रविवार, अप्रैल 05, 2009

किसकी संगत कर ली, यार!!

आपकी पहचान यह नहीं होती कि आप क्या हैं या कौन हैं-समाज आपको आप किनके साथ उठते बैठते हैं, उससे आंकता है.

आप जिनके साथ उठते बैठते हैं, ज्यादा समय बिताते हैं वो निश्चित ही आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. (इसके कुछ अपवाद आपको अपने ब्लॉगजगत में भी मिलेंगे जो सुधरने का नाम नहीं लेते मगर बड़े बड़ों के संरक्षण में पले जा रहे हैं-खैर, उनसे क्या करना, उन्हें तो इग्नोर करते रहूँ, उसी में मेरी भलाई है और उनका अंत).

शायद इसीलिए कहा गया होगा ’संगत कीजे साधु की’

कुछ सालों पहले जब ब्लॉगिंग शुरु की तो एकाएक वाह वाह कहने की आदत सी पड़ गई. पत्नी घर पर खाना परोसे और हम कह उठें-वाह वाह, बहुत खूब!! इस चक्कर में वैसी ही तरोई और लौकी की सब्जी तीन तीन दिन तक खाना पड़ी मगर आदत के चलते मजबूर.

दो साल पहले पूरे मसिजीवी परिवार को हमसे साधुवाद की ऐसी छूत लगी थी कि पहाड़ों पर घूमते वो परिवार बादल से लेकर जल तक का साधुवाद करता रहा और कहता रहा आकाश से कि क्या चित्र उकेरा है, बहुत खूब!!

आज जब ब्लॉगजगत का विचरण करता हूँ तो पाता हूँ कि कितने ही एक दूसरे से प्रभावित हैं. जिसे देखो वो कहता है कि बहुत उम्दा...बेहतरीन अभिव्यक्ति...अति भावपूर्ण. और भी जाने क्या क्या.

एक नया सा चलन आजकल देखने में आ रहा है-जो भी दस दिन से ज्यादा अंतराल के बाद लिख रहा है वो पहले अपनी अनुपस्थिति की क्षमा मांगता है कि माफ करियेगा इतने दिन आपके बीच नहीं आ पाया. वैसे सच सच कहें तो अगर वो बताते नहीं तो हमें पता तक न चलता कि वो इतने दिन से आये नहीं. किसे इन्तजार था भाई.

ये तो वो जगह है दोस्तों, जहाँ आ गये तो वाह वाह-न आये तो वाह वाह!! टंकी पर चढ़ जाओ तो वाह वाह!! उतर आओ तो वाह वाह!! वहीं रह जाओ तो भी वाह वाह!! हो चुका है ऐसा और लोग अपनी मूँह की खाये उतरते भी दिखे हैं. अगर दस दिन से ज्यादा का अन्तराल क्षमा मांगने का तय हो जाये तो जाने कितने ब्लॉगर ’क्षमा देहि’ का कटोरा लिए घूमते नजर आयें. जीतू (अरे वो नारद वाले) तो खुद ही कटोरा बन जायें ऐसा अन्तराल रहता है उनका.

कई बार सोचता हूँ कि काश, यह ’व्यवहार बदलाव’ ’प्लेटफॉर्म इन्डिपेन्डेन्ट’ (मंच उदासीन-ज्ञान जी से एफेक्टेड) (उन्मुक्त जी सुन रहे हो) होता तो कितना बढ़िया होता. ब्लॉगर से साहित्यकार प्रभावित होते और साहित्यकारों से ब्लॉगर. दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. जैसे कई बार पूरे शरीर में जहर न फैल जाये इस लिहाज से पैर काट कर अलग कर देना इन्सान झेल जाता है अन्य लाभ देखते हुए.

आम जन से नेता प्रभावित होते और नेता से आम जन. पुनः, दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. शायद कोई नेता इस प्रभाव में कह उठता कि आम जन तकलीफ में है, नेताओं को कुछ करना चाहिये. कुछ तो भला हो ही जाता.

कुछ समय पहले ब्लॉगजगत का प्रभाव कुछ यूँ होना शुरु हुआ कि मैं तो घबरा ही गया.

एकाएक एक मित्र से दूसरे मित्र के बारे में पूछा और साथ में कहा कि यार, वो कुछ स्वभाव से ठीक नहीं लगता.

आम आदमी के स्वभाव की तरह उस मित्र ने भी हाँ मे हाँ मिला दी और हमने जाकर दूसरे मित्र को बता दिया कि यार, तुम्हारा स्वभाव उस मित्र को पसंद नहीं.

बस, बात का बतंगड़ बन गया. कुछ मित्रों ने बैठ कर मसला हल कराया तो बात खुल कर सामने आई और हम फंसने लगे. अब क्या रास्ता था. बस दांत चियारे हम कह उठे कि अरे भई, हम तो यूँ ही मौज ले रहे थे और आप सब इतने छुईमुई कब से हो गये कि बुरा मान गये.

बात आई गई तो हो गई मगर हमने इस कुप्रभाव को तुरंत झटक कर अपने से अलग किया. तुरंत समझ गये कि इस तरह की बातें ठीक नहीं. इसमे ध्यान देने योग्य है कि हम समझ गये वरना कौन समझ पा रहा है. :)

इधर कुछ दिनों से मेरी आदत और भी कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुई है.

कल पत्नी मोहित हुई और कहने लगी कि क्या तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो, जितना की मैं?

अब बताओ, क्या जबाब है इसका और वो भी इस उम्र में? बहु, बच्चों के घर में ऐसी बातें, क्या शोभा देती हैं?

ब्लॉग प्रभावित हम कह उठे: ’बूझो तो जानें?"

आजकल जिस ब्लॉग पर देखो, यही तो है. यहाँ तक की रचना जी भी इसी काँटे में अटक गई हैं, इससे तो उनका खौफ लोगों पर से जाता रहेगा, मगर उन्हें समझाये कौन? :) (स्माईली प्रोटेक्शन के लिए, हालांकि उनसे ठिठोली करना मेरा हक है और मुझे स्माईली की जरुरत नहीं, कम से कम रचना जी के सामने)

अब पत्नी का पारा तो सातवें आसमान पर कि इसमें वो क्या बूझे. किसी तरह मनाया और उसने बुझे मन से पूछा, ’खाने में क्या खाओगे आज?’

हम तो प्रभावित वातावरण के जीव, पूछ बैठे कि ;"क्या खिलाओगी, कुछ क्लू तो दो, रामप्यारी "

अब ये रामप्यारी कौन है, इस पर बखेड़ा मचा है और हम ताऊ रामपुरिया का फोन ट्राई कर रहे हैं जो कह रहा है कि ’आप कतार में हैं, कृप्या प्रतिक्षा करें.”

न जाने और कौन कौन क्या लफ़ड़ा कर बैठा है और ताऊ से बात कर रहा है.

अब आजकल की आदत के अनुसार:

मै कौन: बूझो तो जरा!! (क्लू नीचे देखो)

कौन सा वाला?


रामप्यारी का क्लू:

जय हो!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अप्रैल 02, 2009

जैसे दूर देश के टावर में-गुलाल

हमारे खास हितचिन्तकों का (विशेष तौर पर संजय बैंगाणी जी) कहना है कि मुझे फिल्म देखने देने पर बैन लग जाना चाहिये क्यूँकि मुझे कोई फिल्म पसंद ही नहीं आती. वैसे मैने खुद पर बैन लगा रखा है मगर पत्नी की जिद पर कोई बैन लगवा दे, तो आजीवन आभारी रहूँगा. वैसे आभारी तो मल्टी पलेक्स का हूँ ही जो रिकलाईनर के माध्यम से इतना बढ़िया सोने का इन्तजाम कर दिये हैं पिक्चर हॉल में.

उस दिन कलकत्ता में था. रात पत्नी और साली की जिद हुई कि मूवी देखने चलें तो टाल न पाया. अब देखो क्या हाल हुआ: IMOX का थियेटर और पेट भर भोजन के बाद गद्दीदार लेटने योग्य सीट के साथ फिल्म देखने की शुरुवात.

अच्छा, ऐसा मानो कि ब्लॉगर्स को लेकर फिल्म बनायें. चलो, फुरसतिया जी हीरो..थोड़ी देर काम करवाया-पसंद नहीं आये, हटाओ और अब डॉ अनुराग हीरो, अरे, वो भी नहीं जमे. चलो जाने दो, अब समीर लाल हीरो..वो भी फिस्स..फिर कोई और. फिर कोई और..हीरोईन जो भी बन जाओ. कोई नहीं जमा. सब एक दूसरे को गोली मार दो. सब मर जाओ. अब, हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन. बाकी सब मर गये, क्या पूछ रहे हो यार?? कि ये हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन-ये कौन लोग हैं. इनको तो कभी ब्लॉग पर देखा नहीं. सही है, हमारी तरह ही गुलाल देख कर भी आखिर में हीरो हीरोईन के बारे में यही कहोगे-उनको भी कभी देखा नहीं. आखिर में सबके मरने पर एकाएक भये प्रकट कृपाला टाईप आ गये. शायद कुछ लोग जानते हों तो वो तो हरी और रुक्मणी को भी जानते होंगे तो उससे क्या लेना देना.





यूँ भड़ास ब्लॉग से गुरेज कि गाली गलौज सब लिखी होती है. जो भी बात गले में अटक गई हो, उसे उगल दी जाती है और इस फिल्म पर वाह वाह!! सिर्फ इसलिये कि फिल्म है और अनुराग कश्यप की है. नाम की महिमा भी अपरंपार है. भड़ास की गालियों और भाषा की तो फिर भी वजह है कि भड़ासी लय में गाली बक कर हल्का हो लेता है और शायद उद्देश्य भी यही है मगर यहाँ तो बगैर वजह, निरुदेश्य और बिना सुर ताल के सब चालू रहे और लोग बैठे देखते रहे.

ऐसे देश में ,जहाँ हर नेता अपने कुकर्मों की कालिख अपने मूँह पर पोते घूम रहा हो और हम उसे फिर भी अलग से पहचान कर अनजान बने हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि हमने इसे अपनी किस्मत मान हालातों से समझौता कर लिया है. ऐसे देश में जहाँ की एक बहुसंख्यक आबादी अपने आपका असतित्व बचाये रखने के लिए मुखौटा लगाये घूम रही हो. वहाँ चेहरे पर गुलाल पोत कर, भले ही सांकेतिक, एक रंग होना न जाने किस आशय और मकसद की पूर्ति कर रहा है, यह समझ पाना मुश्किल सा रहा. फिल्में देश और काल के मद्दे नज़र न बनें तो जादू देखना ज्यादा श्रेयकर होगा. संपूर्ण तिल्समि दुनिया. क्या आधा अधूरा देखना.

ऐसे देश में, जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की-समझ से परे ही रहा.

अक्सर फिल्म की कहानी को भटकते देखा है मगर इस फिल्म में तो कहानी भटकी, डायरेक्शन भटका, हीरो हीरोईन भटके और यहाँ तक कि दर्शक भी भटक गये. ऐसे भटके कि घर आने का रास्ता खोजना पड़ा.

गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन...नाचते देख तब्बू की हमशक्ल को लगा कि यही हीरोईन है मगर वो नहीं थी. दूसरी ही निकली जिसकी कतई उम्मीद न थी. अरे, वही, उपर फोटो वाली गुलाल पोते. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अप्रैल 01, 2009

एक मुद्दत से तमन्ना थी...कलकत्ता देखने की.

गाना बज रहा है:

एक मुद्दत से तमन्ना थी, तुझे छूने की.....

सोचता हूँ वाकई, एक मुद्दत से तमन्ना थी..कलकत्ता नहीं देखा. देश के अनेक शहर देखे, विदेश के अनेक शहर देखे मगर नहीं देखा तो कलकत्ता!! बस, यही तमन्ना पूरी करने निकल पड़े २१ मार्च को कलकत्ता के सफर पर और एक नहीं अनेक तमन्नाऐं पूरी होती देखते रहे..शिव मिश्रा से मिलना, मीत भाई से मुलाकात, रंजना की फोन पर फटकार कि पहले काहे नहीं बताये कि आ रहे हो वरना हम भी आ जाते. छोटी है न!! रुठने मचलने का हक है तो फटकार सुनते रहे और मना भी लिए. वो भी मान गई, खुश हो गई कि अगली बार जरुर मिलेंगे.

क्रिकेट के शौकीन और नियमित खिलाड़ी शिव की फिटनेस प्रभावित करती रही. हमपेशा चार्टड एकाउन्टेन्ट हैं तो अनेकों मुद्दों पर व्यवसायिक सोच भी अति प्रभावशील रही.

कलकता स्टेशन पहुँचे ही थे कि सामने से आता एक नौजवान पहचाना सा लगा. आते ही चरण स्पर्श पहले हमारे फिर पत्नी के. पत्नी गदगद कि कितने संस्कारी मित्र हैं उनके पति के. जैसा शिव के बारे में सोचा था उससे भी ज्यादा संस्कारी और उर्जावान पाया.

बड़ी सी गाड़ी ले कर आये थे हमारे साईज का ख्याल करके मगर वो भी कम ही पड़ गई. दरअसल हमारी बिटिया जैसी साली का परिवार भी साथ था और उस पर से उसी समय ट्रेन मिला कर पत्नी की बड़ी बहन ने भी साथ कर लिया रुड़की से आकर. तब शिव ने तुरंत अपने दफ्तर से एक और बड़ी गाड़ी बुलवाई और हम सब रवाना हुए उस होटल के लिए जो शिव ने बुक कर रखी थी हमारे लिए पहले से. उम्दा व्यवस्था, उम्दा कमरा..वाह!! हमें छोड़ कर और शाम का प्रोग्राम बनाकर शिव ऑफिस वापस लौट गये.

शाम उनके बताये अनुरुप आसपास घूमें और अगले रोज सुबह शिव गाड़ी के साथ फिर हाजिर. गाड़ी दिन भर हमें कलकत्ता घुमाती रही उस दिन भी और अगले रोज भी जब हमें जलपाईगुड़ी के लिए निकलना था गंगटोक और दार्जलिंग जाने के लिए. घूमते फिरते कलकत्ता तो ऐसा समझ आया कि खूब खाओ, दवा लो और सो जाओ. जब नींद खुले तो फिर खाओ. हर तरफ खाने की दुकानें या फिर दवा की और दिन में बाकी सब दुकानें बंद मतलब की सोने चले गये.

अगले रोज शिव मीत को लेकर आये. मीत से हमारी बात पहले दिन ही हो गई थी मगर मुलाकात अगले दिन हुई. सारा परिवार बाजार में शिव की गाड़ी लिए घूम रहा था और हम, शिव और मीत कमरे में बैठे वार्तालाप में व्यस्त थे.


कलकत्ता: शिव, समीर और मीत

मीत कम बोलते हैं मगर पुख्ता बोलते हैं. पुख्ता इसलिए कि हमारे लेखन की उन्होंने तारीफ की कम बोलने के बावजूद भी.

बहुतेरी बातें हुई. फुरसतिया जी का फोन भी उसी दौरान पहुँचा, तो उनके बारे में भी बात हुई. खराब बात और बुराई करने से तीनों को ही परहेज था तो फुरसतिया जी के विषय में बात शुरु हुई और तुरंत ही रुक गई. :)

शैलेष द्वारा आयोजित ब्लॉगर मीट पर भी विशेष चर्चा हुई. पाया गया कि इस तरह की ब्लॉगर मीट से कुछ ऐसा संदेश जाना चाहिये जो अन्य क्षेत्रों को प्रेरित करे इस तरह के आयोजनों के लिए.

करीब दो घंटे की चर्चा में बैंगाणी बंधु, डॉ अनुराग, कुश, पीडी, नीरज बाबू ताऊ, भाटिया जी, अरविंद मिश्रा, चौखेर बाली, पंगेबाज, ज्ञान जी, शास्त्री जी, राकेश खण्डॆलवाल, प्रमोद सिंग, प्रत्यक्षा जी, अनूप भार्गव, विश्वनाथ जी, जबलपुर ब्लॉगर आदि आदि अनेक लोग आये और सहजता के साथ निकल गये.

मिलन मजेदार रहा. लघुकथा पर विशेष चर्चा में इस ओर ध्यान देने की आवश्यक्ता पर जोर दिया गया. कलकत्ता के ब्लॉगर बालकिशन जी का आना भी तय था किन्तु किंचित व्यवसायिक व्यस्तताओं के चलते रह गया.

पूरी यात्रा में शिव की मेहमान नवाजी का क्या कहें. हम तो घर के ही कहलाये तो कैसे मेहमान. बाकी तो झेला शिव ने है, वो बेहतर बतायेंगे. :) हमारा तो सारा परिवार अब तक शिव स्तुति में लगा है जबकि लौटे हुए २४ से ज्यादा घंटे हो गये हैं.

उनके सौजन्य से मछली खाते जबलपुर लौट रहे थे तो रास्ते में इलाहाबाद में परमेन्द्र महाशक्ति मिलने आये. पिछली बार ट्रेन छुटने के बाद पहुँचे थे तो इस बार दस मिनट पहले से स्टेशन पर मौजूट फोन पर टिकटिका रहे थे. चरण स्पर्श की परंपरा से उन्होंने भी पत्नी को अभिभूत किया, बहुत मजा आया इस युवक से मिल कर भी. बड़े सपने हैं इसके पास और भविष्य की अनेक योजनाऐं. मुझे बेहद उम्मीदें हैं परमेन्द्र से. मिलने पर असीम आनन्द की प्राप्ति हुई. जल्द ही फिर मिलने का वादा है. इलाहाबाद में और किसी को सूचना भी नहीं दे पाये थे तो मुलाकात भी नहीं हुई.

इलाहाबाद: समीर और परमेन्द्र

हर मिलन में बस एक ही बात पूरी होती दिखी:

एक मुद्दत से तमन्ना थी.....

बाकी तो शिव, मीत और प्रमेन्द्र ही बतायेंगे अपनी कलम से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मार्च 19, 2009

चितरंजन अस्पताल का कमरा नं. ४११: एक बुजुर्ग की डायरी-२

(आज उसी बुजुर्ग की डायरी का एक और पन्ना, जिसे आपने पहले पढ़ा था: पीले पन्नों में दर्ज हरे हर्फ शीर्षक के तहत (अगर न भी वो पन्ना पढ़ा हो तो भी यह पूरा है मगर उसे पढ़ने के बाद इसे देखने में ज्यादा जुड़ा महसूस करेंगे, बस्स!! )

एक अंदाज बस है कि शायद रात के तीन बजे के आस पास का समय होगा. नींद एकाएक सामने की सड़क से जाते ट्रक के हॉर्न से टूटी है.

पलंग से लगी खिड़की से लेटे लेटे बाहर झांकता हूँ आकाश में. आज कुछ भूरा सा रंग लिए है न जाने क्यूँ. बाहर क्या पता कि कैसा मौसम होगा-शायद महिने के अनुसार गरम ही हो. मगर कमरे में ए सी चल रहा है बिना किसी आवाज के शीतल वातावरण निर्मित करता.

विज्ञान की प्रगति के साथ प्रकृति से साथ छूटा. आप अपना वातावरण खुद निर्मित करने में सक्षम हुए. गरमी में सर्द या सर्दी में गर्म. मानव को एक अहंकार का भाव मिला. कमरे में रुम फेशनर की खुशबू से फूलों सी महक भरी है जबकि अस्पताल के ठीक नीचे बहता नाला जाने कितना बजबजा रहा होगा किन्तु मुझे उससे क्या लेना देना. मैं आत्म मुग्ध, अपने निर्मित वातावरण में.

अक्सर ही पाया गया कि अपने अनुरुप गढ़ा गया वातावरण, कहीं न कहीं शायद अहंकार की वजह से, वो नैसर्गिक सुख देने से वंचित हो जाता है जो हम अपने समय में सुविधाओं के आभाव में प्रकृति से जुड़ कर पाते थे. अब न गर्मी में छत पर खुले में सोने वाले और पड़ोसियों से छत से गपियाने वाले दिन रहे और न ही सर्दी में अँगीठी की आँच सेकते कमरे में रजाई में गुमड़ियाने के दिन जब मटर की गर्मागरम घुघरी हरी मिर्च और लहसून की चटनी के साथ अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थी.

चितरंजन अस्पतालकमरा नं.४११

मैं चितरंजन अस्पताल में भरती हूँ कमरा नम्बर ४११. सीने में तीन दिन पहले दर्द उठा था शायद गैस की वजह से. दिन भर दबाये रहा मगर जैसा कि इस दर्द की शक्शियत है, रात को असहनीय हो उठा और बेटे को आवाज देनी ही पड़ी. आज बाजू में केयर टेकर के बिस्तर पर इस प्राईवेट एक्ज्यूकिटिव सूट के शानदार कमरे में बड़ा बेटा सोया है मेरी केयर करने को. बड़ी कम्पनी में अधिकारी है तो उसके पिता इससे कम सुविधा वाले कमरे में कैसे भरती रह सकते हैं.

सुबह ८ बजे बड़ी बहू नौकर के साथ आ जायेगी मेरे लिए चाय और नाश्ता लेकर. तब बड़ा बेटा घर चला जायेगा और नहा धो कर दफ्तर जायेगा. इस बीच छोटा बेटा ९.३० बजे यहाँ चला आयेगा ताकि बड़ी बहू घर जा सके. वो ११ बजे तक यहीं रहेगा. सूप वगैरह वो ही लायेगा. फिर ११ बजे छोटी बहू आ जायेगी और मेरे पास ही रहेगी २ बजे तक, जब बड़ी बहू वापस आयेगी लंच लेकर ताकि छोटी बहू घर जाकर छोटी और बड़ी बहू के स्कूल से लौटते बच्चों की टेक केयर करे.

अब ६ बजे छोटा बेटा दफ्तर से आकर मेरे पास रहेगा, बड़ी बहू घर जायेगी. वो मुझसे बात करेगा. डॉक्टरर्स से बात करेगा. आते रिश्तेदारों से सिर्फ और सिर्फ मेरी ही बात होगी. सब मेरे ही आसपास केन्द्रित रहेंगे. फिर छोटी बहू आकर रात का खाना खिलायेगी, मेरे तो हाथ में आई वी लगा है, खुद से खा ही नहीं सकता. तब थोड़ी देर में बड़ा बेटा आ जायेगा और वो रात भर रहेगा. यही दिनचर्या है जबसे यहाँ भरती हुआ हूँ.

अपनों का और अपने बेटों का इतना सानिध्य और अपनपा-इतनी मेरे और सिर्फ मेरे विषय में बातचीत और सब कुछ मुझ पर ही केन्द्रित देखे तो ५ बरस बीत गये, जब पत्नि मरी थी. क्या पता मैं ही मर गया था शायद. दोनों बेटे, दोनों बहूऐं सब मेरे साथ ही एक ही घर में रहते हैं मगर यहाँ मेरे ही कमरे में-मुझसे बात करते और मेरे ही लिए. यही बस अलग सी बात है यहाँ जो मुझे इतनी खुशी दिए जा रही है अपनी बीमारी की.

आई वी से टपकती बूँद बूँद ग्लुकोज की मिठास में पूरे वातावरण में अहसास रहा हूँ. जुँबा पर कोई स्वाद नहीं, बस अहसास, ठीक ग्लुकोज की मिठास सा.

कितना ही अच्छा लग रहा है मुझे कि मैं बीमार हुआ. लेकिन जाहिर भी तो नहीं कर सकता यह बात.

मेरी अशक्त्ता नें मुझे डरपोक बना दिया है शायद. हर वक्त डर रहता है कि मेरी कोई बात से मेरा ही कोई बच्चा नाराज न हो जाये. सामने हैं, दिखते रहते हैं तो एक मानसिक संबल रहता है. भले ही उनके पास मेरे लिए समय न हो.

डॉक्टर का कहना है कि जल्दी ही डिस्चार्ज कर देंगे.

है भगवन, मैं ठीक होकर अपने ही बनाये उस घर लौटना नहीं चाहता- मैं उस भरे पूरे घर के अपने एकाकी जीवन में, जहाँ होने को ये सब हैं पर मेरे पास कोई नहीं, लौटना नहीं चाहता. बस, वहाँ मैं और मेरे ही घर में मेरे कमरे तक सीमित मैं. मुझे तो तू अपने साथ यहीं से ले चल.

मैं अपने साथ अपनों की वो मधुर स्मृतियाँ ले जाना चाहता हूँ जो पिछले तीन दिनों में मैने सहेजी हैं मानो कि पत्नि के जाने के बाद के ५ बरस मैनें इन तीन दिनों के इन्तजार में ही जिए हों.

मगर भगवन, तू जल्दी कर, मैं अब भी चाहता हूँ कि मेरे बच्चे, समाज में अपनी पोजिशन बनाये रखने के लिए, अपनी इस नियमित कठिन अस्पताल आने जाने की जिम्मेदारियों से जल्दी मुक्त हो अपनी उन्मुक्त जिंदगी बितायें.

हे प्रभु, तुम सुन रहे हो न!!! बड़ा बेटा अभी बाजू के बिस्तर में गहरी नींद में है. चल, मुझे चुपचाप ले चल!!!!

(नोट: पिछली बार कुछ लोगों को लगा कि मैं अपनी डायरी का पन्ना दे रहा हूँ. एक स्पष्टीकरण देना चाहूँगा कि यह मेरी डायरी नहीं बल्कि अपने आस पास महसूस कर मैं एक बुजुर्ग को जीने का प्रयास कर रहा हूँ इन पन्नो के माध्यम से ताकि उन्हें मैं और आप बेहतर समझ सकें और उन्हें यथोचित मान सम्मान और समय देने का प्रयास करें.)

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चलो, अब मामला भारी सा हो लिया है तो एक नई रचना सुनो और खुश हो लो. डायरी उनकी, दर्द उनका..हमें क्या, हम ऐसे ही तो जीने के आदी हैं. तो फिर रचना हमारी-मुस्कान आपकी -की दरकार के साथ.


चुनाव का माहौल है तो उससे प्रभावित पहले कुछ शेर फिर कुछ चुलबुले भी, मूड ठीक करने को:


झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

तू दगा करता उन्हीं से, जो भी तेरा साथ दे
वार करते साथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

यूँ जमीं कब्जे में करके, दे गया तू मशविरा,
घर बसा लो नालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

कब गुजर संभव किसी की, इस कविता पाठ से,
मिल रही इन तालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

-समीर लाल ’समीर’


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सूचना:


१. कल १० दिनों के कलकत्ता और सिक्किम के प्रवास पर जा रहा हूँ. कलकत्ता में शिव भाई दौड़ा भागी में लगे सब इन्तजाम कर रहे हैं और मीत भाई से भी मुलाकात तय है. वापसी ३१ मार्च की है.


२. १८ मार्च की संजय तिवारी ’संजू’ के संदेशा द्वारा प्रस्तुत श्री विजय शंकर चतुर्वेदी जी (आजाद लब) के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज की रिपोर्ट में यह बात हमारे संजय साहब आराम से दबा गये कि मैने जबलपुर के सभी ब्लॉगर्स को न्यौता देने की जिम्मेदारी उन पर रख छोड़ी थी.

थोड़ी गल्ति मेरी थी कि सब कुछ तय शाम ५ बजे पाया गया और संजय तक सूचना पहुँचते ५.३० बज गया और सब ७.३० बजे एकत्रित हो लिए जिन को भी वो सूचित कर पाये. बहुतों तक इस सूचना के न पहुँच पाने का मुझे दुख है. आगे फिर किसी दिन जल्द ही कनाडा वापस लौटने के पहले. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 15, 2009

बिल्लु की जगह बिल्ली भी चलता..

हमारे मोहल्ले का गरीब नाई. पुरानी स्टाईल वाला. बस, एक टूटी कुरसी, पुराना आईना और टूटे फूटे औजार. क्या चलेगी उसकी दुकान ऐसे दिखावे के बाजार में जहाँ प्रोडक्ट से ज्यादा शो पानी बिकता है. तो नहीं चलती थी.

एकाएक हमारे गाँव में बॉलीवुड सुपर स्टार शूटिंग करने आ जाता है और लोगों में पता नहीं कहाँ से हवा फैल जाती है कि ये नाई उसका बचपन का दोस्त है.

लोग समझते नहीं हैं, हमारे गाँव में तो अमरीका से बुश भी आ जाये, तो उसके साथ के बचपन के पढ़े पाँच सात तो पान की दुकान पर गपियाते मिल जायेंगे. मूँह चलाने में कोई पैसे थोड़ी ही न लगते हैं.

बस, फिर क्या!! आज की दुनिया में लोग तो वक्त के दोस्त होते हैं आपके थोड़े न!! आपका वक्त अच्छा, तो आपके दोस्त वरना नहीं पहचानते. इसी हल्ले में उसकी दुकान चल निकलती है. नाई की पूछ परख बढ़ जाती है. सब उसे जरिया बना कर सुपर स्टार से मिलना चाहते हैं.

अरे, जो खुद ही नहीं सुप स्टार से मिल पा रहा वो क्या किसी को मिलायेगा. इत्ती सी बात बहुत समय निकल जाने के बाद लोगों को समझ आती है और फिर जैसा मैने कहा, लोग वक्त के दोस्त होते हैं. सब उसे दुत्कार देते हैं और वो फिर से पुराना वाला नऊआ.

गांव के एक स्कूल में शूटिंग के आखिरी दिन सुपर स्टार स्कूल के बच्चों के लिए रखे गये कार्यक्रम में किसी तरह समय निकाल कर पाँच मिनट के लिए आता है और फिर ऐसा रह जाता है जैसे जाना ही न हो. अपनी जीवनी सुनाता है और अपने बचपन के दोस्त नऊए का जिक्र कर बैठता है.

फिर क्या, सब उसे लेकर नऊए के यहाँ आ जाते हैं. सब घर के बाहर और सुपर स्टार अंदर. गला मिलन और एक मिनट में बचपन की याद, बात और फिर सुपर स्टार का उसे ऑफर कि तू पुराने गाँव में जाकर बस जा, तो कभी हम पुराने दिन फिर से जी लेंगे और सुपर स्टार रवाना वापस बम्बई.

अब बताओ, पुराने गाँव में धरा क्या है? कुछ होता तो क्या नाई यहाँ आता? न पैसा न कौड़ी, कुछ भी प्रामिस नहीं किया और कह गये, जाकर बस जाओ-कहाँ बस जाये? बस स्टैंड पर कि कुछ मकान दुकान खरीद के दोगे? कहानी खत्म!!

ये हम सोच सोच कर कहानी नहीं बनायें हैं. ये है बिल्लू बार्बर फिल्म की कहानी. नाम फिल्म का यह भी हो सकता था ’मैं किंग खान’ या ’शाहरुख’ या ’क्या देखने आये हो, कुछ काम नहीं है क्या’ या ’अगली फिल्म में मुझे ले ले, ठाकुर!!’ .......कुछ भी. सब इसी तरह फिट होते. फिल्म का नाम ’बिल्लू बार्बर’ मगर फोकस पूरे समय बस शाहरुख खान के प्रमोशन पर.

अगर शाहरुख कोई नया आया कलाकार होता और फिल्म में जरा सी काट छांट करके बिल्लू सिल्लू अलग कर दें, तो भी २ घंटे का शाहरुख प्रोमो बच रह जायेगा जिस सीडी को किसी भी प्रोड्यूसर के पास भेज अगली फिल्म में काम मिलने का इन्तजार किया जा सकता है.

मगर हम तो फिल्म प्रोड्यूस करते नहीं और आप भी कहाँ फिल्में बनाते हैं, अतः आपके और हमारे काम की नहीं.

बिल्लु के बदले: बिल्ली

शाहरुख का होम प्रोड्क्शन है. वो क्लेम कर सकते हैं कि यह फिल्म मेरे प्रमोशन के लिए नहीं बल्कि मित्रता की मिसाल, बाल सखाओं का प्यार, त्याग और बलिदान जैसी बातें बताने के लिए बनाई है तो आप पायेंगे कि पूरे तीन घंटे की फिल्म में ये मित्र आमने सामने मात्र दो मिनट के लिए हैं एक सिंगल प्रेम में. अगर फिल्म की जस्ट समाप्ति पूर्व वो फ्रेम न होता और इन्हें आपस में बताया न जाता तो कहो, ये दोनों जान भी न पाते कि फिल्म में किसके साथ काम किये हैं.

हैप्पी एंडिंग हुई-ऐसा पत्नी ने मुस्करा कर थियेटर के बाहर निकलते हुए बताया. जबरदस्ती दिल्ली की ट्रिप में दिल्ली ६ जैसी फिल्म दिखाने के बावजूद भी (नेक इन्सान एक गल्ति करके संभल जाता है मगर वो!!) दूसरी फिल्म दिखाने ले आई थी तो भला उसके पास चारा भी क्या था सिवाय मुस्कराने के.

हम भारतियों की यही विशेषता है कि जब कुछ समझ न आये, कोई गल्ति हो जाये, बेवकूफ बन जाओ या कोई रास्ता समझ न आये तो बिना लॉजिक दाँत चियार के मुस्कराने लगो. मामला अपने आप सलट जाता है.

खैर, पूरी फिल्म में एक करेक्टर थे जो याद रह गये- कविराज माननीय राजपाल यादव जी. ये छुटकू महाराज हमें यूँ भी पसंद हैं और इसमें तो कवि बने हैं.

मोहल्ले में बताया कि फिल्म तो ऐं वें टाईप थी, बस कवि चूँकि हमारे हम शौक निकले इसलिये ठीक लगे तो बात लोगों को ठनक गई.

सब पीछे लग लिए कि मोहल्ले में 'मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह' के कार्यक्रम में फागुन गीत भी गाया जायेगा, आप जरा फड़कता हुआ गीत लिख दिजिये- जरा लोकगीत की तर्ज पर रहे, यह ध्यान रखियेगा. मोहल्ले में तो ईमेज से ही इन्सान की पहचान होती है फड़कता लिखें तो फड़कती ईमेज बने, सो उसे मेन्टन करने के चक्कर में हम लिखे और दे दिये. अब इसकी धुन बनेगी और कोई महिला मंडल की सदस्या ’मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह” में इसे गायेंगी मगर तब तक आप पढ़ लो. राज पाल यादव के गीत ’बिल्लू भयंकर’ से बेहतर ही सा लग रहा है:


चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

रंग लगा दो,
गुलाल लगा दो,
गालों पे मेरे
लाल लगा दो..
भर भर पिचकारी से मार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

सासु लगावें
ससुर जी लगावें,
नन्दों के संग में
देवर जी लगावें..
साजन का करुँ इन्तजार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

गुझिया भी खाई
सलोनी भी खाई
चटनी लगा कर
कचौड़ी भी खाई..
भांग का छाया है खुमार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

हिन्दु लगावें
मुस्लमां लगावें,
मजहब सभी
इक रंग लगावें..
मुझको है इंसां से प्यार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मार्च 12, 2009

होली पर यह हालत हो ली!!!

देखिये, क्या क्या न बनें हम भी सनम, आपकी खातिर: हा हा!!! जिसका जैसे मन आया, होली पर रंगता चला गया और हम रंगाते चले गये. मजा बहुत इस ब्लॉगरी होली में इस साल.


ताऊ के दर पर:


ताऊ: जय हो!


साहित्य शिल्पी पर योगेश समदर्शी की नजर:


योगेश भाई: वाह!!


मित्र द्वारा ईमेल पर भी लटका दिये गये:


अब तो: ब्लॉग बना लो!


मास्साब पंकज सुबीर के मुशायरे में:


मास्साब: क्या खूब सजाया!!



मास्साब के मुशायरे में नाम मिला समीरा लल्ली कनाडा वाली उड़ने वाली तश्तरी और फिर हमने जो गज़ल पढ़ी, जिसका मिसरा दिया गया था: तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं - वो तो सुनते जाईये (हालांकि आप में से बहुत से लोगों ने तो मुशायरे में ही सुन ली होगी.)



तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं
नहाते नंगे बच्चों के रिसाले याद आते हैं

था ऐसा ही तो इक नाला, तुम्हारे घर के आगे भी
हमें उसके ही किस्से अब, वो वाले याद आते हैं

तुम्हें छेड़ा था हमने बस ज़रा सा ही तो, नाले पर
पिटे फिर जिनके हाथों से वो साले याद आते हैं

तुम्हारा घर था बाज़ू से, नज़र दीवार से आता
हमें उस पर लगे, मकड़ी के जाले याद आते हैं.

हाँ छिप कर पेड़ के पीछे, नज़र रखते थे हम तुम पर
तुम्हारे गाल गुलगुल्ले, गुलाले याद आते हैं.

नशा नज़रों का तुम्हारा, उतारा बाप ने सारा
हमें रम का मज़ा देते, दो प्याले याद आते हैं

मिटा दी हर रुकावट हमने, अपने बीच की सारी
लगाये बाप ने तुम पर जो ताले, याद आते हैं

अँगूठी तुमको पीतल की, टिका कर उसने भरमाया
जो तुमने हमको लौटाए, वो बाले याद आते हैं

चली क्या चाल तुमने भी, जो कर ली गै़र संग शादी
हमें गुज़रे ज़माने के, घोटाले याद आते हैं.

जिगर को लाल करने को, गुलाल दिल पे था डाला
चलाए नज़रों से तुमने, वो भाले याद आते हैं

अँधेरी रात थी वो घुप्प और बिजली नदारत थी
’समीर’ भागे थे जिन रस्तों से, काले याद आते हैं

--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 08, 2009

आओ, तुम्हें होली खिलवायें..

होली आन पड़ी है.

रंगों का त्यौहार है सो रंग लगाये जायेंगे. मस्ती का मौसम है तो मस्त हो जायेंगे. इस दिन तो ऐसा लगता है कि मानो पीने वालों को ओपन लायसेंस जारी हो गया हो कि भाई, खूब पिओ और जो दिल में आये, सो करो. पुलिस के डंडो की गिनती करना पाप है.

पुलिस मुस्तैद है, क़ानून की रक्षा कर रही है. एक बच्चे के जन्म दिन की पार्टी से लौट रहे थे. पी कर गाड़ी चलाने का इल्ज़ाम लगा दिया गया. होली के समय तो आप दूध पीकर भी गाड़ी चलाइए इल्ज़ाम सेम लगेगा. आप कहेंगे दूध है भाई वो कहेंगे पिया तो है ना, बस बात ख़त्म.

१०० रुपये ढीले गए तो पीना जायज़ ठहराया गया और यह भी बताया गया के शराब पीना तो सरकारी काम है भाई. क्या करें हम घर आये तो यह पोस्ट आटोमैटिक लिख गई भाई और जब लिख गई तो पोस्ट तो करै का पड़ी ना दादू.

१०० रुपये में तीन पैग ..पार्टी में तो फ़्री के थे, बुरे नहीं लगे. आगे से चार पिया करेंगे. सस्ता पड़ेगा. अर्थशास्त्र की तो यही सलाह है.

सबको होली मुबारक!!

सब होली के रंग में डूबे ..क्या शिवजी और क्या फ़ुरसतिया..अरुण पंगेबाज भंग से टन्न है. सफ़ाई पेश करने में जुटे हैं. अब देखो क्या होता है, उन्हें यूँ भी होलिका दहन की आग में प्रहलाद उछालने में ज़्यादा मज़ा आता है रंग खेलने के बनिस्बत. जितना मैं उन्हें जान पाया हूँ, उस आधार पर मैथली जी तो मुझसे एग्री करेंगे ही.

होली पर हमारे शहर का माहौल हमेशा एक अलग रंग में रंगा होता था. लुक़्मान क़व्वाल ज़िंदा थे. शहर उमड़ पड़ता था मोदी बाड़े में होलिका दहन की रात उनकी क़व्वाली सुनने अपनी बोतलों और कबाबी चटखारों के साथ.

अब लुक़्मान तो रहे नहीं, मगर होली फिर भी हर साल आती है और उनकी याद को ज़िन्दा रखे हैं हमारे बवाल भाई, उनके शागिर्द और वसीयतदार. अब तो वही हमारे बीच होते हैं .............. और लुक़्मान चचा की याद ये गाकर दिलाते हैं कि----

कुछ ऐसी तसव्वुर की महफ़िल सजाएँ,
जहाँ हों वहीं से उन्हें खेंच लाएँ


...शायद दो तीन दिन में उनके साथ होली मिलन का कार्यक्रम रखूँ, जो अभी रुपरेखा ले रहा है और आप सब को पेश करुँ उनकी बेहतरीन क़व्वालियों की रिपोर्ट बाक़ायदा सुरा के साथ(मुझे ऐसा लिखने में कोई गुरेज़ नहीं, मुझे पसंद है तो है) जैसा पिछले साल सुनाया था. :) पूना से आज जबलपुर आते ही होंगे और आते ही हमसे ना मिलें तो इत्ते की बात.

खैर, जब सब लिख ही रहे हैं तो होली पर हम क्यूँ न लिखें. क़लम कमज़ोर ही सही, मगर अब है तो ग़लती से हमारे हाथ में. और ना हम बन्दर ना हमारी क़लम उस्तरा.

इसलिये सुनिये यह आल्हानुमा रचना और हो हो करें या हीं हीं..जो भी कीजिएगा, होली की मस्ती में काऊंट होगी, समझे कि नाही .



बड़े सबेरे फ़ुरसतिया जी, हमरे घर पे आ धमकायें
क्यूँ तुम घर पर ही बैठे हो, चलो साथ होली खिलवायें

हम बचने की बात सोचते, वो अँखियन रह रह मिचकायें
और कहें कि भांग पिला कर, सब को जमकर रंग लगायें

ज्ञानदत्त उठ घर से भागे, कहते भंग पचा ना पायें
फ़ुरसतिया तब दौड़े पीछे, टंगड़ी मार दिये गिरवायें

देखें जो भईया को गिरते, शिव बाबू यह सह न पायें
छोड़ के गुझिया वाला ठेला, पिचकारी लै दौड़े आयें

फ़ुरसतिया जी जान बचा कर, छुप बैठें गलियन में जायें
देख तमाशा भीड़ भाड़ कुछ, ब्लॉगर टंकी पर चढ़ जायें

कुछ तो ढ़ूंढ़ रहे हैं उनको, कुश काफ़ी पीकर भरमायें
होली है भई बुरा ना मानें, दिनेशराय जी ये समझायें

सभी मान गये कुश की बतियां, शास्त्री स्नेह सहित मुस्कायें
नीरज बोलें ग़ज़ल सुना कर, मौसम को कुछ बदलें आयें

इन बातों पर कुछ तो बोलें और कुछ चुपै-चुप्पे जायें,
बाकी बचे खड़े सहमे से, सज्जनतावश हैं शरमायें

देख बदलते हवा के रुख़ को, लेडी ब्लॉगर बाहर आयें
स्लोली स्लोली रंग उड़ायें, मौजें ले लेकर मुस्कायें

अरुण अरोरा फिर गुस्से में, सीना ताने सामने आयें
हिम्मत है तो उनको रंग लें, सीधों को ना यहाँ सतायें

भांग पिला लें रंग लगा लें, जब हम अपनी पर आ जायें
नीले-पीले-लाल-गुलाबी, दुनिया भर को हम रंग जायें

कीचड़-गोबर-ग्रीस है संग में, मथुरा की होली खिलवायें
कुर्ता अपना फाड़ फाड़ कर, फ़ोटो हर एंगल खिंचवायें

अरविंद जी इतना सुनकर, कूद सामने मंच पे आयें
नर-नारी विज्ञान की फ़ोटो, सबको तुरत-फ़ुरत भिजवायें

नारी शक्ति जाग रही पर, ताऊ भैंस बने पगुरायें
राज भाटिया लाल बुझक्कड़, बूझ बूझ कर मगज फिरायें

सबको होली बहुत मुबारक, सब मिलकर के पर्व मनायें
प्राण साब हैं साथ में सबके, जो चाहें जी वो लिख जायें

अर्श पटापट ग़ज़लें लिख-कर, छोटी बड़ी बहर समझाएँ
पर्दा-पीछे खड़े सुबीरा, रंग भरी पट्टी पढ़वायें

संजय-पंकज नाच रहे हैं, आर्या जी मेकअप करवायें
क्या केने क्या केने भाया, झूम झूम आलोक भी गायें

अमर डाक्टर खटिया तोड़ें, मौदगिल दाढ़ी ख़ूब खुजायें
भूतनाथ भये आज तो सबरे, होली का मतलब समझायें

मीत-अजीत भी कहते कुछ कुछ, मगर किसी को सुन्नै नायें
मसिजीवी फिर भाँग मसक कर, नीलम नोट पैड संग आयें.

पूजा मैडम डिग्री टाँगे, साथ पल्लवी को ले आयें
रचना जी सब ताड़ रही हैं, नारी को कुछ कह न पायें

रंजू जी भी खड़ी मंच से, प्रीतम दी की कथा सुनायें
पारुल जी गाती मुस्का कर, मीत गीत गंभीर सुनायें

अनिल पुसदकर लोट रहे हैं, पानी पानी वो चिल्लायें,
तिलक की होली हम न खेंले, पाणी बेंगाणी ले आयें

पीडी टांग तुड़ा कर बैठे, सबको अपनी व्यथा बतायें,
आदि की जब बाजे ताली, देख देख सब मन हर्षाये

जज मनीष बैठे कुर्सी पर, गीतों की पयदान बतायें
जाट मुसाफिर के किस्से भी, ठिठक ठिठक सब सुनते जायें

रंग में डूबे ब्लॉगर सारे, क्या मालूम कब क्या कर जायें
इतने सारे लोग जमा हैं, डर है मंच टूट नै जायें

जिसको जो भाये सुन ले, कोई ढपली कोई शंख बजायें
ब्लॉगीवुड की कवरिज करने, टीवी संग अखबार भी आयें

राकेश गीतकार के संग-संग लगे दिगम्बर गाना गायें
भंग चढ़ा कर कविता करने, दुबई तलक भी पहुँचें जायें

चिट्ठाजगत-ब्लॉगवाणी और नारद को कैसे बिसरायें,
जिसमें दर्ज हजारों ब्लॉगर, सब होली के रंग रंगायें.

जितने ब्लॉगर जबलपूर में, उतने किसी सहर में नायें
सबको प्यारे दुनिया भर में, भारत का परचम लहरायें

मिश्रा-मुकुल, डुबे संग शैली, रंगों से आकाश सजायें
पंकज स्वामी ‘गुलुश’- गार्गी, भगवत कथा कहो पढ़ जायें

साज़-प्रेम फ़र्रुख़ाबादी, किसलय से भंगिया घुँट्वायें
विवेक रंजन बिजली का बिल, संजय के घर पर भिजवायें

कृष्णानंन्दं चलते चलते, बात हमारी सुनते जायें
होली में सब बैर भुला दें, प्रेम के रंग में रंग सब जायें

उड़नतश्तरी पर सब बैठें, सुनकर आल्हा घर को जायें
सीमा में जब हों बवाल तो, सब Regards वैसे ही पायें


सभी को होली महापर्व की बहुत बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!! और हाँ !!! सबको जबरन साधूवाद भी. हा हा. :)

चलते चलते :-

ब्लॉगर बिग बच्चन के पूज्य पिताजी
डॉ. हरिवंशराय ‘बच्चन’ की अमरकृति मधुशाला से ---

एक बरस में एक बार ही, जगती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किन्तु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला

(धुरेड़ी के दिन याने ११/३/२००९ को हमें बवाल के संग लाल एण्ड बवाल पर आप सब ज़रूर मिलिएगा, तब तक के लिए ...........जय रंग.......हुड़दंग) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 01, 2009

आओ, ब्लॉग सालगिरह का केक तो खाते जाओ!!

आज देखते देखते इस ब्लॉगजगत में तीन साल पूरे हो गये. बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया. नये मित्र बनें, मिले और बात हुई. अब तो यह एक शौक के बदले जीवन शैली सी हो गई है. आप सबका असीम स्नेह प्राप्त हुआ. लिखने का हौसला मिलता रहा. गुरुगण सिखाते रहे. बेहतरीन सफर चला और आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि आपका स्नेह ऐसे ही प्राप्त होता रहेगा और यह खुशनुमा सफर यूँ ही चलता रहेगा.

इस सालगिरह के मौके पर आप सब के लिए केक:

ये रहा: केक


वैसे तो तीन साल की उम्र कुछ खास तो नहीं होती है किन्तु उम्र से न सही, दूसरों के अनुभवों से तो सीखा ही जा सकता है. यूँ भी एक उम्र के बाद व्यक्ति उम्र के साथ साथ जिम्मेदारियों से बड़ा होना शुरु होता है. जैसे कि माँ बाप का साया हटना, बच्चों, भाईयों, बहनों की जिम्मेदारी व्यक्ति को खुद ब खुद बड़ा एवं जिम्मेदार बना देती है.

अमिताभ के ब्लॉग पर पढ़ता था कि:

दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।

बात जचीं. बचपन में और बड़े होने पर भी बाल सुलभ हरकतें और बाल मन अच्छे लगते हैं किन्तु एक उम्र के बात भी वही रट कि मैं तो अभी बच्चा हूँ, मैं तो अभी बच्चा हूँ और उज्जडता जारी, जरा अच्छा सा नहीं लगता और सहज तो कतई नहीं. बस, इन तीन सालों में सही उम्र के सही लोग, बड़ी उम्र के बड़े, बड़े होकर भी उज्जड बच्चे बने आदि सभी से मिलने का मौका मिला. सभी से अनुभव लिए और सभी से सीखने का मौका मिला, उनका आभार दर्ज करना चाहता हूँ.
आजकल पोस्ट भी अनियमित है और टिप्पणी तो न के बराबर ही कर पा रहे हैं. कल ही दिल्ली से बहुरानी को लंदन के लिए रवाना करके लौटे. अब शायद कुछ समय मिले. दिल्ली में फिल्म भी देखी, उसी के बारे में सुन लें:


दाँये और बाँये दोनो तरफ दिल वालों की दिल्ली

दो रोज पहले पत्नी और बहू की जिद पर दिल्ली में दिल्ली ६ देखी. ये छूट दोनों को ही जबलपुर के बाहर है कि हमें साथ फिल्म ले जा पायें.

फिल्म में बताया गया दिल्ली दिल वालों की-जिसके दोनों तरफ दिल है-दाँये भी और बाँये भी. याने हृदयाधात की डबल गुँजाईश. जाहिर सी बात है कि जहाँ दिल होगा, वहीं धड़केगा और वहीं हृदयाघात भी होगा.

मरना तो खैर सबको एक दिन है ही. चाहो तो गैस विकार मान कर हृदयाधात को नजर अंदाज कर दो, और बिना उचित कारण के असमय सिधार गये-कहलाओ या फिर उचित बॉयपास वगैरह कराकर सब की सहानभूति पाते सादा एवं उच्च जीवन गुजार दो सिर्फ इस विचार में कि इसमें सादे के सिवाय उच्च क्या है? ढ़ूँढ़ते रह जाओगे.

खैर, यह सब छोड़ो. नसीब और सेहत अपनी अपनी. देखे हैं लोग जो बिन पान खाये मुख कैंसर से मरे और वो भी जो पान खाते खाते शान से शहनाई बजाते गये. दो दिल हैं तो हैं. जैसी लिखी होगी वैसी ही होगी-मान लो न!! ९९ फिसदी हिन्दुस्तान इसे मानता है.

फिल्म देखी, अंसल प्लाजा के ग्रेटर नोयडा स्थित बिग सिनेमा में. बिग याने इतना बिग कि क्या बतायें. नया बना है तो कोई था ही नहीं और जितना खाली, उतना बिग. हर तरफ जगह, जगह ही जगह.

देखते देखते फिल्म चालू हो गई..ढ़ाँय ढ़ाँय...न जाने क्या क्या..छत पर टायलेट..एक छत से दूसरी छत मिली हुई..जलेबी..रामलीला..पतंगबाजी, जवान सपने, इन्डियन आईडियल, दो भाईयों का बँटा घर फिर भी दीवार मे छेद से जुड़ा घर . हैण्ड पम्प से पानी भर टायलेट जाता अभिषेक फोन पर अटका हुआ, गाय बछड़े को जन्म देती हुई और उससे जुड़ी हमारी अंधविश्वासी धार्मिक आस्था, पाँच साल से सूखी तुलसी फिर एकाएक हरी भरी होती, कबूतर बाजी, गैंदा फूल ससुराल और फिर वही, जलेबी अछूत लड़की जिसे हर किसी में छूने की ललक. जाने क्या क्या.

न सिर न पैर और उस पर से थाना इंचार्ज दुबे जी (मानसून वेडिंग फेम)-एक मात्र ऐसा करेक्टर जो वाकई में हो सकता है.

विदेश-देश-सीन पर लादे हुए सीन तो ऐसे लादे कि न्यू यार्क में चाँदनी चौक दिखवाये दिये. पता नहीं कहाँ रामलीला हो रही थी कि सारे लोग चंद लोगों को पहचान रहे थे और उसी में ईद भी हो ली. जामा मज्जिद भी सज ली. संप्रदायिक झगड़े भी हो लिये. पुराने जमाने के हिन्दु मुस्लिम विवाह की वजह से देश त्यागा युगल और उसका घर लौटता बालक अभिषेक, सब कुछ की पैकेज डील और पैकेट खाली. गिफ्ट हैम्पर के बड़े बक्स टाइप. आखिर तक समझ ही नहीं आया कि आखिर दिखा क्या रहे हैं?

एक किरदार था जिसका नाम था गोबर. बिल्कुल नॉन रसूकदार एक आम आदमी सा.. रसूकदारों/ रईसों का मनोरंजन का साधन और जीवन यापन की जुगत में पगला सा बना जीवन काटता.

खैर, पूरी फिल्म में जिसने घुमाया वो था काला बन्दर. आखिर तक नहीं पकड़ाया. अगर अभिषेक नाटक में काला बंदर न बन कर पकड़ाता तो नोयडा के आरूषि केस टाईप लटक कर रह लेता काला बंदर और हम आदतानुसार भूल जाते उसे. जय हो अभिषेक तुम्हारी. तुम आरुषि केस के समय कहाँ थे? सुना है उस केस जो उगलवानी केपसूल थी नारको टेस्ट वाली डॉ मालिनी, वो बरखास्त हो गई है सबूतों से छेड़छाड़ करने के आरोप में अरे, उसी पर तो यह जिम्मा था कि सबूत उगलवाये और वो ही बरखास्त.

ये ही तो है:काला बंदर

खैर, काला बन्दर - अंत तक एनोनिमस रहा..और अब भी है. आगे भी रहेगा. उसका अस्तित्व शास्वत है झूठ की तरह हरदम सत्य पर विजय पाता. बस, समय समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहता है. कभी किसी ने समझा मुसलमान है. कभी किसी ने हिन्दु माना. सब आपस में लड़ते रहे और वो अफवाहों को दोनों तरफ से जन्म देता रहा, लोगों को लड़वाता रहा और पकड़ में आया गरीब-फेन्सी ड्रेस टाईप सजा अभिषेक. काला बन्दर था या हमारा नेता?

या कहीं वो हमारे ब्लॉगजगत के अनाम टिप्पणिकार तो नहीं?? उनका भी तो यही काम है और वो जब फेवर में बोले तो मन ही मन हम खुश और विरोध में जाये तो धमकी कि हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ. आ भी जायेगा तो क्या कर लोगे मात्र मॉडरेशन की तलवार चलाने के?

अरे जलेबी, गोबर को अपने सर के बाल तो काट कर दे-अभी स्वाहा करते हैं इन अनाम महारज को!! जय हो..ओ..के....!!!!

(ऐसे ही एक स्वामी जी स्वाहा करने वाले थे काले बंदर को फिल्म में-गोबर से काले बंदर का बाल मंगवा कर जिसे जलेबी ने अपने सर से काट कर गोबर को दे दिये थे) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, फ़रवरी 23, 2009

काश!! हर दिन ऐसा ही हो !!!

सुबह सुबह ४ बजे मोहल्ले का कुत्ता भोंका और हम उठकर लगे खिड़की के बाहर झांकने. नित नियम से ४ बजे भोंकना उस कुत्ते की आदत है और नित नियम से ४ बजे उसके भौंकने पर उठकर चोर चैक करना हमारी. दोनों खुशी खुशी अपनी आदत का पालन करते हैं बिना नागा. फिर हम खिड़की से चिल्लाते हैं..धत..हूम्म्म...धत.. और वो भाग जाता है. हम तब जाकर मंजन इत्यादि निपटाते हैं और आकर अपने क्म्प्यूटर पर ४.१५ के आसपास स्थापित हो जाते हैं अगले ढाई घंटे के लिए. वो कुत्ता क्या करता है उसके बाद-इसकी तनिक भी जानकारी नहीं है और न ही कोई सारोकार. कईयों को रहता है कि जिससे कुछ लेना देना नहीं, उसे भी नापे हुए हैं बेमतलब मगर मेरी ऐसी आदत नहीं.

विद्युत मंडल नित नियम से ७ बजे बिजली उड़ा देता है. हम इन्वर्टर पर रहम रखते हैं क्योंकि वक्त जरुरत वो अपना काम मुस्तैदी से करता है. ऐसी चीजों के लिए हमारे दिल में खास जगह है. अत: गैर जरुरी इस्तेमाल, जो टाला जा सकता है, उसे टाल देते है और कम्प्यूटर बंद कर देते हैं.

यह वह समय है जब हम दालान में आकर झूले में बैठे हरियाली के बीच अखबार पढते हैं. पहले हिन्दी और फिर अंग्रेजी. भाषा से कोई छूआछूत या विरोध नहीं, जब तक संदेश मिल रहे हैं और हम उसे उसी रुप में ग्रहण कर पा रहे हैं.फिर भाषा तो मात्र एक माध्यम है अभिव्यक्ति का, उससे कैसी बैर. इस बीच दूध वाला आकर दूध के पैकेट नियत स्थान पर रख जाता है. बरतन धोने वाली बरतन धो कर चली जाती है. झाडू, पोछे, कपड़े वाली आ चुकी होती है. खाना बनाने वाली हमारी चाय बनवाकर हम तक भिजवा चुकी होती है और हम चाय के साथ साथ अखबार खत्म कर रहे होते हैं.
पूरे १.३० घंटे निकल जाते है इस मशक्कत में. साथ ही दोनों अखबारों के सुडुको भी हल कर मन ही मन अपने आप को बुद्धिमान मान कर पीठ भी ठोंक चुके होते हैं.

अब लगभग ८.३० या ९.०० के बीच का समय होना चाहता है और हाजिर हो जाता है हमारा मालिशिया, ’रामजस’ मानो अपने साथ बिजली लाता हो. बिजली भी ९ बजे वापस आ जाती है. फिर एक घंटा तख्त पर लूँगी पहने मालिश-खालिस सरसों के तेल से और उसके बाद आधे घंटे वैसे ही उंघाड़े बदन औंधे पड़े रहते हैं गुनगुनी धूप में. फोटो शरम में नहीं लगा रहे हैं हालांकि है हमारे पास. कहते हैं शरीर को तरोताजा रखने के लिये अच्छा होता है धूप में तेल मालिश करा कर लेटे रहना. एन्जिला जोली भी केलिफोर्निया में बीच पर हमारे जितने कपड़ों से भी कम में पड़ी फोटो खिंचवा कर बिना शर्म छपवा देती है, मगर हम न कर पायेंगे ऐसा. ठेठ हिन्दुस्तानी देहाती जो ठहरे.

१०.३० बज गया, अभी तक नहाये नहीं..पानी गरम है गीज़र में. नित नियम से लगभग इसी समय रोज यह आवाज आती है. सही पहचाना, हमारी पत्नी की. यानि वो उठकर स्नान ध्यान कर चुकी है. ११ से ११.१५ के बीच नहाने गये तो ११.३० तो आमूमन बज ही जाता है फुरसत होते. फिर तैयार होकर १२ बजे दिन में हल्का सा नाश्ता और कार में सवार चल दिये मित्र मंड्ली के बीच.

दुनिया जहान की गप्पे, किसे प्रधान मंत्री बनाना है इस बार से लेकर ऑस्कर किसे दिला दिया जाये. सब वहीं डिसाईड हो जाता है और एक दिन नहीं, नित नियम से यह कार्य संपादित किया जाता है.

२.३० बजे दो चार कप चाय, दो एक पान आदि के सेवन समाप्ति पर मित्र सभा समाप्त. सब अपने अपने घर चले खाना खाने. हम पागल तो हैं नहीं कि वहीं बैठे रहें सो चले आते हैं घर खाना खाने. भूख हो न हो, २.३० बजे घर लौट ही आते है खाना खाने जैसे यहाँ अक्सर देखता हूँ ठंड हो न हो-नवम्बर शुरु तो हॉफ स्वेटर, दिसम्बर शुरु तो फुल, दिसम्बर के अंत आते तक मफलर और कनटोपा भी और साथ में लैदर जैकेट...आदि. याने मौसम के मिजाज से नहीं महिने से कपड़े डिसाईड हो रहे हैं. मैं पूछ बैठता हूँ अपने मित्र से कि भाई, ठंड तो है नहीं, फिर काहे स्वेटर पहने हो? उनका सीधा सा जबाब होता है कि दिसम्बर में नहीं स्वेटर पहनेंगे तो आखिर कब पहनेंगे गोया कि साल में कभी न कभी स्वेटर पहनना अनिवार्य है.

३.३० बजे तक खाना खा कर चुकते हुए थकान से शरीर भर चुका होता है. नींद भी आ रही होती है आखिर ४ बजे सुबह के उठे हैं और इतनी देर दोस्तों के साथ गप्प सटाका-एनर्जी तो जाया होती ही है तो स्वभाविक है थकान हो जाये अतः २ घंटे के लिए सो जाता हूँ.

५.३० बजे उठकर छत पर से मोहल्ले का नजारा लेते हुए चाय पीने की आदत सी हो गई है. पत्नी भी इस समय साथ ही छत पर होती है-अडो़सी पड़ोसी से गपियाति. आज मन किया तो बहुत समय बाद नौकर से लट्टू (भौंरा) मँगवाया और पूरी शातिरी से चलाते हुए पत्नी से लोहा मनवाया. वो तो न भी लट्टू नाचता तो पत्नी की नजर में लट्टू ही की कुछ खराबी होती. यही तो फायदा है पत्नी के सामने कला प्रदर्शन करने में. अति आत्मविश्वास आ लेता है और यह आत्म विश्वास देने की और हौसला बढ़ाने की कला हर पत्नी को ईश्वरीय देन है जिसमें हम पति प्राणी शून्य है. हमसे तो बस हर बात में-अगर उससे नहीं बना तो अरे, तुमसे तो कुछ हो ही नहीं सकता और बन गया तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, कहना आता है. कल ऐसे ही पतंग उडा़ई थी. फोटो आज के लट्टू नचाई का है जिसमें कल की पतंग और चकरी भी दृष्टवत है.

देखो: लट्टू नचाते


६.३० से ७ के बीच फिर नीचे घर में और तैयार होकर ये चले मित्रों के साथ पार्टी में या किसी रिश्तेदार या दोस्त के घर दावत पर. आखिर विदेश से आये हैं भारतीय दोस्त इतना तो करबे करेंगे. अब तो ११ के पहले क्या लौटेंगे. दिन खत्म. आकर तो सोना ही है. कुत्ता तो भौंक कर रहेगा ४ बजे और हम चोर चैक करेंगे ही ४ बजे तो जितनी जल्दी हो, सो लो. वैसे भी दावत के बाद अक्सर ज्यादा देर तक जागे रहने की स्थिति बची नहीं रहती. ज्यादा जो हो जाती है.. :) अधिकतर लोग हमारी तरह ही सुबह उठना है इसलिये सो जाते हैं मानो काल को जीत आये हों.

देखो: पतंग उड़ाते

क्या आराम है यार!!! ये आदमी कमाता कब होगा, काम पर जाने का तो रुटिन में समय ही नहीं है इसके पास? यही सोच रहे हैं न!!
तो सुन लो...अभी छुट्टी चल रही है. एक महिना और बचा है. ऐश कर लेने दो भाई. फिर तो गदहा मजदूरी में लगना ही है.

अरे हाँ, कहीं ये तो नहीं सोच रहे कि मैं ये सब आपको लिख बता क्यूँ रहा हूँ? अगर ऐसा सोच रहे हैं तो हिन्दी ब्लॉगजगत आपके लिए मुफीद जगह नहीं है. यहाँ अधिकतर पोस्ट पर यही सोचना पड़ता है. स्तरीय लेखन नहीं न होता है यहाँ. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 19, 2009

किसी ने देखा तो नहीं!

यादें: खट्टी खट्टी सी मगर मजेदार

कुछ दिन पहले बैठा बीते समय को टटोल रहा था. अक्सर खाली रहो, छुट्टियों की मौज हो, अपने पुराने घर, गली में लौटे हो तो ऐसा हो जाता है. बहुत स्वभाविक सी बात है. याद आया कि लोग कैसा व्यवहार कर बैठते हैं अनजाने में ही सही कि वह हमेशा के लिए दिलों दिमाग पर अंकित हो जाता है. ऐसे हादसे जब घटित होते हैं, तब हम सोचते रह जाते हैं कि कहीं किसी ने देखा तो नहीं, कहीं किसी ने सुना तो नहीं.

सोचता हूँ: हसूँ कि रोऊँ!!!

वाकिया-१

बहुत बचपन में, शायद ४थी या ५ वीं में रहा हूँगा. माता जी ने खीर बनाई और उस जमाने में, मोहल्ले में पहचान वालों के यहाँ इस तरह के व्यंजन बनाने पर पहुँचाने का रिवाज हुआ करता था. माँ ने आवाज लगाई और मैं घर के बाहर ही मैदान में खेल रहा था पूरा धील धूसरित, हॉफ पैन्ट भी धूल मिट्टी से रंगा और उस पर से भगवान का दिया रुप रंग. सब मिल कर कैसा लग रहा हूँगा, आप मेरी तस्वीरें देख कर अंदाज लगा लो. हमें एक डब्बे में खीर पकड़ा कर कहा गया कि वो आखिरी वाले घर में नये शर्मा जी आये हैं, उनके यहाँ दे आओ और कह देना कि 'पहले घर में जो लाल साहब रहते हैं, उनके यहाँ से खीर भिजवाई है.'

हम भी खेलते हुए पहुँच लिए. घंटी बजाई. उनकी प्यारी सी बिटिया निकली और हमने रटा रटाया वाक्य दोहरा दिया: "पहले घर में जो लाल साहब रहते हैं, उनके यहाँ से खीर भिजवाई है."

अंदर से उसकी मम्मी की आवाज आई: ’कौन है, पिंकी’

पिंकी ने वहीं से कहा:" वो पहले घर में जो लाल साहब रहते हैं, उन्होंने खीर भिजवाई है. उनका नौकर लेकर आया है."

हम तो सन्न!! क्या सफाई देते. चुप्पे लौट आये, रोनी सी सूरत लिए. किसी से कुछ बता भी नहीं सकते थे. बाद में पिंकी से पहचान भी हो गई. उसने कभी इस बारे में याद नहीं दिलाया और हम भी दिखावटी भूले भंडारी ही बने रहे. मगर, वो वाक्या समय बे समय दबे पाँव आकर कचोटता जरुर है.


वाकिया-२

कुछ समय हुआ था. कार खरीद ली थी. बैंक/अन्य संस्थाओं के अधिकारियों और साहबों की सेवा में हमेशा हाजिर कर दी जाती थी, काम जो निकलवाना होता था. एक बार एक अधिकारी के रिश्तेदार को उनके घर से लेकर साहब के घर छोड़ना था, अतः उनका फोन आया, हमने कह दिया कि अभी ड्राईवर को भिजवा देते हैं. पता चला कि ड्राईवर घर चला गया है, तबीयत खराब लग रही थी. कोई रास्ता न बचा, तो हम खुद ही पहुँचाने चले गये. वैसे भी उसी तरफ कुछ काम भी था. उनके रिश्तेदार के घर पहुँच कर उनके नौकर से अंदर खबर भिजवा दी और लगे इन्तजार करने.

५ मिनट बाद भीतर से आवाज आई: ’मोहन (शायद उनके नौकर का नाम), बाहर गाड़ी में ड्राईवर को ये चाय दे आ और कह देना कि बस, पाँच मिनट में चलते हैं."

हमने सुना अनसुना तो कर दिया मगर बिना हैंडिल की कप में कार में बैठे बैठे ही चाय पी. रईसों के घर में जब कप का हैंडिल टूट जाता है तो उसे फेका नहीं जाता बल्कि नौकरों, चपरासियों और ड्राइवरों को चाय पिलवाने के लिए जतन से रख दिया जाता है.

वो मियाँ बीबी आये. नमस्ते तक करना मुनासिब न समझा. गाड़ी में, जैसी कि रिवायत है, पीछे बैठ गये. हम भी क्या समझाते, उन्हें साहब के घर छोड़ कर आगे बढ़ गये.


वाकिया-३

एक साहब के यहाँ सुबह सुबह पहुँचे. दरवाजा बंद था. घंटी बजाई. अंदर से साहब ने अपने नौकर को आवाज दी, "छोटू, देख तो रे कौन है." पीछे कहीं आंगन की तरफ से उनकी पत्नी का स्वर उठा, "अरे वो जमादार होगा. उसे बुलवाया था अभी." "छोटू, उसको कह दे कि पीछे के दरवाजे से आ जाये."

इसके पहले की छोटू दरवाजा खोलता. हमने गाड़ी स्टार्ट की और घर भाग आये. साहब का फोन आया कि आप आये नहीं. हमने कह दिया कि साहब, तबीयत खराब है. देर से नींद खुली. आधे घंटे में आते हैं और फिर गये.


ऐसे ही अनेकों बातें/ हादसे याद हैं कि पूरी किताब लिख जाये. समय समय पर सुनाता रहूँगा. बस सोचता हूँ तो लगता है कि शायद सभी के साथ किसी न किसी मोड़ पर ऐसे प्रसंग आ जाते होंगे. माना कि रुप रंग और हरकतों के चलते हमारे साथ ज्यादा आये होंगे मगर फिर भी.

विचार इसलिये कर रहा हूँ कि लोग बोलने के पहले अगर वाणी नियंत्रित करें, विचारों को यूँ ही न बाहर निकाल दें, जरा अन्य पहलु पर भी नजर डालें तो शायद ऐसी स्थितियों से बचा जा सकता है कि कोई आहत न हो. न किसी के दिमाग पर ऐसी बात अंकित हो जाये जो जीवन भर पोंछे न पूछे.

बस, एक चिन्तन की आवश्यक्ता है और विवेक इस्तेमाल करने की दरकार.



आ. दिनेश राय द्विवेदी जी ने इस पोस्ट को और विस्तार दिया है एक टिप्पणी के माध्यम से. आवश्यक है कि इस पोस्ट का वो हिस्सा हो, अतएव यहाँ जोड़ा जा रहा है:

आप के ये संस्मरण बहुत कुछ कह रहे हैं। लेकिन ऊपर उदृत अंतिम हिस्से की सोच को कुछ आगे बढ़ा रहा हूँ।

वास्तविकता यह है कि हमने मनुष्य को समानता से अलग श्रेणियों के खांचों में बांट दिया है और उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। एक नौकर काम करने के लिए नौकर है, वह व्यवहार के लिए भी नौकर हो जाता है। जब कि व्यवहार के लिए उसे मनुष्य होना चाहिए। जब तक प्रत्येक मनुष्य को व्यवहारिक रूप से मनुष्य समझने की संस्कृति विकसित नहीं होती तब तक ये सारी बातें होती रहेंगी। Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 12, 2009

मस्त रहें सब मस्ती में...

इधर बिना किसी घोषणा के १५ दिन कुछ नहीं लिखा. किसी ने नहीं मनाया कि क्यूँ नहीं लिख रहे. कारण-बिना मार्केटिंग कुछ भी हासिल नहीं. नहीं लिखना हो तो भी बताना पड़ता है कि नहीं लिखूँगा अब से. तब तो लोग चेतते हैं कि काहे नहीं लिखोगे भाई..क्या हुआ..कहाँ चले..कब लौटोगे..किसी ने कुछ कहा क्या..आदि आदि. चुपचाप चले जाओ..किसी को कोई अंतर नहीं पड़ता. सब मस्त हैं..सब व्यस्त हैं. आप सोचो कि आपकी अहमियत है, तो आप ही गलत हो.

एक वेल्यू होती है जो सबसे पावरफुल होती है और उसे शुद्ध भाषा में कहा जाता है न्यूसेंस वेल्यू. बहुत पूछ है इसकी. नहीं क्रियेट करोगे तो वही होगा..जो हमारे साथ हुआ. १५ दिन नहीं लिखे..किसी ने नहीं पूछा कि क्यूँ नहीं लिखा.

वैसे तो मुझे खुद भी ख्याल न रहा कि १५ दिन हो गये, नहीं लिखा. कुछ पारिवारिक व्यस्तता और कुछ असंमजस..असमंजस भी ठीक वैसा ही जो बारात में बिन नाचे अलग थलग चलते बुजुर्गों के साथ होता है. नाचने वाले उन्हें खींच खींच कर नाचने बुलाते हैं और वो कभी मुस्करा कर, कभी खीज कर चुपचाप चलते जाते हैं. नाचने वाले उन्हें खूसट समझते हैं और वो बुजुर्ग या सज्जनवार उस बैण्ड बाजे में भी अपनी शांति तलाशते रहते हैं..कुछ शांत रहने की आदत जो पड़ जाती है.

एक बोध कथा याद आती है:

एक साधु गंगा स्नान को गया तो उसने देखा कि एक बिच्छू जल में बहा जा रहा है। साधु ने उसे बचाना चाहा। साधु उसे पानी से निकालता तो बिच्छू उसे डंक मार देता और छूटकर पानी में गिर जाता। साधु ने कई बार प्रयास किया मगर बिच्छू बार-बार डंक मार कर छूटता जाता था। साधु ने सोचा कि जब यह बिच्छू अपने तारणहार के प्रति भी अपनी डंक मारने की पाशविक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ पा रहा है तो मैं इस प्राणी के प्रति अपनी दया और करुणा की मानवीय प्रवृत्ति को कैसे छोड़ दूँ। बहुत से दंश खाकर भी अंततः साधु ने उस बिच्छू को मरने से बचा लिया।

बिच्छू ने वापस अपने बिल में जाकर अपने परिवार को उस साधु की मूर्खता के बारे में बताया तो सारा बिच्छू सदन इस साधु को डसने को उत्साहित हो गया। जब साधु अपने नित्य स्नान के लिए गंगा में आता तो एक-एक करके सारा बिच्छू परिवार नदी में बहता हुआ आता। जब साधु उन्हें बचाने का प्रयास करता तो वे उसे डंक मारकर अति आनंदित होते। तीन साल तक यह क्रम निरंतर चलता रहा।

एक दिन साधु को ऐसा लगा कि उसकी सात पीढियां भी अगर ऐसा करती रहें तो भी वह सारे बिच्छू नहीं बचा सकता है इसलिए उसने उन बहते कीडों को ईश्वर की दया पर छोड़ दिया। बिच्छू परिवार के अधिकाँश सदस्य बह गए मगर उन्हें मरते दम तक उन्हें यह समझ न आया कि एक साधु कैसे इतना हृदयहीन हो सकता है।

तब से बिच्छूओं के स्कूल में पढाया जाता है कि इंसान भले ही निस्वार्थ होकर संन्यास ले लें वह कभी भी विश्वास-योग्य नहीं हो सकते हैं।

(आभार पिट्सबर्ग वाले शर्मा जी यानि ’स्मार्ट इन्डिय’ का इस कथा के लिए)


----तो यह तो हो गई आज की बोध कथा- किन्तु यह बिच्छूओं के लिए है. वो पढ़ लेंगे. अतः आपके किसी काम की नहीं.

अब रही अगली बात कि आज प्रेम दिवस है यानि वेलन्टाइन डे. अब इस उम्र में काहे का डे और काहे का सेंन्ट वेल्न्टाइन. मानो न मानो, बस अपनी बुजुरिया ही काम आयेगी-चाहे प्रेम प्रदर्शन करें या न करें. करें भी तो कैसे:

प्रेम दिवस का भूत देखिये, सबका मन भँवरा बोराय
हम बैठे हैं पांव पसारे, दोनों घुटनन रहे पिराये.

हम तो ठहरे बुढ पुरनिया, घर में भांग रहे घुटवाय
दूध जलेबी छान के दिन में, हुए टनाटन हम तो भाय.

सबकी बीबी फेयर लवली, माँग रही है खूब इठलाय
हमरी बीबी बाम रगड़ती, कहती है कि मर गये हाय.

नये लोग हैं नया गीत है, इलु पर दये कमर मटकाय,
हम तो बैठे तिलक लगा कर, आरत राम लला की गाय.

देखो उनकी कैसी मस्ती, पिकनिक पर खण्डाला जाय
बीबी हमरी धड़कन सुनके, ब्लड प्रेशर की दवा खिलाय.


-खैर जो है, सो है-सब दिन एक समान-सब दिन राम के:

आज एक गीत सुनवाता हूँ..ताकि एक बचा डोज़ भी पूरा ही हो ले:

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मंगलवार, जनवरी 27, 2009

मुझसे पहली सी मुहब्बत..

सर्दी की सुबह-कुनकुनी धूप और छत पर निमाड़ की पलंग पर हाथ से तकिया बनाकर लेटा मैं, आकाश ताक रहा हूँ. यकीन जानिये जनाब, यह एक लक्ज़री है जो सबके नसीब में कहाँ. कभी निमाड़ की पलंग पर लेटना मजबूरी रही होगी जैसे कि बिना डाईनिंग टेबल के जमीन पर पीढे पर बैठ कर खाना. आज उसी पीढे पर बैठ कर लालटेन की रोशनी में खाना खाने के लिए ताज ग्रुप के ढाबे पर हजारों के बिल चुकाता व्यक्ति अपने रईस होने का अहसास करता है. कभी लगता है कि हम तो इस बारे में जानते भी हैं. आने वाली पीढ़ी तो निमाड़ और मूंच की खटिया सिर्फ म्यूजियम और (शायद) प्रेमचन्द्र की किताबों में ही देखेगी.

उन्हीं अहसासों के बीच मुझे कहीं दूर बाजार से उठता लाउड स्पीकरीय संगीत का स्वर सुनाई पड़ता है- संप्रदायिक सदभाव की मिसाल सा. पहले हिन्दी भजन- ओम जय जगदीश..फिर कोई पंजाबी गाना और फिर कुछ देर बाद उर्दू-मुझसे पहली सी मुहब्बत, मेरे महबूब न मांग...ओफ्फ!! इसमें कैसी संप्रदायिकता..ऐसा किसने कह दिया कि हिन्दी गाना हिन्दुओं का और उर्दू गाना मुसलमानों का. ये तो भाषाऐं हैं, इनका क्या मजहब? मजहब तो हम इन्सानों का होता है भाषा में तो बस अपनी मिठास होती है. खैर, ठीक है..कोई संप्रदायिकता की बात नहीं. बस, गीत बज रहे थे, हिन्दी, पंजाबी, उर्दू...अब ठीक है. बीच में सड़क से गुजरती मोटर साईकिल, ट्रक, टैम्पो की आवाज. गली से निकलते सब्जीवाले की कर्णभेदी गुहार-आलू ले लो, टमाटर ले लो..हरी बूटट्ट्ट!!!! ताजा है. पीछे पीछे मरियल सी आवाज-रद्दी पेपर वाल्ल्ला!! फिर वही संगीत..मुझसे पहली सी मुहब्बत...

सोचता हूँ किसने लिखा होगा यह गीत..नज़्म. खैर, जिसने भी लिखा हो वह मेरे लिए उतना महत्वपूर्ण और विचारणीय नहीं जितना कि क्यूँ लिखा होगा? क्या लफड़ा फंसा होगा जो उसे इतनी शिद्दत और साहस से कहना पड़ा होगा कि मुझसे पहली सी मुहब्बत... मेरे महबूब न मांग...

अपनी सोचता हूँ..पत्नी का चेहरा याद करता हूँ. दूर नहीं है, नीचे ही गृह कार्य में व्यस्त है. संगीत की आवाज से कहीं ज्यादा नजदीक से बीच बीच में नौकरों को हिदायत देती उसकी आवाज आ जाती है. चेहरा याद आता है तो कल्पना करता हूँ कि यदि मैं ऐसा कह दूँ कि मुझसे पहली सी मुहब्बत...मेरे महबूब न मांग... तब?? उसकी जबाबी भाव भंगिमा की कल्पना मात्र से सिहर उठता हूँ. वो तो प्राण ही निकाल ले पूछ पूछ के कि काहे न मांग. ऐसा क्या हो गया कि न मांगे. तुम तो रोज दर रोज वैसा ही खाना मांगते नहीं अघाते. बल्कि रोज नया ही आईटम जुड़ा मिलता है लिस्ट में..अगर मैं कह दूँ कि मुझसे पहले सा खाना न मांग तो भूखे मरोगे. इस उम्र में कोई पूछेगा भी नहीं. बड़े आये हैं कहने वाले कि मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...चुप्पे बैठे रहो वरना पानी के भी लाले पड़ जायेंगे. एक गिलास तक तो खुद से पानी लेकर पी नहीं सकते और बड़ी बड़ी बात करने निकले हो..महबूब न मांग....

मुझसे पहली सी मुहब्बत..

मेरा मन करता है कि इस गीत के साहसी रचयीता के बारे में मनन करुँ कि आखिर कैसे और किन परिस्थियों में यह शौर्यपूर्ण कदम उठाया होगा. यह तो तय है कि जिसने भी लिखा हो, वो निश्चित ही अपने जीवन में सावन दर्शन का अर्द्ध शातक तो कम से कम बना ही चुका होगा. वरना, उसके पहले तो कितना भी वीर खिलाड़ी हो, इतना बोल्ड शॉट नहीं लगा सकता.

निश्चित ही उसके पास या तो कुछ स्पष्टीकरण के मुद्दे रहे होंगे कि जब पत्नी ’काहे न मांग’ पूछेगी तो कह सके. मसलन, कि देखो महबूब, आजकल न तो पेड़ के आसपास पहले जैसे मटक कर नाचने के लिए कमर रह गई है और तुम तो देख ही रही हो कि खांसी भी ऐसी आन बैठी है कि मानो अब तन के साथ ही जावेगी तो घूम घूम कर तुम्हारे साथ प्रेम गीत भी फिल्मी स्टाईल में नहीं गा सकते, अतः हे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...बल्कि हो सके तो कमर में जरा मूव मल दो, कल से बड़ा दर्द है.

या फिर शादी के पहले का वाकया याद दिलाता, जब उसकी गली के मोड़ पर उसके भाईयों ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर घेर लिया था और वो साईकिल छोड़ कर सरपट दौड़ता हुआ एक किलोमीटर दूर अपने मौहल्ले में आकर ही रुका था तब जाकर हाथ पैर सलामत रह पाये थे. आज न तो दौड़ने का वो रियाज रहा और न ही दौड़ने लायक घुटने और तिस पर से सामने झूलता पेट-कैसे दौड़ पायेगा. हाथ पैर टूटें मारा पीटी में उससे बेहतर है कि ओ मेरे महबूब.. मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...तुमसे क्या छिपा है.

या उस शाम की बात याद दिलाये जब शादी के पहले उसके कमरे में घुसा था और सीढ़ी पर से आते उसके पिताजी की कदमों की आहट से उसने ही सहम कर उसे पलंग के नीचे छिपा दिया था. अब आजकल वैसे पलंग कहाँ..आजकल तो पलंगे के नीचे झाडू भर जाने की जगह रहती है. और न ही शरीर का विस्तार अलमारी में छिपने की इजाजत देता है तो पिता जी के हाथों पकड़ा जाना तो तय ही मानो..बचना अब संभव नहीं. अतः ऐ महबूब.. मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...कुछ तो रहम खाओ.

और न जाने कितने ही कारण इक्कठे किए होंगे ताकि सनद रहें और वक्त पर काम आयें और तब जाकर ऐसा साहसिक गीत लिखा होगा- मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...

हममें वो साहस नहीं. हमें इस गीत से कोई शिक्षा नहीं चाहिये. हम तो ऐसा न लिख पायेंगे. अरे, लिखना तो दूर, गुनगुना भी न पायेंगे. हमें हमारे हाल पर छोड़ दो. अरे, ये क्या, लाउड स्पीकर भी यही कहने लगा...मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये..मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो...मुझे मेरे हाल...!!

जाने कब नींद लग गई. टेबल पर खाना लगा है...आ जाओ..क्या दिन भर सोते ही रहोगे. पत्नी की आवाज सुनाई दे रही है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जनवरी 19, 2009

पीले पन्नों पर दर्ज हरे हर्फ : एक बुजुर्ग की डायरी

तब समय ही नहीं होता था या मैं समय निकालता नहीं था.

मैं अपने पद प्रतिष्ठा के नशे में चूर, अपने मातहतों से तारीफ सुनता और अपने अधिकारियों से तारीफ पाने की लालसा में १० से १२ घंटे दफ्तर में गुजार लेने के बाद भी फाईलों से लदा घर पहुँचता और रात देर गये तक उनमें खोया रहता. याद है मुझे कि जब मैं सोने की तैयारी करता, तब तक घर में तो क्या शायद पूरे मोहल्ले में ही सब लोग सो चुके होते.

देर सुबह जब नींद खुलती तो बच्चे स्कूल जा चुके होते. पत्नी घरेलु कार्यों में और मेरे ऑफिस जाने के लिए तैयारियों में जुटी होती. मैं उठते ही चाय की प्याली के साथ अखबार में खो जाता और फिर फटाफट नहा धोकर नाश्ता करके दफ्तर के लिए रवाना. लंच भी चपरासी भेज कर दफ्तर ही में ही मंगवा लेता. न कभी रविवार देखा, न कोई छुट्टी. बस, काम काम काम और आगे बढ़ते जाने का अरमान.

मैं अपनी इस मुहिम में काफी हद तक सफल भी रहा और एक सम्मानीय ओहदे तक आकर रिटायर हुआ.

पता ही नहीं चला या बेहतर यह कहना होगा ध्यान ही नहीं दिया कि बच्चे कैसे पढ लिख गये और कब देखते देखते स्कूल पास कर कॉलेज मे पहुँच गये. कभी कभार बात चीत हो जाती. साधारणतः ऐसे मुद्दे कि इन्जिनियरिंग करना है कि डॉक्टरी. मगर बहुत सूक्ष्म चर्चा. सब यंत्रवत होता गया मेरी नजरों में. मगर इसके पीछे पत्नी का क्या योगदान रहा, क्या त्याग रहा, कितनी मेहनत रही-वह न तो मैने उस वक्त देखी और न जानने का प्रयास किया. मेरे लिए मेरा केरियर और मेरा दफ्तर. मेरी पूछ परख, मेरा जयकारा-बस, यही मानो मेरी दुनिया थी.

चिन्तन: बेबसी

ऐसा नहीं कि बच्चों और पत्नी को बिल्कुल भी समय नहीं दिया किन्तु जो दिया वह आपेक्षित से बहुत थोड़ा था. पढ़ाई की किसी भी समस्या के लिए उन्हें ट्य़ूटर के पास भेजने से लेकर अन्य जरुरतों के लिए ड्राइवर और पत्नी के साथ भेज अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली. बच्चे अपने पिता से समय चाहते थे और पत्नी अपने पति से. वो बैठकर गप्प करना चाहते थे. मेरे किस्से सुनना चाहते थे जो वो दूसरों से मेरी तारीफों में सुना करते थे और मेरे पास समय न था.

अपनी उपलब्धियों के तहत एक घर बनवा दिया था. जितने रहने वाले घर में, उससे भी एक अधिक कमरा मेहमानों के वास्ते. कुछ उपर और कुछ नीचे. तब सोचता था कि एक कमरा और बनवा लूँ जिसमें मेरा स्टडी रुम हो. बस मैं, मेरी फाईलें, किताबें और अखबार. कोई व्यवधान न आये.

सरकारी गाड़ी के अलावा एक कार खुद की भी. कुछ बैंक में पैसा और यह सब जमा करते करते एक दिन पाया कि सारे कमरे अब खाली रहते हैं. बच्चे अपनी अपनी दिशा में चले गये हैं नौकरियों पर. बिटिया अपने पति संग और उस बड़े घर के एक कमरे में रिटायर्ड मैं और मेरे साथ मेरी पत्नी.

अभी रिटायर्ड हुए ज्यादा दिन न बीते थे. आदतें वही पुरानी मगर अब कोई काम न था तो सारा सारा दिन अखबार, टीवी और किताबें और शाम को मित्रों और रिश्तेदारों के यहाँ मेल मुलाकात. यह मेल मुलाकात पत्नी के साथ ज्यादा समय बीतने का बहाना भी बन गया वरना तो उसके लिए मेरे पास अब भी सीमित वक्त ही था.

हमारा अपना कमरा छोड़ कर अब सारे कमरे मेहमानों के हो गये और आने वाला कोई नहीं. बच्चे यदा कदा अपनी सहूलियत और छुट्टियों में मय परिवार आते. कुछ दिन मेहमानों से रहते और निकल जाते. एक अघोषित सा कमरों का आवंटन भी था कि ये बड़े का, ये छोटे का और उसी अनुरुप इनके सामान भी उसमें रहते.

कभी कभी बच्चों के पास जाना भी होता किन्तु पहला दिन छोड़ ये पत्नी के साथ अधिक समय बिताना ही साबित होता. बच्चे अपनी दिनचर्या में व्यस्त होते.

जल्द ही हम अपने घरौंदे में वापस आ जाते और मैं अखबार किताबों में एवं पत्नी घर काज अड़ोस पड़ोस रिश्ते नातों में डूब जाती.

एक दिन पत्नी न आँखें मींच ली कभी न खोलने को. वो नहीं रही. पहली बार उसका साथ पाने की प्रबल अभिलाषा जागी. सब इक्कठे हुए थे और देखते देखते वापस हो लिए. उस पूरे घर में बच रहा तो अकेला मैं. बच्चे साथ ले जाना चाहते थे मगर मैं ही कुछ समय खुद के लिए चाहता था सो न गया.

खाली घर. ढ़ेरों कमरे. माँ न रही तो उनका सामान कौन देखेगा, ये सोच बच्चे अपने अपने कमरों में ताला लगा गये थे. हालांकि चाबी मेरे पास ही थी पर न जाने क्यूँ कभी हिम्मत न जुटा पाया कि खोल कर देखूँ क्या है उन कमरों में. क्या पत्नी मेरा आत्म विश्वास, मेरे मुखिया होने का अहसास, मेरी ताकत, मेरा सम्मान सब अपने साथ ले गई थी या कि वो ही मेरी यह सब थी. आज तक इस प्रश्न का उत्तर मैं नहीं पा पाता.

मैं अब भी कभी बच्चों के पास जाता हूँ, पहले से ज्यादा ख्याल रखते हैं पर मुझे वहाँ बस एक मेहमान होने का अहसास होता है. न जाने क्यूँ, मैं कभी भी उनके घर को, उनके सामानों को उस अधिकार से नहीं देख पाया जिस तरह से उन्हों ने मेरे घर को या मेरे सामानों को देखा था या इस्तेमाल किया था. क्या यह एक दिशाई धारा है? क्या उन्हें भी भविष्य में अपने बच्चों के साथ यही अहसास होगा या पहले मेरे गई पुश्तों ने भी यह अहसासा होगा.

बच्चे घर पर आते भी हैं. कुछ देर बातें भी होती हैं. फिर वो अपने पुराने दोस्तों में मशगूल या अपने कमरे में बंद, कुछ फुसफुसाते हुए से अपनी पत्नियों के साथ. खाने के टेबल या शाम को साथ बैठ भी जाते हैं. मगर बहुत सीमित समय के लिए. उनके प्रवास के दौरान, खाना क्या बनना है आदि उनकी पसंद पर ही होता है और न जाने क्यूँ, कभी मुझे इन्तजार भी लग जाता है कि ये जायें तो मैं अपनी पसंद से कुछ बनवाऊँ.

मैं उनसे बात करना चाहता हूँ. अब मेरे पास समय ही समय है. मेरे पास ढ़ेरों किस्से हैं. कितने अनुभवों से मैं गुजरा हूँ. मैने क्या गलत किया और क्या सही-सब जान चुका हूँ मगर अब उनके पास सुनने को समय नहीं. मेरे किस्से उन्हें बोर करते हैं. हैं भी आऊट ऑफ डेट तो रोचक कैसे लगें. बस, मजबूरीवश अगर कुछ सुन लें तो बहुत हुआ वो भी बिना चेहरे पर कोई भाव लाए ताकि मैं अपना किस्सा जल्दी बन्द करुँ और वो अपने दोस्तों, पत्नी और बच्चों के बीच समय बितायें. अनुभव तो है इसलिए मैं समझ जाता हूँ. कई बार भूल जाने का बहाना कर बड़ा किस्सा बीच में बंद किया है मैने उनके चेहरे के भाव को समझते हुए.

आज खाली कमरे हैं. चाहूँ जहाँ स्टडी बना लूँ, कोई व्यवधान डालने वाला भी नहीं पर न जाने क्यूँ, अब पढ़ने लिखने से भी जी उचाट हो गया है. आखिरी नॉवेल दो साल पहले पढ़ी थी. इधर तो अखबार भी जैसा आता है, वैसा ही लिपटा दो तीन महिने में रद्दी में बिक जाता है. सोचता हूँ क्या करुँगा जानकर कि बाहर की दुनिया के क्या रंग हैं जब मेरी खुद की दुनिया बेरंग है.

आज भी इस कथा को यहीं रोक देता हूँ-आभास हो रहा है कि आपके चेहरे पर इसे पढ़ते वो ही भाव हैं जो मेरे बच्चों के चेहरे पर अपने किस्से सुनाते हुए मैं देखता हूँ.

बाकी पन्ने फिर कभी...या अभी के लिए ये मान लें कि मैं उन्हें भूल गया हूँ.

बस इतना जानता हूँ कि भले ही वक्त के थपेड़े खाकर मेरी डायरी के ये पन्ने पीले पड़ जायेंगे लेकिन इसमे दर्ज एक एक हर्फ हरदम हरा रहेगा- शायद किसी और बुजुर्ग की व्यथा कथा कहता. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जनवरी 14, 2009

एक जिज्ञासा का निराकरण!!

एक किस्सा याद आता है जब त्रिलोकी से उसके बाप ने कहा कि बेटा जा, पंसारी के यहाँ से मेरे लिए सौदा ला दे. त्रिलोकी घर से निकल ही रहा था कि सामने से चाचा आता दिख गया. त्रिलोकी को बाजार जाता देख कर चाचा बोले कि बेटा, पहली गली से मत जाना, बहुत गोबर पड़ा है. देख मेरे पूरे जूते खराब हो गये. आगे वाली गली से चला जा.

त्रिलोकी हामी भर के चल पड़ा. मगर बड़ों की बात माने तब न.

वो पहली गली से ही गया. जैसे ही गली में घुसा, सामने ही गोबर जैसा कुछ नजर आ गया. वो उससे बच कर आगे निकल गया. जरा दूर पर उसे ख्याल आया कि क्या पता जिसे चाचा ने गोबर समझा वो गोबर था भी कि नहीं. वो लौट कर उसके पास बैठ कर नजदीक से देखने लगा कि हाँ, है तो गोबर ही. फिर उठ कर चल पड़ा. मगर मन नहीं माना, क्या पता देखने में जो गोबर लग रहा है शायद गोबर न हो. वो फिर लौटा और उसे छूकर देखा. उसे लगभग भरोसा हो गया कि गोबर ही है तो वह चल पड़ा.

मगर हाय रे मन, फिर वही संशय अतः लौट कर उसने उसे हाथ में थोड़ा सा उठाया और महक कर देखा. अब तो उसे विश्वास सा हो गया कि गोबर ही है. फिर चला बाजार मगर क्या कहें. एक बार फिर फाइनली वापस, उठाया और चख कर देखा फिर गंदा सा मूँह बनाते हुए खुद से ही कहा कि चाचा ठीक कह रहे थे. अच्छा हुआ मैं बच कर निकला वरना जूते खामखां खराब हो जाते. इसी सोच में खुद को शाबाशी देते हुए वो खुशी खुशी आगे बढ़ा और मारे अपनी होशियारी पर प्रफुल्लित होते हुए अगले गोबर के ढेर पर नजर न डाल पाया और जूते उसमें सन कर खराब हो गये.

कौन मानता है बड़े बुजुर्गों की सलाह. उनके अनुभव का लाभ उठाना तो दूर, सुनना तक सदियों से कोई पसंद नहीं करता. सब अपने आप में होशियार फन्ने खां हैं जब तक अपना जूता सान नहीं लेंगे मानेंगे थोड़े ही न बिना चखे!!

कोई आसान काम नहीं होता जब आप अपने लिए संकट को खुद तलाशें. विपदा का खुद बुलायें. (पत्नी से सुरक्षा कवच: ये हम नहीं कह रहे, बल्कि इतिहास में लिखा है. हमारा अनुभव इससे इतर है) :) अपनी आजादी को दांव पर लगा दें. हँसते मुस्कराते नाचते गाते जिन्दगी का रुप बदल देने वाले क्षण का आत्मियता के साथ स्वागत करें. ठीक वैसी ही बात हुई कि कोई जानकार बता रहा हो कि भागो, सुनामी की लहर उठ रही है और आप हैं कि समुन्दर की दिशा में ही मुस्कराते और नाचते चल पड़े. फिर तो आप वीर ही कहलाये और आपका ईश्वर ही मालिक है.

जिस मौज मस्ती से अपने मन के मालिक हुए फिरते थे, उसे एक पल में तिलांजलि दे दें. फक्कड़ी का मस्त जीवन त्याग दायित्वों की गंभीरता का लबादा ओढ़ लें.

तिस पर से इस बात पर लोगों को निमंत्रित करें, भोज का आयोजन करें और खुशी खुशी अपने मैं को तुम ही तुम हो में बदल दें.

मित्र, इसीलिए हर शादी में बैण्ड पर यह घुन बजायी जाती है कि

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....

हो हो....

इस देश का.........

यारों क्या कहना.....’


सारे बुजुर्ग नाचते हैं कि चलो, हमारे समझाये तो नहीं समझे. अब मजा चखो, हमारी बात न मानने का. अब समझ में आयेगी बच्चू कि बुजुर्गों के अनुभव को दो कौड़ी का समझने का अंजाम क्या होता है.

जवान नव शादी शुदा भी नाचते है कि हम फंस ही चुके हैं लो तुम भी अटको.

गैर शादी शुदा इसलिए नाचते हैं कि उन्हें लगता है यह उत्सव का विषय है (गैर अनुभवी होते हैं न!!)

बिना वीर हुए और साथ ही जवान हुए (ऐसी बेवकूफी करने के लिए ) क्या ये संभव है कि ऐसा करे? मगर फिर भी यह हमेशा होता रहा है..एक सतत प्रक्रिया है. जवान शहीद होते जाते हैं और बैण्ड वाले बजाते रहते हैं:

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....


आशा है आपकी जिज्ञासा कि ’हर शादी में यह विशेष धुन क्यूँ बजाई जाती है” का निराकरण हो गया होगा. ( यह जिज्ञासा अभिषेक ओझा जी ने फुरसतिया जी की पोस्ट पर व्यक्त की थी और फुरसतिया जी को विवरण लिखता व्यस्त देख हम बीड़ा उठाय लिये सुलझाने का)

चलते चलते:

सूक्ति:

शादी वो लड्डू है जो खाये वो पछताये, जो न खाये वो पछताये.... (पुनः किसी और ने कही है, हम नहीं कह रहे)

अतः अविवाहित वीरों, हमारे समझाने से अपना शहीदाना तेवर न छोड़ना और बैण्ड वालों, तुम जारी रहो...

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....

हम नाच रहे हैं.


ये देखो व्यथा: (खूँटे से टाईप)

एक रात ३ बजे पति के रोने की आवाज सुनकर पत्नी की नींद खुली तो देखा, पति ड्राइंगरुम में बैठा रो रहा है. पत्नी ने कारण पूछा तो कहने लगा कि तुम्हें याद है आज से २० साल पहले, जब हमारी शादी नहीं हुई थी, तुम्हारे पिता ने हमें प्यार करते पकड़ लिया था और कहा था कि या तो मेरी लड़की से विवाह करो या मैं अपने आपको गोली मार लूँगा और हत्या का इल्जाम तुम पर आयेगा. तुमको आजीवन कारावास होगा. तो मैने तुमसे शादी कर ली थी. पत्नी ने कहाः हाँ याद है मगर इसमें रोने की क्या बात है? पति बोला: सोच रहा हूँ, आज मैं छूट गया होता जेल से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 11, 2009

फिर सजी एक और महफिल..

जब कभी कोई कदम उठाने जा रहे हो तो बस एक बार, हाँ हाँ सिर्फ एक बार उसका तुम्हारे भविष्य पर अंजाम सोच लो-बस, तुम देखना कि तुम अपने आचरण में कितना बड़ा बदलाव पाओगे. ऐसा गुरु जी कह गये थे. कल एक जेबकतरा मेरी जेब काट रहा था. मैने उसे पकड़ लिया और उसे मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि यह सूत्र याद हो आया. विचार आया कि कहीं ये जेबकतरा कल को मंत्री हो गया तब? जेबकतरों का स्वभाविक रुपांतरण वाया चोर, गुण्डा होकर मंत्री ही तो है. बस, हाथ नीचे आ गया. कितना बड़ा परिवर्तन पाया मैने अपने आचरण में वरना तो मेरा हाथ देश के इस भावी कर्णधार पर उठ ही गया था.

खैर, जाने दो. इन सब बातों में क्या रखा है?

मूड दुरुस्त करने बैठक जमीं फिर बवाल के साथ. खूब सुनी और खूब सुनाई गई. देर रात महफिल सजती रही और फिर बैठे हम और बवाल कुछ शेरो शायरी के दौर पर और जो गज़ल निकल कर आई, वो ही पेश कर देते हैं. जरा गहरा उतरियेगा तो मजा आयेगा.

लाल संग बवाल की तस्वीर:




गर दुआ उनकी है, तो असर देखिए
रह गई हो कहीं कुछ, कसर देखिए

इसमें उसमें सभी में नज़र आएँगे
आप अपनी यहाँ पर बसर देखिए

भूल सा ही गया है, वो इस गाँव को
देगा कैसी सज़ा, अब शहर देखिए

आबे-ज़म-ज़म* को पीकर मेरे सामने
मुझपे उगला है, कितना ज़हर देखिए

काटे कटती नहीं थी कभी रात वो
हो रही है उधर, इक सहर देखिए

ये तमाशा सही, फिर भी रखने को दिल,
मेरे दर पे ज़रा सा, ठहर देखिए

कह गया हूँ ग़ज़ल, मैं ज़रा झौंक में
गिरती-पड़ती, सँभलती बहर देखिए

--लाल एण्ड बवाल

* आबे-ज़म-ज़म=मक्का के पवित्र कुँऐं का जल Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जनवरी 08, 2009

हमारा स-सुर होना फ्रॉम बेसुर

भाई विष्णु बैरागी ने एक अति स्वभाविक प्रश्न उछाला:

आपने सूचित किया कि अब आप 'स-सुर' बन गए। अब तक क्‍या थे?

विचारणीय बात है कि इतना बड़ा वाकिया हो गया और कोई स्पष्टीकरण नहीं. विगत २५ दिसम्बर को मेरे ज्येष्ट पुत्र चि. अनुपम का विवाह सौ. प्रगति के साथ जबलपुर में परिजनों एवं देश विदेश से आये ईष्टमित्रों की उपस्थिति में सानन्द सम्पन्न हुआ.

हम स-सुर हो लिए. वैसे इसके पूर्व भी काफी सुर में तो थे ही याने कि बेसुरे तो कभी न थे ( चाहो तो अरविन्द जी से पूछ लो जिनके कान मेरे गाये गीत सुनने को बेताब रहते हैं :) और फुरसतिया जी की बात पर तो बिल्कुल कान मत दिजिये कि वो हम से ज्यादा सुर में हैं, ये उनका गुमान भर है अन्य बातों के समान :)) और असुर भी कभी नहीं रहे. इस जगत में अब तक तो कोई ऐसी हरकत तो पकड़ में आई नहीं है (मय साक्ष्य) जिससे की असुर घोषित किया जा सके तो स-सुर ही कहलाये. अत: यह कह पाना बड़ा मुश्किल है कि अब तक क्या थे मगर अब ससुर का ऑफिशियल दर्जा प्राप्त हो गया है, अतः घोषित किया गया.

ये हैं समधि समधन-बहु बेटा

इस शुभ अवसर पर ब्लॉगजगत से अनूप शुक्ला जी ’फुरसतिया’ और रचना बजाज जी (सपरिवार दीपक जी और बिटिया निशि के साथ) ने कानपुर एवं नासिक से पधार कर अनुग्रहित किया. अरुण अरोरा, मैथली जी , पंकज बैगाणी , संजय बैंगाणी , पल्लवी त्रिवेदी , अजित वडनेकर , गुरु पंकज सुबीर जी भी लगभग आ ही से गये थे मगर अंतिम समय में प्रोग्राम अलग अलग विविध कारणों से केन्सिल हो गया. उनके इन्तजार में और उनके आने के समाचार ने ही काफी उत्साह और उर्जा दी पूरे कार्यक्रम में. दीगर बात है कि वो आ न पाये. वैसे तो मित्रों से प्राप्त न आ पाने के कारण इतने सॉलिड और अकाट्य थे कि कई बार लगा कि मैं ही किसी तरह उन तक चला जाऊँ बेचारे कितनी मुसीबत में हैं. :) न आ पाने के ५१ सॉलिड कारणों पर फुरसतिया जी से विस्तार में चर्चा हुई और इन कारणों का एक संग्रह बनाकर जनहित में प्रकाशित करने का निर्णय लिया जा चुका है. शीघ्र ही फुरसतिया जी के संग मेरा यह संयुक्त प्रयास आपके सामने लाया जायेगा.

From फुरसतिया, दीपक बजाज, समीर लाल ’उड़न तश्तरी


अनेकों अनेक ब्लॉग मित्रों के ईमेल संदेशे, टिप्पणी, फोन, एस एम एस भी शुभकामनाओं के साथ प्राप्त हुए. मित्र ताऊ हरियाणवी ने मेरी ब्लॉगजगत में अनुपस्थिति को स्पष्ट करते हुए पोस्ट लिखी( शायद मैं स्वयं ही स्वयं की अनुपस्थिति के बारे में लिख गया-बशक मित्र विवेक सिंह ) और उस पर भी ढ़ेरों शुभकामनाऐं प्राप्त हुई.

जबलपुर ब्लॉग परिवार से भाई महेन्द्र मिश्रा प्रारंभ से ही मेरी भागादौड़ी में भागीदार बने. निमंत्रण पत्र बाँटने से लेकर हर कार्य में सतत योगदान के लिए लगातार उनकी भागीदारी ने मुझे अभिभूत किया. उनके इस योगदान के लिए बारंबार नमन.

फिर जबलपुर ब्लॉग परिवार से ही मेरे भाई बवाल , मेरे जबलपुर पहुँचने के साथ साथ आज दिन तक हर वक्त साथ बनाये हुए हैं. विवाह समारोह की पूर्व संध्या पर उन्होंने मेरे सभी आमंत्रितों के लिए आयोजित कार्यक्रम में कव्वाली का ऐसा समा बाँधा कि हर व्यक्ति झूम उठा. उसी कार्यक्रम के दौरान रचना बजाज जी ने भी अपनी रचनाओं से सब को मंत्रमुग्ध कर लिया. हालात ये हो गये कि इन दो को सुनते लोगों को हम अपनी सुनाई ही नहीं पाये और कार्यक्रम खतम हो गया. रिश्तेदारों से खचाखच भरे घर में चार दिन से बाथरुम में बंद हो होकर रियाज किये थे, सब धरा रह गया. खैर बदला फिर कभी लिया जायेगा, अभी नोट करके रख लिया है.

जबलपुर ब्लॉग परिवार से भाई डॉ विजय तिवारी ’किसलय’ , विवेक रंजन श्रीवास्तव जी , पंकज स्वामी ’गुलुश’ जी भी पधारे. भाई गिरीश बिल्लोरे , भाई राजेश कुमार दुबे ’डुबे जी’ और आशीष पाठक जी किंचित कारणों से पहुँच नहीं पाये.

अंत करने से पहले यह कहना चाहूँगा कि एक फौजी ही इस देश का हित समझता है और जब देश का समझेगा, तभी न देशवासियों को समझेगा सो हमारा समझ गया, कितनी सुन्दर बात कही है प्रियश्रेष्ट गौतम राजरिशी ने:

"पुत्रवधु तो कितनी खुशनसीब हैं कि ससुर के साथ एक कवि मुफ़्त मिला है"

वाह!!! और पुत्रवधु की तरफ से आपको आह्ह!!! :)

आज आप सभी की शुभकामनाओं और बधाई संदेशों के लिए आभार प्रकट करता हूँ. ऐसा ही स्नेह हमेशा मिलता रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है.

इस पावन मौके पर मेरे प्रिय गीत सम्राट श्री राकेश खण्डेलवाल जी ने नीचे पेश मंगल-गीत रच कर भेजा, जिसे परिजनों और मित्रों ने बहुत सराहा:


पुष्प सुगन्धित मलय समीरं महकाये घर द्वारा
प्रगति और अनुपम हो मंगल, पावन प्रणय तुम्हारा

लगा गूँजने पुण्य साधना के मंत्रों का मृदु स्वर
सुषमा करे कन्हैया की पथ को प्रशस्त मह मह कर
शिखा दीप की ललक ललक कर, फिर फिर शगुन बताये
महिमा आज तुम्हारी राहों को आकर महकाये

शहनाई का उठा गूँजकर स्वर ये आज पुकारा
प्रगति पंथ पर रहे अग्रसर, अनुपम प्रणय तुम्हारा

मधुपूरित सपने सुशील मन, अनुभव नया बातायें
नभ पर आ राजेन्द्र मुदित मन सुरभित सुमन लुटायें
लिये सुनीति, विभा बिखराते हैं राकेश गगन पर
महामहिम के स्वप्न हो रहे शिल्पित आज निरन्तर

वीणा के सितार के संग में गाता है इकतारा
पावन मंगलमय हो अनुपम, परिणय प्रगति तुम्हारा

जो समवेत उठे स्वर वह हो गीता जैसा पावन
मुट्ठी में सिमटे आकर के मल्हारें ले सावन
सहराही जीवन के सारे सपने शिल्पित कर दे
और ईश तुमको बिन मांगे, वांछित हर इक वर दे

दिशा दिशा से दिक्पालों ने आज यही उच्चारा
प्रगति और अनुपम मंगल हो पावन प्रणय तुम्हारा Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 04, 2009

डूबती आँखों के चमकते सपने-बांधवगढ़ यात्रा

दो इनोवा वैनों में भरकर पूरा परिवार बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के लिए रवाना हुआ. दोनों गाड़ी, पूरी पैक, शीशे बंद, मनपसंद का संगीत बजाते, हल्का एसी चालू, परिवारिक गप्प सटाकों और हंसी हल्ले में दौड़ रहीं थीं मंजिल की ओर. न कोई धूल, बेहतर सड़क बन जाने से न कोई उछलन. मात्र ३.३० घंटे से कम समय में हम २०० किमी का फासला तय कर बांधवगढ़ पहुँच गये.

पहले से बुक एक अति सुन्दर रिसोर्ट हमारा इन्तजार कर रहा था. चारों तरफ हरियाली, सुन्दरता से सजे हुये दूर दूर कॉटेज, करीने से लगाया गया बगीचा और बीचों बीच शाम को बॉन फायर करने के लिये बड़ा सा सीमेन्टेड पंडाल.

कमरे के भीतर की साज सजावट और सफाई काफी मनभावन थी. कमरा बंद करने के बाद मैं सोचने लगा कि बंद कमरे में क्या भारत और क्या अमेरीका? पिछले कुछ माह पहले जब लास वेगस में था, तब भी कमरे के भीतर तो यही अहसास थे. बल्कि यहीं ज्यादा आराम और लक्ज़री है कि घंटी बजाओ और बंदा चाय नाश्ता लिए हाजिर. वहाँ तो कॉफी/चाय की मशीन कमरे में लगी थी, खुद बनाओ और तब पिओ.

कुछ देर आराम, फिर सब अपने अपने कमरे से बाहर खुले हरे मैदान में. फुटबाल खेली गई. बच्चे, बड़े सभी बराबरी से अपने उम्दा प्रदर्शन की फिराक में. थक कर सब तैयार हुए और हम चल दिये नजदीक में ही बने बांधवगढ़ म्यूजियम को देखने. छोटा सा म्यूजियम-अब म्यूजियम तो क्या-फोटो और पार्क एवं किले के मिनियेचर मॉडल की प्रदर्शनी ही कहें तो बेहतर कि कल क्या देखेंगे. अच्छा लगा एक घंटा वहाँ गुजारना. पुराने राजे महाराजाओं ने कितने टाईगर मार गिराये, उनका लेखाजोखा भी प्रिंट करके टांगा गया था सो उनको समय की मांग के अनुरुप कोस भी लिया कि हाय, कैसे थे ये? इत्ते निर्दयी. उस कमरे में ऐसा कोसना, एक प्रकार से बोर्ड पढ़ लेने की पावती छोड़ने जैसा लगा. जो पढ़ता था वो कुछ ऐसे ही पावती छोड़ रहा था.

बहरहाल, वहाँ से वापस लौट बॉन फायर के आसपास सारा इन्तजाम पाया गया. फायर को घेरे कुर्सियाँ, कायदे से लगी टेबल.
देर तक महफिल जमीं. जाम छलके, सुर उछले. मौका था तो जी भर के परिवार वालों को अपनी रचनाऐं झिलवाईं. उनकी मजबूरी थी तो जितना बन पड़ा, उन्होंनें वाहवाही का मंजीरा बजाया और नई आई पुत्र वधु ने भी वहाँ जान लिया कि ओह!! तो ऐसे होते हैं कवि और वो भी उसके ससुर. सोचती होगी..ये कहाँ आ गये हम? :) मगर क्या करे, झेलना तो पड़ा ही.

ये रहे टाईगर माहराज

खैर, तय पाया गया कि अगले दिन सुबह ६.१५ बजे सब तैयार मिलेंगे और ६.३० बजे जंगल सफारी की जीपें हमें वन भ्रमण पर ले जायेंगी.

सुबह की कड़कड़ाती ठंड, खुली जीपें, रिसोर्ट वालों द्वारा प्रायोजित कंबल भी मानो सरसराती हवा में पिघले जा रहे हों. कंबल से शरीर गरम हो या शरीर की गरमी से कंबल-समझ पाना मुश्किल था. जंगल के भीतर की सुन्दर मनोहारी यात्रा. पतले पहाड़ी रास्ते. २० किमी की स्पीड़ पर चलती जीप.

पंछियों की चहचहाट, कुछ चीतल, हिरण, मोर आदि दिखे. आनन्द आ गया. इन्तजार था कि कहीं टाइगर दिखे. कहते हैं इस १०५ वर्ग किमी में फैले राष्ट्रीय उद्यान में लगभग २५ टाइगर हैं. जीप धीरे धीरे बिना आवाज के चलती रही और हम चुपचाप आजू बाजू नजर दौड़ाते रहे कि शायद कहीं टाइगर दिखे. एक दो बार बंदर और अन्य जानवारों की आवाज से गाईड ने टाईगर के आसपास होने का अनुमान भी लगाया और जीप रोककर इन्तजार भी किया. उसके पंजे के ताजे निशान भी दिखे मगर महाराज को नहीं दिखना था तो नहीं दिखे. दो घंटे बाद हम पहुँचे सेन्टर पाईंट याने कि भ्रमण के उस स्थल पर, जहाँ से वापसी का ट्रेक शुरु होना था किन्तु रास्ता दूसरा याने अभी भी टाईगर के दर्शन के ५०% चान्सेस बाकी.

सेन्टर पाईंट पर चाय नाश्ते चिप्स केडबरी कुरकुरे की दुकानें, काफी चहल पहल के बीच चिप्स केडबरी की दुकानों से कुछ दूर मेरी मुलाकात हुई गले में टोकनी लटकाये उबले चने को पत्तल में बाँध प्याज मसाला डालकर बेचते बालक मोनू से. चिप्स कुरकुरे की सभ्यता के बीच शायद सुबह से उसे कोई खरीददार नहीं मिल पाया था अतः कुछ उदास सा था उस चहकती अभिजात्य भीड़ के बीच अनसुनी आवाज लगाता-चने ले लो, बाबू जी.

मन नहीं माना तो मैं उससे बात करने लगा. पता लगा वहीं एक नजदीकी गांव में रहता है. रोज २० रुपये के चने खरीद कर लाता है और ३५ से ४० रुपये के बीच बेच कर १० रुपये बना लेता है. बाकी पैसा शायद वहाँ बेच पाने की परमिशन के लिए विभागीय कर्मचारियों के हिस्से जाता हो. कुछ ठीक ठीक उसने नहीं कहा. कम बात करने वाला शर्मीला लड़का था.सैकड़ों की तादाद में आये भ्रमणकारियों में से वो मात्र ७-८ ग्राहक चाहता है अपना पूरा माल खपाने के लिए. फिर १० बजे से गांव के स्कूल में पढ़ने जाता है. स्कूल के कारण शाम का फेरा लगाना संभव नहीं हो पाता. साथ में उसका दोस्त भी था भद्र सिंह. वो साथ सिर्फ खेलने आता है. शायद बेहतर आर्थिक स्थिती वाले परिवार का हो मगर दोस्त के साथ फिर भी घूमने चला आता है.

मोनू एक दिन पढ़ लिखकर वन विभाग में नौकरी करना चाहता है. शायद वही जंगल की दुनिया उसने देखी है तो सपने भी वहीं तक सीमित होकर रह गये हों, बहुत स्वभाविक है. अपनी कमाई का हिस्सा बांटते हुए निश्चित ही उसके मन में आता होगा कि कल जब मैं इसकी जगह हूँगा तो किसी मोनू को कोई तकलीफ नहीं दूँगा और अगली पीढ़ी के मोनू की पूरी की पूरी कमाई उसी मोनू की होगी.

मोनू की आज बोहनी भी नहीं हुई थी.उसकी डूबती आँखों में तैरते सुनहरे सपनों की छटा देखने की किसी को फुरसत नहीं. बच्चे हों या बड़े, सब बस एक कुतहल लिए फिर रहें है कि टाईगर कहाँ दिखेगा? जिसे जो दिशा बता दी जाती है, वह जीप उस ओर मुड़ कर ओझल हो जाती है. और मोनू खड़ा अगली खेप की बाट जोहता है कि शायद कोई उससे उसके उबले चने खरीद ले. उसे किसी टाईगर का इन्तजार नहीं. उसका वन विभाग में नौकरी पाने का सपना ही उसका टाईगर है और वो उसी का पीछा कर रहा है अपने मासूम बचपन को व्यापार की इन चालों के तले रौंदते जिसमें उसे इन १० रुपयों को कमाने के लिए विभाग के लोगों से हिस्सा बांट करते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए क्या क्या पाठ नहीं सीखने होते.

ये है मासूम मोनू अपने दोस्त भद्र सिंह के साथ

मैं उसका फोटो खींचना चाहता हूँ तो वो अपने साथी भद्र सिंह को साथ खड़ा कर लेता है फोटो खिंचवाने. फोटो खींचकर मैं उसकी ओर ५ रुपये बढ़ा देता हूँ. आत्म सम्मानी मोनू यूँ ही पैसे नहीं लेता-वो भी एक दोना चने मेरी तरफ बढ़ाता है. मैं चने हाथ में लिए जीप में आकर बैठ जाता हूँ उस भीड़ का हिस्सा बन, जिसे तलाश है टाईगर दर्शन की.
टाईगर नहीं दिखा-टाईगर हर रोज नहीं दिखते. टाईगर का पीछा करना इतना आसान नहीं.
हम वापस रिसोर्ट में आकर अपना सामान उठाते हैं और लंच के बाद शुरु होता है मद्धम संगीत के बीच वापसी का सफर.
थकान से मैं आँखे बंद कर लेता हूँ और मेरी आँखों के आगे मोनू का भोला चेहरा आ जाता है-साहब, आज बोहनी नहीं हुई है!!

आज भले ही उसकी बोहनी न हुई हो लेकिन उसके उदास चेहरे पर झलकते आत्मविश्वास से मैं पूर्णतः आशान्वित हूँ कि एक दिन उसे उसका टाईगर जरुर मिलेगा.

मन ही मन मैं बुदबुदा उठता हूँ , अलविदा मोनू!! मेरी शुभकामनाऐं तुम्हारे साथ हैं. एक दिन फिर मिलेंगे शायद इसी मोड पर-तब तुम वन विभाग में होगे. तुम तो शायद मुझे पहचान भी न पाओगे मगर ये वादा रहा, मैं तुम्हारी आँखों से तुम्हे पहचान लूँगा.

निदा फाज़ली साहेब का एक शेर बरबस ही याद आता है न जाने क्यूँ:

कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है


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जबलपुर के साहित्य समाज ने दिवंगत डॉ श्री राम ठाकुर दादा को श्रद्धांजलि अर्पित की

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