रविवार, अप्रैल 20, 2008

टिप्पणी कर और गाली खा!!

शब्द पुष्टिकरण यानि वर्ड वेरिफिकेशन. आजकल अन्तर्जाल की दुनिया में आपकी अन्तर्जालिय सुरक्षा के लिये सुझाया गया बहुचर्चित तकलीफदायक उपाय. कम से कम हम जैसे टिप्पणीकर्ताओं के लिये तो बहुत ही तकलीफदायक. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा भारत में सब थानों के बाहर लिखा होता है कि पुलिस आपकी साहयता के लिये है. चोर सारे तोड़ जानते हैं.

कई बार सोचते हैं कि चिट्ठाकारों से कहें कि मित्र, अपने चिट्ठे पर टिप्पणी और हमारे बीच से इस दीवार को अलग कर दो. क्यूँ दो प्यार करने वालों के बीच लड़की के भाई की तरह खड़े हो? बहुत डर लगता है तो माडरेशन चालू कर लो ताकि बिना आपकी स्विकृति के टिप्पणी प्रकाशित ही न हो. समझो कि जैसे अरेंज्ड मेरिज. फिर तो स्पैम के भर जाने का खतरा नहीं रहेगा. मगर स्वभाववश बस सोचते ही रह जाते हैं. कहना चाहते हैं कुछ और मगर टाईप हो जाता है साधुवाद. ब्लॉगमालिक जान ही नहीं पाता कि हम क्या कहना चाहते थे.

किसी तरह थक हार खीज कर वर्ड वेरिफिकेशन भर भी दें तो पता चलता है वो ढेड़े मेड़े शब्द ही गलत पढ़ डाले थे तो लो, फिर से टाईप करो. दो बार गलत भर दो तो टिप्पणी भी उड़ गई. फिर नये सिरे से टाईप करो कि बहुत बढ़िया लिखे हो, साधुवाद, शुभकामना और न जाने क्या क्या.

चलिये टिप्पणी करने की उमंग में एक दीवाने की तरह हम यह सब भी बर्दाश्त करने को तैयार हैं मगर यह क्या बात हुई??

वर्ड वेरिफिकेशन भरे भी और वो हमें बेवकूफ कहें. ये तो हम न झेल पायेंगे.

नेकी कर दरिया में डाल तो सुना था मगर टिप्पणी कर और गाली खा!!-यह नई परंपरा मालूम पड़ती है. ये हमारे गाँव के संस्कार नहीं हैं.

आप ही बताईये कि इतनी मेहनत के बाद कोई आपको बेवकूफ कहे तो कैसा लगेगा?

हमें तो लगता है कि अगर इस तरह की संगीन वारदातों को अभी नहीं रोका गया तब आगे तो न जाने क्या क्या गालियाँ बकें?

देखा तो था- कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर, तो कभी अपनी अनोखी पहचान बनाने की खातिर-क्या खुल कर गाकियाँ लिखी गईं चिट्ठो से जो कि सब सार्वजनिक था. यह दीगर बात है कि आज वो अपनी करनी के चलते गुमनामी के अंधेरों मे खो गये हैं और कोई उन्हें अब पूछता तक नहीं मगर आप क्या कर पाये? कुछ नहीं. और फिर यह वर्ड वेरिफिकेशन वाली तो दबी छुपी बात है-बिल्कुल वन टू वन-इसमें तो क्या हाल करेंगे, भगवान जाने.

अब हम खुद अपने हाथ से अपने खुद के लिये गाली टाईप भी करें, तब टिप्पणी प्रकाशित होगी तो मित्र, क्षमा करना. माफी चाहूँगा. अगर मेरी टिप्पणी न दिखे तो यह मत समझना कि हमने कोशिश नहीं की होगी या आये नहीं होंगे (ऐसा कहाँ होता है हमारे साथ, वो भी आपके ब्लॉग पर..न, न!!). बस, समझ लेना कि गाली खाकर चुपाई मारे बैठे हैं अपने मूँह की खाकर.

बीबी अलग कोस रही है कि और जाओ हर जगह साधुवाद का बिगुल बजाने. खा ली गाली, मिल गई तसल्ली!! ऐसा ही चलता रहा तो किसी दिन लतिया भी दिये जाओगे और बैठे रहना अपनी साधुवाद की माला जपते.

मेरी बात पर भरोसा न हो रहा हो तो यह देखो स्क्रीन शॉट-कोई झूठ थोड़े ही न बोलेंगे??

tippaniphoto

अब बोलिये?? हमारा विवेक और मानस तो जबाब दे गया. उपर से बीबी का प्रेशर अलग. आप कर सकते हो तो करो टिप्पणी. हम तो नहीं ही टाईप कर पायेंगे अपने लिये इस तरह की बात.

मेरा निवेदन स्वीकार कर लो मित्र, वर्ड वेरिफिकेशन हटा कर माडरेशन लगा लो!! हमें गाली खाने से बचवा लो, बड़ा आभारी रहूँगा और साधुवाद तो दूँगा ही. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अप्रैल 14, 2008

इनसे मिलिये-मेरे सहपाठी

बचपन से परिचित-हम सहपाठी थे दर्जा आठ तक.

फिर उसकी पढ़ाई की रफ्तार शनैः शनैः मद्धम पड़ गई और ११ वीं तक आते आते उसकी शिक्षा यात्रा ने उस वक्त के लिये दम तोड़ दिया.
neta
अक्सर मौहल्ले के चौराहे पर खड़ा दिखता. सदा ४-६ आवारा लड़कों के साथ. किसी ने बताया कि अब वो छोटी मोटी चोरी की वारदातों में शामिल रहने लगा है. स्वभाव से मिलनसार एवं व्यवहारकुशल.जब भी दिखता तो हाथ उठा कर अभिवादन करता और चाय के लिये जरुर पूछता. यह उसकी आदत का हिस्सा बन गया था. पूछना उसका काम होता और मना करके किसी कार्य की जल्दी बतला कर निकल जाना मेरा.

दरअसल मैं डरा करता था कि कहीं उसके साथ साथ किसी लफड़े में ही न अटक जाऊँ. वो भी शायद समझता होगा तो बस, इतना सा कह कर मुस्करा देता कि ठीक है. आगे कभी सही. मेरे लायक कोई काम हो तो बताना. यह पूछना भी उसकी आदत का ही हिस्सा था अन्यथा किसी चोर से क्या काम बतायें? यही उसकी सहृदयता की निशानी है. धार्मिक वो शुरु से रहा. मंदिर मे सुबह शाम दोनों वक्त माथा टिकाने जाता. बस, कभी कभी मौका देख कर चढ़ावे पर हाथ साफ कर लेता.

फिर सुना बड़ी चोरियों में उसकी गैंग चलने लगी. बहुत कर्मठ है. इलेक्ट्रानिक्स गुड्स की चोरी में स्पेशलाइजेशन हासिल कर लिया. शहर उपर नाम चलने लगा और वो चोर से प्रमोट होकर गुण्डा केटेगरी में आ गया. आदत वही: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना और मेरा विदा हो जाना.

कहते हैं उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और हौसला फौलादी. गुण्डागर्दी में भी वो जल्द ही ग्रेड ए का गुण्डा हो लिया. बहुत नाम कमाया. आधा काम तो उसके नाम से हो जाता. वो स्वयं सिर्फ बड़े केसेस हैंडल करने जाता जैसे मकान खाली कराना, चुनाव के दौरान नेताओं के लिये बूथ केप्चरिंग आदि. रसूकदार हो लिया और कालांतर में उच्चस्तरीय गुण्डागीरी के राजमार्ग की स्वभाविक मंजिल को हासिल करते हुए वह नेता हो गया.

शिक्षा और शिक्षा के समाज में योगदान का उसे पूरा भान था. जीजिविषा ऐसी कि ११वीं में दम तोड़ी शिक्षा यात्रा को उसने पुन: जीवित किया और अपने नाम के चलते किसी को भेजकर उसने इस बीच १२वीं और फिर बी.ए. और एल.एल.बी. की उपाधी अर्जित की.

अपनी रसूकदारी और अनेकों नेताओं पर पुराने अहसानों के चलते और भविष्य में काम का सिद्ध होने की पूर्ण प्रतिभा के कारण पार्टी टिकिट से विधायक का चुनाव लड़ा और जैसा की होना था-जीता भरपूर मार्जिन के साथ. एक बार नहीं. लगातार दो बार और आज भी तीसरे दौर में विधायकी बरकरार है.

जैसा बताया कि उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और आदमी काम का, अतः इस बार उसे मंत्री बनाया गया.

भावुक हृदयी होने के कारण जनसमस्यायें उसे विचलित करतीं अतः अक्सर उनसे वह मूँह फेर लेता.

कुछ दिनों पहले पुनः दिखा. मानो पद प्रतिष्ठा का घमंड उसे छू तक न सका. वही तरीका: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना-इस बार लाल बत्ती की कार को किनारे रोक कर उसने यह रसम अदायगी की अतः स्वभाविक रुप से हमेशा की तरह मैं मना नहीं कर पाया और उसके साथ वहीं चाय पी.

बड़ा दबदबा. पीछे पीछे पुलिस की गाड़ी. हालांकि उसे कुछ भी नया नहीं लगता होगा. पहले भी उसके पीछे पुलिस की गाड़ी रहती ही थी. मगर तब जनता की उससे सुरक्षा की वजह से. आज जनता से उसकी सुरक्षा की वजह से. बस, इतना सा ही तो अंतर पड़ जाता है गुण्डे से नेता की यात्रा तय कर लेने में. आज जब उसकी चुनाव बाद शोभा यात्रा निकलती है तो भी वह बीच में, चारों ओर पुलिस और समर्थक टाईप आवारा बालक. बहुत पहले भी कई बार उसकी ऐसी ही यात्रायें पुलिस ने निकाली हैं मौहल्ले में मगर तब वो शिनाख्ती परेड की शक्ल में होती थीं और वो कुछ इसी अन्दाज में तब भी मुस्करा कर ही पुलिस को बताया करता था कि फलानी जगह से यह चुराया और फलानी जगह से वो. साथ साथ बहुतेरे आवारा लड़कों की भीड़ भी ऐसे ही चलती थी कुतहलवश.

वह यारों का यार है. पहचान वालों से पैसा लेकर काम करना उसे गवारा नहीं और बिना पैसे लिये कोई काम आज तक उसने करवाया नहीं. अतः उसकी पहचानवालों का उसके माध्यम से कोई कार्य नहीं होता किन्तु किसी को उसने कभी नहीं भी नहीं कहा. एक सकारात्मक सोच का धनी-हमेशा हाँ में ही जबाब देता.

चाहे वो मंत्री हो गया हो किन्तु जमीन से उसका जुड़ाव वन्दनीय है. वह जमीनी नेता के तौर पर जाना जाता है. जमीन से लगाव ऐसा कि क्षेत्र की सारी कभी विवादित जमीनों पर आज उसका मालिकाना हक है और सारे कागजात उसके नाम. शहर के बीचों बीच एकड़ों का मालिक.

समाज में उनके सराहनीय कार्यों एवं क्षेत्र विकास को समर्पित जीवनशैली को देखते हुए विश्व विद्यालय शीघ्र ही उन्हें मानद डाक्टरेट देने पर विचार कर रही है. सारे जुगाड़ सेट हो चुके हैं.

आज उसका मौहल्ले में सम्मान समारोह है. मुझे मंत्री जी का परिचय देने के लिये मंच से बोलना है. अतः, सोच रहा हूँ इसी में से बोल्ड किये हुए मुख्य मुख्य अंश निकाल कर पढ़ दूंगा. अब कहाँ समय मिलेगा फिर से नया लिखने का?

चल जायेगा क्या?

वैसे इस आलेख का कॉपी राईट नहीं है. कभी आपको अपने क्षेत्र के नेता के बारे में बोलना हो, तो बेफिक्र होकर इस्तेमाल करें. बिल्कुल फिट बैठेगा.


नोट: आज ही ५ दिनों की लखनऊ/कानपुर की यात्रा से लौटा हूँ. शायद कनाडा वापसी के लिये २२ को बम्बई जाने से पहले की इस दौर की अंतिम शहर के बाहर की यात्रा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अप्रैल 06, 2008

अपनी औकात में रहो तुम!!!

महेन्द्र मिश्र जी के ब्लॉग पर इस समाचार को पढ़ता था: कम्प्यूटर वाइरस ने ३९ अपात्रो को सरकारी नौकरी दिलवाई ?

बड़ा गुस्सा आया. ये मजाल एक कम्प्यूटर वाइरस की? एक तो हम कुछ बोल नहीं रहे उससे. सरकारी कम्प्यूटर मे रहने दे रहे हैं. एक से एक उम्दा फाईलें खिलवा रहे हैं. जो किसी को नहीं पता वो खाते बही दिखा रहे हैं. फिर भी ये जुर्रत?

मियाँ वायरस, मैं जानता हूँ कि तुम सरकारी लेपटॉप में रहने लगे हो. लाल बत्ती की गाड़ी में घूमने लगे हो. एक चपरासी तुम्हें उठाये घूमता है. कम से कम इस्तेमाल होता है तुम्हारे आवास का, लगभग न के बराबर. अधिकतर तो मॉडल होम टाईप ही सजा रहता है फिर भी?

यूँ तो अर्दली और गार्ड भी पूरे समय मंत्री जी के साथ ही चलते हैं, इसका क्या मतलब वो भी मंत्री हो गये और वैसा ही बिहेव करें जैसा मंत्री जी करते हैं? गलत बात है न!! ऐसा कहाँ होता है?

अपनी औकात पहचानों, वत्स!!

computer-virus

अभी भी वक्त है संभल जाओ वरना पछताओगे. अपने आप को मंत्री समझने की भूल न करो. यह अपात्रों को सरकारी नौकरी वगैरह दिलवाना मंत्रियों के काम हैं और उन्हीं को सुहाते हैं. तुम क्यूँ पड़ते हो इन सब लफड़ों में? देखो, आ गये न सुर्खियों मे, अब??

हालांकि स्वभाव से तुम दोनों एक से हो. एक आम आदमी तुम्हारे और उनके द्वारा पहूँचाये नुकसान को जब तक पहचान पाता है, तब तक देर हो चुकी होती है. सब कुछ तबाह. सामने मची तबाही देखने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता. आखिर हमने खुद ही तो चुना: उनको भी और तुमको भी, क्लिक करके. किसको दोष दें? बस यही मान कर संतोष कर लेते हैं कि शायद किस्मत में यही तबाही बदी थी.

एक तबाही के बाद जब फिर से जमने की तैयारी करो. तुम दोनों ही तो दूसरे रुप में चले आते हो. कैसे पहचानें? कैसे बचें?

बस, एक अंतर है उनमें और तुममें. वह यह कि तुममे से जो पहचाने जा चुके हो, उन्हें रोकने के रास्ते हैं. लगा देंगे कोई बेहतरीन एन्टी वायरस वेक्सीन..अब रुप बदल कर ही तुम आ पाओगे मगर उन्हें-उनके लिये तो कोई परमानेन्ट एन्टी वायरस ओह!! सॉरी-एन्टी नेता या एन्टी मंत्री वेक्सीन भी नहीं. पूरे ढ़ीट है-वैसे ही फिर चले आयेंगे हाथ जोड़े और हम मूर्ख-उन्हें फिर क्लिक कर देंगे.

इसीलिये वह तुमसे वरिष्ट कहलाये. समझे मियाँ वायरस?

आ जा बेटा औकात में. ज्यादा मंत्री बनने की कोशिश न कर वरना सरकारी आवास से भी हाथ धो बेठेगा और लाल बत्ती से भी. आखिर सारे कार्पोरेशनों के अध्यक्ष भी तो हैं. वो भी तो बिना मंत्री हुए तुम्हारी तरह जी ही रहे हैं. कुछ तो सीखो उनसे! Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अप्रैल 02, 2008

बिटिया का बाप

नया जमाना आ गया था. एक या दो बच्चे बस. बेटा या बेटी-क्या फरक पड़ता है. दोनों ही एक समान.

शिब्बू नये जमाने का था उस समय भी. खुली सोच का मालिक. ऐसा वो भी सोचता था और उसके जानने वाले भी.

एक प्राईवेट फर्म में सुपरवाईजर था.

एक बेटी की और बस! सबने खूब तारीफ की. माँ बाप ने कहा कि एक बेटा और कर लो, वो नहीं माना. माँ बाप को पुरातन ठहारा दिया और खुद को प्रगतिशील घोषित करते हुए बस एक बेटी पर रुक गया. पत्नी की भी नहीं मानी. पौरुष पर प्रगतिशीलता का मुखौटा पहने पत्नी की बात नाकारता रहा.

dwand

खूब पढ़ाया बिटिया को. इंजिनियर इन आई टी. नया जमाना. आई टी का फैशन. कैम्पस इन्टरव्यू. बिटिया का मल्टी नेशनल में सेलेक्शन. सब जैसा सोचा वैसा चला.

मंहगाई इस बीच मूँह खोलती चली गई. माँ की लम्बी बिमारी ने जमा पूंजी खत्म कर दी. उम्र के साथ रिटायरमेन्ट हो गया. नया जमाना, नये लोग. वह पुराना, बिना अपडेट हुआ..वर्कफोर्स से बाहर हो गया. उम्र ५८ पार हो गई. नया कुछ करने का जज्बा और ताकत खो गई. घर बैठ गया. बेटी उसी शहर में नौकरी पर. मल्टी लाख का पैकेज. जरुरत भी क्या है कुछ करने की, वह सोचा करता. प्राईवेट कम्पनी में था तो न कोई पेंशन, न कोई फंड.

बेटिया को तो समय के साथ साथ बड़ी होना था तो बड़ी होती गई. शादी की फिक्र माँ को घुन की तरह खाने लगी मगर शिब्बू-उसे जैसे इस बात की फिक्र ही न हो.

पत्नी कहती तो झल्ला जाता कि तुम क्या सोचती हो, मुझे चिन्ता नहीं? जवान बेटी घर पर है. बाप हूँ उसका..चैन से सो तक नहीं पाता मगर कोई कायदे का लड़का मिले तब न!! किसी भी ऐरे गैरे से थोड़े ही न बाँध दूँगा. यह उसका सधा हुआ पत्नी को लाजबाब कर देना वाला हमेशा ही उत्तर होता.

पत्नी अपने भाई से भी अपनी चिन्ता जाहिर करती. उसने भी रिश्ता बताया मगर शिब्बू बात करने गया तो उसे परिवार पसंद न आया. दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी लड़के पर थी. कैसे अपनी बिटिया को उस घर भेज दे.

पत्नी इसी चिन्ता में एक दिन चल बसी. घर पर रह गये शिब्बू और उसकी बिटिया.

जितने रिश्ते आये, किसी न किसी वजह शिब्बू को पसंद न आये. लड़की पैंतीस बरस की हो गई मगर शिब्बू को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता.

लड़की की तन्ख्वाह पर ठाठ से रहता था और बिटिया ही उसकी देखरेख करती थी.

आज शिब्बू को दिल का दौरा पड़ा और शाम को वो गुजर गया.

उसको डायरी लिखने का शौक था. उसकी डायरी का पन्ना जो आज पढ़ा: १० वर्ष पूर्व यानि जब बिटिया २५ बरस की थी और नौकरी करते तीन बरस बीत गये थे तथा शिब्बू रिटायर हो चुका था उस तारीख के पन्ने में दर्ज था...

शीर्षक: बिटिया की शादी

और उसके नीचे मात्र एक पंक्ति:

" मैं स्वार्थी हो गया हूँ."

आज न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. इंसान की सोच कितनी पतनशील हो सकती है?

बिटिया अब घर पर अकेले रहती है. अभी अभी दफ्तर के लिये निकली है-बेमकसद!!


(नोट: १.शिब्बू छद्म नाम मान लें और बिटिया का नाम, जो चाहें रख लें, मगर उससे कहानी कहाँ बदलती है?

२. कितने ही प्रश्न आकर दस्तक दे रहे हैं-बेटा बेटी एक समान!! एक बच्चा और बस!! और भी न जाने क्या क्या!!

३. मुझे न जाने क्यूँ इस पोस्ट को छापना अनमना सा लग रहा है और मेरा मन है कि यह अतिश्योक्ति हो, मगर फिर भी आप सबके साथ अपनी सोच बाँट रहा हूँ.) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 30, 2008

आया रे मदारी आया!!!

डुग-डुग-डुग-डुग-डुग!!!!!!

एकाएक सुबह १० बजे घर के भीतर सड़क से ये आवाज सुनाई पड़ी. एक अर्सा बीता इस आवाज को सुने. बचपन में इसे सुन हम सब बच्चे घर से भाग सड़क पर निकल आते थे. यह मदारी का डमरु था और वो बंदर का खेल दिखाया करता था. आज सालों बाद वो ही आवाज सुन अनायास ही मैं दरवाजे के बाहर भागा. भागते भागते पत्नी को आवाज लगाई-आओ, आओ, मदारी आया!! डुग-डुग-डुग-डुग-डुग!!!!!!

वो भी सोच रही होगी कि किस पागल आदमी से पाला पड़ा है. मगर हिन्दी साहित्य में एम.ए. किये होने के बावजूद उसकी इस मनोविज्ञान पर भरपूर पकड़ है कि पागल को पागल कहो, तो वह भड़क उठता है. अतः वो भी मुस्कराते हुए बिना भागे बाहर चली आई.

अब तक मैं मदारी के पास पहुँच चुका था और बन्दरिया "राधा" ने मुझे सलाम भी कर लिया था. न जाने कितनी पुरानी बचपन की वादियों में लौट लिया मैं. कितने ही दोस्त याद आये. सब कुछ बस कुछ ही पलों में.

मदारी डमरु बजा रहा था. डुग-डुग-डुग-डुग-डुग!!!!!! बन्दरिया नाच रही थी. शहरों से विलुप्त होती संस्कृति आज अपने अब तक जीवित होने का प्रमाण लिये खड़ी थी मेरे सामने. शायद, मुझसे कह रही है कि हे उड़न तश्तरी, हमारे पूर्ण विलुप्त होने के पहले एक बार, बस एक बार हमें अपनी लेखनी और चिट्ठे से जन जन तक पहुँचा दो ताकि दर्ज रहे और सदियां हमें याद रखें. मैं यूं भी मौन पढ़ने में विशारद हासिल रखता हूँ, ऐसी मेरी खुशफहमी है सो हाजिर हूं उनकी तस्वीरों के साथ. खुशफहमी तो यह भी कहलाई कि सदियाँ मेरा लिखा पढ़ेंगी.

राधा:

radha

मोहल्ले भर के बच्चे इक्कठे किये, बुजुर्ग एकत्रित किये. पिता जी के लिये कुर्सी लगाई गई. पत्नी स्वतः आ गई. सामने ही स्कूल है, जहाँ आज परीक्षा के परिणाम घोषित हुए, वहाँ के बच्चे इककठे कर लिये. सभी बच्चे आसपास की झुग्गियों से आते हैं. मन था कि सब देखें हमारे समय के मनोरंजन के साधन जो शायद फिर आगे देखने न मिले. सभी बच्चे बहुत खुश हुए. बन्दरिया ’राधा’ भी खूब जी तोड़ कर नाची. जेठ से शरमाई. देवर की बारात में नाची. पनघट से पानी भर कर दिखाया. शाराब के नशे में गुलाटी लगाई और न जाने क्या क्या. धमका के दिखाया. सलाम करके अभिभूत कर दिया. बड़ी प्यारी थी और क्यूट लग रही थी अपने करीने से पहिने टॉप्स और स्कर्टस में (आजकल कहाँ देखने में आता है यह??) और मदारी ’मल्लैय्या’ की लाड़ली तो वो थी ही.

पत्नी साधना हमारे पागलपन को सहर्ष स्विकारते हुए राधा को नजराना दे रही है:

madam with radha

चेहरे से बुश और हरकतों से अपने सरदार जी. जैसा मल्लैय्या कहे, वैसा करे. राधा शायद समझ गई थी कि मैं अमरीका टाईप के देश से आया हूँ तो मल्लैय्या के इशारे पर बार बार सलाम करे. कहीं मेरे हाथ में सिमटे सुबह के अखबार को न्यूक्लियर डील के कागज न समझ रही हो, बार बार दस्तखत करने आगे बढ़ रही थी मगर उदंड बच्चों की भीड़ देख (वाम पंथी टाईप) हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, बस, सलाम करके काम चला रही थी. सलाम में एक संदेश था कि मौका देखकर साईन कर देंगे.

खैर, आनन्द बहुत आया. सभी बच्चों और बुजुर्गों को खुश देख कर और भी ज्यादा.

मैं, याने उड़न तश्तरी स्कूली बच्चों के बीच:

sameer with kids

बाद में मल्लैय्या से कुछ देर बातें हुई. यहीं नजदीक के एक गांव ’घाना’ में रहता है. बंदर का नाच ही उसकी रोटी का सहारा है. एक बेटा है. उसे खूब पढाया लिखाया और काबिल बनाया तो वह बड़े शहर दिल्ली को रुखसत हो लिया. किसी अच्छे ओहदे पर है. गांव आना उसे पसंद नहीं. पिता जी को साथ न रख पाना, आजकल आम तौर पर देखी गयी, उसकी पारिवारिक और पोजिशनजन्य मजबूरी है. पैसे न भेज पाने का कारण पिता जी के दिये संस्कार कि अपने बच्चों को अपने से बेहतर पढ़ाओ, बढ़ाओ और पालो, सो वो वह कर रहा है. इसलिये भेजने लायक पैसे नहीं बचते. आखिर, संस्कारी बच्चा है. गांव की पान की दुकान, जो घर के बाजू में है, पर फोन न कर पाने का कारण समयाभाव को जाता है. और पत्र लिखने का अब फैशन न रहा. अतः माता-पिता से संपर्क सूत्र टूटे ६ से ज्यादा बरस बीत चुके हैं.

पहले वाला बंदर ’रामू’ मर गया आखिरी दिन तक नाचते नाचते, जो उसका और उसकी पत्नी का पेट पालता था. नया बंदर लाये. पढ़ाया लिखाया याने नाचना और अन्य कलायें सिखाई. १० दिन में पढ़ लिख कर रोड शो देने को तैयार हो गया. आखिर मालिक की मजबूरी समझता था. खुद तो फल फूल और पेड़ों पर उपलब्ध चीजों पर जी लेता है मगर माता-पिता तुल्य मालिक को भूखा नहीं सोने देता. उन्हीं के बाजू में वो भी सो रहता है.

मल्लैय्या को भी इन्सानों और औलाद से ज्यादा इस मूक प्राणी पर भरोसा है. वो इसके साथ संतुष्ट है. कहता है, साहेब, ये ही ठीक हैं. कम से कम हम इनके साहरे जी तो ले रहे हैं.

मल्लैय्या और राधा:

mallaiya radha

कई बच्चों ने उसका खेल देखा आज. काश, एक भी बच्चा उस खेल दिखाने के पीछे छिपे उस राधा बंदरिया के जज्बे को समझे तो आज का खेल दिखाना सफल हो जायेगा. शायद इंसानो पर इंसानों का भरोसा वापस लौटवाने में यही बंदर कामयाब हो जाये.

राधा को सलाम!!

मल्लैय्या और राधा दोनों चले गये..दूर से विलुप्त होती आवाज सुनाई देती रही: डुग-डुग-डुग-डुग-डुग!!!!!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, मार्च 28, 2008

दिल से आवाज आई: विश्व रंगमंच दिवस पर

जबलपुर आये बहुत दिन बीते. रोज इन्तजार करते थे कि कोई निमंत्रित करे. कहीं कुछ बोलने के लिये बुलवाये. कोई कविता सुने. मगर पत्थरों का शहर के नाम से मशहूर जबलपुर अपने को साबित करता रहा. कहते हैं सब टूट जाये, एक आस नहीं टूटना चाहिये. नहीं टूटी साहब और आखिर वो दिन आ ही गया और भाई पंकज स्वामी, अरे वही जबलपुर चौपाल वाले. नहीं जानते, जानेंगे भी कैसे, ब्लॉगवाणी पर अभी जो वो नहीं हैं. जल्द आ जायेंगे, ने निमंत्रित किया. अखबार में समाचार और नाम आया और साथ ही जानने वालों की बधाई. वाह भाई, अखबार में छप लिये और आख्यान देने जा रहे हो, का बोलोगे यार?? जरा हमें भी तो सुनाओ.

vivechana

अपना मोहल्ला, जहाँ कभी बचपन में हॉफ पेन्ट पहन कर मिट्टी में खेले थे, वो काहे मानने लगे कि आप कुछ ऐसा जान गये हो जो वो नहीं जानते और आप उन्हें बता सकते हैं. हम भी झेंपे से चुपचाप बधाई लेकर शाम, अपने पूर्ण भारतीय होने को सत्यापित करते हुए पूरे ४५ मिनट विलम्ब से आयोजन स्थल पर पहुँचे. आनन्द आ गया. विवेचना रंगमण्डल ने इतना सुन्दर कार्यक्रम प्रस्तुत किया कि शब्दों में बयान करके उसके आकार को बांधने में मैं अपने आपको पूर्णतः अक्षम पा रहा हूँ.

फिर भाई पंकज स्वामी का विश्व रंगमंच दिवस के, प्रगतिशील लेखक संघ के एवं ब्लॉग के विषय में आख्यान हुआ तथा उसके बाद हमें, यानि समीर लाल यानि उड़न तश्तरी को इस विधा के विषय मे बताने के लिये मंच पर निमंत्रित किया गया. कुछ बताया, ज्यादा निवेदन किया और भी ज्यादा आश्वासन दिया कि ब्लॉग खोलने एवं बनाने की हर मदद के लिये हम सब ब्लॉगर हर वक्त हाजिर हैं. अपने कार्ड भी लोगों में बांट दिये. गिरीश बिल्लोरे ’मुकुल’, पंकज स्वामी, महेन्द्र मिश्रा, विकास परिहार, जो सभी जबलपुर से ब्लॉगिंग करते हैं, इन सबको बिना इनकी पूर्वानुमति के सबकी मदद के लिये हाजिर करवा दिया. गिरीश भाई ने तो तुरन्त एक सेमिनार की घोषणा भी कर दी जिसमें विवेचना के एवं साथियों को ब्लॉग के विषय में जानकारी देने हम सब उपस्थित रहेंगे. घोषणा पर त्वरित प्रतिक्रिया करते हुए प्रख्यात हस्ती विवेचना रंगमंडल के निर्देशक श्री अरुण पाण्डे जी ने दिन भर के लिये पूरा का पूरा साईबर कैफे उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी. हम उनके हृदय से आभारी हैं. अगले हफ्ते किसी दिन इस सेमिनार का आयोजन किया जायेगा और उस दिन संस्कारों की नगरी संस्कारधानी जबलपुर से नये शुरु हुए चिट्ठों की जानकारी आप तक पहुँचाई जायेगी. यह अपने आप में एक उपलब्धि है.

कार्यक्रम के द्वितीय चरण में विवेचना रंगमण्डल के ही युवा कलाकारों की हृदय की वाणी कविता रुप में सुन कर मन प्रफुल्लित हो गया. कहीं से लगा ही नहीं कि यह नया नया लिखना शुरु कर रहे हैं और कई तो पहली बार पढ़ रहे थे. उनमें से ही, हालांकि कोई भी कमतर नहीं था, एक बालक नें मेरा तथा पूरी सभा का ध्यान विशेष रुप से आकर्षित किया. मैने उसकी तस्वीर भी ली और उसकी वह कविता भी, इस वादे के साथ कि इसे मैं अपने चिट्ठे क माध्यम से लोगों तक पहुँचाऊँगा.

आईये स्वागत करें रंगकर्मी भाई राजेश वर्मा ’बारी’ का, जो कि जबलपुर में ही रहते हैं:

rajeshkavi vivechana

देखिये उनकी कल्पनाशीलता:

"लकीरें"

हरे पत्तों से भरे, नन्हे से पौधों की, पत्तियों पर भी
होती हैं चिंता की लकीरें, के न जाने कब किसके
पैरों तले रौंदा जाऊँगा मैं.

हरे पत्तों से भरे, पेड़ों की पत्तियों पर भी,
होती हैं चिंता की लकीरें, के जाने कब, कौन
छांट डालेगा मेरी टहनियों को,
और काट डालेगा मेरे तनों को.

हरे पत्तों से भरे, वृक्षों के पत्तों पर भी,
होती हैं चिंता की लकीरें, के जाने कब,
मिटा दिया जायेगा मेरा नामों निशां,
किसी आदमी की चिता के लिये.

और न चाह कर भी, लिटाना होगा उसे, अपनी छाती पर मुझे
जिसने रौंदा था, मेरे हंसते खिलखिलाते बचपन को,
जिसने काटा था जवानी में मेरी छोटी छोटी डालियाँ और तनों को
जिसने उजाड़ दिया था मुझको बुढ़ापे में.

आखिर क्या बिगाड़ा था मैने उस इसां का
मैने तो लोगों को फूल दिये, फल दिये, पक्षियों को बसेरा दिया
राहगीरों को छाया दी, जीवन के लिये प्राण वायु दी.

हो सकता है यही मेरा अपराध रहा हो!!

पर फिर भी फक्र है मुझे अपने आप पर
के उस माटी का कर्ज चुका रहा हूँ मैं,
आज किसी इसां की देह जलाने के काम आ रहा हूँ मैं.

इन्हीं शब्दों के साथ इस मातृभूमि को नमन करता हूँ और
प्रार्थना करता हूँ, उस इसां की चिता की राख के वारिसों से
के मुझे अभी अपना अंतिम कर्ज चुकाना है,
इसलिये हो सके तो मेरी राख को गंगा में न बहाना
कर सको तो बस इतना करना, उस माटी में मिला देना तुम मुझे
हुआ था जिस माटी में मेरा जन्म,
हो सकता है मेरी राख से मेरा कोई अंकुर फूटे
जिसका बचपन, जवानी और बुढ़ापा तुम्हारे काम आये.

--राजेश वर्मा ’बारी’

और यह दर्शन करिये वहाँ उपलब्ध जबलपुर के चिट्ठाकार:

बांये से दांये:

गिरिश बिल्लौरे, समीर लाल, पकंज स्वामी, महेन्द्र मिश्रा.
jbpkeblogger


बाकी आयोजन के डिटेल्स तो आप गिरीश बिल्लौरे जी की पोस्ट एवं महेन्द्र मिश्र जी की पोस्ट से सुन ही चुके हैं.

कार्यक्रम की एक झलक देखें:

vivechana1 Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मार्च 26, 2008

माई ब्लॉग, माई वाईफ: मेरी आत्मकथा

सोचता हूँ अब वक्त आ गया है जबकि मैं अपनी आत्मकथा लिख डालूँ.

पिछले कुछ दिनों से इसी विचार में खोया हूँ. चल रहा है एक चिंतन. देखिये न तस्वीर में.
sambw2for
पहले तो मसला उठा कि शीर्षक क्या रखूँ?? मगर वो बड़ी जल्दी हल हो गया. फाइनल भी कर दिया- "माई ब्लॉग, माई वाईफ". कैसा लगा??

नाम से भ्रमित न हों. इस तरह की अन्य आत्मकथाओं की ही भाँति न तो इसमें हमारे ब्लॉग के बारे में कुछ होगा और न ही हमारी वाईफ के बारे में. अगर यह ढ़ूँढ़ा तो बस, ढ़ूँढ़ते रह जाओगे!!!!

तो ऐसा बना कवर पेज:

myblogmywife

अब विचार चल रहा है कि क्या क्या जिंदगी के हिस्से में इसमें कवर करुँ. वो पुराने जमाने के चक्कर तो मैं लिखने से रहा और न ही अपने हाई स्कूल के नम्बर. जब बड़े बड़े बदनामी के डर से बड़े बड़े किस्से आत्मकथा से गोल कर गये, जो कि सबको मालूम थे, तो हमारा तो ज्यादा लोगों को मालूम भी नहीं है और हमारे मोहल्ले में ज्यादा ब्लॉग पढ़ने का फैशन भी नहीं है कि कोई हल्ला मचाये कि हम क्या क्या छिपा गये.

रही किसी से मनमुटाव या विवाद की घटना..तो जिनसे ब्लॉगजगत एवं असली जगत में ऐसा है, वो सारे तो अभी बने हुए हैं. रिटायर हो जाते तो जरुर कुछ न कुछ चैंप देते उनके नाम. अभी तो इतना ही लिख दूँगा कि उनको मैं अपना पथप्रदर्शक मानता हूँ. उनके बिना बिल्कुल अकेला महसूस करुँगा. बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद तले एक निश्चिंतता रहती है, सो ही महसूस करता हूँ उनके रहने से. जब भी मैने उन्हें आवाज दी वो मदद के लिये दौड़े चले आये. (हांलाकि उनके घुटने में बहुत दर्द था और ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने दौड़ने को मना किया है) फिर भी स्नेहवश वो दौड़े.

जब वो रिटायर या फायर हो जायेंगे, तब असलियत लिख दूँगा मगर अभी तो बस इतना ही.

अभी तो रेल्वे के गरीब रथ में बैठ कर भारत के कोने कोने की रथ यात्राओं का अनुभव भी इसी में समेटना है. पाकिस्तान जाने का मौका नहीं लगा तो क्या हुआ? विदेशों वाली और जगहें भी तो हैं, जहाँ मैं गया हूँ. वहीं का लिख डालूँगा. कौन वेरीफाई करने जाता है?

कुछ ऐसा भी बीच में लिख दूँगा कि हिन्दी ब्लॉगिंग सन २०१० तक विकसित चिट्ठाकारी का दर्जा प्राप्त कर लेगी और चिट्ठाकारों की संख्या लाखों में होगी. पूरा विश्व हिन्दी की ओर मूँह बाये देखेगा.

किताब मोटी होनी चाहिये, बस यही उद्देश्य है. ऐसी किताबें यूँ भी कौन खरीद कर पढ़ता है और वैसे भी, हमारी वाली तो सरकार भी नहीं खरीदेगी और न ही हमारी पार्टी अर्रर...हमारे ब्लॉगिये ही उसे खरीदने वाले हैं. तो सिर्फ बांटने के काम आयेगी. लोग फार्मेलटी में सधन्यवाद ग्रहण करेंगे और अपने घर ले जाकर बिना पढ़े अलमारी में रख देंगे.

मगर मुझे संतोष रहेगा कि मेरी आत्म कथा ’"माई ब्लॉग, माई वाईफ" छप गई और ५०० कॉपी चली गई. और क्या अपेक्षा करुँ इस छोटे से जीवन से!!! बड़ी संतुष्टी महसूस हो रही है. मुस्करा रहा हूँ और दोनों हाथ आपस में मल रहा हूँ..इस इन्तजार में कि कोई टीवी वाला आता होगा इन्टरव्यू लेने. ऐसा ही फैशन है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 09, 2008

बस, बच ही गये..समझो!!!

मार्च माह का भोर का वातावरण, न जाने क्यूँ मुझे बचपन से ही भाता है.

आज सुबह ६ बजे ही नींद खुल गई. दलान में निकल आया. वहीं झूले पर बैठ कर या यूँ कहें कि आधा लेट कर अधमुंदी आँखों से आज के अखबार की सुर्खियों पर नजर दौड़ाने लगा. सूरज की रोशनी में हल्की गुलाबी तपिश थी किन्तु मधुयामिनि के वृक्ष की आड़ उसे सुखद सुगंधित और मोहक बना दे रही थी.
samsam
झूला स्वतः ही हल्की हल्की हिलोरें ले रहा था. सामने टेबल पर चाय परोसी जा चुकी थी. मैं अलसाया सा, चाय पर नाचती एक मख्खी को नजर अंदाज करता हुआ अपने आप में खोया था. मख्खी को शायद उसे मेरा नजर अंदाज करना पसंद नहीं आ रहा था. वो बीच बीच में उड़ कर कभी मेरे कान के पास और कभी नाक के पास उड़ कर परेशान कर रही थी या अपने होने का अहसास करा रही थी, कि कैसे ध्यान नहीं दोगे.. स्वभावतः मैं इस तरह की बेवकूफियों को नजर अंदाज करते हुये उसमें भी कोई खूबी खोजने का प्रयास करता हूँ. एक बार को उसकी चपलता मुझे भाई भी, मन किया कि आदतानुसार कह दूँ: क्या फुर्ती है?? साधुवाद आपकी उड़ान का.. जब आप कान के पास आती हैं तो क्या मधुर संगीत लहरी उठती है..भुन्न्न्न!!! वाह वाह!! गाते रहिये. एकदम मौलिक संगीत..आनन्द आ गया. पर दूसरे ही पल ख्याल आया कि कहीं इससे उसे गलत हौसला न मिल जाये और वो पहले से भी ज्यादा परेशान करने लगे. यह मैने समय के साथ प्राप्त अनुभवों से सीखा है. . अगर भगाता या उसे मारता या गाली देता, तो भी वो और ज्यादा परेशान करती, विवाद करने का उसका यही तरीका है. उसे मजा आता है इस तरह के विवाद में. बस, मैं उसे नजर अंदाज करता रहा.

कुछ ही पल में देखा कि वो मेरी चाय की गरम प्याली में गिर गई और मर गई. उसका यह हश्र तो होना ही था. वो ही हुआ. मगर, मेरी चाय का सत्यानाश हो गया बेवजह. तो क्या नजर अंदाज करना भी उपाय नहीं है?? फिर क्या किया जाये कि मख्खी भी मर जाये और चाय भी खराब न हो. यूँ तो फिर से चाय बन कर आ जायेगी मगर खामखाह, एक तो खराब हुई.

नीचे दिवंगत आत्मा की एक तस्वीर, अगर आप श्रृद्धांजली अर्पित करना चाहें, तो (ध्यान रहे यह मरने के पूर्व की है):
makhkhi
खैर, चाय फिर आ गई. इस बीच रामजस नाई भी आ गया मालिश करने.

मैं अधलेटा सा, रामजस गोड़ में कड़वा तेल रगड़ने लगा और साथ ही शुरु हुआ उसका दुनिया जहान की अनजान खबरों का खुफिया एफ एम बैन्ड रेडियो. तरह तरह के किस्से सुनाता रहा. कानों विश्वास न हो मगर पास्ट परफॉरमेन्स के बेसिस पर उसकी बात को सपाट रिजेक्ट कर देना भी अपनी ही बेवकूफी होती. पहले भी उसकी बताई असंभव खबरों को संभव होते देख चुका हूँ तो अब कान ज्यादा चौक्कने रहते हैं. सब आदमी अनुभव से ही तो सीखता है.

मालिश चलती रही, बीच बीच में चाय की चुस्की और रामजस का नॉनस्टाप ट्रांसमिशन. कह रहा था कि अपनी कोठरी बेच देगा, कहीं और नया कमरा खरीदेगा. बच्चे बड़े हो रहे हैं. मोहल्ले के बच्चे गाली गलोच करते हैं. उनके साथ खेलने को तो मना कर दिया है पर कान में जो पड़ती है, वही न सीखेंगे, माहौल का बहुत अंतर पड़ता है, साहेब. मैं चुपचाप उसकी ज्ञानवार्ता सुन रहा हूँ. उसके विचार मुझे अच्छे लग रहे हैं मगर मैं चुप हूँ हमेशा की तरह. मैं ऐसे मसलों पर नहीं बोला करता.

तब तक एक छोटी सी प्यारी गोरी बच्ची ने मुस्कियाते हुये मेन गेट खोल कर दलान में प्रवेश किया. मैने आज पहली बार उसे देखा था.

रामजस ने बताया कि यह उसकी बेटी है गुलाबो. मेरे कनाडा जाने के बाद पैदा हुई. अब ७ साल की है और दूसरी क्लास में अंग्रजी स्कूल में पढ़ती है. हिसाब में बहुत तेज है. रामजस तो पढ़ा नहीं, न ही उसकी बीबी इसलिये इसे खूब पढ़ायेगे.

मैने गुलाबो से पूछा कि बेटा, पढ़ना कैसा लगता है?

गुलाबो प्यारी सी मुस्कान के साथ बोली कि बहुत अच्छा.

मैने फिर पूछा कि बड़ी होकर क्या बनोगी?

कहने लगी, डॉक्टल (डॉक्टर)!! वो फिर मुस्कराने लगी.

रामजस कहने लगा कि साहेब, यह तो पगलिया है. हमारे भी अरमान हैं.खूब पढ़ा देंगे १२ तक फिर ब्याह रचा देंगे. अपने घर जाये फिर चाहे, हिमालय चढ़े वरना तो बिरादरी में लड़का कहाँ मिलेगा? और बिरादरी के बाहेर शादी करके अपनी नाक कटवानी है क्या?

मैं सन्न!!!! कभी रामजस को देखूँ और कभी गुलाबो की मासूम आँखों में तैरते सपनों को. किसको सही मानूँ..जो होने को है या जो सोच में है. समझाईश का कोई फायदा रामजस पर हो, इसकी मुझे उम्मीद नहीं मगर जब जब मौका लगेगा, समझाऊँगा जरुर.

बस, बात को बदलने के लिये मैने पूछ ही लिया कि यह गुलाबो नाम कैसा रखा है?

रामजस बताने लगा कि साहेब, जब पैदा हुई तो झक गुलाबी रंग की थी तो हम इसका नाम गुलाबो रख दिये.

मैं मुस्करा दिया और मन ही मन भगवान को लाख लाख धन्यवाद दिया कि हमारे पिता जी के दिमाग में यदि १% भी रामजस के दिमाग का साया पड़ गया होता तो आज हमारा नाम कल्लू लाल होता. बहुत बचे!!!


स्पष्टीकरण एवं बचाव कवच (डिसक्लेमर):

आलेख में उल्लेखित मख्खी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या ब्लॉगर से मेल खाना मात्र एक संयोग एवं दुर्घटना है. यह पूर्णत: मौलिक एवं गंदगी में बैठने वाली सचमुच की मख्खी थी जिसे साफसुथरी जगहों पर उड़ कर सभ्यजनों को चिढ़ाने में मजा आता था. बदमजगी फैलाना ही उसका मजा था. अपनी इसी मजा लुटने की आदात के चलते वह गरम चाय में गिर कर असमय ही काल की ग्रास बनी. ईश्वर उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें. कृप्या कोई अन्यथा न ले क्योंकि लिखने के बाद जब मैं इसे पढ़ रहा हूँ तो कहीं कहीं कुछ अन्यों से सामन्जस्य दिख रहा है, मगर कहाँ वो और कहाँ यह एक गंदी सी मख्खी..न न!! बस, एक संयोग ही होगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, मार्च 04, 2008

हाय!! काश! यह धरती फट जाये!!

याद आता है तब अपनी चार्टड एकाउन्टेन्सी की प्रथम पार्ट की परीक्षा दी थी. दो पन्नों में ही पूरे भारत का रेजेल्ट आ गया. मात्र १ या १.५% बच्चे पास हुए. हम भी गये अपना रेजेल्ट देखने. बार बार खोजा, रोल नम्बर/नाम मिल ही नहीं रहा था. मित्र ने पूछा: क्या हुआ भाई!! हमने बड़े भोलेपन से कहा कि यार, नाम ही नहीं मिल रहा, पता नहीं क्या बात है. मित्र जरा अव्यवहारिक से थे, तुरंत बोल उठे: इसमें पता नहीं की क्या बात है. एकदम साफ है कि आप फेल हो गये हैं. बड़ी शर्म आई. हॉस्टल में रुम पर लौट आये. खूब रोये और अगले दिन से सब नार्मल. बाद में भी कहीं कहीं एकाध बार फेल हुए, मगर तब उतना दुख नहीं हुआ. बुरी आदत जल्दी लग जाती है.

आज उकसाया उसने जिन्हें मैं अपने परम मित्रों और अपने शुभचिंतकों में ऊँचें रखता हूँ..मेरे भाई अनिल रघुराज ने.

उनके कहे पर आज देखा पूरे ब्लॉगवीर से ब्लॉगपीर तक सब अपनी अपनी एलेक्सा रेंकिंग को लेकर उत्साहित घूम रहे हैं. कोई पहले नम्बर पर तो कोई २९वें नम्बर पर.

हम भी पहुँच लिये एलेक्सा की साईट पर और लगे खोजने प्रथम २० वीरों में अपना नाम. आखिर एक लम्बा समय गुजारा है इस दुनिया में..जहाँ कभी साधुवाद के परचम गाड़े थे और जिस दुनिया ने अब शैतानवाद के युग तक का सफर सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है, उसमें हमारा नाम तो यहीं कहीं होना चाहिये. नहीं मिला!!!! आँखें सजल सी हो आईं. फिर सोचा कि शायद गल्ती से थोड़ा नीचे लिख दिया होगा. एक पन्ना, दो पन्ना, तीन पन्ना...पढ़ते चले गये. कई पहचाने चेहरे मिले..कोई कोई तो ऐसे जो दो साल से मिले ही नहीं. यहाँ तक की दो साल पहले भी बस इतना कहने आये थे कि आज से हम लिखेंगे फिर गुम..वो भी मिल लिये. एक नहीं मिले तो हम खुद.....उत्साह की चरम देखिये कि ८० पन्ने तक चले गये. और जैसा कि होनी को बदा था..नहीं मिलना था और नहीं मिले...शुष्क उद्यान, चिरकुट कलम, चिलमन कहानियाँ, न छेड़ो मुझे और न जाने कौन कौन.. सब मिले..या खुदा, बस हम न मिले.
alexa
आँसूओं की अविरल धारा प्रवाहित हो चली. फेल होने की भी प्रेक्टिस होती है. अब इतने दिन से छुटी हुई थी कि एकाएक यह सदमा फिर से झेलना तो बरदाश्त के बाहर हो गया. ८० पन्ने तक तो नहीं ही है..अब आगे होये भी तो क्या.किसी को आगे दिख जाये तो बता देना. एप्लिकेशन लिख कर हटवा दूँगा. उतने पीछे रेकिंग में(अगर हो तो) एडसेन्स से डॉलर की बरसात तो क्या, ट्प्पर चू का एक बूँद पानी भी न गिरे. एक सच्चा भारतीय हूँ तो सबकी कमाई का जुगाड़ देखकर जलन भी हो रही है कि हम रह गये.

मन में तो आ रहा है कि ब्लॉग ही डिलिट कर दूँ. कम से कम कहने को तो रहेगा कि डिलिट हो गया भूले से, इसलिये एलेक्सा में नहीं है.

काश! हमें भी रेंकिंग मिल जाती. आप सबके बीच उठने बैठने लायक हो जाते. सोचता हूँ, जरुर कोई पाप हो गया है मुझसे, जिसकी यह सजा मिली है. कैसे प्रयाश्चित करुँ उस अनजान पाप का?? जिन्हें अपने पाप मालूम हैं या जिनके पाप जगजाहिर हैं वो तक रेंकिंग पा गये और एक मैं बदनसीब इन टर्मस ऑफ एलेक्सा. ये कैसा न्याय है भगवन!!!

उस पर से पत्नी भी नाराज है. कहती है कि और फोड़ लो आँखें कम्प्यूटर में. कहते थे कि लगी रहने दो, सन २०१० से रवि भईया बताये हैं कि कमाई शुरु हो जायेगी. रेंकिंग तक तो मिली नहीं, क्या खाक कमाई होगी. बड़े टिप्पणीपीर बने घूमते हो..अभी भी वक्त है कि कुछ कायदे का काम करो. दिन भर उड़न तश्तरी-उड़न तश्तरी लगाये रहते हो..देखा, कैसी उड़ी....न जाने कहाँ उड़ गई कि नजर ही नहीं आ रही.

अब क्या जबाब दें उसको. खराब समय में चुप ही रहना बेहतर है.

हाय!! काश! यह धरती फट जाये और मैं उसमें समा जाऊँ!!!

मगर कितनी..पूरा का पूरा समाने के लिये तो तालाब ही खुदना होगा!!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मार्च 01, 2008

क्या बवाल मचा रखा है?? (भड़ास/मोहल्ला विवाद नहीं)

कहते हैं पुरानी यादें जब जरुरत से ज्यादा घेरने लगे तो वह आपकी प्रगती में बाधक होती हैं और यहाँ तो अपनी स्थितियों का आँकलन करता हूँ तो पाता हूँ बाधक तो दूर, हम तो इतना ज्यादा घिरे रहते हैं कि प्रगति का स्थान शायद अब तक पतन ने ले लिया होगा. इसी पतनशीलता के दौर से गुजरते तीन रोज पहले दिल्ली में था. फरीदाबाद से ग्रेटर नोयडा की तरफ जा रहा था. पूरा ट्रेफिक जाम. फरवरी की दोपहर मगर एक तो आपस में सटे वाहन, उस पर से तपता सूरज. गाड़ी का एसी अपने कर्तव्यों को बखूबी निष्पादित कर रहा था फिर भी गाड़ी को बहुत मुश्किल से एक बड़े अंतराल में मात्र कुछ इन्च खिसकता देख खीझ होना स्वभाविक ही था. हालात ऐसे कि लगा फिल्म जोधा अकबर देख रहे हैं. बार बार लगता कि अब खत्म हुई कि तब..मगर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

क्या फर्क है?? एक ही बात!!


jodhaakbar1

delhijam


ऐसा नहीं कि मैं अकेला ही खीझ रहा हूँ या परेशान हो रहा हूँ. मैने उसके चेहरे पर भी परेशानी के भाव देखे. गुलाबी टॉप्स, सर पर चढ़कर आराम करता धूप का चश्मा, शायद काफी देर लगाये लगाये थक गई होगी. खीझ और परेशानी का मिलाजुला असर यह रहा कि थकान ने उसे आ घेरा और उसने सीट पर सर टिका कर आँखें बन्द कर लीं. एकदम चुप, न कुछ बोलना और न कुछ सुनना, खूबसूरत लग रही थी.

आज एक अरसे बाद उसने रीता की याद दिला दी. खूबसूरत तो वो भी थी, इस तरह के माहौल में वो भी परेशान हो उठती और खीझ जाती मगर उसके और इसके स्वभाव में एक बहुत बड़ा व्यवहारिक अन्तर दिखा कि रीता अपनी सारी खीझ मुझ पर निकाल दिया करती. उसे हमेशा अपने बाजू वाली लेन ज्यादा तेजी से क्लियर होती नजर आती. वो मुझ पर नाराज होती, चिल्लाने लगती. मैं उसे समझाता कि न तो बाजू की लेन तेज है और न ही लेन बदलने से कोई फायदा होगा, मगर वो सुने तब न!! ऐसी ही कितनी आदतों के चलते हमारे रास्ते कब अलग हो गये, पता ही नहीं चला. शायद वो वाकई बाजू वाली लेन से बहुत तेजी से आगे निकल गई. खैर!! न जाने कहाँ होगी अब.

आज इसे देखता हूँ तो लगता है कितना शांत स्वभाव है. कैसे इतनी परेशानी के बावजूद भी आँखे मूँदें समय काट रही है. मैं एकटक उसे निहारता हूँ. न जाने किन विचारों में खोई वो एकाएक मुस्कराने लगी. उसके करीने से लिपिस्टिक लगे होंठ. मुस्कराते ही ऐसा लगा कि जैसे कोई फूल खिल उठा हो-गुलाब का ताजा खिला फूल.

मुझे खिले गुलाब बहुत पसंद हैं.

न जाने कब खिसकते खिसकते हम जमुना पार उस मुहाने पर आ गये, जहाँ से दिल्ली और ग्रेटर नोयडा का मार्ग अलग हो जाता है. गाड़ी हवा से बात करने लगी. मैं आँखें बंद किये खिले गुलाब के फूल को सोचता रहा. शायद उसकी गाड़ी दिल्ली की तरफ निकल गई थी. न जाने कौन थी, कहाँ से आ रही थी मगर रीता की याद बरबस ही दिला गई. क्या यही पतनशीलता है??
फिर कल टीवी पर एक फैशन शो देख रहा था. रैम्प पर चलती सुन्दरियाँ. लगातार एक के बाद एक. सारे दर्शक टकटकी लगाये देख रहे थे. न जाने किस बात पर बीच बीच में ताली बजाते थे.
tops
सभी मॉडल न जाने किस डिजाईनर के कपडे पहने थीं. कम से कम उन सबके टॉप्स तो मुझे सरकारी नजर आये. अपने कर्तव्यों से बिल्कुल विमुख. ऐसा लगा जैसे जिस डेस्क पर उसे होना चाहिये उससे कहीं दूर कैन्टीन में चाय के साथ ठहाका लगाते. अन्तर मात्र इतना ही कि सरकारी कर्मचारी का इस तरह से अपने कर्तव्यों से विमुख होना जनता से गाली खिलवाता है और यहाँ इनके टॉप्स का अपने कर्तव्यों से विमुख होना ताली बजवा रहा था. कहते हैं यह प्रगति की निशानी है-एडवान्समेन्ट. मैं नहीं समझ पाया, पतनशील जो ठहरा. पुरानी यादों से घिरा रहने वाला.

खैर, मैं गर्त में जाऊँ या पहाड़ पर-क्या फर्क पड़ता है. मगर यदि दिल्ली के यातायात फस्सूवल (ट्रेफिक जाम) की हालत न सुधारी गई तो देश का विकास जरुर प्रभावित हो जायेगा. कुछ करो भाई-और फ्लाई ओवरर्स बना लो फटाफट. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

अफसोस कि दिल्ली नहीं गये

अफसोस कि दिल्ली नहीं गये. दिल्ली जाने के बाद भी दिल्ली नहीं गये. बस, फरीदाबाद गये. खुशी इस बात की कि पंगेबाज भाई अरुण अरोरा मिल गये. खाना उन्हीं के घर दबा कर खाया. भाभी जी एक उम्दा और बेहतरीन व्यक्तित्व की धनी हैं. इतना लज़ीज खाना खिलाया कि लंच के बाद के सारे काम टल गये. अगले हफ्ते फिर जाना पड़ेगा काम निपटाने. काम एक हफ्ते टल जाने का सारा दोष लज़ीज खाने पर डाला जा रहा है. मगर अगले हफ्ते की ट्रिप में दिल्ली जरुर जायेंगे और मित्रों से मिलेंगे, यह अभी से प्लान में है.
arunsameer
लौटते वक्त अपने गुरु राधा स्वामी श्री श्री अनुकुल जी महाराज के आश्रम देवघर, झारखण्ड गये. सारा दिन वहीं बिताया और बैजनाथ धाम के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त किया. दर्शन करने टांगे से गये. घोडे पर क्या बीती, पता नहीं मगर मुझे मजा आया. बचपन की ढ़ेरों यादें घिर आई इस टांगा यात्रा के साथ. यादों ने साथ छोड़ा, पंडों को स्पेस मिली, उन्होंने घेरा. किसी तरह उन्हें ढ़केला तो समय खत्म हुआ और हम निकल पड़े जबलपुर की ओर. रास्ते में इलाहाबाद पड़ना था. ज्ञानदत्त जी से मुलाकात हुई. जैसा सोचा था उससे कहीं ज्यादा विनम्र और व्यवहारकुशल. अफसोस हुआ कि मुझे कम से कम से एक दिन इलाहाबाद के लिये रखना चाहिये था. हमने तो अपनी खुशी के लिये घोड़े की चिन्ता नहीं की तो ज्ञानजी के लिये क्या सोचें कि क्या वो भी चाहते थे कि हम एक दिन रुकें.

ज्ञानजी आये. पूरे ट्रेन में हमारी पूछ हो ली. सबने समझा कि या तो हम कोई मंत्री हैं या रेल्वे बोर्ड के मेंम्बर. हमारा मौन और मुस्कराह्ट सह यात्रियों से लेकर रेल्वे स्टाफ की अटकलों पर अपनी मोहर लगाता रहा और हम मुस्कराते रहे और बकायदा सम्मान पाते जबलपुर तक चले आये.
gyanjisameer
महाशक्ती परमेन्द्र प्रताप का भी इलाहबाद में मिलने का वादा था. फिर बाद में पता चला कि ट्रेन छूटने के बाद, गलत जानकारी की वजह से, वो हाँफते हुए पहुँचे भी और मुलाकात न हो पाई. खैर आगे कभी सही, फिर मुलाकात हो लेगी. वो अमरुद अपने बगीचे से लेकर आये थे. मैं नहीं खा पाया, हमेशा इस बात का रंज रहेगा जब तक की खा न लूँ.

न तो अरुण भाई से और न ही ज्ञानजी से, मिलन की उत्सुक्ता में ,कोई विशेष प्रयोजन पर बात हो पाई. बस, एक बिखरी सी बात ब्लॉगिंग, ब्लॉगिंग का भविष्य, आगे के प्लान आदि पर हल्की फुल्की चर्चा हुई.

दोनों ही जगह, गौरतलब, इस विषय पर अवश्य नजर डाली गई कि आखिर क्या वजह है कि एकाएक नव आगंतुकों की संख्या में कमी आई है. क्या कहीं प्रोत्साहन की कमी है या विस्तार को लेकर विशेष कार्य नहीं किया जा रहा है. है तो चिन्ता का विषय मगर मेरा मानना है कि इससे उबरा जा सकता है और हम सब को इस ओर प्रयासरत होना होगा. हर ब्लॉगर अगर माह में मात्र दो से तीन लोगों को नया ब्लॉग बनाने को प्रेरित करे तो चेन एफेक्ट में हिन्दी के विस्तार को एक नया आयाम मिल सकता है. बस, एक सजग प्रयास की आवश्यक्ता है.

बाकी का कल.... Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, फ़रवरी 23, 2008

सावधान!! मेरी ब्लॉग आई डी चोरी...

मित्रों,

आज कम से कम ७ मित्रों का फोन या ई मेल आया कि मैने उनके ब्लॉग पर कुछ असंयत भाषा का प्रयोग करते हुए टिप्पणियाँ की हैं और बाद में मिटा भी दी.

इसे हादसा ही कहना चाहूँगा क्यूँकि न तो यह सब मेरी जानकारी में है और न ही मैं इस तरह के क्रियाकलापों का समर्थक हूँ.

खुशी इस बात की है कि मित्रों को यह विश्वास रहा कि यह कार्य मेरा नहीं है और उन्होंने मुझे इस तरह की वारदात की सूचना दी.

हालांकि यह कार्य जिसने भी किया हो और जिस भी उद्देश्य से किया हो, उस मित्र से भी मुझे कोई शिकायत नहीं. शायद कोई मजबूरी रही होगी किन्तु फिर भी उससे अनजान मित्र से निवेदन है कि बिना असंयत भाषा का उपयोग करते हुए भी वह अपनी बात अपने आई डी से कह सकता था. अगर उसे यह विश्वास था कि मेरे कहने का असर ज्यादा होगा तो मुझे सूचित करता. मैं निश्चित ही अपने तरीके से उसकी बात रखने की कोशिश करता.

आशा है भविष्य में यह अनजान मित्र इस बात का ख्याल रखेंगे.

अभी के लिये सभी को हुई असुविधाओं और उनके दिल को लगी ठेस के लिये क्षमापार्थी.

सादर

समीर लाल Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

द चोकिंग गेम-चिट्ठाजगत में...

कभी घुटन सी महसूस होने लगती है. सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि ये कहाँ आ गये हम. क्या हासिल है? महज एक घुटन का अहसास. एक अंधेरापन. एक दूसरे पर कीचड़ उछालना. एक विवाद समाप्त नहीं होता, दूसरा शुरु, बेवजह. नाम दिया जाता है कि एक स्वस्थ बहस चल रही है.

मुझे तो लगने लगा है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो बिना बहस जिन्दा रहना ही नहीं जानते, चार दिन शांति छाई रहे तो खाना हजम होना बन्द हो जाता है. किसी को पुरुस्कार मिले तो विवाद, किसी ने कुछ कहा तो विवाद और तो और कोई चुप रहा तो विवाद.

बात शुरु होती है कहाँ से और चल पड़ती है किस ओर. बहुत कोशिश करनी पड़ती है इससे बच कर निकलने के लिये. इससे किनारा बनाये रखने के लिये.
choking
मगर जब उसी गली के निवासी हैं तो कब तक बचते रहेंगे. माना कि हम नहीं भी खेलें कीचड़-कीचड़ तब भी कुछ छीटें तो आयेंगे ही. न भी आये तो दुर्गंध को कौन रोक पाया है आजतक. कहीं यही दुर्गंध नये आते लोगों का मन ही न बदल दे. फिर तो रह जायेंगे जो रह रहे हैं और छोड़ कर न जा पाना मजबूरी हो गया है या फिर वो, जिन्हें यह खेल पसंद है और इस खेल में मजा आता है. आबादी में विस्तार के मार्ग स्वतः ही अवरुद्ध हो जायेंगे.

अजीब लगता है मगर ये उन लोगों में से है जो खुद का गला घोंटकर उस पार की दुनिया का क्षणिक आभास और आनन्द लेने में अपने आप को एडवन्चर्स का दर्जा देते हैं. क्या ये बीमार नहीं? क्या इन्हें इलाज की जरुरत है?

आज ही ’द चोकिंग गेम’ के बारे में एक खबर पढ़ता था जिसने मुझे यह सोचने को मजबूर किया.

शायद यह उसी प्रजाती के हैं जिन बच्चों को लेकर आज अमरीका/कनाडा चिन्तित हैं. यह बच्चे इसी तरह के चोकिंग गेम में आनन्द का अनुभव करते हैं. ये बच्चे या तो अपने दोस्त के माध्यम से या कम्प्यूटर के तार या टेलिफोन के केबल से खुद ही अपना गला उस स्तर तक घोंटते हैं जब तक की लगभग होश न रह जाये. इन्हें इसमें मजा आता है. यह कहते हैं इन्होंने ब्लैक टनल देख ली जिससे होकर व्यक्ति मौत के बाद गुजरता है. यह मौत के साथ अपने साक्षात्कार का अनुभव करना चाहते है. क्यूँ? कोई नहीं जानता. ये बच्चे खुद नहीं जानते. बस, महज एक मानसिक विक्षप्तता- जिसका कोई जबाब नहीं. जिसे यह बच्चे एडवेन्चर कहते हैं.

तकलीफ तब हो जाती है, जब आसपास कोई नहीं होता या तुरन्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती और यह बच्चे अपनी नादानी से जान गँवा बैठते हैं.

खुद तो चले जाते हैं मगर पीछे छोड़ जाते हैं एक बिलखता बिखरा परिवार और दे जाते हैं अपनी तरह के अन्य नादानों को इसे अजमाने का उकसाहट-चलो देखें तो उसने कैसा अनुभव किया होगा?

इन बच्चों को रोकने के लिये कनाडा में एक वेब साईट शुरु की गई है और न जाने कितने फोरम इस दिशा में कार्यरत हैं.

बस, साथियों से यही कहना चाहूँगा कि इस खेल का अन्त अच्छा नहीं है. कहीं चिट्ठाजगत के लिये भी ऐसी ही वेबसाईट न शुरु करना पड़े. खुद ही समझ जाओ न!!

नोट: १.मूलतः इस पोस्ट की वजह ’द चोकिंग गेम’ की जानकारी देना था बाकि तो साथ में बह निकला. :)

२. आज से ४ दिन के लिये बाहर जा रहा हूँ. यह पोस्ट स्केड्यूल की है कल सुबह के लिये, जब मैं कहीं और से अपना ब्लॉग चेक करने वाला हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 17, 2008

आओ कि खुशी मनायें

यह मेरी २०० वीं पोस्ट है और मैं आप सबका बहुत आभारी हूँ जो आप सबने मेरा इतना उत्साह लगातार बढ़ाया. आगे भी इसी तरह के उत्साहवर्धन का आकांक्षी हूँ. बहुत आभार.
neon1

इस मौके पर एक संदेश:


मौका है खुशी का
चलिये न!! कुछ जश्न मनाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

झूमिये, नाचिये और गाईये
जरा मूड में ठूमका लगाईये
जमाना क्या क्या बोलेगा
न इस बात से शरमाईये

अब तक हमने टिपियाया है
आज आप भी टिपियाईये
न सिर्फ मेरा वरन औरों का भी
थोड़ा तो हौसला बढ़ाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

दो सौ पोस्ट यूँ तो
कम नहीं होती
मगर जो मैं लिखता हूँ उसमे
कोई दम नहीं होती

अगर आप भी चाहें
तो रोज एक ऐसी पोस्ट ले आईये
कुछ हो न हो, कम से कम नेट पर
हिन्दी को फैलाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

बीते हैं अभी बस
देखिये न सिर्फ दो बरस
नशा ब्लॉगिंग का ऐसा है
भूल जाओगे तुम चरस

एक बार बस एक बार
मेरा कहा मान जाईये
बिन शरमाये बिन सकुचाये
अपना ब्लॉग बनाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

नोट: अपना स्वयं का हिन्दी ब्लॉग बनाने में सहायता के लिये लिखें: sameer.lal@gmail.com Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2008

बीबी तो इन्तजार करेगी ही..

चार दिन बाद गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से लौटा. बचपन में भी हर साल ही गोरखपुर जाना होता था. ननिहाल और ददिहाल दोनों ही वहाँ हैं. तब तीन दिन की रेल यात्रा करते हुए राजस्थान से थर्ड क्लास में जाया करते थे. कोयले वाले इंजन की रेल. साथ होते लोहे के बक्से, होल्डाल, पूरी, आलू और करेले की तरकारी. सुराही में एकदम ठंडा पानी. रास्ते में मूंगफली, चने, कुल्हड़ में चाय. फट्टी बजाकर गाना गा गा कर पैसा मांगते बच्चे.राजनित और न जाने किन किन समस्याओं पर बहस करते वो अनजान सहयात्री जिनके रहते इतने लम्बे सफर का पता ही नहीं चलता था.तीन दिन बाद जब घर पहुँचते तो कुछ तो ईश्वरीय देन( खुद का रंग) और कुछ रेल की मेहरबानी, लगता कि जैसे कोयले में नहाये हुए हैं. इक्के या टांगे में लद कर नानी/दादी के घर पहुँचते थे. फिर पतंग उड़ाना, मिट्टी के खिलोने-शेरे, भालू.हर यात्रा याददाश्त बन जाती. जैसे ही वापस लौटते, अगले बरस फिर से जाने का इन्तजार लग जाता.घर लौट कर फट्टी वालों की नकल करते, उनके जैसे ही गाने की कोशिश,
Steam_eng
इस बार जब गोरखपुर से चला तो वही पुराने दिनों की याद ने घेर लिया. मगर एसी डिब्बे में वो आनन्द कहाँ? और यात्रा भी मात्र १६ घंटे की. यही सोच कर एसी अटेंडेन्ट को सामान का तकादा कर कुछ स्टेशनों के लिए जनरल डिब्बे में आकर बैठ गया. कितना बदल गया है सब कुछ. काफी साफ सुथरा माहौल. न तो कोई बीड़ी पी रहा था. न बाथरुम से उठती गंध, न मूंगफली वाले, न कुल्हड़ वाली चाय. जगह जगह ताजे फलों की फेरी लगाते फेरीवाले, प्लास्टिक के कप में बेस्वादु चाय, कुरकुरे और अंकल चिप्स बेचते नमकीन वाले. बस्स!! लोहे की संदुक की जगह वीआईपी और सफारी के लगेज जिनके पहियों ने न जाने कितने कुलियों की आजिविका को रौंद दिया, वाटर बाटल में पानी. आपसी बातचीत का प्रचलन भी समाप्त सा लगा, अपने सेलफोन से गाने बजाते मगन लोगों की भीड़ में न जाने कहाँ खो गये वो हृदय की गहराई से गाते फट्टी वाले बच्चे और राजनित पर बात करते सहयात्री.

कहते है सब विकास की राह पर है. वाकई, बहुत विकास हो रहा है. आम शहरों में न बिजली, न पानी, न ठीकठाक सड़कें..बस विकास हो रहा है. बच्चे बच्चे के हाथ में सेल फोन, तरह तरह की गाड़ी, सीमित जमीनों के बढ़ते दाम, लोगों के सर पर ऋणों का पहाड़, हर गांव-शहर से महानगरों को रोजगारोन्मुख पलायन करते युवक, युवतियाँ. भारत शाईनिंग-मगर मुझे पुकारता मेरे बचपन का भारत-जिसे ढ़ूंढ़ने मैं आया था, न जाने कहाँ खो गया है और अखबार की खबरें कहती है कि इसी के साथ ही खो गई है वो सहिष्णुता, सहनशीलता, आपसी सदभाव और सर्वधर्म भाईचारा. सब अपने आप में मगन हैं.

मुझे बोरियत होने लगती है. मैं उठकर अपने एसी डिब्बे में वापस आ जाता हूँ और खो जाता हूँ शिवानी की किताब ’अतिथी’ में. सामने की बर्थ पर बैठी महिला कोई मोटा अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही है और उसके ipod के ईयर फोन से बाहर तक सुनाई देती अंग्रेजी गाने की घुन माहौल को संगीतमय बना रही है.

उसी महिला को देखकर न जाने क्यूँ अनायास ही याद आ गया-ओह!! आज तो वेलेन्टाईन डे है. :)

सोचता हूँ घर जाते समय एक गुलाब खरीद लूँगा-बीबी इन्तजार कर रही होगी. अब मैं इस त्यौहार को मानूँ न मानूँ-क्या फरक पड़ता है. बीबी तो गुलाब का इन्तजार करेगी ही-यही आज के जमाने का चलन है. साथ तो चलना होगा.

पुन्श्चः मैं किसी विकास के विरोध में बात नहीं कर रहा. बस, आज कल याददाश्त के साथ कुछ पंगा हो रहा है, तभी तो उस मोहतरमा को देखकर वेलेन्टाईन डे याद आया वरना तो भूल ही गये थे.इसीलिये मेरी याद के पुराने भारत के लापता हो जाने पर उसका हुलिया लिपिबद्ध कर रहा हूँ ताकि दर्ज रहे और याददाश्त बनी रहे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 03, 2008

लोटा गायब

लगभग ३ माह गुजर गये चिट्ठाकारी किये और पता ही नहीं चला. शायद वजह अपनों का सानिध्य और लगातार चिट्ठाकारों से संपर्क एवं मिलन रही हो.

इस बीच भारत के विभिन्न शहरों में घूमा और अनेकों लोगों से मिला. बहुत स्नेह रहा सभी का. आज सभी यात्राओं एवं मधुर मिलनों का लेखा जोखा नहीं, वह धीरे धीरे एक एक करके समय समय पर सुनाऊँगा. आज तो मात्र एक उद्देश्य था कि पुनः वापसी की जाये और कुछ निरंतर लिखा जाये.

ऐसा भी नही रहा कि चिट्ठों से बिल्कुल आँख फेर ली हो इस अवधि में. एक निरन्तर अंतराल पर एग्रीगेटर्स के माध्यम से सभी गतिविधियाँ देखता रहा, सुनता रहा, मुस्कराता रहा तो कभी कुढता रहा. कभी हँसी आई तो कभी किन्हीं पोस्टों पर आँखें नम हो आई. कभी चिट्ठाकार होने का गर्व महसूस किया तो कभी लगा कि यह कैसा दलदल है?

लोगों ने पुरुस्कार जीते. अच्छा लगा देखकर. फोन पर ही बधाईयों का प्रेषण कर दिया, क्योंकि सोचा यह कि यदि एक टिप्पणी की तो फिर उड़न तश्तरी शायद रुक न पाये और छुट्टियों के माध्यम से आवंटित पारिवारिक समय के साथ अन्याय न हो जाये.

दिन मस्ती में गुजर रहे हैं. भारत में रहने का भरपूर आनन्द उठाया जा रहा है. आदतें खराब हो रही हैं. नौकर से मांग का पानी पीना और चाय बनवाना- मैं ही जानता हूँ कितना भारी पड़ेगा लौट कर.

बहुत सी बातें हैं करने को-मगर आज तो बस एक प्रसंग पर ....

इस भारत यात्रा के दौरान जबकि सोच हर तरफ प्रगति खोज और देख रही थी. सोचा था सभी बदलाव जो देखूँगा उन्हें कलमबद्ध करुँगा. एक नज़ारा तो प्रगतिशीलता का खुले आम देखा और वह यह कि हमारे युग का गाँव गाँव और शहर की रेल पटरियों के किनारे हर वक्त दर्शन देता लोटा चलन के बाहर हो गया और उसकी जगह ले ली बिसलरी की बोतलों नें.

जब भी सुबह सुबह ट्रेन द्वारा किसी शहर से प्रवेश किया या प्रस्थान किया. पटरियों के किनारे लोग बिसलरी की बोतलें लिये विराजमान नजर आये. जाने लोटे को किसकी नजर लग गई-बेचारा. न जाने कहाँ किस हालात में होगा?

जब व्यक्ति लोटा लेकर निकला करता था, यह जग जाहिर रहता था कि मैदान ही जा रहा है और आज बोतल लिये तो पता ही नहीं चलता कि मैदान जा रहा या दफ्तर या कि खेलने या स्कूल या यूँ ही तफरीह को. ये मुई बोतन न सिर्फ कन्फ्यूजन फैला रही है बल्कि प्रदूषण भी, उसके बाद भी पश्चिमी होने का फायदा ये कि पापुलर होती जा रही है.
lota
अब तो बस लोटा देखने की चाह लिये भटक रहा हूँ-हे लोटा महाराज, तुम कहाँ हो??

ऐसे ही अनेकों बदलाव दिख रहे हैं. सब पर बात करेंगे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, नवंबर 07, 2007

कुंठा से ग्रन्थी तक...

आज किसी से बात चल रही थी और वो अपने बचपन कोई किस्सा बता रहा था. मुझे बचपन की बात से एक किस्सा याद आया.

एक दिन दफ्तर से लौटते वक्त स्टेशन से निकलने के लिये सीढ़ी उतर रहा था थोड़ा सा तेजी से चलते हुए. आगे एक बच्चा अपनी मम्मी का हाथ पकड़े हँसते हुए उतर रहा था. मैने माँ और बेटे को ओवर टेक करते हुए दो तीन सीढ़ी पार कर ली. तभी पीछे से बच्चे की आवाज सुनाई दी. "मॉम, आई लॉस्ट" (माँ, मैं हार गया). उसकी माँ ने उसे समझाया कि बेटा, वो आपसे बहुत बड़े हैं, इसलिये आगे चले गये. आप भी जब उतने बड़े हो जाओगे तो ऐसे ही चल पाओगे.

मैं रुक गया. मैने हाँफने का अभिनय किया. बच्चे की माँ की तरफ देखा. एक खूबसूरत महिला थी. बालक कुछ ३ साल के आसपास का. फिर मैने बच्चे की ओर मुखातिब होकर कहा, "अरे, मैं तो थक गया और आप जीत गये. स्लो एंड स्टडी विन्स द रेस." बच्चा खूब खुश हो गया. मुझे भी बहुत खुशी हुई बच्चे में आत्म विश्वास लौटता देख. उसकी मम्मी भी मुस्कराई. मैं भी मुस्कराया.

मैं नहीं चाहता था कि उसे इस छोटी सी बात से कुछ दुख पहुँचे जिससे मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता मगर उसका यही दुख आगे चल कर एक कुंठा बन सकता था जो और गहरा होकर एक कभी न निकलने वाली ग्रंथी का रुप ले लेता. इसी तरह की बातें कि वो हमसे ज्यादा सामर्थवान है चाहे पैसे से, उम्र से, ताकत से, बुद्धि से, पावर से, इसलिये हम कुछ नहीं कर सकते, एक कुंठा और फिर ग्रंथी का रुप लेकर कितने ही लोगों में विद्यमान है.
motherson
वैसे लगता है उसकी माँ मेरे पूरे भाव नहीं समझ पाई या कई लोग शर्म के मारे कम बोलते हैं. अपनी फिलिंग्स नहीं कह पाते या समझी होगी कि कोई बीमार आदमी है, पता नहीं वरना तो इतने ऊँची विचारधारा के व्यक्ति से मिलने का गर्व उसके चेहरे पर छलक आता. शायद आभारवश कॉफी पर चलने को भी कहती अहसान उतारने को. सामने ही तो थी कॉफी शॉप. साथ बैठते थोड़ी देर तो बच्चे को खरगोश, कछुये की कहानी भी सुना देता और उसकी मम्मी को भी बच्चों के मनोबल बढ़ाने के कुछ गुर बताता.

शायद पैसे न रहे हों. अरे, एक बार कह देती तो क्या मैं न पेमेन्ट कर देता कॉफी का. आखिर लगता ही कितना मगर वही शर्मीलापन आड़े आ गया होगा.

मैने धीरे से देख लिया था कि वो अँगूठी भी नहीं पहने थी यानि उसके पति से या तो संबंध विच्छेद हो गया होगा या ये भी हो सकता है, उसने इससे शादी से ही मना कर दिया हो. कुछ भी तो संभव है. मैं सोचने लगा कि बेचारी की अभी उम्र ही क्या है. कैसे काटेगी सामने पड़ी पहाड़ जैसी जिंदगी. आँख भर आई मेरी.

माना कि साथ बच्चा है तो जब तक बच्चा है तभी तक. बड़ा हुआ नहीं कि समझो अपनी दुनिया में मस्त और यह बेचारी अकेली बच रहेगी. शायद इसी से मानसिक स्थितियाँ सामान्य न हों और भूल गई हो कॉफी के लिये कहना. जबकि यदि कॉफी के लिये कहती तो दो पल बैठ लेते. वैसे भी मुझे घर ही तो जाना था, कुछ देर बाद चला जाता. घर कोई भागे थोड़ी न जा रहा है. एक दुखिया का अगर कुछ दर्द कम होता है तो यह तो इन्सानियत का तकाजा है. मैं क्यूँ पीछे हटने लगा.वो अपना दर्द सुना लेती, दो बूँद आंसू बहा लेती मेरे कंधे पर सर रख कर. कहते हैं दर्द बांटने से हल्का हो जाता है. मुझे क्या फर्क पड़ना था. मेरा कंधा कोई शक्कर की डली तो है नहीं कि उसके दो बूँद आंसू से गल जाता. यूँ भी मेरा कंधा कर क्या रहा था सिवाय कमीज संभालने के, किसी के काम ही आ लेता. मैं भी साहनभूति के दो शब्द कह लेता, मुझे भी हल्का लगता. इस तरह विचारों की उधेड़ बून में तो न रहता.

खैर, बाद में समझ आया होगा तो बहुत दुख हुआ होगा उसे या अपने शर्मीले स्वभाव को कोस रही होगी, मगर मुझे इन सब से क्या? मैं तो सीधे घर लौट आया. अरे, एक पत्नी है, दो जवान लड़के हैं. मैं क्यूँ पड़ने लगा उसकी झंझटों के विचार में. वो जाने और उसका बच्चा. मैने तो अपना कर्तव्य निभा दिया, बस्स!!

मैं भी कहाँ बचपन की बात बताते बताते कहाँ पहुँच गया, यही होता है जब विचारों की उधेड़ बून में रहो!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, नवंबर 05, 2007

झूठे सिद्धांत-एक दोस्त को याद करते हुए

सुबह सुबह संदीप का फोन आया. कल रात उसके पिता जी को दिल का दौरा पड़ा है. अभी हालात नियंत्रण में है और दोपहर १२.३० बजे उन्हें बम्बई ले जा रहे हैं. वैसे तो सब इन्तजाम हो गया है मगर यदि २० हजार अलग से खाली हों तो ले आना. क्या पता कितने की जरुरत पड़ जाये? निश्चिंतता हो जायेगी. मैने हामी भर दी और कह दिया कि बस पहुँचता हूँ.

स्टेशन घर से आधे घंटे की दूरी पर है, फिर भी आदात के अनुसार मार्जिन रख कर सवा ग्यारह बजे ही स्कूटर लेकर निकल पड़ा.

चौक पार करने के बाद रेल्वे फाटक आता है. वहाँ गेट बंद मिला. छोटी लाइन की कोई ट्रेन गुजरने वाली है. शायद चार पाँच मिनट बाकी हो आने में. मगर लोग निर्बाध गेट के नीचे से अपने स्कूटर, साईकिल तिरछा करके झुककर निकले जा रहे थे. मानो कोई चार पाँच मिनट भी नहीं रुकना चाहता. फिर गेट बंद करने का तात्पर्य क्या है. अजब लोग हैं. जब घर से निकलते हैं तो कुछ समय तो अलग से क्यूँ नहीं रखते इस तरह की बातों के लिये. क्या पा जायेंगे कहीं पाँच मिनट पहले पहुँच कर?

कुछ तो सिद्धांत होने चाहिये.कुछ तो नियमों का पालन करना चाहिये.

इसी तरह के सिद्धांतवादी विचारों में खोया, मैं स्कूटर के हैंडल पर एक हाथ में अपनी ठुड्डी टिकाये मन ही मन अपने को जल्द निकल पड़ने की शाबाशी दे रहा था. अक्सर होता है ऐसा कि अपना सामान्य कार्य भी दूसरों की बेवकूफियों की वजह से प्रशंसनीय हो जाता है.
railwaycrossing
बाजू में आकर एक कार खड़ी हो गई. मैने कनखियों से देखा तो किसी संभ्रांत परिवार की कोई कन्या गाड़ी का स्टेरिंग थामे बैठी थी. उसके सन गॉगेल उसके तरतीब से झड़े रेशमी बालों पर आराम से बैठे थे मेरी ही तरह, निश्चिंत. मगर कन्या के चेहरे पर गेट बंद होने की खीझ स्पष्ट दिखाई दे रही थी. बार बार घड़ी की तरफ नजर डालती और फिर खीझाते हुए गेट की तरफ, पटरी पर जहाँ तक नजर जा सके, नजर दौड़ा लेती.

उसके चेहरे को देखकर मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर वो स्कूटर पर होती तो पक्का स्कूटर झुका कर निकल जाती. वो मात्र कार की मजबूरीवश रुकी थी और बाकी स्कूटर, साईकिल वालों को निकलता देख खीज रही थी. उसका सिद्धांतवादी होना मात्र मजबूरीवश है वरना तो कब का निकल गई होती. यह ठीक वैसे ही जैसे कितने ईमानदार सिर्फ इसलिये ईमानदार हैं कि कभी बेईमानी का सही मौका नहीं मिला.

इस बीच ट्रेन की सीटी दूर से सुनाई पड़ी. उसका चेहरा कुछ तनाव मुक्त सा होता दिखाई पड़ा. ट्रेन नजदीक ही होगी.

गेट के दोनों ओर भरपूर भीड़ इकट्ठा हो गई.

कुछ ही पलों में ट्रेन आ गई. एक एक कर डब्बे पार होने लगे. लाल हरे नीले पीले कपड़े पहने यात्रियों से भरी रेल. धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी.

उसकी कार ऑन हो गई. मैने भी बैठे बैठे ही स्कूटर में किक मारा और चलने को तैयार हो गया.

एकाएक आधी पार होने के बाद ट्रेन रुक गई. पाँच सात मिनट तक तो कुछ पता चला नहीं, फिर पता चला कि इंजन में कुछ खराबी हुई है. जल्द ही चल देगी.

स्कूटर बंद. कार बंद.खीज के भाव कन्या के चेहरे पर वापस पूर्ववत.

समय तो जैसे उड़ने लगा. देखते देखते ३० मिनट निकल गये. अब तो झुक कर भी नहीं जाया जा सकता था. एक तो ठसाठस भीड़ और उस पर से बीच में खड़ी ट्रेन. इन्तजार के सिवाय और कोई रास्ता नहीं. पीछॆ मुड़ना भी वाहनों की भीड़ से पटी सड़क पर संभव नहीं.

जिस खीज के भाव का अब तक मैं कन्या के चेहरे पर अध्ययन करके प्रसन्न हो रहा था, वही अब मेरे चेहरे पर आसन्न थे.

क्या सोच रहा होगा संदीप? खैर, अभी भी थोड़ा समय है, पहुँच कर समझा दूँगा.

४०-४५ मिनट बाद ट्रेन बढ़ी. गेट खुला. दोनों तरफ से टूट पड़ी भीड़ से ट्रेफिक जाम. किसी तरह उल्टी तरफ से निकलते हुए जैसे ही मैं स्टेशन पहुँचा, ट्रेन सामने से जा रही थी. आखिरी डिब्बा दिखा बस!!

मैं सोचने लगा कि इससे बेहतर तो मैं गेट के नीचे से ही निकल पड़ता. आखिर, जब मजबूरी में फँसा तब उल्टी ट्रेफिक में घुस कर निकला ही. कौन सा ऐसा तीर मार लिया सिद्धांतों को लाद कर. विषम परिस्थितियों में भी सिद्धांतों का पालन करता तो कोई बात होती. सामान्य समय में तो कोई भी कर सकता है. सिद्धांतवादी होना सरल नहीं है.

बाद में पता चला कि संदीप के पिता जी नहीं रहे. बम्बई में ही उन्होंने दम तोड़ दिया. उनके बड़े भाई का परिवार वहीं रहता था तो अंतिम संस्कार भी वहीं कर दिया गया. संदीप ने मुझसे फिर कभी बात नहीं की. मुझे बतलाने का मौका भी नहीं दिया कि क्या हुआ था.

काश, मैं उस वक्त अपने सिद्धांतों को दर किनार कर गेट से नीचे से भीड़ का हिस्सा बन निकल गया होता, तो संदीप आज भी मेरा दोस्त होता. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, नवंबर 01, 2007

आखिर बेटा हूँ तेरा

सरौता बाई नाम था उसका. सुबह सुबह ६ बजे आकर कुंडी खटखटाती थी. तब से उसका जो दिन शुरु होता कि ६ घर निपटाते शाम के ६ बजते. कपड़ा, भाडू, पौंछा, बरतन और कभी कभी मलकिनों की मालिश. बात कम ही करती थी.

पता चला कि उसका पति शराब पी पी कर मर गया कुछ साल पहले. पास ही के एक टोला में छोटी सी कोठरिया लेकर रहती थी १० रुपया किराये पर.

एक बेटा था बसुआ. उसे पढ़ा रही थी. उसका पूरा जीवन बसुआ के इर्द गिर्द ही घूमता. वो उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती थी.

हमें ७.३० बजे दफ्तर के निकलना होता था. कई बार उससे कहा कि ५.३० बजे आ जाया कर तो हमारे निकलते तक सब काम निपट जायेंगे मगर वो ६ बजे के पहले कभी न आ पाती. उसे ५ बजे बसुआ को उठाकर चाय नाश्ता देना होता था. फिर उसके लिये दोपहर का भोजन बनाकर घर से निकलती ताकि जब वो १२ बजे स्कूल से लौटे तो खाना खा ले.

फिर रात में तो गरम गरम सामने बैठालकर ही खाना खिलाती थी. बरसात को छोड़ हर मौसम में कोशिश करके कोठरी के बाहर ही परछी में सोती थी ताकि बसुआ को देर तक पढ़ने और सोने में परेशानी न हो.
poor lady
समय बीतता गया. बसुआ पढ़ता गया. सरौता बाई घूम घूम कर काम करती रही. एक दिन गुजिया लेकर आई कि बसुआ का कालिज में दाखिला हो गया है. बसुआ को स्कॉलरशिप भी मिल गई है. कालिज तो दूर था ही, तो स्कॉलरशिप के पैसे से फीस , किताब के इन्तजाम के बाद जो बच रहा, उसमें कुछ घरों से एडवान्स बटोरकर उसके लिये साईकिल लेकर दे दी. पहले दिन बसुआ अपनी माँ को छोड़ने आया था साईकिल पर बैठा कर. सरौता बाई कैरियर पर ऐसे बैठकर आई मानों कोई राजरानी मर्सडीज कार से आ रही हो. उसके चेहरे के भाव देखते ही बनते थे. बहुत खूश थी उस दिन वो.

बसुआ की प्रतिभा से वो फूली न समाती. बसुआ ने कालिज पूरा किया. एक प्राईवेट स्कूल से एम बी ए किया. फिर वो एक प्राईवेट कम्पनी में अच्छी पोजीशन पर लग गया. हर मौकों पर सरौता बाई खुश होती रही. उसकी तपस्या का फल उसे मिल रहा था. उसने अभी अपने काम नहीं छोड़े थे. एम बी ए की पढ़ाई के दौरान लिया कर्जा अभी बसुआ चुका रहा था शायद. सो सरौता बाई काम करती रही. उम्र के साथ साथ उसे खाँसी की बीमारी भी लग गई. रात रात भर खाँसती रहती.

बसुआ का साथ ही काम कर रही एक लड़की पर दिल आ गया और दोनों ने जल्द ही शादी करने का फैसला भी कर लिया, सरौता बाई भी बहुरिया आने की तैयारी में लग गई.

एक दिन सरौता बाई ५.३० बजे ही आ गई. आज वो उदास दिख रही थी. आज पहली बार उसकी आँखों में आसूं थे. बहुत पूछने पर बताने लगी कि कल जब घर पर चूना गेरु करने का इन्तजाम कर रही थी बहुरिया के स्वागत के लिये, तब बसुआ ने बताया कि बहुरिया यहाँ नहीं रह पायेगी. वो बहुत पढ़ी लिखी और अच्छे घर से ताल्लुक रखती है और वो शादी के लिये इसी शर्त पर राजी हुई है कि मैं उसके साथ उनके पिता जी के घर पर ही रहूँ. वैसे, तू चिन्ता मत कर, मैं बीच बीच में आता रहूँगा मिलने.

कोई भी काम हो तो फोन नम्बर भी दिया है कि इस पर फोन लगवा लेना. उसे चिन्ता लगी रहेगी. बहुत ख्याल रखता है बेचारा बसुआ. जाते जाते कह रहा था कि अब तो मेरा खर्च भी तुझको नहीं उठाना है. बसुआ पढ़ लिख गया है तो तू एकाध घर कम कर ले और हफ्ते में एक टाईम की छुट्टी भी लिया कर. अकेले के लिये कितना दौड़ेगी भागेगी आखिर तू. और अब इस उम्र भी तू पहले की तरह काम करेगी तो सोच, मुझे कितनी तकलीफ होगी. आखिर बेटा हूँ तेरा.

तब से सरौता बाई रोज ५.३० बजे आने लगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 29, 2007

१.३० घंटे मे ५० चिट्ठे मय टिप्पणी निपटायें

बचपन में परीक्षा की तैयारी करते थे. मास्साब सफलता का पाठ पढ़ाते थे ट्यूशन में. गुर दिया गया कि जैसे ही परचा हाथ में आये, सबसे पहले एक नजर पूरा परचा देख लो. फिर एक एक दो दो नम्बर वाले प्रश्न, जिसमें सिर्फ हाँ नहीं, छोटे छोटे जबाब देने हैं, उन्हे फटाफट कर डालो. फिर वो प्रश्न उठाओ, जिसका उत्तर तुम बखूबी से जानते हो. उन्हें फटाफट हल कर दो. अब बाकि के धीरे धीरे सोच समझ के जबाब देते जाओ. अगर किसी में फंस रहे हो, हल नहीं निकल रहा, तो जहाँ तक किया है वहीं छोड़ कर आगे अगले प्रश्न पर चले जाओ. बाद में समय बचे तो आकर फिर कोशिश करना. ध्यान रहे, जितने ज्यादा हल करोगे, उतना अच्छा परिणाम आयेगा. छूटे प्रश्न पर अंक भी शून्य मिला करते हैं. कुछ भी कोशिश की होगी तो शायद कुछ हिस्सा सही निकल जाये और परीक्षक उतने हिस्से के अंक दे दे.

उनका कहना था कि परीक्षा भी मेनेज्मेंट की बात है. टाईम मेनेज्मेंट, एक्साईटमेन्ट मेनेज्मेंट, कन्टेन्ट मेनेज्मेंट सभी लागू होते हैं. कहीं भी चूके और गये. उनके गुर हर परीक्षा में काम आये.

ऊँचे दर्जे के साथ जब कोर्स की किताबें मोटी होने लग गई तो समय तो वही २४ घंटे रहा उल्टे कॉलेज में ज्यादा समय लगने लगा. दोस्त बढ़ गये. घूमने फिरने का दायरा बढ़ गया. दीगर शौकों में समय जाने लगा. तब एक दिन उन्होंने हमें समस्या से जूझते देख एक नया गुर सिखाया-स्पीड रिडिंग-शीघ्र पठन जो रियाज के साथ साथ अतिशीघ्र पठन यानि रेपिड रिडिंग को प्राप्त हुआ. वही ध्यान तेज लेखन याने फास्ट राईटिंग की तरफ भी दिलवाया गया.

उनके शीघ्र पठन वाले गुर का भरपूर फायदा हमने उस समय नावेल पढ़ने में उठाया. वो सिखाते थे कि अगर मटेरियल सिर्फ जानकारी और मनोरंजन के लिये पढ़ा जा रहा और याद रखने की महती आवश्यक्ता नहीं है तो उसे पढ़ते वक्त शब्द शब्द नहीं, लाईन लाईन पढ़ो. पैराग्राफ नजर से स्कैन करो और आगे बढ़ो. किस विषय में है वो प्रस्तावना थोड़ा अधिक ध्यान से, व्याख्या स्कैनिंग मोड में और फिर निष्कर्ष पुनः थोड़ा ध्यान से. बस. इस तरह आप पूरा जान भी लेंगे और शब्द शब्द पढ़ने की अपेक्षाकृत १० प्रतिशत समय में आपका काम हो जायेगा. कभी कोई चीज विशेष पसंद आ जाये तो जितना चाहे लुत्फ लेकर पढ़ो. समय तुम्हारा है कौन रोक सकता है.ऐसे ही कुछ पठन, उसकी प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी छोड़ सकते हो कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता. समय बचता है. कितनी नावेल बस प्रस्तावना पढ़कर आगे नहीं पढ़ीं. कई उपन्यासकारों की शैली देखकर आपको रुचिकर नहीं लगता तो आप फिर उसका नाम देखकर दूसरी किताब पर चले जायें. ९५% आपका निर्णय सही ही होगा.

इस परीक्षा देने के, अतिशीघ्र पठन और तेज लेखन के गुरों की गठरी बना कर मैने इसका ब्लॉगजगत में पिछले एक वर्ष से खूब इस्तेमाल किया.

आज की स्थितियों में मान लिजिये, दिन की ५० पोस्ट आ रही हैं. मुझे इन ५० पोस्टों को पढ़ने और टिप्पणी करने में मात्र १ से १.३० घंटे का समय देना होता है बस!! क्या आप विश्वास करेंगे? इतना समय तो सभी चिट्ठाकार बिताते होंगे नेट पर बल्कि ज्यादा ही.
computer
मेरा नियम होता है कि पहले मैं छोटी छोटी पोस्ट, कविता आदि निपटाऊँ. फिर समाचार, फोटो आदि और फिर बड़े गद्य. उन बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़ में. कुछ जो पसंद आये, उन्हें अपना समय है के अंदाज में. मगर जो भी पढ़ूँ, देखूँ या सरियायूँ (स्कैन रिडिंग का हिन्दीकरण), उस पर शीघ्र लेखन (टाईपिंग और अब तो कट पेस्ट की सुविधा हमेशा हाजिर रहती है, कुछ वाक्य वर्ड पैड में लिखकर रख लें न, क्या बार टाईप करना जब दो की स्ट्रोक में १० की स्ट्रोक निपट सकते हैं) का फायदा उठाते हुए टिप्पणी अवश्य दर्ज करुँ ताकि अगला जान सके कि उसकी मेहनत पर हमारी नजर गई है. वो आगे भी मेहनत करने का उत्साह प्राप्त करेगा और आप जब मेहनत करेंगे, तब वह भी आपको उत्साहित करने आयेगा.

२० मिनट में फ्रस्ट फेज (छोटी छोटी पोस्ट, कविता) १५ मिनट में सेकेन्ड फेज (समाचार, फोटो आदि ), १५ मिनट में बाकी स्कैनिंग (बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़) बाकि का समय अपना पसंदीदा इस स्कैनिंग मोड से उपलब्ध लेखन. अब यदि आप १.३० घंटा दे रहे हैं तो पसंदीदा देखने के लिये आपके पास ४० मिनट बच रहे याने कम से कम १२० लाईन...अधिकतर गद्य २० से ४० लाईन के भीतर ही होते हैं ब्लॉग पर.(अपवाद माननीय फुरसतिया जी, उस दिन अलग से समय देना होता है खुशी खुशी) तो कम से कम ४ से ५ आराम से. चलो, कम भी करो तो ३. बहुत है गहराई से एक दिन में पढने के लिये. (कुछ इस श्रेणी में भी निकल जाते हैं - कुछ पठन की प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी आप उसे छोड़ सकते हैं कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता.)

अब यदि आपके मन में प्रश्न है कि १ मिनट में दो लाईन कैसे पढ़ पायेंगे (इस स्पीड में तो लाईन याद हो जायेगी, मेरे भाई)- तो भाई मेरे, आप इस लाईन में ही गलत आ गये हो. यहाँ से तो नमस्ते कर लो और राजनीति में किस्मत आजमाओ, सफलता आपके कदम चूमेगी, यह मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ और मेरी शुभकामनायें तो हैं ही.

अंत में निष्कर्ष कि जितना अपने लेखन को समय दो उससे चार गुना समय पठन को दो. कोई आवश्यक नहीं कि रोज लिखें. नये लोगों को नाम देख देख कर अहसास होने लगता है कि मैं खूब लिखता हूँ मगर विश्वास जानिये मेरी एक माह में मात्र १० से ११ पोस्ट होती हैं अर्थात हफ्ते में दो से तीन का औसत. अक्सर दो ही. मगर समय वही रोज १.३० से २ घंटे औसत. किया जा सकता है इतना शौक के लिये, हिन्दी की सेवा के लिये, खुद के मन की शांति के लिये और नाम कमाने के लिये. क्या पता कल को यह भी जुड़ जाये कि कुछ कमाई के लिये.

(आशा है शास्त्री जी, ज्ञान जी और अनूप शुक्ल जी को मेरे इतना समय चिट्ठाकारी को देने का रहस्य उजागर कर मैं संतुष्ट कर पाया और यह नये लोगों के लिये भी उपयोगी सिद्ध होगा)

तो शुरु करें अपनी टिप्पणी यात्रा इसी पोस्ट से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 28, 2007

राम की चिट्ठी सीता जी के नाम

अभी २ दिन बाद वाशिंग्टन कवि सम्मेलन से लौटा १५ मिनट पहले. चिट्ठों में तो दमादम मची है. चलो, अच्छा है अच्छी परंपरा है सब खुल कर बात करते हैं. यही तो अपनापन है. आज इतनी जल्दी में कुछ लिखने को नहीं है-न ही कवि सम्मेलन की रिपोर्ट. इतने बड़े कवि सम्मेलन जिसमें मेरे अलावा (वो तो लिख जाता) अनूप भार्गव, उनकी पत्नी रजनी भार्गव (सुना है वो ही अनूप जी के लिये भी लिखती है-बकौल मानोशी-वाया फुरसतिया), राकेश खंडेलवाल, घनश्य़ाम गुप्त जी जैसे २५ लोग शिरकत कर रहे हों, वो कैसे संभव हैं...

तो आज के लिये मात्र एक आर्कुट खुदाई की रिपोर्ट पेश कर देता हूँ देवनागरी में. कल पेश कर दूँगा जो मुझसे जमाने से पूछा जा रहा है कि मैं कैसे मैनेज करता हूँ इतनी टिप्पणियां और सारे ब्लॉग पढ़ना....भई, बहुत सरल है, बस एक से ढेढ घंटा चाहिये....अजब लगा न!!! कल पढ़ना मुझे...बताता हूँ कैसे संभव है...५० ब्लॉग १.३० घंटे में निपटाना मय टिप्पणी.....तब तक यह महज मनोरंजन को पढ़ें.:

राम की चिट्ठी सीता जी के नाम पंजाबी में और कलयुग में:




प्यारी सित्ता,

मैं इत्थे राजी खुशी से हां एंड होप के तु वी ठिक ठाक होवेंगी.

लक्ष्मण तेन्नु भोत याद करदा सी.

मैं इस बंदर दे हात्थ तन्नु चिट्ठी भेज रेहा हां.

तु बिल्कुल टेन्शन न लेई मैं भोत जल्दी तेनु रावण कोलो छुड़ा लावांगा.

मैं एअरटेल दा पोस्टपेड ले लिया सी, रावण नु मैं मोबाईल ते भोत गालियाँ काड़िया ते साले ने कट दित्ता.

चल कोई नी मैने आना ता है ही. तान कुटुँगा साले कंजर नु.

मैं तेरे नाल भी एक एअरटेल का प्रीपेड भेज रिया व उस विच १५०० एस एम एस फ्री वाली स्किम हा, तु रोज मेनु एस एम एस करी.

चिन्ता न करी, जद वी गल करने नु जी करे, एक मिस काल मार दियो, मैं वापस फोन्न कर लेवागा.

तु मेरे बिल दी चिन्ता न करी, सुग्रिवा नु पेमेन्ट दा जिम्मा दे दित्ता वै.

अच्छा ओके

सी य्य्यू

विथ लव

दशरथ दा वड्डा पुत्तर ’राम Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 24, 2007

हद करती हैं ये लड़कियाँ भी...

(यह संस्मरणात्मक आलेख मेरे पिछले आलेख ’दो जूतों की सुरक्षित दूरी’ वाले आलेख पर आये कई जिज्ञासु पाठकों की उस जिज्ञासा निवारण के लिये लिखा जा रहा है जिसमें पूछा गया है कि हे गुरुवर, सुकन्या के पीछे चलते वक्त दो जूते की सुरक्षित दूरी का ज्ञान तो आपने दे दिया किन्तु उनके बाजू में चलने/बैठने के विषय में भी हमारा कुछ ज्ञानवर्धन करें. )

आज दफ्तर जाते समय थोड़ा सजने (यहाँ की भाषा में-ड्रेस अप) का मन हो लिया. होता है कभी कभी. युवा मन है, मचल उठता है. मैं भी बुरा नहीं मानता, मेरा ही तो है.

टॉमी की सफेद कमीज, कालर से झांकती लाल पट्टी वाली, जिसे मैं खास मौकों पर पहनता हूँ. लोगों ने बताया है कि इसमें मैं बहुत स्मार्ट नजर आता हूँ.

साथ में काली फुल पेन्ट, काले मोजे, सॉलिड पॉलिश किये लगभग नये से पिछले साल कानपुर से खरीदे जूते. थोड़ा पाउडर भी लगा लिया चेहरे पर और फिर फाईनल टच-अज़ारो का परफ्यूम-वाह. कभी उसका विज्ञापन देखना. उसमे बताया है कि महक ऐसी कि रुप खिंचा खिंचा चला आये. जब भी लगाता हूँ लोग पूछते हैं कि आज कौन सा परफ्यूम लगाया है. बड़े इम्प्रेस होते हैं. मुझे तो मालूम नहीं था, विज्ञापन में देखा था और लोगों ने बताया है.
sy3
निकलते निकलते वो काला चश्मा, वाह!! कितने ही लोग कह चुके हैं कि बहुत फबता है मेरे उपर. तभी तो अपना फोटो उसी चश्में को पहन कर खिंचाई है.

आकर ट्रेन में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया हूँ. बाजू की सीट खाली है. बैग से परसाई जी की किताब ‘माटी कहे कुम्हार से’ निकाल कर पढ़ने लगता हूँ.

अगले ही स्टेशन मेरे बाजू वाली सीट एक सुपात्र को प्राप्त हुई. एक सुन्दर युवती, उम्र तो जरुर रही होगी गुजरते योवन वाली ३७-३८ वर्ष, मगर वह उसे ३० पार न होने देने के लिये सफलतापूर्वक संघर्षरत थी. उसके जज्बे और सफलता को देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ. यह सजगता और यह संघर्ष का जज्बा हर स्त्री पुरुष में रहना चाहिये, ऐसा मेरा मानना है.

उसने अपने आप को व्यवस्थित किया. मैने कनखियों से देखा था. मैं किताब पढ़ता रहा.

तब तक एकाएक बोली-’हैलो, कैसे हैं आप?"

आह्हा!! परफ्यूम का कमाल- रुप खिंचा खिंचा चला आये. मगर वह पूछते समय भी अपनी नजर सामने अखबार में गड़ाई रही. मैं समझ गया, संस्कारी कन्या है, नहीं चाहती कि किसी और को पता चले कि मुझसे बात कर रही है.

मैने भी किताब में ही झूठमूठ मन लगाये सकुचाते हुये कहा, "जी, मैं ठीक हूँ और आप?"

वो कहने लगी, "कब से सोच रही थी मगर आज बात हो पाई."

ह्म्म!! जरुर सफेद शर्ट लाल पट्टी के साथ कमाल दिखा रही है. लोग सही ही कह रहे थे. मैने धीरे से फुसफुसाते लहजे में ही कहा, "जी, चलिये कम से कम आज सिलसिला तो शुरु हुआ." मैं भी संस्कारी हूँ इसलिये फुसफुसा कर कहा.

वो हंसी. मैं मुस्कराया.

उसने कहा, "लंच पर मिलोगे?"

मैने कहा, ’जरुर, कहाँ मिलना है?" मुझे लगा कि जरुर चश्मे ने भी गजब ढ़हाया होगा. बाकी तो लंच पर मिलने पर उसका क्या हाल होगा जब मैं बताऊँगा कि मैं चिट्ठाकार हूँ और सन २००६-०७ का तरकश स्वर्ण कमल और इंडी ब्लॉगीज पुरुस्कार से नवाजा गया हूँ. यू ट्यूब के कवि सम्मेलन के विडियो लिंक जो दूँगा तो फूली न समायेगी कि किस सेलेब्रेटी से मुलाकात हो ली है.

वो बोली, "ठीक है, वहीं मिलते हैं जहाँ पिछली बार मिले थे. ठीक दो बजे."
womenbluetoothअब मुझे लगा कि कुछ क्न्फ्यूजन है. मैं कब मिला इन मोहतरमा से. मैने उनकी तरफ पहली बार मूँह फिराया तो देखा वो कान में फंसाने वाले मोबाईल (अरे, ब्लू टूथ) पर किसी से बात करती हुई हंस रही थी. हद हो गई और मैं समझता रहा कि मुझसे बात चल रही है. एकाएक उसने मेरी तरफ मुखातिब होकर पूछा-"आपने कुछ कहा?"

मैने कहा,"नहीं तो."

अरे, मैं क्यूँ कुछ कहूँगा किसी अजनबी औरत से-अच्छा खासा शादीशुदा दो जवान बेटों का बाप-ऐसा सालिड एक्सक्यूज होते हुए भी. बस, समझो. किसी तरह बच निकले.वो तो लफड़ा मचा नहीं वरना तो सुरक्षाकवच ऐसे ऐसे थे कि जबाब न देते बनता उनसे. मैं तो तैयार ही था कहने को कि हम भारतीय है. हमारी संस्कृति में विवाहित महिलाये ऐसी नहीं होती कि पूछती फिरें –आपने कुछ कहा? अरे, हमारे यहाँ तो सही में भी अपरिचित महिला से कुछ पूछ लो तो कट के सर झुका के लज्जावश निकल लेती है. लज्जा को नारी के गहने का दर्जा दिया गया है. उस संस्कृति से आते हैं हम. तुम क्या जानो.

हद है भाई!! अफसोस होता है.

मैं तो खुश नहीं हूँ इन छोटे छोटे मोबाईल फोनों के आने से. ससूरे, साफ साफ दिखते भी नहीं हैं और कन्फ्यूजन क्रियेट करते हैं. आग लगे ऐसे छोटे मोबाईल के फैशन में.

सीख (ध्यान से पढ़ें): यदि कोई अजनबी सुन्दर कन्या, जो जन्म से अंधी नहीं है, आपकी काया, रंगरुप और उम्र की गवाही देते खिचड़ी बालों की प्रदर्शनी को देखते हुये भी, खुद से बढ़कर, आपसे अनायास अकारण आकर्षित होते हुये बात प्रारंभ करे (इस बात के होने की संभावना से कहीं ज्यादा प्रबल संभावना इस बात की है कि आप पर आकाश से बिजली गिर गई और आप सदगति को प्राप्त हुए (इस तरह की सदगति की संभावना करोंड़ों में एक आंकी गई है ज्ञानियों के द्वारा)), तब आप कम से कम दो बार उसे देखें और न हो तो बिना शरमाये पूछ लें कि क्या वो आप से मुखातिब हैं? कोई बुराई नहीं है पहले पूछ लेने में बनिस्पत कि बात में बेवकूफ बन इधर उधर बगलें ताकने के)


(प्रिय जिज्ञासु पाठक, यही ज्ञान आगे आगे चलने में भी काम आयेगा. जब आपको लगे कि पीछे से उसने आपको आवाज लगाई है. :))

पुनश्चः: मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा की दृष्टी से इस कथा को काल्पनिक ही माना जाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 21, 2007

कृप्या दो जूते की सुरक्षित दूरी बनाये रखें...

बुजुर्ग कहते हैं जीवन एक पाठशाला है जहाँ व्यक्ति रोज कुछ नया सीखता है.

सच कहते हैं. बुजुर्ग वैसे भी जो कुछ कह गये वो सच ही कह गये हैं. उनको तो कुछ झेलना था नहीं. कहा और निकल लिये और अब आप उनका कहा पालन करिये और झेलिये.

बड़ी मुश्किल यह है कि जो भी कह गये आधा कह गये हमेशा. सेफ प्ले किया.

देखिये, एक दिन आलोक पुराणिक ज्ञान बीड़ी जलाये बैठे थे कि बुजुर्ग कह गये-’झूठ बोले कौव्वा काटे’ . आगे कुछ नहीं कह गये और चले गये. सच बोले तो?? कहते हैं कि झूठ बोलने पर सिर्फ कौव्वा काटता है और सच बोलने पर सांप, जैसे कि सत्यवादी हरीश चन्द्र जी के लड़के को काट गया.

कह गये ’नेकी कर दरिया में डाल’-कहा और चले गये. बताया ही नही कि चालबाजी कर और तिजोरी भर. वो तो भला हो बिगडैल औलादों का, जिन्हें हम नेता के नाम से जानते हैं, जिन्हें सिद्धान्तः बड़े बुजुर्गों की बात के विपरीत ही जाना है. उन्होंने बाकी आधे को ईजाद कर दिखाया. चालबाजी कर और तिजोरी भर. नेताओं का समाज पर यह उपकार कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.

भुलाया तो गुण्डों का भी नहीं जा सकेगा जिन्होंने इस अधूरी दास्तान को पूरा किया. कहा गया कि ’इज्जत दो इज्जत मिलेगी’.आगे भाई लोगों ने पूरा किया कि दम दो, धमकाओ, बंदा पैर पर गिर पड़ेगा और पैसा मिलेगा सो बोनस.

खैर वापस आते हैं ’जीवन एक पाठशाला है जहाँ व्यक्ति रोज कुछ नया सीखता है.’

हम तो उपर की दोनों श्रेणी, नेता और गुण्डा में नहीं आ पाये हैं अभी तक. हालांकि कोशिश जारी है और मन भी बहुत करता है. इसलिये जैसा बताया गया, मान लिया. आज नया सीख कर लौटे हैं जीवन की पाठशाला से, तो बाँटे दे रहे हैं.

हुआ यह कि स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा था. सामने एक सुकन्या-तीन इंच की पैन्सिल हील पहने बड़ी ही अदा से चढ़ रही थी. वो एक सीढ़ी पर और हम अगली पर-एकदम पीछे. अदाकारी न चाहते हुये भी दिख ही जा रही थी. एकाएक न जाने क्या हुआ कि मोहतरमा का एक पैर हल्का सा गलत पड़ा और जूता पैर का साथ छोड़ हवा में होता हुआ हमारे मुँह पर. हद हो गई. बिना छेड़े पिट लिये. एक सुन्दर पत्नी के पति और दो जवान लड़कों के बाप के मुँह पर एक विदेशी सुकन्या का तीन इंच हील का जूता सीधे तड़ाक से. हम सन्न. कन्या सन्न. फिर न जाने क्या हुआ-उसने बिना अपनी गल्ती के भी माफी मांगी, हमने पिटने के बाद भी, उन्हें रिवाज के मुताबिक सुकन्या होने का फायदा देते हुये मुस्कराते हुए माफ कर दिया. बस, जीवन की इस पाठशाला में एक नया अध्याय पढ़ लिया, सीख लिया, कंठस्थ कर लिया.
shoe
’जब भी किसी सुकन्या के पीछे चलिये, कृप्या दो जूते की सुरक्षित दूरी बनाये रखें’ अर्थात कम से कम दो सीढ़ी पीछे चढ़ो.

बरफ से नाँक सेकते हुए सोचा कि आपको भी बताता चलूँ ताकि सनद रहे और वक्त पर आपके काम आये. यह सीख मेरे उन नौजवान साथियों को ज्यादा काम आयेगी जो कुछ ज्यादा ही नजदीक चलते हैं सुकन्याओं के पीछे. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अक्टूबर 18, 2007

मीर की गज़ल सा.......

आज कुछ ऐसे ही लिख देने का मन हुआ. देखिये, आपको कैसा लगा!!!

मीर की गज़ल सा.......

गांव की
गली के उस नुक्कड पर
बरगद की छांव तले
माई बेरी की ढ़ेरी लगाती थी
हम सब उसे नानी कहते थे.
सड़क पार कोठरी मे रहती थी
कम पैसे रहने पर भी
बेर न कम करती....
हमेशा मुस्कराती.

पिछली बार जब भारत गया
तब कहानियां हवा में थी..
सुना है वो पेड़ कट गया
उसी शाम
माई नही रही.....

अब वहाँ पेड़ की जगह मॉल बनेगा
और सड़क पार माई की कोठरी
अब सुलभ शोचालय कहलाती है.

-मेरा बचपन खत्म हुआ!!!!!!
कुछ बुढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा................

--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्टूबर 16, 2007

हे कुत्ता जी महाराज, विधायक को आ जाने दो!!!

हे कुता जी महाराज, आज न काटना. विधायक जी शहर के बाहर हैं. यह आम पुकार आपको शीघ्र गली मुहल्ले नुक्कड़ पर जल्द ही सुनाई देने लगेगी.

सुना था कुता काट खाये तो चौदह मोटे मोटे इंजेक्शन पेट में लगवाना पड़ते हैं और उस कुत्ते को, जिसने काटा है, खोज करके उस पर नजर रखनी होती है. अगर चौदह दिन में वो मर गया तब मामला मोटा हो गया समझो. तब लोग जिस कुत्ते ने काटा उस पर और उसके चारों ओर नजर दौड़ाते थे उसके हाव भाव देखने के लिये.

आज मामला बदल गया है. कुत्ता काट ले तो कुत्ते पर तो बाद में नजर रखी जायेगी और क्षेत्र के विधायक पर पहले. अगर विधायक नहीं मिला तो मरना तय ही समझो. कुत्ता न मिले चल जायेगा. आज कुत्ते के काटने पर उससे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट विधायक जी हो गये हैं. और कुत्ते से उपर उन्हें सम्मान नवाजने का कार्य किया है झारखण्ड सरकार ने. अभी अभी समचार सुनता था जिसमें झारखण्ड सरकार ने नया निर्णय लिया है:
kutaa1
अगर किसी को कुत्ता काट ले तो उसे इन्जेक्शन लगाने के पहले क्षेत्रिय विधायक की मंजूरी की आवश्यक्ता होगी.

हद है. कुत्ता काट ले और विधायक महोदय विधान सभा का सत्र अटेन्ड करने राजधानी में हों, तब तो फिर भी पकड़ सकते हैं मगर यदि वो अपनी उन के साथ सिंगापुर घूम रहे हों या किसी अज्ञात स्थली के भ्रमण पर हों, तब??

बस एक ही रास्ता बचेगा कि कुत्ते की पूजा की जाये कि हे प्रभु, विधायक महोदय के आने तक न काटना या मरना. एक बार जब वो तुम्हारा स्थान ले लें फिर चाहे तुम मरो या जिओ, कोई अंतर नहीं पड़ता.

किसी ने पूछ ही लिया कि जैसे ही कुत्ते ने आपको काटा, आपके मन में क्या आया? आपको किसकी याद आई?

अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा-मुझे विधायक महोदय की याद आई!!

क्या बात है कि काटे कुत्ता और गाली निकले विधायक के लिये कि इस समय कहाँ निकल गये.

यूँ तो सही है कि दोनों ही ढ़ूँढ़े नहीं मिलते वक्त पर.

वैसे तो यह भी शास्वत सत्य है कि नेता मौके पर नहीं मिलते. सिद्ध करना चाहते हैं तो कुत्ते से कटवा कर देख लिजिये. विधायक जी शहर में नहीं मिलेंगे.

फिर भी महा-मृत्युंजय जाप की तरह, इस दोहे को गुनगुनाते हुए गलियों में घूमने में कोई बुराई नहीं है:


कुता जब भी काट ले, बस इतना रखना ध्यान
एमएलए हो शहर में और फोन रखा हो ऑन.


या ऐसा कुछ शेर पढ़ना:

विधायक जी जबसे गये हैं,
मैं कुत्ते से डरने लगा हूँ.......



--अभी सोचता हूँ कि सरकार को किस बात ने प्रेरित किया होगा ऐसा विधेयक लाने के लिये. और कोई भी तो काम का काम होगा करने को. आप कुछ सोच सकते हैं क्या?? Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 14, 2007

वो जो लिखता है न!! वो मैं नहीं हूँ.

वो जो है न!! वो ख्वाबों की रहस्यमयी दुनिया में भटकने वाला, यथार्थ से दूर चाँद तारों में अपनी माशूका को तलाशता, हवाओं मे संगीत लहरी खोजता. उसे बासंती झूलों में प्रेयसी के संग प्रेम गीत गुनगुनाते हुए पैंग मारना पसंद है. उसे सागर की लहरें भाती हैं, फूलों की खुशबू लुभाती है.वो हरियाली को निहारता है- वो कवि है, शायद गीतकार या सिर्फ एक लेखक.वो अपने लेखन सृजन से मुदित मुस्कराता है. खुश होता है.

वो जो है न!! वो लिखता है-संभल संभल कर, शब्द चुन चुन कर ताकि लोग उसे पढ़े, पसंद करें. वो अपनी बातों को न जाने कितनी कसौटियों में कसता है, तब कहता है, बिल्कुल बनावटी. हर वक्त एक ही चाह, उसकी वाह वाही हो. वो और लिखे. उसे वो लिखना होता है जो औरों के मन को भाये.
sl1
वो जो है न!! वो समाज पर पैनी नजर रखता है. दिन में सोता और रातों को जागता है. उसे रह रह कर अपने गुजरे वक्त की सुनहरी यादें सालती हैं और वो उन्हें सहेज सहेज कर सजाता है कभी कविता के माध्यम से तो कभी लेखों में परोसने के लिये.

मैं एक जिंदा आदमी हूँ और जिन्दा रहने की मशक्कत वो क्या जानेगा.

मेरा परिवार मेरी धूरी है, जिसके इर्द गिर्द मैं कोल्हू के बैल की तरह सारा दिन घूमता हूँ. गोल गोल. कोल्हू से उठती आवाज ही मेरा संगीत है और चक्करों की संख्या मेरा लक्ष्य. जितने चक्कर काटूँगा, जितनी देर इन आवाजों को सुनता रहूँगा, उतनी देर अपने कर्तव्यों का पालन करता रहूँगा और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना ही तो मेरा कर्तव्य है:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


कोल्हूkolhu से उठती यही ध्वनि मेरा संगीत है. मुझे जिन्दगी की आपा धापी में इतना समय ही कहाँ कि मैं उन पलों को सोच भी सकूँ जिनको मैं इतना पीछे छोड़ आया हूँ. उनकी सुहानी यादों में खो जाऊँ. हवाओं के गीत सुनूँ. हरियाली को निहारुँ. लिखने-परोसने का तो प्रश्न ही नहीं. कभी यादें आ भी जाती हैं तो इतनी क्षणिक कि झटक देता हूँ उन्हें. मेरा हर कदम इसी उद्देश्य से उठता है जो मेरे परिवार से जुड़ा है मैं तो बस:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


का संगीत सुन चल चल के दिन भर में थक जाता हूँ. मैं सावन के झूले से गिरने का भय पाले अपने इस कमरे में दुबका बैठा, दिन भर की थकन से टूटा कुछ पल विश्राम के तलाशता.हार कर रात को बिस्तर पर जो गिरा कि सुबह उसी करवट उठता हूँ अगले दिन फिर से उसी कोल्हू में पिर जाने को. मुझे रातों को यादें नहीं घेरतीं, न कोई स्वपन जगाता है.

यह सब उसके साथ ही होता है जो वो है-वो कवि है, शायद गीतकार या सिर्फ एक लेखक.वो मैं नहीं हूँ.

मगर मुझे वो अच्छा लगता है. लगता है कि वो मैं हूँ. वो जिन्दा रहे, यही मेरी चाहत है.

उसे जिन्दा रखने के लिये कुछ देर को और सही, मैं सुन लूँगा:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


वो मेरा प्रिय है. वो बना रहेगा तो मैं बना रहूँगा.

मगर वो जो लिखता है न!! वो मैं नहीं हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्टूबर 09, 2007

ताज्जुब न करो!!

tree
गाँधी जयन्ती पर पढ़ता था गाँधी जी का खत, जो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अपने अभिन्न मित्र कालेनबाख को लिखा. उस खत में उन्होंने हवा में आ रही सनसनाहट और पेड़ों का जिक्र किया. कम ही बात की है गाँधी जी ने पर्यावरण पर अपने जीवन काल में. शायद समय न मिल पाया हो या प्रासंगिक न रहा हो, उस वक्त.

हमारे एक मित्र अनायास ही कह उठे उनका खत पढ़ कर:

पौधे लगाने होंगे ताकि पेडों की सनसनाहट सुन सकें। नहीं तो कंकरीट के जंगल ही देखने को मिलेंगे। ऐसा जारी रहा तो जीवन जीवन नहीं रहेगा।

मैं हतप्रभ सा विचार में डूब गया. उड़ चला मन पखेरु मुम्बई प्रवास के दौर में. गिरगाम रोड, मुम्बई के उस कमरे में, जहाँ मैं रहा करता था. कहाँ लगाऊँ पेड़ इस महानगर में? काश, मैं भी हवा में तैरती पेड़ों की सनसनाहट भरी संगीत लहरी सुन पाता.

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!
building
बिल्डिंग से सटी बिल्डिंगें. ७ वीं मंजिल से जिधर नजर दौड़ाओ, बिल्डिंगें ही बिल्डिंगें. एक सघन कांक्रीट का विशालकाय जंगल. आवाजें तो उठती हैं. कहीं से किसी के बच्चे के चिल्लाने की, रसोई मे आपस में टकराते-गिरते बर्तनों की, टीवी पर चीख चीख कर पढ़े जाते समाचारों की, कहीं पर बेढ़ब तरीके से बजते री-मिक्स की तेज कर्कश धुन और भी न जाने कितने प्रकार की अजीब अजीब आवाजें. सुप्त संवेदनाओं की तलहटी से उठती ऊँची ऊँची आवाजें, शायद चित्कार ज्यादा बेहतर शब्दावली हो इसे जाहिर करने के लिये. शहरी रिवाज़ को उजागर करती आवाजें. एक दूसरे से सटे छोटे छोटे फ्लैटों में सिवाय आवाजों के और है ही क्या?

नीचे झांकता हूँ तो लोगों की भीड़ से पटी पड़ी पतली पतली सड़कें. सड़को के दोनों ओर अतिक्रमण किये सब्जी वालों के ठेले, टेक्सी वालों की भीड़. हैरत होती है जब सड़क नजर नहीं आती. किस स्तर पर यह सब तैर रहे हैं.

न कोई पेड़, न हरियाली. कहाँ से आये हवा में पेड़ों की सनसनाहट. वो संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

फ्लेट के बरामदे के गमले में बोनसाई लगा लिया है. कोई सनसनाहट नहीं बस, एक पेड़ होने का अहसास मात्र. पेड़ होकर भी पेड़ नहीं. ठीक वैसे ही, जैसे संवेदनाहीन मानव..जो आज हर जगह मिल जाते हैं..मानव होकर भी मानव नहीं. संवेदना शुन्य..आत्मलिप्त..लिजलिजे मानव आकृत.crowd

और बड़ी बड़ी हाईवे के किनारे हरे पेड़ लगा दिये गये हैं. शायद उनसे उठती होगी सनसनाहट...कोई संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

मगर तेज रफ्तार भागती कारें, ट्रकों की धों धों में उसकी क्या बिसात. कब उठी, कब लुप्त हो गई, कोई जान ही नहीं सका. कौन जान सका है सुप्त संवेदनाओं की करवट बदलने की प्रक्रिया को...क्षणिक..अनजान..अनकही..अहसास विहीन.

अब तो हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियों को सुनने पहाड़ों पर छुट्टियों में जाना पड़ेगा, एक कोशिश करके. तभी सुनाई देगा जीवन का असली संगीत...पेड़ों से उठती..हवा में समाहित स्वर लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

ठीक वैसे ही जैसे हर तरफ छाये रीमिक्स संगीत के कान फोडू संगीत से हट कर कभी किसी पाँच सितारा हॉल में जाकर शास्त्रीय संगीत का आनन्द लेना. वो भी तो अब यूँ ही सहज सुनाई नहीं पड़ता.

क्यूँ ऐसा सोचते हो कि फिर जीवन जीवन नहीं रहेगा, मित्र!! जरुर रहेगा-अंतर बस स्वर्ग और नरक के जीवन का होगा और फिर दोनों ही तो जीवन हैं.

जीना तो पड़ेगा-चाहे वो कितना भी अभिशप्त क्यूँ न हो. सब जी ही रहे हैं न!!

बस भूल जाओ, हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियाँ...

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

लगा लो मन रीमिक्स में!! उसके अपने सुर हैं. जैसे ट्रक और कारों की धों धों!

ताज्जुब न करो!!

(नोट: अभी भी वक्त है कि जितना बच सके उतना पर्यावरण और पहाड़ बचा लिये जायें. पाँच सितारा ही सही, कभी जा तो पायेंगे. :) वरना तो गुलाम अली को सुनते ही रह जायेंगे:

-दिल में इक लहर सी उठी है अभी,
कोई ताजा हवा चली है अभी.)
Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 08, 2007

पुनः वापसी : एक विचार

५ तारीख की शाम एक कवि सम्मेलन में शिरकत करने मांट्रियल जाना पड़ा. उम्मीद थी कि ६ को लौट आयेंगे. मगर वाह रे मित्र!! ऐसे कैसे लौट आते जबकि सोमवार को भी दफ्तर बंद है थैक्स गिविंग के लॉग वीक एंड के लिये. बस रुकना पड़ गया. न लेपटॉप साथ में और इतने मित्र. बस एक कमरे में, ढ़ेरों बातें, दिन भर चाय के दौर, पुरानी पुरानी यादें. शाम बीतते तक ताश की गड्डियां और कुछ हल्के फुल्के शौकिन जाम के दौर.वाह. खूब सोये, खूब गपियाये..और चार दिन लगा मानो सारा जीवन जी लिया हो स्वर्ग में. एक नैसर्गीक आनन्द.

लगा कि एक दुनिया इन्टरनेट के बाहर अभी भी बसती है और वो भी कितनी सुन्दर है. वाह!! बस देर है, उसे जीने की.

बार बार मन ब्लॉग की तरफ भागे मगर इन्तेजामात ऐसे किये गये कि उस तक हम न पहुँच पायें. न ईमेल और न इन्टरनेट.

मुझे आज लगा कि ऐसा कभी कभी हो जाना चाहिये. सब कुछ दूसरा.एकदम रोज से अलग.

माफी चाहूँगा उन सभी मित्रों से, जिन के ब्लॉग पर मैं इस दौरान पहुँच नहीं पाया और अपने कमेंट नहीं दे पाया.

पढ़ जरुर लूँगा और अगर बहुत आवश्यक हुआ तो कमेंट भी कर दूँगा. मगर नया एकाऊन्ट आज से शुरु समझा जाये. :)

कल से मेरी पोस्ट भी पूर्ववत आने लगेंगी. और आपकी पोस्टें भी पूर्ववत पढ़ी जाने लगेंगी.

मेरी गल्ती कि मुझे बता कर जाना था, मगर मैने इसे उतना गंभीरता से नहीं लिया,

लगता है विश्वकर्मा जी की गल्ती है. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 03, 2007

अपराध बोध से मुक्ति

घर के सामने ही एक छोटा सा किन्तु लम्बाई के हिसाब से अपेक्षाकृत घना पेड़ है. सुबह शाम को जब चाय पीने बरामदे में बैठो तो उसे निहारना बड़ा अच्छा लगता है. मगर जिस तरह बिन बच्चों के घर में सब कुछ होते हुए भी एक सूनेपन का साम्राज्य हो जाता है वैसे ही बिन पंछियों के पेड़.

बस इसी उम्मीद से एक बर्ड फीडर (जिसमें चिड़ियों के लिये खाना भरा जाता है) खरीद कर ले आये और उसमें पंछियों के लिये दाने भर कर पेड़ पर टांग दिया. पता नहीं कैसे सबको खबर लगी. मगर दिन भर में पूरा डब्बा खाली. पचासों चिड़ियों से जैसे लहलहा उठा पूरा माहौल. एक दम बच्चों से भरे चहकते घर सा. मैं, पापा, मेरी पत्नी सब खूब खुश होते रोज सुबह शाम उसमें दाने भर कर. दिन भर चिड़ियाँ चहकती मानों आशीर्वाद दे रही हों भोजन कराने का. जबकि आभारी तो हम उनके थे जो इतनी रौनक लगा दी थी उन्होंने सूने बरामदे में. रोज का नियम हो गया. बहुत अच्छा लगता था उनको खाते देखना. उनको गाते देखना. खाना खत्म हो जाये तो भी थोड़ी थोड़ी देर में आकर देख जाती थीं कि वापस भरा कि नहीं.

birdfeederउनका आपसी भाईचारा ऐसा कि देखते ही बनता था. हम इन्सानों से बिल्कुल भिन्न. काश, हम उनसे कुछ सीख पाते. दरअसल, उस बर्ड फीडर पर एक बार में चार चिड़ियों के बैठने की ही जगह थी. तो चार की ड्यूटी लगती, वो खाती जातीं और नीचे गिराती जाती. बाकी सारी चिड़ियाँ जमीन पर पेड़ के नीचे भीड़ लगा कर उस नीचे गिराये गये दानों में से खातीं. उपर की चारों पारी पारी बदलती जातीं. खाना खत्म. सब उड़ जाती. खाना भरा, उनमें से जो आकर देख जाये, वो सबको खबर कर देती और मिनट भर में सब पचासों की तादाद में फिर इक्कठा.

मगर खुशियाँ कब अकेले आईं हैं.एक दिन देखा तो मुहल्ले की एक बिल्ली ने उनमें से एक चिड़िया को पकड़ कर अपना ग्रास बना लिया. आह्ह!! यह मैने क्या किया. आत्मग्लानी से भर उठा मैं. मेरी ही गल्ती है. लगने लगा मानो मैं ही उन बेचारी चिड़ियों को घेर कर ले आया इस बिल्ली के लिये. मैं ही जिम्मेदार हूँ. मुझे एक अपराध बोध ने आ घेरा. न मैं खाना रखता, न वो निश्चिंत होकर जमीन पर से भोजन कर रही होतीं और न ही ये बिल्ली उसे अपना शिकार बना पाती. अभी आराम से उन्मुक्त गगन में उड़ रही होती.

मन खराब हो गया. विषाद के उन्हीं लम्हों में मैनें तुरन्त बर्ड फीडर हटा लिया. अरे, खाना तो बेचारी कहीं भी पा लेंगी. पहले भी पा ही रहीं थीं. मगर कम से कम मेरे कारण इस तरह से काल का ग्रास बनने से तो बच जायेंगी. मैं सह लूँगा उस पेड़ का सूनापन, ठीक उन बुजुर्गों की तरह जिनके बच्चे अपने कैरियर की तलाश में उन्मुक्त गगन में उड़ चले हैं घर से कहीं बहुत दूर. उन बुजुर्गों को बस यही तसल्ली है कि जहाँ भी हैं, बच्चे खुश हैं और इसी बच्चों की खुशी के लिये तो वे घर के सूनेपन को अपनी जीवनशैली बना बैठे हैं.

हो सकता है कि जंगल में या दीगर जगहों पर भी बिल्लियाँ और अन्य शिकारी पक्षी इन चिड़ियों को अपना शिकार बना रहे हों किन्तु जब यह सब मेरे सामने नहीं होगा तो कम से कम मैं अपराध बोध से मुक्त रहूँगा.

इसी तरह से तो आस पास घटित हो रहे अत्याचारों और कारनामों से नजर फिरा कर हम सभी एक अपराध बोध मुक्त जीवन जी रहे हैं, वरना तो जीना दूभर हो जाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links