बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

अफसोस कि दिल्ली नहीं गये

अफसोस कि दिल्ली नहीं गये. दिल्ली जाने के बाद भी दिल्ली नहीं गये. बस, फरीदाबाद गये. खुशी इस बात की कि पंगेबाज भाई अरुण अरोरा मिल गये. खाना उन्हीं के घर दबा कर खाया. भाभी जी एक उम्दा और बेहतरीन व्यक्तित्व की धनी हैं. इतना लज़ीज खाना खिलाया कि लंच के बाद के सारे काम टल गये. अगले हफ्ते फिर जाना पड़ेगा काम निपटाने. काम एक हफ्ते टल जाने का सारा दोष लज़ीज खाने पर डाला जा रहा है. मगर अगले हफ्ते की ट्रिप में दिल्ली जरुर जायेंगे और मित्रों से मिलेंगे, यह अभी से प्लान में है.
arunsameer
लौटते वक्त अपने गुरु राधा स्वामी श्री श्री अनुकुल जी महाराज के आश्रम देवघर, झारखण्ड गये. सारा दिन वहीं बिताया और बैजनाथ धाम के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त किया. दर्शन करने टांगे से गये. घोडे पर क्या बीती, पता नहीं मगर मुझे मजा आया. बचपन की ढ़ेरों यादें घिर आई इस टांगा यात्रा के साथ. यादों ने साथ छोड़ा, पंडों को स्पेस मिली, उन्होंने घेरा. किसी तरह उन्हें ढ़केला तो समय खत्म हुआ और हम निकल पड़े जबलपुर की ओर. रास्ते में इलाहाबाद पड़ना था. ज्ञानदत्त जी से मुलाकात हुई. जैसा सोचा था उससे कहीं ज्यादा विनम्र और व्यवहारकुशल. अफसोस हुआ कि मुझे कम से कम से एक दिन इलाहाबाद के लिये रखना चाहिये था. हमने तो अपनी खुशी के लिये घोड़े की चिन्ता नहीं की तो ज्ञानजी के लिये क्या सोचें कि क्या वो भी चाहते थे कि हम एक दिन रुकें.

ज्ञानजी आये. पूरे ट्रेन में हमारी पूछ हो ली. सबने समझा कि या तो हम कोई मंत्री हैं या रेल्वे बोर्ड के मेंम्बर. हमारा मौन और मुस्कराह्ट सह यात्रियों से लेकर रेल्वे स्टाफ की अटकलों पर अपनी मोहर लगाता रहा और हम मुस्कराते रहे और बकायदा सम्मान पाते जबलपुर तक चले आये.
gyanjisameer
महाशक्ती परमेन्द्र प्रताप का भी इलाहबाद में मिलने का वादा था. फिर बाद में पता चला कि ट्रेन छूटने के बाद, गलत जानकारी की वजह से, वो हाँफते हुए पहुँचे भी और मुलाकात न हो पाई. खैर आगे कभी सही, फिर मुलाकात हो लेगी. वो अमरुद अपने बगीचे से लेकर आये थे. मैं नहीं खा पाया, हमेशा इस बात का रंज रहेगा जब तक की खा न लूँ.

न तो अरुण भाई से और न ही ज्ञानजी से, मिलन की उत्सुक्ता में ,कोई विशेष प्रयोजन पर बात हो पाई. बस, एक बिखरी सी बात ब्लॉगिंग, ब्लॉगिंग का भविष्य, आगे के प्लान आदि पर हल्की फुल्की चर्चा हुई.

दोनों ही जगह, गौरतलब, इस विषय पर अवश्य नजर डाली गई कि आखिर क्या वजह है कि एकाएक नव आगंतुकों की संख्या में कमी आई है. क्या कहीं प्रोत्साहन की कमी है या विस्तार को लेकर विशेष कार्य नहीं किया जा रहा है. है तो चिन्ता का विषय मगर मेरा मानना है कि इससे उबरा जा सकता है और हम सब को इस ओर प्रयासरत होना होगा. हर ब्लॉगर अगर माह में मात्र दो से तीन लोगों को नया ब्लॉग बनाने को प्रेरित करे तो चेन एफेक्ट में हिन्दी के विस्तार को एक नया आयाम मिल सकता है. बस, एक सजग प्रयास की आवश्यक्ता है.

बाकी का कल.... Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, फ़रवरी 23, 2008

सावधान!! मेरी ब्लॉग आई डी चोरी...

मित्रों,

आज कम से कम ७ मित्रों का फोन या ई मेल आया कि मैने उनके ब्लॉग पर कुछ असंयत भाषा का प्रयोग करते हुए टिप्पणियाँ की हैं और बाद में मिटा भी दी.

इसे हादसा ही कहना चाहूँगा क्यूँकि न तो यह सब मेरी जानकारी में है और न ही मैं इस तरह के क्रियाकलापों का समर्थक हूँ.

खुशी इस बात की है कि मित्रों को यह विश्वास रहा कि यह कार्य मेरा नहीं है और उन्होंने मुझे इस तरह की वारदात की सूचना दी.

हालांकि यह कार्य जिसने भी किया हो और जिस भी उद्देश्य से किया हो, उस मित्र से भी मुझे कोई शिकायत नहीं. शायद कोई मजबूरी रही होगी किन्तु फिर भी उससे अनजान मित्र से निवेदन है कि बिना असंयत भाषा का उपयोग करते हुए भी वह अपनी बात अपने आई डी से कह सकता था. अगर उसे यह विश्वास था कि मेरे कहने का असर ज्यादा होगा तो मुझे सूचित करता. मैं निश्चित ही अपने तरीके से उसकी बात रखने की कोशिश करता.

आशा है भविष्य में यह अनजान मित्र इस बात का ख्याल रखेंगे.

अभी के लिये सभी को हुई असुविधाओं और उनके दिल को लगी ठेस के लिये क्षमापार्थी.

सादर

समीर लाल Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

द चोकिंग गेम-चिट्ठाजगत में...

कभी घुटन सी महसूस होने लगती है. सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि ये कहाँ आ गये हम. क्या हासिल है? महज एक घुटन का अहसास. एक अंधेरापन. एक दूसरे पर कीचड़ उछालना. एक विवाद समाप्त नहीं होता, दूसरा शुरु, बेवजह. नाम दिया जाता है कि एक स्वस्थ बहस चल रही है.

मुझे तो लगने लगा है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो बिना बहस जिन्दा रहना ही नहीं जानते, चार दिन शांति छाई रहे तो खाना हजम होना बन्द हो जाता है. किसी को पुरुस्कार मिले तो विवाद, किसी ने कुछ कहा तो विवाद और तो और कोई चुप रहा तो विवाद.

बात शुरु होती है कहाँ से और चल पड़ती है किस ओर. बहुत कोशिश करनी पड़ती है इससे बच कर निकलने के लिये. इससे किनारा बनाये रखने के लिये.
choking
मगर जब उसी गली के निवासी हैं तो कब तक बचते रहेंगे. माना कि हम नहीं भी खेलें कीचड़-कीचड़ तब भी कुछ छीटें तो आयेंगे ही. न भी आये तो दुर्गंध को कौन रोक पाया है आजतक. कहीं यही दुर्गंध नये आते लोगों का मन ही न बदल दे. फिर तो रह जायेंगे जो रह रहे हैं और छोड़ कर न जा पाना मजबूरी हो गया है या फिर वो, जिन्हें यह खेल पसंद है और इस खेल में मजा आता है. आबादी में विस्तार के मार्ग स्वतः ही अवरुद्ध हो जायेंगे.

अजीब लगता है मगर ये उन लोगों में से है जो खुद का गला घोंटकर उस पार की दुनिया का क्षणिक आभास और आनन्द लेने में अपने आप को एडवन्चर्स का दर्जा देते हैं. क्या ये बीमार नहीं? क्या इन्हें इलाज की जरुरत है?

आज ही ’द चोकिंग गेम’ के बारे में एक खबर पढ़ता था जिसने मुझे यह सोचने को मजबूर किया.

शायद यह उसी प्रजाती के हैं जिन बच्चों को लेकर आज अमरीका/कनाडा चिन्तित हैं. यह बच्चे इसी तरह के चोकिंग गेम में आनन्द का अनुभव करते हैं. ये बच्चे या तो अपने दोस्त के माध्यम से या कम्प्यूटर के तार या टेलिफोन के केबल से खुद ही अपना गला उस स्तर तक घोंटते हैं जब तक की लगभग होश न रह जाये. इन्हें इसमें मजा आता है. यह कहते हैं इन्होंने ब्लैक टनल देख ली जिससे होकर व्यक्ति मौत के बाद गुजरता है. यह मौत के साथ अपने साक्षात्कार का अनुभव करना चाहते है. क्यूँ? कोई नहीं जानता. ये बच्चे खुद नहीं जानते. बस, महज एक मानसिक विक्षप्तता- जिसका कोई जबाब नहीं. जिसे यह बच्चे एडवेन्चर कहते हैं.

तकलीफ तब हो जाती है, जब आसपास कोई नहीं होता या तुरन्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती और यह बच्चे अपनी नादानी से जान गँवा बैठते हैं.

खुद तो चले जाते हैं मगर पीछे छोड़ जाते हैं एक बिलखता बिखरा परिवार और दे जाते हैं अपनी तरह के अन्य नादानों को इसे अजमाने का उकसाहट-चलो देखें तो उसने कैसा अनुभव किया होगा?

इन बच्चों को रोकने के लिये कनाडा में एक वेब साईट शुरु की गई है और न जाने कितने फोरम इस दिशा में कार्यरत हैं.

बस, साथियों से यही कहना चाहूँगा कि इस खेल का अन्त अच्छा नहीं है. कहीं चिट्ठाजगत के लिये भी ऐसी ही वेबसाईट न शुरु करना पड़े. खुद ही समझ जाओ न!!

नोट: १.मूलतः इस पोस्ट की वजह ’द चोकिंग गेम’ की जानकारी देना था बाकि तो साथ में बह निकला. :)

२. आज से ४ दिन के लिये बाहर जा रहा हूँ. यह पोस्ट स्केड्यूल की है कल सुबह के लिये, जब मैं कहीं और से अपना ब्लॉग चेक करने वाला हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 17, 2008

आओ कि खुशी मनायें

यह मेरी २०० वीं पोस्ट है और मैं आप सबका बहुत आभारी हूँ जो आप सबने मेरा इतना उत्साह लगातार बढ़ाया. आगे भी इसी तरह के उत्साहवर्धन का आकांक्षी हूँ. बहुत आभार.
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इस मौके पर एक संदेश:


मौका है खुशी का
चलिये न!! कुछ जश्न मनाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

झूमिये, नाचिये और गाईये
जरा मूड में ठूमका लगाईये
जमाना क्या क्या बोलेगा
न इस बात से शरमाईये

अब तक हमने टिपियाया है
आज आप भी टिपियाईये
न सिर्फ मेरा वरन औरों का भी
थोड़ा तो हौसला बढ़ाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

दो सौ पोस्ट यूँ तो
कम नहीं होती
मगर जो मैं लिखता हूँ उसमे
कोई दम नहीं होती

अगर आप भी चाहें
तो रोज एक ऐसी पोस्ट ले आईये
कुछ हो न हो, कम से कम नेट पर
हिन्दी को फैलाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

बीते हैं अभी बस
देखिये न सिर्फ दो बरस
नशा ब्लॉगिंग का ऐसा है
भूल जाओगे तुम चरस

एक बार बस एक बार
मेरा कहा मान जाईये
बिन शरमाये बिन सकुचाये
अपना ब्लॉग बनाईये
एक जाम मेरे पास है
एक आप भी उठाईये.

नोट: अपना स्वयं का हिन्दी ब्लॉग बनाने में सहायता के लिये लिखें: sameer.lal@gmail.com Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2008

बीबी तो इन्तजार करेगी ही..

चार दिन बाद गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से लौटा. बचपन में भी हर साल ही गोरखपुर जाना होता था. ननिहाल और ददिहाल दोनों ही वहाँ हैं. तब तीन दिन की रेल यात्रा करते हुए राजस्थान से थर्ड क्लास में जाया करते थे. कोयले वाले इंजन की रेल. साथ होते लोहे के बक्से, होल्डाल, पूरी, आलू और करेले की तरकारी. सुराही में एकदम ठंडा पानी. रास्ते में मूंगफली, चने, कुल्हड़ में चाय. फट्टी बजाकर गाना गा गा कर पैसा मांगते बच्चे.राजनित और न जाने किन किन समस्याओं पर बहस करते वो अनजान सहयात्री जिनके रहते इतने लम्बे सफर का पता ही नहीं चलता था.तीन दिन बाद जब घर पहुँचते तो कुछ तो ईश्वरीय देन( खुद का रंग) और कुछ रेल की मेहरबानी, लगता कि जैसे कोयले में नहाये हुए हैं. इक्के या टांगे में लद कर नानी/दादी के घर पहुँचते थे. फिर पतंग उड़ाना, मिट्टी के खिलोने-शेरे, भालू.हर यात्रा याददाश्त बन जाती. जैसे ही वापस लौटते, अगले बरस फिर से जाने का इन्तजार लग जाता.घर लौट कर फट्टी वालों की नकल करते, उनके जैसे ही गाने की कोशिश,
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इस बार जब गोरखपुर से चला तो वही पुराने दिनों की याद ने घेर लिया. मगर एसी डिब्बे में वो आनन्द कहाँ? और यात्रा भी मात्र १६ घंटे की. यही सोच कर एसी अटेंडेन्ट को सामान का तकादा कर कुछ स्टेशनों के लिए जनरल डिब्बे में आकर बैठ गया. कितना बदल गया है सब कुछ. काफी साफ सुथरा माहौल. न तो कोई बीड़ी पी रहा था. न बाथरुम से उठती गंध, न मूंगफली वाले, न कुल्हड़ वाली चाय. जगह जगह ताजे फलों की फेरी लगाते फेरीवाले, प्लास्टिक के कप में बेस्वादु चाय, कुरकुरे और अंकल चिप्स बेचते नमकीन वाले. बस्स!! लोहे की संदुक की जगह वीआईपी और सफारी के लगेज जिनके पहियों ने न जाने कितने कुलियों की आजिविका को रौंद दिया, वाटर बाटल में पानी. आपसी बातचीत का प्रचलन भी समाप्त सा लगा, अपने सेलफोन से गाने बजाते मगन लोगों की भीड़ में न जाने कहाँ खो गये वो हृदय की गहराई से गाते फट्टी वाले बच्चे और राजनित पर बात करते सहयात्री.

कहते है सब विकास की राह पर है. वाकई, बहुत विकास हो रहा है. आम शहरों में न बिजली, न पानी, न ठीकठाक सड़कें..बस विकास हो रहा है. बच्चे बच्चे के हाथ में सेल फोन, तरह तरह की गाड़ी, सीमित जमीनों के बढ़ते दाम, लोगों के सर पर ऋणों का पहाड़, हर गांव-शहर से महानगरों को रोजगारोन्मुख पलायन करते युवक, युवतियाँ. भारत शाईनिंग-मगर मुझे पुकारता मेरे बचपन का भारत-जिसे ढ़ूंढ़ने मैं आया था, न जाने कहाँ खो गया है और अखबार की खबरें कहती है कि इसी के साथ ही खो गई है वो सहिष्णुता, सहनशीलता, आपसी सदभाव और सर्वधर्म भाईचारा. सब अपने आप में मगन हैं.

मुझे बोरियत होने लगती है. मैं उठकर अपने एसी डिब्बे में वापस आ जाता हूँ और खो जाता हूँ शिवानी की किताब ’अतिथी’ में. सामने की बर्थ पर बैठी महिला कोई मोटा अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही है और उसके ipod के ईयर फोन से बाहर तक सुनाई देती अंग्रेजी गाने की घुन माहौल को संगीतमय बना रही है.

उसी महिला को देखकर न जाने क्यूँ अनायास ही याद आ गया-ओह!! आज तो वेलेन्टाईन डे है. :)

सोचता हूँ घर जाते समय एक गुलाब खरीद लूँगा-बीबी इन्तजार कर रही होगी. अब मैं इस त्यौहार को मानूँ न मानूँ-क्या फरक पड़ता है. बीबी तो गुलाब का इन्तजार करेगी ही-यही आज के जमाने का चलन है. साथ तो चलना होगा.

पुन्श्चः मैं किसी विकास के विरोध में बात नहीं कर रहा. बस, आज कल याददाश्त के साथ कुछ पंगा हो रहा है, तभी तो उस मोहतरमा को देखकर वेलेन्टाईन डे याद आया वरना तो भूल ही गये थे.इसीलिये मेरी याद के पुराने भारत के लापता हो जाने पर उसका हुलिया लिपिबद्ध कर रहा हूँ ताकि दर्ज रहे और याददाश्त बनी रहे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 03, 2008

लोटा गायब

लगभग ३ माह गुजर गये चिट्ठाकारी किये और पता ही नहीं चला. शायद वजह अपनों का सानिध्य और लगातार चिट्ठाकारों से संपर्क एवं मिलन रही हो.

इस बीच भारत के विभिन्न शहरों में घूमा और अनेकों लोगों से मिला. बहुत स्नेह रहा सभी का. आज सभी यात्राओं एवं मधुर मिलनों का लेखा जोखा नहीं, वह धीरे धीरे एक एक करके समय समय पर सुनाऊँगा. आज तो मात्र एक उद्देश्य था कि पुनः वापसी की जाये और कुछ निरंतर लिखा जाये.

ऐसा भी नही रहा कि चिट्ठों से बिल्कुल आँख फेर ली हो इस अवधि में. एक निरन्तर अंतराल पर एग्रीगेटर्स के माध्यम से सभी गतिविधियाँ देखता रहा, सुनता रहा, मुस्कराता रहा तो कभी कुढता रहा. कभी हँसी आई तो कभी किन्हीं पोस्टों पर आँखें नम हो आई. कभी चिट्ठाकार होने का गर्व महसूस किया तो कभी लगा कि यह कैसा दलदल है?

लोगों ने पुरुस्कार जीते. अच्छा लगा देखकर. फोन पर ही बधाईयों का प्रेषण कर दिया, क्योंकि सोचा यह कि यदि एक टिप्पणी की तो फिर उड़न तश्तरी शायद रुक न पाये और छुट्टियों के माध्यम से आवंटित पारिवारिक समय के साथ अन्याय न हो जाये.

दिन मस्ती में गुजर रहे हैं. भारत में रहने का भरपूर आनन्द उठाया जा रहा है. आदतें खराब हो रही हैं. नौकर से मांग का पानी पीना और चाय बनवाना- मैं ही जानता हूँ कितना भारी पड़ेगा लौट कर.

बहुत सी बातें हैं करने को-मगर आज तो बस एक प्रसंग पर ....

इस भारत यात्रा के दौरान जबकि सोच हर तरफ प्रगति खोज और देख रही थी. सोचा था सभी बदलाव जो देखूँगा उन्हें कलमबद्ध करुँगा. एक नज़ारा तो प्रगतिशीलता का खुले आम देखा और वह यह कि हमारे युग का गाँव गाँव और शहर की रेल पटरियों के किनारे हर वक्त दर्शन देता लोटा चलन के बाहर हो गया और उसकी जगह ले ली बिसलरी की बोतलों नें.

जब भी सुबह सुबह ट्रेन द्वारा किसी शहर से प्रवेश किया या प्रस्थान किया. पटरियों के किनारे लोग बिसलरी की बोतलें लिये विराजमान नजर आये. जाने लोटे को किसकी नजर लग गई-बेचारा. न जाने कहाँ किस हालात में होगा?

जब व्यक्ति लोटा लेकर निकला करता था, यह जग जाहिर रहता था कि मैदान ही जा रहा है और आज बोतल लिये तो पता ही नहीं चलता कि मैदान जा रहा या दफ्तर या कि खेलने या स्कूल या यूँ ही तफरीह को. ये मुई बोतन न सिर्फ कन्फ्यूजन फैला रही है बल्कि प्रदूषण भी, उसके बाद भी पश्चिमी होने का फायदा ये कि पापुलर होती जा रही है.
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अब तो बस लोटा देखने की चाह लिये भटक रहा हूँ-हे लोटा महाराज, तुम कहाँ हो??

ऐसे ही अनेकों बदलाव दिख रहे हैं. सब पर बात करेंगे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, नवंबर 07, 2007

कुंठा से ग्रन्थी तक...

आज किसी से बात चल रही थी और वो अपने बचपन कोई किस्सा बता रहा था. मुझे बचपन की बात से एक किस्सा याद आया.

एक दिन दफ्तर से लौटते वक्त स्टेशन से निकलने के लिये सीढ़ी उतर रहा था थोड़ा सा तेजी से चलते हुए. आगे एक बच्चा अपनी मम्मी का हाथ पकड़े हँसते हुए उतर रहा था. मैने माँ और बेटे को ओवर टेक करते हुए दो तीन सीढ़ी पार कर ली. तभी पीछे से बच्चे की आवाज सुनाई दी. "मॉम, आई लॉस्ट" (माँ, मैं हार गया). उसकी माँ ने उसे समझाया कि बेटा, वो आपसे बहुत बड़े हैं, इसलिये आगे चले गये. आप भी जब उतने बड़े हो जाओगे तो ऐसे ही चल पाओगे.

मैं रुक गया. मैने हाँफने का अभिनय किया. बच्चे की माँ की तरफ देखा. एक खूबसूरत महिला थी. बालक कुछ ३ साल के आसपास का. फिर मैने बच्चे की ओर मुखातिब होकर कहा, "अरे, मैं तो थक गया और आप जीत गये. स्लो एंड स्टडी विन्स द रेस." बच्चा खूब खुश हो गया. मुझे भी बहुत खुशी हुई बच्चे में आत्म विश्वास लौटता देख. उसकी मम्मी भी मुस्कराई. मैं भी मुस्कराया.

मैं नहीं चाहता था कि उसे इस छोटी सी बात से कुछ दुख पहुँचे जिससे मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता मगर उसका यही दुख आगे चल कर एक कुंठा बन सकता था जो और गहरा होकर एक कभी न निकलने वाली ग्रंथी का रुप ले लेता. इसी तरह की बातें कि वो हमसे ज्यादा सामर्थवान है चाहे पैसे से, उम्र से, ताकत से, बुद्धि से, पावर से, इसलिये हम कुछ नहीं कर सकते, एक कुंठा और फिर ग्रंथी का रुप लेकर कितने ही लोगों में विद्यमान है.
motherson
वैसे लगता है उसकी माँ मेरे पूरे भाव नहीं समझ पाई या कई लोग शर्म के मारे कम बोलते हैं. अपनी फिलिंग्स नहीं कह पाते या समझी होगी कि कोई बीमार आदमी है, पता नहीं वरना तो इतने ऊँची विचारधारा के व्यक्ति से मिलने का गर्व उसके चेहरे पर छलक आता. शायद आभारवश कॉफी पर चलने को भी कहती अहसान उतारने को. सामने ही तो थी कॉफी शॉप. साथ बैठते थोड़ी देर तो बच्चे को खरगोश, कछुये की कहानी भी सुना देता और उसकी मम्मी को भी बच्चों के मनोबल बढ़ाने के कुछ गुर बताता.

शायद पैसे न रहे हों. अरे, एक बार कह देती तो क्या मैं न पेमेन्ट कर देता कॉफी का. आखिर लगता ही कितना मगर वही शर्मीलापन आड़े आ गया होगा.

मैने धीरे से देख लिया था कि वो अँगूठी भी नहीं पहने थी यानि उसके पति से या तो संबंध विच्छेद हो गया होगा या ये भी हो सकता है, उसने इससे शादी से ही मना कर दिया हो. कुछ भी तो संभव है. मैं सोचने लगा कि बेचारी की अभी उम्र ही क्या है. कैसे काटेगी सामने पड़ी पहाड़ जैसी जिंदगी. आँख भर आई मेरी.

माना कि साथ बच्चा है तो जब तक बच्चा है तभी तक. बड़ा हुआ नहीं कि समझो अपनी दुनिया में मस्त और यह बेचारी अकेली बच रहेगी. शायद इसी से मानसिक स्थितियाँ सामान्य न हों और भूल गई हो कॉफी के लिये कहना. जबकि यदि कॉफी के लिये कहती तो दो पल बैठ लेते. वैसे भी मुझे घर ही तो जाना था, कुछ देर बाद चला जाता. घर कोई भागे थोड़ी न जा रहा है. एक दुखिया का अगर कुछ दर्द कम होता है तो यह तो इन्सानियत का तकाजा है. मैं क्यूँ पीछे हटने लगा.वो अपना दर्द सुना लेती, दो बूँद आंसू बहा लेती मेरे कंधे पर सर रख कर. कहते हैं दर्द बांटने से हल्का हो जाता है. मुझे क्या फर्क पड़ना था. मेरा कंधा कोई शक्कर की डली तो है नहीं कि उसके दो बूँद आंसू से गल जाता. यूँ भी मेरा कंधा कर क्या रहा था सिवाय कमीज संभालने के, किसी के काम ही आ लेता. मैं भी साहनभूति के दो शब्द कह लेता, मुझे भी हल्का लगता. इस तरह विचारों की उधेड़ बून में तो न रहता.

खैर, बाद में समझ आया होगा तो बहुत दुख हुआ होगा उसे या अपने शर्मीले स्वभाव को कोस रही होगी, मगर मुझे इन सब से क्या? मैं तो सीधे घर लौट आया. अरे, एक पत्नी है, दो जवान लड़के हैं. मैं क्यूँ पड़ने लगा उसकी झंझटों के विचार में. वो जाने और उसका बच्चा. मैने तो अपना कर्तव्य निभा दिया, बस्स!!

मैं भी कहाँ बचपन की बात बताते बताते कहाँ पहुँच गया, यही होता है जब विचारों की उधेड़ बून में रहो!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, नवंबर 05, 2007

झूठे सिद्धांत-एक दोस्त को याद करते हुए

सुबह सुबह संदीप का फोन आया. कल रात उसके पिता जी को दिल का दौरा पड़ा है. अभी हालात नियंत्रण में है और दोपहर १२.३० बजे उन्हें बम्बई ले जा रहे हैं. वैसे तो सब इन्तजाम हो गया है मगर यदि २० हजार अलग से खाली हों तो ले आना. क्या पता कितने की जरुरत पड़ जाये? निश्चिंतता हो जायेगी. मैने हामी भर दी और कह दिया कि बस पहुँचता हूँ.

स्टेशन घर से आधे घंटे की दूरी पर है, फिर भी आदात के अनुसार मार्जिन रख कर सवा ग्यारह बजे ही स्कूटर लेकर निकल पड़ा.

चौक पार करने के बाद रेल्वे फाटक आता है. वहाँ गेट बंद मिला. छोटी लाइन की कोई ट्रेन गुजरने वाली है. शायद चार पाँच मिनट बाकी हो आने में. मगर लोग निर्बाध गेट के नीचे से अपने स्कूटर, साईकिल तिरछा करके झुककर निकले जा रहे थे. मानो कोई चार पाँच मिनट भी नहीं रुकना चाहता. फिर गेट बंद करने का तात्पर्य क्या है. अजब लोग हैं. जब घर से निकलते हैं तो कुछ समय तो अलग से क्यूँ नहीं रखते इस तरह की बातों के लिये. क्या पा जायेंगे कहीं पाँच मिनट पहले पहुँच कर?

कुछ तो सिद्धांत होने चाहिये.कुछ तो नियमों का पालन करना चाहिये.

इसी तरह के सिद्धांतवादी विचारों में खोया, मैं स्कूटर के हैंडल पर एक हाथ में अपनी ठुड्डी टिकाये मन ही मन अपने को जल्द निकल पड़ने की शाबाशी दे रहा था. अक्सर होता है ऐसा कि अपना सामान्य कार्य भी दूसरों की बेवकूफियों की वजह से प्रशंसनीय हो जाता है.
railwaycrossing
बाजू में आकर एक कार खड़ी हो गई. मैने कनखियों से देखा तो किसी संभ्रांत परिवार की कोई कन्या गाड़ी का स्टेरिंग थामे बैठी थी. उसके सन गॉगेल उसके तरतीब से झड़े रेशमी बालों पर आराम से बैठे थे मेरी ही तरह, निश्चिंत. मगर कन्या के चेहरे पर गेट बंद होने की खीझ स्पष्ट दिखाई दे रही थी. बार बार घड़ी की तरफ नजर डालती और फिर खीझाते हुए गेट की तरफ, पटरी पर जहाँ तक नजर जा सके, नजर दौड़ा लेती.

उसके चेहरे को देखकर मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर वो स्कूटर पर होती तो पक्का स्कूटर झुका कर निकल जाती. वो मात्र कार की मजबूरीवश रुकी थी और बाकी स्कूटर, साईकिल वालों को निकलता देख खीज रही थी. उसका सिद्धांतवादी होना मात्र मजबूरीवश है वरना तो कब का निकल गई होती. यह ठीक वैसे ही जैसे कितने ईमानदार सिर्फ इसलिये ईमानदार हैं कि कभी बेईमानी का सही मौका नहीं मिला.

इस बीच ट्रेन की सीटी दूर से सुनाई पड़ी. उसका चेहरा कुछ तनाव मुक्त सा होता दिखाई पड़ा. ट्रेन नजदीक ही होगी.

गेट के दोनों ओर भरपूर भीड़ इकट्ठा हो गई.

कुछ ही पलों में ट्रेन आ गई. एक एक कर डब्बे पार होने लगे. लाल हरे नीले पीले कपड़े पहने यात्रियों से भरी रेल. धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी.

उसकी कार ऑन हो गई. मैने भी बैठे बैठे ही स्कूटर में किक मारा और चलने को तैयार हो गया.

एकाएक आधी पार होने के बाद ट्रेन रुक गई. पाँच सात मिनट तक तो कुछ पता चला नहीं, फिर पता चला कि इंजन में कुछ खराबी हुई है. जल्द ही चल देगी.

स्कूटर बंद. कार बंद.खीज के भाव कन्या के चेहरे पर वापस पूर्ववत.

समय तो जैसे उड़ने लगा. देखते देखते ३० मिनट निकल गये. अब तो झुक कर भी नहीं जाया जा सकता था. एक तो ठसाठस भीड़ और उस पर से बीच में खड़ी ट्रेन. इन्तजार के सिवाय और कोई रास्ता नहीं. पीछॆ मुड़ना भी वाहनों की भीड़ से पटी सड़क पर संभव नहीं.

जिस खीज के भाव का अब तक मैं कन्या के चेहरे पर अध्ययन करके प्रसन्न हो रहा था, वही अब मेरे चेहरे पर आसन्न थे.

क्या सोच रहा होगा संदीप? खैर, अभी भी थोड़ा समय है, पहुँच कर समझा दूँगा.

४०-४५ मिनट बाद ट्रेन बढ़ी. गेट खुला. दोनों तरफ से टूट पड़ी भीड़ से ट्रेफिक जाम. किसी तरह उल्टी तरफ से निकलते हुए जैसे ही मैं स्टेशन पहुँचा, ट्रेन सामने से जा रही थी. आखिरी डिब्बा दिखा बस!!

मैं सोचने लगा कि इससे बेहतर तो मैं गेट के नीचे से ही निकल पड़ता. आखिर, जब मजबूरी में फँसा तब उल्टी ट्रेफिक में घुस कर निकला ही. कौन सा ऐसा तीर मार लिया सिद्धांतों को लाद कर. विषम परिस्थितियों में भी सिद्धांतों का पालन करता तो कोई बात होती. सामान्य समय में तो कोई भी कर सकता है. सिद्धांतवादी होना सरल नहीं है.

बाद में पता चला कि संदीप के पिता जी नहीं रहे. बम्बई में ही उन्होंने दम तोड़ दिया. उनके बड़े भाई का परिवार वहीं रहता था तो अंतिम संस्कार भी वहीं कर दिया गया. संदीप ने मुझसे फिर कभी बात नहीं की. मुझे बतलाने का मौका भी नहीं दिया कि क्या हुआ था.

काश, मैं उस वक्त अपने सिद्धांतों को दर किनार कर गेट से नीचे से भीड़ का हिस्सा बन निकल गया होता, तो संदीप आज भी मेरा दोस्त होता. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, नवंबर 01, 2007

आखिर बेटा हूँ तेरा

सरौता बाई नाम था उसका. सुबह सुबह ६ बजे आकर कुंडी खटखटाती थी. तब से उसका जो दिन शुरु होता कि ६ घर निपटाते शाम के ६ बजते. कपड़ा, भाडू, पौंछा, बरतन और कभी कभी मलकिनों की मालिश. बात कम ही करती थी.

पता चला कि उसका पति शराब पी पी कर मर गया कुछ साल पहले. पास ही के एक टोला में छोटी सी कोठरिया लेकर रहती थी १० रुपया किराये पर.

एक बेटा था बसुआ. उसे पढ़ा रही थी. उसका पूरा जीवन बसुआ के इर्द गिर्द ही घूमता. वो उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती थी.

हमें ७.३० बजे दफ्तर के निकलना होता था. कई बार उससे कहा कि ५.३० बजे आ जाया कर तो हमारे निकलते तक सब काम निपट जायेंगे मगर वो ६ बजे के पहले कभी न आ पाती. उसे ५ बजे बसुआ को उठाकर चाय नाश्ता देना होता था. फिर उसके लिये दोपहर का भोजन बनाकर घर से निकलती ताकि जब वो १२ बजे स्कूल से लौटे तो खाना खा ले.

फिर रात में तो गरम गरम सामने बैठालकर ही खाना खिलाती थी. बरसात को छोड़ हर मौसम में कोशिश करके कोठरी के बाहर ही परछी में सोती थी ताकि बसुआ को देर तक पढ़ने और सोने में परेशानी न हो.
poor lady
समय बीतता गया. बसुआ पढ़ता गया. सरौता बाई घूम घूम कर काम करती रही. एक दिन गुजिया लेकर आई कि बसुआ का कालिज में दाखिला हो गया है. बसुआ को स्कॉलरशिप भी मिल गई है. कालिज तो दूर था ही, तो स्कॉलरशिप के पैसे से फीस , किताब के इन्तजाम के बाद जो बच रहा, उसमें कुछ घरों से एडवान्स बटोरकर उसके लिये साईकिल लेकर दे दी. पहले दिन बसुआ अपनी माँ को छोड़ने आया था साईकिल पर बैठा कर. सरौता बाई कैरियर पर ऐसे बैठकर आई मानों कोई राजरानी मर्सडीज कार से आ रही हो. उसके चेहरे के भाव देखते ही बनते थे. बहुत खूश थी उस दिन वो.

बसुआ की प्रतिभा से वो फूली न समाती. बसुआ ने कालिज पूरा किया. एक प्राईवेट स्कूल से एम बी ए किया. फिर वो एक प्राईवेट कम्पनी में अच्छी पोजीशन पर लग गया. हर मौकों पर सरौता बाई खुश होती रही. उसकी तपस्या का फल उसे मिल रहा था. उसने अभी अपने काम नहीं छोड़े थे. एम बी ए की पढ़ाई के दौरान लिया कर्जा अभी बसुआ चुका रहा था शायद. सो सरौता बाई काम करती रही. उम्र के साथ साथ उसे खाँसी की बीमारी भी लग गई. रात रात भर खाँसती रहती.

बसुआ का साथ ही काम कर रही एक लड़की पर दिल आ गया और दोनों ने जल्द ही शादी करने का फैसला भी कर लिया, सरौता बाई भी बहुरिया आने की तैयारी में लग गई.

एक दिन सरौता बाई ५.३० बजे ही आ गई. आज वो उदास दिख रही थी. आज पहली बार उसकी आँखों में आसूं थे. बहुत पूछने पर बताने लगी कि कल जब घर पर चूना गेरु करने का इन्तजाम कर रही थी बहुरिया के स्वागत के लिये, तब बसुआ ने बताया कि बहुरिया यहाँ नहीं रह पायेगी. वो बहुत पढ़ी लिखी और अच्छे घर से ताल्लुक रखती है और वो शादी के लिये इसी शर्त पर राजी हुई है कि मैं उसके साथ उनके पिता जी के घर पर ही रहूँ. वैसे, तू चिन्ता मत कर, मैं बीच बीच में आता रहूँगा मिलने.

कोई भी काम हो तो फोन नम्बर भी दिया है कि इस पर फोन लगवा लेना. उसे चिन्ता लगी रहेगी. बहुत ख्याल रखता है बेचारा बसुआ. जाते जाते कह रहा था कि अब तो मेरा खर्च भी तुझको नहीं उठाना है. बसुआ पढ़ लिख गया है तो तू एकाध घर कम कर ले और हफ्ते में एक टाईम की छुट्टी भी लिया कर. अकेले के लिये कितना दौड़ेगी भागेगी आखिर तू. और अब इस उम्र भी तू पहले की तरह काम करेगी तो सोच, मुझे कितनी तकलीफ होगी. आखिर बेटा हूँ तेरा.

तब से सरौता बाई रोज ५.३० बजे आने लगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 29, 2007

१.३० घंटे मे ५० चिट्ठे मय टिप्पणी निपटायें

बचपन में परीक्षा की तैयारी करते थे. मास्साब सफलता का पाठ पढ़ाते थे ट्यूशन में. गुर दिया गया कि जैसे ही परचा हाथ में आये, सबसे पहले एक नजर पूरा परचा देख लो. फिर एक एक दो दो नम्बर वाले प्रश्न, जिसमें सिर्फ हाँ नहीं, छोटे छोटे जबाब देने हैं, उन्हे फटाफट कर डालो. फिर वो प्रश्न उठाओ, जिसका उत्तर तुम बखूबी से जानते हो. उन्हें फटाफट हल कर दो. अब बाकि के धीरे धीरे सोच समझ के जबाब देते जाओ. अगर किसी में फंस रहे हो, हल नहीं निकल रहा, तो जहाँ तक किया है वहीं छोड़ कर आगे अगले प्रश्न पर चले जाओ. बाद में समय बचे तो आकर फिर कोशिश करना. ध्यान रहे, जितने ज्यादा हल करोगे, उतना अच्छा परिणाम आयेगा. छूटे प्रश्न पर अंक भी शून्य मिला करते हैं. कुछ भी कोशिश की होगी तो शायद कुछ हिस्सा सही निकल जाये और परीक्षक उतने हिस्से के अंक दे दे.

उनका कहना था कि परीक्षा भी मेनेज्मेंट की बात है. टाईम मेनेज्मेंट, एक्साईटमेन्ट मेनेज्मेंट, कन्टेन्ट मेनेज्मेंट सभी लागू होते हैं. कहीं भी चूके और गये. उनके गुर हर परीक्षा में काम आये.

ऊँचे दर्जे के साथ जब कोर्स की किताबें मोटी होने लग गई तो समय तो वही २४ घंटे रहा उल्टे कॉलेज में ज्यादा समय लगने लगा. दोस्त बढ़ गये. घूमने फिरने का दायरा बढ़ गया. दीगर शौकों में समय जाने लगा. तब एक दिन उन्होंने हमें समस्या से जूझते देख एक नया गुर सिखाया-स्पीड रिडिंग-शीघ्र पठन जो रियाज के साथ साथ अतिशीघ्र पठन यानि रेपिड रिडिंग को प्राप्त हुआ. वही ध्यान तेज लेखन याने फास्ट राईटिंग की तरफ भी दिलवाया गया.

उनके शीघ्र पठन वाले गुर का भरपूर फायदा हमने उस समय नावेल पढ़ने में उठाया. वो सिखाते थे कि अगर मटेरियल सिर्फ जानकारी और मनोरंजन के लिये पढ़ा जा रहा और याद रखने की महती आवश्यक्ता नहीं है तो उसे पढ़ते वक्त शब्द शब्द नहीं, लाईन लाईन पढ़ो. पैराग्राफ नजर से स्कैन करो और आगे बढ़ो. किस विषय में है वो प्रस्तावना थोड़ा अधिक ध्यान से, व्याख्या स्कैनिंग मोड में और फिर निष्कर्ष पुनः थोड़ा ध्यान से. बस. इस तरह आप पूरा जान भी लेंगे और शब्द शब्द पढ़ने की अपेक्षाकृत १० प्रतिशत समय में आपका काम हो जायेगा. कभी कोई चीज विशेष पसंद आ जाये तो जितना चाहे लुत्फ लेकर पढ़ो. समय तुम्हारा है कौन रोक सकता है.ऐसे ही कुछ पठन, उसकी प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी छोड़ सकते हो कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता. समय बचता है. कितनी नावेल बस प्रस्तावना पढ़कर आगे नहीं पढ़ीं. कई उपन्यासकारों की शैली देखकर आपको रुचिकर नहीं लगता तो आप फिर उसका नाम देखकर दूसरी किताब पर चले जायें. ९५% आपका निर्णय सही ही होगा.

इस परीक्षा देने के, अतिशीघ्र पठन और तेज लेखन के गुरों की गठरी बना कर मैने इसका ब्लॉगजगत में पिछले एक वर्ष से खूब इस्तेमाल किया.

आज की स्थितियों में मान लिजिये, दिन की ५० पोस्ट आ रही हैं. मुझे इन ५० पोस्टों को पढ़ने और टिप्पणी करने में मात्र १ से १.३० घंटे का समय देना होता है बस!! क्या आप विश्वास करेंगे? इतना समय तो सभी चिट्ठाकार बिताते होंगे नेट पर बल्कि ज्यादा ही.
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मेरा नियम होता है कि पहले मैं छोटी छोटी पोस्ट, कविता आदि निपटाऊँ. फिर समाचार, फोटो आदि और फिर बड़े गद्य. उन बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़ में. कुछ जो पसंद आये, उन्हें अपना समय है के अंदाज में. मगर जो भी पढ़ूँ, देखूँ या सरियायूँ (स्कैन रिडिंग का हिन्दीकरण), उस पर शीघ्र लेखन (टाईपिंग और अब तो कट पेस्ट की सुविधा हमेशा हाजिर रहती है, कुछ वाक्य वर्ड पैड में लिखकर रख लें न, क्या बार टाईप करना जब दो की स्ट्रोक में १० की स्ट्रोक निपट सकते हैं) का फायदा उठाते हुए टिप्पणी अवश्य दर्ज करुँ ताकि अगला जान सके कि उसकी मेहनत पर हमारी नजर गई है. वो आगे भी मेहनत करने का उत्साह प्राप्त करेगा और आप जब मेहनत करेंगे, तब वह भी आपको उत्साहित करने आयेगा.

२० मिनट में फ्रस्ट फेज (छोटी छोटी पोस्ट, कविता) १५ मिनट में सेकेन्ड फेज (समाचार, फोटो आदि ), १५ मिनट में बाकी स्कैनिंग (बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़) बाकि का समय अपना पसंदीदा इस स्कैनिंग मोड से उपलब्ध लेखन. अब यदि आप १.३० घंटा दे रहे हैं तो पसंदीदा देखने के लिये आपके पास ४० मिनट बच रहे याने कम से कम १२० लाईन...अधिकतर गद्य २० से ४० लाईन के भीतर ही होते हैं ब्लॉग पर.(अपवाद माननीय फुरसतिया जी, उस दिन अलग से समय देना होता है खुशी खुशी) तो कम से कम ४ से ५ आराम से. चलो, कम भी करो तो ३. बहुत है गहराई से एक दिन में पढने के लिये. (कुछ इस श्रेणी में भी निकल जाते हैं - कुछ पठन की प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी आप उसे छोड़ सकते हैं कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता.)

अब यदि आपके मन में प्रश्न है कि १ मिनट में दो लाईन कैसे पढ़ पायेंगे (इस स्पीड में तो लाईन याद हो जायेगी, मेरे भाई)- तो भाई मेरे, आप इस लाईन में ही गलत आ गये हो. यहाँ से तो नमस्ते कर लो और राजनीति में किस्मत आजमाओ, सफलता आपके कदम चूमेगी, यह मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ और मेरी शुभकामनायें तो हैं ही.

अंत में निष्कर्ष कि जितना अपने लेखन को समय दो उससे चार गुना समय पठन को दो. कोई आवश्यक नहीं कि रोज लिखें. नये लोगों को नाम देख देख कर अहसास होने लगता है कि मैं खूब लिखता हूँ मगर विश्वास जानिये मेरी एक माह में मात्र १० से ११ पोस्ट होती हैं अर्थात हफ्ते में दो से तीन का औसत. अक्सर दो ही. मगर समय वही रोज १.३० से २ घंटे औसत. किया जा सकता है इतना शौक के लिये, हिन्दी की सेवा के लिये, खुद के मन की शांति के लिये और नाम कमाने के लिये. क्या पता कल को यह भी जुड़ जाये कि कुछ कमाई के लिये.

(आशा है शास्त्री जी, ज्ञान जी और अनूप शुक्ल जी को मेरे इतना समय चिट्ठाकारी को देने का रहस्य उजागर कर मैं संतुष्ट कर पाया और यह नये लोगों के लिये भी उपयोगी सिद्ध होगा)

तो शुरु करें अपनी टिप्पणी यात्रा इसी पोस्ट से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 28, 2007

राम की चिट्ठी सीता जी के नाम

अभी २ दिन बाद वाशिंग्टन कवि सम्मेलन से लौटा १५ मिनट पहले. चिट्ठों में तो दमादम मची है. चलो, अच्छा है अच्छी परंपरा है सब खुल कर बात करते हैं. यही तो अपनापन है. आज इतनी जल्दी में कुछ लिखने को नहीं है-न ही कवि सम्मेलन की रिपोर्ट. इतने बड़े कवि सम्मेलन जिसमें मेरे अलावा (वो तो लिख जाता) अनूप भार्गव, उनकी पत्नी रजनी भार्गव (सुना है वो ही अनूप जी के लिये भी लिखती है-बकौल मानोशी-वाया फुरसतिया), राकेश खंडेलवाल, घनश्य़ाम गुप्त जी जैसे २५ लोग शिरकत कर रहे हों, वो कैसे संभव हैं...

तो आज के लिये मात्र एक आर्कुट खुदाई की रिपोर्ट पेश कर देता हूँ देवनागरी में. कल पेश कर दूँगा जो मुझसे जमाने से पूछा जा रहा है कि मैं कैसे मैनेज करता हूँ इतनी टिप्पणियां और सारे ब्लॉग पढ़ना....भई, बहुत सरल है, बस एक से ढेढ घंटा चाहिये....अजब लगा न!!! कल पढ़ना मुझे...बताता हूँ कैसे संभव है...५० ब्लॉग १.३० घंटे में निपटाना मय टिप्पणी.....तब तक यह महज मनोरंजन को पढ़ें.:

राम की चिट्ठी सीता जी के नाम पंजाबी में और कलयुग में:




प्यारी सित्ता,

मैं इत्थे राजी खुशी से हां एंड होप के तु वी ठिक ठाक होवेंगी.

लक्ष्मण तेन्नु भोत याद करदा सी.

मैं इस बंदर दे हात्थ तन्नु चिट्ठी भेज रेहा हां.

तु बिल्कुल टेन्शन न लेई मैं भोत जल्दी तेनु रावण कोलो छुड़ा लावांगा.

मैं एअरटेल दा पोस्टपेड ले लिया सी, रावण नु मैं मोबाईल ते भोत गालियाँ काड़िया ते साले ने कट दित्ता.

चल कोई नी मैने आना ता है ही. तान कुटुँगा साले कंजर नु.

मैं तेरे नाल भी एक एअरटेल का प्रीपेड भेज रिया व उस विच १५०० एस एम एस फ्री वाली स्किम हा, तु रोज मेनु एस एम एस करी.

चिन्ता न करी, जद वी गल करने नु जी करे, एक मिस काल मार दियो, मैं वापस फोन्न कर लेवागा.

तु मेरे बिल दी चिन्ता न करी, सुग्रिवा नु पेमेन्ट दा जिम्मा दे दित्ता वै.

अच्छा ओके

सी य्य्यू

विथ लव

दशरथ दा वड्डा पुत्तर ’राम Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 24, 2007

हद करती हैं ये लड़कियाँ भी...

(यह संस्मरणात्मक आलेख मेरे पिछले आलेख ’दो जूतों की सुरक्षित दूरी’ वाले आलेख पर आये कई जिज्ञासु पाठकों की उस जिज्ञासा निवारण के लिये लिखा जा रहा है जिसमें पूछा गया है कि हे गुरुवर, सुकन्या के पीछे चलते वक्त दो जूते की सुरक्षित दूरी का ज्ञान तो आपने दे दिया किन्तु उनके बाजू में चलने/बैठने के विषय में भी हमारा कुछ ज्ञानवर्धन करें. )

आज दफ्तर जाते समय थोड़ा सजने (यहाँ की भाषा में-ड्रेस अप) का मन हो लिया. होता है कभी कभी. युवा मन है, मचल उठता है. मैं भी बुरा नहीं मानता, मेरा ही तो है.

टॉमी की सफेद कमीज, कालर से झांकती लाल पट्टी वाली, जिसे मैं खास मौकों पर पहनता हूँ. लोगों ने बताया है कि इसमें मैं बहुत स्मार्ट नजर आता हूँ.

साथ में काली फुल पेन्ट, काले मोजे, सॉलिड पॉलिश किये लगभग नये से पिछले साल कानपुर से खरीदे जूते. थोड़ा पाउडर भी लगा लिया चेहरे पर और फिर फाईनल टच-अज़ारो का परफ्यूम-वाह. कभी उसका विज्ञापन देखना. उसमे बताया है कि महक ऐसी कि रुप खिंचा खिंचा चला आये. जब भी लगाता हूँ लोग पूछते हैं कि आज कौन सा परफ्यूम लगाया है. बड़े इम्प्रेस होते हैं. मुझे तो मालूम नहीं था, विज्ञापन में देखा था और लोगों ने बताया है.
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निकलते निकलते वो काला चश्मा, वाह!! कितने ही लोग कह चुके हैं कि बहुत फबता है मेरे उपर. तभी तो अपना फोटो उसी चश्में को पहन कर खिंचाई है.

आकर ट्रेन में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया हूँ. बाजू की सीट खाली है. बैग से परसाई जी की किताब ‘माटी कहे कुम्हार से’ निकाल कर पढ़ने लगता हूँ.

अगले ही स्टेशन मेरे बाजू वाली सीट एक सुपात्र को प्राप्त हुई. एक सुन्दर युवती, उम्र तो जरुर रही होगी गुजरते योवन वाली ३७-३८ वर्ष, मगर वह उसे ३० पार न होने देने के लिये सफलतापूर्वक संघर्षरत थी. उसके जज्बे और सफलता को देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ. यह सजगता और यह संघर्ष का जज्बा हर स्त्री पुरुष में रहना चाहिये, ऐसा मेरा मानना है.

उसने अपने आप को व्यवस्थित किया. मैने कनखियों से देखा था. मैं किताब पढ़ता रहा.

तब तक एकाएक बोली-’हैलो, कैसे हैं आप?"

आह्हा!! परफ्यूम का कमाल- रुप खिंचा खिंचा चला आये. मगर वह पूछते समय भी अपनी नजर सामने अखबार में गड़ाई रही. मैं समझ गया, संस्कारी कन्या है, नहीं चाहती कि किसी और को पता चले कि मुझसे बात कर रही है.

मैने भी किताब में ही झूठमूठ मन लगाये सकुचाते हुये कहा, "जी, मैं ठीक हूँ और आप?"

वो कहने लगी, "कब से सोच रही थी मगर आज बात हो पाई."

ह्म्म!! जरुर सफेद शर्ट लाल पट्टी के साथ कमाल दिखा रही है. लोग सही ही कह रहे थे. मैने धीरे से फुसफुसाते लहजे में ही कहा, "जी, चलिये कम से कम आज सिलसिला तो शुरु हुआ." मैं भी संस्कारी हूँ इसलिये फुसफुसा कर कहा.

वो हंसी. मैं मुस्कराया.

उसने कहा, "लंच पर मिलोगे?"

मैने कहा, ’जरुर, कहाँ मिलना है?" मुझे लगा कि जरुर चश्मे ने भी गजब ढ़हाया होगा. बाकी तो लंच पर मिलने पर उसका क्या हाल होगा जब मैं बताऊँगा कि मैं चिट्ठाकार हूँ और सन २००६-०७ का तरकश स्वर्ण कमल और इंडी ब्लॉगीज पुरुस्कार से नवाजा गया हूँ. यू ट्यूब के कवि सम्मेलन के विडियो लिंक जो दूँगा तो फूली न समायेगी कि किस सेलेब्रेटी से मुलाकात हो ली है.

वो बोली, "ठीक है, वहीं मिलते हैं जहाँ पिछली बार मिले थे. ठीक दो बजे."
womenbluetoothअब मुझे लगा कि कुछ क्न्फ्यूजन है. मैं कब मिला इन मोहतरमा से. मैने उनकी तरफ पहली बार मूँह फिराया तो देखा वो कान में फंसाने वाले मोबाईल (अरे, ब्लू टूथ) पर किसी से बात करती हुई हंस रही थी. हद हो गई और मैं समझता रहा कि मुझसे बात चल रही है. एकाएक उसने मेरी तरफ मुखातिब होकर पूछा-"आपने कुछ कहा?"

मैने कहा,"नहीं तो."

अरे, मैं क्यूँ कुछ कहूँगा किसी अजनबी औरत से-अच्छा खासा शादीशुदा दो जवान बेटों का बाप-ऐसा सालिड एक्सक्यूज होते हुए भी. बस, समझो. किसी तरह बच निकले.वो तो लफड़ा मचा नहीं वरना तो सुरक्षाकवच ऐसे ऐसे थे कि जबाब न देते बनता उनसे. मैं तो तैयार ही था कहने को कि हम भारतीय है. हमारी संस्कृति में विवाहित महिलाये ऐसी नहीं होती कि पूछती फिरें –आपने कुछ कहा? अरे, हमारे यहाँ तो सही में भी अपरिचित महिला से कुछ पूछ लो तो कट के सर झुका के लज्जावश निकल लेती है. लज्जा को नारी के गहने का दर्जा दिया गया है. उस संस्कृति से आते हैं हम. तुम क्या जानो.

हद है भाई!! अफसोस होता है.

मैं तो खुश नहीं हूँ इन छोटे छोटे मोबाईल फोनों के आने से. ससूरे, साफ साफ दिखते भी नहीं हैं और कन्फ्यूजन क्रियेट करते हैं. आग लगे ऐसे छोटे मोबाईल के फैशन में.

सीख (ध्यान से पढ़ें): यदि कोई अजनबी सुन्दर कन्या, जो जन्म से अंधी नहीं है, आपकी काया, रंगरुप और उम्र की गवाही देते खिचड़ी बालों की प्रदर्शनी को देखते हुये भी, खुद से बढ़कर, आपसे अनायास अकारण आकर्षित होते हुये बात प्रारंभ करे (इस बात के होने की संभावना से कहीं ज्यादा प्रबल संभावना इस बात की है कि आप पर आकाश से बिजली गिर गई और आप सदगति को प्राप्त हुए (इस तरह की सदगति की संभावना करोंड़ों में एक आंकी गई है ज्ञानियों के द्वारा)), तब आप कम से कम दो बार उसे देखें और न हो तो बिना शरमाये पूछ लें कि क्या वो आप से मुखातिब हैं? कोई बुराई नहीं है पहले पूछ लेने में बनिस्पत कि बात में बेवकूफ बन इधर उधर बगलें ताकने के)


(प्रिय जिज्ञासु पाठक, यही ज्ञान आगे आगे चलने में भी काम आयेगा. जब आपको लगे कि पीछे से उसने आपको आवाज लगाई है. :))

पुनश्चः: मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा की दृष्टी से इस कथा को काल्पनिक ही माना जाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 21, 2007

कृप्या दो जूते की सुरक्षित दूरी बनाये रखें...

बुजुर्ग कहते हैं जीवन एक पाठशाला है जहाँ व्यक्ति रोज कुछ नया सीखता है.

सच कहते हैं. बुजुर्ग वैसे भी जो कुछ कह गये वो सच ही कह गये हैं. उनको तो कुछ झेलना था नहीं. कहा और निकल लिये और अब आप उनका कहा पालन करिये और झेलिये.

बड़ी मुश्किल यह है कि जो भी कह गये आधा कह गये हमेशा. सेफ प्ले किया.

देखिये, एक दिन आलोक पुराणिक ज्ञान बीड़ी जलाये बैठे थे कि बुजुर्ग कह गये-’झूठ बोले कौव्वा काटे’ . आगे कुछ नहीं कह गये और चले गये. सच बोले तो?? कहते हैं कि झूठ बोलने पर सिर्फ कौव्वा काटता है और सच बोलने पर सांप, जैसे कि सत्यवादी हरीश चन्द्र जी के लड़के को काट गया.

कह गये ’नेकी कर दरिया में डाल’-कहा और चले गये. बताया ही नही कि चालबाजी कर और तिजोरी भर. वो तो भला हो बिगडैल औलादों का, जिन्हें हम नेता के नाम से जानते हैं, जिन्हें सिद्धान्तः बड़े बुजुर्गों की बात के विपरीत ही जाना है. उन्होंने बाकी आधे को ईजाद कर दिखाया. चालबाजी कर और तिजोरी भर. नेताओं का समाज पर यह उपकार कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.

भुलाया तो गुण्डों का भी नहीं जा सकेगा जिन्होंने इस अधूरी दास्तान को पूरा किया. कहा गया कि ’इज्जत दो इज्जत मिलेगी’.आगे भाई लोगों ने पूरा किया कि दम दो, धमकाओ, बंदा पैर पर गिर पड़ेगा और पैसा मिलेगा सो बोनस.

खैर वापस आते हैं ’जीवन एक पाठशाला है जहाँ व्यक्ति रोज कुछ नया सीखता है.’

हम तो उपर की दोनों श्रेणी, नेता और गुण्डा में नहीं आ पाये हैं अभी तक. हालांकि कोशिश जारी है और मन भी बहुत करता है. इसलिये जैसा बताया गया, मान लिया. आज नया सीख कर लौटे हैं जीवन की पाठशाला से, तो बाँटे दे रहे हैं.

हुआ यह कि स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा था. सामने एक सुकन्या-तीन इंच की पैन्सिल हील पहने बड़ी ही अदा से चढ़ रही थी. वो एक सीढ़ी पर और हम अगली पर-एकदम पीछे. अदाकारी न चाहते हुये भी दिख ही जा रही थी. एकाएक न जाने क्या हुआ कि मोहतरमा का एक पैर हल्का सा गलत पड़ा और जूता पैर का साथ छोड़ हवा में होता हुआ हमारे मुँह पर. हद हो गई. बिना छेड़े पिट लिये. एक सुन्दर पत्नी के पति और दो जवान लड़कों के बाप के मुँह पर एक विदेशी सुकन्या का तीन इंच हील का जूता सीधे तड़ाक से. हम सन्न. कन्या सन्न. फिर न जाने क्या हुआ-उसने बिना अपनी गल्ती के भी माफी मांगी, हमने पिटने के बाद भी, उन्हें रिवाज के मुताबिक सुकन्या होने का फायदा देते हुये मुस्कराते हुए माफ कर दिया. बस, जीवन की इस पाठशाला में एक नया अध्याय पढ़ लिया, सीख लिया, कंठस्थ कर लिया.
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’जब भी किसी सुकन्या के पीछे चलिये, कृप्या दो जूते की सुरक्षित दूरी बनाये रखें’ अर्थात कम से कम दो सीढ़ी पीछे चढ़ो.

बरफ से नाँक सेकते हुए सोचा कि आपको भी बताता चलूँ ताकि सनद रहे और वक्त पर आपके काम आये. यह सीख मेरे उन नौजवान साथियों को ज्यादा काम आयेगी जो कुछ ज्यादा ही नजदीक चलते हैं सुकन्याओं के पीछे. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अक्टूबर 18, 2007

मीर की गज़ल सा.......

आज कुछ ऐसे ही लिख देने का मन हुआ. देखिये, आपको कैसा लगा!!!

मीर की गज़ल सा.......

गांव की
गली के उस नुक्कड पर
बरगद की छांव तले
माई बेरी की ढ़ेरी लगाती थी
हम सब उसे नानी कहते थे.
सड़क पार कोठरी मे रहती थी
कम पैसे रहने पर भी
बेर न कम करती....
हमेशा मुस्कराती.

पिछली बार जब भारत गया
तब कहानियां हवा में थी..
सुना है वो पेड़ कट गया
उसी शाम
माई नही रही.....

अब वहाँ पेड़ की जगह मॉल बनेगा
और सड़क पार माई की कोठरी
अब सुलभ शोचालय कहलाती है.

-मेरा बचपन खत्म हुआ!!!!!!
कुछ बुढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा................

--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्टूबर 16, 2007

हे कुत्ता जी महाराज, विधायक को आ जाने दो!!!

हे कुता जी महाराज, आज न काटना. विधायक जी शहर के बाहर हैं. यह आम पुकार आपको शीघ्र गली मुहल्ले नुक्कड़ पर जल्द ही सुनाई देने लगेगी.

सुना था कुता काट खाये तो चौदह मोटे मोटे इंजेक्शन पेट में लगवाना पड़ते हैं और उस कुत्ते को, जिसने काटा है, खोज करके उस पर नजर रखनी होती है. अगर चौदह दिन में वो मर गया तब मामला मोटा हो गया समझो. तब लोग जिस कुत्ते ने काटा उस पर और उसके चारों ओर नजर दौड़ाते थे उसके हाव भाव देखने के लिये.

आज मामला बदल गया है. कुत्ता काट ले तो कुत्ते पर तो बाद में नजर रखी जायेगी और क्षेत्र के विधायक पर पहले. अगर विधायक नहीं मिला तो मरना तय ही समझो. कुत्ता न मिले चल जायेगा. आज कुत्ते के काटने पर उससे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट विधायक जी हो गये हैं. और कुत्ते से उपर उन्हें सम्मान नवाजने का कार्य किया है झारखण्ड सरकार ने. अभी अभी समचार सुनता था जिसमें झारखण्ड सरकार ने नया निर्णय लिया है:
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अगर किसी को कुत्ता काट ले तो उसे इन्जेक्शन लगाने के पहले क्षेत्रिय विधायक की मंजूरी की आवश्यक्ता होगी.

हद है. कुत्ता काट ले और विधायक महोदय विधान सभा का सत्र अटेन्ड करने राजधानी में हों, तब तो फिर भी पकड़ सकते हैं मगर यदि वो अपनी उन के साथ सिंगापुर घूम रहे हों या किसी अज्ञात स्थली के भ्रमण पर हों, तब??

बस एक ही रास्ता बचेगा कि कुत्ते की पूजा की जाये कि हे प्रभु, विधायक महोदय के आने तक न काटना या मरना. एक बार जब वो तुम्हारा स्थान ले लें फिर चाहे तुम मरो या जिओ, कोई अंतर नहीं पड़ता.

किसी ने पूछ ही लिया कि जैसे ही कुत्ते ने आपको काटा, आपके मन में क्या आया? आपको किसकी याद आई?

अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा-मुझे विधायक महोदय की याद आई!!

क्या बात है कि काटे कुत्ता और गाली निकले विधायक के लिये कि इस समय कहाँ निकल गये.

यूँ तो सही है कि दोनों ही ढ़ूँढ़े नहीं मिलते वक्त पर.

वैसे तो यह भी शास्वत सत्य है कि नेता मौके पर नहीं मिलते. सिद्ध करना चाहते हैं तो कुत्ते से कटवा कर देख लिजिये. विधायक जी शहर में नहीं मिलेंगे.

फिर भी महा-मृत्युंजय जाप की तरह, इस दोहे को गुनगुनाते हुए गलियों में घूमने में कोई बुराई नहीं है:


कुता जब भी काट ले, बस इतना रखना ध्यान
एमएलए हो शहर में और फोन रखा हो ऑन.


या ऐसा कुछ शेर पढ़ना:

विधायक जी जबसे गये हैं,
मैं कुत्ते से डरने लगा हूँ.......



--अभी सोचता हूँ कि सरकार को किस बात ने प्रेरित किया होगा ऐसा विधेयक लाने के लिये. और कोई भी तो काम का काम होगा करने को. आप कुछ सोच सकते हैं क्या?? Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 14, 2007

वो जो लिखता है न!! वो मैं नहीं हूँ.

वो जो है न!! वो ख्वाबों की रहस्यमयी दुनिया में भटकने वाला, यथार्थ से दूर चाँद तारों में अपनी माशूका को तलाशता, हवाओं मे संगीत लहरी खोजता. उसे बासंती झूलों में प्रेयसी के संग प्रेम गीत गुनगुनाते हुए पैंग मारना पसंद है. उसे सागर की लहरें भाती हैं, फूलों की खुशबू लुभाती है.वो हरियाली को निहारता है- वो कवि है, शायद गीतकार या सिर्फ एक लेखक.वो अपने लेखन सृजन से मुदित मुस्कराता है. खुश होता है.

वो जो है न!! वो लिखता है-संभल संभल कर, शब्द चुन चुन कर ताकि लोग उसे पढ़े, पसंद करें. वो अपनी बातों को न जाने कितनी कसौटियों में कसता है, तब कहता है, बिल्कुल बनावटी. हर वक्त एक ही चाह, उसकी वाह वाही हो. वो और लिखे. उसे वो लिखना होता है जो औरों के मन को भाये.
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वो जो है न!! वो समाज पर पैनी नजर रखता है. दिन में सोता और रातों को जागता है. उसे रह रह कर अपने गुजरे वक्त की सुनहरी यादें सालती हैं और वो उन्हें सहेज सहेज कर सजाता है कभी कविता के माध्यम से तो कभी लेखों में परोसने के लिये.

मैं एक जिंदा आदमी हूँ और जिन्दा रहने की मशक्कत वो क्या जानेगा.

मेरा परिवार मेरी धूरी है, जिसके इर्द गिर्द मैं कोल्हू के बैल की तरह सारा दिन घूमता हूँ. गोल गोल. कोल्हू से उठती आवाज ही मेरा संगीत है और चक्करों की संख्या मेरा लक्ष्य. जितने चक्कर काटूँगा, जितनी देर इन आवाजों को सुनता रहूँगा, उतनी देर अपने कर्तव्यों का पालन करता रहूँगा और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना ही तो मेरा कर्तव्य है:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


कोल्हूkolhu से उठती यही ध्वनि मेरा संगीत है. मुझे जिन्दगी की आपा धापी में इतना समय ही कहाँ कि मैं उन पलों को सोच भी सकूँ जिनको मैं इतना पीछे छोड़ आया हूँ. उनकी सुहानी यादों में खो जाऊँ. हवाओं के गीत सुनूँ. हरियाली को निहारुँ. लिखने-परोसने का तो प्रश्न ही नहीं. कभी यादें आ भी जाती हैं तो इतनी क्षणिक कि झटक देता हूँ उन्हें. मेरा हर कदम इसी उद्देश्य से उठता है जो मेरे परिवार से जुड़ा है मैं तो बस:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


का संगीत सुन चल चल के दिन भर में थक जाता हूँ. मैं सावन के झूले से गिरने का भय पाले अपने इस कमरे में दुबका बैठा, दिन भर की थकन से टूटा कुछ पल विश्राम के तलाशता.हार कर रात को बिस्तर पर जो गिरा कि सुबह उसी करवट उठता हूँ अगले दिन फिर से उसी कोल्हू में पिर जाने को. मुझे रातों को यादें नहीं घेरतीं, न कोई स्वपन जगाता है.

यह सब उसके साथ ही होता है जो वो है-वो कवि है, शायद गीतकार या सिर्फ एक लेखक.वो मैं नहीं हूँ.

मगर मुझे वो अच्छा लगता है. लगता है कि वो मैं हूँ. वो जिन्दा रहे, यही मेरी चाहत है.

उसे जिन्दा रखने के लिये कुछ देर को और सही, मैं सुन लूँगा:

एक चक्कर, दो चक्कर
चरमर चमर च्यूँ चमर .......


वो मेरा प्रिय है. वो बना रहेगा तो मैं बना रहूँगा.

मगर वो जो लिखता है न!! वो मैं नहीं हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्टूबर 09, 2007

ताज्जुब न करो!!

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गाँधी जयन्ती पर पढ़ता था गाँधी जी का खत, जो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अपने अभिन्न मित्र कालेनबाख को लिखा. उस खत में उन्होंने हवा में आ रही सनसनाहट और पेड़ों का जिक्र किया. कम ही बात की है गाँधी जी ने पर्यावरण पर अपने जीवन काल में. शायद समय न मिल पाया हो या प्रासंगिक न रहा हो, उस वक्त.

हमारे एक मित्र अनायास ही कह उठे उनका खत पढ़ कर:

पौधे लगाने होंगे ताकि पेडों की सनसनाहट सुन सकें। नहीं तो कंकरीट के जंगल ही देखने को मिलेंगे। ऐसा जारी रहा तो जीवन जीवन नहीं रहेगा।

मैं हतप्रभ सा विचार में डूब गया. उड़ चला मन पखेरु मुम्बई प्रवास के दौर में. गिरगाम रोड, मुम्बई के उस कमरे में, जहाँ मैं रहा करता था. कहाँ लगाऊँ पेड़ इस महानगर में? काश, मैं भी हवा में तैरती पेड़ों की सनसनाहट भरी संगीत लहरी सुन पाता.

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!
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बिल्डिंग से सटी बिल्डिंगें. ७ वीं मंजिल से जिधर नजर दौड़ाओ, बिल्डिंगें ही बिल्डिंगें. एक सघन कांक्रीट का विशालकाय जंगल. आवाजें तो उठती हैं. कहीं से किसी के बच्चे के चिल्लाने की, रसोई मे आपस में टकराते-गिरते बर्तनों की, टीवी पर चीख चीख कर पढ़े जाते समाचारों की, कहीं पर बेढ़ब तरीके से बजते री-मिक्स की तेज कर्कश धुन और भी न जाने कितने प्रकार की अजीब अजीब आवाजें. सुप्त संवेदनाओं की तलहटी से उठती ऊँची ऊँची आवाजें, शायद चित्कार ज्यादा बेहतर शब्दावली हो इसे जाहिर करने के लिये. शहरी रिवाज़ को उजागर करती आवाजें. एक दूसरे से सटे छोटे छोटे फ्लैटों में सिवाय आवाजों के और है ही क्या?

नीचे झांकता हूँ तो लोगों की भीड़ से पटी पड़ी पतली पतली सड़कें. सड़को के दोनों ओर अतिक्रमण किये सब्जी वालों के ठेले, टेक्सी वालों की भीड़. हैरत होती है जब सड़क नजर नहीं आती. किस स्तर पर यह सब तैर रहे हैं.

न कोई पेड़, न हरियाली. कहाँ से आये हवा में पेड़ों की सनसनाहट. वो संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

फ्लेट के बरामदे के गमले में बोनसाई लगा लिया है. कोई सनसनाहट नहीं बस, एक पेड़ होने का अहसास मात्र. पेड़ होकर भी पेड़ नहीं. ठीक वैसे ही, जैसे संवेदनाहीन मानव..जो आज हर जगह मिल जाते हैं..मानव होकर भी मानव नहीं. संवेदना शुन्य..आत्मलिप्त..लिजलिजे मानव आकृत.crowd

और बड़ी बड़ी हाईवे के किनारे हरे पेड़ लगा दिये गये हैं. शायद उनसे उठती होगी सनसनाहट...कोई संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

मगर तेज रफ्तार भागती कारें, ट्रकों की धों धों में उसकी क्या बिसात. कब उठी, कब लुप्त हो गई, कोई जान ही नहीं सका. कौन जान सका है सुप्त संवेदनाओं की करवट बदलने की प्रक्रिया को...क्षणिक..अनजान..अनकही..अहसास विहीन.

अब तो हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियों को सुनने पहाड़ों पर छुट्टियों में जाना पड़ेगा, एक कोशिश करके. तभी सुनाई देगा जीवन का असली संगीत...पेड़ों से उठती..हवा में समाहित स्वर लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

ठीक वैसे ही जैसे हर तरफ छाये रीमिक्स संगीत के कान फोडू संगीत से हट कर कभी किसी पाँच सितारा हॉल में जाकर शास्त्रीय संगीत का आनन्द लेना. वो भी तो अब यूँ ही सहज सुनाई नहीं पड़ता.

क्यूँ ऐसा सोचते हो कि फिर जीवन जीवन नहीं रहेगा, मित्र!! जरुर रहेगा-अंतर बस स्वर्ग और नरक के जीवन का होगा और फिर दोनों ही तो जीवन हैं.

जीना तो पड़ेगा-चाहे वो कितना भी अभिशप्त क्यूँ न हो. सब जी ही रहे हैं न!!

बस भूल जाओ, हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियाँ...

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

लगा लो मन रीमिक्स में!! उसके अपने सुर हैं. जैसे ट्रक और कारों की धों धों!

ताज्जुब न करो!!

(नोट: अभी भी वक्त है कि जितना बच सके उतना पर्यावरण और पहाड़ बचा लिये जायें. पाँच सितारा ही सही, कभी जा तो पायेंगे. :) वरना तो गुलाम अली को सुनते ही रह जायेंगे:

-दिल में इक लहर सी उठी है अभी,
कोई ताजा हवा चली है अभी.)
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सोमवार, अक्टूबर 08, 2007

पुनः वापसी : एक विचार

५ तारीख की शाम एक कवि सम्मेलन में शिरकत करने मांट्रियल जाना पड़ा. उम्मीद थी कि ६ को लौट आयेंगे. मगर वाह रे मित्र!! ऐसे कैसे लौट आते जबकि सोमवार को भी दफ्तर बंद है थैक्स गिविंग के लॉग वीक एंड के लिये. बस रुकना पड़ गया. न लेपटॉप साथ में और इतने मित्र. बस एक कमरे में, ढ़ेरों बातें, दिन भर चाय के दौर, पुरानी पुरानी यादें. शाम बीतते तक ताश की गड्डियां और कुछ हल्के फुल्के शौकिन जाम के दौर.वाह. खूब सोये, खूब गपियाये..और चार दिन लगा मानो सारा जीवन जी लिया हो स्वर्ग में. एक नैसर्गीक आनन्द.

लगा कि एक दुनिया इन्टरनेट के बाहर अभी भी बसती है और वो भी कितनी सुन्दर है. वाह!! बस देर है, उसे जीने की.

बार बार मन ब्लॉग की तरफ भागे मगर इन्तेजामात ऐसे किये गये कि उस तक हम न पहुँच पायें. न ईमेल और न इन्टरनेट.

मुझे आज लगा कि ऐसा कभी कभी हो जाना चाहिये. सब कुछ दूसरा.एकदम रोज से अलग.

माफी चाहूँगा उन सभी मित्रों से, जिन के ब्लॉग पर मैं इस दौरान पहुँच नहीं पाया और अपने कमेंट नहीं दे पाया.

पढ़ जरुर लूँगा और अगर बहुत आवश्यक हुआ तो कमेंट भी कर दूँगा. मगर नया एकाऊन्ट आज से शुरु समझा जाये. :)

कल से मेरी पोस्ट भी पूर्ववत आने लगेंगी. और आपकी पोस्टें भी पूर्ववत पढ़ी जाने लगेंगी.

मेरी गल्ती कि मुझे बता कर जाना था, मगर मैने इसे उतना गंभीरता से नहीं लिया,

लगता है विश्वकर्मा जी की गल्ती है. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 03, 2007

अपराध बोध से मुक्ति

घर के सामने ही एक छोटा सा किन्तु लम्बाई के हिसाब से अपेक्षाकृत घना पेड़ है. सुबह शाम को जब चाय पीने बरामदे में बैठो तो उसे निहारना बड़ा अच्छा लगता है. मगर जिस तरह बिन बच्चों के घर में सब कुछ होते हुए भी एक सूनेपन का साम्राज्य हो जाता है वैसे ही बिन पंछियों के पेड़.

बस इसी उम्मीद से एक बर्ड फीडर (जिसमें चिड़ियों के लिये खाना भरा जाता है) खरीद कर ले आये और उसमें पंछियों के लिये दाने भर कर पेड़ पर टांग दिया. पता नहीं कैसे सबको खबर लगी. मगर दिन भर में पूरा डब्बा खाली. पचासों चिड़ियों से जैसे लहलहा उठा पूरा माहौल. एक दम बच्चों से भरे चहकते घर सा. मैं, पापा, मेरी पत्नी सब खूब खुश होते रोज सुबह शाम उसमें दाने भर कर. दिन भर चिड़ियाँ चहकती मानों आशीर्वाद दे रही हों भोजन कराने का. जबकि आभारी तो हम उनके थे जो इतनी रौनक लगा दी थी उन्होंने सूने बरामदे में. रोज का नियम हो गया. बहुत अच्छा लगता था उनको खाते देखना. उनको गाते देखना. खाना खत्म हो जाये तो भी थोड़ी थोड़ी देर में आकर देख जाती थीं कि वापस भरा कि नहीं.

birdfeederउनका आपसी भाईचारा ऐसा कि देखते ही बनता था. हम इन्सानों से बिल्कुल भिन्न. काश, हम उनसे कुछ सीख पाते. दरअसल, उस बर्ड फीडर पर एक बार में चार चिड़ियों के बैठने की ही जगह थी. तो चार की ड्यूटी लगती, वो खाती जातीं और नीचे गिराती जाती. बाकी सारी चिड़ियाँ जमीन पर पेड़ के नीचे भीड़ लगा कर उस नीचे गिराये गये दानों में से खातीं. उपर की चारों पारी पारी बदलती जातीं. खाना खत्म. सब उड़ जाती. खाना भरा, उनमें से जो आकर देख जाये, वो सबको खबर कर देती और मिनट भर में सब पचासों की तादाद में फिर इक्कठा.

मगर खुशियाँ कब अकेले आईं हैं.एक दिन देखा तो मुहल्ले की एक बिल्ली ने उनमें से एक चिड़िया को पकड़ कर अपना ग्रास बना लिया. आह्ह!! यह मैने क्या किया. आत्मग्लानी से भर उठा मैं. मेरी ही गल्ती है. लगने लगा मानो मैं ही उन बेचारी चिड़ियों को घेर कर ले आया इस बिल्ली के लिये. मैं ही जिम्मेदार हूँ. मुझे एक अपराध बोध ने आ घेरा. न मैं खाना रखता, न वो निश्चिंत होकर जमीन पर से भोजन कर रही होतीं और न ही ये बिल्ली उसे अपना शिकार बना पाती. अभी आराम से उन्मुक्त गगन में उड़ रही होती.

मन खराब हो गया. विषाद के उन्हीं लम्हों में मैनें तुरन्त बर्ड फीडर हटा लिया. अरे, खाना तो बेचारी कहीं भी पा लेंगी. पहले भी पा ही रहीं थीं. मगर कम से कम मेरे कारण इस तरह से काल का ग्रास बनने से तो बच जायेंगी. मैं सह लूँगा उस पेड़ का सूनापन, ठीक उन बुजुर्गों की तरह जिनके बच्चे अपने कैरियर की तलाश में उन्मुक्त गगन में उड़ चले हैं घर से कहीं बहुत दूर. उन बुजुर्गों को बस यही तसल्ली है कि जहाँ भी हैं, बच्चे खुश हैं और इसी बच्चों की खुशी के लिये तो वे घर के सूनेपन को अपनी जीवनशैली बना बैठे हैं.

हो सकता है कि जंगल में या दीगर जगहों पर भी बिल्लियाँ और अन्य शिकारी पक्षी इन चिड़ियों को अपना शिकार बना रहे हों किन्तु जब यह सब मेरे सामने नहीं होगा तो कम से कम मैं अपराध बोध से मुक्त रहूँगा.

इसी तरह से तो आस पास घटित हो रहे अत्याचारों और कारनामों से नजर फिरा कर हम सभी एक अपराध बोध मुक्त जीवन जी रहे हैं, वरना तो जीना दूभर हो जाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, सितंबर 30, 2007

भूतपूर्व स्वर्गवासी श्री......

जबलपुर में हमारे एक भूतपूर्व स्वर्गवासी मित्र श्री नारायण तिवारी जी रहते हैं. भूतपूर्व स्वर्गवासी सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है मगर वो उपर हो रहे समस्त क्रिया कलापों को इतने आत्म विश्वास और दृढ़ता से बताते हैं कि उनके पूर्व में स्वर्ग मे रहवास पर स्वतः ही विश्वास सा हो जाता है.

हमारे एक और मित्र हैं मुकेश पटेल. ईश्वर की ऐसी नजर कि अच्छे खासे खाते पीते घर का यह बालक अगर किसी भिखारी के बाजू से भी निकल रहा हो तो भिखारी उसे बुलाकर कुछ पैसे दे दे. चेहरे पर पूर्ण दीनता के परमानेन्ट भाव. मानो भुखमरी की चलती फिरती नुमाईश. भर पेट खाना खा कर भी निकले तो लगे कि न जाने कितने दिन से भूखा है. हँसता भी तो लगता कि जैसे रो रहा है.

सड़क पर क्रिकेट खेलते समय जब किसी के घर में गेंद चली जाये तो हम लोग मुकेश को ही भेजा करते थे गेंद लेने. उसे डांटना तो दूर, अगला गेंद के साथ मिठाई नाश्ता कराये बिना कभी विदा नहीं करता था. अपने चेहरे के चलते वह सतत एवं सर्वत्र दया का पात्र बना रहा. होली, दशहरे की चंदा टीम का भी वो हमेशा ही सरगना रहा और हर घर से चंदा मिलता रहा. अब तो उसका बड़ा व्यापार है. बैंक से लेकर इन्कमटैक्स वाले तक सब उस पर दया रखते हैं. आज तक किसी को घूस नहीं दी. बैंक वाले लोन देने के साथ साथ चाय पिला कर भेजते हैं. लोन की किश्त भरने जाते हैं तो बैंक निवेदन करने लगता है कि जल्दी नहीं है चाहें तो अगले महीने दे दीजियेगा. इन्कम टैक्स का क्लर्क भी बिना नाश्ता कराये उन्हें नहीं जाने देता.

जहाँ मुकेश को अपने उपर ईश्वर की इस विशेष अनुकम्पा पर अभिमान था वहीं हमारे भूतपूर्व स्वर्गवासी मित्र नारायण के पास इस स्थिति के लिये भी कथा कि मुकेश का चेहरा ऐसा क्यूँ है.

भू.पू.स्व. श्री नारायण बताते हैं कि वहाँ उपर कई फेक्टरियाँ हैं. भारत की अलग, अमरीका की अलग, चीन, अफ्रीका, जापान सब की अलग अलग. वहीं स्त्री पुरुषों का निर्माण होता है. सबके क्वालिटी कन्ट्रोल पूर्व निर्धारित हैं. अमरीकी गोरे, अफ्रिकी काले, भारत के भूरे आदि. सबकी भाव भंगीमा भी बाई डिफॉल्ट कैसी रहेगी, यह भी तय है. जैसे दोनों हाथ नीचे, पांव सीधे, मुँह बंद आदि. यह बाई डिफॉल्ट सेटिंग है, अब यदि किसी को हाथ उठाना है, तो उसे हरकत एवं प्रयास करना होगा और जैसे ही प्रयास बंद होगा, हाथ पुनः डिफॉल्ट अवस्था में आ जायेगा यानि फिर नीचे लटकने लगेगा.

ऐसा ही चेहरे की भाव भंगिमा के साथ होता है. बाई डिफॉल्ट आपके चेहरे पर कोई भाव नहीं होते. न खुश, न दुखी. विचार शून्य सा चेहरा. अब यदि आपको खुश होना है तो ओंठ फेलाईये, दांत दिखाईये और हा हा की आवाज करिये. इसे खुश हो कर हंसना कहते हैं. जैसे ही आप इसका प्रयास बंद कर देंगे पुनः डिफॉल्ट अवस्था को प्राप्त करेंगे अर्थात विचार शून्य सा चेहरा-बिना किसी भाव का.

कई बार जल्दीबाजी में, जब कन्टेनर रवाना होने को तैयार होता है और कुछ मेटेरियल की जगह बाकी है, तब कुछ लोग जल्दी जल्दी लाद दिये जाते हैं. वही डिफेक्टिव पीस कहलाते हैं. उन्हीं में से एक उदाहरण मुकेश हैं जिनकी हड़बड़ी में चेहरे की डिफॉल्ट सेटिंग दीनता वाली हो गई. उन्हें सामान्य दिखने के लिये प्रयास करना होगा और जैसे ही प्रयास बंद, पुनः डिफॉल्ट अवस्था यानि दीनता के भाव.

यह सारी बातें नारायण इतने आत्म विश्वास से बताते थे कि लगता था वो ही उस फेक्टरी के मैनेजर रहे होंगे जो इतनी विस्तार से पूरी कार्य प्रणाली और निर्माण प्रक्रिया की जानकारी है. तभी तो सब उन्हें भूतपूर्व स्वर्गवासी की उपाधि से नवाजते थे.

उनके ज्ञान का विस्तार देखते हुए एक बार हमने भी जिज्ञासावश प्रश्न किया कि नारायण भाई, आप तो कह रहे थे कि भारत के लिये त्वचा का रंग भूरा फिक्स है. फिर यहाँ गोरे और हमारे रंग के लोग कहाँ से आ गये?

भू.पू.स्व. नारायण जी ने तुरंत अपने संस्मराणत्मक अंदाज में कहना शुरु किया कि दरअसल भारत की फैक्टरी के सुपरवाईजर विश्वकर्मा जी बहुत जुगाड़ू टाइप के हैं. जब पेन्ट खत्म होने लगता है तो कभी तारपीन ज्यादा करवा देते है. sammanpatra
कभी अमरीकी फेक्टरी का और कभी अफ्रिकी फेक्टरी का बचा पेन्ट मार देते हैं मगर मिला जुला कर, जोड़तोड़ कर काम निकाल ही देते हैं. इसीलिये भारत में भी कुछ लोग गोरे पैदा हो जाते हैं और अगर अफ्रिका वाला ज्यादा पेन्ट मार लाये तो तुम्हारे जैसे. किन्तु बाकी ऐसा नहीं करते वो काम रोक देते हैं. इसीलिये अफ्रिका में कभी कोई गोरा नहीं पैदा होता और न अमरीका में काला. इसी से उनकी फैक्टरी भी मटेरियल के इन्तजार में कई कई दिन बंद रहती है तो प्रोडक्शन भी कम होता है. आज तक मटेरियल की कमी के कारण भारत वाली फेक्टरी में काम नहीं रुका. हर साल सबसे अनवरत संचालन का अवार्ड भी विश्वकर्मा जी को ही मिलता है. इसीलिये तो हमारे यहाँ सभी फेक्टरियों में उनकी पूजा होती है.

हम तो सन्न रह गये कि वाह रे विश्वकर्मा जी, आप तो अवार्ड पर अवार्ड लूट रहे हो, जगह जगह पूजे जा रहे हो और खमिजियाना भुगतें हम!! बहुत खूब!


नोट: इस आलेख का उद्देश्य मात्र हास्य-व्यंग्य है. यदि किसी वर्ग या समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँची हो, तो मैं क्षमायाचना करता हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links