हम बाहर बैठे रहे और वहीं अस्पताल की लायब्रेरी से उठाकर फिलिस्तीन की क्रान्ति पर लिखी एक किताब का अध्ययन करते रहे. घर से ही थर्मोकप में ले जायी गई चाय के गरमागरम चुस्कियों के साथ. बरसों चली इस क्रांति का सार दो घंटों में निपटाकर संतुष्टी को प्राप्त हुए-क्या फरक पड़ता है जब बरतन दूसरे घर के फूटे. बल्कि मजा ही आता है और च च च!! जैसा अफसोस भी पूरे सुर ताल में रहता है. लगता है कि आपसे ज्यादा कोई दुखी नहीं..भले ही वो इस क्रान्ति में अपना सर्वस्व लुटा बैठा हो.
डॉक्टर ऑपरेशन करके बाहर आ चुका है. मुझसे बात कर ली है. पत्नी की हालत सामान्य है. एनेस्थिसिया का असर है, अतः होश नहीं है और शायद अगले ४ घंटे लगें जब होश आ पाये. हद है, जिसे होश नहीं है, उसकी हालत सामान्य?? भारत की जनता याद आई, मन मान गया. डॉक्टर में विश्वास जागा मात्र इसलिए कि अविश्वास से कोई फायदा नहीं. वो डॉक्टर ही रहेगा और मैं बीमार या बीमार का परीजन..पुनः मेरा भारतीय होना काम आया. मैं निश्चिंत हो गया. स्थिती से तुरंत समझौता कर लिया.
अगले ३ से ४ घंटे फिर इन्तजार करना था, जब वो कुछ होश में आये और उसे कमरे में स्थानान्तरित किया जाये. मैं अपने लिए एक कॉफी खरीद लेता हूँ-एकदम ब्लैक कॉफी. मूँह मे कड़वहाट भर दे मगर अंतरआत्मा को जगा कर रख दे. सब ऐसे ही जागे हैं मेरे देश में..कितने ही हैं जो मूँह में कड़वाहट भरे पूर्ण जागृत अवस्था का नाटक रचे घूम रहे हैं. मैं भी उनमें से एक हो गया तो क्या?? कौन नोटिस करेगा-और कर भी लेगा तो मेरा क्या हो जाने वाला है, जब लगभग सौ करोड़ का कुछ नहीं हुआ.
खैर, अब चार घंटे काटने के लिए मैने फिर अस्पताल की लायब्रेरी में किताब तलाशी. जहाँ फिलिस्तीन की क्रान्ति वाली किताब वापस रखी (जहाँ से उठाई थी), उसी के बाजू से ’इजराईल का अपना पक्ष’ वाली उठा ली. न जाने क्यूँ, लायब्रेरी हो या किताब की दुकान..दो विरोधी पक्ष आसपास ही क्यूँ जमाती है-क्या झगड़ा लगवाना इनका उद्देश्य है या कुछ और?? दुकान और लायब्रेरी हो या हमारे भारतीय नेता?
निश्चित ही इज़रायली का अपना पक्ष पर लिखी किताब फिलिस्तीन की क्रान्ति पर लिखी किताब से ज्यादा मोटी थी. हो भी क्यूँ न, पैसे वालों का पक्ष, जिन्हें बड़े बड़े गुण्डों का समर्थन हासिल हो, हमेशा़ भारी ही रहता है. फिर यहाँ तो अमरीका का समर्थन हासिल है. उससे बड़ा....कौन?? ज्यादा दस्तावेजी प्रमाणों से लैस. और उसे पढ़ने को मेरे पास समय भी ज्यादा ही था..रहना भी चाहिय..यही प्रभावी और पैसे वालों के प्रति आम शिष्टाचार की मांग भी है.
मेरे पास समय इतना कि लगभग दुगना. शल्य चिकित्सा, मुख्य भाग, में दो घंटे लगे..और रिकवरी में ४ घंटे लगने थे.आप समझ रहे होंगे क्यूँकि सामान्यतः यही होता है हमेशा!!! रिकवरी प्रोसेस हमेशा अपना समय लेती है, पूर्ववत स्थिती में आने को..पूर्ववत स्थिती की अहमियत का अहसास दिलाने.
इजराईल का पक्ष पढ़ा. अन्तरसात किया. जी मतलाया..वोमिट फीलिंग हुई थ्रो आउट वाली-बहुत समय पहले रशियन वोदका बिना जिन्जरेल के पीने पर ऐसा ही महसूस किया था ..मगर इम्प्रेस हुआ..इम्प्रेशन-अच्छा या बुरा..यह कहने वाला मैं कौन..मात्र एक पाठक की मामूली सी हैसियत.कोई आलोचक तो हूँ नहीं...आमतौर पर, पैसे वालों का और पॉवरफुल लोगों का पक्ष इम्प्रेस करता ही है. वो लिखा इसी उद्देश्य से जाता है.
यूँ अगर अलग नजरिये से आप देखना चाहें तो आपकी मरजी. मैं तो बस एक वृतांत पेश कर रहा हूँ पत्नी की ऑपरेशन के दौरान जो दिन गुजरा उसका.
एक नजरिया यूँ ही सही कि ऐसी क्रांति में झेलन पक्ष ( जो आम नजरों में झेल रहा है मगर सही मायनों में झिलवा रहा है) ज्यादा संवेदनशील प्रमाणपत्रों और पक्षों से लैस रहता है. मेरा लड़का है, इसका मेरे पास क्या प्रमाण पत्र होगा मगर अगर और कोई क्लेम करेगा तो वो डी ऎन ए रिपोर्ट से लेकर न जाने कितने फोटोग्राफ्स से लैस होगा कि चक्कर ही आ जायें. पाकिस्तान का हाल नहीं देख रहे हैं कश्मीर के मामले पर?? अब भी कोई प्रश्न है क्या?
क्या सही, क्या गलत!!! किस किस को रोईये..रो ही लेंगे तो खुद ही अपने आंसू पोछिये... छोडिये सब..बस, पत्नी की तबीयत देखिये, वो ही अपनी है..उसी से फरक पड़ता है, बाकि तो बस टाईम पास...चाहे प्रलय आ जाये..किसे बचाने भागियेगा... सोचो कुछई..भागोगे बीबी को बचाने ही न!!
खैर, वो कमरे में आ गई है. वेस्ट विंग का कमरा नं. ४००९. आलीशान कमरा..समृद्ध देश का समृद्ध अस्पताल...और मरीजों के लिए पेश किया खाना..मानो कोई अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन अटेंड कर रहे हों. मरीज के साथ वालों के लिए हाई फाई स्नैक, ज्यूस..और न जाने का क्या क्या विथ डिजर्ट.
उपरी मंजिल पर कमरा. अस्पताल जो एक बहुत विशाल प्रांगण में बना हुआ है..उत्तर में दो मील तक सिर्फ घास का करीने से कटा मैदान..दक्षिण में भी दो न सही डेढ़ मील का तो कम से कम...कमरे से खिडकी से दिखता दक्षिणी छोर...बीच मैदान में एक हैलीपैड..हैलीकाफ्टर से लाये गये मरीजों के लिये-लोहे की जाली से घिरा अहातानुमा... कुछ दूर पर इलेक्ट्रीक रुम और एक अन्य कोने में लगा प्रोपेन टैंक..अस्पताल की गैस सप्लाई के लिए... मैदान के दोनों ओर सड़क.
देखता हूँ सामने वाली सड़क से एक कन्या को मैदान में आते. सोचने लगता हूँ इतनी लम्बी दूरी और पैदल..दूसरी तरफ भी याने उत्तर में दो मील और, तब अगली सड़क पर पहूँचेगी. मैं सोच ही रहा हूँ और वो चलते चलते हैलीपैड का मुआयना करती, हेलिकाफ्टर को निहारती (सोचता हूँ मैं अकेला नहीं हूँ जो हेलिकाफ्टर और हवाई जहाज देखकर आनन्दित हो उठता है), इलेक्ट्रीक हाउस को पार कर, प्रोपेन सिलेंडर से किनारा कर गुम हो गई उत्तर मे..जल्द ही सड़क पा लेगी जो उसकी रफ्तार दिखी. मैं बस सोच ही रहा हूँ तभी उल्टी दिशा में जाता आदमी भी दिख गया..और जल्द ही दक्षिणी सड़क पर पहूँच भी गया. शायद पहला कदम जरुरी रहा होगा और फिर सब फासला तय हो गया.
मैं आल्स्यवश बैठा अस्पताल में, बस सोच रहा हूँ कि कैसे चल लेते हैं यह इतना.
एक स्वास्थ्य के प्रति जागरुक श्रेणी के लोग और एक हम आलसी..बस, सोच की दुनिया में जीते.
शायद यही कारण होगा कि वो दक्षिणी छोर से घुसी और उत्तरी छोर से निकल गई..आस्पताल को पार करती हुई-अस्पताल में रुकने की कोई जरुरत नहीं और हम अस्पताल में बैठे हैं बीमार या बीमार के साथ. जल्दी कुछ इस तरीके का टहलना न शुरु किया तो यहीं लेटे नजर आयेंगे.
कितना अंतर है किसी कथा को लिख देने में और उसे जीने में. टहलना एक आलसी के लिए मनभावन बात नहीं है अतः सरल साहित्य के तहत राही मासूम रज़ा की किताब ’टोपी शुक्ला’ पढ़ने लगता हूँ. कुछ आनन्द का अनुभव होता है टोपी की बातें सुन "तुम मुसलमान हो क्या इफ्फन?- हाँ- और तुम्हारे अब्बू, क्या वो भी मुसलमान हैं?? :)).. बालमन, नादान गहरी बातें और हम सोच की उथली सतह पर ही टहल रहे हैं.
नोट: शायद आप समझ गये होंगे कि मेरी टिप्पणियाँ क्यूँ नहीं दिख रही हैं. कम से कम यह राजशाही की तरफ बढ़ता कदम तो कतई नहीं है, बस एक पारिवारिक जिम्मेदारी है.








