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उम्र के दीप में उनका स्वार्थ -समीर लाल ’समीर’ |
| आज आखर कलश पर भी मेरी दो रचनाएँ प्रकाशित हैं और एक गज़ल मेरे मन की पर अर्चना चावजी द्वारा गाई. |
रविवार, अक्टूबर 31, 2010
पीपल का पेड़
बुधवार, अक्टूबर 27, 2010
लबड़हत्था....
बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता.
पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़ने का सिलसिला शुरु हुआ.
अम्मा हुड़कती कि लबड़हत्थे से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा? (उत्तर प्रदेश में बाँये हाथ से काम करने वालों को लबड़हत्था कहते हैं)
आदत छुड़ाने के लिए खाना खाते वक्त मेरा बाँया हाथ कुर्सी से बाँध दिया जाता. मैं बहुत रोता. कोशिश करता दाँये हाथ से खाने की लेकिन जैसे ही बाँया हाथ खुलवा पाता, उसी से खाता. मुझे उसी से आराम मिलता.
एक मास्टर साहब रखे गये थे, नाम था पं.दीनानाथ शर्मा. रोज शाम को आते मुझे पढ़ाने और खासकर दाँये हाथ से लिखना सिखाने. जगमग सफेद धोती, कुर्ता पहनते और जर्दे वाला पान खाते. ऐसा नहीं कि बाद में और किसी मास्टर साहब ने मुझे नहीं पढ़ाया लेकिन उनका चेहरा आज भी दिमाग में अंकित है.
बहुत गुस्से वाले थे, तब मैं शायद दर्जा तीन में पढ़ता था. जैसे ही स्कूल से लौटता, वो घर पर मिलते इन्तजार करते हुए. पहला प्रश्न ही ये होता कि आज कौन से हाथ से लिखा? स्कूल में दाँये हाथ से लिख रहे थे या नहीं. मैं झूठ बोल देता, ’हाँ’. तब वो मुझसे हाथ दिखाने को कहते और बाँये हाथ की उँगलियों में स्याहि लगी देख रुलर से हथेली पर मारते. उनकी मुख्य बाजार में कपड़े की दुकान थी. पारिवारिक व्यवसाय था. उन्हीं में से थान के भीतर से निकला रुलर लेकर आते रहे होंगे क्यूँकि जिन दो साल उन्होंने मुझे पढ़ाया, एक सा ही रुलर हमेशा लाते.
फिर मैं जान गया कि वो स्याहि देखकर समझ जाते हैं. तब स्कूल से निकलते समय वहीं पानी की टंकी पर बैठ कर मिट्टी लगा धो धोकर स्याहि छुड़ाता और फिर घर आता.
मगर दीनानाथ मास्टर साहब फिर दाँये हाथ पर स्याहि का निशान न पाकर समझ जाते कि कुछ बदमाशी की है. मैं फिर मार खाता.
इसी दौर में मैने यह भी सीख लिया कि सिर्फ स्याहि धोने से काम नहीं चलेगा तो दाँये हाथ की उँगलियों में जानबूझ कर स्याहि लगा कर लौटता. ऐसा करके काफी हद तक मास्टर साहब को चकमा देता रहा और मार खाने से बचता रहा.
फिर जाने कैसे उनकी पहचान मेरे क्लास टीचर से हो गई. फिर तो वो उनसे पूछ कर घर पर इन्तजार करते मिलते. गनीमत यह रही कि परीक्षा में नम्बर बहुत अच्छे आ जाते तो बाँये हाथ से लिखना धीरे धीरे घर में स्वीकार्य होता चला गया और दीनानाथ मास्टर साहब को विदा दे दी गई. हाँ, खाने के लिए फिर भी बहुत बाद तक टोका गया.
उसी बीच जाने कहाँ की शोध किसी अखबार में छपी कि बाँये हाथ से काम करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं और किसी सहृदय देवतुल्य व्यक्ति ने पिता जी को भी वो पढ़वा दिया. पिता जी ने पढ़ा तो माता जी को ज्ञात हुआ. एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया.
तब मैं चाहता था कि वो मेरे बड़े भाई को अब डांटे और मास्टर साहब को लगवा कर उसे रुलर से मार पड़वाये कि बाँये हाथ से लिखो. मगर न जाने क्यूँ ऐसा हुआ नहीं. बालमन था, मैं इसका कारण नहीं जान पाया या शायद मेरी विलक्षणता अलग से दिखने लगे इसलिये उसे ऐसे ही छोड़ दिया होगा. ऊँचा पहाड़ तो तभी ऊँचा दिख सकता है, जब नापने के लिए कोई नीचा पहाड़ भी रहे. वरना तो कौन जाने कि ऊँचा है कि नीचा.
लबड़हत्थों की जमात में अमिताभ बच्चन जैसे लोगों का साथ मिला तो आत्मविश्वास में और बढ़ोतरी हुई और मेरी उस शोध परिणाम में घोर आस्था जाग उठी. काश, उस पेपर की कटिंग मेरे पास होती तो फ्रेम करा कर नित दो अगरबत्ती लगाता और ताजे फूल की माला चढ़ाता.
शोध परिणाम तो खैर समय, जरुरत, बाजार और स्पान्सरर्स/ प्रायोजकों के हिसाब से बदलते रहते हैं मगर अपने मतलब का शोध फ्रेम करा कर अपना काम तो निकल ही जाता. फिर नये परिणाम कोई से भी आते रहते, उससे मुझे क्या?
किन्तु सोचता हूँ क्या इससे वाकई कोई फरक पड़ता है कि आप बाँये हाथ से काम करते हैं या दाँये? फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.
नोट:
सोच रहा हूँ कि जल्दी से इसे लिखकर छाप देता हूँ इससे पहले कि कोई शोध परिणाम ऐसा कहे कि ब्लॉग पर लिखने से इन्सान पागल हो जाता है इसलिए प्रिंट की पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिये. वैसे कुछ कदम इस दिशा में बढ़ते दिखे तो हैं.
रविवार, अक्टूबर 24, 2010
दिल की हिफ़ाजत मैं करने लगा हूँ...
बस ऐसे ही, दो रोज पहले एक मंच के लिए गीत गुनगुनाया तो सोचा सुनाता चलूँ, शायद पसंद आ जाये.
जब से बसाया तुझे अपने दिल में,
दिल की हिफ़ाजत मैं करने लगा हूँ...
नहीं कोई मेरा, दुश्मन जहाँ में
अपनों से खुद मैं, डरने लगा हूँ
जमाना मुझे इक दीवाना समझता
मगर तुमने मुझको हरपल दुलारा
कभी दूर से ही करती इशारा
कभी पास आकर तुमने पुकारा
जीना सिखाया था तुमने ही मुझको
ये मैं हूँ कि तुम पर मरने लगा हूँ...
नहीं कोई मेरा, दुश्मन जहाँ में
अपनों से खुद मैं, डरने लगा हूँ
ऐसा नहीं था कि रहा मैं अकेला
फिर भी न जाने, क्यूँ तन्हा रहा मैं
लहरों ने आकर, मेरा हाथ थामा
फिर भी न जाने, अकेला बहा मै..
सभी मुझको थोड़ा थोड़ा चाहते
मुझे लगता मैं ही बंटने लगा हूँ
नहीं कोई मेरा, दुश्मन जहाँ में
अपनों से खुद मैं, डरने लगा हूँ
किसे प्यार मिलता सच्चा जहाँ में
यहाँ प्यार भी एक, सौदा हुआ है
तुम्हें पाकर मैने इतना तो जाना
दुनिया में सबको ही, धोखा हुआ है.
अभी तक विरह के, गीतों को जाना
नये प्रेम गीतों को, रचने लगा हूँ
नहीं कोई मेरा, दुश्मन जहाँ में
अपनों से खुद मैं, डरने लगा हूँ
-समीर लाल ’समीर’
यू ट्यूब पर यहाँ देखें:
बुधवार, अक्टूबर 20, 2010
नजरों का यकीं...
कमरे में खड़ा खिड़की के बाहर देख रहा हूँ एकटक. वो नहीं दिखता जो बाहर है. नजर बस टिकी है लेकिन दिख वो रहा है जो मन में है. एक उड़ान मन की. विचारों की. कुछ उधेड़बुन तो कुछ धुंधली तस्वीरें हल्के भूरे रंग की. रंग भरा समय भी कैसे वक्त की मार झेल झेल कर बदरंग हो जाता है.
एक बार अपना सिर हल्के से झटकाता हूँ. खिड़की के बाहर हरियाली लिए सब स्थिर है. शायद हवा न चलती होगी. बंद खिड़की के कांच से हवा का अहसास भी पत्तियों की हलचल से होता है. वो न होती तो पता भी न चलता. सर्दियाँ आयेंगी, बर्फ़ जमीन पर कब्जा जमा कर बैठ जायेगी. पत्तियाँ बुरे वक्त में कहाँ साथ देती हैं? छोड़ कर चल देंगी फिर से बेहतर मौसम आने तक के लिए. अच्छे हालातों में ही अपने भी साथ देते हैं.
ऐसे में काँच के भीतर से झांकते हुए मैं भी भला कहाँ जान पाऊँगा कि हवा चल रही है या थमी. ठीक उन पेड़ों की सांसो की तरह-कौन जाने चलती भी होंगी या थम गई.
बिना पत्तों के ठंड की मार झेलते पेड़ों के ठिठुरते बदन खुद का अस्तित्व बचायें या मुझे हवा का पता दें. गर्दन उठाये बेहतर मौसम की आस में फिर अपनों के वापस आने का इन्तजार ही शायद उन्हें उर्जा देता होगा इस मार को झेल जाने की वरना तो हट्टा कट्टा इन्सान भी अगली सांस के इन्तजार में दम तोड़ दे और वो सांस सर्दीली मार में जमी, चाह कर भी लौट न पाये.
जब पत्ते लौटेंगे तो उनके बीच घिर खुशियाँ मनाते ये पेड़ भूल जायेंगे उस दर्द को, उस तकलीफ को जो इन्होंने इन्तजार करते झेली है और पत्तियाँ उन्हें सुखी देख कुछ समय साथ बिताएंगी, फिर विदा ले लेंगी अगली मौसम की मार अकेले झेलने को छोड़ कर.
यूँ सुनी थी एक कविता उस व्यक्ति की जो निर्वस्त्र एक सर्दीली रात काट देता है नदी के इस छोर पर उस पार जलती चिता से उगती आग की तपन सोच कर..
खिड़की से झांक
देखता हूँ वो
जो दिखता नहीं...
शायद
देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें
कि
नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा
-जाने क्यूँ?
--समीर लाल ’समीर’
रविवार, अक्टूबर 17, 2010
गुलाब का महकना...
आज यहाँ रविवार है. भारत के लिए निकलने से पहले ऐसे तीन रविवार ही मिलेंगे अतः व्यस्तता चरम पर है. आज कविता पढ़िये:
बुधवार, अक्टूबर 13, 2010
गीली पोली जमीन...
पैर से लिखने की ख्वाहिश है, उन इबारतों को, जिन्हें हाथ लिखने को तैयार नहीं. ख्वाहिशों को कब परवाह रही है किसी भी बात की. न ही उन्हें स्थापित नियमों से कुछ लेना देना है. डोर से टूटी पतंग, उड़ चली जिस ओर हवा बही. कभी पूरब तो कभी पश्चिम. कभी उपर तो कभी नीचे. क्या रंग है, क्या रुप है- इससे बेखबर. बस, एक बेढब बहाव और अंत, वही किसी मिट्टी में मिल जाना, खत्म हो जाना. तसल्ली ये कि किया मन का.
लिख डालने की कोशिश में जमीन पर गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से चन्द उघाड़े अक्स, कुरेदी हुई कुछ लकीरें आड़ी तिरछी. शाम की बारिश अपने साथ सब बहा कर ले गई. बस बच रही सिर्फ, एक मिट्टी की सतह. क्या जाने?.. इन्तजार करती भी होगी या नहीं-चन्द नई इबारतों का. उलझी हुई, किसी को न समझ आ सकने वाली. हाथों की बेवफाई को कुछ पल को ही सही मगर धता बताती ये ख्वाहिश, मानो बिटिया हाथों में बर्फ का नारंगी गोला लिये इतरा रही हो. धूप मुई बच्चों को भी कहाँ बख्शती है? बिटिया का इतराना भी बरदाश्त न हुआ और पिघला कर रख दिया उसका नारंगी बर्फ का गोला. वो नादान गोले की लकड़ी लिए चुसती रही घंटो उसे.
याद करो तो आज भी पैर का अंगूठा अनायास ही कालीन में जाने क्या कुरेदने लगता है. हाथ आज भी तैयार नहीं उस इबारत को लिखने के लिए जिसमें वो नाम जुड़े. वफाई बेवफाई का दिल आदी हुआ पर हाथ. वो मान में नहीं. दिल नाजुक और हाथ सख्त. एक ही शरीर के हिस्से. व्यवहार इतना जुदा.
उसी आंगन में खेलते थे दो भाई. एक ही खून के/ माँ के जाये. कब आंगन की अमराई दीवार में बदली, जान ही नही पाये. एक ही दिशा में निकलते/ एक ही मंजिल पत जाने को लेते-- दो जुदा रास्ते. आंगन एक से दो हुआ. दो चूल्हे बस धुँओं की राह मिलते. मिल जाते आसमान में जाकर और फिर बरसते बादल बन आँसूओं की धार की तरह और पौंछ जाते वो सब इबारते जिन्हें आज हाथ लिखने को राजी नहीं मगर अँगूठा कुरेदता है हर पोली और गीली मिट्टी को पा कर बेवजह. कहीं दिल की कोई टीस होगी जो पैर के अँगूठे के माध्यम से चीखती होगी और वो अनसुनी चीख मिल जाती होगी मिट्टी में बहते हुए बरसाती पानी के साथ.
दाग होते हैं दिल में गहरे गहरे जो किसी एक्स रे से नहीं दिखते. बस होते हैं अहसासों के मानिंद. अजब से दाग जिनका रंग नहीं होता बल्कि स्वाद होता है- कुछ मीठे तो कुछ खट्टे. महसूस करती है जुबान उस भीतर से उठते स्वाद को.
पत्नी आलू, मटर, पनीर की सब्जी बनाने की तैयारी करती. त्यौहार मनाने की खुशी और मैं उन उबले आलूओं में से एक उबला आलू किनारे रखवा देता हूँ. जाने क्यूँ आज पांच सितारा सब्जी के बदले उबले आलू फोड़ उसमें नमक और लाल मिर्च बुरक कर पराठें के साथ खाने का मन हो आया. छुटपन में जब नानी के घर जाते तो अम्मा रेल में पराठे और उबले आलू लेकर चलती. पैर का अँगूठा पोली मिट्टी तलाशता है डाईनिंग टेबल के नीचे सबकी नजर बचाता. वुडन फर्श है शायद कोई फांस गड़ गई है नाखून में. एक चीख सी उठने को है, दबा ली तो आँखें चुगली करने को तैयार. लाल मिर्च बुरकते आलू में सने हाथ से आँख पौंछ लेता हूँ.
दोष लाल मिर्च को मिला.
बच्चों की हँसी, पत्नी का आँख में फूँकना और...
फिर गीली पोली जमीन की अनवरत तलाश!
आज रात भर
बारिश होती रही.
उनकी
अलिखित इबारतें
पौंछने की फिराक..
और
पैर से लिखने की
ख्वाहिश लिये..
बिस्तर पर लेटा
नींद से
आँख मिचौली खेलता..
मैं.
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, अक्टूबर 10, 2010
प्यार तुम्हारा इक दिन..
एक बार भारत यात्रा के दौरान एक कवि सम्मेलन में शिरकत कर रहा था. एक कवि महोदय ने गीत प्रस्तुत किया. उसकी धुन मुझे बहुत पसंद आई और कई दिनों तक जेहन में गुँजती रही. फिर उसी धार पर मिसरा लिया और रचा अपना गीत. बहुत बार तो मंच से सुना चुका लेकिन फिर वही. ब्लॉग पर खोज रहा था तो पता लगा कि आप सबको तो पढ़वाया ही नहीं. तो आज वो ही सही:
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं..
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
तनहा तनहा सर्दीली भीगी रातों में
विरह अगन से बदन मेरा जल जाता है
बरसाती आँधी वो जब जब भी चलती है
महल हमारे सपनों का फिर ढह जाता है
मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, अक्टूबर 06, 2010
सात समुंदर पार आती गली.....
सब कहते कि वो गली मेरे घर आकर खत्म हो जाती है. मैने इसे कभी नहीं माना. मेरे लिए वो गली मेरे घर से शुरु होती थी.
लोग कहते कि गली का आखिरी मकान मेरा है और उसके बाद गली बन्द हो जाती है. मेरा हमेशा मानना रहा कि गली का पहला मकान मेरा है और वहीं से उसके बाद दूसरों के मकान शुरु होते हैं.
कोई उसे कहता कि श्रीवास्तव जी की, यानि हमारी गली, तो कोई सामने के मकान वाले तिवारी जी की गली, नुक्कड़ पर कुठरिया में रहने वाले घुन्सू चमार की गली तक भी मैं लोगों के कहे का बुरा नहीं मानता मगर जब कोई इसे खज़रे कट्खन्ने कुत्ते वाली गली कहता, तो मेरा खून खौल उठता.
खज़रा कटखन्ना कुत्ता- कालू. बस, एक बार पाण्डे जी के बेटे को काटा था उसने, वो भी तब जब उसने उसकी पूँछ पर से साइकिल चला दी थी. अब तो कालू को मरे भी जाने कितने साल गुजर गये थे मगर लोग-गाहे बगाहे मेरी गली को खज़रे कट्खन्ने कुत्ते वाली गली कह ही देते हैं.
मेरे लिए वो गली मेरे घर से शुरु होती है. वहीं मैं पैदा हुआ और होश संभाला. वो गली आकर बाजार में जुड़ती और फिर बाजार की सड़क से होती हुई राजमार्ग पर और फिर सीधे शहर में. शहर मुझे विदेश ले आया उस गली से शुरु होकर. वो गली मेरे लिए विदेश तक आती है. लौट लौट कर मैं उस तक जाता हूँ. कभी सच में मगर रोज - यादों में, सपनों में.
माँ मायके से आई और गली में समा गई. हाँ, उसके लिए गली हमारे घर पर समाप्त होती थी..वो जो उस घर में आई तो आँख मींचे ही निकली वहाँ से. उसे गली ने शमशान ले जाकर छोड़ा मगर वो तो माँ ने देखा नहीं. वो तो बस डोली में बैठकर आई थी इस घर में. दो बाँस और चार काँधों वाली सवारी कहाँ ले जाती है, सब जानकर भी नहीं जान पाते हैं जब खुद की सवारी निकलती है.
सामने वाले तिवारी जी मकान बेच कर अपने बेटे के पास शहर चले गये. मकान खरीदा वर्मा जी ने मगर गाँव ने कब भला माना इसे..वो मकान आज भी स्टेट बैंक वाले तिवारी जी का मकान कहलाता है. क्या पुराने और क्या नये- लोग अब भी उसे तिवारी जी की गली कहते हैं. कब मिटती हैं ऐसी पहचानें?
बहुत बदला गाँव. बिजली आई, नहर खुदी, एक सिनेमा बना. सरकारी स्कूल खुला. अस्पताल खुला. कई कुत्तों नें कई लोगों को काटा. सूखा पड़ा. बाढ़ आई. हैजा फैला. गली रुकी रही. मेरे लिए "श्रीवास्तव जी की गली"- मेरे साथ विदेश तक आई.
बचपन में पढ़ी उस भूत की कथा याद आई जिसका हाथ बड़ा होता जाता था दूर का सामान पकड़ने को. गली, जो मेरे घर से शुरु हुई, (और अब भी वहाँ है) मेरे साथ इस विदेशी गोरों की घरती पर भी आई. अजनबियों के इस देश में मेरा साथ निभाती आधी रात के अंधेरों में ढाढस बँधाती. एक तार को जोड़ती - बचपन से अब तक.परिवार के साथ. कुछ दूर न लगता.
एक दिन लौट जाना है - उस छोर पर जहाँ से गली शुरु हुई है. रास्ता याद दिलाती, यही तो दिली इच्छा है मेरी. मेरी ही क्यूँ..हर उस शक्स की जो गली से शुरु होकर दूर तक चला आया है.
सोचता हूँ क्या गली मुझे यहाँ लाई या मैं गली को?
गली चली या मैं ?? ..
रोशन जगमगाहट रोकती है और लालटेन की टिमटिमाती लौ बुलाती है.
पशोपेश में हूँ. फिर लौटने की चाह और रुके रहने की मजबूरी के बीच झूलता मैं.
वो
पिछवाड़े के दरवाजे पर
रात गये
तेरा छ्म्म से आना...
मुस्कराना
रोना
और
फिर बिछड़ जाना...
अब तो सब
सपनों की बातें हैं....
क्या तुम जानती हो....
मेरे साथ आज भी
वो रातें हैं...
-समीर लाल ’समीर’
सोमवार, अक्टूबर 04, 2010
गाँधी जी का जन्म दिवस समारोह मॉन्ट्रियल में
शुक्रवार से कुछ आवश्यक कार्यवश मॉन्ट्रियल जाना हुआ और आज याने सोमवार की शाम लौट कर आये. यही वजह हुई कि सोमवार सुबह की पोस्ट नहीं आ पाई. वो अब परसों ही आयेगी. मॉट्रियल यात्रा के दौरान ब्रोसार्ड सिटीहॉल के सामने स्थापित गाँधी जी की प्रतिमा स्थल पर गाँधी जी का जन्म दिवस का समारोह में शामिल होने का अवसर मिला, जिसमें वहाँ की मेम्बर ऑफ पार्लियामेन्ट से लेकर सिटी कॉन्सलर्स और डिप्टी मेयर एवं भारतीय समुदाय के अनेक लोग उपस्थित थे. उसी अवसर की कुछ तस्वीरें प्रस्तुत कर रहा हूँ.
इस पूरे कार्यक्रम के कर्ताधर्ता श्री उमाशंकर श्रीवास्तव थे, जिन्हें इस प्रतिमा को स्थापित कराने का भी श्रेय जाता है. उन्हीं के प्रयासों के चलते आज क्यूबेक के एसेम्बली हॉल में भी गाँधी जी की प्रतिमा स्थापित है. समारोह के उपरान्त समोसा, गुलाबजामुन, बर्फी आदि के स्वल्पाहार के साथ विदा ली गई.
बुधवार, सितंबर 29, 2010
मैं, अंधेरों का आदमी!!!
बचपन, खेल खेल में जुगनू पकड़ कर शीशी में बंद कर लिए. ढक्कन में एक छेद भी बनाया कि वो सांस ले सकें. सुबह को देखता था उन जुगनुओ को. कोई चमक न दिखती तो बंद अलमारी के अंधेरे में ले जाकर देखता. रात तीन बंद किये थे, अब बस एक चमकता था धीरे धीरे. वहीं अलमारी में उनको रखकर जब देर शाम लौटा तो उनमें से कोई भी नहीं चमकता था. सुबह उठकर देखा, तीनों मर गये. आज रात फिर नये पकड़ूंगा, सोच कर उनको बोतल से निकाल कर बाहर फेंक दिया.
बचपन की नादानी. सोचता कि जाने कैसे मर गये. छेद भी किया ढक्कन में सांस के वास्ते. सिर्फ सांस लेना ही जिन्दा रहने के लिए काफी नहीं.
कुछ यादों के जुगनू तुम्हारे खतों की शक्ल में डायरी में मोड़ कर रख दिये थे. अब अंधेरा हैं. वो चमकते नहीं, अलमारी के भीतर भी नहीं. हालांकि अलमारी के भीतर हो या बाहर, क्या फरक पड़ता है. अँधेरा तो बराबर से है. ट्यूब लाईट की रोशनी कई बार चीख चुकी मगर ये जिद्दी अँधेरा, हटता ही नहीं. डटा है जस का तस.
सबने लूटा जहां मेरा
फिर भी कोई कहाँ मेरा...
-खोजता फिरता हूँ पता उसका...
अँधेरे में बस यूँ ही टटोलते. कुछ हाथ नहीं आता.
कुछ टेबल से गिर कर टूटा अभी छन्न से. वो कहती कि कांच का टूटना अशुभ होता है.
मैं सोचता गिलास टूटा है, कांच तो कभी टूटता नहीं, बस, रुप बदल जाता है. टुकड़े टुकड़े. होता फिर भी कांच ही है. वो भला कब टूटा है. फिर क्या शुभ और क्या अशुभ. मैं भी टूटा कब, बस टुकड़ो में बटा.
वस्ल कहते हैं:
अपने अंदर ही सिमट जाऊँ तो ठीक
मैं हर इक रिश्ते से कट जाऊँ तो ठीक.
तब एक शायराना ख्याल:
सभी चाहते हैं यहाँ मुझे थोड़ा थोड़ा
मैं ही कई टुकड़ों में बट जाऊँ तो ठीक...
झपट कर कुछ पकड़ा तो है. हाथ आया मुट्ठी भर और अँधेरा. एक टुकड़ा अँधेरा और जुड़ गया हिस्से में मेरे.
डायरी से निकाल कुछ मुर्दा खत उस अँधेरी आग के हवाले कर देता हूँ. कुछ नई यादें पकड़ूंगा फिर से. कुछ मरे जुगनू मिले, चमकते ही नहीं. मरे जुगनू चमका नहीं करते. एक खत हाथ लगा. लिखती हो ’खुदा ने चाहा तो फिर मिलेंगे’. एक चमक बाकी हैं कहीं. सब कुछ लुट जाने पर भी एक उम्मीद की किरण, हल्की हल्की चमकती, सांस तोड़ती. अब शाम का इन्तजार भी नहीं. सपने मर रहे हैं.
अबकी नासमझी है कि खुदा के चाहने से कुछ होगा. खुदा गिरफ्त में है पंडो की और भगवान मौलवियों के चुंगल में लाचार. सौदा हो भी जाये तो एक छेद से कब तक सांस लेकर बच रहेंगे. आज वायदा बाजारी में सौदागरों का महत्व है, उन्हीं का बोलबाला, सौदे का नहीं. आर्टिफिशियल कमोडिटी की चमक दूर तक जाती है.
अँधेरे में पतंग उड़ाने की ख्वाईश है कंदील लटका कर. कंदील नजर आती रहे, पतंग न दिखे तो भी क्या. मन बहलता है.
एक कविता लिखूँगा तेरे नाम की आज शाम और शीर्षक रखूँगा-अँधेरा.
झपट कर पकड़ता हूँ
हवा से
कुछ....
फिर
जोड़ लेता हूँ
एक मुट्ठी
अंधेरा और...
अपनी जिन्दगी के खाते में...
-मैं, अंधेरों का आदमी!!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, सितंबर 26, 2010
एक अलग अनुभव...
मगर न उसे मानना था, न माना. जिद पकड़ली कि कुछ तो लिखो. नहीं पसंद आयेगा तो फिर किसी और को ट्राई करेंगे. फिर चाय का दौर चला और मैं अपना लेपटॉप लिए कुछ कुछ टाईप करने की कोशिश करता रहा और वो फोन पर किसी के साथ सीरियल की रुपरेखा बनाने में व्यस्त था. चाय खत्म होते होते, मैंने कुछ पंक्तियाँ उसे दीं और और उसके म्यूजिक डायरेक्टर को दिखाई. उसने उसे गा कर मित्र को सुनाया और बस, यही फायनल है...सुनकर लगा कि जाने क्या होगा इस सीरियल का.
घर आ कर पत्नी को बताया. जरा सा टूं टां करके साऊन्ड ट्रेक पत्नी को भी बताया..उसी को आधार बना कर उसने गुनगुनाया है, आप भी पढ़ें और सुनें..साथ ही वो गीत जो उस सीरियल बनाने वाले मित्र के जेहन में गूँज रहा था और वो टुकड़ा जो उसने मुझे सुनाया था लिखने के लिए:
जाना, दूर नहीं जाना
जाना, दूर नहीं जाना
मुझसे बिछड़ के
दूर नहीं जाना
जाना, दूर नहीं जाना
बीती हुई रातों मे
दूर हुये थे तुम
भीगी हुई बारिशों में
भीग रहे थे तुम..
गिर के संभलने को
मेरा हाथ थामा.
जाना..मेरा हाथ थामा.....
जाना!!!!!! मेरा हाथ थामा....
जाना, दूर नहीं जाना
मुझसे बिछड़ के
दूर नहीं जाना
जाना, दूर नहीं जाना
रीती हुई जिन्दगी मे
गीत रहे हो तुम
तन्हा सफर में भी
मीत रहे हो तुम
तेरी हर अदा का
दिल हुआ दिवाना
जाना...दिल हुआ दिवाना
जाना, दूर नहीं जाना
मुझसे बिछड़ के
दूर नहीं जाना...
-समीर लाल ’समीर’
नोट: पोस्ट शायद हिन्दी सिनेमा से जुड़े ब्लॉगर्स का ध्यान आकर्षित करे इस प्रतिभा की ओर, यही एक मात्र कोशिश है. :)
साधना का गुनगुनाना:
वो गीत जो निर्माता के दिमाग में गूँज रहा था:
बस, आज इतना ही:
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बुधवार, सितंबर 22, 2010
एक अंश- ट्रेलर ही समझिये!!
संभल कर चलाना
जीवन की इस गाड़ी को
जरा सी चूक
और
कोई भी टकराहट
संबंधों की..
बड़ी से बड़ी कीमत
चुकाने के बाद भी
छोड़ जाती है
अपने निशान..
जो नासूर बन दुखते हैं
पूरी यात्रा में..
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, सितंबर 19, 2010
तुझे भूलूँ बता कैसे
बुधवार, सितंबर 15, 2010
जिन्दा सूखा गुलाब...
हरि बाबू, टूटती काया, माथे पर चिन्ता की लकीरें, मोटे चश्में से ताकती बुझी हुई आँखें, शायद ८४ बरस की उम्र रही होगी. हर दोपहर अपने अहाते में कुर्सी पर धूप में बैठे दिखते मानो किसी का इन्तजार कर रहे हों.
दो बेटे हैं. शहर में रहते हैं और हरि बाबू यहाँ अकेले. निश्चित ही बेटों का इन्तजार तो नहीं है, क्योंकि हरि बाबू जानते हैं कि वो कभी नहीं आयेंगे. बहु और बच्चों के लिए हरि बाबू देहाती हैं, तो इनके वहाँ जाने का भी प्रश्न नहीं. फिर आखिर किसका इन्तजार करती हैं वो आँखें?
उम्र की मार के कारण हरि बाबू की स्मृति धोखा देती है, पर बेटों से थोड़ा कम. आसपास देखी घटनायें ४-६ दिन तक याद रह जाती हैं. कुछ पुरानी यादें भी और कुछ पुरानी बातें भी, कुछ टीसें-नश्तर सी चुभती. इतना सा संसार बना हुआ है उनका जिसमें वो जिये जा रहे हैं. यही आधार है उनका और उनकी सोच का.
अकेले आदमी की भला कितनी जरुरतें, खुद से थोप थाप कर एक दो रोटी, कभी गुड़ तो कभी सब्जी के साथ खा लेते हैं और अहाते में बैठे-बैठे दिन गुजार देते हैं. बोलते कुछ नहीं.
जब नहीं रहा गया तो एक दिन उनके पास चला गया. पूछ बैठा कि ’चाचा, किसका इन्तजार करते हो?’
हरि बाबू पहले तो चुप रहे और फिर धीरे से बोले,’देश आजाद हो जाता तो चैन से मर पाता.’
मैं हँसा. मैने कहा कि ’चाचा, देश तो आजाद हो गया…. देश को आजाद हुए तो ६३ बरस हो गये. सन ४७ में ही आजाद हो गया था.’
देश तो आजाद हो गया…. सुनते ही एकाएक हरि बाबू के होंठों पर एक मुस्कान फैली और चेहरा बिल्कुल शांत.
हरि बाबू नहीं रहे.
चलते चलते:
देखता हूँ जब
उस अँधेरे कमरे की
खिड़की पर रखा
बुझी लौ लिए एक दीपक,
जिन्दा सूखे हुए गुलाब
फंसे हुए गुलदस्ते में
और उस कोने वाली
दीवार से
टिका
टूटे तारों वाला
सितार....
तब दिखती है
इक रोशनी
उठती हुई दिये से
सुनाई देती है एक धुन
तारों से झंकृत
और
महक उठता है
गुलाब की खुशबू से
मेरा तन-मन!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, सितंबर 12, 2010
कुछ शामें और आज का दिन
मालूम तो था ही कि आ रहे हैं मगर कहाँ और कब मिलेंगे, यह आकर बताने वाले थे.
गुरुवार की सुबह बात हुई कि शुक्रवार की शाम को ७ बजे सिनेमा देखकर फुरसत होंगे, तब आ कर ले जाईये. टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भारत से पधारे हमारे चव्वनी चैप (छाप नहीं) ब्लॉग के मालिक अजय ब्रह्मात्मज को लेने हम पहुँचे घर से ८० किमी दूर, यही विचारते कि अभी खाना खिलवाकर फिर छोड़ने यहीं आना है फिर ८० किमी. ५ बजे शाम से रात १२.३० बजे के बीच हमारी ३६० किमी की ड्राईविंग किन्तु मिलकर इतना आनन्द आया कि पता ही नहीं चला.
८ बजे उनको घर लेकर पहुँचे और फिर जमीं महफिल हमारे बार में. कुछ जाम छलके, अनेको विषयों से लेकर ब्लॉगिंग और फिल्मों की बात चली, भोजन किया गया और फिर उनको होटल छोड़ आये. यादगार शाम थी. अपनी पुस्तक भी उसी दौर में उन्हें टिका दी. कह गये हैं कि पढ़ेंगे. :)
मुलाकात की कुछ तस्वीरें:
फिर कल शाम अनूप जलोटा जी के साथ गुजरी. एक से एक भजन सुने गये. नई बात जो देखने में आई वो यह कि आजकल उन्होंने भी बीच बीच में कुछ चुटकुले जोड़ना शुरु कर दिया है जिसे पब्लिक ने खूब मस्त होकर सुना. साथ ही चामुंडा स्वामी जी का प्रवचन भी था. तो कल की शाम भी मजेदार गुजरी. उनके चुटकुले की एक बानगी.भजन तो आप यू ट्यूब पर यूँ भी सुन सकते हैं.
आज सुबह से ही एक मित्र के घर जाना हो गया बार-बे-क्यू का इन्तजाम, शहर से १०० किमी दूर. अभी लौटे.
शाम अजय भाई भारत वापस निकल गये. फोन से बातचीत हो गई. उन्होंने हमारी तारीफ की, हमने उनकी. बाय बाय हो गई. अभी वो हवाई जहाज में होंगे.
ये सब इसलिए सुनाया कि इन सब के बीच कुछ लिखने का मौका नहीं लगा, तो आज ये ही. :)
तो आज के लिए:
चाहता
तो लिख देता
एक कविता
तुम्हारे लिए
लेकिन
जब कविता
कुछ कह न पाये
तब सोचता हूँ
बेहतर है
चुप रह जाये!!!
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, सितंबर 08, 2010
नीरो बाँसुरी बजाता है...
गुजरा वक्त लौट कर नहीं आता फिर भी सताता बहुत है.
अवसाद में न घिर जाऊँ इसीलिए डायरी नहीं लिखता. पहले लिखता था. बंद कर दिया. कई बार कलम उठाई, फिर रख दी.
एक गुलाब तोड़ लाया था बगीचे से. कांटा चुभ गया. कुछ देर गुलाब महकता रहा फिर मुरझा गया. ऊँगली में कांटा चुभने का दर्द बना रहा. मुरझाया फूल फेंक दिया. ऊँगली में जहाँ कांटा गड़ा था, उसे छूकर देखा, तेज दर्द बना है. आँख से एक छोटी सी बूंद लुढ़क चन्द लम्हों में दम तोड़ती है. दर्द कुछ कम तो हुआ.
कुछ ही पन्ने लिखे हुए डायरी के. पन्ने भूरे से हो गये हैं. ज़िल्द की प्लास्टिक उखड़ने को है. अब नहीं लिखता डायरी वरना तो ज़िल्द कब का उखड़ गया होता. क्या लिखा है याद नहीं. पढ़ने का दिल भी नहीं.
डायरी से इतर कुछ घटनायें जेहन में कहीं अंकित हो गई हैं. सबको बसेरा चाहिये. बेहतर होता डायरी में लिखकर संदूक में बंद कर देता. जेहन पर अंकित हैं तो साथ साथ घूमती हैं हर वक्त.
जेहन पर अंकित हर्फ धुँधलाते नहीं. सफ्हे भी उजले के उजले.
हर की पौड़ी- हरिद्वार. गंगा आरती. कुछ यादें दोने में जला कर बहा देता हूँ. दूर जाते देखता हूँ उन्हें. बह गईं? भ्रम है शायद. पाप पुण्य बहते नहीं. पंडा अपने हिस्से के पैसे ले गया. प्रसादी में पेड़ा. ज्यादा मीठा खाकर मूँह में कसैलापन भर जाता है.
रेल भागी जा रही है. दरवाजे पर खड़ा अंधेरे में झांक रहा हूँ. दूर गांव में टिम टिम बत्ती. वो भी पीछे छूटती.
नीरा नाम है उसका. सामने की बर्थ पर. अम्मा ने उसे पुकारा, तो मैं जान गया. वो, उसकी अम्मा और बाबू जी. अगले स्टेशन पर तीनों उतर गये. कौन सा स्टेशन? क्या पता-कोई गांव, अंधेरे में नाम ही नहीं दिखा.
खिड़की से आती हवा सर्द है. कोई बड़ा स्टेशन आने को है. चाय पीने का मन है.
कौन से झौंके के साथ नींद आई-आँख खुली तब ट्रेन मेरे स्टेशन पर रुक रही है.
गरमा गरम चाय..चाय गरम. नहीं ली.
रिक्शे वाला बुढ़ा है, धीरे धीरे चल रहा है.
तिवारी जी टहलने निकल पड़े हैं. उनकी लड़की का नाम भी नीरा है.
डायरी मैं अब नहीं लिखता, कहीं अवसाद से घिर न जाऊँ.
नारंगी सूरज निकल रहा है. घर पर क्यारी में एक गुलाब ऊगा है-लाल रंग का.
ऊँगली को हल्का सा दबा कर देखता हूँ वहाँ जहाँ कांटा गड़ा था, दर्द नहीं है फिर आँख से ये बूंद कैसी?
रविवार, सितंबर 05, 2010
अक्सर दिल करता है मेरा
| अक्सर दिल करता है मेरा चलूँ, बादलों के पार चलूँ चलूँ, उन पहाड़ों के पार चलूँ चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ -समीर लाल ’समीर’ |
यहाँ सुनिये:
बुधवार, सितंबर 01, 2010
ओ यारों ये इंडिया बुला लिया...मानो उल्लू बुला लिया!!
पहले दिवाली में गुनिया लोग उल्लू बुलाया करते थे याने वो मंत्रों और तन्त्रों की सहायता से उल्लू को इंसानों की आवाज में बुलवा लेते थे और अपने जंतर सिद्ध किया करते थे. अक्सर सुना करता था कि फलाने गुनिया नें उल्लू बुला लिया और सिद्ध हो चला.
कभी एक्चूवल उल्लू को इन्सानों की आवाज में बोलते तो नहीं देखा और न ही उसे इन्सानो सी हरकत करते देगा है यद्यपि कई इन्सानों को उल्लू की हरकत करते तो हमेशा ही देखता आया हूँ मगर फिर भी जब भी सुना कि किसी गुनिया ने उल्लू बुला लिया तो फिर क्या कहना उस गुनिया का. मानो उसकी किस्मत खुल गई. उसी गुनिया से सब उपाय पूछें हर परेशानी का. लोगों की परेशानी हल हो या न हो मगर उसने उल्लू बुला लिया तो उस पर पैसों की बरसात तय है. उसकी परेशानी तो हल हुई ही समझो.
आज कॉमन वेल्थ का थीम सॉन्ग सुना तो न जाने क्यूँ उस गुनिया वाली बात की याद हो आई जबकि उसका इससे कुछ लेना देना नहीं है.
कल जब यह गीत सुन रहा था तो मुझे एक बार फिर कवियों पर गुस्सा आया. न जाने क्या सोच कर गीत लिखते हैं कि सामने वाला गीत पढ़ेगा या उनका दिमाग? जाने क्या चल रहा होता है दिमाग में और उसे शब्द दे देते हैं, फिर यह आप पर छोड़ देते हैं कि चलो अब लगाओ इसका अर्थ अपने हिसाब से.
मेरा इतना सा निवेदन करने का मन करता है कि जो भी दिमाग में हो वो लिख दो, फिर उसे कविता के फार्म में सुना देना याने कविता लिखो तो भावार्थ के साथ. जो भाव तुम्हारे मन में हो. हम पर मत डिपेन्ड करो कि हम अटकल लगायें.
बचपन से हिन्दी की पर्चा हल करते करते यह गुस्सा एक एक बूँद बन कर भरता चला आया है. वो मुझे डर है कि यह बूँद बूँद कर बचपन से भरता गुस्सा किसी दिन ज्वालामुखी की शक्ल में न फट पड़े. खैर, अभी तो थामे हैं.
हर परीक्षा में होता था कि फलाने कवि की इन पंक्तियों का भावार्थ संक्षिप्त में बताईये और हम लगे हैं पास होने के जुगाड़ में अपनी अटकल को शब्द देने में. वो तो कविता लिखकर रोयल्टी खा पी कर किनारे हो लिए और पसीने हमारे निकल रहे हैं. अधिकतर तो स्वर्गवासी ही होते थे, अतः पूजनीय भी और उनके चक्कर में हम पहले मास्साब से लात खा रहे होते थे और फिर पिता जी से. जाने क्यूँ पाठयपुस्तक में छपने के पूर्व अधिकतर स्वर्गवासी हो लेते थे, शायद यह हमारे संस्कारों और संस्कृति का भावार्थ हो कि स्वर्गवासी को बड़ा सम्मान मिलता है. जिन्दा रहने पर भले कोई आपको सुने न सुने, मरते ही पहले तो पदवी स्वर्गवासी की और फिर आपके बताये मार्ग पर चलना ही सच्ची श्रृद्धांजलि.
इस गीत को सुन कर भी वही भावार्थ वाली बात दिमाग में आई. अपनी अटकल लगाने का सिलसिला शुरु हुआ. अब आप कॉपी जाचों तो पता चले कि सही के आसपास है कि नहीं. कवि तो फैशन के हिसाब से भावार्थ देने से कतरा ही लिए. थीम और लोकेशन के ज्ञान से उन कविताओं का अर्थ निकाला करते थे तो सो ही यहाँ भी किया.
ओ यारों ये इंडिया बुला लिया
-देखा न?? कैसा बेवकूफ बना कर बुला लिया जबकि हमारी तो तैयारी पूरी है ही नहीं, बस दिखावे के लिए फटाफट लीपापोती में जुटे हैं और रही खेल की बात, तो वो तो हमें खेलना आता ही नहीं. ओलम्पिक से लेकर किसी भी टूर्नामेन्ट का रिकार्ड उठा कर देख लो, हम अपने मूँह से क्या कहें? हमारे पास तो खिलाड़ी ही नहीं है जो जीत सकें..जो जीत सकने लायक तैयार होते हैं वो मॉडलिंग में चले जाते हैं. आजकल हमारे यहाँ खेल के लिए मेहनत कर अच्छा प्रदर्शन करना मॉडलिंग और ग्लैमर की दुनिया में सिक्का जमाने पहुँचने का राजमार्ग है और उतने तक ही अच्छा प्रदर्शन सीमित है. फिर भी देखो, कैसे सब के सब को बुला लिया मानो सबसे बड़े तीस मार खाँ हम ही हैं.
तभी तो कह रहे हैं: यारो, बुला लिया. खैर तुम्हें बुला तो न सिर्फ खेलों के लिए लिया बल्कि:
दीवानों ये इंडिया बुला लिया
सारे होटल, बार, डिस्को सजवा दिये हैं और यहाँ तक की कोठे भी ठीक करवा लिए. ढेरों एस्कार्ट वेब साईटें लॉन्च कर दीं..हिन्दुस्तानी से लेकर विदेशी तक, हर रेट रेन्ज में सरकारी सहमति से इन्तजाम है. दीवानों चले आओ..
दीवानों ये इंडिया बुला लिया
ये तो खेल है, बड़ा मेल है
-ये वो खेल है जिसमें पूरे मेल जोल के साथ एवं संपूर्ण खेल भावना के साथ, सब ठेकेदार, नेता, अधिकारी रह रहे हैं, खा रहे हैं, पी रहे हैं..ऐश कर रहे हैं...
मिला दिया..
पूरे भारत की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया..मिला रहे हैं. पूरा विश्व जान रहा है कि भारत का सदी का सबसे बड़ा घोटाला इसी कॉमन वेल्थ (साझा संपति) के माध्यम से हो रहा है..इतना ही नहीं, फिर से कहा...
मिला दिया………….
मिला दिया न मिट्टी में पूरे भारत की तरक्की का सपना भी इज्जत के साथ साथ. हे हे, मिला दिया..ले ठेंगा, जो करना हो सो कर लो..सब मिले हैं, सबको मिला लिया..सबको मिला दिया..तुम कुछ नहीं कर सकते..बस गीत सुनो..सुरबद्ध..रहमान की आवाज में..
रूकना रूकना रूकना रूकना रूकना नहीं
रुकना मत..सुनते रहो..अभी समय बाकी है..अभी तो हम और खायेंगे..रुकेंगे नहीं..मना किया है - रुकना नहीं..खाते चलो..अभी समय बचा है. बाद में ऐसा मौका हाथ नहीं लगेगा..बस, एक महिना और...
हारना हारना हारना हारना हारना नहीं
जो हारा वो बेवकूफ कहालायेगा..उसने एक करोड़ बनाया, तुम दो करोड़ बनाओ और जीत जाओ..यही होड़ है सब अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों में....हारना मत..जीतना ही ध्येय है. जीत कर दिखा दो...हारना नहीं..
चलो न सिर्फ
सिर्फ चलते रहने से कुछ न होगा..साथ साथ कमाते चलो...चलो न सिर्फ..याने कमाओ भी...खाओ भी..खिलाओ भी...पैसा खिलाओ, दावत खिलाओ..शराब पिलाओ..मजे कराओ..खूब कमाओ..मगर सिर्फ चलो नहीं.
करो न सिर्फ
काम सिर्फ दिखावे को करो कि काम चल जाये...बाद किसने देखा है. सिर्फ करते रहे तो करते ही रह जाओगे..मैदान मारो...लगे कि काम कर रहे हो मगर तुम तो याद रखो कि अपना ही नहीं, अपने परिवार और आने वाली पुश्तों का इन्तजाम कर रहे हो..
मैदान मारो !!
मैदान मार गये तो बाद में कोई कुछ नहीं पूछने वाला वरना पछताओगे...यहाँ तक कि जो पकड़ायेंगे वो वहीं होंगे जिन्होंने मैदान नहीं मारा होगा मारना तो दूर देखा भी न होगा.. पूछ उसी की होगी जो मैदान मार जाये. हमेशा मैदान मारा ही विजेता कहलाता है...एक बार मैदान मार लो फिर
Lets go
Lets go
- Lets go to Switzerland...वहीं जमा करा देंगे. घूम भी लेंगे. सेकेन्ड हनीमून भी मना लेना..वहाँ के जमा पैसे की चर्चा भले ही कितनी भी हो जाये मगर होता जाता कुछ नहीं...बस, Lets go..हल्ला मचता रहेगा कि पैसा वापस आ रहा है..आयेगा जायेगा कुछ नहीं..इत्मिनान से जमा कराओ...
जियो, उठो, बढ़ो, जीतो
जियो, उठो, बढ़ो, जीतो…..
यही काम आयेगा...सारी दुनिया कहेगी जियो..जब जेब में पैसा होगा...वैसे भी बिना पैसे कैसे जिओ..बेकार है..फिर जब पैसा हो तो उठो..तब भला बैठेगा कौन..जब बैठना नहीं है तो बढ़ो.. बढ़ चल बेटा पैसे भर कर जेब में...तभी तू जीता कहलायेगा...कहता हूँ न जीतो..तब जियो..वरना मरा हुआ तो बाकी का हिन्दुस्तान है ही..उनके लिए थोड़ी न है कि
ओ यारों ये इंडिया बुला लिया
--ये सिर्फ उनके लिए है जिन्हें हमने बेवकूफ बना कर बुला लिया है..अपना काम बन गया अब हारे या जीतें...मगर शुभकामना तो दे ही सकते हैं कॉमन वेल्थ गेम्स की.
इसीलिए तो इस बार नहीं कहा ’ जय हो’ ..खुद को तो हम जानते ही हैं. बेवकूफ बनाते हैं, बेवकूफ हैं नहीं.
पूरा गाना तो और भी है मगर इतना ही काफी है कम्पलीट बात समझ आने को. पूरा पढ़ना चाहो तो यहाँ क्लिक कर लो, मगर इससे ज्यादा निष्कर्ष क्या निकालोगे??
-अब क्या है भई, सुनना भी है गाना तो लो सुनो:
नोट: यह भावार्थ मेरी दिमागी अटकल के हिसाब से है. हो सकता है गलत हो और मुझे बचपन याद आ जाये जीरो अंक प्राप्त करके.
रविवार, अगस्त 29, 2010
चकमित पत्नी!!
एक दिन अजय , हमारे एक मित्र मिले. फुटबाल का मैच देखने आये थे. एक आँख दबा कर मुस्कराते हुए अजय ने खुलासा किया कि पत्नी से छिपा कर आया है. पत्नी से कह दिया है कि दफ्तर का काम है. यह बात अजय ने पूरे मैच के दौरान अलग अलग विषयों पर छिड़ी बातचीत के दौरान तीन बार बताई.
वहाँ हम सब मिलाकर करीब पाँच मित्र थे और हमारे एक मित्र विकास पत्नी से अनुमति न मिल पाने के कारण नहीं आये थे. अजय ने विकास को शिद्दत से अव्वल दर्जे का बेवकूफ ठहराया और कहा कि उसे अकल ही नहीं है कि पत्नी को कैसे चकमा देना है. हालांकि यह अकल तो हममे भी नहीं है किन्तु चूँकि हम वहाँ मौजूद थे, अतः इस इल्जाम से बच गये.
अगले दिन विकास मिला तो हमने उसे अजय के बारे में भी बताया कि कैसे वो पत्नी को चकमा देकर आया था, तुम भी क्यूँ नहीं कुछ तरीके सीखते कि ऐसे मौको पर निकल सको? वरना तो सीधे सरल तरीके से कौन सी पत्नी अकेले किसी को दोस्तों के साथ मौज मनाने जाने देगी. विकास बोला कि जब तुम लोग मैच देखने गये थे तो अजय की वाईफ तो हमारे घर आई थी और मेरी पत्नी से उसने पूछा भी कि भाई साहब मैच देखने नहीं गये अजय के साथ?
पता नहीं कौन किसको चकमा दे रहा है मगर अजय यह सोचते रहे कि उन्होंने पत्नी को चकमा दे दिया और उधर पत्नी जानबूझ कर चकमित रही.
वैसे इस बात के लिए महिला शक्ति को नमन करता हूँ (यूँ तो हर बात के लिए करता हूँ) कि भगवान और भारतीय पुलिस के बाद यदि कोई है जो जब तक खुद न चाह ले, आप उससे छिपा कर कुछ नहीं कर सकते, तो वो सिर्फ माँ और पत्नी ही है. अकसर हम प्रफुल्लित होते हैं, शादी के पहले माँ को बेवकूफ बना कर और शादी के बाद पत्नी को किन्तु यकीन जानिये वो सिर्फ आपका आत्मविश्वास और सम्मान बरकरार रखने के लिए बेवकूफ बनती है वरना वो पूरी बात तब ही जान चुकी होती है जिस वक्त चकमा देने के विचारमात्र आपके दिमाग में जनम लेता है.
वही हाल तो भारतीय पुलिस का है. चोरी और अपराध तो बहुत बाद में होते हैं मगर उसकी पूरी खबर इनको पहले से होती है. अगर ये ठान लें तो अपराध हो ही नहीं सकते.
भारतीय पुलिस कानून की मर्यादा एवं संविधान का सम्मान एवं उन सबके उपर अपनी उपरी कमाई बनाये रखने के लिए मेरी बात से जरुर इन्कार करेगी और वो ही हाल माँ और पत्नियों का होगा जो एक पुरुष की मर्यादा का सम्मान एवं उसका अह्म भाव बरकरार रखने के लिए इस बात को शायद न मानें, मगर है तो ऐसा ही.
तो अगली बार जब माँ या पत्नी को चकमा देने का ख्याल मन में आये तो याद रखना और एक बार सोच कर देखना कि कौन किसको चकमा दे रहा है और किसने किसको बेवकूफ बनाया.
अब ये देखो बेचारे ने कैसे आँसूं बहाते हुए प्रीत की पाती लिखी है.
चलो, इसी बात पर गज़ल के नाम पर एक चकमा :) बताना जरुर कि चकमा दे पाया कि नहीं वरना फिर उपर भारतीय पुलिस, माँ और पत्नी के साथ हिन्दी ब्लॉगर भी शामिल किया जाये:
मंत्र कुछ सिद्ध जाप लें तो चलें
तिलक माथे पे थाप लें तो चलें
सुनते हैं बस्ती फिर जली है कोई
चलो हम आग ताप लें तो चलें
मिली है पांच साल को कुर्सी
नोट दिन-रात छाप लें तो चलें
जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं
कफन ख़ुद अपना नाप लें तो चलें
आम लोगों में अब रहें क्यूँ ’समीर’
पाल आस्तीं में सांप लें तो चलें
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, अगस्त 25, 2010
शीर्षक की तलाश!
एक किताब का शीर्षक तलाश रहा हूँ कि क्या रखूँ?
वैसे तो कुछ फार्मुले पता चले हैं बेस्ट सेलर बनाने के. कहते हैं इसके लिए शीर्षक का बहुत महत्व है. वही तो सबसे पहले आकर्षित करता है पाठक को किताब खरीदने के लिए.
मुझे समझाया गया कि शीर्षक कभी सीधा मत रखो वरना न तो किताब कोई खरीदेगा और न ही कोई आपको साहित्यकार मानेगा.
उदाहरण देते हुए उन अनुभवी सज्जन (साहित्यकार)(बेस्ट सेलर) ने बताया कि जैसे अगर उपन्यास का नाम मम्मी (Mummy) या बहन(Sister) रखो तो कौन खरीदेगा भला. शीर्षक को happening बनाओ. जैसे मम्मी की जगह लिखो, माई फादर्स वाईफ (My Father's Wife) और बहन की जगह माई मदर्स डॉटर (My Mother's Daughter).
पड़ोसन लिखने में वो बात कहाँ जो नेबर्स वाईफ लिखने में है.
याद आता है कि यूँ भी गुलाब लिख देने पर जेहन में अक्स लाल गुलाब का ही उभरता है मगर ’लाल गुलाब’ लिखने की बात अलग है. एकदम स्पष्ट.
अब चूँकि किताब तो छपवानी ही है और हिन्दी में भला क्या बेस्ट सेलर-दो चार बेच लो तो कम से कम अपने पेड प्रकाशक के तो बेस्ट सेलर हो ही लिए. विश्व के न सही, देश के ही सही, वरना प्रदेश, शहर, मोहल्ला, कहीं के तो हो ही लेंगे, तब क्यूँ न ऐसा ही कुछ भड़कीला शीर्षक तलाशा जाये. आखिर संतोषी जीव हैं.
वैसे बाँये हाथ से लिखता हूँ तो ख्याल आया था कि ऐसा कुछ रख दूँ: ’बाँये हाथ में लड़खड़ाती कलम’ या ’उल्टे हाथ में सीधी कलम’- कैसा रहेगा?
आप सोच रहे होगे कि भई, कहानी तो बताओ जिसका शीर्षक रखना है..कैसी बातें पूछते हैं आप? उनसे कुछ तो सीखो जो पुस्तक की प्रस्तावना या पुस्तक के बारे में दो शब्द (चार पन्नों में) तक बिना पुस्तक पढ़े या देखे लिख डालते हैं. मुद्दा इतना है कि आप उन्हें कितना जानते हैं.
तो कहानी- उसकी चिन्ता न करें. एक पैराग्राफ शीर्षक आधारित कहीं भी एडजस्ट करके जस्टीफाई कर देंगे, आप तो बस जरा तड़कता भड़कता शीर्षक बताओ और यह गज़ल पढ़ो. महावीर ब्लॉग पर कुछ समय पूर्व छप चुकी है.
अकेले चले हो किधर धीरे-धीरे
युं ही क्या कटेगा सफ़र धीरे-धीरे
दुआओं की खातिर किये थे जो सज़दे
सभी को दिखेगा असर धीरे-धीरे
पिलाई है तुमने जो आँखों से मदिरा
चढ़ेगी वो बन के ज़हर धीरे-धीरे
रहूँगी मैं ज़िंदा सजन बिन तुम्हारे
चलेगी ये सांसें मगर धीरे-धीरे
नहीं मैंने सोचा, जुदा तुमसे होकर
कि बरपेगा ऐसा क़हर धीरे-धीरे
उसे बोलते हैं नज़र का मिलाना
खुशी से मिली हो नज़र धीरे-धीरे
कभी तो कहो प्यार से बात मन की
बना लो मुझे हमसफ़र धीरे-धीरे
-समीर लाल ’समीर’



















