बुधवार, मार्च 09, 2016

वो शहर जो अब नहीं है..



सभी शहर मध्य प्रदेश का हरसूद नहीं हुआ करते.. जो नदी में डूब में आकर अपना अस्तित्व
खो दें...कुछ शहर यूँ भी खो जाते हैंबेवजह!!

जीने के लिए सोचा ही नहींदर्द संभालने होंगे
मुस्कुराये तोमुस्कुराने के कर्ज उतारने होंगे
मुस्कुराऊ कभी तो लगता हैजैसे होठों पे कर्ज रखा है
तुझ से नाराज नहीं जिन्दगीहैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं….

मेरे मुर्दा सपनों के उस शहर मेंकहीं दूर बजते रेडिओ से इस गीत के अलावा और उम्मीद भी कोई क्या कर सकता होगा..कान में रुई ठूँस कर आवाज को बेखबर जाने देने का विकल्प सपनों के शहरों में उपलब्ध नहीं होता..आँख मुँदी रहे..पता भी न हो कि हम कहाँ है ..और ये गीत...
सपने में एक खीज उतरजाती है...घर में मैं रेडीओ नहीं बजाता... वो अपनी पसंद के गाने सुनाता है..और मुझे अपनी पसंद के सिवाय दूसरों की पसंद के गाने सुनना मंजूर नहीं..मैं अपने अहम में जीने वाला..किसी दूसरे की पसंद को अपना बनाऊँ ...मेरे लिए संभव नहीं...आज तक यूँ ही किया है...यूँ ही जिआ है...बदनाम हुआ कि नहीं.. पता नहीं..मगर इसी तर्ज पर जिन्दगी को मैं जिन्दगी का नाम देता आया हूँ..कम से कम अब तक...
मैं युधिष्टर नहीं...कि कल की बात करुँ..
हारा हूँ जब भी मैने अपवाद पाले..कुछ अपने उसी अपवादों में अपनी जगह बनाते रहे..और मैं छलावे की उस दुनिया में खुद को बादशाह समझ बैठा...बादशाह का आदेश है पालन हो...वाली सोच में जीता वो हिस्सा...हासिल आया एक लम्बे गुमान के बाद सिफर..खाली हाथ मलता मैं..आकाश वाले चाँद को मचलता मैं..
उकडूँ बैठ खुद के घुटनों में अपना मूँह छुपा...सिमट कर खुद को खुद में खो देने का अहसास..सिर्फ वो जान सकता है..जो इस हादसे से गुजरा होखो जाना तब.. जबकि सबको पुकारता रहा मैं तड़प कर ..ओ मेरे अपने...ओ मेरे अपने....सुनो न मेरे अपने..और किवदन्तियों में मांडू की उस रानी रुपमति के महल से बादशाह बाज बहादुर की पुकार की लौट कर आती वो गूँज...रुपमति..रुपमति... किवदन्ति हारती नजर आई मुझे...ओ मेरे अपने की पुकार के साथ..तब वो मेरे अपने खो जाते हैं और नहीं लौटती है कोई आवाज..
मेरी पुकार चित्कार का रुप लेकर मर जाती है..शायद, बस शायद किसी को उद्वेलित करती हो कौन जाने.. मगर मांडू का वो महल ..धीरे से मुस्करा कर एक अवसाद में डूब जाता है मेरे गम को अपना समझ...चित्कार की मंजिल बस ऐसी ही होती है...काश!! चित्कार हुंकार हो पाये...
मगर तुम.. तुम मेरी चित्कार को अनसुना कर...खोये रहे अपने बनाये और खुद के गढ़े तर्कों के महल में..जो कम से कम तुम्हारे मन को तो तसल्ली बक्श ही गये होंगे कुछ और थोड़ा सा बचा वक्त जिन्दगी की इस बहती दरिया में..जिन्दगी के साथ गुजार देने को..और मैं साहिल पर खड़ा..देखता हूँगा तुम्हारे उस वजूद को उसी दरिया में डूबता..जिसे मैने अपना जाना था बेवजह...अपने स्वभाव में अपवाद बना..
अपवाद ही अवसाद की वजह बनते हैं इस जिन्दगी में..तब जाकर जाना हमने...
आँख बमुश्किल लगती है इतनी ऊहापोह भरी जिन्दगी में...तो सपने आ जगा देते हैं उन्हें...
खुली आँख सपने जागते हुये..यादों का पूरा पिटारा होते हैं..खास कर चुभती और सालती यादों का...
उनसे भाग कर फिर आँख मूँद सोने की नाकाम कोशिश...सोई आँख के सपने तिल्समी दुनिया में ले जाकर..एक अनजाना खुशनुमा अहसास दे भी जायें शायद...उम्मीदें कब पूरी होती है भला इस तरह की?
लेकिन आँख को ऐसे वक्त में सो जाना कहाँ मंजूर..हार जाता है इन्सान..अगर ऐसी राहों से गुजरा हो...
हारे हुए इन्सान का पूरा वजूद हारता है और जीते हुए का बस अहम जीतता है..अजब विडम्बना है!!
खुली आँख सपनों में..पिटारा उन यादों का...रोज बिखरता है...उसमें तुम होते हो..मैं होता हूँ..और खोया हुआ वो शहर...जो अब नहीं है...
स्टेशन के पत्थर पर लिखा नाम मेरे उस शहर का पता तो हो सकता है मगर..
वो शहर नहीं...जिसे मैं याद करता हूँ!!
वो शहर...
अब नहीं है...

फोटो: साभार गुगल

समीर लाल समीर


Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2016

नमस्कार का चमत्कार

कुछ लोग नमस्कार करने में पीर होते हैं और कुछ नमस्कार करवाने में. नमस्कार करने वाले पीर, चाहे आपको जाने या न जाने, नमस्ते जरुर करेंगे. कुछ हाथ जोड़ कर और कुछ सर झुका कर, शायद उनको मन ही मन यह शान्ति प्राप्त होती होगी कि अगले को नमस्ते किया है और उसने जबाब भी दिया है याने वो पहचानने लगा है और साथ वालों पर उसकी पहचान की धाक पड़ेगी.
नमस्कार करवाने वाले पीर, सीधे चलते चलते, इतना स्टाइल में धीरे से सर को झटकते हैं और कभी कभी सिर्फ आँख को कि मानो आपको नमस्ते कर रहे हों और जब आप पलट कर नमस्ते करते हो तो इतनी जोर से जबाबी नमस्ते करते हैं जैसे कि पहल आपने की हो. अक्सर वो अपनी वापसी नमस्ते के साथ हाल भी पूछते नजर आ जाते हैं कि कैसे हो? और बिना जबाब सुने आगे भी बढ़ चुके होते हैं अगले नमस्ते के इन्तजार में. इस केटेगरी में नेता बनने की पहली पायदान पर खड़े बहुतेरे शामिल रहते हैं और उससे उपर की पायदान वाले तो इसी पायदान से गुजर कर निकले हैं तो उनकी तो खैर आदत हो गई है.
वैसे नमस्कार, प्रणाम, चरण स्पर्श आदि पहले कभी आदर, अभिवादन के सूचक रहे होंगे किन्तु समय के साथ साथ मात्र पहचान और नाम जमाने की औपचारिकता मात्र रह गये हैं. नेताओं को उनके चेले इतनी तत्परता से चाचा कह कर चरण स्पर्श करते हैं जितनी जोर शोर से उन्होंने अपने चाचा की तो छोड़ो, कभी अपने पिता जी का भी न किया होगा.
इन नेताओं के चेलों को भी पता होता है कि चाचा को चरण स्पर्श करवाना कितना पसंद है. अतः जब आप जैसे किसी को उनसे मिलवाने ले जाते हैं तो आपकी रीढ़ की हड्डी का जाने कौन सा हिस्सा, चाचा से मिलवाते हुए, पीछे से दबाते हैं कि आप थोड़ा सा झुक ही जाते हो और चाचा, एकदम से, खुश रहो के आशीष के साथ पूछते हैं –बोलो, काम बोलो. कैसे आना हुआ?
और इन सबके आगे एक जहाँ और भी याद आता है. पहले हम किसी को पसंद करते थे और पसंद पसंद करते प्यार कर बैठते थे. याने किसी को लाइक करना लव करने की पहली पायदान होती थी..तब के जमाने में लड़का लड़की को, लड़की लड़के को लाइक करके धीरे धीरे लव तक का सफर पूरा किया करते थे. अब तो खैर लड़का लड़की का फार्मूला भी आवश्यक न रहा. कोई भी किसी को लाइक करके लव तक का सफर कर सकता है.
ये सब दुनियावी बातें अब सड़क से उठकर इन्टरनेट पर आ पहुँची है मगर व्यवहार वैसा का वैसा ही है. मगर यहाँ लाइक, मात्र लव का गेट वे न होकर नमस्कार, प्रणाम और चरण स्पर्श आदि सबका पर्याय बन चुका है.
फेसबुक पर यदि कोई आपकी फोटो को, लिखे को या पोस्ट को लाइक करे तो कतई ये न समझ लिजियेगा कि उसे आप बहुत पसंद आ गये...आपका फोटो फिल्म स्टार जैसा है और आपका लेखन बहुत उम्दा है...इनमें से अधिकतर ने तो उपर बताई किसी एकाध वजह से पसंद किया होता है और वो भी चूँकि फेसबुक एक क्लिक मात्र में लाइक कर की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है - बस इससे ज्यादा कुछ भी नहीं. अन्यथा यदि लिखकर बताना होता कि आप को लाइक किया है तब देखते की कितने सही में लाइक करते हैं.


अब आप ही देखिये, वो तो एक एक करके सौ जगह पसंद बिखरा कर चले गये मगर जब इन सौ लोगों ने जब पलट नमस्ते में इनकी तस्वीर या पोस्ट लाइक की, तो वहाँ एक साथ सौ लाइक दिखने लगे और जनाब हो लिए सेलीब्रेटी टाईप. ऐसे लोग आपको लाइक करने तभी आते हैं जब इन्होंने अपनी टाईम लाईन पर कुछ नया पोस्ट किया हो और उन्हें लाइक की दरकार हो.
इनका संपूर्ण दर्शन मात्र इतना है कि मैं तेरी पीठ खुजाता हूँ, तू मेरी खुजा!!
इन फेसबुकिया लतियों को इन लाइकों से वही उर्जा प्राप्त होती है जैसी इन फूहड़ चुटकुले बाज कवियों को तालियों से, इन छुटभय्यिया नेताओं को भईया जी नमस्ते से और इन सड़क छाप स्वयंभू साहित्यकारों को सम्मानित होने से भले ही उस सम्मान को कोई जानता भी न हो!!
आप देख ही रहे हैं कि आपसे उर्जा प्राप्त किए इन कवि सम्मेलनों की हालत, इन छुटभय्यिये नेताओं की हरकतें और साहित्यिक सम्मानों के नाम पर गली गली खोमचेनुमा दुकानें. ध्यान रखना, यह समाज के लिए कतई हितकर नहीं है.
तो जरा संभलना, जहाँ फेसबुक पर लाइक करना एक लत बन जाती है वहीं यह अपने आपको सेलीब्रेटी सा दिखाने का नुस्खा भी है.
इसका इस्तेमाल अपने विवेक के साथ करें वरना इस लत से आपका जो होगा सो होगा मगर समाज का ये स्वयंभू सेलीब्रेटी बंटाधार करके रख देंगे.

-समीर लाल ’समीर’
Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 24, 2016

प्रभु जी सुन लो अरज हमारी


प्रभु अपने भक्तों का उद्धार करने भारत भूमि पर अपनी नाम पताका लहरा रहे हैं. लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं. प्रभु का इस तरह अवतरित होना कोई संप्रदायिकता वाली बात  नहीं है और न ही इसे हिंदुत्व से जोड़कर देखना चाहिये.
हर बात जिसमें अच्छे दिन नजर आयें, वो संप्रदायिक ही हो, ऐसा जरुरी तो नहीं.
नए नए युग पुरुषों के शंखनाद से सारा वातावरण गुंजायमान है. एक नए युग की घोषणा हो चुकी है.
इस प्रभु में आस्था रखना, इस  प्रभु से संपर्क स्थापित करना, इस  प्रभु से कुछ मदद मांगना, यह हर एक प्राणी का अधिकार है, अब यह मात्र हिन्दुओं का अधिकार नहीं रहा. आप मुसलमान हों, इसाई हों, यहूदी हों, इससे कोई फर्क नहीं पडता. इस प्रभु से आशीष माँगने के लिए और अपनी समस्या का समाधान कराने के लिए ना तो अब आपको मंदिर जाने की ज़रूरत है, ना कोई यज्ञ या अनुष्ठान कराने की. ना कहीं तपस्या करने जाना है, ना व्रत उपवास, ना पंडितों की चिरोरि, ना कोई तीरथ धाम.
प्रभु से अपनी मनोकामना पूरी कराने के लिए बस आपको भारतीय रेल से यात्रा करना है. फिर  किसी भी प्रकार की समस्या जैसे बच्चे के लिए दूध और बिस्कुट, बीमार के लिए दवाई, गुंड़े या शराबियों से प्रतारणा निवारण, असहाय को सहायता, प्रसव पीड़ा या अन्य कोई पीड़ा हो तो तुरंत प्रभु को ट्विटर पर याद करिये और चन्द मिनटों में आपकी समस्या का मात्र समाधान ही नहीं हो जायेगा वरन आप अगले दिन के समाचार पत्र की सुख्रियों में भी नजर आयेंगे कि कैसे प्रभु ने चुटकियों में आपकी मनोकामना पूर्ण की.
आपको अहसास भी न होगा कि जिस समस्या को आप इतनी बड़ी मान रहे थे वो प्रभु की शरण में जाते ही कैसे चुटकियों में हल हो गई. प्रभु रेल मंत्री से ज़्यादा भगवान नज़र आने लगे हैं. ट्विटर रेल मंत्रालय से परे प्रभु से सीधा सूत्र स्थापित कराता है और प्रभु सब काम छोड़कर अपने भक्तों याने रेल यात्रियों की समस्याओं का त्वरित निवारण करने में लगे है. न रेल प्रसाशन का जिक्र और न मंत्रालय से कुछ लेना देना. बस भक्त की समस्या ओर प्रभु का वरदान. सीधा सीधा डायरेक्ट कनेक्शन.
पुराने ज़माने में लोग घर द्वार छोड़ कर भूखे प्यासे जंगलो में वर्षों तपस्या करके भगवान से जो वरदान पाते थे वो अब भारतीय रेल से मात्र प्रभु को ट्वीट भेज कर प्राप्त हो जाता है. वैसे भी भारतीय रेल में यात्रा करना किसी तपस्या से कम तो नहीं फिर प्रभु क्यूँ न करें मनोकामना पूर्ण.
यूँ देखा जाये तो कार्य अति उत्तम है बस प्रभु भगवान का रुप धारण किये इतना याद किये रहें कि वो सच्ची मुच्ची वाले भगवान नहीं हैं जैसे लक्ष्मी मैया सदा धन का डिपार्टमेन्ट देखती रहेंगी शास्वत सत्य की तरह. कल को ये प्रभु शायद रेल मंत्री न रहें या उनकी सरकार सत्ता से बाहर हो जाये तो भी यात्री जब प्रभु को ट्वीट करे तो उसे यूँ ही वरदान मिलता रहे. कहीं बेचारे भक्त को रिकार्डिंग न मिलने लगे कि प्रभु अब रेलवे के भक्तों के बदले एच आर डी के भक्तों की सेवा में लगे पुस्तकें और मिड डे मील पहुँचा रहे हैं. आप कृप्या रेलवे वाले नये प्रभु को ट्वीट करिये और वरदान पाईये या अब प्रभु विपक्ष में बैठे हैं और आपके ट्वीट को मुद्दा बना कर सरकार को हालाकान करेंगेआपका आभार मुद्दा भेजने के लिए- मस्त मुद्दा भेजे हो.
वैसे सोचा जाये तो अब भला इससे ज़्यादा अच्छे दिन और क्या आ सकते है.
बोलो जयकारा !!
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा।
कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
-समीर लाल 'समीर '

फोटो: गुगल साभार
Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 28, 2015

जिल्द इक किताब का...

दो काल खण्ड
इस जीवन के
और उन्हें जोड़ता
वो इक लम्हा
जो हाथ पसारे
लेटा है इस तरह
दोनों को समेटता
मानिंद जिल्द हो
मेरी जिन्दगी की
किताब का!!

-समीर लाल ’समीर’


Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 18, 2015

टैटू पसंद लड़की



वो टैटू पसंद लड़की
चिपका लाती
दायें गाल पर तिरंगा
और
बायें गाल पर 
चाँद सितारा हरियाली
वो करवट बदलती
कि
बदल जाती जमाने की नजर!!
सहम जाती
वो टैटू पसंद लड़की!!

-समीर लाल ’समीर’
Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, सितंबर 21, 2015

सम्मानित साहित्यकार्स!!

एकाएक सन २००५ के आस पास हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाले अवतरित हुए.. और फिर तो सिलसिला चल पड़ा..रचनाओं के रचित होने का...लोगों को प्रोत्साहित करने का लिखने के लिए..आप भी लिखो. बोल लेते हो तो लिख भी लोगे. जैसे फिल्म देख कर घर लौटने पर फिल्म की कहानी सुनाते हो न..वैसे ही लिख कर सुनाओ. बस इतना सा निवेदन किया था और लोग उसे बड़ी गंभीरता से ले गये और टूट पड़े लिखने लिखाने में.
और इन रचनाओं को पढ़ने वाले भी वो ही होते थे जो लिखने वाले होते थे. पढ़ना मात्र मजबूरी होती थी कि पढ़ कर कुछ कमेंट कर दें तारीफ में तो बंदा भी हमें आकर पढ़ेगा और कमेंट करेगा. इस प्रक्रिया को उस वक्त कहा जाता था कि तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊँ.
अब इस लिखने पढ़ने की होड़ में, हम दूसरे लिखने वाले से बेहतर कैसे दिखें? कैसे साबित करें कि हम तुमसे बेहतर रच रहे हैं. तब लोगों ने अपने ब्लॉग पर छपी कहानियों और कविताओं के अखबार में प्रकाशित हो जाने की खबरों को जोर शोर से उछालना शुरु किया.
अखबार वालों की भी पौ बारह हो निकली. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आये. न पैसा देना और न पूछना..जो पसंद आया..कट पेस्ट किया और अखबार में छाप दिया. मेहताना मांगना तो दूर..छपा ब्लॉगर उस अखबार की तस्वीर छाप छाप कर फूला न समाता कि हम तो बड़े साहित्यकार हो लिए..अखबार वाले छापने लगे.
ऐसे में जो अखबार में नहीं छप पाते वो ऐसी सूचनाओं की पोस्टों के कमेंट में आकर आपत्ति उठाते कि अखबार वाले चोर हैं ..बिना पूछे छाप देते हैं. आप उन पर मुकदमा करिये और अपना मेहताना माँगिये. छ्पा बंदा भी जानता था कि ये अगला मात्र खीज उतार रहा है, अतः इतना सा बस जबाब देता कि आप ठीक कह रहे हैं. देखते हैं.
धीरे धीरे समय के साथ साथ जब ब्लॉगरों का यह गुमान उन्हें भ्रमित कर यह विश्वास दिलाने लगा कि वो साहित्यकार हो गये हैं और आने वाले युग के वो ही प्रेमचन्द हैं और वो ही निराला. तब तो मानो जलजला सा ही आ गया. अब की बार खुद को बेहतर साहित्यकार प्रूव करने के लिए पुरुस्कारों और सम्मानों का दौर चला..और ऐसा चला कि अब तक चला आ रहा है.
जितने साहित्यकारों को ब्लॉग जन्म देता गया, उससे कई गुना ज्यादा सम्मान और पुरुस्कार जगह जगह जन्म लेते चले गये. नये नये पुरुस्कारों के नाम पता चलने लगे. नये नये शहरों के नाम पता चले जहाँ ये सम्मान समारोह आयोजित होते रहे. कमाल ये था कि अधिकतर सम्मान ऐसे थे जो पहली बार सुने गये और फिर कभी आगे सुनाई भी नहीं दिये मानों जैसे सिर्फ इन्हीं के लिए ऊगे थे और इन्हीं का सम्मान करके डूब गये.
samman
यूँ भी अगर ध्यान से सोचिये तो सम्मानित होने की प्रक्रिया में दो लोगों का ही तो काम है – एक वो जो सम्मान दे रहा हो और दूसरा वो जो सम्मान ले रहा हो. इसके बाद जितने भी लोग हों सब बोनस ही तो है. लेकिन जब ये सम्मानित साहित्यकार सम्मान पत्र हाथ में पकड़े अपनी सेल्फी फेसबुक पर चढ़ाते हैं यो कभी कभी चंचल मन शक में पड़ जाता है कि कहीं इस बार सम्मानित करने वाला और सम्मानित होने वाला बंदा एक ही तो नहीं. इसलिए निवेदन बस इतना सा है कि जब कभी सम्मानित हों तो कम से सम्मान देने वाले और लेने वाले का सम्मान आदान प्रदान करते समय का फोटो लगायें. यूँ भी वो है कौन- कौन चैक करने आ रहा है?
इस बीच फेसबुक ने दस्तक दी और ब्लॉगजगत के तथाकथित साहित्यकार अपने कहानी किस्से और कविताओं का बस्ता बॉधे फेसबुक पर चले आये. हालात वही कि नित नये सम्मान..नित नये ईनाम..
अगर कायदे से गिना जाये तो उन्होंने जितने पन्नों के आलेख और कविता न लिखे होंगे ..उससे कहीं ज्यादा पन्नें सम्मान और पुरुस्कारों की सूचना देने और बखान करने में लिख डाले. रोज एक नया स्टेटस.एक नया ईमेल..मसौदा कुछ यूँ..
मित्रों, आपको बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मुझे फलाना संस्था ने इस वर्ष का ’साहित्य मणि’ मेरी रचना ’मुस्करा भी दो’ के लिए देना तय किया है. इस हेतु चिरई डौंगरी में महा आयोजन १८ दिसम्बर को शाम ७ बजे किया जायेगा..आप सादर आमंत्रित हैं’ अपना आशीर्वाद दें..याने बधाई देने वाला कमेंट करो मेरी स्टेटस पर.
सोचो तो इस आमंत्रण के आधार पर आयें कहाँ..न तो ये पता है कि चिरई डौंगरी कहाँ है..न ये पता कि अगर किसी तरह चिरई डौंगरी ढ़ूँढ कर पहुँच भी गये तो किस जगह आना है?
ये पुरुस्कार और सम्मान मिलने की सूचना ईमेल, गुगल प्लस, ट्विटर, व्हाटस अप, एस एम एस, फेस बुक, ब्लॉग, कमेंट..हर संभव रुट से भेजी जाती है. उनका बस चले तो वो आपके घर आकर बता जाये. जैसे बता रहे हों कि भाई साहब, नार्वे आईये. आपके आशीर्वाद से मुझे नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया जा रहा है...
अब तो ऐसी ईमेल या स्टेटस देखो जिसमें शुरुआत में लिखा हो कि आपको बताते हुए... देख कर ही घबराहट हो जाती है कि बंदे का फिर कहीं सम्मान हो गया या होने वाला है...लेकिन हद तो तब हो जाती है जब कर्जा उतार कमेंट में उसे बधाई दे डालते हैं कि ऐसा शुभ दिन बार बार आये..बिना ये सोचे कि आपको बताते हुए में..अपने पिता की मृत्यु की समाचार भी तो दे रहा हो सकता है..
समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अगस्त 30, 2015

शहर के मुँह में भी जुबान होती है....

सुन कर अजीब सा लग सकता है मगर हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है और उस जुबान की अपनी एक अलग ही जुबान होती है.

tounge

आपका शहर दरअसल वो शहर होता है जो आपके बचपन से जवानी तक के सफर का और अक्सर उसके बाद तक का भी, चश्मदीद गवाह होता है या यूँ कहें कि वो शहर जिस शहर में, आपके व्यक्तित्व की मौजूदा आलीशान इमारत जिन मुख्य स्तंभों पर आधारित है, वो स्थापित हो.

भले ही वहाँ आपने जन्म न लिया हो, भले ही वहाँ आपके माता पिता सदा किराये के मकान में रहते आये हो और आप भी किराये के मकान में रहते रह गये हों..मगर बचपन से खेलते पढ़ते घूमते ब़ड़े होते होते न जाने कब वो शहर आपमें समा जाता है. उसकी सड़के, गलियाँ, बाग बगीचे सब आपके मानस पर रच बस जाते हैं.

मुझ जैसा जबलपुर शहर का प्राणी जो आज बरसों से कनाडा में आ बसा है मगर फिर भी जब कभी कनाडा के विश्व विख्यात नियाग्रा फाल्स के सामने खड़ा होता है तो उसे उसमें जबलपुर का नर्मदा नदी का धुँआधार जलप्रपात नजर आता है और मेरी पत्नी जो मिर्जापुर की है, उसे उसी नियाग्रा फाल्स में विन्ढम का झरना. एक ही वक्त में एक ही चीज दो अलग अलग प्राणियों की आँखों को दो अलग अलग आलम दे – ये सिर्फ जहन में बसे एक शहर की औकात है.

अपना शहर और अपने शहर का जहां मे बसना समझना हो तो हालात तो यूँ हैं कि श्रीवास्तव जी जो सन १९६५ में लखनऊ से कनाडा में आ बसे थे सपरिवार और फकत चार पाँच साल में भारत जाना आना होता रहा था जिनका मात्र दो या तीन हफ्तों के लिए, वो अभी जब पिछले माह एक लम्बी बीमारी के बाद गुजरे तो उनके अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को कहते सुना कि भाई साहब का बहुत मन था कि अंतिम सांस वो लखनऊ में ही लेते मगर मन का मांगा कब पूरा होता है. तब लगा कि ये होता है अपना शहर जो मरने के बाद भी आपके नाम के साथ गुथा रहता है.

आपके शहर के मुँह में जो जुबान होती है वो जरा सा फिसली और समझो कि हुआ आपका बंटाधार. फिर भले आप शहर में हों या उसे छोड़ कर कहीं और जा बसे हों मगर वो शहर आपको छोड़ने को तैयार नहीं..वो तो आपके भीतर रच बस चुका होता है और साथ साथ चलता रहता है और फिर जो आपको उस शहर से होने की पहचान देती है, वो होती है उस शहर के मुँह में बसी जुबान की अपनी एक अलग जुबान. कुछ ज्ञानी उसे उस शहर की भाषा या महाज्ञानी उसे उस शहर की बोली भी कहते हैं.

चाहे आप अपना शहर छोड़ कर दिल्ली, बम्बई या बैंगलोर आ बसें या सात समुन्दर पार अमेरीका, कनाडा आ बसें तो भी. जब कभी बात निकलेगी तो पूछने वालों का पहला प्रश्न ही यह होगा कि आप कहाँ से हैं?

तब आप जैसे ही बताते हो कि आप जबलपुर से हैं और वो पूछने वाला भी अगर आपके शहर का ही हुआ तो अति प्रसन्न भाव से बतायेगा कि ’गजब हो गओ महाराज!! हम भी जबलईपुर से हैं’. ये जबलपुर का जबलपुर वाले का जबलपुर वाले के सामने जबलईपुर निकल जाना एकदम स्वभाविक प्रक्रिया है, इसके लिए सामने वाले को न तो कुछ सोचना होता है और न ही कोई प्रयास करना होता है. यह एकदम सहज हो जाने वाली घटना है और आप जान जाते हो कि ये तो अपने शहर का सर्टिफाईड बंदा है. ये होती है उस शहर के मुँह में होने वाली जुबान की अपनी एक अलग जुबान. उस शहर की बोली.

तब बात आगे बढ़ती है और वो पूछता है कि काये, जबलपुर में कहाँ से? और आप जैसे ही उसे अपना मोहल्ला बताते हो, हालांकि अब उस मोहल्ले में आपका कुछ भी नहीं मगर वो मोहल्ला फिर भी हमेशा आपका ही रहता है, तुरंत वो कहता है कि अरे!! वहीं तो वो शर्मा जी रहते थे स्टेट बैंक वाले जिनकी लड़की का ड्राईवर के साथ चक्कर था. ये जो एकाएक बेवजह शर्मा जी और उनकी लड़की की भद्द उतार दी गई.. वो होती है उस शहर के मुँह में रहने वाली जुबान.

ये इसी शहर के मुँह में रहने वाली जुबान की मेहरबानी है कि अच्छा अच्छा बोले तो आप अच्छे और पोल खोल दे तो आप बुरे.

वैसे सच जानो तो दर्ज तो आपके शहर की मुँह की जुबान पर आपके बारे सब कुछ है ही..इतना कुछ कि जो करम आपने उस शहर में न कर, सेफ रहने के लिहाज से किसी और शहर में किये हों उसे तक वो अपने सीने से लगाये बैठी रहती है और न जाने कब, एकाएक लपलपा के बोल दे और फिर आप देखिये कि क्या तमाशा खड़ा होता है..

कभी अपने शहर के मुँह की जुबान से, अपनी पैदाईश से लेकर घटना दर घटना मय सबूत के पूरी जन्म कुण्डली, जिसे शायद आपको खुद भी याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़े, सुनना हो तो एक काम करियेगा..बस!! एक बार एक बड़ा चुनाव लड़ लिजियेगा किसी जानी मानी पार्टी की टिकट पर..फिर सुनियेगा..मन लगा कर कि क्या क्या गुल खिलाये थे आपने मियाँ..अपने ही शहर की मुँह की जुबान से...उसी की जुबान में..

और तब आप भी मान जायेंगे..कि

’हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है’

बस!! डर इतना सा है कि इस बदलती दुनिया में कहीं स्मार्ट सिटी का कल्चर शहर को बेजुबान न बना दे!! मुंबई बहुत नहीं तो थोड़ा स्ट्रीट स्मार्ट तो है ही और वो इसका काफी हद तक प्रमाण भी देता रहा है अन्य शहरों की तुलना में.

चित्र साभार: गुगल

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 21, 2015

योगा दिवस: सब पूर्ण स्वस्थ हैं!!

साहेब की थाली में दो सूखी रोटी और पालक का साग उनके स्वास्थय के प्रति सजगता दिखाती है. वो बड़े गौरव के साथ अपना ५६ इंची सीना ताने अपने रईस दोस्तों के बीच अपनी डाइट बताते है. अपना एक्सर्साईज रुटीन बधारते हैं. नित प्रति दिन ऐसी साइकिल (एक्सर्साईज बाईक) चलाने का दावा करते है जो जाती तो कहीं नहीं मगर मीटर में दिखाती है कि पूरे पाँच किमी चली है याने अगर १०० दिन की बात करें तो ५०० किमी चली- मानो साइकिल न हुई, सरकार हो गई हो. हुआ गया कुछ हो या न हो, १०० दिन में ५०० किमी का रिपोर्ट कार्ड लहराया जा रहा है हर तरफ. काश!! ५०० किमी की जगह, दिल्ली से ५० किमी दूर तक भी निकल लिए होते सही में साईकिल चलाते और कुछ जमीनी हकीकत का जायजा ले लेते तो शायद कुछ किसान आत्म हत्या करने से बच जाते. शायद महिनों से रुकी तनख्वाह की बाट जोते किसी नगर निगम के कर्मचारी के परिवार को कुछ आशा की किरण दिख जाती.

लेकिन हमारे नेताओं की आदत में है, आपदाओं और विपदाओं का हवाई निरक्षण करना और उसके आधार पर बने जमीनी विकास के रिपोर्ट कार्ड को हवा में लहरा लहरा कर जनता को बहलाना. आकाश से देखने का फायदा ये होता है कि कीचड़ में उगी घास भी हरियाली नजर आती है. मुश्किल तो उसकी है जिसे उस कीचड़ के दलदल से होकर गुजरना होता है. लेकिन उसकी किसे फिकर- कीचड़ में उसके कपड़े खराब हों या वो दलदल में फंस कर दम तोड़ दे- ये सब उसकी परेशानी है. हमारा रिपोर्ट कार्ड तो दिखा रहा है कि चहु ओर हरियाली ही हरियाली है. हरित क्रान्ति के इतिहास में पहली बार इतना हरा अध्याय.

खैर, बात चल रही थी एक्सर्साईज रुटीन की- तो यदि आप योग को योगा कह दें तो ये तुरंत वैसा ही स्टेटस सिंबल बन जाता है जैसे मानों आम आदमी की थाली से उचक कर दो सूखी रोटी और पालक का साग साहब की थाली में शोभायमान होने लगा हो और जब साहब की थाली में आया है तो बखाना भी जायेगा और जब बखाना जायेगा तो रिपोर्ट कार्ड में भी आयेगा.

गांवों में अस्पताल हो या न हो और अगर अस्पताल हो भी तो उसमें डॉक्टर का अता पता लापता हो मगर इससे क्या फरक पड़ता है. बेवजह हल्ला मचाते हो फालतू का मुद्दा उठा कर. चलो, तैयार हो जाओ इस समस्या के समाधान के लिए- २१ जून को अन्तर्राष्ट्रीय योगा दिवस के दिन सब साथ में योगा करो. योगा में अगर भगवान का नाम न लेना हो मत लेना, अल्लाह का ले लेना, ईशु का ले लेना - क्या फरक पड़ता है मोटापा कम होने में अगर पाव दो पाव का अंतर रह भी गया इस वजह से तो. जब सब सूर्य नमस्कार कर रहे हों तो तुम सूर्य ग्रहण की कल्पना करते हुए चाँद सलाम कर लेना, लिटिल स्टार मान कर ट्विंकल ट्विंकल हैलो कर लेना- आँख तो मूँदी ही रहना है.

जो मन करे सो करना- बस इतना ध्यान रखना कि अब आगे से बीमारी के लिए अस्पताल और डॉक्टर की मांग उठाना मना है क्यूँकि रिपोर्ट कार्ड दिखा रहा होगा कि भारत में सब योगा कर रहे हैं और सब पूर्ण स्वस्थ है!!

इससे अच्छे दिन की और क्या कल्पना कर सकते हो, बुड़बक!!

बात करते हो!!

jansandesh_photo

-समीर लाल ’समीर’

२१ जून २०१५ अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस पर दैनिक जनसंदेश में प्रकाशित

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, जून 20, 2015

अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होने की योग्यता

बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.

जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े तो आपकी नजरों के आगे मेरी तस्वीर उभरती है, शायद कविता पढ़ते हुए या आपकी रचनाओं पर दाद देते हुए मगर जैसे ही मेरे नाम के अंत में आ की मात्रा लगा दी जाती है याने समीरा तो आपकी आँखों के आगे फिल्मों वाली समीरा रेड्डी की तस्वीर उभर आती है बीच पर गीत गुनगुनाते. समीर और समीरा- एकदम दो विपरीत ध्रुव. अतः समीर नाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर का होने की पात्रता नहीं रखता.

अब दूसरा उदाहरण लें. नरेन्द्र- सुनते ही आँखो के सामने ५६ इंच का सीना तन गया न और कान में गूँजा- मितरों......!!! अब अगर आप इस नाम के अन्त में आ की मात्रा लगा दें याने कि नरेन्द्रा – तब भी आँख के आगे वही ५६ इंच की सीना और कान में..मितरों..!!!!! याने की इनमें अन्तरराष्ट्रीय हो जाने की योग्यता है और हो ही रहे हैं. राष्ट्र में तो होते ही कब हैं? अधिकतर अन्तर्राष्ट्र में ही बने रहते हैं. मित्र भी अन्तरराष्ट्रीय- जैसे बराक!! वरना तो किस की हिम्मत कि ओबामा साहब को बराक पुकारे. इसके लिए तो ५६ इंच के सीने के साथ साथ अन्तरराष्ट्रीय होना भी जरुरी है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ जाते हैं वहीं नाम का डंका बज रहा होता है.

इनसे जब अरविन्द, राहुल टक्कर लेते हैं तो ये क्यूँ नहीं सोचते कि उनके नाम में अन्तरराष्ट्रीय होने की योग्यता नहीं है तो वो क्या होंगे. बेवजह टकराते हैं. अरविन्दा और राहुला- न जाने कोई होगा भी या नहीं कहीं पर इस नाम का तो तस्वीर क्या खाक उभरेगी भला?

एकदम ताजा ताजा- योग और योगा. योग कहो तो बाबा रामदेव गुलाटी खाते नजर आयें और कान में आवाज गूँजे- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो. और आ की मात्रा लगा कर योगा कह दो तो भी बाबा राम देव ही नजर आयें गुलाटी लगाते और कान में वही- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो.

और फिर ये तो संपूर्ण योग्यता वाले हैं- योग और योगा, राम और रामा और देव और देवा. ’समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

Yoga

अब तो मान जाओ इनका लोहा.

मितरों!! चलो करो- आज अन्तरराष्ट्रीय योग (योगा) दिवस है. करो करो- करने से होता है.

-समीर लाल ’समीर’

चित्र साभार: इन्टरनेट

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 07, 2015

परदे के उस पार!!

मंच प्रस्तुति-

नगर की एक नौटंकी मे...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

परदा गिरा और सम्राट अशोक भागा चेंज रुम की तरफ..

कपड़े बदले और लग गया लाईन में..

आज का मेहताना मिले तो खरीदे बीमार बीबी की दवा

और

बच्ची के लिए ..क्या?

सोचा और सर झटकार दिया..

न! उतना सारा पैसा थोड़ी न मिलेगा!

गुड़िया अगली बार!!

जब एक जंग और जीतेगा...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

और गिरेगा परदा...

तब!

-समीर लाल ’समीर’

 

उपरोक्त लघुकथा को ’गागर मे सागर’  लघु कथा ग्रुप के ’परदा’ विषय पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और विशेषज्ञों के आंकलन और अन्य जानकारी के लिए कृप्या नीचे दिये लिंक पर जायें:

 

parda_Certificate

लिंक

Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, जून 02, 2015

हम भारतीयों का डी एन ए!!

नजर की पहचान थी उससे यही कोई तीन चार बरसों की. सिर्फ दफ्तर आते जाते हुए ट्रेन में पड़ोस के डिब्बे में उसे चढ़ते उतरते देखता था और नजर मिल जाती थी. लबों के हाथ कभी इतने नहीं बढ़े कि कोई मुस्कराहट उस तक पहुँचा दें और उसके लबों के तो मानो हाथ थे ही नहीं. भाव विहीन चेहरा.

sl_intezaar

हाँ, एक बार झुंझलाहट देखी थी उसके चेहरे पर..मगर वो भी मुझे लेकर नहीं..ट्रेन के देर से आने की वजह से. कनाडा में ट्रेन का लेट होना यदा कदा ही होता है अतः सभी चेहरे झुंझलाये से थे उस दिन तो उसका चेहरा फिर भीड़ के चेहरे सा ही दिखा. मेरा चेहरा सामान्य था बिना झुंझलाये. मैने उस दिन भी उसकी नजरों से वैसे ही नजर मिलाई थी जैसे हर रोज. उसे पक्का आश्चर्य हुआ होगा मेरा चेहरा देखकर कि मानो ट्रेन के देर से आने का मुझ पर कोई असर हुआ ही न हो.

उसे क्या पता कि ट्रेन का इस तरह, न जाने कितने दिनों बाद, ४५ मिनट देर से आना मुझे मेरे देश की यादों में वापस ले गया था..मुझे लगा कि मैं अपने शहर के स्टेशन पर खड़ा उस ट्रेन का इन्तजार कर रहा हूँ जो लेट है अनिश्चित काल के लिए. लेट आने वाली ट्रेन का इन्तजार खुशी खुशी करना और किसी भी तरह की समस्या के वक्त के साथ गुजर जाने पर विश्वास कर स्थितियों से समझौता कर लेना मेरे भारतीय होने की वजह से मेरे डी एन ए में है.

यही डी एन ए तो है जो आज तीन चार बरस बीत जाने बाद भी मुझे अपने लबों के हाथो के कद बढ़ जाने की उम्मीद हर रोज सुबह शाम रहती है..जो शायद उसके लबों पर एक मुस्कान ला दें कभी और वो मुझसे पूछे ..कैसे हो आप? और मैं उससे कह सकूँ..कि तुमने पूछा तो अब बेहतर महसूस कर रहा हूँ मैं!

ये इन्तजार अनिश्चित कालिन भी हो तो क्या और सतत बना भी रह जाये तो क्या..इन्तजार और वक्त के साथ समझौता कर लेना तो हम भारतीयों के डी एन ए में है...कर ही रहे हैं अच्छे दिनों के आने का इन्तजार!!

कुछ हर्फ मेरे उतरे ही नहीं, जीवन के कोरे पन्नों पर.

ये दुनिया वाले अजब से हैं, उसको भी गज़ल बुलाते हैं..

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links