बुधवार, मार्च 09, 2016

वो शहर जो अब नहीं है..



सभी शहर मध्य प्रदेश का हरसूद नहीं हुआ करते.. जो नदी में डूब में आकर अपना अस्तित्व
खो दें...कुछ शहर यूँ भी खो जाते हैंबेवजह!!

जीने के लिए सोचा ही नहींदर्द संभालने होंगे
मुस्कुराये तोमुस्कुराने के कर्ज उतारने होंगे
मुस्कुराऊ कभी तो लगता हैजैसे होठों पे कर्ज रखा है
तुझ से नाराज नहीं जिन्दगीहैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं….

मेरे मुर्दा सपनों के उस शहर मेंकहीं दूर बजते रेडिओ से इस गीत के अलावा और उम्मीद भी कोई क्या कर सकता होगा..कान में रुई ठूँस कर आवाज को बेखबर जाने देने का विकल्प सपनों के शहरों में उपलब्ध नहीं होता..आँख मुँदी रहे..पता भी न हो कि हम कहाँ है ..और ये गीत...
सपने में एक खीज उतरजाती है...घर में मैं रेडीओ नहीं बजाता... वो अपनी पसंद के गाने सुनाता है..और मुझे अपनी पसंद के सिवाय दूसरों की पसंद के गाने सुनना मंजूर नहीं..मैं अपने अहम में जीने वाला..किसी दूसरे की पसंद को अपना बनाऊँ ...मेरे लिए संभव नहीं...आज तक यूँ ही किया है...यूँ ही जिआ है...बदनाम हुआ कि नहीं.. पता नहीं..मगर इसी तर्ज पर जिन्दगी को मैं जिन्दगी का नाम देता आया हूँ..कम से कम अब तक...
मैं युधिष्टर नहीं...कि कल की बात करुँ..
हारा हूँ जब भी मैने अपवाद पाले..कुछ अपने उसी अपवादों में अपनी जगह बनाते रहे..और मैं छलावे की उस दुनिया में खुद को बादशाह समझ बैठा...बादशाह का आदेश है पालन हो...वाली सोच में जीता वो हिस्सा...हासिल आया एक लम्बे गुमान के बाद सिफर..खाली हाथ मलता मैं..आकाश वाले चाँद को मचलता मैं..
उकडूँ बैठ खुद के घुटनों में अपना मूँह छुपा...सिमट कर खुद को खुद में खो देने का अहसास..सिर्फ वो जान सकता है..जो इस हादसे से गुजरा होखो जाना तब.. जबकि सबको पुकारता रहा मैं तड़प कर ..ओ मेरे अपने...ओ मेरे अपने....सुनो न मेरे अपने..और किवदन्तियों में मांडू की उस रानी रुपमति के महल से बादशाह बाज बहादुर की पुकार की लौट कर आती वो गूँज...रुपमति..रुपमति... किवदन्ति हारती नजर आई मुझे...ओ मेरे अपने की पुकार के साथ..तब वो मेरे अपने खो जाते हैं और नहीं लौटती है कोई आवाज..
मेरी पुकार चित्कार का रुप लेकर मर जाती है..शायद, बस शायद किसी को उद्वेलित करती हो कौन जाने.. मगर मांडू का वो महल ..धीरे से मुस्करा कर एक अवसाद में डूब जाता है मेरे गम को अपना समझ...चित्कार की मंजिल बस ऐसी ही होती है...काश!! चित्कार हुंकार हो पाये...
मगर तुम.. तुम मेरी चित्कार को अनसुना कर...खोये रहे अपने बनाये और खुद के गढ़े तर्कों के महल में..जो कम से कम तुम्हारे मन को तो तसल्ली बक्श ही गये होंगे कुछ और थोड़ा सा बचा वक्त जिन्दगी की इस बहती दरिया में..जिन्दगी के साथ गुजार देने को..और मैं साहिल पर खड़ा..देखता हूँगा तुम्हारे उस वजूद को उसी दरिया में डूबता..जिसे मैने अपना जाना था बेवजह...अपने स्वभाव में अपवाद बना..
अपवाद ही अवसाद की वजह बनते हैं इस जिन्दगी में..तब जाकर जाना हमने...
आँख बमुश्किल लगती है इतनी ऊहापोह भरी जिन्दगी में...तो सपने आ जगा देते हैं उन्हें...
खुली आँख सपने जागते हुये..यादों का पूरा पिटारा होते हैं..खास कर चुभती और सालती यादों का...
उनसे भाग कर फिर आँख मूँद सोने की नाकाम कोशिश...सोई आँख के सपने तिल्समी दुनिया में ले जाकर..एक अनजाना खुशनुमा अहसास दे भी जायें शायद...उम्मीदें कब पूरी होती है भला इस तरह की?
लेकिन आँख को ऐसे वक्त में सो जाना कहाँ मंजूर..हार जाता है इन्सान..अगर ऐसी राहों से गुजरा हो...
हारे हुए इन्सान का पूरा वजूद हारता है और जीते हुए का बस अहम जीतता है..अजब विडम्बना है!!
खुली आँख सपनों में..पिटारा उन यादों का...रोज बिखरता है...उसमें तुम होते हो..मैं होता हूँ..और खोया हुआ वो शहर...जो अब नहीं है...
स्टेशन के पत्थर पर लिखा नाम मेरे उस शहर का पता तो हो सकता है मगर..
वो शहर नहीं...जिसे मैं याद करता हूँ!!
वो शहर...
अब नहीं है...

फोटो: साभार गुगल

समीर लाल समीर


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10 टिप्‍पणियां:

Rajendra kumar ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.03.2016) को "एक फौजी की होली " (चर्चा अंक-2278)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

शारदा अरोरा ने कहा…

oh ...touching...bheetar ki uhapoh se vakif karati hui rachna..

मन के - मनके ने कहा…

बहुत सुंदर,समीर जी,
बहुत कुछ कहने के लिये
शब्द घनघोर हो रहे हैं—
देखिये ना,कभी हम याद ही रह जाते हैं,
कभी उस शहर की नेमप्लेट जहां से होकर
गुजरे थे---और वो चस्पा हो गयी हमारे वजूद से??
क्या कहें—त्रासदी या कि प्रारब्ध या कि--?
सुकून भी मिला और पीडा भी.
कुछ सत्य शाश्वत हैं.

PRAN SHARMA ने कहा…

Vichaarneey Lekh !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऐसे कितने ही शहर हैं जो रोज़ मर जाते हैं ... जिन्दा होते हुए भी ...
कई बार ऐसा होता है की किसी की आँखों में वो जिन्दा रहते हैं किसी की में मर जाते हैं ... पर ... दुनिया भी तो तभी तक जिन्दा है जब तक हम ....

Rohit Singh ने कहा…

शहर में पहले इंसान मरने लगा, अब छोटे शहर और कस्बे अपना अस्तित्व खो ही चुके हैं। कई कस्बों में शहरों की दास्तां सिमट गई है।

Unknown ने कहा…

बड़े शहरों के चकचौध मे छोटे शहर बेसमेंट मे है जहां अरमान पार्क होते है , एक मुद्दा उठाने के लिए बधाई

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मिट जायेंगे मिटाने वाले, ये हिन्दुस्तान है - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Unknown ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है समीर सर
Hindi Shayari

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सुन्दर गद्य-काव्य रच डाला है समीर जी,स्मृतियों का वह शहर उजड़ा नहीं है रूप बदल गया है बस जैसे और सब कुछ समय के साथ बदल जाता है .
मुझे प्रसन्नता है कि आप रेसिपी बनाने से छुट्टी कर रसोई से बाहर निकल आये.