यूँ ही कभी शौकिया लेखन शुरु किया था. आम हल्की फुल्की भाषा में लिखता गया. जब जो मन में आया, लिख दिया. सबने बहुत उत्साहित किया, सम्मानित किया, स्नेह दिया और मैं अपनी ही रौ में बहता लिखता चला गया.
सही मायनों में न तो मैं साहित्य का ज्ञाता हूँ और न ही कोई मंझा हुआ लेखक या कवि न ही ब्लॉगलेखन का महारथी. बस, हल्का फुल्का मन बहलावी लेखन. पाठक को मजा आये, मेरे संदेश उन तक पहूँच जायें, किसी को मेरे लिखे से ठेस या तकलीफ न पहुँचें-बस, यही मात्र उद्देश्य रहा मेरे लेखन का.
मेरे लेखन में कहीं कुछ बहुत बड़ी कमी आ रही है आजकल. आ क्या रही है, है ही. जो कहना चाहता हूँ वो भाव न जाने कैसे मतलब बदल कर पहुँच रहे हैं. निश्चित ही लेखन की कमजोरी है, जो अपनी बात सही तरीके से नहीं रख पा रहा.
कल रात टिप्पणियों के माध्यम से साथी चिट्ठाकारों से निवेदन किया:
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निवेदन
आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.
ऐसा ही सब चाहते हैं.
कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.
हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.
-समीर लाल
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उद्देश्य और मंतव्य था कि हिन्दी चिट्ठाकारों को प्रोत्साहन मिले. हिन्दी चिट्ठाकारी का विकास हो और शनैः शनैः, परिणाम स्वरुप हिन्दी का विकास हो.
किन्तु शायद कुछ लोगों तक बात ठीक से पहुँची नहीं और उन्होंने इसे उन पर टिप्पणी न करने का आक्षेप माना या मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का निवेदन. किसी ने साफ साफ लिख कर मुझे अनुग्रहित किया तो किसी ने मेरी टिप्पणी मॉडरेट कर अपना क्षोभ जताया.
इस तरह सोच लेने एवं अर्थ लगा लेने में मैं उनकी कतई गल्ती नहीं मानता. मेरा ही लेखन कमजोर रहा और शायद मैं ही अपनी बात ठीक तरीके से नहीं रख पाया.
आज देखा तो शास्त्री जे सी फिलिप भी इसी बात को बेहतर तरीके से अपनी सिग्नेचर लाईन बना कर सब तरफ टिप्पणियों में कह रहे थे. निश्चित ही वह सक्षम लेखक हैं, अतः अपनी बात बेहतर ढ़ंग से रख पाये, उनका साधुवाद.
प्रोत्साहन के आभाव में, अपने पिछले दो वर्ष और छः माह के चिट्ठाकारी जीवन में न जाने कितने चिट्ठों को दम तोड़ते देखा है. कुछ बंद हो गये, कुछ बंद होने की कागार पर हैं.
मैं अपनी तरफ से जितना बन पड़ता है, उतना प्रोत्साहित करने का प्रयास करता हूँ. अनेकों लोग इसी तरह के प्रोत्साहन देने के प्रयास में सक्रिय हैं. यह एक मिशन है, अतः समय और श्रम दोनों देना होता है मगर साथ ही हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार प्रसार देख कर आत्म संतुष्टी भी होती है कि हमारा यह छोटा सा प्रोत्साहन देने का योगदान बेकार नहीं गया.
खैर, किसी विद्वान को कभी पढ़ा था कि जितना लिखते हो, उससे कई गुना ज्यादा पढ़ो. इससे न सिर्फ ज्ञान बढ़ेगा अपितु लिखने का स्तर भी सुधरेगा.
मुझे लगता है कि मुझे अब पढ़ने में कुछ ज्यादा समय लगाना चाहिये इससे पहले की मैं कुछ लिखने का अधिकारी बनूँ. अतः विचार है कि लेखन को कुछ समय के लिए स्थगित कर मात्र पठन की ओर अग्रसर हुआ जाये ताकि अपने कमजोर लेखन के चलते बार बार लोगों को ठेस न पहुँचाऊँ. शायद पढ़ते रहने से लेखन को कुछ ताकत मिले भले ही थोड़ी सी सही.
पुनः मिलूँगा इसी मोड़ पर जैसे ही कुछ लिख सकने का आत्मविश्वास वापस आता है.
मेरे मन में न तो किसी से द्वेष है और न ही गुस्सा. मैं तो बल्कि उनका आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुझे इस कमजोरी को पहचानने का मौका दिया. वरना तो मैं मदमस्त चलता ही जा रहा था.
आशा करता हूँ जब भी लौटूँ, आप सबका स्नेह ऐसे ही प्राप्त हो.
तब तक के लिए आप सबको बहुत शुभकामनाऐं और आजतक प्राप्त समस्त स्नेह और हौसला देते रहने के लिए आभार.
भारी मन से विदा लेता हूँ...
चाहता हूँ आज हर इक शब्द को मैं भूल जाऊँ
चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ
--मेरे गुरु राकेश खण्डेलवाल जी की ताजा रचना से...
सादर
आपका
समीर लाल ’समीर’








