रविवार, सितंबर 07, 2008

मुझे याद रखना-वापस आऊँगा, दोस्तों!!!

कुछ थक सा गया हूँ. कुछ दुखी सा भी हूँ मगर खुद से. कुछ जरुरत से ज्यादा ही आप लोगों का सम्मान, स्नेह, लाड़-प्यार पाकर लेखन के मुख्य कार्य से विचलित हो चला हूँ. सही शब्दों में-बिगड़ सा गया हूँ.

यूँ ही कभी शौकिया लेखन शुरु किया था. आम हल्की फुल्की भाषा में लिखता गया. जब जो मन में आया, लिख दिया. सबने बहुत उत्साहित किया, सम्मानित किया, स्नेह दिया और मैं अपनी ही रौ में बहता लिखता चला गया.

सही मायनों में न तो मैं साहित्य का ज्ञाता हूँ और न ही कोई मंझा हुआ लेखक या कवि न ही ब्लॉगलेखन का महारथी. बस, हल्का फुल्का मन बहलावी लेखन. पाठक को मजा आये, मेरे संदेश उन तक पहूँच जायें, किसी को मेरे लिखे से ठेस या तकलीफ न पहुँचें-बस, यही मात्र उद्देश्य रहा मेरे लेखन का.

मेरे लेखन में कहीं कुछ बहुत बड़ी कमी आ रही है आजकल. आ क्या रही है, है ही. जो कहना चाहता हूँ वो भाव न जाने कैसे मतलब बदल कर पहुँच रहे हैं. निश्चित ही लेखन की कमजोरी है, जो अपनी बात सही तरीके से नहीं रख पा रहा.

कल रात टिप्पणियों के माध्यम से साथी चिट्ठाकारों से निवेदन किया:

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निवेदन
आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.
ऐसा ही सब चाहते हैं.
कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.
हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.
-समीर लाल
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उद्देश्य और मंतव्य था कि हिन्दी चिट्ठाकारों को प्रोत्साहन मिले. हिन्दी चिट्ठाकारी का विकास हो और शनैः शनैः, परिणाम स्वरुप हिन्दी का विकास हो.

किन्तु शायद कुछ लोगों तक बात ठीक से पहुँची नहीं और उन्होंने इसे उन पर टिप्पणी न करने का आक्षेप माना या मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का निवेदन. किसी ने साफ साफ लिख कर मुझे अनुग्रहित किया तो किसी ने मेरी टिप्पणी मॉडरेट कर अपना क्षोभ जताया.

इस तरह सोच लेने एवं अर्थ लगा लेने में मैं उनकी कतई गल्ती नहीं मानता. मेरा ही लेखन कमजोर रहा और शायद मैं ही अपनी बात ठीक तरीके से नहीं रख पाया.

आज देखा तो शास्त्री जे सी फिलिप भी इसी बात को बेहतर तरीके से अपनी सिग्नेचर लाईन बना कर सब तरफ टिप्पणियों में कह रहे थे. निश्चित ही वह सक्षम लेखक हैं, अतः अपनी बात बेहतर ढ़ंग से रख पाये, उनका साधुवाद.

प्रोत्साहन के आभाव में, अपने पिछले दो वर्ष और छः माह के चिट्ठाकारी जीवन में न जाने कितने चिट्ठों को दम तोड़ते देखा है. कुछ बंद हो गये, कुछ बंद होने की कागार पर हैं.

मैं अपनी तरफ से जितना बन पड़ता है, उतना प्रोत्साहित करने का प्रयास करता हूँ. अनेकों लोग इसी तरह के प्रोत्साहन देने के प्रयास में सक्रिय हैं. यह एक मिशन है, अतः समय और श्रम दोनों देना होता है मगर साथ ही हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार प्रसार देख कर आत्म संतुष्टी भी होती है कि हमारा यह छोटा सा प्रोत्साहन देने का योगदान बेकार नहीं गया.

खैर, किसी विद्वान को कभी पढ़ा था कि जितना लिखते हो, उससे कई गुना ज्यादा पढ़ो. इससे न सिर्फ ज्ञान बढ़ेगा अपितु लिखने का स्तर भी सुधरेगा.

मुझे लगता है कि मुझे अब पढ़ने में कुछ ज्यादा समय लगाना चाहिये इससे पहले की मैं कुछ लिखने का अधिकारी बनूँ. अतः विचार है कि लेखन को कुछ समय के लिए स्थगित कर मात्र पठन की ओर अग्रसर हुआ जाये ताकि अपने कमजोर लेखन के चलते बार बार लोगों को ठेस न पहुँचाऊँ. शायद पढ़ते रहने से लेखन को कुछ ताकत मिले भले ही थोड़ी सी सही.

पुनः मिलूँगा इसी मोड़ पर जैसे ही कुछ लिख सकने का आत्मविश्वास वापस आता है.

मेरे मन में न तो किसी से द्वेष है और न ही गुस्सा. मैं तो बल्कि उनका आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुझे इस कमजोरी को पहचानने का मौका दिया. वरना तो मैं मदमस्त चलता ही जा रहा था.

आशा करता हूँ जब भी लौटूँ, आप सबका स्नेह ऐसे ही प्राप्त हो.

तब तक के लिए आप सबको बहुत शुभकामनाऐं और आजतक प्राप्त समस्त स्नेह और हौसला देते रहने के लिए आभार.

भारी मन से विदा लेता हूँ...

चाहता हूँ आज हर इक शब्द को मैं भूल जाऊँ
चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ

--मेरे गुरु राकेश खण्डेलवाल जी की ताजा रचना से...

सादर

आपका
समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 04, 2008

विरह अगन सी तपन!!

पिछली पॉडकास्ट पर मित्र एवं पथप्रदर्शक माननीय फुरसतिया जी के कथनानुसार श्रृंगार रस का हमारा गीत वीर रस के मार्ग से होता हुआ रोद्र रस के मैदान में टहलता हुआ पाया गया. आज फिर वैसी ही एक कोशिश की है, इच्छा मात्र इतनी है कि टहले-चाहे जिस रस में भी. हम भी अभी टहल कर लौटे हैं ग्रेन्ड कैनियन-एक तस्वीर देखिये:

grandc

अब गीत पढ़ें और फिर सुनते हुए पढ़ें:


विरह अगन सी तपन कहाँ है, दुनिया भर की आगों में,
पिरो लिए कंचन से मोती, प्यार के पक्के धागों में,
भीग रही है धरती सारी, छलक रही इन बूँदों से,
तुम कहती हो आँख के आंसू, सूख गये सब यादों में.

या तो इस मौसम से कह दो, इतना मत हैरान करो,
या कि तुम खुद ही आ जाओ, इस दिल पर अहसान करो,
अब तक मैने जीवन काटा, निविड़ मावसी रातों सा,
मेरी राहें रोशन कर दो, जीना कुछ आसान करो.

सोच रहा हूँ आखिर कब तक, तन्हाई को सहना है
मेरी आँखें सब कहती हैं, मुझे नहीं कुछ कहना है,
साँस मेरी है चलती जाती, केवल इक इस आशा में,
एक दिवस पत्थर पिघलेगा, मुझको जिन्दा रहना है.




फिर मिलते हैं जल्दी ही!!!

आप सबका साथ बहुत सुहाना है..बनाये रखिये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अगस्त 25, 2008

कैनिडियन पंडित-विदेशी ब्राह्मण!!!

शाम दफ्तर से घर ट्रेन से वापस आ रहा हूँ था. सामने की दो कुर्सियों पर एक प्रेमी युगल आलिंगनबद्ध बैठा है. दो कुर्सियों में दो लोग और फिर भी एक की जगह बाकी?? अजब मंजर है. मन गदगद हो गया कि क्या जज्बा है जन सुविधाओं की सीमांत उपयोगिता का इनमें और एक हम हैं- शुद्ध भारतीय-एक टिकिट में दो सीट में ऐसा पसर कर बैठे हैं, कि दूसरा कोई बैठना चाहे तो एक तो उसका सिकुड़ी छाप होना जरुरी है और साथ ही बीमार भी कि खड़े रह ही नहीं सकते.

kiss

वो प्रेमी युगल बात बात में एक दूसरे को लिप टू लिप किसिंग कर रहा है. आते ही- एक किस्स, कैसी हो-एक किस्स--मैं ठीक हूँ-एक किस्स-अच्छा लगा तुम ठीक हो-एक किस्स, तुम्हारा ईमेल मिला-एक किस्स. अरे, ईमेल मिलने का किस्स देने लगें तो हमारा तो दिन १५० से कम किस्स में खतम ही न हो और उपर से वो मास फारवर्ड वाले, किस्स करने के लिए एक दो कर्मचारी रखवा कर ही मानें.

हर बात पर किस्स!! ट्रेन रुक गई-तो किस्स. ट्रेन चल दी-तो किस्स, ट्रेन चल रही है-तो किस्स, ट्रेन रुकी है-तो किस्स!! गजब है भई!!!

मेरी आँख किताब में गड़ी, कान उनकी बातों पर टिके और ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ी. बीच बीच में कनखियों से उन पर नजर. सीधे भी नजर रखे रहता तो उनको कोई फर्क न पड़ता मगर मेरे हिन्दुस्तानी संस्कार आड़े आ रहे थे.

उसने कहा-मैं अपना पैक्ड खाना ले आया हूँ-एक किस्स-फ्री मिला-एक और किस्स-सो गुड-एक किस्स-तुम क्या बनाओगी अपने लिए-एक किस्स- चिकिन बेक्ड-सो डिलिसियस-एक किस्स-कीप द लेफ्ट ओवर फॉर टुमारो लंच-मेरा खाना बाहर है-एक और गहरा किस्स. किस्स किस्स किस्स!!

मन तो किया कि पूछूँ-क्यूँ भई आप ये करते करते बोर नहीं हो जाते. मगर उनका जबाब क्या होगा, यही न कि जब भी बोर होते हैं-एक किस्स!! सो नहीं पूछा.

गिनते गिनते गिनती खत्म होने को आई, मगर उनके किस्स का आदान प्रदान खत्म न हुआ. धन्य है-४५ मिनट के सफर में जितने किस्स उन्होंने किये-और हम अतीत में झांक कर देखते हैं तो हमारे और पत्नी के बीच सारे जीवन के किस्स-हम हार गये. कॉस्य पदक की तो छोड़ो-क्वालिफाई तक नहीं कर रहे. भारतीय हैं तो ओलंपिक हॉकी की भांति ही बुरा नहीं लगा. अमरीकन होते तो डूब मरते मगर हारना भी एक आदात होता है, एक सांस्कृतिक विरासत होता है जो हमें भारतीय होने की वजह से स्वतः प्राप्त है- सो चल गया. ये दीगर बात है कि महर्षि वात्सायन ने कामसूत्र हमारे मोहल्ले में बैठ कर लिखी थी- सो तो हॉकी के जादूगर ध्यान चन्द भी हमारे ही स्कूल से पढ़े थे.

हम ऐसा सोचने लगे कि ये दोनों सारा होमवर्क यहीं ट्रेन में निपटा लेंगे तो घर जाकर करेंगे क्या? लाईफ स्टाईल मैग्जीन ने ज्ञानवर्धन किया कि पति महोदय घर जाकर बियर पीते हुए सोफे पर बैठ कर टी वी पर बास्केट बॉल देखेंगे और पत्नी सिर्फ अपने लिए खाना बनाते हुए अपनी सहेली से नई रेसिपि पर फोन पर बात करेगी. फिर थक कर दोनों सो जायेगे और सुबह ५ बजे उठकर दफ्तर जाने की जद्दोजहद. कठिन जिन्दगी है!!

आत्मग्लानि आत्मविश्लेषण की जननी है-इस सिद्धांत के तहत हम आत्मविश्लेषण करने में जुट गये.

पिछले बरस भी एक ऐसा ही जोड़ा जो बात बात में या बात बेबात में चुम्बन यज्ञ मे बिला जाता था, सामने बैठा करता था. इस बरस, दोनों सामने से हट कर कुछ दूर वाली सीट पर बैठते हैं अलग अलग दिशा में मगर अपने अपने नये साथियों के साथ. क्रियायें और भंगिमाऐं प्रायः वही हैं.

निष्कर्ष स्वरुप जिस फल की प्राप्ति मैने की, वह आम से कम मीठा मगर फिर भी मीठा सा ही नजर आया.

मुझे यह कैनेडियन पंडित यानि विदेशी ब्राह्मण टाइप आईटम लगे. वो पंडित जो दिन भर मंदिर में राम राम जपते हैं मगर दिल में बस एक उम्मीद कि कोई जजमान फंसे और वो उसे लूटें. सारा जैव रस इसी लूटम लाट को निछावर. भगवान गये तेल लेने, नोट आयें तो काम बने. भगवान का नाम नोट लाने के हाईवे की तरह- बस, दौड़े चले जाओ. छल एवं दिखावा ही परम धर्म!!

ये वो साधु संत हैं, जो यह बताने के लिए लाखों रुपये बतौर फीस लेते हैं कि धन की जीवन में कोई महत्ता नहीं-धन त्यागो और बैकुंठ का फ्री पास लो. रोज सुबह टीवी पर दाढ़ी खुजाते उज्जवल सफला वस्त्र धारण किए और अपने नाम के साथ महाराज या बापू जोड़े गाँधी जी को गाली बकते सबको ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाते और अपने बेटे पर कोई कंट्रोल बिन हवा में पिचकारी चलाते सभी प्रकार के धतकर्मों में लीन ये बाबा, बिल्कुल ऐसे ही नजर आते हैं.

वो सारा जीवन रस जो हम पति पत्नी अपने रिश्तों क दीर्घजीवी बनाये रखने के लिए सरेस की तरह बचाये रखते हैं, उसे ये किसिंग में लुटाये दे रहे हैं. यह पंडितों की तरह मंत्रोच्चार के दिखावे के बिलिवर हैं और हम एक आम भक्त जो दिल में श्रृद्धा को जगह देता है, मौन रहता है और परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय बीते की तरह. भले हम बास्केट बॉल न देख पायें, मगर जो भी रुखी सूखी मिले, मिल बांट कर खायें. आधा तुम, आधा हम.

साधु संत तुम्हें मुबारक-हमें हमारी मुक्ति का मार्ग मालूम है. परिवार बंधा रहे-बच्चे लोन मुक्त पढ़कर परिवार के साथ यथा संभव रहते रहें, अपने परिवारिक दायित्व समझें और उन दायित्वों के प्रति सजग रहें और हम उन पर भरसंभव बोझ न बन मार्गदर्शक बनें रहें, इसे ही हम मुक्ति का मार्ग समझते हैं और हम इससे खुश हैं.

आपको आपकी कनैडियन पंडिताई और संतई मुबारक...एन्जॉव्य किजिये. हेव फन!!! हेव एनदर किस्स!!

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नोट:कनाडा में कम उपलब्ध गरमियाँ चल रही हैं. शायद एक दो हफ्ते के और मजे. फिर वही ठंड और सब घर में पैक. अतः सप्ताहंत घूमने फिरने और बाह्य कार्यक्रमों में उपयोग किये जा रहे हैं. अभी राजधानी ऑटवा से तीन दिन बाद वापस आया हूँ, अतः पिछले तीन दिन से कोई टीप नहीं कर पाया अब कोशिश कर कुछ देखता हूँ कल!!! अगला सप्ताहंत भी लॉस वेगस (विश्व की जुआ राजधानी) का कार्यक्रम है.

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बुधवार, अगस्त 20, 2008

अंदर की बात!!!

आज आपके मास्साब छुट्टी पर है इसलिए आज आपकी निबंध की क्लास मैं लूँगा. मैं छात्रों को बता रहा हूँ. आज का विषय है: ’अंदर की बात एवं बाहर की बात’

क्या आप में से कोई छात्र इस विषय पर कुछ कह सकता है?

’सर, परिभाषा तो नहीं मगर उदाहरण से बता सकता हूँ.’ यह वही छात्र है जिसने पिछली बार निबंध में टॉप किया था.

मैं बहुत खुश हुआ कि अगर उदाहरण से बता देगा तो परिभाषा सिखाना तो बहुत आसान हो जायेगा.
’सर, आपने अभी कहा कि मास्साब छुट्टी पर हैं, यह बाहर की बात है और असल में मास्साब को छुट्टी पर भेजा गया है क्यूँकि उन पर हमारे निबंध चुरा कर छापने की इन्क्वायरी चल रही है, यह अंदर की बात है.’

चुप रहो-मैं मास्साब की बची खुची इज्जत पर डांट का पैबंद लगाने की मित्रवत कोशिश करता हूँ. तुम लोग बस शारीफ लोगों को बदनाम करना जानते हो.

अब मैं उनको बोलने का मौका न देते हुए परिभाषा पर आ जाता हूँ:

दरअसल, बाहर की बात वह होती है जो अंदर से आती है बाहर सबको बतलाने के लिए और सामन्यतः उसी के द्वारा भेजी जाती है, जिसके विषय में बात है. अंदर की बात सामन्यतः बाहर से बाहर के लिए आती है और सामन्यतः अंदर से टूटे हुए व्यक्ति द्वारा भेजी जाती है.

उदाहरण के लिए, संसद में चमका चमका कर दिखाया गया कि हमें १ करोड़ घूस दी गई. यह बाहर की बात कहलाई एवं यह उन्हीं के द्वारा कही गई जिन्हें घूस मिली. इसमें अंदर की बात यह है कि घूस दरअसल २५ करोड़ मिली और यह बात उसने बताई जिसने घूस दिलवाने के लिए अंदर के आदमी का काम किया-देयता और ग्रेहता के बीच सेतु के समान.
मगर सर हमने तो सुना था कि अंदर की बात अक्सर अफवाह होती है! यह फिर वही विद्व छात्र पूछ रहा है.

बेटा, अंदर की बात स्वभाववश अफवाह जैसी ही लगती है किन्तु अफवाह और अंदर की बात के बीच एक बारीक धागे जैसी लकीर का विभाजन है इसे ज्ञानी लोग समझ जाते हैं और मौका देख कर किनारा कस लेते हैं जैसे अडवानी जी ने इस घूस कांड में किया. अफवाह अक्सर कोरी बकवास होती है जबकि अंदर की बात मूलतः ठोस. अतः यह अंतर करना सीखना परम आवश्यक है और यह मात्र अनुभव से आ सकता है. जिस तरह घाघ नेता बनने की कोई किताबी पाठशाला नहीं है, बस अनुभव से बना जा सकता है, ठीक वैसे ही इसे पहचानने के लिए भी मात्र अनुभव की ही आवश्यक्ता है.

जैसे उदाहरण के तौर पर अमरीका का कहना कि इराक के पास वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन हैं, यह बाहर की बात थी असल में अंदर की बात यह थी कि इराक के पास तेल के लबालब कुएं थे, जिस पर अमरीका की नजर थी.

एक अन्य उदाहरण के माध्यम से यह बात समझने की कोशिश करो कि अडवानी जी चिल्ला रहे थे कि परमाणु करार नहीं होना चाहिये, यह बाहर की बात थी यानि मात्र जनता के लिए दिखावा. पुख्ता बात यह थी कि होना तो चाहिये मगर हमारे शासन काल में, न कि कांग्रेस के.

बाहर की बात है मनमोहन सिंग कहते है यह परमाणु संधि देश हित में है. इसमें अंदर की बात का विशिष्ट उदाहरण है कि मैडम ने ऐसा कहने को कहा है बाकि तो मनमोहन सिंग को खुद नहीं मालूम कि किसके हित में है. यह अपने आप में एक विचित्र उदाहरण है.

ऐसा ही अपवाद एक और है कि जब अंदर की बात कई बार अंदर से ही धीरे से बाहर करवा दी जाती है बाहर वाले के द्वारा जो अंदर का आदमी होता है-जैसे कि अडवानी जी नहीं चाहते कि मायावती प्रधान मंत्री बने.

मगर सर, यह बात तो बाहर से बाहर आई थी, बालक कुतहलवश पूछ रहा है.

हाँ मगर भिजवाई तो अंदर ही से थी, मैने बताया.

अन्य भारतीय समस्यायों के जंजाल में फंसी आम जनता जिस तरह इन नेताओं की चालों और बयानों से कन्फ्यूज होकर चुप बैठ जाती है, कुछ वैसे यह छात्र भी अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गया.

इसी तरह अपवादवश कभी बाहर की बात बाहर से ही अंदर वाला बाहर वालों के लिए अंदर के व्यक्ति के द्वारा कहलवा देता है जिसका उम्दा उदाहरण अटल जी के समस्त संदेश स्व. महाजन जी द्वारा प्रसारित किए जाना था.

अब बालक और ज्यादा कन्फ्यूज था, शायद किसान होता तो आत्महत्या कर लेता मगर सारांश में इतना समझ पाया कि बाहर की बात झूठी और अंदर की बात सच्ची, अगर अफवाह न हुई तो और अफवाह और अंदर की बात के बीच भेद करना अभी उसके लिए बिना अनुभव के संभव नहीं.

फिर भी हिम्मत जुटा कर वो पूछ ही लेता है कि फिर वो मास्साब की चोरी की इन्क्वायरी वाली बात तो अंदर की बात कहलाई.

मुझे जबाब नहीं सुझता और मैं सर दर्द का बहाना बना कर निकल लेता हूँ यह कहते हुए कि जब तुम्हारे मास्साब आ जायें, तो उनसे पूछ लेना. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 13, 2008

बारिशों का मौसम है...

न तो साहित्यकार हूँ और न ही कवि. एक आम अदना सा ब्लॉगर हूँ. दिन भर मौका निकाल निकाल कर बाकी ब्लॉग्स पर ताका झाँकी करता रहता हूँ, आहें भरता हूँ कि हाय हसन, यूँ हम क्यूँ न हुए?

एक से एक लिख्खाड़, एक से एक कवि, एक से एक आवाज के धनी पॉड कास्टर और उन सब से बढ़ कर एक से एक शब्दों के जादूगर गद्यकार. नाम तो खैर किसी का नहीं लेता मगर सब मिल जुल कर एक ही काम करते हैं: मेरा खून जलाते हैं और मैं सोचता रह जाता हूँ फिर वही..काश!!! हम ये क्यूँ न हुए.

यह सब तो बस सोच की बातें हैं. शायद और भी ऐसा ही सोचते हों. मुझे क्या पता.

कुछ दिन पहले महावीर जी और प्राण शर्मा जी से बात चलती थी. वो ऑन लाईन मुशायरा कर रहे थे. बड़ा भव्य आयोजन किया. मुझे जैसे कवि को भी न जाने किस सोच में आमंत्रित कर लिया और मैने अपने आपको धन्य महसूस किया. उनकी गल्ती और धन्य हम हो लिये. बड़े बड़े कवि/ कवियत्री शिरकत कर रहे थे, हम भी बीच में ठस लिये. अपनी सबसे बेहतरीन, अपनी समझ से, कविता भेज दी. तब पता चला कि लिस्ट से नाम कट जायेगा क्यूँकि बारिश पर लिखना है. समय कम, पुरानी लिखी में कोई बारिश पर लिखी नहीं..क्या करें. लगे जल्दी जल्दी लिखने. आखिर ऐसे मौके कब आ पाते हैं जब इतने बड़े नामों के साथ आप खड़े हों और इतने नामी गिरामी आय्जक आपको निमंत्रण दें. जल्दी जल्दी जो बन पड़ा, भेज दिया. आप भी पढ़ें और इन पॉड कास्टरर्स के चलते, सुनें भी:


पहले बारिश पर एक दोहा सुनें:

बारिश बरसत जात है, भीगत एक समान,
पानी को सब एक हैं, हिन्दु औ’ मुसलमान.

अब एक गीत:

barish


बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

सांस सावनी बयार, बन के कसमसाती है
प्रीत की बदरिया भी ,नित नभ पे छाती है
इस बरस तो बरखा का ,तुमहि से तकाजा है
मीत तुम चले आओ ,ज़िन्दगी बुलाती है

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

खिल उठे हैं फूल फूल, भ्रमर गुनगुनाते हैं
रिम झिमी फुहारों की, सरगमें सुनाते हैं
उमड़ घुमड़ के घटा, भी तो यही कहती है
साज बन के आ जाओ, रागिनि बुलाती है.

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

झूम रही है धरा ,ओढ़ के हरी ओढ़नी
किन्तु है पिपासित बस ,एक यही मोरनी
इससे पहले दामिनी ,नभ से दे उलाहने
प्रीत बन चले आओ, प्रेयसि बुलाती है

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

--समीर लाल 'समीर'

पुनः एक बार आभार, महावीर जी का और प्राण शर्मा जी का.


यहाँ सुनिये यह कविता:

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गुरुवार, अगस्त 07, 2008

अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो...

अब जो किये हो दाता, ऐसा ना कीजो
अगले जनम मोहे बेटवा ना कीजो ऽऽऽऽ

Ash

अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो!!

अब के कर दिये हो, चलो कोई बात नहीं. अगली बार ऐसा मत करना माई बाप. भारी नौटंकी है बेटा होना भी. यह बात तो वो ही जान सकता है जो बेटा होता है. देखो तो क्या मजे हैं बेटियों के. १८ साल की हो गई मगर अम्मा बैठा कर खोपड़ी में तेल घिस रहीं हैं, बाल काढ़ रही हैं, चुटिया बनाई जा रही है और हमारे बाल रंगरुट की तरह इत्ते छोटे कटवा दिये गये कि न कँघी फसे और न अगले चार महिने कटवाना पड़े. घर में कुछ टूटे फूटे, कोई बदमाशी हो बस हमारे मथ्थे कि इसी ने की होगी. फिर क्या, पटक पटक कर पीटे जायें. पूछ भी नहीं सकते कि हम ही काहे पिटें हर बार? सिर्फ यही दोष है न कि बेटवा हैं, बिटिया नहीं.

बेटा होने का खमिजियाना बहुत भुगता-कोई इज्जत से बात ही नहीं करता. जा, जरा बाजार से धनिया ले आ. फलाने को बता आ. स्टेशन चला जा, चाचा आ रहे हैं, ले आ. ये सामान भारी है, तू उठा ले. हद है यार!!

जब देखो तब, सारा फेवर लड़की को. अरे बेटा, कुछ दिन तो आराम कर ले बेचारी, फिर तो पराये घर चले जाना है. उनके लिए खुद से क्रीम पावडर सब ला ला कर रखें और वो दिन भर सजें. सिर्फ इसलिये कि कब लड़के वालों को पसंद आ जाये और उसके हाथ पीले किये जायें. हम जरा इत्र भी लगा लें तो दे ठसाई. पढ़ने लिखने में तो दिल लगता नहीं. बस, इत्र फुलेल लगा कर शहर भर लड़कियों के पीछे आवरागर्दी करते घूमते हो. आगे से ऐसे नजर आये तो हाथ पैर तोड़ डालूंगा-जाओ पढ़ाई करो.

बिटिया को बीए करा के पढ़ाई से फुरसत और बड़े खुश कि गुड सेकेंड डिविजन पास हो गई. हम बी एस सी मे ७०% लाकर पिट रहे हैं कि नाक कटवा दी. अब बाबू के सिवा तो क्या नौकरी मिलेगी. अभी भी मौका है थोड़ा पढ़ कर काम्पटिशन में आ जाओ, जिन्दगी भर हमारी सीख याद रखोगे. पक गया मैं तो बेटा होकर.

जब कहीं पार्टी वगैरह में जाओ कोई देखने वाला नहीं. कौन देखेगा, कोई लड़की तो हैं नहीं.

-लड़का लड़की को देखे तो आवारा कहलाये और कोई लड़की देखे तो उनकी नजरे इनायत.

-लड़की चलते चलते टकरा जाये तो मुस्कराते हुए सॉरी और हम टकरा जाये तो ’सूरदास है क्या बे!! देख कर नहीं चल सकता.’

-उनके बिखरे बाल, सावन की घटा और हमारे बिखरे बाल, भिखारी लगता है कोई.

-उनके लिए हर कोई बस में जगह खाली करने को तैयार और हमें अच्छे खासे बैठे को उठा कर दस उलाहने कि जवान होकर बैठे हो और बुजुर्गों के लिए मन में कोई इज्जत है कि नहीं-कैसे संस्कार हैं तुम्हारे.

हद है भई इस दोहरी मानसिकता की. हमें तो बिटिया ही कीजो, नहीं तो ठीक नहीं होगा, बता दे रहे हैं एक जन्म पहले ही. कोई बहाना नहीं चलेगा कि देर से बताया.

ऑफिस में अगर लड़की हो तो बॉस तमीज से बात करे, कॉफी पर ले जाये और फटाफट प्रमोशन. सब बस मुस्कराते रहने का पुरुस्कार और हम डांट खा रहे हैं कि क्या ढ़ीट की तरह मुस्कराते रहते हो, शरम नहीं आती. एक तो काम समय पर नहीं करते और जब देखो तब चाय के लिए गायब. क्या करें महाराज, रोने लगें? बताओ?

अगर पति सही आईटम मिल जाये तो ऑफिस की भी जरुरत नहीं और आराम ही आराम. जब जो जी चाहे करो बाकी तो नौकर चाकर संभाल ही रहे हैं. आखिर पतिदेव आईटम जो हैं. जब मन हो सो कर उठो, चाय पिओ, नाश्ता करो और फिर ठर्रा कर बाजार घूमों, टीवी देखो, ब्लॉगिंग करो..फिर सोओ. रात के लिए क्या बनना है नौकर को बता दो, फुरसत!! क्या कमाल है, वाह. काश, हम लड़के भी यह कर पायें.

क्या क्या गिनवाऊँ, पूरी उपन्यास भर जायेगी मगर दर्द जरा भी कम न होगा. रो भी नहीं सकता, वो भी लड़कियों को ही सुहाता है. उससे भी उनके ही काम बनते हैं. हम रो दें तो सब हँसे कि कैसा लड़का है? लड़का हो कर रोता है. बंद कर नौटंकी. भर पाये महाराज!!

बस प्रभु, मेरी प्रार्थना सुन लो-अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो. हाँ मगर ध्यान रखना महाराज, रंग रुप देने में कोताहि न बरतना-इस बार तो लड़के थे, चला ले गये. लड़की होंगे तो तुम्हारी यह नौटंकीबाजी न चल पायेगी. जरा ध्यान रखना, वर्कमैनशिप का. उपर वाली फोटू को सुपरवाईजरी ड्राईंग मानना, विश्वकर्मा जी. १९/२० चलेगा-खर्चा पानी अलग से देख लेंगे.

ब्लॉगिंग स्पेशल: अगर लड़की होऊँ तो कुछ भी लिखूँ, डर नहीं रहेगा. अभी तो नारी शब्द लिखने में हाथ काँप जाते हैं. की-बोर्ड थरथरा जाता है. हार्ड डिस्क हैंग हो जाती है कि कहीं ऐसा वैसा न लिख जाये कि सब महिला ब्लॉगर तलवार खींच कर चली आयें. हालात ऐसे हो गये हैं कि नारियल तक लिखने में घबराहट होती है कि कहीं नारियल का ’यल’ पढ़ने से रह गया, तो लेने के देने पड़ जायेंगे. इस चक्कर में कई खराब नारियल खा गये मगर शिकायत नहीं लिखी अपने ब्लॉग पर.

बस प्रभु, अब सुन लो इत्ती अरज हमारी...
अगले जनम में बना देईयो हमका नारी..


चित्र साभार: गुगल ईमेज Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अगस्त 04, 2008

कुछ तो बदलना चाहिये!!

मित्र के पिता जी नहीं रहे.

यूँ भी एक न एक दिन तो नहीं ही रहना था-काल करे सो आज कर-की तर्ज पर आज ही नहीं रहे. सामने सामने प्यार से सब उन्हें बाबू जी कहते थे.

बहुत ही भले आदमी थे हर स्वर्गवासी की तरह. अंतर बस इतना था कि वो जब तक जिन्दा रहे, दूसरों की तकलीफों के प्रति अति संवेदनशील थे. मरने के बाद का पता नहीं मगर शायद मरते वक्त उन्हें आभास नहीं हो पाया होगा कि वो जा रहे हैं अन्यथा मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी को कोई तकलीफ न हो इसलिये वो खुद ही पाँच मिनट पहले बस से शमशान चले जाते और चिता पर लेट कर ही अंतिम सांस लेते याने कि पर-तकलीफ के प्रति संवेदनशीलता की पराकाष्टा.

अन्य मित्रों की भाँति मैं भी शमशान गया था उनको अंतिम विदाई देने. बिल्कुल गमगीन चेहरा, आँख पर काला चश्मा और मूँह में पान मसाला कि भूले से भी कोई शब्द न फूटे. बस, मौन की आवाज, सामने जलती चिता, हवाओं की सरसराहट, पसीने की चिपचिप और शमशान का सन्नाटा. गम का इससे बेहतर सीन क्या हो सकता है?

पूरा माहौल सेट मगर कुछ नालायक किसम के लोग पास ही खड़े हँसी मजाक भी कर रहे थे और अनाप शनाप राजनिती से लेकर शहर की बिजली, पानी की कभी न हल हो सकने वाली शास्वत समस्या पर कभी न खत्म होने वाली शास्वत बातचीत. मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं. अरे भाई, गम का माहौल है, कुछ देर मत हंसों, कुछ देर इन समस्याओं को दर किनार करो. गम में शामिल रहो. ऐसे नहीं चुप रह सकते तो पान दबा लो सुरती वाला मगर चुप रहो. खराब लगता है जिसके घर गमी हुई है उसे. उसकी मजबूरी है वो चाह कर भी हँस नहीं सकता और उसे तो मूँह उतारे खड़े ही रहना है और तुम हो कि मूँह बाये तो ऐसा कि बंद ही नहीं कर रहे हो.

वो तो खुद ही जल्दी में है, आधे घंटे भी उसे भारी लग रहे हैं. क्या तुम उतना भी साथ नहीं दे सकते? कैसे दोस्त हो यार? देखा नहीं, कितनी फटाफट धोती पहनी. चिता के दो चक्कर काट कर लगे पंडित की तरफ देखने और फिर उसके कहने पर दौड़ कर तीसरा चक्कर काटा. फट से दाग दी और जल्दी आग पकड़े इसलिये दनादन धौंख मरवाई. इधर से घी डालो, उधर से घी डालो-ये दूसरे भाई बोल रहे हैं जिन्होंने दाग नहीं दी. वो भी लगे हैं जल्दी आग पकड़े. पांच मिनट पहले से ही कपाल क्रिया के लिये लट्ठ उठाये खड़े पंडित जी की तरफ ताक रहे हैं कि कब वो कहें और ये सर फोड़े. चंदन फैंके और घर निकलें. गर्मी भी तो कितनी है? सर पर सीधे तपता सूरज और सामने चिता का ताप. बाप रे बाप!!

बाबू जी तो निकल लिये और सुना है उपर तो बढ़िया ठंडक रहती है. हवाई जहाज में बाहर का तापमान बताता है एकदम ठंडा हर समय, तब ये तो उससे भी उपर निकले हैं. न धूल, न धक्कड़-पोल्यूशन फ्री-कूल कूल. अब तक तो वो डेस्टीनेशन पर टच कर रहे होंगे-कोई भारतीय रेल से तो गये नहीं हैं कि चले जा रहे हैं-गंतव्य आ ही नहीं रहा या फिर नोयडा से कनॉट प्लेस जा रहे हों कि ट्रेफिक में फंसे के फंसे ही रह गये और सुबह से शाम हो ली.

फिर सब लोग वहीं पेड़ के नीचे जमा हुए. भाषण अधिभार हमारा क्षेत्र था सो चबूतरे पर मित्र हमारे बाजू में सर झुकाये खड़े हो लिये और बोले हम, भारी भर्राई आवाज में:

" बाबू जी नहीं रहे. वे व्यक्ति नहीं, एक युग थे. आज एक युग समाप्त हुआ आदि आदि जरुरी व्यवहारिक फैशनारुप नियमित अंतिम क्रिया के बाद की बातें. आदतन बीच में एक पुराना शेर भी ठेल दिया:

जिन्दगी मानिंद बुलबुल शाख की,
दो पल बैठी, चहचहाई और उड़ चली"


कवियों के साथ ये बीमारी है. मंच दिखा, श्रोता दिखे और मन मचल उठता है. सो, मैं बीमार, लोभ संवरण न कर पाया. फिर कब अस्थि संकलन है आदि के बाद दो मिनट के नाम पर ३० सेकेंड का मौन रख फुर्ती से विदाई.

खैर, बाबू जी चले गये ठंडे में और पीछे रह गये उनके पुत्र याने हमारे मित्र गर्मी में-एकदम खड़ी धूप. यही होता है जब गर्मी में सर से साया हट जाये. शायद किसी के बुजुर्ग ऐसी ही गरमी में निकल लिये होंगे और शमशान चिंतन तो जग प्रसिद्ध है, तब उसी चिंतन के क्षणों में उसने यह कहावत रची होगी:

"बुजुर्ग एक वट वृक्ष से साये की तरह होते हैं."

इस बीच एक दो बार और भी उनके घर जाना हुआ. सब रिश्तेदारों का जमावड़ा. कहीं नाश्ता चाय. कहीं मामा गाना अच्छा गाते हैं, तो उनको घेरे रिश्तेदार लोग गाना सुन रहे हैं. कहीं बड़े दिनों बाद मिल रहे कजिन्स ताश जमाये बैठे हैं. कोई अनजान हो, तो समझे घर में शादी है.

brahmin

बात यूँ निकल पड़ी कि आज उनकी तेहरवीं थी. मित्र ने सर मुंडवा रखा था. बकौल कई दोस्त, उस पर यह स्टाईल बहुत सूट कर रही थी. एकदम कूल ड्यूड. बड़े बेहतरीन बेहतरीन व्यंजन मनुहार कर कर के खिलाये जा रहे थे. हमारे मित्र प्रसन्न मुद्रा में सभी आंगतुकों का स्वागत कर रहे थे. चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान. हँसी ठ्ट्ठे की फुहार हर तरफ.

हमने भी लुत्फ उठाया स्वादिष्ट व्यंजनों का. बकौल हमारे मित्र याने दिवंगत के पुत्र, शहर के सबसे बेहतरीन केटरर ने जो बनाया था, फिर लज़ीज तो होना ही था. वाह!! निकल पड़ा हमारे मूँह से अनायास ही. पता चला चमचम बनारस से बुलवाये हैं. कहिन कि बाबू जी को बहुत पसंद थे. पता नहीं कब पसंद थे, हमारे होश में तो हमने उन्हें मुहल्ले की हलवाई की दुकान पर जाते तक कभी नहीं देखा, फिर बनारस के चमचम पसंद, वो भी ठेठ जबलपुरिया को-जो कभी जबलपुर के बाहर गया ही नहीं. सारे रिश्ते-नातेदार यहीं. उनकी लीला वो जाने, हमें तो चमचम बहुत पसंद आये. दो खा लिये.

चलते चलते वे हमसे पूछ बैठे-"और कब तक हो इंडिया में?"

हमने बताया कि अभी तो अप्रेल के आखिर तक हैं तो बड़े खुश हो लिये और कहने लगे कि चलो, अब आज सब झंझट से फुरसत हुए जा रहा हूँ. तुम तो जानेते ही हो कि कब से यह सब लफड़े लगे थे..पहले तो पिता जी बहुत दिन बीमार रहे फिर ......खैर, बस एकाध दिन में सब रिश्तेदार निकल लें तो बैठते हैं तुम्हारे साथ फिर महफिल जमें. वो जो बोतल कनाडा से लाये हो, वो तो रखी होगी न कि साफ हो गई.

मैं उस दुखी मित्र (अरे भाई, उसके पिता को गुजरे अभी मात्र १३ दिन ही तो हुए हैं) को यह बता कर और दुखी नहीं करना चाहता था कि ४ महिने हो गये हैं हमें आये. अगर न भी साफ करते तो अल्कोहल तो अब तक हवा में ही उड़ लेती, और बोतल मिलती ऐसी ही खाली. इसलिये, हाँ में हाँ मिला कर चल दिया.

सोचता हूँ कि हम सब भी एक न एक दिन किसी न किसी के लिये ऐसे ही लफड़े साबित होंगे और वो भी फुरसत होकर महफिल जमाने की फिराक में लगेंगे. बस, यह शेर याद आ लिया:

देखो भाईया, सब कुछ पारी पारी है...
आज तेरी है तो कल मेरी बारी है....

शायद वक्त आ गया है कि पुरातन परंम्पराओं को कुछ आसान किया जाये इसके पहले कि हमारी खुद की फजीहत हो.

पुनश्चः : किसी की भावनाओं को आघात पहुँचाना इस आलेख का उद्देश्य कतई नहीं है. बस जैसा देखा और जैसा मन में आया कि बदलना चाहिये, उस हिसाब से लिख दिया. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 30, 2008

ये सॉलिड तरीका हाथ लगा!!!

किसी ने कहा है कि अगर ससम्मान जीवन जीना है तो वक्त के साथ कदमताल कर के चलो अर्थात जो प्रचलन में है, उसे अपनाओ वरना पिछड़ जाओगे. अब पार्ट टाईम कवि हैं, तो उसी क्षेत्र में छिद्रान्वेषण प्रारंभ किया. ज्ञात हुआ कि वर्तमान प्रचलन के अनुसार, बड़ा साहित्यकार बनना है तो दूर दराज के विदेशी कवियों की रचनाऐं ठेलो.

पोलिश कवियत्री, रुमानिया का कवि, उजबेकिस्तान का शायर, फ्रेन्च रचनाकार, और साथ में इटेलियन चित्रकार की चित्रकारी ससाभार उसी चित्रकार के, जैसे कि उसे व्यक्तिगत जानते हों. वैसे, बात जितनी सरल लग रही है, उतनी है नहीं. मन में कई संशय उठते हैं. अतः मैने अपने मित्र को किसी के द्वारा प्रेषित एक बड़े साहित्यकार द्वारा छापी एक विदेशी कवि की रचना मय चित्र भेज कर उसके विचार जानने चाहे. त्वरित टिप्पणी में उसे हमसे भी ज्यादा महारथ हासिल है. तुरंत जबाब आ गया. कहते हैं कि कविता तो खैर जैसी भी हो, विदेशी होते हुए भी हिन्दी पर पकड़ सराहनीय है.

मैं माथा पकड़ कर बैठ गया. लेकिन फिर सोचता हूँ कि इसमें उसकी क्या गल्ती है. अव्वल तो ऐसी कविताओं के साथ लिखा ही नहीं होता कि यह अनुवाद है या भावानुवाद या किसने किया है और अगर गल्ती से लिख भी दें तो कहीं कोने कचरे में हल्के से और कवि का नाम और उनका देश बोल्ड में.

मगर फैशन है तो है. सब लगे हैं तो हम क्यूँ पीछे रहें. शायद इसी रास्ते कुछ मुकाम हासिल हो.

मूल चिन्ता यह नहीं की कैसे करें? मूल चिन्ता है कि किसकी कविता का अनुवाद करें? वो बेहतरीन रचना मिले कहाँ से, जो हिन्दी में भी बेहतरीनीयत कायम रख सके? घोर चिन्तन और संकट की इस बेला में हमें याद आया हमारा पुराना संकट मोचन मित्र. उसकी दखल हर क्षेत्र में विशेषज्ञ वाली है और इसी के चलते कालेज के जमाने में उसे संकट मोचन की उपाधि से अलंकृत किया गया था हम मित्रों के द्वारा. संकट कैसा भी हो, उन्हें पता लगने की देर है और वो उसे मोचने चले आयेंगे. अतः हमने खबर कि संकट की घड़ी है, चले आओ और वो हाजिर.

विषय वस्तु समझने, सुनने और अनेकों उदाहरण जो मैने प्रस्तुत किये, देखने के बाद पूरी अथॉरटी से बोले: ’यार, तुम भी तो कविता लिखते हो? एकाध गद्यात्मक कविता निकालो अपनी डायरी से.’ हमने धीरे से अपनी एक कविता बढ़ा दी. एक नजर देखकर बोले, हाँ, यह चल जायेगी क्यूँकि कुछ खास समझ नहीं आ रही कि तुम कहना क्या चाह रहे हो!!’

फिर उन्होंने इन्टरनेट का रुख किया और गुगल सर्च मारी: ’स्विडन के फेमस लोग’. सर्च के जबाब में ओलिन सरनेम चार पाँच बार दिखा, नोट कर लिया. दूसरा सरनेम दो बार दिखा तो वहाँ से फर्स्ट नेम ’पीटर’ निकाल लाये और शीर्षक तैयार ’स्विडन के प्रख्यात जनकवि पीटर ओलिन की कविता’. मेरा तो नहीं मगर इस संकट मोचनवा का दावा है कि बहुतेरे लोग इसी तरह चिपका रहे हैं अपनी रचनाऐं विदेशी नाम से और चल निकले हैं.

आगे के लिए भी सलाह दी है कि अगर कविता तैयार न हो तो किसी भी जगह से ८-१० लाईन का अच्छा गद्य उठा कर कौमा फुलस्टाप की जगह बदलो. शब्दों की प्लेसिंग बदलो, थोड़ा कविता टाईप शेप देकर ठेल दो, तुम तो कवि हो, इतना तो समझते ही हो. एक विदेशी नाम मय देश के चेपों और बस, चल निकलोगे गुरु.

संकट मोचन तो हमारा संकट मोच चले गये, कहीं और मोचने और हम चेंप रहे हैं:

’स्विडन के प्रख्यात जनकवि पीटर ओलिन की कविता’

घुटन

gutana


सुबह सुबह
स्वच्छ, साफ सुथरा
वातावरण
शीतल शुद्ध
मंद बयार
पर झूमती हुई
पक्षियों की चहचहाहट
हरे भरे वृक्ष
मेरा मन
मोहित कर लेते हैं
जब मैं
टहलने निकलता हूँ ...

प्रफुल्ल मना
वहीं पार्क की
कोने वाली बेन्च पर-
सुस्ताने की खातिर
बैठ कर
खोलता हूँ
अखबार का पन्ना
और
मन घुटन से भर जाता है!

भावानुवाद: समीर लाल ’समीर’
(चित्र साभार: इटालियन चित्रकार एन्टोनी डी पॉम्पा, उनका बहुत आभार)


नोट: महज हास्य विनोद वश पोस्ट है. कोई आहत न हो और अपनी आदतानुसार जारी रहें. इस रचना का उद्देश्य उन्हें रोकना नहीं, वरना उसी अखाड़े में अपना हाथ आजमाना है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 27, 2008

एक टिप्पणी १२१ पोस्ट

जिस दिन लोकसभा में विश्वास मत के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, और सारे सांसदों के कारनामे खुले आम जनता के सामने आये, मैने एक टिप्पणी, इस विषय में पहली पोस्ट पर लिखी:

दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

फिर इसे नोट पैड में सुरक्षित भी कर लिया.

आज तक की सबसे ज्यादा चलने वाली टिप्पणी- बहुत खूब!! साधुवाद!! आम जनता की तरह अपने मूँह की खाई किनारे पड़ी रही और ये बिन सिर पैंदी की टिप्पणी अपनी विजय यात्रा पर निकली. हर जगह-जिस पोस्ट पर देखो..संसद, सांसद, उनका चरित्र, सोमनाथ दा का पार्टी निकाला, उन्होंने सही किया, उन्होंने गलत किया. सांसदों को ऐसे नोट नहीं चमकाने थे, सारे २५ करोड़ चमकाने थे आदि आदि...सब पर यह टिप्पणी कट पेस्ट से चमकने लगी: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!! सौजन्य-उड़न तश्तरी-समीर लाल...

हमने सोचा कि एक दो दिन में मामला शांत हो जायेगा तो यह टिप्पणी वाली फाईल डिलिट कर देंगे मगर फिर बैंगलोर में धमाके: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

कल अहमदाबाद में धमाके: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

अब तक १२१ से ज्यादा पोस्ट हो चुकी है, जिस पर मैं यह चिपकाते आ रहा हूँ. हे मानवता!! जागो!! मुझे मौका दो कि मैं यह टिप्पणी मिटाने दो...मैं अब और इसे करना नहीं चाहता. एक डर और है कि कहीं किसी कविता आदि पर न चिपक जाये जल्द बाजी में. मित्रों, इसे भूल चूक लेनी देने में डाल देना-माहौल के चलते हो गई होगी. :)

खैर!! इसी मसले पर मेरे गुरु गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी से बातचीत हो रही थी, तो दोनों की बातचीत कुछ कवित्तमय हो ली संसद कांड को लेकर. आप भी देखें:

उठा पटक के इस नाटक में,
किसको क्या क्या याद रहा...
दुर्योधन ने लाज बचाई,
कृष्ण बेचारे भूल गये...!!

बारिश की बूँदों ने रोका.
सूरज की किरणों ने टोका..
रुपयों की बारिश देखी तो,
झोली फ़ैलाना भूल गये!!

कुटिल हुईं कौटिल्य नीतियां
करें राज अब विषकन्या
जिसने पाला पोसा, वे ही
मंतर सारे भूल गये!!

गांधारों के शकुनि आज सब
दिल्ली में आकर बैठे
इन्द्रप्रस्थ का सपना क्या था
हम बेचारे भूल गये!!

सत्ता की रावणी प्यास ने
कैसा खुल कर नॄत्य किया
शर्म- चूनरी शेहरावत की
लाज के मारे भूल गये!!

फिर न जाने क्यूँ मेरे मन में इस कविता ने जन्म लिया, जो आपका आशिर्वाद चाहती है:


नई महाभारत

मदारी का खेल
मसखरों का जमावड़ा
कुछ कुश्ती, कुछ दंगल,
एक सांस्कृतिक मंचन
मंच का नाम 'संसद'!!

लोकतांत्रिक तरीके से
लोकतंत्र का चीरहरण करते
युग पुरुष
लाज बचाना
भूल गये हैं कृष्ण
हँसते हैं
और उनके साथ
ताली बजाते पांडव,

मंद मंद मुस्कराते
भीष्म पितामह,
कलयुग में
क्या नहीं होता
सब हैं
एक नई महाभारत
नित रचने के लिए!!

जनता
अपने ही चमत्कार से
रोज चमत्कृत होती
अपने ही चयन को
मूँह बाये
आश्चर्य से देखती
कुंठा
और खीज
की गठरी
सर पर लादे...

सावनी अमावस्या से भी काली
घुप्प अंधेरी सुरंग मे,
मौन के सम्वेत स्वर के
कर्णभेदी
भयावह अट्टाहस
के बीच
चंद खुली सांसों की
एक ख्वाहिश लिए...

दिशाहीन
अप्राप्य रोशनी
के एक सपने
का पीछा करते
भटकती चली जा रही है..

उफ़!!!

कितनी जटिल है यह चाह
विकासशील
से विकसित होने की!!

--समीर लाल 'समीर'


---कल और आज कोई टिप्पणी नहीं की. दो दिन बाद अभी अमेरीका से लौटा हूँ याने कल सुबह से...फिर शुरु!! :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जुलाई 21, 2008

हाय रे, ये जी का जंजाल!!

मुन्नू याने पिछले ढाई दशक से भी ज्यादा समय से मेरे जी का जंजाल.

मेरे मित्र शर्मा जी का बेटा है. पारिवारिक मित्र हैं तो सामन्यतः न पसंदगी को भी पसंदगी बता कर झेलना पड़ता है. शायद शर्मा जी का भी यही हाल हो मगर उससे हमें क्या?

मुन्नू क्या पैदा हुए, शर्मा शर्माइन सारी शरम छोड़ कर उसी के इर्द गिर्द अपनी दुनिया सजा बैठे. फिर क्या, मुन्नू ने आज माँ कहा, मुन्नू आज गुलाटी खाना सीख गये, मुन्नू चलने लगे. मुन्नू सलाम करना सीख गये और जाने क्या क्या. हर बात की रिपोर्टिंग बदस्तूर फोन के माध्यम और आ आकर या बुला बुलाकर मय प्रदर्शन के जारी रही.

बेटा, समीर अंकल को सलाम करो..बीस बार बोलने पर मुन्नू भी टुन टान करके एक बार सलाम किये..फिर क्या, सब लगे उसे चूमने..खूब खुश होकर अतः हम भी खुशी से हँसे. वाह, वेरी गुड करते हमारा मूँह दुख गया मगर शर्मा दंपत्ति न थके. नित नये किस्से.

देखते देखते मुन्नू चार साल के हो गये. दीवार से लेकर फ्रिज तक पर पेन्टिंग ड्राईंग में महारत हासिल कर ली. मूंछ वाली रेलगाड़ी, कुत्ते से बदत्तर सेहत वाला पंखधारी शेर, गमले में उगता आधा कटा पपीते के आकार का सेब, नीला केला..सब बनाना सीख गया. शर्मा दंपत्ति का सीना गर्व से फूला न समाता और हम एक चाय की एवज में वाह वाह करते रह जाते.

वाह वाही से बालक मुन्नू इतना उत्साहित हुए कि एक दिन हमारे ड्राईंग रुम की दीवार पर उड़ती हुई मछली के सर पर गुलाब का फूल उगा गये. अब हमें काटो तो खून नहीं, मगर क्या करते. खुद ही तो वाह वाह करके उत्साहित किये थे. मिटा भी नहीं सकते, शर्माइन के बुरा मान जाने का खतरा. वो तो इस चक्कर में साल भर बाद एक पैच मिटाने के लिए पूरे घर को पेन्ट करवा कर बहाना बनाया कि पेन्ट छूटने लगा था, तब बच पाये.

आप भी देखें मुन्नू की कला का एक नमूना:

kid draw

अब तक मुन्नू स्कूल जाने लगे. हमारे लिए नई जहमत रोज साथ लाने लगे. अब जब भी वो लोग बुलायें या हमारे यहाँ आयें तो कभी गिनती, कभी ए बी सी, कभी पहाड़ा और कभी कविता. दोनों हाथ एक के उपर एक चिपका कर दोनों अंगूठे उड़ा उड़ा कर नचाते हुए..

मछली जल की रानी है..(पीछे पीछे शर्माइन बैकअप में..हाथ लगाओ...!!!)
हाथ लगाओ, डर जाती है (शर्माइन की देखादेखी डरने का अभिनय करते हुए और फिर दोनों हाथ समेट कर बाजू में उस पर गाल टिकाते हुए)
बाहर निकालो...(आँख बंद करके मरने का अभिनय) मर जाती है....

शर्मा शर्माइन की तालियाँ..मैं सोचने लगा कि कितनी खुश किस्मत है यह मछली जो मर गई, मुन्नू की जमाने से सुनी जा रही घिसी पिटी कविता से निजात पा गई और हम अटके हैं जब मुन्नू पुनः मनुहार पर जैक एण्ड जिल सुनाने की ऐंठते हुए तैयारी कर रहे हैं. दिखाने के लिए हम भी ताली बजाते रहे और मुन्नू सुनाना शुरु हुए...


जैक एण्ड जिल....और अंतिम पंक्ति में...

जिल केम टंम्बलिंग आफ्टर...

और मुन्नू जी पूरी तन्मन्यता से धड़धड़ा कर गिरे. सबने ताली बजाई, मुन्नू हँसे, हम दिल दिल में रोये.चेहरे पर मुस्कान चिपकाये ताली बजाने लगे., समझिये कि भयंकर झेले. सर पकड़ लिया. घर पर सेरीडॉन की सर दर्द गोली का पत्ता हफ्तावारी लिस्ट में शामिल हो गया. लगने लगा जैसे सेरीडॉन ने शर्मा जी को अपना ब्रॉण्ड एम्बेसडर बना दिया हो. उन्हें देखते ही इसकी याद आ जाये.

अच्छा या बुरा, कहते हैं कैसा भी वक्त हो, गुजर ही जाता है. सो यह भी गुजरा. झेलते झिलाते मुन्नू २६ साल के हो लिये. दो महिने पहले उनका भारत में ब्याह भी कर दिया गया. तब से आज तक बुल्लवे पर उनके घर चार बार हम जा चुके है और वो हमारे घर प्रेशर क्रियेट कर बुल्लवे पर तीन बार आ चुके हैं. हर बार शादी के चार फोटो एलबम, जिसमें हल्दी, मेंहदी, शादी, रिसेप्शन और फिर हनीमून की तस्वीरें हैं और इन्हीं विभिन्न समारोहों का विडियो देख देख कर पक चुके हैं. ये बुआ जी, ये चाची, ये दादी, ये साला, ये दूर की साली-इन्फोसिस में, ये गुलाबी साड़ी में नौकरानी छल्लो, ये भूरा ड्राईवर..ये ये...वो वो...हाय, मेरे कान क्यूँ न फट गये, आँख क्यूँ न फूट गई. कहो उनकी बहू जिन रिश्तेदारों को न पहचाने, उन्हें हम बिना मिले अंधेरे में पहचान जायें, बिना किसी गफलत के. एक बार फिर घर में सेरीडॉन चल निकली है.

कल रात आये थे..इस बार शादी का विडियो बर्न करके दे गये हैं क्यूँकि हमें बहुत पसंद आया था. :) अगली बार लेड़ीज संगीत वाला भी बना कर दे जायेंगे, यह बात उन्होंने समय की कमी के कारण क्षमा मांगते हुए बता दी है. अब तो जब उस विडियो पर नजर जाती है, बस मन से एक ही उदगार निकलता है-

धन्य हो तुम..मेरे मुन्नू.

हम आगे के लिए भी तैयार हैं, जब अगले बरस तुमको बच्चा होगा. हमें तो मानो परम पिता परमेश्वर ने किसी पुराने जन्म का बदला लेकर सिर्फ झेलने को रचा है.

शायद, पिछले जनम में कवि रहा होऊँगा और लोगों को खूब झिलवाया होगा.


डिस्क्लेमर:
जिनके बच्चे छोटे हों या अभी अभी शादी हुई हो, वो कृप्या इस पोस्ट को दिल से न लें. बदस्तूर जारी रहें. ऐसे ही दुनिया चल रही है. जब हमने झेला है तो हम किसी और को क्यूँ बचवायें.

सूचना:

मेरी पिछली पोस्ट उड़ी उड़ी रे पतंग देखो उड़ी रे ने मुझे आजतक एक पोस्ट पर प्राप्त अधिकतम टिप्पणियों का रिकार्ड ८४ को ब्रेक करते हुए नया मुकाम हासिल किया है, आप सबके स्नेह का बहुत आभारी हूँ. ऐसा ही स्नेह और आशीष बनाये रखें, संबल मिलता है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 17, 2008

उड़ी उड़ी रे पतंग देखो उड़ी रे!!!

सबको सुबह की चाय देने से आंगन लीपने तक सब काम निपटा कर वह अब नहा कर बाल सुखाने छत पर चली आई थी. पूरा आसमान रंग बिरंगी पतंगों से पटा पड़ा था और एकदम रंगीन हो उठा था. उसने एक नजर आसमान पर डाली और अटक गई उस दूर उड़ती आधे पीले और आधे नीले रंग वाली पतंग में.

patang

मानो वो उसके सपने हों जिसे वो बचपन से देखती आई थी. कुछ नीले, कुछ पीले और कुछ नीले पीले मिले हुए धानी सपने.

नीले सपने, हाँ एकदम नीले! देखती थी बचपन से. देखती कि वो भईया हो गई. स्वच्छंद गली के लड़कों के साथ सारा सारा दिन खेल पा रही है, न कोई रोक न कोई टोक. बस, भईया होते ही वो साईकिल लेकर दोस्तों के साथ पूरे गांव में घूम रही है. घर का कोई साथ नहीं. न कोई पूछने वाला कि कहाँ जा रही हो और कब लौट कर आओगी. बड़े होने तक वो नीले सपने देखती चली गई. भईया बन पास के गांव में ८ वीं से आगे पढ़ने जा रही है. पिता जी के साथ दुकान में हाथ बटा रही है और न जाने क्या क्या!! बस, एक स्वच्छंद एवं बेरोक टोक जीवन जीने की चाह.

कभी पीले सपने देखने लग जाती. किताबों में विदेश की तस्वीरें देखती थी. सपने में वहीं पहुँच जाती. गोरे गोरे उजले साफ सुथरे लोग. रुई के फुओं से, बादलों की तरह बिखरे बरफ के मैदान और उनमें गिर गिर के बल खाती, इठलाती, खेलती वो. बड़ा सा गोला बना कर अपने सपनों के राजकुमार पर उछाल कर खिलखिलाती वो. फिर पीले नीले मिले जुले धानी सपने. वो भईया की तरह पतलूम कमीज पहने अपने सपनों के राजकुमार पति की बाहों में झूलती रोशन विदेशी संसार में खोती जाती, डूबती जाती. पाश्चात संगीत की स्वर लहरी पर झूमती वो. अपने सपनों में सपनों को सच होता देखती वो.

बस उलझी रही एकटक उस पीली नीली पतंग में. दूर बहुत दूर, ऊँचे आसमान में खूब उपर. इतनी ऊँचाई कि धुंधली होती दिखती पतंग. बड़ी लेकिन एकदम छोटी सी दिखती पतंग. सोचने लगी, शायद, उतनी उपर से पतंग को उस पार विदेश भी दिखता होगा. एक मुस्कराहट सी तैर गई उसके चेहरे पर.

एकाएक काली पतंग ने आकर उस पीले नीले रंग वाली पतंग को काट दिया और वो पीली नीली पतंग अपने अस्तित्व को नाकारती हवाओं के थपेड़ों संग बह चली, जहाँ तक हवा उसे उड़ा कर ले गई और फिर कटीली झाड़ियों में उलझ कर हो गई छिन्न भिन्न. जैसे उसके सपनों का ढहता महल.

आँसू बस गिरने को ही थे कि एकाएक राजू उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ कर बोला "माँ" मानो उसको यथार्थ की दुनिया में वापस ले आया हो.

वो उसके साथ नीचे उतर आई. माँ की पूजा भी खतम होने को है. वो सर पर पल्लू रख लेती है. पति, जो कि स्कूल में बाबू हैं, उनके खाने पर आने का वक्त भी हो चला है.

जल्दी से वो खाना बनाने में जुट जाती है. खिचड़ी, चोखा और तिल के लड्डू.

उसे याद है, आज मकर संक्राति है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 13, 2008

हाय!! ये बदलता नज़रिया

यह रचना आज की सामाजिक परिस्थितियों पर मेरे खराब स्वास्थय के दौरान कुनैन की गोलियों की कड़वाहट मूँह में लिए, बदलते नज़रिये पर लिखी गई है. निवेदन है कि कृप्या उन्हीं स्थितियों का आभास करते हुए पढ़ें, शायद ज्यादा मजा आये.

हाय!! ये बदलता नज़रिया

Change

मैं
मलेरिया ग्रसित हूँ!!
सिगार के धुऐं से भी कड़वी
कुनैन की कड़वाहट
स्वाद ग्रन्थियों पर अपना कब्जा जमाये
पूरे मानस पटल पर आच्छादित
हो चुकी है..

अतीत की कड़वी स्मृतियाँ
हर खाँसी के संग उठते
पसलियों के दर्द के साथ
ताजी हो उठती हैं..
मैं
वेदना से कराहता
पूरे वातावरण में
कड़वाहट ही कड़वाहट
महसूस कर रहा हूँ!

कल तक
जो मुझे लुभाते थे
मुस्कराते फूल
गीत सुनाती चिड़िया
बेहतर मानवियता का परिचय देते
मुस्कराते खुश लोग..
आज न जाने क्यूँ
मेरा परिहास करते
नज़र आते हैं..

यों तो कुछ नहीं बदला
जानता हूँ मैं
वे सब
बिल्कुल वैसे ही हैं, जस के तस..
बदला हूँ मैं..बस मैं.

मैं--जो
मलेरिया ग्रसित हूँ!!
सिगार के धुऐं से भी कड़वी
कुनैन की कड़वाहट
स्वाद ग्रन्थियों पर अपना कब्जा किये
पूरे मानस पटल पर आच्छादित
हो चुकी है..

हाँ
इतनी कड़वाहट के बावजूद भी
दिल से बस यही
भाव उठते हैं..
आस लिये
शायद
कल जब मैं
मलेरिया के
प्रकोप से मुक्त हो जाऊँ
और दुनिया की उस खुशनुमा असलियत में लौटूँ.
मुझे जो दुनिया पसंद है…..

लेकिन
पता नहीं क्यों
हावी होने लगी है
यही कड़वाहट
सिगार के धुँये से भी कड़वी
मेरी आंखों पर
और दिखता है मुझे
पूरे का पूरा
मलेरिया ग्रस्त
समाज....
दुनिया....
लोग.....
और फिर
न जाने क्यों
और भी कड़वाहट
घुल जाती है
मेरे मुँह में.....

-समीर लाल ’समीर’

स्वास्थय अपडेट: बुखार अब बिल्कुल नहीं है. बदन दर्द से भी लगभग निजात मिल गई है. खाँसी जारी है अपनी पूरी ताकत से. जल्द राहत की उम्मीद है. टिप्पणियाँ देना और ब्लॉग पढ़ना काफी कम है मगर जल्द लौटने की उम्मीद है. इस बीच आप सबका साथ सराहनीय है. आज राजस्थान पत्रिका में छपे आलेख का जिक्र भी जरुरी है. जरुर देखें: यहाँ क्लिक करें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 10, 2008

एक सूचना, फिर हाले दिल और फिर लघु कथा

सूचना

'महावीर' ब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)

वरिष्ठ लेखक, समीक्षक, ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की प्रेरणा से जुलाई १५, २००८ एवं जुलाई २२,२००८ को 'महावीर' ब्लॉग पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।

इस ब्लाग पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों और कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को दो भागों में दिया जा रहा है। पहला भाग १५ जुलाई और दूसरा भाग २२ जुलाई २००८ को दिया जायेगा।
देश-वदेश से शायरों और कवियों में प्राण शर्मा, लावण्या शाह, तेजेन्द्र शर्मा, देवमणि पांडेय, राकेश खण्डेलवाल, सुरेश चन्द्र "शौक़",कवि कुलवंत सिंह, समीर लाल "समीर",नीरज गोस्वामी, चाँद शुक्ला "हदियाबादी",देवी नागरानी, रंजना भाटिया, डॉ. मंजुलता, कंचन चौहान,डॉ. महक, रज़िया अकबरमिर्ज़ा, हेमज्योत्सना "दीप" आदि पधार रहे हैं।
आप से निवेदन है कि उनकी रचनाओं का रसास्वादन करते हुए ज़ोरदार तालियों (टिप्पणियों) से मुशायरे की शान बढ़ाएं।

महावीर शर्मा
प्राण शर्मा

पत्र-व्यवहार इस ईमेल पर कीजिए :
mahavirpsharma@yahoo.co.uk
'महावीर' - http://mahavir.wordpress.com

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आगे,

हाले दिल

तबियत अभी भी गले की खराश और शरीर की टूटन की वजह से खराब ही की केटेगरी में है. इतना बड़ा इन्जन, दुरुस्त होने में समय तो लगता ही है बस यही तस्सली है. हमसे आधे से भी कम साईज वाले ऑफिस में एक महिने में पूरी तरह ठीक हो पाये हैं तो हमारे तो अब क्या बतायें? बस, एक टिमटिमता सा दिया उम्मीद रोशन किये है. :)

ऐसे में नया क्या लिखें, फिर एक पुरानी कहानी, जो ब्लॉग पर नहीं है मगर तरकश और साहित्य कुंज पर प्रकाशित हो चुकी है, वो ही सुनाते हैं.
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लघु कथा

अपराध बोध



अगस्त की उमस भरी शाम। पीछे रेलवे क्वार्टर की सिगड़ियों से उठते कोयले के धुएँ की खुशबू पूरे माहौल मे भरी हुई थी। ये महक मुझे शुरू से बहुत भाती है।

हवा खाने के लिये मैं अपने दूसरी मंजिल के फ्लैट की पीछे वाली बालकनी में निकल आता हूँ। सिगरेट जलाते ही मेरी नज़र उन दो आँखों से टकरा जाती है, जो पिछवाड़े के क्वार्टर के आँगन से मुझे ही ताक रहीं थी। मैं चाह कर भी उसकी नज़रों से अपनी नजरें नही हटा पाया और एकटक उसे देखने लगा।

कितनी गहरी और बोलती हुई आँखें हैं। माथे पर अल्हड़ता से बिखरी जुल्फ़ें और पसीने से बेतरतीब हो गई वो सिंदुरी बिंदिया। एक पुरानी सी धानी रंग की सूती साड़ी मे लिपटी वो बला की खुबसूरत लग रही थी।

ऐसा नहीं कि मैंने पहले कभी उसे नहीं देखा मगर आज पहिली बार नज़रें चार हुईं थी। उसकी आँखों मे एक अजब सा प्रश्न चिन्ह और चेहरे पर आंतरिक वेदना की एक परत।

वो शायद सिगड़ी उठाने ही बाहर निकली थी। नज़रों के मिलते ही वो जड़वत जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। काँपते होंठ जैसे कुछ कह देने को आतुर और आँखें अपने भीतर छिपी असंख्य वेदनाओं का इज़हार करने को बेकरार।

एकाएक उँगलियों के बीच जलन से बिना पिये सिगरेट खत्म होने की तरफ जैसे ही ध्यान गया, हाथ जोर से झटक कर सिगरेट फेंकी। मेरी हालात देख वो बस धीरे से मुस्कराई। हमारी नज़रें फिर भी एक दूसरे को ही देखती रहीं। कब शाम ढल गई और अंधियारा घिर आया, पता ही नही लगा।

एकाएक उसके घर के दरवाजे पर उसके पति की दस्तक सुनते ही घबड़ा कर वो अंदर भाग गई। मै वहीं बालकनी मे कुर्सी खींच कर बैठ गया। मन अभी भी उसके आँगन में ही विचर रहा था।

उसके घर से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। शायद उसका पति पीकर नशे मे घर लौटा था।
वो चिल्ला रहा था.. स्स्साआली, दिन भर पड़ी पड़ी आराम करती रहती है और अब कह रही है अभी खाना बनने में समय लगेगा... वो बुरी बुरी गालियाँ बकता जाये और उसे बुरी कदर मारता जाये। उसके रोने की आवाज़ भी मेरे कानों को भेद रही थी।

न जाने वो कब तक उसे मारता और चिल्लाता रहा। मुझसे सहा ना गया। मैं उठकर भीतर चला आया, एक आत्मग्लानि का एहसास लिये कि मेरी वजह से बेचारी की क्या हालत हो रही है। न मैं बालकनी में निकलता, न उससे नज़रें टकराती और न ही खाना बनाने में उसे देर होती... मैं अपराधबोध से घिरता चला गया।

इस वाकये को दो हफ़्ते बीत गये हैं। आज फिर बहुत उमस है। शाम हो रही है, अभी अभी दफ़्तर से लौटा हूँ। कुछ ताजी हवा खाने का मन है लेकिन आज मैं घर की सामने वाली बालकनी मे आकर बैठ जाता हूँ।

उस रोज का सिगरेट से जलने का घाव तो भर गया है, मगर उसकी जलन और अपराधबोध, दोनों अब तक ताज़े हैं।
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रविवार, जुलाई 06, 2008

मैं गाँधी से मिला हूँ!!

उस रात कुछ मित्र परिवारों के साथ जुआघर गया. सभी मित्र हिन्दुस्तानी थे. दरवाजे पर पहुँचते ही हम ठिठक गये. मेरे मित्र के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा-वो देखो गाँधी जी! एकाएक धक्का लगा-कहाँ ये जुआघर और यहाँ कहाँ गाँधी जी!






फिर भी हम पलटे तो देखा लॉबी के दाँयी ओर एक मंचनुमा पत्थर पर मेनीकुइन - आदमी जो पुतला बना खड़ा रहता है, गाँधी जी के रुप में खड़ा था. कभी ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी तमाशा में गाँधी के मेनीकुइन के बारे में पढ़ा था आज साक्षात देख रहा हूँ वैसा ही माज़रा. गाँधी-जुआघर में. गाँधी-लोगों को जुआघर में आने का निमंत्रण देता, गाँधी-एक जिंदा पुतला, न हिलता न डुलता, बस तटस्थ भाव से सबको ताकता गाँधी.

जिन अंग्रेजों को कभी अपनी चुप्पी से डरा देने वाला गाँधी- आज उनके मनोरंजन का साधन बना बेबस खड़ा गाँधी. मेरे इन्हीं कानों ने सुना पास से गुजरती उस अंग्रेज महिला की फुसफुसाहट को-लुक, हाऊ क्यूट इज दिस गाँधी!! कोई कहता-पुअर गाँधी, लुकिंग सो स्वीट!! वेरी सेक्सी! इन बातों को सुनकर भी बिना हिले डुले खड़ा लाचार गाँधी-सेक्सी गाँधी-क्यूट गाँधी. मैने यह नायाब नजारा देखा. जिस गाँधी की पाँच सौ रुपये के नोट पर तस्वीर अंकित है. लगभग उतने रुपये घंटा अर्जित करने के लिये खड़ा मजबूर गाँधी.

लॉबी मे हालांकि हीटींग रहती है मगर फिर भी दरवाजा बार बार खुलते बंद होते रहते के कारण काफी ठंडा रहता है वहाँ का माहौल. उस माहौल मे जैकेट और कनटोपों से ढके लोगों को लुभाता सिर्फ एक धोती पहने अर्धनग्न खड़ा गाँधी. पेट की भूख मिटाने के लिये हर कष्ट सहता गाँधी-बेचारा गाँधी.

शराबियों और जुआरियों का आकर्षण का केन्द्र बना गाँधी शायद सबसे पापुलर आदम पुतला है. ऐसा मैने सुना वहाँ पर. मोस्ट सेलेबल एंड इन डिमांड गाँधी. लोग उसे देख कर हँसते हैं, चुटकुला बना गाँधी. लोग आते जाते थे, थोड़ी देर खड़े होकर गाँधी जी को निहारते थे और उनके कँधे पर टंगे झोले में कुछ लोग चंद रुपये भी डाल जाते थे. चार घंटे की ड्यूटी के बाद खुशी खुशी उन पैसों को गिनता गाँधी. छद्म मगर बिल्कुल असली सा दिखता गाँधी वरना मेरा दोस्त कैसे पहचान जाता. बनावटी, पुतला मगर सांस लेता पुतला और अपनी पलकें झपकाता पुतला-बिना हिले डुले खड़ा- अविचलित गाँधी. न कोई नेम प्लेट, न ही वो कुछ बोलता फिर भी सब जान जाते हैं वो गाँधी है-मौन खड़ा गाँधी. गाँधी की नुमाईश लगता गाँधी.

मैने पहले भी देखा है नव-धनाढ्यों को पार्टियों में आर्केस्ट्रा की धुन पर थिरकती नर्तकियों पर पाँच सौ के नोट पर सजे गाँधी को लूटता. गाँधी हवा में उड़ाया जाता है, फिर जमीन पर गिरता है और फिर उठकर उन नर्तकियों के ब्लाउज में कहीं खो जाता है. मैने यह भी देखा है कि हर बड़ी दो नम्बर डील में गाँधी ही प्रचलन में है, छोटे नोट किसी को गिनने और संजोने का समय नहीं. उन छोटे नोटों पर गाँधी भी नहीं है, वो इस प्रचलन से बाहर हैं.उन्हें गाँधी का आशिर्वाद नहीं है. मैने लिफाफों पर थूक से गाँधी को चिपकते देखा है, भारतीय डाक विभाग की टिकटों के माध्यम से. उसी गाँधी को जो बापू के नाम से जाना जाता है. उसी गाँधी की तस्वीर के नीचे बैठकर नेताओं को देश का सौदा करते देखा है.

किंतु आज यह जिंदा गाँधी. विदेश में नौकरी करता गाँधी-बिना हिले-डुले-एकदम सीधे खड़ा लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना-पुरातन गाँधी सबको जुआधर में खेलने को लुभाता गाँधी.

मैं दोस्तों के साथ जुआ खेलने जुआघर के भीतर चला जाता हूँ और यह पुतला गाँधी- मेरे मानस पटल से होता हुआ मेरे भीतर समा जाता है. मैं अपने लिये स्कॉच का एक गिलास आर्डर करता हूँ. सिगरेट के धुऐं का छल्ला बना कर उस गाँधी की याद को उड़ा देने की असफल कोशिश करता हूँ. सिगरेट के धुऐं के छल्ले में गाँधी. मगर यह गाँधी मुझ पर छाया है. कुछ असहज सा महसूस कर रहा हूँ. घुटन से बचने को मैं वापस बाहर लॉबी में आ जाता हूँ. गाँधी की तरफ निगाह जाती है. उसकी ड्यूटी खत्म हो गई है.

वो मंच से उतर रहा है, उसकी जगह अब सद्दाम हुसैन खड़ा है. उसके पहले उसी मंच पर चार्ली चेपलीन खड़ा था. चार्ली चेपलीन से लिया मंच सद्दाम हुसैन को सौंप कर गाँधी मंच से उतर जाता है.

लोग ताली बजा रहे हैं और गाँधी मुस्करा रहा है. फिर नम्बर आता है उन लोगों का जो गाँधी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं. हर फोटो के लिये चंद रुपये जेब में ठूंसता गाँधी. महिलाओं के साथ चिपक कर फोटो खिंचाता गाँधी, बेबस मगर मुस्कराता गाँधी. दस मिनट फोटो सेशन के बाद गाँधी पीछे एक कमरे में चला गया. पाँच मिनट बाद निकला. अब वो जींस टीशर्ट पहने था-एक नये रुप में गाँधी. जींस टीशर्ट पहने गाँधी.

मैं उसके नजदीक जाता हूँ और उससे उसका नाम पूछता हूँ. वो कहता है, जावेद खान! गुजरात, भारत. और पूछता है कि क्या आप भी भारत से हैं. मैं हामी में सर हिला देता हूँ और उसके साथ साथ बाहर आ जाता हूँ. वो जेब से सिगरेट निकाल कर जला लेता है. पाँच मिनट पहले का गाँधी अब सिगरेट पी रहा है. मैं उसे गौर से देखता हूँ. मुझमे कोतुहल है. मैं उससे पूछता हूँ कि यार, यह सब क्यूँ करते हो, बड़े मेहनत का काम है और तिस पर से गाँधी. वो बोला कि भईया, पेट का सवाल है, क्या करुँ.

पाँच साल पहले आया था. कोई काम नहीं मिला. एक दोस्त ने यह नौकरी लगवा दी. पहले नेहरु बना, नहीं चला. लोगों को मैं पसंद नहीं आया. फिर सुभाष, उसमें भी फेल हो गया, कोई पहचान ही नहीं पाता था. तब जाकर गाँधी बना और भाई, मैं हिट हो गया. यहाँ गाँधी बिकता है, सब उसे जानते हैं. खूब पैसा मिल जाता है. परिवार भारत में है. उनको पैसा भेजना होता है हर महिने. अगर गाँधी न बनूँ तो मैं भी भूखा मरुँ और भारत में परिवार भी. ऐसा गाँधी जो चार घंटे बिना हिला डुले खड़े रह कर फिरंगियों और सैलानियों का मनोरंजन करके पैसे कमाता है ताकि एक मुसलमान जावेद का पेट भर सके और भारत में उसका परिवार जी सके.

वो गाँधी, जो जावेद को पाल रहा है, जावेद से गाँधी और फिर गाँधी से जावेद...और फिर घर जाने के लिये बस का इंतजार करता जावेद जो तीन दोस्तों के साथ कमरा शेयर करता है. जिस दिन जावेद थक जाता है या बीमार होता है, उस दिन गाँधी नहीं बन पाता और भूखा सोना पड़ता है. गाँधी को आराम नहीं. वो फिरंगियों की नौकरी करता है. नहीं करेगा तो यह मुसलमान जावेद विदेश में भूखा मर जायेगा और परिवार भारत में.

मैं इस गाँधी से मिला हूँ!!

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मेरी यह कहानी तरकश में मार्च, २००७ में प्रकाशित हो चुकी है. तबियत की खराबी की वजह से कुछ नया लिखा नहीं जा रहा है, अतः आज मौका था कि आपको इसे यहाँ पढ़वा दिया जाये.

क्षमा चाहता हूँ कि वायरल फीवर की वजह से ब्लॉग से कटा हुआ हूँ, न पढ़ना, न टिप्पणी करना. सब बंद है. शायद कल से कुछ बेहतर हो जायें हालात. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 30, 2008

टालम टूली में कुछ बात

पिछले दो दिन से तबीयत खराब है. आँख में किसी की नज़र लग गई है, दोनों आँख सूजी है और लाल हैं. ऑफिस भी नहीं जा पा रहा हूँ सो मन मसोसे सोता रहता हुँ. आखिर, कब तक पोस्ट करना टालूँ. सो, आज टाईम पास:

पहले एक मुक्तक आज के हिसाब से:

इंसानों को इंसानों से, मैं मिलवाने आया हूँ
प्यार जिसे सब याद रखें, वो बतलाने आया हूँ
तुमने अब तक लड़ते लड़ाते, कितना कुछ है खो दिया
उनकी गिनती गीतों में ले, मैं गिनवाने आया हूँ.

-समीर लाल ’समीर’




अब आज के माहौल पर:

साहित्यकार

PenguinSlap

आलोचक

funny0130

हिन्दी ब्लॉगर

funny-dog-picture-biker

हैरान पाठक

Funny-MonkeyReaction-full


आज सुबह ही कॉफी विथ कुश पर इन्टरव्यू दिया. उन्होंने खुल कर बखिया उधेड़ी.. आशा है आपने देख ही लिया होगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 22, 2008

तुमको मैं अपनी जान कहूँ

घर से दफ्तर, दफ्तर से घर की रेल यात्राओं के दौरान, स्टेशन पर, स्टेशन की सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते, ट्रेफिक में फंसे, गमझे में मूँह लपेटे इतनी महिलाओं के विषय में कथायें रच चुका हूँ कि मुझ जैसे निहायत शरीफ किस्म के दो जवान बेटों के बाप का इम्प्रेशन ही चौपट हो गया है.

कल शाम को ही एक मित्र का फोन आया. हम तो थे नहीं तो वो हमारी श्रीमती जी से ही पूछने लगे कि आजकल भाई साहब की नौकरी जाती रही क्या? पत्नी ने आश्चर्यपूर्वक उनको नाकारते हुए पूछा कि ऐसा क्यूँ पूछ रहे हैं? बोले कि बड़े दिन से ट्रेन में किसी महिला से मुलाकात की कथा नहीं छपी, इसलिये लगा.

अब बताईये लिखो तो बदनाम और न लिखो तो नौकरी ही छूट जाने का शक और उस पर से पत्नी को सारी कथाओं की खबर बोनस में दे गये. घर लौटने पर जो स्वागत हुआ, उसकी तो खैर छोड़िये. वैसे ही सबकी अपनी अपनी परेशानियां कम हैं क्या?

किसी तरह यह कह कर बचे कि सब काल्पनिक घटनाऐं है जो अपने संदेश को रोचक बनाने के लिए गढ़ी जाती हैं (लाई डिटेक्टर नहीं लगा था वरना लाल लाईट जल जाती). स्वागत गान में ऐसी भी पंक्ति सुनाई दी कि हम पर लिखने की फुर्सत तो है नहीं और दुनिया भर पर लिखते हो.

यह कविता, उसी इज्जत पर लगी खंरोच पर पैबंद मानिंद है. इसे जनहित में ही जारी किया मानें. कहीं भी मैने अपना नाम इसीलिये बीच कविता में इस्तेमाल नहीं किया है ताकि कोई भी पीड़ित पति इसका इस्तेमाल अपने नाम से कर सके. मल्टीकलर्ड पैबंद है, हर रंग में कहीं न कहीं मैच कर ही जायेगा.

rp

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ

घनघोर उदासी छाती है
जब दूर जरा तुम होती हो
मदहोशी छाने लगती है
जब बाहों में तुम होती हो
ये कलम हो रही है डगमग
तब मधुशाला का जाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

कलियों के घूँघट खुल जाते
जब बागों में तुम जाती हो
घटा भी श्यामल हो जाये
जब जुल्फों को लहराती हो
शर्मसार सूरज को करती
क्या मैं सुरमई शाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

तेरे आने की आहट ही
जीने का कारण होती है
मेरे इस मन के मंदिर में
तू मूरत पावन होती है
पथ निर्वाणों के दे मुझको
तुमको मैं तीरथ धाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

--समीर लाल 'समीर'


नोट: उपर दर्शाया चित्र मेरी पत्नी का नहीं है, बस यही डर है.
चित्र साभार: रिपुदमन पचौरी
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बुधवार, जून 18, 2008

रोज बदलती दुनिया कैसी...

अभी बहुत पुरानी बात नहीं हुई है जब पूरे मोहल्ले में एकाध किसी के घर फोन होता था और सब उसका ही नम्बर देते थे. वो बेचारे कभी इसे बुला, कभी उसे, इसी में खुशी खुशी उलझे रहते थे.

तब एस टी डी नहीं होता था. कॉल बुक करना पड़ता था-ऑडनरी, अर्जेंट या लाईटनिंग. तब भारत से कनाडा या अमेरीका बात करनी हो तो जो आज कॉल बुक करो वो तीन दिन बाद लगता था. जबलपुर से इन्दौर. इन्दौर से बम्बई. बम्बई से कनाडा. उस पर भी आधी बात ऑपरेटर सुन कर बताता था. चिल्ला चिल्ला कर बात करनी पड़ती थी. पूरे मोहल्ले को मालूम चल जाता था कि कल रात कनाडा बात हुई है. कॉल बुक करने के बाद फोन के बाजू में ही सो, खाओ और कहीं मत जाओ, जब तक वो कॉल दो तीन दिन में लग न जाये.

अब देखिये कितनी तेजी से इस क्षेत्र में विकास हुआ है कि आपको मेरी बात अजूबा लग रही है या फिर आप मुझ जैसे जवान को कोई बूढ़ पूरान मनही बूझ रहे होंगे. मगर यकीन मानिये बहुत नजदीकी सालों की बात है.

अब तो गांव गांव गली गली फोन है. एस टी डी बूथ हैं. मोबाईल है और यहाँ तक कि इस बार तो महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों तक में फोन लगा देखा है टाटा इन्डिकॉम का. कितनी तेजी से तकनीक फैलती है कि भरोसा ही नहीं होता.

सोचता हूँ एक-दो और तकनीक जिसका बहुत तेजी से बेवजह उपयोग हो रहा है फोन की तरह अगर उसका भी ऐसा ही विस्तार हो जाये तो क्या सीन बनेगा.

पति घर पर देर से लौटा. पत्नी ने पूछा, कहाँ थे? वो बोला कि दफ्तर में मिटिंग थी, उसी में फंसा था. पत्नी बोली कि लैब चलो. लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाती हूँ तुम्हारा. झूठ पकड़ा गया. रात भूखे सोना पड़ा.

भिखारी दरवाजे पर भीख मांग रहा है-मेमसाब, तीन दिन से भूखा हूँ. पता चला, उसे रामू के साथ यह सोचकर कि लाई डिटेक्टर ब्रेक करने की तो रोज रोज प्रेक्टिस से आदत हो गई होगी उसकी, नुक्कड़ वाले ब्रेन मैपिंग बूथ पर भिजवा दिया. बूथ से पाँच रुपये में रामू, भिखारी को लेकर ब्रेन मैप बनवा लाया. भिखारी का झूठ पकड़ा गया. वो सिर्फ दो दिन से भूखा था. मेमसाहब ने उसे झूठा कह कर भगा दिया. भले टेस्ट करवाने में पाँच रुपये खर्च हो गये मगर भिखारी को एक रुपये न दिये गये.

स्कूल में टीचर जी बबलू को डांट रही है कि तुमने चुन्नू को चांटा मारा, उपर से झूठ बोलते हो. बबलू कह रहा है कि नहीं मैडम, मैने नहीं मारा. चाहे तो उसके गाल पर से मेरा फिंगर प्रिंट मिलवा लो.

प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है-मेरा विश्वास करो. मैं तुमसे शादी करके तुम्हें बहुत खुश रखूँगा और तुम्हीं मेरा पहला और अंतिम प्यार हो.

प्रेमिका उसे सिद्ध करवाने के लिये नार्को टेस्ट की मांग करती है.

क्या प्रश्न पूछने है जो वो डॉक्टर को देगी, इसके लिये बाजार से नार्को टेस्ट के अनसॉल्वड प्रश्नों की लव विषय की किताब लाती है ४०० सेम्पल क्योचनस वाली. उधर प्रेमी भी नार्को टेस्ट की लव विषय पर अमर ज्योति सीरीज की गाईड से पिछले दस टेस्टों में पूछे गये प्रश्न एवं उनके उपयुक्त जबाब घोंट रहा है. गारंटीड सक्सेस इन नार्को टेस्ट की कोचिंग क्लास भी ज्वाईन कर ली. अगर पास नहीं हुये तो अगले बैच में फ्री एडमिशन का ऑफर. प्रेक्टिल की अलग से व्यवस्था.

फिर भी कहीं फेल न हो जायें, इस हिसाब से दलाल से भी व्यवस्था कर ली है. दलाल की कम्पाऊन्डर से सीधे सेटिंग है. ऐन टाईम पर ट्रूथ सीरम के बदले ग्लोकोज लगा देगा. बस, फिर क्या करना है. सोने का नाटक और डॉक्टर साहब को खों खों घों घों करके (जैसे शराब पिये हों-प्रेक्टिकल क्लास में जैसा सिखाया है वैसे ही) मन मर्जी के जबाब. गारंटीड सक्सेस.

narco

नेता मंच की बजाये लाई डिटेक्टर पर खड़े होकर चुनावी वादे करेंगे. मशीन की सेटिंग पहले से सेट कर दी जायेगी पलट कर. याने जब सच बोलें तो लाल लाईट और झूठ बोलें तो हरी बत्ती. बस फिर क्या, पूरे भाषण में हरी बत्ती जलती रहेगी और जनता समझेगी कि नेता का सच बोलना तो साईटिफिकली भी साबित हो रहा है. पक्का सच वादे कर रहा है और वो जीत जायेगा.

आप कहेंगे कि जनता इतनी आसानी से बेवकूफ बन जायेगी क्या? लल्लू समझ रखा है?

तो अभी तक तो बिना मशीन के भी और क्या बनती आई है, तब तो कम से कम लाई डिटेक्टर मशीन के कारण होगा.

बस, यही सब सोच सोच के मन में खलबली मची है. सोचा, आप लोगों को भी खलबलाऊँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 15, 2008

किस नजर से देखूँ दुनिया तुझे...

पिछले सात दिन से न कोई नई पोस्ट और पिछले दो दिनों से न तो कोई टिप्पणी. यह भी नहीं पता कि कब से सिलसिला फिर शुरु होगा. शायद कल से ही या कुछ रुक कर. कितनी अनिश्चितता है. खुद को खुद का पता नहीं. अभी जरा सा समय मिला, तब सोचा कि सूचित तो कर ही दूँ वरना आप लोग क्या का क्या सोच बैठो. सोचने पर क्या लगाम है? :)

अरे हाँ, एक जरुरी बात तो बताना भूल ही गया. ३-४ दिन पहले किसी हुश हुश नागराज जी का हमारी चिट्ठाकार स्पेशल पोस्ट पर कमेंट आया:

बहुत बढ़िया डमरु बजा लेते हो, गुरु. खूब मजमा लगा रखा है. xxx, ब्लॉगिंग छोड़ कर मदारी का काम पकड़ लो, कुछ कमाई भी हो जायेगी और लोगों का मनोरंजन भी. भीड़ जमा करने की कला वहीं दिखाओ और यहाँ लिखने वालों के लिए जगह खाली करो, समझे की नहीं. वरना xxxxx

(इसके बाद वो अपनी औकात पर उतर आये-हम आई पी से पहचान तो गये मगर उनसे मुझे इससे ज्यादा उम्मीद भी न थी)

उनका कमेंट मैं जरुर अप्रूव करता मगर जिस जगह से वो अपनी पहचान पर उतरे उस जगह से आगे संपादित कर कमेंट प्रकाशित करने की सुविधा ब्लॉग स्पॉट नहीं देता और उस भाषा को बिना कांट छांटा के छापने की इजाजत मेरा विवेक नहीं देता. तो मजबूरीवश पूरा कमेंट ही रिजेक्ट करना पड़ा. मगर हुश हुश नागराज जी ने तबियत से पीकर मन की उतारी और हमें खूब महिमा मंडित किया. :)
न तो उनके ब्लॉग का पता है और न ही ईमेल का. अतः मजबूरीवश यहाँ लाना पड़ा वरना ईमेल से जबाब दे लेते.


प्रिय हुश हुश नागराज जी:

हमारी भी हुश हुश!!

अच्छा लगा अपने विषय में जानकर. मेरी मदारी कला से आप प्रभावित हुए, यह मेरे लिए सम्मान का विषय है रिटायरमेन्ट के बाद क्या करुँगा-इस चिन्तन को आपने एक नया आयाम दिया है. काफी बोझ उतरा सा लग रहा है. किस तरह आपको साधुवाद पहुँचाऊँ और आभार प्रदर्शन करुँ, समझ नहीं पा रहा हूँ. कम से कम ईमेल ही दे देते.

आपने जिस धारा प्रवाह में गाली-उवाच किया है, वो भी काबिले तारीफ है. सबके बस में नहीं, इतने तुकबंदी के साथ गाली बकना. काश, बेहतर शब्द इस्तेमाल करते तो शायद आपका कथ्य अमर काव्य बन जाने की काबिलियत रखता. कभी विचार करियेगा.

चलते चलते एक बात और बताता चलूँ कि बजाता तो मैं बीन भी बहुत अच्छी हूँ. कभी नाचने का मन हो तो बताईयेगा, आपके लिए जरुर बजाऊँगा. जो भी पैसा और दूध इक्कट्ठा होगा, सब आपका. कोशिश करुँगा नागपंचमी पर आपका शो रखा जाये, ज्यादा दूर है भी नहीं. आना जरुर. इन्तजार रहेगा.

सादर

उड़न तश्तरी

snakecharme

आज इरफ़ान झांस्वी शेर याद आता है, जो फुरसतिया जी ने सुनाया था:

संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।


यह बताने की एक वजह और थी कि इसे बताने के बहाने विन्डोज लाईव राईटर टेस्ट भी हो जायेगा और इसी बहाने एक कागज की चिन्दी पर कभी उतारे चंद शब्द भी सधा लेंगे.


ये रंग कैसे कैसे:

दुनिया!!!

वो कहता है-नीली है
मैं कहता हूँ-हरी है
उसकी नजरों में सुनहरी है..

दुनिया कैसी है?
दुनिया क्या है?

दुनिया वो है
जो तुम हो
जो हम हैं...

बाकी सब
हमारे चश्मों के रंग हैं..
सबके देखने के
अपने अपने ढंग हैं.

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 08, 2008

असहज विचारों की सहज बानगी..

अकसर
दफ्तर आते जाते
ट्रेन में बैठे
फ्री बंटे उस अखबार के
इश्तहारों से पटे पन्नों पर
कोई खाली कोना तलाश
अपने असहज भावों को
सहजता से उतार देता हूँ
अपनी कलम की
काली स्याही से...

और

लोग उसे कविता कहते हैं....
न जाने, क्यूँ!!!



और कुछ अखबार के कागजों पर अपने मनोभावों का अंकन आज बटोरा और ले आया. न जाने, आप क्या कहेंगे मगर बस भाव हैं..कभी कुछ तो कभी कुछ..ज्यूँ का त्यूँ परोस रहा हूँ..बिखरे शब्दों को बिना समेटे. आप ही बतायेंगे कि कितने बिखरे हैं या सिमटे हैं!!!


dep

-१-

साहिल पर बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है.....
उसे तैरना नहीं आता

वरना

बचा लेता.

-२-

कुछ तो बात है
वरना
मौसम यूँ ही
नाहक

खराब नहीं होता.

-३-

वो अपनी
किस्मत का रोना रोते हैं..

बदकिस्मती क्या होती है
जिन्हें इसका
गुमान भी नहीं.

-४-

मँहगाई ने दिखाया
यह कैसा नजारा.
हर इंसान तो परेशान है
दो जून की रोटी के
इंतजाम में..
उसे क्या देता...

गली का कुत्ता था
मर गया बेचारा!!


-५-

वो हँस कर
बस यह
अहसास दिलाता है

वो जिन्दा है अभी!!


samd

-६-

आकाश में उड़ते
उन्मुक्त पंछियों को देख
खुद अपनी गिरफ्त से
आजाद होने को
छटपटाता हूँ
मैं!
तड़प जाता हूँ
मैं!!



-७-

अँधेरे कमरे की
चाँदनी में नहाई
उस उदास खिड़की से
आसमान में
चमकीले तारों को देख
दूर देश की यादों में
न जाने कब
खो जाता है वो!

न जाने कब
सो जाता है वो!

--------------------------------


असहज विचारों की सहज बानगी..ये हमारी स्टाईल है जी.


--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 04, 2008

हिन्दी चिट्ठाकारी स्पेशल

आज की यह पोस्ट हिन्दी चिट्ठाकारी स्पेशल है यानि स्पेशली फार हिन्दी ब्लॉगर्स. (अंग्रेजी मे बॉलीवुड चलन के अनुरुप लिखना पड़ा)

आज हम नहीं, बस ये पोस्ट खुद ही बोलेगी. हम तो चुपचाप बैठे हैं.

बशीर बद्र निदा फाज़ली साहब शेर है:

घर से मस्जिद है बहुत दूर है चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये.

बशीर बद्र निदा फाज़ली साहब से क्षमा मांगते हुए:

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें,
किसी रोते हुए ब्लॉगर को हँसाया जाये.

लगता है किसी ने टिप्पणी नहीं की!

HeadBang

एक नजर इधर भी, बदलते परिवेश के साथ:

कोई नेता जी लगते हैं? जेड सिक्यूरिटि मिली है.
अरे नहीं, यह हिन्दी ब्लॉगर हैं.

zee security

आज का समाचार:

दिल्ली में आज शाम ४ बजे से रामलीला मैदान में हिन्दी ब्लॉगर मीट का आयोजन किया गया है. सुरक्षा की दृष्टि से, कानून एवं व्यवस्था बनाये रखे रहने के लिए, दिल्ली एवं आसपास के राज्यों में धारा १४४ लगा दी गई है.


आगरा पागलखाने का नोटिस बोर्ड

पागलों का समाज में खुले आम घूमना हानिकारक साबित हो सकता है.

पागल पकड़वाईये- ४०० रुपये नगद पाईये.
हिन्दी ब्लॉगर पकड़वाईये- १००० रुपये नगद पाईये और साथ में एक शानदार गिफ्ट हैम्पर (हिन्दी साहित्य सभा की ओर से).


मानो या न मानो:

५ हिन्दी ब्लॉगरर्स का मिलन समारोह बिना किसी विवाद एवं लड़ाई झगड़े के शांतिपूर्वक सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न.

ब्रेकिंग न्यूज:

१.बड़के न्यायालय ने मंत्रालय को फटकारा. अपने फैसले में कहा कि हिन्दी ब्लॉगर होना रिवाल्वर लाईसेन्स प्राप्त करने का वैद्य एवं समुचित कारण.

२.पब्लिक मार रही है. हिन्दी ब्लॉगर है और अपने आपको साहित्यकार बताता है.

Beating

.सरकारी रत्नों में एक और रत्न जुड़ा : हिन्दी ब्लॉग रत्न.
(सिर्फ सिफारिश और जुगाड़ से उपलब्ध- हिन्दी ब्लॉग का न होना सम्मान प्राप्ति में बाधक नहीं, जैसा कि बाकी सम्मानों के साथ होता है)

blogratn

हिन्दी ब्लॉग रत्न का चयन लोकतांत्रिक तरीके से करने के लिए वोटिंग करवाई जायेगी, जिन्हें बिना गिने समिति के अध्यक्ष विजेता घोषित करेंगे. उनका निर्णय ही अंतिम एवं मान्य होगा, जो कि पूर्णतः जुगाड़ा्धारित रहेगा. इस विषय में किसी भी विवाद पर कोई भी सुनवाई का प्रावधान नहीं है. अगर आप नतीजों से संतुष्ट नहीं हैं, तो कृप्या घर बैठें. इस तरह आप इस लोकतांत्रिक प्रणाली का सहयोग करेंगे, जैसा कि आप हर लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ सहयोग करते आये हैं. मात्र इस सम्मान के लिए आपको अपनी आदत बदलने की आवश्यक्ता नहीं है-बस घर बैठिये और कुढ़िये.)

चित्र बोलते हैं:


बोल टिप्पणी करेगा या नहीं!

beatingsome


ये कोई गैंगस्टर नहीं है. सामूहिक ब्लॉग का मॉडरेटर है, बाकी सारे उस ब्लॉग पर लिखने वाले.

mode1

बेनामी ब्लॉगर

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shantilaka


(नोट: यह मात्र मनोरंजन के लिए है. कृप्या कोई भी आहत न हों) Indli - Hindi News, Blogs, Links