जन्म लेना और मरना हमारे हाथ में नहीं. मृत्यु एक अटल सत्य है किन्तु इन्सान उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो, उसके जीने की लालसा खतम नहीं होती.
इन्सान पैसा कमा कमा कर अघा सकता है. कमाने के लिए उल्टे सीधे हथकंडे अपनाना छोड़ सकता है. हलवाई मिठाई के बीच बैठा बैठा मीठा खाने से उब सकता है. अपराधी जुर्म कर कर थक के जुर्म की दुनिया से मूँह मोड़ सकता है लेकिन जिन्दा रह रह कर भी जीने की लालसा खतम करना, कभी नहीं. यह इन्सानी स्वभाव नहीं है.बीमारी और शारीरिक व्याधियों से परेशान इन्सान लाख बोल ले कि हे भगवान!! अब नहीं जिया जाता, अब तो तू मुझे उठा ही ले मगर जब मौत करीब आती है, तो एकदम घबरा उठता है. मानो जाने को तैयार ही न हो.
लालच की पराकाष्टा राजनिती तक से सारी जिन्दगी उसी दलदल में फंसे लोग एक उम्र पर निकल सकते हैं. प्रधानमंत्री रह चुके लोग भी घर बैठे राजनिती से दूर कविता रच रहे हैं मगर जीने की लालच, तौबा!! इसे छोड़ने की बात मत करो. यह नहीं हो पायेगा.
जिस उम्र में आर्ट ऑफ डाईंग सीखना चाहिये, याने मरने की कला, उस उम्र में लोग भीड़ लगाये खड़े हैं आर्ट ऑफ लिविंग सीखने के लिए जैसे कोई छात्र इन्जिनियरिंग का कोर्स खत्म करके के. जी. में एडमिशन लेने के लिए डोनेशन लिए पहुँचे. अरे, जितनी लिविंग करनी थी, सो तो कर ही चुके, अब अंत से समय में कैसा आर्ट और कैसी साईंस. कोई क्या सिखा देगा. वैसे कितना भी सिखा देखा, बुढ़ा तोता बोलेगा तो राम राम ही और माना कि सीख भी गये, तो जब तक निपुण होने का मौका आयेगा, ज्यादा उम्मीद यही है कि निकल चुके होगे या कहीं मुहाने पर होगे. कोई लड्डू तो है नहीं कि गप्प से खाया और अह्हा!! मीठा मीठा करने लगो. अभ्यास की बात है.
बाजार समझता है कि क्या बिकेगा. लोगों को क्या खरीदना है. किस बात पर वो ललचा कर रुक नहीं पायेंगे और बस!! वही एक बढ़िया व्यापारी शानदार पैकिंग बना कर बेचने निकल पड़ता है और खरीददारों की जमघट लग जाती है. व्यापारी गुरु कहलाता है और खरीददार चेले.
सारी जिन्दगी दो नम्बर की कमाई काटी, मातहतों को परेशान किया, नौकरों को फटकारा, झूट बोला, व्यापार में लोगों को चूना लगाया, टैक्स हजम कर गये और फिर जब चलने का समय आया तो मीठी वाणी के लाभ, ईमानदारी और पर पीड़ा समझने की पाठशाला में जाकर मूँह उठाये आँख मींचे बैठे हैं और वही पैसा न्यौछावर कर रहे हैं जो इन्हीं बातों से कमाया. गुरु जी भी धन का लोभ त्यागने का प्रवचन पिला पिला कर धन समेटने में व्यस्त हैं. धन्य हैं वो लोग. मैं उन्हें नमन करता हूँ.
उम्र दराज हो चुके बुजुर्गों के लिए जो ज्यादा जरुरी और करीबी है वो क्लास लगा कर देखो ’आर्ट ऑफ डाईंग’. उसमें सिखाओ कि कैसे तैयार हो अन्तिम यात्रा के लिए. कोई पूड़ी सब्जी कपड़े तो बाँध कर ले नहीं जाना है कि परेशानी हो. बस सिखाओ कि कैसे सब बातों से निवृत हो कर चैन से तैयार रहना है. कल के लिए कुछ पैन्डिग नहीं रखना है. जब सोने जाओ तो यह सोच कर कि अब उठ नहीं पायेंगे. सारे रुपये पैसे, वसीयत नामा वगैरह पूरा कर लो. प्रियजनों से मेल मुलाकात करते रहो. प्रेम से रहो. लड़ो झगड़ो मत. किसी का दिल न दुखाओ. इच्छाऐं जहाँ तक संभव हो, पूरी कर लो आदि आदि. इतना सा तो सिलेबस है इस कोर्स का.
बस, फिर क्या है. जब भी घड़ी आ जाये, मुस्कराते हुए चल दो. आखिर लोग घर छोड़ कर दूसरे देश में जा ही बसते हैं. क्या पता कब लौटें. सब कुछ निपटा कर ही निकलते हैं न!! फिर? अन्तिम यात्रा की तैयारी में शरमाना कैसा और घबराना कैसा? विदेश प्रवास तो फिर भी कैंसिल हो सकता है मगर यह तो तय है. बस, तारीख नहीं मालूम होती. लास्ट मिनट फ्लाईट जब सस्ती मिल जाती है तो खुशी खुशी निकलते हो कि नहीं कि पैसे बच गये तब फिर यहाँ-इसमें कैसा दुखी होना?
लेकिन तुम देखोगे कि इस ’आर्ट ऑफ डाईंग’ की क्लास के लिए एक भी इन्सान न मिलेगा. खाली हॉल में अकेले तुम होगे सिखाने के लिए इन्तजार करते भूख से डाईंग की ओर अग्रसर, डाईंग का साईंस अहसासते हुए. जो भी ऐसी क्लास लगायेगा वो एक दिन खुद ही आर्ट ऑफ लिविंग की क्लास में नजर आयेगा भीड़ के साथ लेट एडमिशन लेते.
जिस तरह जन्म लेकर जीना जरुरी है, उसी तरह जीने लेने के बाद मरना भी जरुरी है. फिर क्यूँ न इस कला में भी पारंगत हुआ जाये कि जब मौत आये तो मुस्कराते हुए खुशी खुशी गले लगायें कि आओ मित्र, अब मैं जी चुका और तुम्हारा स्वागत है. चलो, चलें.
वैसे तो सही है कि जब तक जिओ, स्वस्थ, खुश रहते हुए खुशियाँ बांटते हुए जिओ. इस कला में निपुण रहो. लेकिन होता विपरीत है. जब तक सक्षमता रहती है तब तक मनमानी कर अपने हिसाब से जी गये. रोज देर रात तक पार्टियाँ चली. सारी दुनिया की लतें जैसे इनके लिए ही बनी हैं तो सिगरेट से लेकर शराब और शबाब तक किसी से कोई परहेज नहीं. और जब अंत समय नजदीक आया, किसी काम के नहीं बचे, शरीर ने साथ देना बंद कर दिया तो आर्ट ऑफ लिविंग सीखने निकल पड़े. बेहतर होता इस समय आर्ट ऑफ डाईंग सीख लेते, वो भी अटल सत्य है.
ये तो वैसा ही हुआ कि जब तक मौका लगा, खूब दबा कर दो नम्बर की कमाई की और जब लाईन अटैच हो गये तो लगे ईमानदारी पर भाषण देने. ऐसा होते हमेशा ही दिखता है. इसीलिए शायद किसी ज्ञानी ने कहा होगा कि असली ईमानदार वो नहीं, जो ईमानदारी से जीवन यापन करता है. असली ईमानदार वो है जो भ्रष्टाचार का मौका होने पर भी ईमानदारी से जीवन यापन करते हैं.
पूरा सार बस इतना कि जब इन सब बातों को जीवन की नींव में डाला जाना था, तब ध्यान नहीं दिया और जब भवन धाराशाही होने का समय आया तो नींव निर्माण की प्रक्रिया सीखने निकल पड़े.
रेत की नींव पर,
मिट्टी का मकान
और उस पर
संगमरमरी कंगूरा
ये है आज का
ताजमहल!!
आज चमत्कार और झूट बिकता है, सच्चाई आज की दुनिया में मार खाती है. दर्पण देखने के अब हम आदी नहीं, तस्वीरें दिखाओ. वो हमें भाती हैं और वो ही हमें लुभाती हैं. दर्पण आऊट ऑफ फैशन हो चला है. हमें सपने दिखाओ, हम खरीदेंगे. सच्चाई के लिए क्या मोल देना, वो तो होना ही है, अपने आप दिख जायेगी.
यह मत सोचना कि हर घर में तो दर्पण हैं, सब देखते हैं. भूल में हो, पूछ कर देखना एक लड़की जब दर्पण के सामने खड़ी होती है तो दर्पण में उसे एश्वर्या दिखती है और एक लड़का, उसमें सलमान देखता है. खुद को जो देख लें, तो घर से निकलने का आत्म विश्वास ही खो दे?






























