रविवार, सितंबर 30, 2007

भूतपूर्व स्वर्गवासी श्री......

जबलपुर में हमारे एक भूतपूर्व स्वर्गवासी मित्र श्री नारायण तिवारी जी रहते हैं. भूतपूर्व स्वर्गवासी सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है मगर वो उपर हो रहे समस्त क्रिया कलापों को इतने आत्म विश्वास और दृढ़ता से बताते हैं कि उनके पूर्व में स्वर्ग मे रहवास पर स्वतः ही विश्वास सा हो जाता है.

हमारे एक और मित्र हैं मुकेश पटेल. ईश्वर की ऐसी नजर कि अच्छे खासे खाते पीते घर का यह बालक अगर किसी भिखारी के बाजू से भी निकल रहा हो तो भिखारी उसे बुलाकर कुछ पैसे दे दे. चेहरे पर पूर्ण दीनता के परमानेन्ट भाव. मानो भुखमरी की चलती फिरती नुमाईश. भर पेट खाना खा कर भी निकले तो लगे कि न जाने कितने दिन से भूखा है. हँसता भी तो लगता कि जैसे रो रहा है.

सड़क पर क्रिकेट खेलते समय जब किसी के घर में गेंद चली जाये तो हम लोग मुकेश को ही भेजा करते थे गेंद लेने. उसे डांटना तो दूर, अगला गेंद के साथ मिठाई नाश्ता कराये बिना कभी विदा नहीं करता था. अपने चेहरे के चलते वह सतत एवं सर्वत्र दया का पात्र बना रहा. होली, दशहरे की चंदा टीम का भी वो हमेशा ही सरगना रहा और हर घर से चंदा मिलता रहा. अब तो उसका बड़ा व्यापार है. बैंक से लेकर इन्कमटैक्स वाले तक सब उस पर दया रखते हैं. आज तक किसी को घूस नहीं दी. बैंक वाले लोन देने के साथ साथ चाय पिला कर भेजते हैं. लोन की किश्त भरने जाते हैं तो बैंक निवेदन करने लगता है कि जल्दी नहीं है चाहें तो अगले महीने दे दीजियेगा. इन्कम टैक्स का क्लर्क भी बिना नाश्ता कराये उन्हें नहीं जाने देता.

जहाँ मुकेश को अपने उपर ईश्वर की इस विशेष अनुकम्पा पर अभिमान था वहीं हमारे भूतपूर्व स्वर्गवासी मित्र नारायण के पास इस स्थिति के लिये भी कथा कि मुकेश का चेहरा ऐसा क्यूँ है.

भू.पू.स्व. श्री नारायण बताते हैं कि वहाँ उपर कई फेक्टरियाँ हैं. भारत की अलग, अमरीका की अलग, चीन, अफ्रीका, जापान सब की अलग अलग. वहीं स्त्री पुरुषों का निर्माण होता है. सबके क्वालिटी कन्ट्रोल पूर्व निर्धारित हैं. अमरीकी गोरे, अफ्रिकी काले, भारत के भूरे आदि. सबकी भाव भंगीमा भी बाई डिफॉल्ट कैसी रहेगी, यह भी तय है. जैसे दोनों हाथ नीचे, पांव सीधे, मुँह बंद आदि. यह बाई डिफॉल्ट सेटिंग है, अब यदि किसी को हाथ उठाना है, तो उसे हरकत एवं प्रयास करना होगा और जैसे ही प्रयास बंद होगा, हाथ पुनः डिफॉल्ट अवस्था में आ जायेगा यानि फिर नीचे लटकने लगेगा.

ऐसा ही चेहरे की भाव भंगिमा के साथ होता है. बाई डिफॉल्ट आपके चेहरे पर कोई भाव नहीं होते. न खुश, न दुखी. विचार शून्य सा चेहरा. अब यदि आपको खुश होना है तो ओंठ फेलाईये, दांत दिखाईये और हा हा की आवाज करिये. इसे खुश हो कर हंसना कहते हैं. जैसे ही आप इसका प्रयास बंद कर देंगे पुनः डिफॉल्ट अवस्था को प्राप्त करेंगे अर्थात विचार शून्य सा चेहरा-बिना किसी भाव का.

कई बार जल्दीबाजी में, जब कन्टेनर रवाना होने को तैयार होता है और कुछ मेटेरियल की जगह बाकी है, तब कुछ लोग जल्दी जल्दी लाद दिये जाते हैं. वही डिफेक्टिव पीस कहलाते हैं. उन्हीं में से एक उदाहरण मुकेश हैं जिनकी हड़बड़ी में चेहरे की डिफॉल्ट सेटिंग दीनता वाली हो गई. उन्हें सामान्य दिखने के लिये प्रयास करना होगा और जैसे ही प्रयास बंद, पुनः डिफॉल्ट अवस्था यानि दीनता के भाव.

यह सारी बातें नारायण इतने आत्म विश्वास से बताते थे कि लगता था वो ही उस फेक्टरी के मैनेजर रहे होंगे जो इतनी विस्तार से पूरी कार्य प्रणाली और निर्माण प्रक्रिया की जानकारी है. तभी तो सब उन्हें भूतपूर्व स्वर्गवासी की उपाधि से नवाजते थे.

उनके ज्ञान का विस्तार देखते हुए एक बार हमने भी जिज्ञासावश प्रश्न किया कि नारायण भाई, आप तो कह रहे थे कि भारत के लिये त्वचा का रंग भूरा फिक्स है. फिर यहाँ गोरे और हमारे रंग के लोग कहाँ से आ गये?

भू.पू.स्व. नारायण जी ने तुरंत अपने संस्मराणत्मक अंदाज में कहना शुरु किया कि दरअसल भारत की फैक्टरी के सुपरवाईजर विश्वकर्मा जी बहुत जुगाड़ू टाइप के हैं. जब पेन्ट खत्म होने लगता है तो कभी तारपीन ज्यादा करवा देते है. sammanpatra
कभी अमरीकी फेक्टरी का और कभी अफ्रिकी फेक्टरी का बचा पेन्ट मार देते हैं मगर मिला जुला कर, जोड़तोड़ कर काम निकाल ही देते हैं. इसीलिये भारत में भी कुछ लोग गोरे पैदा हो जाते हैं और अगर अफ्रिका वाला ज्यादा पेन्ट मार लाये तो तुम्हारे जैसे. किन्तु बाकी ऐसा नहीं करते वो काम रोक देते हैं. इसीलिये अफ्रिका में कभी कोई गोरा नहीं पैदा होता और न अमरीका में काला. इसी से उनकी फैक्टरी भी मटेरियल के इन्तजार में कई कई दिन बंद रहती है तो प्रोडक्शन भी कम होता है. आज तक मटेरियल की कमी के कारण भारत वाली फेक्टरी में काम नहीं रुका. हर साल सबसे अनवरत संचालन का अवार्ड भी विश्वकर्मा जी को ही मिलता है. इसीलिये तो हमारे यहाँ सभी फेक्टरियों में उनकी पूजा होती है.

हम तो सन्न रह गये कि वाह रे विश्वकर्मा जी, आप तो अवार्ड पर अवार्ड लूट रहे हो, जगह जगह पूजे जा रहे हो और खमिजियाना भुगतें हम!! बहुत खूब!


नोट: इस आलेख का उद्देश्य मात्र हास्य-व्यंग्य है. यदि किसी वर्ग या समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँची हो, तो मैं क्षमायाचना करता हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 27, 2007

बड़ा अच्छा लगता है!!

दफ्तर से घर लौट रहा हूँ. स्टेशन पर ट्रेन से उतरता हूँ. गाड़ी करीब ५ मिनट की पैदल दूरी पर खुले आसमान के नीचे पार्क की हुई है. थोड़ी दूर पार्क करके इस ५ मिनट के पैदल चलने से एक मानसिक संतोष मिलता है कि ऐसे तो पैदल चलना नहीं हो पाता, दिन भर भी तो दफ्तर में अपनी सीट में धंसे बैठे ही रहते हैं, कम से कम इसी बहाने चल लें. नहीं से हाँ भला. सेहत के लिये अच्छा होगा. दिल के एक कोने में खुद को हँसी भी आती है कि भला ५ मिनट सुबह और ५ मिनट शाम पैदल चलने से इस काया पर क्या असर होने वाला है मगर खुद को साबित करने के लिये उस हँसी को उसी कोने में दमित कर देता हूँ, जहाँ से वो उठी थी. सब मन का ही खेला है. अच्छा लगता है.

जब कार पास में खड़ी करता था, तब मन को समझाता था कि चलो, इसी बहाने शरीर को आराम मिलेगा. सुबह सोचता कि दिन भर तो खटना ही है और शाम सोचता कि दिन भर खट कर आ रहे हैं. अच्छा है पास में पार्क की. व्यक्ति हर हालत में अपना किया सार्थक साबित कर ही लेता है. अच्छा लगता है.

आज जब स्टेशन पर उतरा तो एकाएक बारिश शुरु हो गई. वहीं वेटिंग एरिया में रुक कर बारिश रुकने की प्रतिक्षा करने लगा. छाता आज लेकर नहीं निकला था और इस बारिश का देखिये. रोज छाता लेकर निकलता हूँ, तब महारानी गायब रहती हैं. आज एक दिन लेकर नहीं निकला तो कैसी बेशरमी से झमाझम बरस रही हैं. मानो मुँह चिढा रही हो.

कोई बच्चा तो हूँ नहीं कि बारिश की इस अल्हड़ता पर खुश हो लूँ. स्वीकार कर लूँ उसका नेह निमंत्रण. लगूँ भीगने. नाचूँ दोनों हाथ फेलाकर. माँ कितना भी चिल्लाये, अनसुना कर दूँ कि तबीयत खराब हो जायेगी. barishबस बरसात में उभर आए छोटी छोटी छ्पोरों के पानी में छपाक छपाक करुँ , आज पास खड़ी लड़कियों को छींटों से भिगाऊं और कागज की नाँव बना कर बहाने लगूँ. मैंढ़क पकड़ कर शीशी में रख लूँ. लिजलिजे से केंचुऐं पकड़ लूँ , वो पहाड़ के नीचे वाले बड़े नाले में से आलपिन से गोला बना कर मछली अटकाने के लिये.

हम्म!! ये सब तो बच्चे करते हैं. मैं तो बड़ा हूँ. पानी रुक जाने पर ही पोखरे बचाते हुए धीरे धीरे संभल कर कार तक जाऊँगा. कल फिर से तो दफ्तर जाना है. वो दफ्तर वाले थोड़ी न समझेंगे कि बारिश देखकर मैं बच्चा बन गया और लगा था भीगने. न, मैं नहीं भीगने वाला.

बहुत गुस्सा आ रहा है बारिश पर, बादलों पर, मौसम पर. क्यूँ मुझे बच्चा बनाने पर तुले हैं. वैसे मन के एक कोने में यह भी लग रहा है कि फिर से बच्चा बन जाने में मजा तो बहुत आयेगा. मगर अब कहाँ संभव यह सब. इसलिये यह विचार त्याग कर सोचने लगता हूँ कि कैसे जान लेते हैं ये कि आज मैं छतरी नहीं लाया. दिन भर बरस लेते, कम से कम मेरे आने के समय तो ५ मिनट चैन से रह लेते. मगर इन्हें इतनी समझ हो, तब न! मैं भी किन मूर्खों को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ.

फिर अपनी खीझ उतार कर चुपचाप बारिश रुकने का इन्तजार कर रही भीड़ का हिस्सा बन जाता हूँ. यूँ भी तो ज्यादा जिंदगी भीड़ का हिस्सा बने ही तो गुजर रही है सबकी. जब आप आप नहीं होते बस एक भीड़ होते हैं. तब आप अपने मन की नहीं करते जो भी करते हैं या तटस्थ भीड़ शामिल रहते हैं, वो ही तो भीड़ की मानसिकता कहलाती है. उस वक्त तो सब जायज लगता है.

अपनी गलती कौन मानता है कि छाता लेकर निकलते तो इन्तजार न करना पड़ता. मुझे तो सारी गलती बारिश, बादल और मौसम की ही लगती है. अच्छा लग रहा है अपनी खीझ उतार कर.

बस, इसी अच्छा लगने की तलाश में हर जतन जारी है.

पता नहीं क्यूँ, कार में बैठते ही मैथिली की यह कजरी झूम झूम के गाने का मन करने लगा, सीट पर बैठे बैठे थोड़ा सा नाच भी लेता हूँ, कोई देख नहीं रहा. अच्छा लग रहा है:


बदरा उमरी घुमरी घन गरजे
बूँदिया बरिसन लागे न.....


आप भी सुनिये न!! विश्वास जानिये, अच्छा लगेगा!!!

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रविवार, सितंबर 23, 2007

आज तुमने फिर बहुत सुन्दर लिखा है!!

समय भी अजब चीज बनी है इस दुनिया में. जब हम चाहते हैं कि जल्दी से कट जाये तो ऐसा रुकता है कि पूछो मत और जब चाहें कि थमा रहे, तो ऐसा भगता है कि पूछो मत. बिल्कुल उलट दिमाग व्यक्तित्व है समय का.

कुछ दिन पहले दफ्तर से घर के निकला. उस रोज घर जरा जल्दी पहुँचना था. स्टेशन से ट्रेन छूटी और तुरन्त ही कुछ दूर आकर रुक गई. तीन स्टेशन छोड़कर एग्लिंगटन स्टेशन पर किसी ने ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली थी. पुलिस की जाँच पड़ताल जारी थी. उनकी जाँच समाप्ति के बाद ही एक एक करके सब ट्रेनें छूटेंगी. वाकिया हुए पहले ही एक घंटे हो चुके थे, उम्मीद थी कि जल्द ही हरी झंडी मिलेगी.

यात्रियों का समय काटे नहीं कट रहा था. मैने कुछ देर अखबार पलटाया. कुछ देर इधर उधर लोगों के चेहरे के हाव भाव पढ़ता रहा. कोई परेशान दिख रहा था, तो कोई सेल फोन पर बातचीत में मगन और कोई कसमसाया सा सोया था. कुछ बतों में मशगुल थे और कुछ रेल्वे को गरिया रहे थे. अब कोई पटरी पर कूद गया तो रेल्वे क्या करे? मगर मानव तो मानव है, गल्ती थोपी और खुश हो लिये.

एक सज्जन अपने मित्र से बड़े मजाकिया अंदाज में बोले कि इनको भी रश ऑवर में ही कूदना होता है. १२ या १ बजे दिन में कूद लेते तो अब तक ट्रेक क्लियर हो जाता. कितना असंवेदनशीन बना दिया है वक्त ने मानव को. एक महिला का बेटा डे-केयर में था, उसे उसके लिये चिंता थी. ऐसा लगा कि जैसे मैं ही बस फुरसत में हूँ. घर फोन कर दिया था और इत्मिनान से बैठा बाकियों की परेशानियों का अवलोकन करने में सच्चे भारतीय की तरह ऐसा खो गया कि खुद की परेशानी हावी ही नहीं हो पाई.
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सुबह से मेकअप में छिपे चहेरों की रंगत धीरे धीरे उड़ती जा रही थी. वो हरे टॉप वाली लड़की सुबह बहुत सुन्दर दिख रही थी. अब दो घंटे के इन्तजार के बाद कम सुन्दर हो गई थी. मैं सोचने लगा कि कितनी टाईमबाउन्ड सुन्दरता है. कहीं तीन चार घंटे और इन्तजार करवा दिया तो एक नया ही रुप न सामने आ जाये. वैसे भी कहा गया है कि किसी का असली रुप देखना है तो उसे गुस्से में या परेशानी में देखो. मेरे साथ कम से कम यह समस्या नहीं है. जैसा सुबह दिखता हूँ, वैसा ही शाम को और वैसा ही गुस्से में भी, जब कभी अगर आ जाये तो. :) उपर वाले की बड़ी कृपा है और आप सबने तो मेरी तस्वीर गाथा तो देखी ही है.

लगा कि समय आगे बढ़ ही नहीं रहा. तीन घंटे का इन्तजार लोगों के लिये मानो तीन साल की तरह कटा, तब कहीं ट्रेन चली. वाकई, इन्तजार की घड़ियां अक्सर बहुत मुश्किल से कटती हैं.

वहीं दूसरी तरफ, पिता जी भारत से मई में आ गये थे चार माह के लिये. हम भी निश्चिंत थे कि अब लम्बे समय तक हमारे साथ रहेंगे. रोज शाम को साथ बैठ कर चाय पीना, टीवी देखना, जमाने की बातें, अपनी आलेखों और कविताओं को सुना सुना कर उनसे स्नेह भरी वाहवाही लूटना.

यही रुटीन हो गया था. हर लेख और कविता पर उनकी तारीफ सुनना मेरी आदत सा बन गये इतने कम दिनों में ही. पत्नी का रुटीन भी उन्हीं के इर्द गिर्द घूमने लगा. अब पापा का चाय का समय हो गया, अब दवा देना है, अब नाश्ता तो अब खाना. सब कुछ उसी रंग में रंग गया. सब बड़े मजे से चलता रहा और इस बार तो समय को जैसे पंख नहीं पंखा लग गये. आज चार महिने बीत भी गये. अभी कल ही तो आये थे ऐसा लगा. कितना तेज समय बीता, समझ ही नहीं पाये.

अभी कुछ घंटे पहले ही उन्हें हवाई जहाज पर बैठा कर लौटे हैं. घर तो जैसे पूरा खाली खाली लग रहा है. दादा जी के जाने से तीनों चिड़िया भी उदास है, जो शाम को उनको अपनी चीं चीं से हैरान कर डालती थीं, आज वो भी चीं चीं नहीं कर रहीं. पत्नी चुपचाप अनमनी सी बैठी टीवी देख रही है, जैसे अब उसके पास कोई काम करने को ही नहीं बचा.

पापा, बार बार सीढ़ी पर छड़ी की ठक ठक सुनाई दे रही है, लगता है आप उतर कर फेमली रुम में आ रहे हैं. मैं इन्तजार कर रहा हूँ आपको अपना नया आलेख सुनाने के लिये.

अब तक तो पिता जी का ३ घंटे का सफर कट भी गया होगा. फिर भी अभी १८ घंटे बाकी ही हैं जब वो इतने लम्बे सफर से थके हुए भारत पहुँचेंगे.

मेरा मन भी बहुत भारी है, बस तसल्ली इतनी सी है कि नवम्बर में मैं खुद भारत जा रहा हूँ तो फिर से साथ हो जायेगा.

सोच रहा हूँ आज यह लेख लिख कर किसे सुनाऊँगा जो उस स्नेह से तारीफ करते हुए कहे कि तुमने आज फिर बहुत सुन्दर लिखा है और मैं दुगने उत्साह से इसे प्रकाशित करुँगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 20, 2007

मुझे मुक्ति चाहिये!!!!

याद है मुझे, तब सरकारी मकान में रहते थे. छत पर ईंट और मिट्टी से घेर कर पानी भर दिया जाता था और घर की सारी खिड़कियों के काँच पर गाढ़ा रंग. गर्मी की तपती दुपहरी में खिड़कियाँ बंद होने पर कमरे में घुप्प अंधेरा हो जाता था और छत पर पानी भरा होने से पंखे से एकदम ठंडी हवा आती थी. बड़ी राहत से सोते थे उसमें.

रात में आंगन में पहले पानी से सिंचाई होती थी और अंधेरा होते ही बिस्तर बिछा दिये जाते थे. जब सोने जाते तो ठंडे ठंडे बिस्तर मिलते और सबेरा होने तक मोटी खेस की चादर ओढ़ने की नौबत आ जाती.

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समय के साथ साथ देखते देखते बाहर सोने का प्रचलन बंद सा होता गया और तब तक कुलर भी आ गये थे. तब गर्मी में बिना कुलर चलाये नींद ही नहीं आती थी. उस पर से रात बिरात अगर बिजली चली जाये तो जैसे पूरा बदन चुनमुना उठता था मानों सैकड़ों चिटियों ने एक साथ काटना शुरु कर दिया हो. फिर जब बिजली आ जाये, तभी नींद आती थी.

कुछ समय और बीता. कुलर की जगह एसी ने ले ली. अब कुलर में उमस लगती थी. बिना एसी जैसे सोने की कल्पना भी मुश्किल हो जाती. कार में एसी, घर में एसी, बिजली जाये तो जनरेटर/इन्वर्टर ऑन. शरीर जैसे एकदम से सुविधाओं का लती हो गया.

इस बात की कल्पना भी मुश्किल हो गई कि बिना इन सब तामझामों के गर्मी में कैसे सो पायेंगे.
फिर कनाडा आ गये. बिजली जाती भी है जैसे भूल ही गये. गर्मी में हर वक्त एसी मे रहना. चाहे घर में, कार में, बजार में या दफ्तर में. सर्दी हो जाये तब यही सब पलट कर हिटिंग में बदल जाता है.
आने के बाद पहली ही भारत यात्रा के बाद अब तो गर्मियों में भारत जाने में भी घबराहट होने लगी है कि कैसे बरदाश्त करेंगे. बार बार तो बिजली चली जाती है और फिर गर्मी भी इतनी ज्यादा.

है तो वो ही भारत, जहाँ से मैं आया था. तब भी तो बिजली जाती थी. फिर क्या हुआ??

शायद सुविधायें बहुत जल्दी हमें अपना गुलाम बना लेती हैं. जकड़ लेती हैं अपने भुजपाश में. अब आप भी तो पेड़ की छाया में नहीं सो सकते?

और गुलाम आदमी तो बदल ही जाता है, वो वो ही कहाँ रह जाता है.

इस गुलामी से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है?

नहीं सुझता है कोई मार्ग.

मगर मुझे मुक्ति चाहिये!!!!

मुझे मेरे भारत आने के लिये मौसम नहीं देखना है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, सितंबर 18, 2007

हाय टिप्पणी!! काहे टिप्पणी!!

अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. हाँ, इस बात को सुनकर अनेकों भृकुटियाँ जरुर टेढी हो जायेंगी. यह तो हम सबको आता है.

जरा बताईयेगा:

क्या आप अपने नौकर को पानी या चाय देने के लिये धन्यवाद देते हैं?

क्या आप अपने ड्राइवर को दफ्तर पर उतरते समय या घर पर उतरते समय, सुरक्षापूर्वक पहुँचाने का धन्यवाद देते हैं?

क्या आप पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरने वाले बालक को पेट्रोल भरने का धन्यवाद देते हैं?

क्या आप अपने मित्र का फोन आने पर फोन रखते समय उसे फोन करके याद करने का आभार करते हैं?

क्या आप से जब कोई आपका हाल पूछता है तो उसे अपना हाल 'ठीक हूँ' के साथ हाल पूछने के लिये धन्यवाद करते हैं?

क्या आप दुकानदार को पैसा देने के बाद बचे पैसे वापस लेते हुये उसकी सेवाओं के लिये धन्यवाद कहते हैं?

क्या आप स्टेशन पर कुली को या रिक्शे वाले को पैसे के सिवाय धन्यवाद भी देते हैं?

उपरोक्त सूची में अभी कम से कम १०० और वाकये रख सकने में सक्षम हूँ जिसमें ९८% लोगों का जबाब नकारात्मक होगा.लोग सोचते हैं कि किस बात का धन्यवाद दें इनको. यह तो इनका काम है. पैसे देते हैं इसको. इसकी औकात ही क्या है हमारे सामने ? और भी न जाने क्या क्या कारण.

(अमरीका/ कनाडा में इन्हीं के जबाब ९८% लोगों के सकारात्मक होंगे और इसका जबाब देते हुये भी अधिकतर इन प्रश्नों को उनसे पूछने का धन्यवाद दे रहे होंगे.)

चलिये, यह तो देने की बात हो गई. अगर कोई दे दे तो लेना नहीं आता. धन्यवाद का सीधा जबाब अंग्रेजी में ' यू आर वेलकम' या 'मेन्शन नॉट' से दे सकते हैं या फिर हिन्दी में इसे ही 'आपका बहुत आभार', लिखित में 'साधुवाद' आदि से दिया जा सकता है. मगर मैने देखा है कि आधे से तो कोई भी जबाब देने की बजाय या तो उसे अनसुना कर देंगे या चुपचाप निकल लेंगे या फिर 'हें हें हें, कैसी बात कर रहे हैं?' या 'अरे, धन्यवाद कैसा?' या फिर 'आप भी न!! हद करते हो, भाई साहब' या 'अरे, यह तो हमारा फर्ज है, इसमें धन्यवाद कैसा.'

वही हालत अभिनन्दन और प्रशंसा की है. किसी से कह देजिये कि भाई, तुम्हारी शर्ट गजब की है. जबाब में धन्यवाद की जगह 'क्या भाई, सुबह से कोई मिला नहीं क्या?' या 'अरे कहाँ, बस ऐसी ही है.' या फिर 'अरे भाई साहब, बस काम चल जा रहा है.' या 'आप ले लो.' हद है, यार. एक धन्यवाद देने की बजाय ये सब क्या है?

इसको इस ढंग से भी देखें कि अगर चाय पिलाने का इन्तजाम करना धन्यवाद प्राप्ति की पात्रता रखता है तो चाय पिलाने का वादा करना, चाय पिलाने के लिये बुलवाना, चाय पिलवाना, हर बार चाय पिलवाना भी हर बार धन्यवाद प्राप्ति की पात्रता रखता है. अगर चाय अच्छी नहीं बनी है, तो या तो आपका प्रोत्साहन पाकर वह स्वयं बना बना कर सीख जायेगा या फिर आप उसे मार्गदर्शन दें कि कैसे बेहतर बनती है. परिणाम दोनों के ही अंत में एक अच्छी चाय बन जाने के ही होने की संभावना है.

किन्तु यदि आप चाय पीने ही न जायें या जायें भी, तो पी कर बिना कुछ कहे ही लौट जायें तो वो भी आखिर कब तक आपके आगे बीन बजाता रहेगा. हताश होकर चाय बनाना ही छोड़ देगा. कोई उधार तो ले नहीं रखी. फ्री में चाय पिला रहा है और आप है कि धन्यवाद तक नहीं कहते मगर चले हर बार आते हैं क्योंकि अभी शहर में बहुत सारी इस तरह की चाय स्थलियों की आवश्यकता है. रोज आवाज लगाते हैं कि अभी चाय पिलाने वाले कम हैं और आओ, और आओ.

कहते हैं न कि

'करत करत अभ्यास ते, जड़मत होत सुजान'

किन्तु बिन प्रोत्साहन के तो अभ्यास हो नहीं सकता. जल्द ही हौसला चुक जायेगा.

मुझे खुद गर तीन दिन तक पत्नी न कहे कि कुछ दुबले दिखने लगे हैं तो ट्रेड मिल पर जाने की इच्छा खत्म होने लगती है जबकि वजन तौलने वाली मशीन चिंघाड़ चिघांड़ कर कह रही होती है कि आपकी बीबी झूठ बोल कर सिर्फ आपको कसरत जारी रखने के प्रोत्साहित कर रही है. सालों में इकट्ठा किया वजन निकलने में भी कुछ समय दोगे कि हर तीसरे दिन दुबले होते जाओगे. मगर उसका प्रोत्साहन ही तो है जो मुझे बार बार ट्रेड मिल पर बनाये रखता है. भले ही कम न हो रहा हो मगर कम से कम बढ़ तो नहीं रहा. यह ही गनीमत है वरना अभी तक क्या हाल हो गया होता.

किसी ने मेहनत की है. भले ही आपके लिये न की हो, खुद के लिये ही की हो मगर उसकी मेहनत का जो फल आया, वो एक अच्छाई के लिये है, आप भी उसका आनन्द उठाते हैं तो दो शब्द धन्यवाद के देना क्या आपका फर्ज नहीं बनता?

बनता है न!! इसी धन्यवाद को, इसी प्रोत्साहन को, इसी अभिनन्दन को चिट्ठाकारी में 'टिप्पणी' कहते हैं और इस धन्यवाद के बदले जो 'यू आर वेलकम' बोलने का शिष्टाचार है, उसे टिप्पणी देने वाले के चिट्ठे पर जाकर 'टिप्पणी' करना बोलते हैं.

फिर शिष्टाचार निभाने में अकड़ कैसी और शर्माना कैसा?

कहीं उन ९८% की तरह आप भी तो इस बात से नहीं डर रहे कि इससे आपकी औकात कमतर आँक ली जायेगी?

बात मानो इससे आपका बड़प्पन ही साबित होगा और औकात में इजाफा. बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं.


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चलते चलते:

इस आलेख की वजह बनी अभी अभी ताजा चली टिप्पणी महत्ता पर वेचारिक आँधी. अगर बहुत गहरा उतरने की चाह हो तो यह सारे लिंक एक जगह उपलब्द्ध करा रहा हूँ. कुछ राजीव जी के ब्लॉग से टीपे हैं बिना अनुमति :) :



राजीव टंडन के अंतरिम पर

ज्ञान दत्त जी मानसिक हलचल पर

शास्त्री जे सी फिलिप जी के सारथी पर

टिप्पणीकार पर

संजय तिवारी जी के विस्फोट पर


कुछ पुराने जमाने की बातें:


उड़न तश्तरी पर : अपना ब्लॉग बेचो रे भाई

फुरसतिया पर: सुभाषित वचन-ब्लाग, ब्लागर, ब्लागिंग

जीतू भाई: ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व

उड़न तश्तरी पर: पुनि पुनि बोले संत समीरा

सागर चन्द नहार जी: अपने ब्लाग की टी आर पी कैसे बढ़ायें

नोटपैड पर: तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ


और भी अनेकों बार इस विषय पर लिखा जा चुका है, जिनके लिंक फिर कभी. मसीजिवी और निलिमा जी भी इस विषय पर अपनी तरह से विचार रख चुके हैं.


सूचना:

यह आलेख स्वांत: सुखाय लेखन वालों के लिये सफेद पन्ना है. वे इसे न देखें. वैसे भी वो सब कुछ पनी डायरी में लिख सकते हैं या टिप्पणी वाला टैब बंद कर सकते हैं तो फिर बताना भी नहीं पड़ेगा कि स्वांत: सुखाय लिख रहे हैं. सब समझ जायेंगे.

उनके काम यह आलेख तभी आयेगा अगर वो हमारे मोहल्ले में रहने वाले शर्मा जी की तरह स्टेटमेंट दे रहे हों तो!! शर्मा जी निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं. रोज मिलते हैं और कहते हैं कि मैं बहुत खुश हूँ. क्या करना है इतना पैसा कि चैन खो जाये? खाना वो दो रोटी ही है चाहे कितना भी पैसा आ जाये. हम तो बस अपने में खुश हैं. जितना है दो टाईम की रोटी आ जाती है, इससे ज्यादा की हा हा क्या मचाना. और मुझे तिवारी जी बता रहे थे कि वो कोई साईड बिजनेस की तलाश में हैं ताकि कुछ अलग से कमाई हो जाये.


वैसे अगर संतोष है तो संतोष में बहुत शक्ति है:

गोधन, गजधन, वाजिधन, और रतन धन खान।
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान॥ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, सितंबर 16, 2007

तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती!!!

गमगीन सा बोझिल माहौल. सभी के चहेरों पर गंभीरता. शांत वातावरण के बीच सुनाई पड़ती फुसफुसाहट. पूरे हॉल के भीतर दीवालों पर टंगी पेन्टिंग्स और उसके पास फुसफुसा कर उसकी डिटेल्स पर प्रकाश डालते कुर्ता पहने, हल्की दाढ़ी और बिखरे बाल में सजे गंभीर मुद्राधारी चित्रकार. कुछ कुछ लोगों की भीड़ अलग अलग हर तरफ तस्वीरों के सामने.

यह दृश्य है एक चित्रकला प्रदर्शनी का जिसमें जाने का शौक हमने कुछ समय पूर्व अपने मित्र भारत के विख्यात चित्रकार विजेन्द्र ’विज’ से प्रभावित होकर पाल लिया.

अब एक कलाकार का हौसला दूसरा कलाकार ही तो बढ़ाता है. एक कवि/लेखक का दूसरा कवि/लेखक, एक चिट्ठाकार का दूसरा चिट्ठाकार, एक चित्रकार का दूसरा चित्रकार. मगर अब हमारी सोच का दायरा हमने जरा बढ़ाया और न सिर्फ चिट्ठाकार/कवि और लेखक की हौसला अफजाई करने के हमने चित्रकारों को भी इसमें शामिल करने का प्रयास किया.

हॉल मे घुसे और जिस चित्र के नीचे सबसे ज्यादा भीड़ थी वहाँ पहुँच लिये. चित्रकार महोदय फुसफुसाते से, हाथ में कूची पकड़े चित्र की डिटेल समझा रहे थे. पता चला कि प्रदर्शनी का विषय था ’ध्यान’. यह चित्र समझाया जा रहा था.

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हम कवि सम्मेलनियों को फुसफुसाहट सुनाई नहीं देती सो कान एक पास ले जाकर सुनना पड़ा. बाकी सब दूर से भी सुन ले रहे थे या कम से कम सुन रहे हैं इसका प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर रहे थे.

चित्रकार महोदय गंभीरता से कह रहे थे कि इस लाल बिन्दु को ध्यान से देखें. इसमें साक्षात ब्रह्म है. यही शून्य है और यही एक मात्र सत्य. इस पर ध्यान केन्द्रित किजिये, यही उर्जा का स्त्रोत है. एकटक बिना पलक झपकाये पूरी श्रृद्धा से इस पर ध्यान केन्द्रित करें और कुछ ही पल में आप अपने आपको दूसरे लोक में पायेंगे, इसका विराट स्वरुप आपको दिखने लगेगा. बस डूब जाईये इस बिन्दु में. डुबकी लगाईये इस सागर में. यही ध्यान है और यही सफल जीवन का एक मात्र मार्ग है. भीड़ के साथ हम भी लगे डुबने. सबने विस्तार देखा और उन सभी ने भी समझा कि हमने भी विस्तार देखा. कौन अपने आपको भीड़ मे मूर्ख घोषित करवाये मना करके.

फिर बाकी के चित्र भी देखे जो और चित्रकारों द्वारा बनाये गये थे. बड़ी बड़ी मेहनत के नमूने. कुछ समझ में आये और अधिकतर नहीं. मगर सुना बड़ी गंभीरता से सभी चित्रकारों को. पहला पहला अनुभव था न!


अगले दिन अखबार में देखा, लाल बिन्दी को सर्वश्रेष्ठ चित्र घोषित किया गया. बाकी सबकी घोर मेहनत नदी, पहाड़, आकाश रंगने की गई पानी में. ऐसा ही तो कविता में भी होता है कि भले ही कम शब्द हों मगर संदेश सालिड हो और कहा ओजपूर्वक तरीके से गया हो. साथ ही फिर आपका नाम भी काम करता है.

फिर तो मानिये सिलसिला सा लग गया इस तरह की प्रदर्शनियों में जाने का. अगली बार गये तो बिल्कुल वही माहौल मगर टॉपिक अलग. इस बार ’रक्त दान’ सप्ताह के उपलक्ष्य में रेड क्रास द्वारा स्पॉन्सर्ड शो था.

फिर हॉल में पहुँचे. तरह तरह के चित्र लगे थे. मगर जिस जगह सबसे ज्यादा भीड़ थी हम भी वहीं पहुँच गये. अरे, यह तो वही चित्रकार हैं. फिर नजर दौड़ा कर देखा तो चित्र भी वही और वो फुसफुसा रहे थे. यह रक्त की वह बूँद है जो किसी को जीवन दे सकती है या इसका आभाव किसी की जिन्दगी ले सकता है. आपकी एक बूँद से किसी का जीवन संवर सकता है और आपका कुछ नहीं जाता और जाने क्या क्या. हम तो ऐसा प्रभावित हो गये कि वहीं रक्त दान शिविर में एक बोतल खून भी दान दे आये.

अगले दिन पता चला कि उनका वही चित्र इसमें भी फिर सर्वश्रेष्ठ चुना गया. हम तो दंग रह गये या ज्यादा साहित्यिक हो कहें तो सन्न रह गये. मगर ऐसा ही तो कविता में भी होता है कि भले ही कम शब्द हों मगर संदेश सालिड हो और कहा ओजपूर्वक तरीके से गया हो. भले ही हर मंच से वही पढ़ रहे हों बार बार. साथ ही फिर आपका नाम भी काम करता है.

इसके बाद तो एक के एक बाद उसी चित्र पर अलग अलग आख्यान दे उन्हें सर्वश्रेष्ठ घोषित होते मैने न जाने कितनी प्रदर्शनियों में देखा. एक बार किसी भारतीय शादी की साईट द्वारा स्पान्सर्ड ’सुहाग’ टॉपिक पर. आख्यान था कि यह लाल बिन्दी सुहाग की निशानी है. यह सुहागन का गहना है.

फिर जापान के सांस्कृतिक कार्यक्रम में- इसे जापान के झंडे के रुप में प्रदर्शित किया गया और फिर संस्कृति की रक्षा के लिये सर्वश्रेष्ठ चुना गया.

फिर ’यातायात जागरुकता अभियान’ में, वही लाल बिन्दी लाल सिग्नल लाईट बन गई. सबसे जरुरी. न ध्यान दिया तो जान जा सकती है. आह्ह!!

हम तो सोच में ही पड़ गये. प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी याद आ गये जो कवियों से रश्क खाते हुये कहते थे कि हम रोज एक व्यंग्य लिखते हैं और सुनाते हैं और हर बार नया सुनाये, तब किसी तरह नाम चला पाते हैं और एक ख्याति प्राप्त कवि जीवन भर छः कविता लिख कर हमेशा मंच साधे रहता है. वही वही कविता हर बार.

मगर आज तो हमने कवि को भी रश्क खाते देखा. एक चित्रकार सारा जीवन एक चित्र के सहारे काट दे..हद है भाई..और उस पर से हर बार सर्वश्रेष्ट. हाय! हम क्यूँ फंस गये छः कविता के चक्कर में सस्ता सौदा समझ कर.

आगे से ध्यान रखूँगा. ऐसा चित्र बनाऊँगा जो हर जगह फिट हो जाये फिर छः कविता लिखने की झंझट भी छूटे. कौन पड़े चक्कर में.

चलते-चलते:

आधा दर्जन गीत लिख, यूँ जीते मंच मचान
सारा जीवन काट गये, वो अपना सीना तान
अपना सीना तान कि नाम कवियों में होता
बार बार सुन करके भी, श्रोता ताली है धोता
कहे समीर कविराय, इससे भी सस्ता पाओ
एक ही चित्र बनाओ,जीवन भर नाम कमाओ.

--समीर लाल ’समीर’

निवेदन: कोई भी कलाकार इसे अन्यथा लेकर आहत न हो. यह मात्र मौज मजे के लिये है. हर कला का सम्मान हो, यही मेरी मान्यता है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, सितंबर 14, 2007

तन्हा रात

नोट: यह पोस्ट जनवरी, २००७ की पुरानी पोस्ट है जो कि गल्ती से सुधार कार्य के चक्कर में फिर से पोस्ट हो गई है और पुरानी दिनाँक में पोस्ट कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है. अतः आप सबको हुई असुविधा के लिये क्षमापार्थी हूँ.


अब कल फुरसतिया जी हमारे द्वार संदेश " एक आग का दरिया है और डूब के जाना है" पर हमें ऐसा लपेटे कि हमारी तो हवा ही खिसक गई. मगर, हम भी कम चिरकुट चक्रम नहीं हैं, जवाब में जरुर लिखेंगे, जो कुछ भी पूछा गया है. अपनी बात को और पुख्ता करने के लिये एक गीत का मल्लमा और चढ़ा देता हूँ फिर इक्कठे ही फोड़ेंगे. :)

तो सुनिये, हमारी नयी रचना, जो जी में आये, कहिये और जो जी में आये वो सोचिये, हम तो लिख गये. आगे खुलासा किया जायेगा, फुरसतिया जी के लेख को देख कर और आपकी टिप्पणियों के मद्दे नजर इस पोस्ट पर:

तन्हा रात

सिसक सिसक कर तन्हा तन्हा, कैसे काटी काली रात
टपक टपक कर आँसू गिरते, थी कैसी बरसाती रात.

महफिल आती रहीं सजाने, हर लम्हे बस तेरी याद
क्या बतलायें किससे किससे, हमने बाँटी सारी रात.

लिखी दास्ताने हिजरां भी जब, तुझको ही था याद किया
हर्फ़ हर्फ़ को लफ्ज़ बनाती , हमसे यूँ लिखवाती रात.

राहें वही चुनी है मैने, जिस पर हम तुम साथ रहें,
क्यूँ कर मुझको भटकाने को, आई यह भरमाती रात.

हुआ 'समीर' आज फिर तनहा, इस अनजान जमानें में,
किस किस के संग कैसे कैसे, खेल यहाँ खिलवाती रात.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, सितंबर 12, 2007

हिन्दी हैं हम वतन है, हिन्दुस्तां हमारा...

मौका है भारत से सात समंदर पार कनाडा में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिये आयोजित समारोह का. अब समारोह है तो मंच भी है. माईक भी लगा है.टीवी के लिये विडियो भी खींचा जा रहा है. मंच पर संचालक, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि विराजमान है और साथ ही अन्य समारोहों की तरह दो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति भी सुसज्जित हैं. माँ शारदा की तस्वीर मंच पर कोने में लगा दी गई है और सामने दीपक प्रज्ज्वलित होने की बाट जोह रहा है.

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कार्यक्रम पूर्वनियोजित समय से एक घंटा विलम्ब से प्रारंभ हो चुका है. संचालक महोदय सब आने वालों का जुबानी और मंचासीन लोगों का पुष्पाहार से स्वागत कर चुके हैं. अब वह मुख्य अतिथि महोदय से दीप प्रज्ज्वलित कर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार कार्यक्रम की विधिवत शुरुवात का निवेदन कर रहे हैं.

मुख्य अतिथि ने अपनी टाई बचाते हुए दीपक प्रज्ज्वलित कर दिया है. हिन्दी द्वैदीप्तिमान होने लगी है. उसका प्रकाश फैलने लगा है. मुख्य अतिथि वापस अपना स्थान ग्रहण कर चुके हैं. अध्यक्ष महोदय अपना उदबोधन कर रहे हैं. हिन्दी के प्रचार और प्रसार कार्यक्रम के अध्यक्ष बनाये जाने के लिये आभार व्यक्त करते हुए आयोजकों का नाम ले लेकर गिर गिर से पड़ रहे हैं.

वहीं मंच पर विराजित सूट पहने मुख्य अतिथि, जो कि भारत में मंत्रालय के हिन्दी विभाग में उच्चासीन पदाधिकारी हैं और यहाँ किसी अन्य कार्य से भारत से पधारे हैं एवं उन दो मंचासीन प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के संयोजन से मंच पर महिमा मंडित हो रहे हैं, अपने चेहरे से पसीना पोंछ रहे हैं.

उनको पसीना आने के दो मुख्य कारण समझ में आ रहे हैं. पहला, गर्मी के मौसम में वो उनी सूट पहने हैं और दूसरा, मंच से बोलने का भय. दोनों ही कारण स्वभाविक हैं.

भारत से आने वाले अधिकारियों द्वारा यहाँ के किसी भी मौसम में गरम सूट पहनना तो एकदम सहज और सर्व दृष्टिगत प्रक्रिया है, इससे मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं होता. और दूसरा मंच से बोलने का भय, वह भी मौकों और अभ्यास के अभाव में सामान्य ही है. वहाँ भारत में भी दफ्तर में यह न सिर्फ बिना बोले ही काम चला लेते हैं बल्कि बिना लिखे भी. मात्र दस्तखत करने में महारत हासिल है और उसका इस मंच से कोई कार्य नहीं, तो पसीना आना स्वभाविक ही कहलाया.

उनकी हालत देखकर कार्यक्रम के प्रथम स्तरीय संयोजक, जो कि संचालक की हैसियत से मंचासीन हैं, मंच के आसपास घूमते द्वितीय स्तरीय संयोजक को इशारा करते हैं और वो द्वितीय स्तरीय संयोजक उपस्थित श्रोताओं के पीछे घूमते तृतीय स्तरीय संयोजक को इशारा करता है जो कि भाग कर कनैडियन एयरफ्लो पंखे का इन्तजाम कर मंच के बाजू में लगा देता है.

पंखे से चलती अंग्रेजी हवा से, जहाँ एक ओर मुख्य अतिथि महोदय राहत की सांस ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हिन्दी को प्रचारित, प्रसारित और प्रकाशित करती दीपक की लौ लड़खड़ाते हुए अपने अस्तित्व को बचाने का भरसक प्रयास कर रही है. आखिरकार उसकी हिम्मत जबाब दे गई.

हिन्दी का प्रचार और प्रसार थम गया. दीपक में अंधेरा छा गया. संचालक महोदय दीपक की तरफ भागे. अध्यक्ष का भाषण एकाएक रुक गया. पंखा बंद कर उस अंग्रजी हवा को रोक दिया गया. माचिस से जला कर दीपक पुनः प्रज्ज्वलित हुआ. हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार पुनः प्रारंभ हुआ. हिन्दी प्रकाशित हुई.
हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार को बाधित करने का जिम्मेदार वह तृतीय स्तरीय संयोजक द्वितीय स्तरीय संयोजक से डांट खाकर किनारे खड़े खिसियानी हंसी हंस रहा है.

कार्यक्रम सुचारु रुप से चलता जा रहा है. सभी भाषण हो रहे हैं. कुछ कवितायें भी पढ़ी जा रहीं हैं और अंत में मुख्य अतिथि द्वारा हिन्दी के प्रचार प्रसार में विशिष्ठ योगदान देने वाले पाँच लोगों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जा रहा है, जिस पर लिखा है:

इन रिक्गनिशन ऑफ योर कॉन्ट्रिब्यूशन टूवर्डस हिन्दी………..

( In Recognisition of your contribution towards Hindi.)..

इसके आगे मुझसे पढ़ा नहीं जा पा रहा है. मैंने हिन्दी का ऐसा प्रचार और प्रसार पहले कभी नहीं देखा शायद इसलिये.

कार्यक्रम समाप्त हो गया है. माँ शारदा की तस्वीर को झोले में लपेट कर रख दिया गया है. दीपक बुझा कर रख दिया गया है. अब अगले साल फिर यह दीप प्रज्जवलित हो हिन्दी का प्रचार, प्रसार करेगा और हिन्दी को प्रकाशित करेगा.

तब तक के लिये जय हिन्दी.

आप सबको १४ सितम्बर को हिन्दी दिवस की औपचारिक एवं सरकारी शुभकामनायें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, सितंबर 10, 2007

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

आज ऐसे ही ऑर्कुट पर टहल रहा था. एकाएक कुछ स्क्रेप्स पर नजर चली गई. कुछ कवितायें टंगी थीं. बचपन की याद दिला गई.

बस सीडी में यह नज़्म लगाई और याद करने लगा:

"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी."


गर्मी की छुट्टियाँ. तपती दुपहरी. घर की खिड़कीयों पर बंधी वो खस की टट्टियाँ. उस पर बार बार सिंचाई और उसके सामने रख कर चलता सिन्नी का काला वाला टेबल फैन. कितनी ठंडा हो जाता था कमरा. मगर बच्चों को कहाँ चैन. इधर माँ दुपहरी का काम निपटा कर कमर सीधी करने जहाँ आँख झपकाये, उधर सारे बच्चे घर के बाहर धूप में लगे खेलने. तब टीवी वगैरह तो होता नहीं था कि कार्टून देखने बैठ जाते.

याद आते हैं, कितनी तरह के खेल खेला करते थे.

कंचे, तरह तरह के रंग बिरंगे. आधे खरीदे और उससे ज्यादा जीते हुए. रोज रात में गिन कर रख कर सोते और सुबह उठकर फिर गिनते. साथ में होते कई सारे सुन्दर सुन्दर बंटे, जिनसे निशाना लगाते थे.

भौरां याने लट्टू-इसमें तो हमारी मास्टरी थी. बढ़ियां नुकीली आर वाला लट्टू बिना जमीन में छुलायें सीधे हाथ पर नचाते हुए गुद्दा खेला करते थे. न जाने कितनों की कितने लट्टू गुद्दा मार मार कर फोड़ने का विश्व रिकार्ड हमारे नाम जाता अगर इस खेल को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली होती.

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सतौलिया, सात पत्थर के चिप्स एक के उपर एक जमा कर उसे गेंद से फोड़ना और फिर भाग कर उन्हें जमाना जब तक दूसरी टीम के लोग आपको गेंद से मारने की कोशिश करते रह्ते थे. जैसे ही जम जाये-जोर से चिल्लाना-सतौलिया. हम्म!!

मार गेंद-इसमें एक दूसरे को गेंद से मारा जाता था. रबर की लाल गेंद. कई बार तो ऐसी चिपकती थी कि निशान ही बन जाये.

मेरे काफी बाद उम्र तक प्रिय रहा-टीप रेस याने छुप्पन छुपाई. क्यूँ प्रिय रहा यह नहीं बतायेंगे. पूरे मोहल्ले के लड़के लड़कियाँ खेला करते थे एक साथ.

गुल्ली डंडा-इस खेल में तो सारे दोस्त डरा करते थे हमसे. इसलिये नहीं कि मैं बहुत अच्छा खेलता था. मगर जितना भी सामने वाले को दाम देना पड़ जाये, जिसमें जो दाम देता है वो आपको कंधे पर लाद कर चलता है उतनी दूर जितनी दूर आपने गुल्ली मारी है, उसकी तो दम ही बैठ जाती थी. हमारा यह विस्तार आज का भर थोड़े ही है. हम हमारी उम्र के हिसाब से हमेशा ही मोटे थे और दुबले होने का आजीवन प्रयास इस बात का साक्षी है. जब से होश संभाला, हमारे मोटापे और दुबले होने के प्रयास, दोनों ने बराबरी से आजतक हमारा साथ निभाया है. जैसे कि अपने नेताओं का साथ मक्कारी और भ्रष्टाचार निभाते हैं.

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और भी ढ़ेरों खेल होते थे जैसे गुलेल, खुद बनाते थे अमरुद के पेड़ (जबलपुर में हम उसे बीही का झाड़ कहते थे) से केटी काट कर और ट्रक की पुरानी गास्केट से ट्यूब निकालकर. निशाना ऐसा कि जिस काँच पर नाराज बस हो जायें.

फिर विष अमृत, नदी पहाड़ बाकि तो नाम भी याददाश्त से जाते रहे. याद है क्या वो जिसमे लंगड़ी कुद कर सात खाने कुदने होते थे चिप फेकने के बाद उसे लंगड़ी मे पार कराना होता था, मुझे तो नाम ही नहीं याद आ रहा. शायद एक्कड़ दुक्कड़ या अड़ई गुड़ई या जाने क्या..

क्रिक्रेट, फुटबाल, हॉकी, पतंगबाजी आदि तो आजकल भी बच्चे खेलते दिख जाते हैं मगर वो मेरे खेल कहाँ गये??

मेरे बीते बचपन के साथ ही वो भी दफन हो जायेंगे, अगर यह तभी पता चल जाता तो थोड़ा और खेल लेता. कुछ और गुद्दे मार लेता और कंचे तो आराम से और जीत ही ले आता.

अब पछताने से क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत. मगर इन कविताओं को तो अब भी सहेज सकते हैं. इसीलिये यहाँ पर दर्ज कर देता हूँ कि भले ही रोज नहीं, पर कभी कभी तो मेरे जमाने का कोई इससे अपना बचपन फिर से जी कर देख सके. आज के बच्चों का बचपन तो शायद इन कविताओं से विहीन होगा मगर हमारे समय के सभी हिन्दी भाषी बच्चों ने कभी न कभी इन कविताओं का पढ़कर या सुनकर लुत्फ जरुर उठाया होगा.

पोशम्पा भाई पोशम्पा,
सौ रुपये की घडी चुराई।
अब तो जेल मे जाना पडेगा,
जेल की रोटी खानी पडेगी,
जेल का पानी पीना पडेगा।
थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।
************

आलू-कचालू बेटा कहाँ गये थे,
बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।
**************

मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है।
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी।
************

आज सोमवार है,
चूहे को बुखार है।
चूहा गया डाक्टर के पास,
डाक्टर ने लगायी सुई,
चूहा बोला उईईईईई।
************

झूठ बोलना पाप है,
नदी किनारे सांप है।
काली माई आयेगी,
तुमको उठा ले जायेगी।
************

चन्दा मामा दूर के,
पूए पकाये भूर के।
आप खाएं थाली मे,
मुन्ने को दे प्याली में।
************

तितली उड़ी,
बस मे चढी।
सीट ना मिली,
तो रोने लगी।
ड्राईवर बोला, आजा मेरे पास,
तितली बोली " हट बदमाश "।
************

कविता साभार: आर्कुट-विचरण
चित्र साभार: डिस्कवर इंडिया-स्ट्रीट गेम्स
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बुधवार, सितंबर 05, 2007

जाओ तो जरा स्टाईल से...

जरा हट के का भाग-२ ही समझो इसे.....

आज एक चिट्ठी आई. उसे देखकर बहुत पहले सुना चुटकुला याद आया.

एक सेठ जी मर गये. उनके तीनों बेटे उनकी अन्तिम यात्रा पर विचार करने लगे. एक ने कहा ट्रक बुलवा लेते हैं. दूसरे ने कहा मंहगा पडेगा. ठेला बुलवा लें. तीसरा बोला वो भी क्यूँ खर्च करना. कंधे पर पूरा रास्ता करा देते हैं. थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा. इतना सुनकर सेठ जी ने आँख खोली और कहा कि मेरी चप्प्ल ला दो, मैं खुद ही चला जाता हूँ.

चिट्ठी ही कुछ ऐसी थी. एक बीमा कम्पनी की. लिखा था कि अपने अंतिम संस्कार का बीमा करा लें. पहले बताया गया कि यहाँ अंतिम संस्कार में कम से कम ५००० से ६००० डालर का खर्च आता है और अक्सर तो १०००० डालर भी अगर जरा भी स्टेन्डर्ड का किया. जरा विचारिये कि जब तक आप का नम्बर आयेगा तब तक मुद्रा स्फिति की दर को देखते हुए यह २५००० डालर तक भी हो सकता है.

आगे बताया गया कि आप अपनी मनपसन्द का ताबूत चुनिये, डिजाईनर. जिसमें आप को आराम से रखा जायेगा. कई डिजाईन साथ में भेजे ताबूत सप्लायर के ब्रोचर में थे. सागौन, चीड़ और हाथी दाँत की नक्काशी से लेकर प्लेन एंड सिंपल तक. उसके अन्दर भी तकिया, गुदगुदा गद्दा और न जाने क्या क्या. उदाहरण के लिये यह देखिये अन्दर और बाहर की तस्वीर.

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और:

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फिर आपके साईज का सूट, जूते आदि जो आपको पहनाये जायेंगे पूरी बामिंग और मेकअप के साथ. मेकअप स्पेशलिस्ट मेकअप करेगी, वाह!! यह तो हमारी शादी में तक नहीं हुआ. खुद ही तैयार हो गये थे. मगर उस समय तो खुद से तैयार हो नहीं पायेंगे तो मौका भी है और मौके की नजाकत भी.

फिर अगर आपको गड़ाया जाना है तो प्लाट, उसकी खुदाई, उसकी पुराई, रेस्ट इन पीस का बोर्ड आदि आदि. अगर जलाया जाना है तो फर्नेस बुकिंग और ताबूत समेत उसमें ढकेले जाने की लेबर. सारे खर्चे गिनवाये गये. साथ ही आपको ले जाने के लिये ब्लैक लिमोजिन. अभी तक तो बैठे नहीं हैं उतनी लम्बी वाली गाड़ी मे. चलो, उसी बहाने सैर हो जायेगी. वैसे बैठे तो ट्रक में भी कितने लोग होते हैं?

हिट तो ये कि आप हिन्दु हैं और राख वापस चाहिये तो हंडिया का सेम्पल भी है और उसे लकड़ी के डिब्बे में रखकर, जिस पर बड़ी नक्काशी के साथ आपका नाम खोदा जायेगा और आपके परिवार को सौंप दिया जायेगा.

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और:

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इतने पर भी कहाँ शांति-फूल कौन से चढ़वायेंगे अपने उपर, वो भी आप ही चुनें. गुलाब से लेकर गैंदा तक सब च्वाइस उपलब्द्ध है.

अब जैसी आपकी पसंद वैसा बीमा का भाव तय होगा.

तब से रोज फोन करते हैं कि क्या सोचा?

क्या समझाऊँ उन्हें कि भाई, यह सब आप धरो. हम तो भारत के रहने वाले हैं. समय से कोशिश करके लौट जायेंगे. यह सब हमको नहीं शोभा देता. अपच हो जायेगी.

हमारे यहाँ तो दो बांस पर लद कर जाने का फैशन है, अब कंधा दर्द करे कि टूटे. यह उठाने वाला जाने और उस पर खर्चा भी उसी का. अपनी अंटी से तो खुद के लिये कम से कम इस काम पर खर्च करना हमारे यहाँ बुरा मानते है.

भाई, अमरीका/कनाडा वालों, आप लोगों की हर बात की तरह यह भी बात-है तो जरा हट के. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, सितंबर 02, 2007

तुझसे नाराज नहीं...जिन्दगी हैरान हूँ मैं

सलाहकारों की भूमि-भारत भूमि. मैं गौरवान्वित महसूस करता हूँ कि मैने ऐसी भूमि पर जन्म लिया. यही पुण्य आदत मेरी भी है. आप मांगे न मांगे, मैं तो हाजिर हो जाता हूँ मुफ्त में सलाह लेकर.

याद आता है जब भारत में रहता था. कार पंचर हो जाये और हमारे सलाहकार मित्र हाजिर. तुमको फलानां टायर लगाना चाहिये और बात बढ़ते बढ़्ते सरकार तक पहुँच जाये कि सड़के बेहतरीन होना चाहिये जैसी अमरीका में होती हैं. अव्वल तो वो कभी अमरीका गये नहीं, उस पर से अगर आप पूछो कि कैसे बनेंगी तो बस इतना ही-हमें क्या करना इससे कि कैसे बनेंगी. सरकार का काम है वो जाने. आप खांसिये तो, छींकये तो, सलाह हाजिर.

आज हमारे मित्रों और शुभचिंतकों की तो कमी नहीं, तब जाहिर सी बात है कि सलाहें भी उसी अनुपात में आती होंगी. मुझे बहुत अच्छा लगता है कि कितना चाहते हैं सब मुझे. कितना ख्याल रखते हैं? कभी तो रात में घबरा कर उठ बैठता हूँ कि अगर मैं भारत का न होता तब तो सलाह के आभाव में क्या से क्या हो गया होता. फिर वंदे मातरम गाता हूँ तब जाकर नींद आ पाती है.

अभी पिछले दिनों नारद की फीड पर हमारी तस्वीर नहीं आती थी. जीतू भाई से बात हुई और उनके कहने पर हमने अपनी तस्वीर भेज दी. उन्होंने तस्वीर लौटती ईमेल से वापस कर दी और साथ मे सलाह कि भाई, आपकी तस्वीर 800 X 600 पिक्सल वाली है. यह नारद पर नहीं चलेगी. 50 x 50 पिक्सल की भेजिये. अब बताईये, हमारी फोटो तो 800 X 600 पिक्सल में भी अगर कोई शातिर फोटोग्राफर सही निशाना साध कर न खींचे तो कहो एकाध बाजू कट ही जाये. 50 x 50 पिक्सल में तो हमारे अंगूठे की फोटो ले लो.

खैर, मित्र की सलाह तो हम टालते नहीं. किसी तरह काट पीट कर सिर्फ चेहरे को छोटा छोटा करते करते 50 x 50 पिक्सल किया, तो करेला उस पर से नीम चढ़ा वाली कहावत एकदम से चरितार्थ होती नजर आई. एक तो भगवान की रचना वैसे ही माशा अल्ला और उस पर यह 50 x 50 पिक्सल की कलाकारी. हमने तो हाथ जोड़ दिये कि जीतू भईया, तस्वीर की जगह ऐसे ही ब्लैक स्पॉट मार दो, मगर हमसे फोटो भेजने को न कहो. तब जाकर वो थोड़ा पसीजे और 100 x 100 पिक्सल पर मान गये. फिर भी जो नतीजा आया वो तो आप हमारी हर फीड पर देख ही रहे हैं.

इसी सदमे से उबरने के लिये हम बैठे ’मासूम’ फिल्म का गाना गा रहे थे:
तुझसे नाराज नहीं...जिन्दगी हैरान हूँ मैं....

पूरी राग में आँखों में पानी लिये कि तब तक टिप्पणी के माध्यम से खबर मिली. अपनी ब्लॉग पर तस्वीर बदलिये भाई..यह कौन सी लगा रखी है बेकार सी.

अब उनको क्या बतलाऊँ कि १००/१२५ तस्वीरों में से ढ़ूँढ़ कर सबमे बेस्ट वाली लगाई थी. वो तो यहाँ भी साईज का लफड़ा फंस गया वरना बड़ी खूबसूरत तस्वीर है क्यूट सी. साईज क्या छोटी की कि मानो खूबसूरती ही पिट गई, जैसे ग्रहण लग गया हो. इसी से मेरा तो दुबले होने से मन ही हट गया है. कैसा तो लगता हूँ दुबला छोटा..हम तो यूँ ही ठीक है बकौल गालिब क्यूट से.

यह देखिये पूरी साईज-क्या खूबसूरत और हसीन, कोई भी वाह कर उठे!!!
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और यह देखिये, फोटो शॉप में दुबला/छोटा करने पर हुई हालत- ह्म्म्म!!!
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मगर अच्छा लगा. मित्र ने ध्यान दिया. यही तो स्नेह है. वरना किसी को क्या लेना देना? आप अपनी बंदर जैसी फोटो लगा लें. चाहने वाले मित्र न होंगे तो लगी ही रह जायेगी, एक सलाह न मिलेगी. लोगों ने लगा ही रखी है. मित्रों के आभाव में टंगी है. हमने सलाह मानते हुए तुरन्त फेर बदल किया. नई तस्वीर खोजी. काटा पीटा और लगा दिया.

यह देखिये, करेंट वाली:
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फिर जो एकदम खास मित्र और रहनुमा ने सलाह दी कि इसे जरा ब्राईट कर लिजिये. हमने फोटोशॉप खोली और शुरु हो गये. पता चला कि ऑलरेडी ९९% ब्राईट है. १% की गुंजाईश है फिर फोटो दिखना बंद हो जा रही है. मगर फिर भी उनकी सलाह टाली नहीं जा सकती, इसलिये इस १% की गुंजाईश में भी जो भी बन पायेगा, रविवार तक कर ही दूँगा.

लेकिन यह हमारे दूसरे मित्र की सलाह क्या करुँ? उनका कहना है कलर्ड फोटो लगाईये न..क्या ब्लैक एंड व्हाईट लगाते हैं हर बार.

अब कैसे समझाऊँ तुम्हे हे मेरे सखा!!! यह कलर्ड ही है. बस कुर्ता सफेद पहने हैं बस. बाकि हमारा रंग तो हम कई बार अपने नख शिख वर्णन में आपको बता ही चुके हैं. अब और कैसा कलर.

होली के दिन खिंचवा कर टांग दूँ क्या?

ये होली टाईप की चलेगी क्या कलर्ड में??
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हमारा तो दिमाग ही काम करना बंद कर दिया है. कोई सलाह हो तो बताईयेगा जरुर!!


हम तो बस गाना गायेंगे:

तुझसे नाराज नहीं...जिन्दगी हैरान हूँ मैं....
तेरे मासूम सवालों से... परेशान हूँ मैं...
परेशान हूँ मैं...


नोट: कृप्या कोई भी सलाहकार मित्र बुरा न माने. यह पोस्ट किसका उपहास करने हेतु नहीं वरन बस मौज मजे के लिये है. बस आप सलाह देना बंद मत करियेगा. हम तो मस्ती लेते ही रहते हैं, आप तो जानते हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 31, 2007

जरा हट के: भाग-१

जरा हट के में सोचता हूँ ऐसी कुछ बातें लिखूँ जो हमारी स्थापित सोच, संस्कृति और समाज से जरा परे हटकर हों.

आज देखिये न!! पड़ोस में दो घर छोड़ कर नये लोग आये हैं. अभी सामान का आना लगा ही है. आदतानुसार पहुँच लिये हम हाय हैलो करते. बातचीत के दौरान पता चला भरा पुरा परिवार है.

घर में एक महिला, एक पुरुष और पाँच बच्चे हैं ७ वर्ष से लेकर १८ बरस तक के. इनमें से तीन महिला के बच्चे हैं और २ पुरुष के. तीन महिला के बच्चों में दो उसके पहले पति से हैं और एक दूसरे पति से. अब तीसरे यह साहब हैं जिनकी दूसरी पत्नी से इन्हें दो बच्चे हैं. पहली वाली से भी एक लड़की थी, जो अब अपने बॉय फ्रेंड के साथ रहने लग गई है. बड़ी हो गई है-पूरे २० साल की. यह साहब बहुत खुश हैं कि अगले साल जून में वह इस महिला के साथ शादी करने वाले हैं. रह तो अभी भी वैसे ही एक साथ हैं. मगर तब पति पत्नी हो जायेंगे. फिर इनके भी बच्चे होंगे.






कुछ हैं मेरे और कुछ हैं ये तुम्‍हारे

आएंगे जो कल को वो होंगे हमारे.


है तो खुशी की बात मगर हमारे लिये जरा हट के.

नोट: अगर आपके पास भी ऐसे किस्से हों तो आप मुझे ईमेल करें. मुझे अगर उचित लगा तो आपके साभार से उसे इस श्रृंखला में छापने का प्रयास करुँगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अगस्त 28, 2007

और भईया जी नहीं रहे…

जब हमारे व्यंग्यकार मित्र ने कुछ समय पूर्व अपने जीते जी अपनी मरणोपरांत खोले जाने वाली वसीयत सार्वजनिक कर दी, तो हम भी जरा संभल गये. उनका इस दुनिया से रुखसती का विचार कर ही जाने मन कैसा कैसा हो गया. ठीक वैसा ही जैसा कि कभी कभी बहुत दुखी हो जाने पर होता है. पता नहीं क्यूँ ऐसी फीलिंग आई. जबकि उतनी दुखी होने जैसी बात भी नहीं थी.

इनकी वसीयत भी ऐसी कि क्या कहा जाये. आज तक जितनी वसीयत देखी उसमें सब पीछे छूटे को कुछ न कुछ देकर जाते हैं. इस वसीयत में पहली बार देखा कि देना देवाना तो कुछ नहीं बल्कि फलाने की इतनी उधार लौटा देना. फलाने का इतना बाकी है. उसे ब्याज का यह भाव देना है. तुम मेरे खास हो और मैं तुम्हें चाहता हूँ इसलिये तुम फलाने को लौटाना क्योंकि वो किश्तों में ले लेगा और ब्याज भी कम है.

धन्य है यह वसीयत. संग्रहालय में रखने लायक.

इतने खास मित्र हैं कि यह तो तय ही समझा जाये कि उनके जाने पर राजू भाई का रोल हमें ही अदा करना होगा. बाँस मंगवाने से लेकर उनको राख बनाने तक का सारा जिम्मा इन नाजूक काँधों पर गिरा ही समझिये. फिर आखिर में पेड़ के नीचे खड़े होकर वो भाषाण, जिसमें उनके महान होने से लेकर उनके जाने के अफसोस तक को कवर करना, कोई हँसी खेल तो है नहीं. इसीलिये हमने सोचा कि जब वो वसीयत सार्वजनिक कर गये पूरी उधार आदि के हिसाब के साथ तो हम भी वो भाषाण अभी से तैयार कर लें. फिक्स डेट मालूम रहती तो ट्रक और तैरहवीं के भोज के लिये हलवाई आदि की बुकिंग भी अभी से कर देते. ऐन टाईम पर बिना बुक किये सभी कुछ तो महंगा पड़ता है. कहाँ तक उस समय मोल भाव करेंगे. एक ही काम तो है नहीं.

अब जितना हो सकता है, उतना कर लिया है अभी से. जैसे कि यह भाषाण. कोई सुधार करना हो तो बताईयेगा. अभी तो लगता है कि कुछ समय है:

कृप्या ध्यान दें, नीचे दिये भाषण में () के बीच के वाक्य भाव भंगिमा बनाने और वाक्यों का अर्थ समझाने के लिये हैं, वो भाषाण के दौरान बोले नहीं जायेंगे.


उधारदाता

भाषण:

“ भईया जी नहीं रहे. (विराम-चेहरे पर घोर उदासी)

कल रात तक थे. खाना भी खूब खाया. (उनको खाता देख कोई भी समझदार जान लेता कि ऐसे खा रहे हैं जैसे कि आगे कभी नहीं मिलेगा. मगर कोई समझ ही नहीं पाया. सबने समझा ऐसा वो आदतन कर रहे हैं.) फिर वो सो गये. (सोये भी तो ऐसा कि फिर उठे ही नहीं.) हमेशा के लिये सो गये. चिर निद्रा में लीन.(अब तो जला भी दिया है तो उठने की कोई उम्मीद भी नहीं.)

बहुत दुख हो रहा है. (दुख इस बात का नहीं कि वो नहीं रहे. इन्सान का जीवन है सभी को एक दिन नहीं रहना है, सभी को चले जाना है. दुख तो इस बात का है कि बस थोड़ा जल्दी चले गये.) कुछ (दो-तीन) साल और रुक जाते. (तो हम स्टेब्लिश हो जाते.- दो बूँद आंसू) वे बहुत याद आयेंगे. उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया. आज व्यंग्यकारी की दुनिया में मेरा जो भी नाम है वो उनकी ही देन है. उन्हीं के कारण मेरा लिखा अच्छा माना जाता था. (ऐसा नहीं कि वो मुझे लिखना सिखाते थे. मगर उन्हीं की लेखनी का जादू था कि मैं कुछ भी लिख दूँ उनसे बेहतर ही होता था और लोग मुझे पढ़ लेते थे.)

उनके और मेरे संबंधों पर इस मौके पर एक शेर कहना चाहूँगा:

आज मेरा इस जहाँ में, जो जरा सा नाम है
मान ले इस बात को तू, वो तेरा ही काम है.


उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है, वो कभी नहीं भरा जा सकेगा. (भर तो सकता है मगर कौन भरना चाहेगा. कोई क्यूँ अपनी लेखनी का स्तर गिरा कर खाई को भरेगा. बेहतर है वो रिक्त ही रहे. सभी तो चैन चाहते हैं.)

भईया जी सिर्फ भईया जी नहीं थे वरन एक युग थे. (युग तो क्या कहिये, घोर कलयुग थे. हर बड़े नेता से लेकर धर्म गुरुओं, भगवानों, शासन तंत्र, बाजार, सामाजिक व्यवस्था को उन्होंने लेखनी के माध्यम से अपना निशाना बनाया. लगा कि नहीं यह अलग बात है, मगर बनाया.) आज सब मौन हैं (सुख चैन में हैं, अब हाहाकार की आवश्यक्ता नहीं रही), सब यहाँ उपस्थित हैं (देखने आये हैं कि सच में चले गये गये या वापस न लौट आयें). आज उनके साथ उस युग की समाप्ति हो गई.

भविष्य उनको याद रखेगा. उनका बताया मार्ग सभी नव व्यंग्यकारों का मार्ग दर्शन करेगा. (इस मार्ग से बच कर चलो).

आज उनके परिवार का रुदन देखा नहीं जा रहा. सब रो रहे हैं. (कमाया धमाया तो कुछ नहीं, इतनी उधार छोड़ गया है कि कैसे चुका पायेंगे सोच सोच कर). आने वाली पीढ़ी भी उन्हें याद करेगी.(इतनी उधार चुकाना इस पीढ़ी के बस में नहीं-अगली पीढ़ी तक ही चूक पायेगा मय ब्याज) .

उनकी व्यंग्य-भारती किताब सदैव उनकी याद ताजा रखेगी. (बिकी तो एक कॉपी नहीं, सारी प्रतियाँ घर पर लदी हैं और प्रिन्टर के पैसे जो बकाया सो अलग ब्याज का मीटर चला रहे हैं). भईया जी रोज एक व्यंग्य कम से कम लिखा करते थे और तीस व्यंग्य की मासिक पत्रिका निकाला करते थे, जिसे वो घूम घूम कर, इस तकादे के साथ कि इस बार फ्री दे रहा हूँ अगले माह से पैसे लगेंगे, सबको बाँटा करते थे. (यह बाँटने का क्रम और तकादे का क्रम सतत चला और हर माह उधार में वृद्धि भी सतत होती गई)

अब वो पत्रिका नहीं निकला करेगी. अब से वो इतिहास हो गई.(व्यंग्य तो खैर कभी भी नहीं थी, कम से कम कुछ तो हुई)

भईया जी के अहसानों को याद कर उन्हें नमन करता हूँ और अब हम दो मिनट का मौन रख यहाँ से विदा लेंगे.(मौन तो खैर सब यूँ भी हैं, बस दो मिनट बाद विदा ले लिजिये).”
नोट: यह पोस्ट मौज मजे के लिये है फिर भी कोई सिरियस हो जाये या बुरा मान जाये तो यहाँ टिप्पणी करने की बजाये भईया जी से उपर जाकर शिकायत करे. वो हमसे कहेंगे तो हम आपसे माफी माँग लेंगे आखिर उनके बहुत अहसान हैं हम पर, कैसे उनकी बात टाल पायेंगे. :)
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गुरुवार, अगस्त 23, 2007

दिन का सूरज उगा




तेरी सूरत दिखी आज फिर याद में,
दिन का सूरज उगा यूँ लगा रात में.

फल से लदने लगे पेड़ अंगनाई के
तुम लिए ही रहे बीज बस हाथ में.

उसकी आदत बुरी है वो रोता रहा
जिसने पाई है दौलत भी खैरात में

बेवफा इश्क के जो भी किस्से उठे
जिक्र तेरा ही आया है हर बात में.

तुम मिलोगे उसी मोड़ पर, इसलिये
भीगते ही गये हम तो बरसात में.

प्यार से जो तुम्हारी नजर पड़ गई
आग जैसे लगी मेरे जज्बात में.

घर तुम्हारा यहीं पर कहीं है समीर
देर क्यूँ लग रही फिर मुलाकात में.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 22, 2007

चूं चूं चीं चीं और हम लोग!!

इस कविता के वास्ते मैने अपने पाठकों, जो कि अधिकतर चिट्ठाकार भी हैं, तीन वर्गों में बाँट दिया है.

पहला वर्ग जो कि 'अ' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ एवं नीचे.
दूसरा वर्ग जो कि 'ब' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ से ६५ वर्ष
तीसरा वर्ग जो कि 'स' कहलायेगा कि उम्र सीमा ६५ वर्ष एवं उपर...?? (उपर का अर्थ सिधार चुकों से न लगाये. इसका मतलब है 65+)


यह कविता 'अ' वर्ग के लिये रची गयी है, वो इसे पूर्णतः रोचक, मनोरंजक ओर ज्ञानवर्धक पायेंगे.

यह कविता 'ब' वर्ग के उन लोगों के लिये भी है जो 'अ' वर्ग की मातायें हैं. 'अ' वर्ग के पिता इसे बेतुका, वाहियात और बकवास मानेंगे अन्य नापसंद करने वाले वर्ग के साथ. इसमें इस कविता का दोष नहीं है. इसमें उनका दर्शन दोष है. उन्हें हर चीज में दोष नजर आता है.राजनेता दोषी-जबकि हैं उनके द्वारा चुने गये. अर्थ व्यवस्थता दोषी, राजनीति दोषी..जब पूछो-क्या आप चुनाव लड़ेंगे इसे सुधारने के लिये? तब उनसे सुनिये कि हम इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहते, हमें यह पसंद नहीं. खुद कुछ करना नहीं बाकि सब दोषी. उन्हें स्वभावतः यह कविता पसंद नही आयेगी. जबकि इसका स्टेन्डर्ड साहित्यिक है-बाल साहित्य.

मगर 'ब' और 'स' वर्ग में भी ऐसे लोग हैं जो प्रोफाईल उम्र के हिसाब से इस वर्ग में आ गये हैं मगर हरकत अभी भी वर्ग 'अ' की है, उनकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतजार है. हाल यह है कि तुमने मुझे क्यूँ छेड़ा भले ही मैने तुम्हें छेड़ा हो..मैं तो विवाद करुँगा. जो कह लो वो रुठ ही जायेंगे. हर बात में बच्चों की तरह झगड़ना. उस दिन तुमने मुझको परेशान किया था न...आज मैं करुँगा. सारे दोस्तों को बताऊँगा कि तुम गंदे हो. फसाद करवाऊँगा. फिर हसूंगा. शायद उनको भी यह रचना हरकतों के हिसाब से आंकी गई उम्र के कारण उपयुक्त लगे. कोई कह तो दे कि कौआ तुम्हारे कान ले गया, बस दौड़ पड़े कौए के पीछे. अरे भाई, एक बार कान तो चैक कर लो कि ले भी गया है कि नहीं?

यह उनके लिये भी राम बाण सिद्ध हो सकती है जो अपने दोस्तों के बच्चों के पोयेट्रिक काम्पिटेन्स (बेटा, अंकल को पोयेट्री सुनाओ के जबाब में) में जैक एण्ड जिल सालों से झेलते चले आ रहे हैं या फिर मछली जल की रानी है सुन सुन कर पक गये हैं. कम से कम एक नई कविता स्टॉक में आयेगी. आप उन बच्चों को यह कविता प्रिंट करके गिफ्ट स्वरुप दे सकते हैं. यह जनहित का कार्य कहलायेगा. बाकि के लोग भी जैक एण्ड जिल से बच जायेंगे.

वर्ग 'स' इसे नाती पोतों के लिये पसंद करेगा और हमारा अहसान भरेगा. साथ ही उम्र रिवर्सल ऑफ्टर ६५ के सिद्धांत पर उन्हें खुद भी यह पसंद आयेगी.

पाठ्य पुस्तक निगम वाले अगर चाहें तो मुझसे संपर्क करें, उन्हें मैं दे दूँगा इस कविता के सारे अधिकार बहुते सस्ते में.

अब कारण मत पूछिये कि हमने यह कविता क्यूँ रची? ठीक है नहीं मानते हैं तो आगे कभी पोस्ट में बताते हैं कि क्या कारण बना कि हम बाल कविता रच गये. चिट्ठा साहित्य का इतिहास इसका गवाह रहेगा.. इंतजार करिये न!!!

इन्तजार तो खैर करते रहियेगा... पहले के भी बहुत सारे वादों को पूरा करने का इन्तजार हमारे भारत के प्रधान मंत्री बनने की पूर्ण योग्यता की गवाही देते हुए सतत पेन्डिंग हैं.

अभी कविता सुनिये जो कतई अनुराग के महा पकाऊ अभियान का हिस्सा नहीं है.




एक है चिड़िया-
चूं चूं करती
चूं चूं करती
चीं चीं करती
नाम है उसका बोलू
इस डंडी से उस डंडी पर
उड़ती फिरती
कभी न गिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र

फिर दूजी चिड़िया भी आई
चूं चूं करती
चीं चीं करती
उड़ती फिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
नाम बताया मोलू
झूले में वो झूल रही है
खुशी खुशी से बोल रही है
मेरी यार बनोगी, बोलू?
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
दोनों ने यह गाना गाया
कूद कूद के खाना खाया

तब तक तीजा दोस्त भी आया
नाम जरा था अलग सा पाया
हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई
चिड़ियों ने यह जात न पाई
जिसने पाला उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती
मुस्लिम के घर रह कर आई
एक नहीं पूरे दो साल
ऐसा ही तो नाम भी उसका
सबने कहा उसे खुशाल
वो भी झूला उस झूले पर
इस झूले पर, उस झूले पर
हन हन हन हन
घंटी वो भी खूब बजाता
ट्न टन टन टन
फिर सबके संग खाना खाता
मिल मिल करके गाना गाता
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं

तीनों सबको खुश रखते हैं
ठुमक ठुमक के वो चलते हैं
खुशी में होते सभी निहाल
बोलू, मोलू और खुशाल!!

हम भी मिलकर
गाना गाते
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
उड़ते जाते
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र


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रविवार, अगस्त 19, 2007

क्या आप मल्लन चाचा को जानते हैं??


भटक गई है जो हवा, उनको दिखाने रास्ते
जल रहा बनकर दिया मैं, रोशनी के वास्ते.


एक बड़े शायर का शेर है. नाम है समीर लाल और तख़ल्लुस 'समीर' लिखते हैं. क्या बलिदान की भावना है शायर की. जानता है कि जब भी हवा सही राह पर आ गई, सबसे पहले वही बूझेगा मगर जज़बा है. सलाम करती हूँ शायर को. यह तो हो गई उड़न तश्तरी की बात. अब हमारी सुनो.

आज पढ़ता था भाई फुरसतिया जी को. स्वतंत्रता की ६०वीं वर्षगांठ पर झूठी आजादी के विषय में सेंटिया रहे थे . कहते हैं 'यह मत पूछो कि देश तुम्हारे लिये क्या कर सकता है बल्कि यह देखो तुम देश के लिये क्या कर सकते हो'.

फिर कलाम साहब के वचन सुनाने लगे कि क्या आपके पास देश के लिये पन्द्रह मिनट हैं? पढ़कर एक बंदे का ख्याल आ गया. उनकी तो पूरी पूँजी ही समय है और जी भर कर है. मगर देश के लिये नहीं, बकबकाने के लिये.

चलिये उनसे परिचय करवाता हूँ, नाम है मल्लन चाचा:




मल्लन चाचा ने जीवन भर कुछ नहीं किया. पिता जी तीन मकान बनवा कर मर गये. दो मकान किराये पर चलते थे और एक में मल्लन चाचा खुद रहते थे. किराये की आमदनी से ठीक ठाक गुजर बसर हो जाती है.

मल्लन चाचा को बात करने का बहुत शौक है और हर बात के लिये वो सामने वाले को ही दोषी मानते हैं. यह उनका स्वभाव था कि कभी किसी बात पर खुश नहीं होना और मीन मेख निकाल कर सामने वाले पर मढ़ देना.




मल्लन चाचा से मिलने उनके घर पहुँचा तो वहीं अहाते में लूंगी लपेटे पेड़ के नीचे चबूतरे पर पालथी मारे बैठे थे.





‘पाय लागूँ, चाचा’

‘खुश रह बचुआ. जरा वो सामने आले से बटुआ तो उठा ले और वहीं चूना भी रखा है. थोड़ा तम्बाखू मल दे.’

मैं तम्बाखू मलता उनके पास ही में बैठ जाता हूँ.

‘का बात है, बचुआ. बहुत दिन बाद दिखे.’

‘चाचा, वो तबियत खराब थी न इसी से.’

‘वो तो होना ही थी. न कसरत, न सैर सपाटा. तो का होगा. यहिये न!!’

‘नहीं चाचा, बस जुकाम पकड़ लिये था.’

‘काहे गरम कपड़ा नहीं पहनते.’

‘चाचा, इतनी गरमी में? वो तो जरा ठंडा गरम हो गया था बस.’

‘तब काहे इतनी शराब पीते हो?’

‘कहाँ चाचा, हम शराब नहीं पीते.’

‘तो फिर कौन ठंडा चीज पिया जा रहा है? बीयर..हा हा!! शहरी का नाती नाही तो! खैर, जाये दो. इ बताओ कि क्या समाचार है शहर का.’

‘चाचा, देश बहुत तरक्की कर रहा है. ढेरन विकास हो रहा है. GDP बहुते बढ़ गया है और मुद्रा स्फिती की दर भी एकदम्मे नियंत्रण में है. विदेशी मुद्रा का भंडार भी लबालब है.’

‘बचुआ, इ सब चोचलेबाजी हमसे न बतियाया करो. हम सब समझते हैं. ई GDP को तो तुम मानो घी, रोटी पर मलने के लिये और मुद्रा स्फिती नियंत्रण को जानो दाल का तड़का. अब रह गये विदेशी मुद्रा भंडार तो वो हैं सलाद और ये तुम्हारे मॉल और कॉल सेन्टरवे सब हइन केक और पेस्ट्री. जब रोटिये, दाल का जुगाड़ नहीं तो इनका का करीं. यह सब तो उनकी सुभीता के लिये हैं जिनके पास रोटी, दाल पहलवें से है. हमार तुहार के लिये नाही. समझे बचुआ.’

‘चाचा, हम तो जो सुनें है वो बताये दिये. बाकि हम तो कुछ किये नहीं हैं. हम पर काहे बिगड़ रहे हैं.’

‘तुम तो यूँ भी किसी कारज के हो नहीं, हें हें हे…’

‘अच्छा, अब चलता हूँ,चाचा. पाय लागी.’

‘ठीक है बचुआ. फिर आना.’

मैं उठता हूँ. चबूतरे के नीचे की जमीन ऊबड़ खाबड़ है पाँव डगमगा जाता है.

‘का बचुआ. जरा संभल कर. कुछ वजन कम करो. बेडौल हुये जा रहे हो. अपना ही वजन तक तो संभल नहीं रहा.’

मैं भी ‘जी’ कह कर चल पड़ता हूँ.

सोचता हूँ कि अगर वो चबूतरे के नीचे दो तसला भी बालू पुरवा दें तो जमीन समतल हो जाये. मगर उन्हें दोष तो दूसरे में ही दिखता है कि तुम वजन कम करो.

अरे चाचा, खुद भी तो कुछ करो कि बस दूसरे की गल्ती देखते रहोगे और हर बात के लिये सबको कोसते रहोगे. फलाना रोटी वालों के लिये है. फलाना हमारे लिये कुछ नहीं करता.

आज हर गली, मोहल्ले में न जाने कितने ही मल्लन चाचा हैं. क्या आप मिले हैं मल्लन चाचा से?

ऐसे में हम विकास की बात करें भी तो कैसे? Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अगस्त 16, 2007

हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले

आज तो कुछ लिखने का मन ही नहीं है. रात हो गई है.अँधेरा घिर आया है. मैं घर के पिछवाड़े में निकल कर लॉन में बैठ जाता हूँ. शीतल मनोहारी हवा मद्धम मद्धम बह रही है. बिल्कुल सन्नाटा. अड़ोस पड़ोस सब सो गया है, ऐसा जान पड़ता है.



मैं आकाश में देखते हुये वहीं लॉन पर लेट जाता हूँ. विस्तृत आकाश. बिल्कुल साफ मौसम. एक कोने में खड़ा चाँद. ऐसा लगता मुझे बेमकसद ताकते देखकर मुस्करा रहा है. पूरा आसमान टिमटिमाते तारों से भरा अदभूत नजर आ रहा है. मानो किसी बड़े से ताल में दोने में तैरते असंख्य दीपक. मेरे मन में हरकी पौड़ी, हरिद्वार की याद सहसा जीवंत हो जाती है. गंगा में तैरते असंख्य प्रज्वलित दीप. यह याद भी क्या चीज है, शिद्दत से याद करो तो सब नजारा जैसे एकदम जीवित हो जाता है. मुझे हवा में घी और अगरबत्ती की मिली जुली खूशबू आने लगती है और कान में घंटों और घड़ियालों के संग बजती गंगा आरती साफ सुनाई देने लगती है:

ओम जय गंगा माता......

मैं डूब जाता हूँ. एकाएक एक कार की आवाज से तंद्रा भंग होती है. शायद पड़ोसी देर से लौटा है आज. मैं भी हरिद्वार से वापस कनाड़ा की लॉन में लौट आता हूँ.



फिर एक टक आकाश में दृष्टि विचरण. बचपन में जब छत पर सोया करते थे तब दादी उत्तर में ध्रुव तारा और फिर सप्तऋषि मंडल दिखाया करती थी और उनकी कहानी न जाने कितनी बार सुनाती थीं. मैं आज फिर उसी ध्रुव तारे को खोजने लगता हूँ और फिर वो सप्तऋषि मंडल दिखाई देता है. दादी की कहानी याद आती है कि कहाँ चंद्रशिला शिखर के नीचे, तुंगनाथ स्थित है. निकटवर्ती स्थलों से सर्वोच्च स्थल पर अवस्थित होने के कारण इसे तुंगनाथ कहा जाता है. केदारखंड पुराण में इसे तुंगोच्च शिखर कहा गया है. यहाँ पूर्वकाल में तारागणों यानि सप्तऋषि ने उच्च पद की प्राप्ति हेतु घोर तप किया था. सप्तऋषियों के तप से प्रफुल्लित हो भगवान शिव ने उन्हें आकाश गंगा में स्थान प्रदान करवाया था. बचपन फिर जीवित हो उठता है.

वापस लौटता हूँ आज में तो इस अथाह आकाश गंगा को देख यूँ ही टिटहरी चिड़िया की याद आ जाती है. सुनते हैं वो आकाश की ओर पैर उठा कर सोती है. सोचती है कि अगर आकाश गिरा तो पैर पर उठा लेगी और खुद बच जायेगी. अनायास ही अनजाने में मेरे पैर आकाश की तरफ उठ जाते हैं. तब ख्याल आता है टिटहरी की इस हरकत को लोग उसकी मुर्खता से जोड़ते हैं और मेरे चेहरे पर अपनी मुर्खतापूर्ण हरकत के लिये मुस्कान फैल जाती है और मैं पैर सीधे कर अपने आपको विद्वान अहसासने लगता हूँ. स्वयं को विद्वान अहसासने का भी एक विचित्र आनन्द है, जो इस पल मैं महसूस कर रहा हूँ. इस आनन्द को शब्दों में बाँधना शायद संभव नहीं.

तब तक अचानक ही एक तारा टूट कर गिरता है बड़ी तेजी से. दादी कहा करती थी कि जब तारा टूटे तो उसके बुझने के पहले जो भी वर मांग लो, वो पूरा हो जाता है. जाने क्या मान्यता रही होगी या शायद अंधविश्वास रहा होगा मगर मेरी दादी ने कहा था तो आज भी मेरा मन इस पर विश्वास करने का होता है. कारण मैं नहीं जानता. कभी कोशिश भी नहीं की जानने की.

मैं एकाएक सोचने लगता हूँ क्या मांगू?
हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले,.......

मैं सोचता ही रह जाता हूँ और तारा बूझ जाता है.

सोचता हूँ कि हमारी कितनी सारी चाहतें हैं कि अक्सर ईश्वर कुछ पूरा करने का मौका भी प्रदत्त करता है मगर हम ही नहीं तय कर पाते कि कौन सी चाहत पूरी कर लें. हर वक्त बस एक उहापोह. शायद सभी के साथ ऐसा होता हो और फिर कोसते हैं अपनी किस्मत को कि हमारी तो कोई इच्छा ही नहीं पूरी हो पाती.
क्या हम कभी भी तुरंत तय कर पायेंगे, तारे के टूटने और बूझने के अंतराल में कि खुश रहने के लिये हम आखिर चाहते क्या हैं या यूँ ही हर आये मौके गंवाते रहेंगे?

असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन.

मैं अनिर्णय की अवस्था में लॉन से उठकर घर के भीतर आ जाता हूँ.

टीप : 'गुरुदेव, इस 'हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले ' का हल क्या है? यह प्रश्न एक भक्त पूछ रहा है.
हल बताने के लिये स्वामी समीरानन्द जल्द ही प्रवचन देंगे, तब तक आते रहिये और पढ़ते रहिये.
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सोमवार, अगस्त 13, 2007

गाँव पुकारता है...



ऐसा नहीं है कि सिर्फ गाँव में रहने वालों को शहर अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.

मुझे लगता है कि शहर में रहने वालों को गाँव पुकाराता है. थोड़ा अजीब सा लगता है यह विचार. मगर यह सत्य है.

हर बड़े शहर में ढाबेनुमा ग्रमीण परिवेश का अहसास कराते रेस्टॉरेन्ट खुल गये हैं और सारे शहरी गॉव का अहसास पाने वहाँ टूटे रहते हैं. वहाँ नकली लालटेन की रोशनी में, खटिया पर बैठकर पत्तल में खाना खाना स्टेटस सिंबॉल सा बन गया है. लोक नृत्य, मदारी का खेल आदि भी साथ साथ हो, क्या कहने.

यह सिर्फ भारत में नहीं. दुनिया में हर जगह है. कनाडा में भी यह रईसी की निशानी है कि आपके पास एक कॉटेज (कुटिया) शहर से कुछ दूर आबादी के बाहर तालाब के किनारे हो. जहाँ आप वीक एंड में जाकर समय बितायें. जिनके पास खुद के है वो रईस और जिनके पास खुद के नहीं, वो रईसी जताने या यूँ कहें गाँव अहसासने किराये पर लेकर हो आते हैं. मैं दूसरी श्रेणी वाला हूँ. कोशिश होती है कुछ मित्र साथ में हो. इसके दो-तीन फायदे हैं. एक तो खर्चा बँट जाता है. साथ साथ ग्रुप का मजा तो रहता ही है और सब एक दूसरे को जता पाते हैं कि उन्हें गाँव के माहौल से कितना लगाव है. अच्छा लगता है.

सर्दियों में तो बर्फ के कारण उतना संभव नहीं हो पाता मगर गर्मी में जरुर दो एक बार हो आते हैं.

ऐसी ही एक यात्रा पर मै मित्रों के साथ गया.

मुझे यूँ भी नदी, पहाड़, झरने, नौका विहार, बत्तख, पेड़ों के बीच शान्त वन में विचरण करना, सूर्योदय, सूर्यास्त, चाँद, तारे, फूल, कलियाँ बाई डिफॉल्ट पसंद आते है कवि होने के कारण. और वही माहौल वहाँ मिला. नौका विहार करके सब थक गये. शाम होने को थी. सभी ने तय किया कि कॉटेज में कुछ देर लेटा जाये फिर शाम को कैम्प फायर और पीने पिलाने नाचने नचाने और बार बेक्यू का सिलसिला चले. सब आराम करने निकल गये और मैं जंगल के बीच से बनी पगडंडी पर अकेला बढ़ चला.

प्रकृति की छटा देखते बनती थी. हर कदम फिजा की बदलती महक, तरह तरह के फूल, पत्ते, पेड़. बहती हवा. तरह तरह की चिड़ियां, छोटे छोटे जानवर. मैं न जाने किन विचारों में खोया बस चलता चला गया. न जाने कितनी दूर आ गया कॉटेज से. थकान घेरने लगी और प्रकृति के साथ चलने की उत्सुकता उसे पीछे ढकेलती रही. एकाएक जंगल के बीच बने एक मकान पर नजर पड़ी. बाहर बोर्ड लगा था जिसका माईने था, यहाँ घोड़े किराये पर मिलते हैं. बोर्ड देखते ही थकान ने आ घेरा. कदम मानो उठने का नाम ही न ले रहे हों. यही होता है सुविधा की उपलब्धता के साथ.

मैं उस घर के अहाते में प्रवेश कर गया. एक आदमी बगीचे को सजाते मिलता है जिसका नाम रेन्डी है. वो मालिक है इस मकान का या यूँ कहें सेठ है. देखता हूँ उसके पास एक घोड़ा है. उसकी गर्भवती पत्नी घोड़ी और एक छोटा बेटा घोड़ा भी है. छोटा बेटा अभी वजन ढोने लायक नहीं हुआ है, अतः अम्मा के इर्द गिर्द दिन भर धमा चौकड़ी मचाता रहता है. ले देकर काम करने अभी सिर्फ यही घोड़ा है.

वापस कॉटेज तक जाने की बात तय होती हैं. घोड़े पर जीन वगैरह बाँधी जाती है.

आह्ह!!

यह आह मेरी नहीं है. यह उस घोड़े की कराह है जिस पर चढ़ कर मैं बैठ गया हूँ. घोड़े ने मूँह खोल कर कुछ नहीं कहा, मगर मेरे संवेदनशील भावुक दिल ने सुन लिया. मेरे भीतर दया उमड़ती है किन्तु आलस्य और थकान के घने बादल मेरे करुणामयी हृदय पर आच्छादित होकर उसे ढांक देते हैं. घोड़ा भी अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाये, बिना किसी खिलाफत के भाव के सर झुकाये, चल पड़ता है. मुझे अहसास हुआ उसकी वेदना उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों के समक्ष मूँह नहीं उठा पाई.

मुझे लगता है कि वो सोचता होगा, अगर वो भी काम करने से मना कर दे तो सेठ उसे निकाल देगा. वो तो उसके किसी काम का रहेगा नहीं. फिर गर्भवती बीबी और छोटे बच्चे को लेकर कहाँ जायेगा? भूखो मरने की नौबत आ जायेगी. हर तरफ बेरोजगारी फैली है. नई नौकरी और आसरा तो मिलने से रहा. फिर सारा जीवन तो जंगल के कच्चे रास्तों पर चला है. ग्रमीण परिवेश में रहा. शहर तो उसे नहीं सुहायेगा और न ही उसे वहाँ रहने और चलने का सुहूर है. जवानी में चला जाता तो ठीक था, अब तो नई बातें सीखना भी मुश्किल है. सुना तो है शहर में नौकरियाँ हैं. मगर उसे उनसे क्या? वो तो किसी को जानता भी नहीं वहाँ. कहाँ जायेगा? यहाँ थोड़ा ज्यादा मेहनत सही, थोड़ी कम सुविधायें ही सही, मगर है तो अपनी जगह. खुली खुली ताजा आबो हवा. प्रदुषण से दूर. ताजगी का अहसास. गाँव के सारे घोड़े एक दूसरे को जानते हैं. एक दूसरे को देखकर सुख दुख कह लेते हैं. सुना है शहर में ऐसा प्रचलन नहीं है. अपने अपने में रहो. वो तो नहीं रह सकता ऐसे घुटन भरे माहौल में.

यही सोचते वो चला जा रहा होगा और मैं उसकी पीठ पर बैठा अपने गंतव्य के आने का इन्तजार कर रहा हूँ. सामने उसकी लगाम थामें खुशी खुशी रेन्डी कोई गीत गाते चल रहा है. लम्बी दूरी है.आज ठीक ठाक कमाई हुई है, लौट कर बीयर पियेगा.

क्या पता घोड़ा वही सोच रहा था कि नहीं जैसा मैने सोचा कि वो सोच रहा होगा या यह मेरा मानवाधारित अनुभव सोच रहा था. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 10, 2007

ये देश है वीर जवानों का...




स्वतंत्रता संग्राम की १५० वीं और स्वतंत्रता प्राप्ति की ६० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में हर तरह उत्सव भरा माहौल है. सरकारी विभागों में भी खुशी मनाने की तैयारी है. बच्चे परेड, नृत्य और गीत की तैयारी कर रहे हैं. स्कूलों में एक बालूशाही, एक समोसा, एक लड्डू और एक केला के पैकेट तैयार होने की तैयारी में हैं, जो बच्चों को स्कूल की परेड में आने के लिये ललचायेंगे.

नेता सारे भाषणबाजी के लिये तैयारी में जुटे हैं. लेखक धड़ाधड़ लेख लिखे चले जा रहे हैं और कवि कवितायें. जगह जगह कवि सम्मेलनों का आयोजन भी किया जा रहा है. सफेद खद्दर के कुर्ते पायजामे की बहार आई है. गाँधी जी की तस्वीर से झाड़ पोंछ कर धूल हटा दी गई है और तिरंगा कलफमय फहरने को तैयार है. विभिन्न प्रदेशों के विकास को दर्शाती प्रदर्शनी के ट्रक परेड शुरु होने की बाट जोह रहे हैं. फूल पौधों से अलग हो नेता जी के गले और गाँधी जी की तस्वीर पर चढ़ने को बेताब हैं.

पुलिस महकमा मुस्तैदी से अपने बिल्ले और बक्कल ब्रासो से चमका रहा है एवं एन सी सी के बालक अपनी यूनिफार्म पर आरारोट चढ़ाये बैठे हैं. स्टेडियम और अन्य झंडा स्थलों के करीब सफाई लगभग पूरी हो चुकी है. चुना और गेरु पुतने को तैयार बैठे हैं. गमले लगाकर हरियाली का माहौल बनाया जा रहा है.

अति जागरुक एवं घाग नेताओं के शहीदों के नाम पर बहाये जाने वाले दो बूँद आँसू आँख की पाईप लाईन की यात्रा लगभग पूर्ण कर चुके हैं और वो काला चश्मा उतार कर आँसू पोंछने के लिये उसे पहनने की तैयारी में हैं. इस हेतु एक जोड़ी रुमाल जेब में रख लिया गया है. पुरुस्कार और मैडल मय प्रशस्ति पत्र अपने जुगाडू साथियों के हाथ में जाने को तड़पड़ा रहे हैं. सब जुगाड़ सेट हो चुका है.

शिल्पा शेट्टी का भी देश पर अतुल्य अहसान राजीव गाँधी पुरुस्कार देकर उतारा जा रहा है. इस तरह से हमने अपने सठियाने का प्रमाण पत्र भी तैयार कर लिया है.

'ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का मस्तानों का'


और

'जो शहीद हुये हैं उनकी,
जरा करो कुर्बानी'


के सी डी हिट सेल रिकार्ड कर रहे हैं. दुकानदार खुश हैं. बच्चे पिकनिकनुमा उत्सव मनाने के लिये तैयार हैं. बस उत्सव ही उत्सव. बहुत खुशनुमा महौल हो उठा है.

ऐसे में हमें भी न्यौता आता है कि इन ६० वर्षों की उपलब्धियों पर एक बड़ी सी कविता रच लाईये और आकर कवि सम्मेलन में सुनाईये. अब हमारी हालत देखिये:


आजादी की वर्षगाँठ पर
६० वर्षों की उपलब्धियाँ गिनाते
कविता लिख कर बुलाया है
अथक प्रयासों के बाद भी
यह कवि सिर्फ
एक क्षणिका लिख पाया है.

वो पूछते हैं-
बस इतनी सी?
कवि हृदय कब चुप रहा
उसने बस इतना सा कहा-
अजी, महा काव्य रच कर लाते
अगर आप
भ्रष्टाचारी, बेरोजगारी,
घोटालों और गरीबी के
विस्तार से ब्यौरे मंगवाते.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 08, 2007

और फिर रात गुजर गई

old

'जागे हो अभी तक, संजू के बाबू' लेटे लेटे कांति पूछ रही है.

'हूँ, नींद नहीं आ रही. तुम भी तो जागी हो?' अंधेरे में ही बिस्तर पर करवट बदलते शिवदत्त जी बोले.

'हाँ, नींद नहीं आ रही. पता नहीं क्यूँ. दिन में भी नहीं सोई थी, तब पर भी.'

'कोशिश करो, आ जायेगी नींद. वरना सुबह उठने में देरी होयेगी.'

'अब करना भी क्या है जल्दी उठकर. कहीं जाना आना भी तो नहीं रहता.'

''फिर भी, देर तक सोते रहने से तबियत खराब होती है.'

फिर कुछ देर चुप्पी. सन्नाटा अपने पाँव पसारे है.

'क्यों जी, सो गये क्या?'

'नहीं'

'अभी अमरीका में क्या बजा होगा?'

'अभी घड़ी कितना बजा रही है?'

'यहाँ तो १ बजा है रात का.'

'हाँ, तो वहाँ दोपहर का १ बजा होगा.समय १२ घंटे पीछे कर लिया करो.'

'अच्छा, संजू दफ्तर में होगा अभी तो'

'हाँ, बहु साक्षी भी दफ्तर गई होगी.'

'ह्म्म!! पिछली बार फोन पर कह रहा था कि क्रिस को किसी आया के पास छोड़ कर जाते हैं.'

'हाँ, बहुत दिन हुये, संजू का फोन नहीं आया.'

'शायद व्यस्त होगा. अमरीका में सब लोग बहुत व्यस्त रहते हैं, ऐसा सुना है.'

'देखिये न, चार साल बीत गये संजू को देखे. पिछली बार भी आया था तो भी सिर्फ हफ्ते भर के लिये. हड़बड़ी में शादी की. न कोई नाते रिश्तेदार आ पाये, न दोस्त अहबाब और साक्षी को लेकर चला गया था.'

'कहते हैं अमरीका में ज्यादा छुट्टी नहीं मिलती. फिर आने जाने में भी कितना समय लगता है और कितने पैसे.'

'हाँ, सो तो है. तीन बरस पहले किसी तरह मौका निकाल कर बहु को यूरोप घूमा लाया था. फिर दो बरस पहले तो क्रिस ही हो गये.उसी में व्यस्त हो गये होंगे दोनों. पता नहीं कैसा दिखता होगा. उसे तो हिन्दी भी नहीं आती. कैसे बात कर पायेगा हमसे जब आयेगा तो.'

'संजू तो होगा ही न साथ. वो ही बता देगा कि क्रिस क्या बोल रहा है.'

दोनों अंधेरे में मुस्करा देते हैं.

'पिछली बार कब आया था उसका फोन?'

'दो महिने पहले आया था.कह रहा था कि १०-१५ दिन में फिर करेगा. और फिर कहने लगा कि अपना ख्याल रखियेगा, बहुत चिन्ता होती है. कहीं जा रहा था तो कार में से फोन कर रहा था. बहुत जल्दी में था.'

'हाँ, बेचारा अपने भरसक तो ख्याल रखता है.'

'आज फोन उठा कर देखा था, चालू तो है.'

'हाँ, शायद लगाने का समय न मिल पा रहा हो.'

'कल जरा शर्मा जी के यहाँ से फोन करवा कर देखियेगा कि घंटी तो ठीक है कि नहीं.'

'ठीक है, कल शर्मा जी साथ ही जाऊँगा पेंशन लेने. तभी कहूँगा उनसे कि फोन करके टेस्ट करवा दें.'

'कह रहा था फोन पर पिछली बार कि कोई बड़ा काम किया है कम्पनी में. तब सालाना जलसे में सबसे अच्छे कर्मचारी का पुरुस्कार मिला है. जलसे में उनके कम्पनी के सबसे बड़े साहब अपने हाथ से इनाम दिये हैं और एक हफ्ते कहीं समुन्द्र के किनारे होटल में पूरे परिवार के साथ घूमने भी भेज रहे हैं.'

'हाँ, वहाँ सब कहे होंगे कि शिव दत्त जी का बेटा बड़ा नाम किये है. तुम्हारा नाम भी हुआ होगा अमरीका में.'

'हूँ, अब बेटवा ही नाम करेगा न! हम तो हो गये बुढ़ पुरनिया. जरा चार कदम चले शाम को, तो अब तक घुटना पिरा रहा है. हें हें.' वो अंधेरे में ही हँस देते हैं.

कांति भी हँसती है फिर कहती है,' कल कड़वा तेल गरम करके घुटना में लगा दूँगी, आराम लग जायेगा. और आप जरा चना और एकाध गुड़ की भेली रोज खा लिया करिये. हड्डी को ताकत मिलती है.'

'ठीक है' फिर कुछ देर चुप्पी.

'इस साल भी तो नहीं आ पायेगा. दफ्तर की इनाम वाली छुट्टी के वहीं से क्रिस को लेकर पहली बार दो हफ्ते को कहीं जाने वाले हैं.'

'हाँ, शायद आस्ट्रेलिया बता रहा था क्रिस की मौसी के घर. कह रहे थे कि आधे रस्ते तो पहुंच ही जायेंगे तो साथ ही वो भी निपटा देंगे. शायद थोड़ी किफायत हो जायेगी.'

'देखो, शायद अगले बरस भारत आये.'

'तब उसके आने के पहले ही घर की सफेदी करवा लेंगे, इस साल भी रहने ही देते हैं.'

'हूँ'

'काफी समय हो गया. अब कोशिश करो शायद नींद आ जाये.'

'हाँ, तुम भी सो जाओ.'

सुबह का सूरज निकलने की तैयारी कर रहा है. आज एक रात फिर गुजर गई.

न जाने कितने घरों में यही कहानी कल रात अलग अलग नामों से दोहराई गई होगी और न जाने कब तक दोहराई जाती रहेगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links