बस सीडी में यह नज़्म लगाई और याद करने लगा:
"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी."
गर्मी की छुट्टियाँ. तपती दुपहरी. घर की खिड़कीयों पर बंधी वो खस की टट्टियाँ. उस पर बार बार सिंचाई और उसके सामने रख कर चलता सिन्नी का काला वाला टेबल फैन. कितनी ठंडा हो जाता था कमरा. मगर बच्चों को कहाँ चैन. इधर माँ दुपहरी का काम निपटा कर कमर सीधी करने जहाँ आँख झपकाये, उधर सारे बच्चे घर के बाहर धूप में लगे खेलने. तब टीवी वगैरह तो होता नहीं था कि कार्टून देखने बैठ जाते.
याद आते हैं, कितनी तरह के खेल खेला करते थे.
कंचे, तरह तरह के रंग बिरंगे. आधे खरीदे और उससे ज्यादा जीते हुए. रोज रात में गिन कर रख कर सोते और सुबह उठकर फिर गिनते. साथ में होते कई सारे सुन्दर सुन्दर बंटे, जिनसे निशाना लगाते थे.
भौरां याने लट्टू-इसमें तो हमारी मास्टरी थी. बढ़ियां नुकीली आर वाला लट्टू बिना जमीन में छुलायें सीधे हाथ पर नचाते हुए गुद्दा खेला करते थे. न जाने कितनों की कितने लट्टू गुद्दा मार मार कर फोड़ने का विश्व रिकार्ड हमारे नाम जाता अगर इस खेल को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली होती.
सतौलिया, सात पत्थर के चिप्स एक के उपर एक जमा कर उसे गेंद से फोड़ना और फिर भाग कर उन्हें जमाना जब तक दूसरी टीम के लोग आपको गेंद से मारने की कोशिश करते रह्ते थे. जैसे ही जम जाये-जोर से चिल्लाना-सतौलिया. हम्म!!
मार गेंद-इसमें एक दूसरे को गेंद से मारा जाता था. रबर की लाल गेंद. कई बार तो ऐसी चिपकती थी कि निशान ही बन जाये.
मेरे काफी बाद उम्र तक प्रिय रहा-टीप रेस याने छुप्पन छुपाई. क्यूँ प्रिय रहा यह नहीं बतायेंगे. पूरे मोहल्ले के लड़के लड़कियाँ खेला करते थे एक साथ.
गुल्ली डंडा-इस खेल में तो सारे दोस्त डरा करते थे हमसे. इसलिये नहीं कि मैं बहुत अच्छा खेलता था. मगर जितना भी सामने वाले को दाम देना पड़ जाये, जिसमें जो दाम देता है वो आपको कंधे पर लाद कर चलता है उतनी दूर जितनी दूर आपने गुल्ली मारी है, उसकी तो दम ही बैठ जाती थी. हमारा यह विस्तार आज का भर थोड़े ही है. हम हमारी उम्र के हिसाब से हमेशा ही मोटे थे और दुबले होने का आजीवन प्रयास इस बात का साक्षी है. जब से होश संभाला, हमारे मोटापे और दुबले होने के प्रयास, दोनों ने बराबरी से आजतक हमारा साथ निभाया है. जैसे कि अपने नेताओं का साथ मक्कारी और भ्रष्टाचार निभाते हैं.
और भी ढ़ेरों खेल होते थे जैसे गुलेल, खुद बनाते थे अमरुद के पेड़ (जबलपुर में हम उसे बीही का झाड़ कहते थे) से केटी काट कर और ट्रक की पुरानी गास्केट से ट्यूब निकालकर. निशाना ऐसा कि जिस काँच पर नाराज बस हो जायें.
फिर विष अमृत, नदी पहाड़ बाकि तो नाम भी याददाश्त से जाते रहे. याद है क्या वो जिसमे लंगड़ी कुद कर सात खाने कुदने होते थे चिप फेकने के बाद उसे लंगड़ी मे पार कराना होता था, मुझे तो नाम ही नहीं याद आ रहा. शायद एक्कड़ दुक्कड़ या अड़ई गुड़ई या जाने क्या..
क्रिक्रेट, फुटबाल, हॉकी, पतंगबाजी आदि तो आजकल भी बच्चे खेलते दिख जाते हैं मगर वो मेरे खेल कहाँ गये??
मेरे बीते बचपन के साथ ही वो भी दफन हो जायेंगे, अगर यह तभी पता चल जाता तो थोड़ा और खेल लेता. कुछ और गुद्दे मार लेता और कंचे तो आराम से और जीत ही ले आता.
अब पछताने से क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत. मगर इन कविताओं को तो अब भी सहेज सकते हैं. इसीलिये यहाँ पर दर्ज कर देता हूँ कि भले ही रोज नहीं, पर कभी कभी तो मेरे जमाने का कोई इससे अपना बचपन फिर से जी कर देख सके. आज के बच्चों का बचपन तो शायद इन कविताओं से विहीन होगा मगर हमारे समय के सभी हिन्दी भाषी बच्चों ने कभी न कभी इन कविताओं का पढ़कर या सुनकर लुत्फ जरुर उठाया होगा.
पोशम्पा भाई पोशम्पा,
सौ रुपये की घडी चुराई।
अब तो जेल मे जाना पडेगा,
जेल की रोटी खानी पडेगी,
जेल का पानी पीना पडेगा।
थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।
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आलू-कचालू बेटा कहाँ गये थे,
बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।
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मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है।
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी।
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आज सोमवार है,
चूहे को बुखार है।
चूहा गया डाक्टर के पास,
डाक्टर ने लगायी सुई,
चूहा बोला उईईईईई।
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झूठ बोलना पाप है,
नदी किनारे सांप है।
काली माई आयेगी,
तुमको उठा ले जायेगी।
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चन्दा मामा दूर के,
पूए पकाये भूर के।
आप खाएं थाली मे,
मुन्ने को दे प्याली में।
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तितली उड़ी,
बस मे चढी।
सीट ना मिली,
तो रोने लगी।
ड्राईवर बोला, आजा मेरे पास,
तितली बोली " हट बदमाश "।
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कविता साभार: आर्कुट-विचरण
चित्र साभार: डिस्कवर इंडिया-स्ट्रीट गेम्स








