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सोमवार, सितंबर 10, 2007

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

आज ऐसे ही ऑर्कुट पर टहल रहा था. एकाएक कुछ स्क्रेप्स पर नजर चली गई. कुछ कवितायें टंगी थीं. बचपन की याद दिला गई.

बस सीडी में यह नज़्म लगाई और याद करने लगा:

"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी."


गर्मी की छुट्टियाँ. तपती दुपहरी. घर की खिड़कीयों पर बंधी वो खस की टट्टियाँ. उस पर बार बार सिंचाई और उसके सामने रख कर चलता सिन्नी का काला वाला टेबल फैन. कितनी ठंडा हो जाता था कमरा. मगर बच्चों को कहाँ चैन. इधर माँ दुपहरी का काम निपटा कर कमर सीधी करने जहाँ आँख झपकाये, उधर सारे बच्चे घर के बाहर धूप में लगे खेलने. तब टीवी वगैरह तो होता नहीं था कि कार्टून देखने बैठ जाते.

याद आते हैं, कितनी तरह के खेल खेला करते थे.

कंचे, तरह तरह के रंग बिरंगे. आधे खरीदे और उससे ज्यादा जीते हुए. रोज रात में गिन कर रख कर सोते और सुबह उठकर फिर गिनते. साथ में होते कई सारे सुन्दर सुन्दर बंटे, जिनसे निशाना लगाते थे.

भौरां याने लट्टू-इसमें तो हमारी मास्टरी थी. बढ़ियां नुकीली आर वाला लट्टू बिना जमीन में छुलायें सीधे हाथ पर नचाते हुए गुद्दा खेला करते थे. न जाने कितनों की कितने लट्टू गुद्दा मार मार कर फोड़ने का विश्व रिकार्ड हमारे नाम जाता अगर इस खेल को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली होती.

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सतौलिया, सात पत्थर के चिप्स एक के उपर एक जमा कर उसे गेंद से फोड़ना और फिर भाग कर उन्हें जमाना जब तक दूसरी टीम के लोग आपको गेंद से मारने की कोशिश करते रह्ते थे. जैसे ही जम जाये-जोर से चिल्लाना-सतौलिया. हम्म!!

मार गेंद-इसमें एक दूसरे को गेंद से मारा जाता था. रबर की लाल गेंद. कई बार तो ऐसी चिपकती थी कि निशान ही बन जाये.

मेरे काफी बाद उम्र तक प्रिय रहा-टीप रेस याने छुप्पन छुपाई. क्यूँ प्रिय रहा यह नहीं बतायेंगे. पूरे मोहल्ले के लड़के लड़कियाँ खेला करते थे एक साथ.

गुल्ली डंडा-इस खेल में तो सारे दोस्त डरा करते थे हमसे. इसलिये नहीं कि मैं बहुत अच्छा खेलता था. मगर जितना भी सामने वाले को दाम देना पड़ जाये, जिसमें जो दाम देता है वो आपको कंधे पर लाद कर चलता है उतनी दूर जितनी दूर आपने गुल्ली मारी है, उसकी तो दम ही बैठ जाती थी. हमारा यह विस्तार आज का भर थोड़े ही है. हम हमारी उम्र के हिसाब से हमेशा ही मोटे थे और दुबले होने का आजीवन प्रयास इस बात का साक्षी है. जब से होश संभाला, हमारे मोटापे और दुबले होने के प्रयास, दोनों ने बराबरी से आजतक हमारा साथ निभाया है. जैसे कि अपने नेताओं का साथ मक्कारी और भ्रष्टाचार निभाते हैं.

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और भी ढ़ेरों खेल होते थे जैसे गुलेल, खुद बनाते थे अमरुद के पेड़ (जबलपुर में हम उसे बीही का झाड़ कहते थे) से केटी काट कर और ट्रक की पुरानी गास्केट से ट्यूब निकालकर. निशाना ऐसा कि जिस काँच पर नाराज बस हो जायें.

फिर विष अमृत, नदी पहाड़ बाकि तो नाम भी याददाश्त से जाते रहे. याद है क्या वो जिसमे लंगड़ी कुद कर सात खाने कुदने होते थे चिप फेकने के बाद उसे लंगड़ी मे पार कराना होता था, मुझे तो नाम ही नहीं याद आ रहा. शायद एक्कड़ दुक्कड़ या अड़ई गुड़ई या जाने क्या..

क्रिक्रेट, फुटबाल, हॉकी, पतंगबाजी आदि तो आजकल भी बच्चे खेलते दिख जाते हैं मगर वो मेरे खेल कहाँ गये??

मेरे बीते बचपन के साथ ही वो भी दफन हो जायेंगे, अगर यह तभी पता चल जाता तो थोड़ा और खेल लेता. कुछ और गुद्दे मार लेता और कंचे तो आराम से और जीत ही ले आता.

अब पछताने से क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत. मगर इन कविताओं को तो अब भी सहेज सकते हैं. इसीलिये यहाँ पर दर्ज कर देता हूँ कि भले ही रोज नहीं, पर कभी कभी तो मेरे जमाने का कोई इससे अपना बचपन फिर से जी कर देख सके. आज के बच्चों का बचपन तो शायद इन कविताओं से विहीन होगा मगर हमारे समय के सभी हिन्दी भाषी बच्चों ने कभी न कभी इन कविताओं का पढ़कर या सुनकर लुत्फ जरुर उठाया होगा.

पोशम्पा भाई पोशम्पा,
सौ रुपये की घडी चुराई।
अब तो जेल मे जाना पडेगा,
जेल की रोटी खानी पडेगी,
जेल का पानी पीना पडेगा।
थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।
************

आलू-कचालू बेटा कहाँ गये थे,
बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।
**************

मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है।
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी।
************

आज सोमवार है,
चूहे को बुखार है।
चूहा गया डाक्टर के पास,
डाक्टर ने लगायी सुई,
चूहा बोला उईईईईई।
************

झूठ बोलना पाप है,
नदी किनारे सांप है।
काली माई आयेगी,
तुमको उठा ले जायेगी।
************

चन्दा मामा दूर के,
पूए पकाये भूर के।
आप खाएं थाली मे,
मुन्ने को दे प्याली में।
************

तितली उड़ी,
बस मे चढी।
सीट ना मिली,
तो रोने लगी।
ड्राईवर बोला, आजा मेरे पास,
तितली बोली " हट बदमाश "।
************

कविता साभार: आर्कुट-विचरण
चित्र साभार: डिस्कवर इंडिया-स्ट्रीट गेम्स
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बुधवार, अगस्त 22, 2007

चूं चूं चीं चीं और हम लोग!!

इस कविता के वास्ते मैने अपने पाठकों, जो कि अधिकतर चिट्ठाकार भी हैं, तीन वर्गों में बाँट दिया है.

पहला वर्ग जो कि 'अ' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ एवं नीचे.
दूसरा वर्ग जो कि 'ब' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ से ६५ वर्ष
तीसरा वर्ग जो कि 'स' कहलायेगा कि उम्र सीमा ६५ वर्ष एवं उपर...?? (उपर का अर्थ सिधार चुकों से न लगाये. इसका मतलब है 65+)


यह कविता 'अ' वर्ग के लिये रची गयी है, वो इसे पूर्णतः रोचक, मनोरंजक ओर ज्ञानवर्धक पायेंगे.

यह कविता 'ब' वर्ग के उन लोगों के लिये भी है जो 'अ' वर्ग की मातायें हैं. 'अ' वर्ग के पिता इसे बेतुका, वाहियात और बकवास मानेंगे अन्य नापसंद करने वाले वर्ग के साथ. इसमें इस कविता का दोष नहीं है. इसमें उनका दर्शन दोष है. उन्हें हर चीज में दोष नजर आता है.राजनेता दोषी-जबकि हैं उनके द्वारा चुने गये. अर्थ व्यवस्थता दोषी, राजनीति दोषी..जब पूछो-क्या आप चुनाव लड़ेंगे इसे सुधारने के लिये? तब उनसे सुनिये कि हम इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहते, हमें यह पसंद नहीं. खुद कुछ करना नहीं बाकि सब दोषी. उन्हें स्वभावतः यह कविता पसंद नही आयेगी. जबकि इसका स्टेन्डर्ड साहित्यिक है-बाल साहित्य.

मगर 'ब' और 'स' वर्ग में भी ऐसे लोग हैं जो प्रोफाईल उम्र के हिसाब से इस वर्ग में आ गये हैं मगर हरकत अभी भी वर्ग 'अ' की है, उनकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतजार है. हाल यह है कि तुमने मुझे क्यूँ छेड़ा भले ही मैने तुम्हें छेड़ा हो..मैं तो विवाद करुँगा. जो कह लो वो रुठ ही जायेंगे. हर बात में बच्चों की तरह झगड़ना. उस दिन तुमने मुझको परेशान किया था न...आज मैं करुँगा. सारे दोस्तों को बताऊँगा कि तुम गंदे हो. फसाद करवाऊँगा. फिर हसूंगा. शायद उनको भी यह रचना हरकतों के हिसाब से आंकी गई उम्र के कारण उपयुक्त लगे. कोई कह तो दे कि कौआ तुम्हारे कान ले गया, बस दौड़ पड़े कौए के पीछे. अरे भाई, एक बार कान तो चैक कर लो कि ले भी गया है कि नहीं?

यह उनके लिये भी राम बाण सिद्ध हो सकती है जो अपने दोस्तों के बच्चों के पोयेट्रिक काम्पिटेन्स (बेटा, अंकल को पोयेट्री सुनाओ के जबाब में) में जैक एण्ड जिल सालों से झेलते चले आ रहे हैं या फिर मछली जल की रानी है सुन सुन कर पक गये हैं. कम से कम एक नई कविता स्टॉक में आयेगी. आप उन बच्चों को यह कविता प्रिंट करके गिफ्ट स्वरुप दे सकते हैं. यह जनहित का कार्य कहलायेगा. बाकि के लोग भी जैक एण्ड जिल से बच जायेंगे.

वर्ग 'स' इसे नाती पोतों के लिये पसंद करेगा और हमारा अहसान भरेगा. साथ ही उम्र रिवर्सल ऑफ्टर ६५ के सिद्धांत पर उन्हें खुद भी यह पसंद आयेगी.

पाठ्य पुस्तक निगम वाले अगर चाहें तो मुझसे संपर्क करें, उन्हें मैं दे दूँगा इस कविता के सारे अधिकार बहुते सस्ते में.

अब कारण मत पूछिये कि हमने यह कविता क्यूँ रची? ठीक है नहीं मानते हैं तो आगे कभी पोस्ट में बताते हैं कि क्या कारण बना कि हम बाल कविता रच गये. चिट्ठा साहित्य का इतिहास इसका गवाह रहेगा.. इंतजार करिये न!!!

इन्तजार तो खैर करते रहियेगा... पहले के भी बहुत सारे वादों को पूरा करने का इन्तजार हमारे भारत के प्रधान मंत्री बनने की पूर्ण योग्यता की गवाही देते हुए सतत पेन्डिंग हैं.

अभी कविता सुनिये जो कतई अनुराग के महा पकाऊ अभियान का हिस्सा नहीं है.




एक है चिड़िया-
चूं चूं करती
चूं चूं करती
चीं चीं करती
नाम है उसका बोलू
इस डंडी से उस डंडी पर
उड़ती फिरती
कभी न गिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र

फिर दूजी चिड़िया भी आई
चूं चूं करती
चीं चीं करती
उड़ती फिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
नाम बताया मोलू
झूले में वो झूल रही है
खुशी खुशी से बोल रही है
मेरी यार बनोगी, बोलू?
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
दोनों ने यह गाना गाया
कूद कूद के खाना खाया

तब तक तीजा दोस्त भी आया
नाम जरा था अलग सा पाया
हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई
चिड़ियों ने यह जात न पाई
जिसने पाला उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती
मुस्लिम के घर रह कर आई
एक नहीं पूरे दो साल
ऐसा ही तो नाम भी उसका
सबने कहा उसे खुशाल
वो भी झूला उस झूले पर
इस झूले पर, उस झूले पर
हन हन हन हन
घंटी वो भी खूब बजाता
ट्न टन टन टन
फिर सबके संग खाना खाता
मिल मिल करके गाना गाता
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं

तीनों सबको खुश रखते हैं
ठुमक ठुमक के वो चलते हैं
खुशी में होते सभी निहाल
बोलू, मोलू और खुशाल!!

हम भी मिलकर
गाना गाते
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
उड़ते जाते
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र


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