गुरुवार, जुलाई 19, 2007

सपना एक निराला है

इधर महफिल, शायर फैमिली, ई कविता, हिन्द कविता और अन्य मंचों से जुडे सभी मित्रों के ईमेल लगातार मिल रहे हैं कि मात्र कवित्त क्यूँ नही करते? क्यूँ डरते हो एक विधा को अपनाने में? अब क्या बतायें उन्हें. चाहते हैं कि कविता भी जस्टिफाई हो और गद्य भी. बस कोशिश जारी रहती है कि दोनों के बीच सामंजस्य बना कर चल पाये और दो नावों के सवार की तरह डूबे नहीं. तो आज कविता पेश है.

मगर वादा है कि अगर ध्यान से पढ़ा जाये और तो गद्य प्रशंसकों को भी यह निराश न करेगी. एक संदेश है इसमे सही दिशा का और क्या सपना मेरा है इस समाज से. थोड़ा गौर फरमायें और बतायें कि मैं सफल रहा कि नहीं-अपनी बात कहने में. :)

बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि बकोल वस्ल:

अपने अंदर ही सिमट जाऊँ तो ठीक
मैं हर इक रिश्ते से कट जाऊँ तो ठीक.

थोड़ा थोड़ा चाहते हैं सब मुझे
मैं कई टुकड़ॊं में बँट जाऊं तो ठीक.

तुम ने कब वादे निभाये 'वस्ल' से
मैं भी वादों से पलट जाऊँ तो ठीक.

अब मुझे सुनिये:

सपना एक निराला है

अगर हमारे रचित काव्य से, तुमको कुछ आराम मिलेगा
यकीं जानिये इस लेखन को, तब ही कुछ आयाम मिलेगा.
भटकों को जो राह दिखाये, ऐसी इक जब डगर बनेगी
दुर्गति की इस तेज गति को, तब जाकर विराम मिलेगा.

इसी पाठ की अलख जगाने, हमने यह लिख डाला है
पूर्ण सुरक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

भूख, गरीबी और बीमारी, कैसे सबको पकड़ रही है
हाथ पकड़ कर बेईमानी का, चोर-बजारी अकड़ रही है.
इन सब से जो मुक्त कराये, ऐसी जब कुछ हवा बहेगी
छुड़ा सकेगी भुजपाशों से, जिसमें जनता जकड़ रही है.

इसी आस के भाव जगा कर, गीत नया लिख डाला है
पूर्ण प्रफुल्लित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

शिक्षित और साक्षर होने में, जो है भेद बता जाती हो
नैतिकता का सबक सिखा कर, जो इंसान बना पाती हो
भेदभाव मिट जाये जिससे, ऐसी एक किताब बनेगी
मानवता की क्या परिभाषा, ये सबको सिखला जाती हो.

ऐसी सुन्दर कृति सजाने, यह छंद नया लिख डाला है
पूर्ण सुशिक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

मेहनत करने से जो भागे, उनका बिल्कुल नाम नहीं है
डर कर जिनको जनता पूजे , वो कोई भगवान नहीं है
कर्म धर्म है सिखला दे जो, ऐसी अब कुछ बात बनेगी
जात पात में भेद कराना, इन्सानों का काम नहीं है.

धर्म के अंतर्भाव दिखाता, इक मुक्तक लिख डाला है
पूर्ण सु्संस्कृत हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 15, 2007

क्या साधुवाद का युग होता है?

हिंदी ब्‍लॉगिंग का साधुवाद युग अब बीत गया। समीरजी तो हो गए बेरोजगार :)

मसिजीवी के उपरोक्त आलेख में मैने पढ़ते वक्त कोशिश पूरी की कि स्माईली को ही सत्य मानूँ. प्रयास यह भी किया कि सबसे पहले टिप्पणी करके यह भी बता दूँ कि मुझे बुरा नहीं लगा. उद्देश्य मात्र यह था कि मेरे चाहने वाले एवं जानने वाले, जिसमें मसिजीवी स्वयं भी हैं, कहीं इस कथ्य को शाब्दिक अर्थों मे न ले लें. मैं आदतानुसार परोक्षरुप से आहत भी नहीं हुआ किन्तु हतप्रद जरुर था. पुनः, इसे पढ़ा. कुछ ही देर बाद छपी भाई फुरसतिया जी की ब्लॉगर मीट भी पढ़ी और उसमें उल्लेखित इस तथ्य पर उनकी विचारधारा भी. हमेशा की तरह उनका मेरे उपर अडिग विश्वास और असीम प्रेम देखकर मन भर आया. कम्प्यूटर बंद कर दिया.

पिछले २४ घंटो में कई बार पुनः कम्प्यूटर चालू करने के लिये अनायास ही हाथ बढ़ाया. मन नहीं माना, ध्यान बँटा लिया.टीवी देखा, मित्रों से फोन पर बातचीत की, परिवार के साथ समय दिया. मगर यह दूरी लगातार खलती रही. लगा कि मैं अपनी ही दुनिया से दूर क्यूँ हो रहा हूँ.

थोड़ा संवेदनशील हूँ फिर भी जल्दी बुरा नहीं मानता. आदतानुसार परोक्षरुप से जल्दी आहत भी नहीं, फिर भी हतप्रद तो हो ही सकता हूँ. ऐसी स्थितियों में मैं अक्सर त्वरित प्रतिक्रिया से बचने की कोशिश करता हूँ. अगर मुझे हतप्रद कर देने या झंकझोर देने वाले विमर्श या विवाद का विषय बिन्दु मैं स्वयं न हूँ, तब तो मैं शायद किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया भी न व्यक्त करुँ और कोशिश कर इस तरह के विमर्श या विवाद को शीघ्रातिशीघ्र मानस पटल से मिटा दूँ.

जबसे पढ़ा एक भी टिप्पणी करने का मन नहीं बना पाया. खैर, मन तो बन ही जायेगा. संस्कार तो छूटते नहीं. शायद कुछ समय लगे, मन काबू में आ जाये, फिर करेंगे टिप्पणियाँ खूब जी भर के.

रुका नहीं गया. मानस को मनाया और फिर अपनी दुनिया में आया. फिर मित्र मसीजीवी को पढ़ा. फिर भाई फुरसतिया जी को पढ़ा. सब टिप्पणियां पढ़ीं. मित्रों का प्रेम देखा. सभी की टिप्पणियों ने पुनः एक विश्वास दिया. अच्छा लगा पढ़ सुनकर सब कुछ.

ऐसा नहीं है कि चिट्ठों में होते विवाद मुझे उद्वेलित नहीं करते या फिर मैं उनके विरोध में कुछ कहने में सक्षम नहीं या एकदम ही विवेकशून्य हूँ. मगर मुझे व्यक्तिगत तौर पर विवाद पसंद नहीं वो भी कम से कम ऐसे तो कतई नहीं, जिनकी परिणिती मात्र कटुता हो, वह भले ही विचारों की हो या व्यक्तिगत.

मैं दोनों को ही उचित नहीं मानता. एक ही छत के नीचे पले बढ़े, एक ही आदर्शों का पाठ पढ़ते बड़े हुए दो भाईयों तक के विचार अलग अलग होते हैं. तब यहाँ तो सब अलग अलग घरों, अलग अलग परिस्थितियों, अलग अलग संस्कारों से आये लोग हैं. कैसे हो सकते हैं सबके एक से विचार? आप अपने विचार रखिये, वो अपने. दोनों मे जो जो जिसको अच्छा, वो वो उनको स्वीकारें वरना स्वयं के विचार तो हैं ही. कोई भी तो विचार शून्य नहीं. सभी विवेकवान हैं. फिर अपने विचार मनवाने के लिये विवाद कैसा और किस हद तक? सार्थक विमर्श की भी एक सीमा रेखा होती है. सबको आपस में सामन्जस्य बनाना होगा तभी विकास का एक सशक्त और सुहावनी राह बनेगी.

जैसा कि मैने अपनी पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया था कि मेरी अपनी निर्धारित सीमा रेखायें हैं. प्रतीक के तौर पर मैंने अपनी कार की रफ्तार दर्ज की थी. मुझे वही अच्छा लगता है और मैं वही करता हूँ जो मुझे अच्छा लगता है, कम से कम ऐसी जगह जहाँ मुझ पर कोई जोर जबदस्ती नहीं है (नौकरी में ऐसा हमेशा नहीं कर पाते) मगर फिर भी मैं अपनी मनमानी करने में किसी मर्यादा का उल्घंन नहीं करता. मैं हर वक्त इस बात का भी ख्याल रखने का प्रयास करता हूँ कि मेरी इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति से कोई आहत न हो. आज और आने वाले कल, दोनों ही वक्त में, न तो मुझे अपने लिखे पर शर्मिंदगी महसूस हो और न ही किसी अन्य पढ़ने वाले को. अगर यही हल्का लेखन कहलाता है तो मैं इसी में खुश हूँ और मुझे इस पर गर्व है. और मुझे स्वयं को तथाकथित विचारोत्तेजक भारी भरकम साहित्यिक लेखन की ओर ले जाने का कोई आकर्षण नहीं है. शायद वक्त, निरंतर पठन कुछ साहित्यिक वजनी शब्दों का भंडार दे जिन्हें में सहज भाव से उपयोग कर पाऊँ मगर उद्देश्य मेरा फिर भी न बदले, बस यही इश्वर से प्रार्थना करता हूँ.


हम हँसते और हँसाते हैं
गम के आँसूं पी जाते हैं
ढ़ेरों जख्मी राह में देखे
मरहम सा रख आते हैं.


नये आये लोगों का अभिनन्दन करना, किसी को अच्छे कार्यों के लिये प्रोत्साहित करना, किसी के अभिवादन के जबाब में अभिवादन करना, किसी के दुख में शामिल होना, किसी के खुशी मे खुश होना, लगातर प्रोत्साहन देना, शाबाशी, धन्यवाद, आभार आदि शिष्टाचारों का कोई युग नहीं होता. यह हर युग में होते हैं और यही साधुवादिता कहलाती है. यह ठीक वैसे ही है जैसे गाली बकना, निर्थक बहस करना, मारना पीटना, लूटपाट करना, आतंक फैलाना आदि शैतानियत के प्रतीक हैं और इनके भी कोई युग नहीं होते.

जिस दिन समाज से शिष्टाचार समाप्त हो जायेगा, उस दिन मुझे इस बेरोजगारी के साथ साथ बेजानी भी मंजूर होगी-खुशी खुशी. बिना आहत हुये, बिना हतप्रद हुये, बिना बुरा लगे और बिना किसी प्रतिक्रिया के.

तब तक के लिये-मैं ऐसा ही हूँ. आप मेरे मित्र हैं और आपकी मित्रता को मैं साधुवाद करता हूँ.

चलिये, आज आपको स्व.रमानाथ अवस्थी जी की मेरी पसंदीदा रचना सुनाता हूं जो कभी फुरसतिया जी ने सुनाई थी:

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।
संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ

यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।

तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।

मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो ।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ

मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
-स्व.रमानाथ अवस्थी




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गुरुवार, जुलाई 12, 2007

मैं ही थोड़ा सा सिमट जाऊँ



कार अपनी गति से भाग रही है. माईलोमीटर पर नजर जाती है. १२० किमी प्रति घंटा. ठीक ही तो है. मैं आगे हूँ. रियर मिरर में देखता हूँ. वो पीली कार बहुत देर से मेरे पीछे पीछे चली आ रही है. दूरी उतनी ही बनी है. शायद वो भी १२० किमी प्रति घंटे पर ही चल रही है. मैं आगे हूँ, वो पीछे है. शायद वो जीतने की कोशिश ही नहीं कर रहा. अगर वो अपनी रफ्तार १२५ किमी प्रति घंटा कर ले, तो तुरंत जीत जायेगा. मगर उसे नहीं जीतना. वो खुश है अपनी स्थितियों से. मुझसे हार रहा है, यह मेरी सोच है शायद. उसके पीछे आ रही सफेद कार से वो जीत रहा है, यह उसकी सोच होगी. ऐसे मैं सोचता हूँ. पता नहीं, वो क्या सोचता होगा?

अभी तो घर आने में बहुत समय है. अभी मैं जहाँ हूँ, हमेशा वहाँ से घर उतनी ही दूर रहता है रोज. कभी पास नहीं होता. कभी दूर नहीं होता. मैं भी रोज एक ही रफ्तार से गाड़ी चलाता हूँ. आदत ही नहीं कि रफ्तार बदलूँ. क्या जरुरत है? सब ठीक तो चल रहा है. कभी किसी से जीत जाता हूँ. हारने वाले को पता ही नहीं चलता कि मैने उसे हरा दिया है. वो शायद अपने पीछे वाली कार वाले को हराने के जश्न में मगन होगा. ऐसा मैं सोचता हूँ. पता नहीं वो क्या सोचता होगा?

रोज अमूमन यंत्रवत यही होता है. मैं तो खेल में हूँ. यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा है. रोज किसी से हारता हूँ, उस पर मैं ध्यान नहीं देता. मैं उसका बुरा नहीं मानता. मैं चाहूँ तो रफ्तार बढ़ाकर १२५ किमी प्रति घंटा कर लूँ. मैं जिससे हार रहा हूँ, उससे जीत जाऊँगा. मगर क्या, सच में जीतूँगा? तब मैं किसी और से हारुँगा. या फिर अगर मेरे आगे वाला भी उस समय मेरे जैसा ही सोचने लगे तो वो अपनी रफ्तार बढ़ा कर १३० किमी प्रति घंटा कर देगा. कोई अंत नहीं ऐसी सोच का और फायदा भी क्या? हासिल क्या होगा सिवाय अफरा तफरी के. फिर मैं अपना शांत स्वभाव क्यूँ बदलूँ? क्यूँ करुँ उसकी परवाह? क्यूँ मचलूँ? मुझे १२० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलना अच्छा लगता है. मैं सुरक्षित महसूस करता हूँ. कार मेरे नियंत्रण में रहती है. मुझे मेरी स्वतः होती जीत पसंद है. मैं संतुष्ट हो जाता हूँ. रोज किसी से जीत जाता हूँ वो मुझे अच्छा लगता है.

अब मैने हाईवे छोड़ दिया है. घर ८०० मीटर की दूरी पर है. हमेशा यहाँ से घर इतनी ही दूर रहता है रोज. कभी पास नहीं होता. कभी दूर नहीं होता. आज मैं पीली कार वाले से जीता हूँ. वो हारा है. क्या वो दुखी होगा? शायद नहीं, वो भी तो सफेद कार से जीता होगा, जो उसके पीछे आ रही थी. वो भी अपनी जीत से खुश होगा. ऐसी दुनिया मुझे अच्छी लगती है. सब जीत रहे हैं. सब खुश हैं. ऐसा मैं सोचता हूँ. पता नहीं, वो पीली कार वाला क्या सोच रहा होगा?

कल तारीख बदलेगी. दौड़ फिर होगी. फिर नया लेकिन ऐसा ही खेल होगा. फिर सब जीतेंगे. शायद प्रतिभागी कुछ बदल जायें मगर खेल तो यही रहेगा.

क्या यह मेरी आभासी दुनिया कहलायेगी और वह आभासी जीत? लेकिन मैं तो सच में जीता हूँ, उस पीली कार वाले से.

आप क्या सोच रहे हैं?

अपने मामा जी प्रशान्त 'वस्ल', जिनका लिखा सा रे गा मा का टाईटिल सांग पूरे भारत की जुबान पर है, की गजल के दो शेर सुनाता हूँ मेरी पसंद में:

अपने अंदर ही सिमट जाऊँ तो ठीक
मैं हर इक रिश्ते से कट जाऊँ तो ठीक.

मेरी चादर बढ़ सके मुमकिन नहीं
मैं ही थोड़ा सा सिमट जाऊँ तो ठीक. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 08, 2007

गुणों की खान-मोटों के नाम

"जीवन में सकारात्मक सोच का स्थान बहुत अहम है. अगर आप सकारात्मक सोच नहीं रखते तो यकीन जानिये आप जल्द डिप्रेशन का शिकार हो जायेंगे और यह एक प्रकार का धीमा जहर है जिससे आप मर भी सकते हैं." जब एक महाज्ञानी के यह शब्द सुने तो हम एकदम सतर्क हो गये-एकदम सकारात्मक सोचधारक. अब हम अपने मोटापे के प्रति भी अपनी समस्त पूर्व धारणाओं को तिलांजली दे सकारात्मक सोच रखने लगे हैं.

मोटापे की प्रवृति दुबलापे से बिल्कुल भिन्न होती है. दुबला व्यक्ति यदि कोई प्रयास न भी करे तो वो दुबला ही बना रहता है एवं और दुबला नहीं हो जाता. मगर अगर मोटा व्यक्ति कोई प्रयास न करे तो उसका मोटापा दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही जाता है. इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिये. इसे स्वीकारने में आपको कोई परेशानी भी नहीं होगी क्योंकि ऐसी बातें स्वीकार कर लेना आपकी फितरत में है जैसे कि आपने भ्रष्टाचार, अराजकता, जातिवाद को कितनी आसानी से स्वीकारा ही हुआ है, तभी तो निष्क्रियता के परिणाम स्वरुप मोटापे के तरह यह दिन रात अपनी बढ़त बनाये हुये है.




मेहनत तो हो नहीं पायेगी, तब दुबले होने से रहे फिर काहे चिन्ता करना. स्वीकार करो इसे खुले मन से, स्वागत करो इसका. नहीं भी करोगे तो भी यह तो बढ़ता ही जाना है. तो फायदे देखकर ही खुश हो लो बाकि कार्य तो यह खुद कर लेगा. मुझे वैसे भी मोटे व्यक्ति पतले दुबले व्यक्तियों से ज्यादा गुणी नजर आते हैं, देखें न कितनी खासियतें होती हैं इनमें. मानों कि गुणों की खान.


जैसा मैने देखा है कि मोटे लोग आम तौर पर हमेशा हँसते मुस्कराते रहते हैं जबकि दुबले पता नहीं क्यूँ गंभीर से दिखते हैं. हो सकता है मोटों का अवचेतन मन अपने आप पर, अपनी हालत देख, हँसी न रोक पाता हो और मुस्कराता हो, मगर जो भी हो हँसते, मुस्काराते ही मिलते हैं मोटे. अर्थात वे हँसमुख होते हैं.

फिर उन्हें देखने वाला भी तो हँस ही देता है. इतने टेंशन की जिन्दगी में कोई किसी के चेहरे पर हँसी बिखेर जाये तो इससे बड़ा साधुवादी कार्य क्या हो सकता है. वैसे किसी दुबले को कह कर देखिये कि भाई, हँसाओ. वो तरह तरह के चुटकुले सुनायेगा, हास्य कविता पढ़ेगा, फूहड़ सी मुख मुद्रा बनायेगा तब भी कोई गारंटी नहीं कि हँसी आ ही जाये, लॉफ्टर चैलेंज देखकर देख लो जबकि किसी मोटे से कह कर देखो. बस जरा सा हिल डुल दे. एक दो नाच के लटके झटके लगा दे, पूरा माहौल हास्यमय हो जायेगा. अर्थात वे मनोरंजक होते हैं.

अच्छा, आप किसी मोटे को मोटा कह कर भाग जाईये. वो सह जायेगा. आपको कुछ नहीं कहेगा. जो भी वजह हो, चाहे उसे पता हो कि वो पीछा नहीं कर पायेगा या थक जायेगा, मगर वो कहेगा कुछ नहीं. अर्थात वे सहनशील होते हैं.

पतलों को मैने देखा है कि चेहरा मोहरा कैसा भी हो जब भी घर से निकलेंगे, पूरा सज धज कर कि शायद सुन्दर दिखने लगें. मोटा व्यक्ति बिना सजेधजे, जिस हाल में है, वैसे ही निकल पड़ता है. वो जानता है कि वो हर हाल में भद्दा ही दिखेगा. वो यथार्थ को समझता है. तो वो स्थितियों से समझौता कर लेता है. अर्थात वे न सिर्फ यथार्थवादी होते हैं बल्कि समझौतावदी भी होते हैं.

मोटे व्यक्ति वैसे भी घूमने फिरने और खेल कूद से पहरेज करते है तो अधिकतर बैठा रहते है. अब बैठे बैठे क्या करे तो किताब पढ़ते है, कम्प्यूटर पर पढ़ते है तब ज्ञानार्जन कर ही लेते है. अर्थात वे ज्ञानी होते हैं.

जब मोटा व्यक्ति अन्य लोगों के साथ कभी पैदल कहीं निकल जाता है तो जगह जगह रुक कर भिखारियों और दुखियों का हाल पूछता है (भले ही इसकी वजह उसकी थकान हो और इस बहाने बिना शर्म के थोड़ा आराम मिल जाता है-क्योंकि मोटा व्यक्ति थोड़ा शर्मीला होता है) और उन्हें भीख में कुछ पैसे भी देता है.अर्थात वो दानी होता है.

आपको शायद ही पता हो मगर मोटा व्यक्ति पराई स्त्रियों पर खराब नजर नहीं रखता. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि वो यथार्थवादी होता है तो यह भली भाँति जानता है कि चाहे जैसी भी खराब नजर रखे, कुछ फायदा नहीं. कोई स्त्री उसे पूछने वाली नहीं. अतः अपने समझौतावादी स्वभाव के तहत विकल्प के आभाव मे, वो हमेशा अच्छी नजर रखता है अर्थात वो चरित्रवान होता है. साथ ही उनकी पत्नी भी इस सत्य से परिचित होती हैं कि उनके पति पर कोई भी डोरे नहीं डालेगा अर्थात वो एक सुरक्षित पति होते हैं.

वैसे कभी कोई दुबला ट्रेन में या बस यात्रा में सीट पर बैठा हो तो उसे कोई भी खिसका कर जगह ले लेता है कि खिसकना जरा भईया मगर मोटों के साथ यह समस्या नहीं होती. वो तो पडोसी की भी आधी सीट घेरे होता है अर्थात वो विराजमान होता है.

मोटा व्यक्ति कभी विवादों और लफड़े में नहीं पड़ता. (शायद वो जानता है कि कहीं बात बढ़ गई तो भाग भी न पायेंगे. पिटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा) अर्थात वो विवादों में तटस्थ और स्वभाव से शांतिप्रिय होता है.

मैने तो यह भी देखा है कि मोटे व्यक्ति के पास पैंट शर्ट तक नये नये खूब ज्यादा होते हैं. अभी अभी सिलवाया और दो बार पहना नहीं कि मोटापा तो मंहगाई की गति से बढ़ता गया और कपडे आम जनता की जेब की तरह छोटे. अब फैंक तो सकते नहीं कि शायद कल को दुबले हो ही जाये तो पहनेंगे. (अर्थात मोटा व्यक्ति आशावादी होता है) अभी नया ही तो है. तो धर देते हैं. फिर न कभी दुबले हुये, न कभी मंहगाई कम हुई और न कभी उनका इस्तेमाल तो नये नये कपडे जमा होते रहे. गिनती बढ़ती गई जो कि दुबले के नसीब मे कहाँ. उसकी तो पैन्ट शर्ट फट ही जाये तभी छूटे. अर्थात वे (इस मामले में) समृद्ध होते हैं.

मोटा जब कहीं ज्यादा खाना खाता है तो उसे उसकी सेहतानुरुप माना जाता है और कोई बुरा नहीं मानता बल्कि लोग कहते पाये गये हैं कि भाई साहब, क्या भूखे ही उठने का इरादा है वरना कोई दुबला उतना खाये तो लोग कहने लगते हैं कि न जाने कितने दिन का भूखा है या आगे लगता है खाना नहीं मिलेगा. अर्थात वे सम्मानित होते हैं.

अब चूँकि मोटा व्यक्ति ज्यादा कहीं आता जाता नहीं और अक्सर घर पर ही सोफे में बैठा होता है तो बच्चों पर लगातार नजर बनीं रहती है अर्थात वो एक अच्छा अभिभावक होता है.

कभी स्कूटर या सायकिल से गिर जाओ तो दुबले की तो हड्डी गई ही समझो मगर मोटे की चरबी से होते हुए हड्डी तक झटका पहुँचने के लिये जोर का झटका चाहिये इसलिये अक्सर हड्डी बच जाती है अर्थात वो दुर्घटनाप्रूफ होता है.

अनेकों गुणों की खान का क्या क्या बखान करुँ मगर अगर कोई दुबला मर जाये तो कारण खोजना पड़ता है कि क्यूँ मरा..शायद शुगर बढ़ गई होगी, हार्ट फेल हो गया होगा मगर मोटा मरे तो बस एक कारण सबके मुँह से कि मोटापा ले डूबा. अर्थात उसका कारण बिल्कुल साफ और पारदर्शी होता है. नो कन्फ्यूजन. बस एक कारण और मात्र एक: मोटापा.

काश, मेरे देश के विकास की गति भी मोटी हो जाये बिना किसी प्रतिरोध के. सब सकारत्मक सोच रखें और फिर देखिये कैसी दिन दूनी रात चौगुनी विकास की दर बढ़ती है. मगर यह भ्रष्टाचार, अराजकता, गुंडागिरी की ट्रेड मिल तो हटाओ!! जरुर मोटी हो जायेगी. आमीन!!!


(यह विलम्बित आलेख शिष्य गिरिराज के विशेष अनुरोध पर प्रेषित किया जा रहा है) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 04, 2007

मरघट से....राजू भाई

राजू भाई यूँ तो कवि थे और इसी वजह से माईक के शौकीन. क्या मजाल कि माईक थामने का कोई भी मौका उनके हाथ से निकल जाये. साथ ही वो समाज सेवा जैसा एक बेहद जरुरी कार्य किया करते थे.पूरे मोहल्ले में बल्कि आजू बाजू के अन्य मोहल्ले में भी कोई मर जाये और राजू भईया को खबर पहुँच बस जाये, कि वो हाजिर. सबसे आगे आगे. जान पहचान मृत व्यक्ति या उसके परिवार से कतई आवश्यक नहीं. आवश्यक है राजू भाई तक खबर पहुँचना और वो आपको हाजिर दिखेंगे.

कवि की हैसियत से भी उनका यही हाल था. कवि सम्मेलन का न्यौता उतना आवश्यक नहीं जितना उन्हें यह पता लगना कि फलां जगह कवि सम्मेलन है. फिर तो वो मेनेजमेन्ट एकस्पर्ट थे. आपको निश्चित मंच से कविता पढ़ते नजर आयेंगे और आयोजक उनके आगे पीछे, न बुलाने के लिये क्षमायाचना की मुस्कराहट चेहरे पर चिपकाये हुये. खैर, यह उनकी शक्सियत ही थी और उनका मैनेज करने का अंदाज.

हाँ, तो बात चल रही थी हर शव यात्रा में राजू भाई की शिरकत होती थी. वही धुला हुआ सफेद कुर्ता पैजामा, आँखों पर काला चश्मा, हाथ में पान पराग और तुलसी का ड्ब्बा. चेहरे से सबसे ज्यादा गमगीन. सुबह से जुटे हर इन्तजाम में. पूरे प्रोजेक्ट मैनेजर की तरह. खुद एक काम नहीं करना और दिखे ऐसा कि सब भार उन्हीं के कंधों पर आ गिरा है. आप उन्हें देखते ही पायेंगे, 'पप्पू बेटा, सुन वो बांस आ गये क्या. जरा यहाँ ले आओ. छोटू सुन, जरा वो रस्सी ले आ. मुन्ना, उधर से बाँधना शुरु कर. रामू, जा ३ किलो घी खरीद ला. भईया से पैसे ले ले और आ कर हिसाब देना. लौट कर हिसाब खुद लेते और पैसे अपनी जेब में. खुद कुछ नहीं करना, बस हल्ला गुल्ला और पैसे वापस लेना. सुबह से सारा सामान अलग अलग लोग ला रहे हैं. कभी भईया से पैसे ले लो कभी चाचा से और लौटकर हिसाब ये लें.अब मरे जिये में उनसे तो कोई हिसाब मांगने से रहा. और न ही ओरिजनल पैसे उन्होंने लिये थे परिवार वालों से, तो अगर कभी शक जाकर कोई बुरा भी मान गया तो छोटू, मुन्ना लोग बदनाम हों. राजू भाई का क्या. यही तो होता है सही प्रोजेक्ट मैनेजर-सब वाह वाही हमारी बाकि गल्तियाँ टीम मेम्बरर्स की. काम एक नहीं आता और न करना है और सबसे ज्यादा व्यस्त.

कुछ खास जानकार बताते हैं कि उनकी आजिविका का साधन भी यही था. एक बार एक मय्यत में मैने छिप कर गिने थे, लगभग २५०० से ३००० हिसाब वापस लेते लेते अंदर गये थे. तभी मैं समझा एक एक सामान के लिये यह लोगों को क्यूँ दौड़ाते हैं, इकट्ठे काहे नहीं मंगा लेते.

कवि सम्मेलन तो शायद इसी ब्लैक को व्हाईट करने का तरीका रहा होगा. जैसे सरकारी अधिकारियों और दो नम्बर की आय वालों के पास कृषि भूमि. कवि सम्मेलन का मंच उनके लिये साहित्य भूमि न हो कृषि भूमि ही थी. जो उनकी इस दो नम्बर की आय को एक नम्बर का जामा पहनाने का कार्य बड़ी मुस्तैदी से करती. चलिये, जाने दिजिये, इस पचड़े में क्या पड़ना.

तो राजू भाई,शुरु से अंत तक हाजिर रहते और जब सारे कर्मकांड हो जाते तो जो मरघट में आखिर में आत्मा की शांति के लिये भाषण दिया जाता है, वो भी राजू भाई तुरंत पेड के चबूतरे वाले मंच पर चढ़कर शुरु हो जाते. अब सुबह से साथ साथ रहते इतना तो जान ही जाते कि कौन मरा है, क्या नाम था, क्या उम्र रही होगी. परिवार में कौन कौन पीछे छूट गया आदि आदि भाषण के आवश्यक तत्व. हर उम्र के लिये एक सधा हुआ भाषण और आप जानकर आश्चर्य करेंगे उनकी काव्य प्रतिभा पर कि ऐसे में भी वो एकाध मुक्तक तो झिलवा ही देते. मैं उनकी भाषण कला से बहुत प्रभावित रहता और एक बार रिकार्ड करके नोट किया. आप सब की सुविधा के लिये पेश कर रहा हूँ. क्या मालूम किस जगह जरुरत पड़ जाये पढ़ने की, अन्य वक्त्ताओं के आभाव में. काम ही आयेगा, तो सुनिये मोहल्ले के बुजुर्ग के मरने पर उन्होंने जो भाषण पढ़ा वो हूबहू यहाँ पेश किया जा रहा है. ज्ञात रहे कि राजू भाई इनसे पहले कभी नहीं मिले और यकिन मानिये, वहाँ उपस्थित सभी लोगों को मृत व्यक्ति के पुत्र से भी ज्यादा करीब और गमगीन राजू भाई ही लगे.

भाषण:





श्रद्धेय रामेश्वर प्रसाद जी जिन्हें हम प्यार से बाबू जी बुलाया करते थे, आज हमारे बीच नहीं रहे. कल तक जो वाणी हमें जीवन की राह दिखाती थी, आज हमेशा के लिये चुप हो गई.

बाबू जी को अब याद करता हूँ तो याद आता है वो मुस्कराता हुआ चेहरा, जो हर दुख और विपत्ति के क्षणों में सदैव एक अजब सा विश्वास जगाता था. जब भी मैं इस जीवन की आपा धापी की धूप में झुलसते हुये परेशान हो जाता था, बाबू जी के पास जाकर उनके श्री चरणों में बैठ जाया करता था. वो एक वट वृक्ष थे, जिसकी छाया की शीतलता में कुछ पल विश्राम करके मैं एक नई शक्ति और उर्जा का अनुभव करता था. जब भी मैं बाबू जी के घर के सामने से निकलता, वो मुस्कराते रहते. उनकी मुस्कान से दैविक उर्जा मिलती थी. (यहाँ राजू भाई क गला भर आता, थोड़ी खरखराहट भरी आवाज हो जाती)

बाबू जी एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे. बाबू जी जाने से एक युग की समाप्ति हुई है. उनके जाने से हमारे जीवन में एक अपूर्णिय क्षति हुई है. बाबू जी के बताये आदर्श मात्र कथन नहीं, एक जीवन शैली है. अगर हम अपने जीवन में उस शैली का थोड़ा भी मिश्रण कर पाये तो यही बाबू जी की आत्मा को सच्ची श्रृद्धांजली होगी. (यहाँ पर वो थोड़ा रुककर जेब से रुमाल निकालते, चश्मा हटाते और आँसू पोछते से नजर आते) (फिर खंखारते और उनका कवि हृदय जाग उठता-मौका मिला है तो कैसे छोड़ते)

आज इस अवसर पर मेरी लिखे एक मुक्तक की चार पंक्तियाँ सुनाना चाहता हूँ जो बाबू जी बहुत पसंद किया करते थे:


आसमां अमृत गिराता, आज अपनी आँख से
पुष्प खुद गिर समर्पित, आज अपनी शाख से
आप सा व्यक्तित्व नहीं, कोई भी दूजा है यहाँ
आपका आना हुआ था, इस धरा के भाग* से

* भाग=भाग्य

और अंत में वो दो पंक्तियाँ जो बाबू जी हमेशा गुनगुनाया करते थे और जो इस जीवन का दर्शन कहती हैं:


जिन्दगी मानिंद बुलबुल शाख की,
दो पल बैठी, चहचहाई और उड चली.


मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि बाबू जी की आत्मा को शान्ति दे और उनके परिवार को इस गहन दुख को वहन करने की शक्ति प्रदान करे.

कल बाबू जी घर ३ बजे से शांति पाठ है. अब हम सब दो मिनट बाबू जी आत्मा की शांति के लिये मौन रख कर यहाँ से विदा लेंगे.

दो मिनट बाद-राजू भाई खँखारे-फिर कहे- ओम शांति..बाकि सबने कहा--शांति शांति.


अंत मे एक बात और, आखिरी दम भाषण और शव जलाने के जस्ट पहले जब सब शांति से इन्हें देख रहे हों, तैयारी चल रही हो, तब ये जरुर किसी को दौड़ाते थे कि जा बेटा, एक अगर बत्ती का पूड़ा खरीद ला. लड़का बोलता, पैसे तो सबके सामने अपनी जेब से २० का नोट निकाल कर देते और फिर थोड़ी दूर जाने पर वापस आवाज देते कि यह और पैसे ले जा और पानी की एक बोतल भी लेते आना चाचाजी के लिये और पुनः १० का नोट. उनको यह रुपये देते मृतक का पूरा परिवार भी देखता और उपस्थित लोग भी.

सारा काम खत्म होने पर जब मृतक के परिवार वाले इनसे पूछते कि भाई साहब, आपके भी सुबह से काफी पैसे खर्च हो गये होंगे, कृप्या बता देते तो हम दे दें. बस फिर क्या, राजू भाई आंसू से रो देते कि बाबू जी के जाते ही क्या मैं इतना पराया हो गया कि १०००- ५०० भी न खर्च कर सकूँ उन पर?

हम तो सकपका ही गये कि कुल ३० रुपये खर्च करके अहसान १०००-५०० का और वो भी २५००-३००० अंदर करने के बाद. पूरा परिवार कृत्यज्ञता से इनकी ओर ताक रहा होता. आज की दुनिया में भला ऐसा आदमी कहाँ मिलता है जो पराया होकर भी अपनों से ज्यादा अपना है.

तो ऐसे थे हमारे कवि महोदय, ओजस्वी वक्ता, मैनेजमेंट गुरु, प्रोजेक्ट मैनेजर, शिक्षा-बी.ए. (हिन्दी)(यह भी विवादित है), बेरोजगार और इतने व्यस्त कि रोजगार खोजने तक का समय नहीं- इन्तजाम अली श्री श्री राजू भाई. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 01, 2007

हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार!!



गुगल चैट पर लाल बत्ती जला कर बैठे हैं. कुछ जरुरी काम निपटाना है साथ ही किसी से कुछ जरुरी बात करनी है तो इन्तजार भी है उनके गुगल चैट पर आने का. इसी लिये व्यस्त का बोर्ड टांग दिया है.


एकाएक सामने से मैसेज आता है, 'क्या भाई साहब, बिजी हैं?' .


अब क्या कहें? जब लाल बत्ती और उसके नीचे लिखा 'व्यस्त' कुछ नहीं कह पाया तो हमारी क्या औकात. कैसे मना करते?

कहना पड़ा, 'नहीं, कोई खास नहीं, बतायें.'

अभी लिख कर एन्टर मारा ही था, तो वहाँ तो मैसेज पहले से ही तैयार था, 'इसे देखा.' और साथ में अपनी नई ब्लॉग पोस्ट का लिंक. अभी कुछ सोचे समझें, एक स्माईली :).

कह दिये, 'अभी देखते हैं'

३ मिनट भी नहीं बीते, अभी लिंक खुलने की तैयारी में है. एक और मैसेज, 'कैसा लगा?'.

अब क्या बतायें कि कैसा लगा? पहले दिखे तो. खैर, पोस्ट खुल खुला गई. बी एस एन एल की महा कृपा का परिणाम. (खैर खुलना तो था ही जैसा की नाम से उजागर है कि बी एस एन एल-बहुत समय नहीं लगेगा-उसने अपना वादा निभा दिया) अब इतने दिन से आँख फोड़ फोड़ कर और ब्लॉगिंग में टिपियाते इतना तो अनुभव प्राप्त हो ही गया कि सरसरिया के पहचान जायें कि कविता है कि कहानी. व्यंग्य है कि यात्रा संस्मरण. विवाद होगा या नहीं. अरे, यही अनुभव तो है जो फट से टिप्पणी कर लेते हैं. और बता दूँ, यह ज्ञान बांटना संभव भी नहीं. बस, इतना बताये दे रहे हैं कि करत करत अभ्यास ते वाली कहावत याद रखो और यह भी कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं. आपको भी यह ज्ञान अनुभव से प्राप्त हो जायेगा. यह ठीक वैसा ही है जैसे कि अपने नेता घाघपंती सिखा नहीं सकते बस अनुभव की बात है, जिसका जितना लंबा अनुभव वो उतना बड़ा घाघ.

खैर, जल्दी से सरसरिया दिये. देखा कविता है और वो भी प्रेम गीत टाईप, कह दिये कि 'बड़ी अनूठी कविता कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं, खास कर यह लाईन और चार लाईन उसी में से कट पेस्ट कर दी' .

वे बोले, 'यह वहीं टिप्पणी में कहिये.'.

लो, कर लो बात, तुम कह रहे हो चैट में. सामने बैठे टाईप में ही हो. सामने के सामने तारीफ कर रहे हैं. तारीफ और दाद चाहिये कि टिप्पणियों की संख्या? समझ नहीं आ पाया.

अब वो तो टिप्पणी का कह कर गायब हो गये. कहीं और कटिया फंसा रहे होंगे. एक जन से उनका काम थोड़ी चलेगा और हम लगे हैं, उनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने में. टाईप करो. वो रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े अक्षर भरो वेरिफिकेशन वाले. अपना नाम, पासवर्ड और झुंझलाहट में अक्षर गलत भरा गये तो फिर भरो. खैर, एक लोभ सा रहता है कि कल को हम भी कुछ लिखेंगे तो बंदा अहसान चुकायेगा. बस शायद इसी लिये बुजुर्ग कह गये हैं कि लालच अच्छी बात नहीं. मगर समझ आये जब न!! वो तो बुढ़ापे में हम भी अपने नाती पोतों को समझायेंगे, ब्लॉगिंग अच्छी बात नहीं-कौन मानेगा. हम ही कहाँ मान रहे हैं.

सब फुरसत पाकर ईमेल चेक करने बैठे तो उन्हीं का ईमेल चैट के पहले का आया हुआ था. यहाँ देखिये मेरी नई रचना और लिंक एवं अंत में स्माईली. नाश हो इन स्माईली बनाने वालों का. कोई सी भी हरकत कर लो और स्माईली के पैकिंग रैपर में लपेट कर थमा दो. अरे, पैकेजिंग का जमाना है. अब जो बुरा माने वो बेवकूफ, उसे अन्तर्जाल के तरीके नहीं मालूम. तब यह बेवकूफी कैसे जाहिर होने दें तो स्माईली लगी बात का बुरा नहीं मानते.

यहाँ से छूटे तो नारद पर पहुँचे, वहाँ भी सबसे उपर वो ही चमक रहे हैं उसी पोस्ट के साथ. भईये, नारद का काम ही यही है. थोड़ा तो धीरज धरो. हम तो खुद ही बिना नारद की पूजा अर्चना के खाना नहीं खाते, नहाते नहीं, सोते नहीं, जागते नहीं...देख ही लेंगे. बस कुछ मिनटों का फरक पड़ सकता है. हम नारद के थ्रू आयेंगे, तब भी टिपियायेंगे और शायद वाकई पढ़कर बेहतरीन टिप्पणी कर जायें कभी कभी पढ़कर भी तो करते हैं टिप्पणी :)) न विश्वास हो तो मसीजिवी से पूछ लो, उन्होंने अभी रिसेन्टली देखा था एक जगह. :)

नारद पर नहीं भी आते हो तो हिन्दी ब्लॉग भी देखते हैं, चिट्ठा चर्चा भी पढ़ते हैं और अब तो चिट्ठाजगत डॉट इन भी. बहुत अच्छा या बहुत बूरा लिखोगे तो सारथी पर भी दिख सकते हो.कहीं न कहीं तो तुम दिख ही जाओगे और तुम्हारे जैसा मुखर व्यक्तित्व नहीं दिखेगा तो फिर कौन दिखेगा??

तो हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार, तुम्हारी पोस्ट का अस्तित्व कोई लोकशाही में उपस्थित ईमानदारी सा तो है नहीं, जो लाख ढूंढने पर भी न मिले. वो तो बेईमानी की तरह सर्वव्यापी एवं स्व-उजागर है, जिसे चाह कर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और उससे हाथ मिलाये बिना इस जगत में तो गुजारा संभव भी नहीं. हमें भी गुजारा करना है, जरुर हाथ मिलायेंगे.जरुर टिपियायेंगे फिर काहे अधीर हुये जा रहे हो. तनिक ठहरो, हम चाहें भी तो बचकर नहीं जा सकते. बस निवेदन और विनती है कि भईया, जरा सा धैर्य रख लो. कुछ हमारी भी जरुरते हैं-खाना खाते हैं, नहाते हैं, सोते हैं-थोड़ा तो स्पेस दे दो फिर नौकरी भी करनी है. वैसे, फिर भी चाहो, तो दरवाजा तो हमेशा खुला है, खटखटा देना भले ही व्यस्त का बोर्ड लगा हो, लाल बत्ती जल रही हो: हम तो हाजिर हैं ही, लालची जो हैं. लाल बत्ती, बोर्ड आदि तुम्हारे लिये नहीं हैं वो आम जन के लिये हैं और तुम आम तो हो नहीं, तुम तो हो-स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार. नमन करता हूँ तुम्हें!!! स्विकारो.

धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

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बुधवार, जून 27, 2007

चलो, हम भी सीख ही गये

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
यह मेरा पॉड कास्टिंग का पहला प्रयास है. सब सुनाये चले जा रहे थे और हम बैठे देखे जा रहे थे कि कैसे करते हैं पॉडकास्ट. भला हो मित्रों का, जैसे ही हमने दोहे वाली पोस्ट में अपनी असमर्थता व्यक्त की वैसे ही सब भागे भागे भीगे भीगे (उस दिन दिल्ली में बारिश हो रही थी :)) टिप्पणी में बता गये, ऐसा कर लो, वैसा कर लो. बैंगाणी बंधुओं ने तो गुजरात से पूरी ईमेल करके विधी भेज दी और खुद करके दे देने की पेशकश भी की जबकि प्लेयर लोड होते समय हरे रंग का हो जाता है, भगवा नहीं और उस पर से हमारे ब्लॉग का हेडर भी हरा. फिर भी सब किया प्रेमवश. सबका प्रेम देखकर मन खुशी से भर आया. बस खुशी से आंसू टपकने की फिराक में ही थे कि मास्साब ई-पंडित श्रीश महाराज आ पधारे. वो तो हमेशा ही कमाल लिखते हैं (जब भी लिखते हैं :)) और हमारी तकलीफ जानकर, बिना हमारे व्यक्तिगत निवेदन के, दो तीन रातें काली कर पूरी की पूरी स्टेप बाई स्टेप क्लास लगाई और फिर आकर क्लास अटेंड करने का निमंत्रण भी दे गये. ऐसे होती है मित्रों की मदद और ऐसा होता है चिट्ठाकारों का आपसी प्रेम. अरे, कुछ सीखो कि बस हर बात में तलवार खिंचना जरुरी है? :) खैर जाने दो, गाना सुनो.

इस गीत को लिखा मैने है और संगीत दिया है केलिफोर्निया स्थित "साज़मंत्रा" ने. आवाज दी है श्री अंशुमान चन्द्रा ने. यह गीत एक प्रवासी की वेदना दर्शाता है.














खोया मुसाफिर

बहुत खुश हूँ फिर भी न जाने क्यूँ
ऑखों में एक नमीं सी लगे
मेरी हसरतों के महल के नीचे
खिसकती जमीं सी लगे

सब कुछ तो पा लिया मैने
फिर भी एक कमी सी लगे
मेरे दिल के आइने पर
यादों की कुछ धूल जमीं सी लगे

जिंदा हूँ यह एहसास तो है फिर भी
अपनी धडकन कुछ थमीं सी लगे
खुद से नाराज होता हूँ जब भी
जिंदगी मुझे अजनबी सी लगे

कुछ चिराग जलाने होंगे दिन मे
सूरज की रोशनी अब कुछ कम सी लगे
चलो उस पार चलते हैं
जहॉ की हवा कुछ अपनी सी लगे.

--समीर लाल 'समीर'


यहाँ डाउनलोड करें.

जरा बताईये तो सफल रहा या कुछ बदलाव की जरुरत है? Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 24, 2007

दो दिन की बात: आशीष के साथ

पता चला कि खाली पिली और अंतरीक्ष वाले आशीष श्रीवास्तव कनाडा आ रहे हैं. हम अधीर हो उठे, मालूम किया तो खबर आई कि मान्ट्रियल पहुँच चुके है और स्थापित होने का प्रयास कर रहे हैं. हमने फोन किया और कह दिया कि हम मदद के लिये एक ईमेल की दूरी पर हैं और औपचारिकतावश कह दिया कि हमारे पास भी आओ. यहाँ से २५० किमी नियाग्रा है, वो घूम जाओ और टोरंटो भी देख लो. हम फोन पर बात कर रहे थे और पत्नी आँख दिखा रही थी कि किस मेहमान को बुलाये ले रहे हो. एक तो ब्लॉग से वैसे ही परेशान और उस पर से ब्लॉगर मेहमान. हमने फोन होल्ड करा कर इन्हें समझाया कि भई, औपचारिकतावश कह रहे हैं. कोई आयेगा थोड़ी इतने पैसे लगाकर हमसे मिलने. ६०० किमी मायने रखता है, कौन आता है.अब कह तो दिया और आशीष से बात आगे शुरु हुई. लगने लगा कि वो तो तैयार ही बैठे हैं. जब आप खाली हों, हम आ जायेंगे. हमने भी सोचा कि मुसीबत जितनी जल्दी आये और टले, उतना अच्छा तो सप्ताहंत में ही बुलवा लिया और वो भी तैयार हो गये.

टिकिट बुक करवा ली और हमें खबर कर दी कि शुक्रवार को रात में ११.४५ बजे आ रहे हैं. आकर साथ खाना खायेंगे. लो, अब कर लो बात...मेहमान आधी रात में और आकर खाना खायेंगे, बतियायेगे और तब सोयेंगे. हमने भी अपना बार वार साफ सुफ कर लिया कि बंदा थका आयेगा तो पहले एक दो पेग की चुस्की लगायेंगे, बात होगी, कविता भी टिका ही देंगे और फिर देखी जायेगी. ११.४५ पर हम स्टेशन पर थे. गाड़ी पार्किंग में खड़ी कर ही रहे थे तब तक महानुभाव चले आ रहे थे कुकड़ते हुये ठंड में. हमारे लिये गर्मी २० डिग्री और उनकी कुल्फी जमीं जा रही थी जबकि ७००० रुपये का लेदर जैकेट पहने थे (उन्होंने ही बताया:)) और हम हॉफ शर्ट में पसीना बहा रहे थे. पता चला कि १०.४५ से स्टेशन पर इंतजार कर रहे हैं और उन्हें याद भी नहीं कि उन्होंने हमें ११.४५ लिखा था. हमने कहा तो फोन कर देते. तो ये न तो फोन नम्बर साथ लाये थे और न ही मेरा पता...वाह!! हमें लगा कि हम खामखाँ अपने बेटों को लापरवाह समझते रहे. उस खास वक्त की टिक के साथ मेरे मन में मेरा अपने बेटों के लिये सम्मान एकाएक बढ़ गया. बेटों की गैर जिम्मेदाराना हरकतें एकदम से नगण्य सी हो गई.

खैर, लाद लूद कर घर लाये. पता चला कि पीते ही नहीं. तब हमें लगा कि यह बंदा जब इत्मीनान से पूरे होशो हवास में बैठा रहेगा तो हमारी कविता तो सुनने से रहा और यह खाना खाने बैठ गये.बात चली...फिर सो गये.

अगले दिन नियाग्रा गये. सारी दोपहर वहीं गुजारी गई.

आशीष नियाग्रा फॉल्स को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश में:






हमने सोचा, चलो हम भी लगे हाथ एक पोज दे दें. आशीष नया कैमरामैन है इसलिये थोडी डार्क आ गई है हमारी फोटो :) :





और उसके अगले दिन टोरंटो घूमा गया. फोटू वगैरह खींचे गये. चिठ्ठों के बारे में बात हुई, चिट्ठाकारी के बारे में बात हुई. लगभग हर चिट्ठाकर और चिट्ठा कवर किया गया. घर परिवार की बात हुई. आशीष की हमारे पिता जी लंबी लंबी चर्चायें हुई. बहुत मजा आया. इस बीच एक ऑनलाईन कवि सम्मेलन भी था तो उसके बहाने कवितायें भी झिलवा दीं. मजबूरीवश वो कह गये हैं कि अच्छी लगीं.

आशीष सी एन टॉवर के प्रवेश द्वार पर






कुछ फुरसत के क्षण:





एक मजेदार तथ्य: आशीष के घर का नाम पप्पू है, उसके छोटे भाई का नाम पिन्टू और बहन-महिमा. क्या संजोग है...हमारे बडे भाई पप्पू हैं, हम पिन्टू और हमारी बहन का नाम महिमा. क्या कभी कोई सोच सकता है.

दो दिन रुककर आशीष चला गया और घर सूना सूना सा हो गया. अब हम हुये रवि रतलामी के दोस्त तो पूरे समय यही जांचते परखते रहे कि बालक कैसा है? अब जाकर बड़ा संतोष हुआ कि लड़का हीरा है हीरा....रवि रतलामी जी को हीरा दामाद पाने के लिये पुनः बहुत मुबारकबाद...बस यही तो थी हमारी और आशीष की भेंट....उम्मीद करता हूँ कि वो अगली बार और हमारे पास आये अपने प्रवास के दौरान. पुनः बहुत मजा आयेगा. अब पत्नी आँख नहीं दिखा रही. वो भी तुम्हें निमंत्रण भेज रहीं है.

बाकी की दास्तान आशीष सुनायेंगे. आज तो भारत वापस भी पहुँच गये होंगे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जून 21, 2007

कहत समीरानन्द स्वामी जी...

आज स्वामी समीरानन्द द्वारा जनहित में २३ दोहे जारी किये जा रहे हैं एक सुक्ति गान के रुप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं. नीचे प्लेयर पर क्लिक करके आप हमारी पत्नी साधना जी की आवाज में कुछ दोहे सुन भी सकते हैं. बहुत मशक्कत के बाद उनकी आवाज मिल पाई. फुरसतिया जी और राकेश भाई के निवेदन से लेकर हमारे जुड़े हाथ उनको किसी तरह तैयार कर पाये. अब तारीफ वारिफ हो जाये तो आगे और कोशिश की जयेगी.

सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें.

कहे समीरानन्द जी, सुन लो चतुर सुजान
जो गाये यह स्तुति , हो उसका कल्याण.

गुरुवर हमको दीजिये, अब कुछ ऐसा ज्ञान
हिन्दु-मुस्लिम न बनें, बन जायें इन्सान.

वाणी ऐसी बोलिये, हर एक कर्ण सुहाये
मिलिये ऐसे प्रेम से, मन से मन मिल जाये.

मतभेदों की बात पर, बस उतना लड़िये आप
लाठी भी साबूत रहे, और मारा जाये साँप.

पीने जब भी बैठिये, बस इतना रखिये ध्यान
सब साथी हों होश में और न ही बिगड़े शाम.

नेता जी से पूछिये, जब भी हो कुछ बात
देश तुम्हारा भी यही, क्यूँ करते आघात.

पुस्तक ऐसी बाँचिये, जिससे मिलता ज्ञान
कितना भी हो पढ़ चुके, नया हमेशा जान.

लेखन लेखन सब करें, लिखे नहीं है कोय
जब लिखने की बात हो,गाली गुफ्ता होय.

उल्टी सीधी लेखनी, एक दिन का है नाम
बदनामी बस पाओगे, नहीं मिले सम्मान.

शंख बजाने जाईये, मन्दिर में श्रीमान
यह गीतों का मंच है, बंसी देती तान.

कविता में लिख डालिये, अपने मन के भाव
जो खुद को अच्छा लगे, जग के भर दे घाव.

समीरा इस संसार का, बड़ा ही अद्भूत ढंग
वैसी ही दुनिया दिखी, जैसा चश्में का रंग.

नदियों से कुछ सिखिये, इनकी राह अनेक
सागर में जब जा मिलें, हो जाती सब एक.

ऐसा कुत्ता पालिये, जो भौंके औ गुर्राये
न काटे मेहमान को, चोर न बचने पाये.

दान धरम के नाम पर, लाखों दिये लुटवाये
क्षमादान वो दान है, जो महादान कहलाये.

गल्ती से भी सीख लो, आखिर हो इन्सान
जो गल्ती को मान लें, उनका हो सम्मान.

कौन मिला है आपसे और कितना लेंगे जान
जो कुछ भी हो लिख रहे, उसी से है पहचान

सब साथी हैं आपके, कोई न तुमसे दूर
अपनापन दिखालाईये, प्यार मिले भरपूर.

जरा सा झुक कर देखिये, सुंदर सब संसार
तन करके जो चल रहे, मिलती ठोकर चार.

मौन कभी रख लिजिये, थोड़ा कम अभिमान
जितना ज्यादा सुन सको, उतना आता ज्ञान.

बुरा कभी मत सोचिये, न करिये ऐसा काम
दिल दुखता हो गैर का, किसी का हो अपमान.

साधु संत औ’ महात्मा, सब गाते हैं दिन रात
सुक्ति समीरानन्द की , जय हो उनकी नाथ.

जो स्वामी जी कह रहे, नहीं आज की बात
जीवन का यह सार है, हरदम रखना साथ.

--जोर से बोलो-जय स्वामी समीरानन्द की


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कोई भक्त पॉड कास्टिंग में मदद कर दे, तो भगवान उसका भला करे. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 18, 2007

सुनो नारद, अब हम बोल रहे हैं!!

अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ चिट्ठे पढ़ रहा था. अधिकतर पर नारद विवाद वाली गहमा गहमी थी. कुछ मेरी ही तरह के लोग कहते मिल जायेंगे कि हम ऐसे चिट्ठों पर जाते ही नहीं, उन्हें पढ़ते ही नहीं. मैं उनके संयम को नमन करता हूँ और साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मैं एक आम इंसान हूँ, भारत में पला, बढ़ा-वो ही संस्कार हैं. झगड़ा देखकर आनन्द लुटने के लोभ को एक आम भारतीय की ही तरह संवरित नहीं कर पाता हूँ. बहुत मेहनती हूँ और इसीलिये अपने अथक प्रयासों से इसमें शामिल होने से अपने को रोक पाता हूँ. थक जाता हूँ अपने आपको रोकते रोकते और सो जाता हूँ और इसीलिये युद्धकाल में जरा कम ही पोस्ट ले आ पाता हूँ. इस हेतु क्षमा का प्राथी भी हूँ और इस गहन थकान के लिये दया का भी. मगर यह मेरा निजी मामला है, इसलिये चल जा रहा है.

जब चिट्ठे पढ़ें तो हमारे जैसे टिप्पणीपीर टिप्पणियाँ न पढ़ें, यह कैसे संभव है? टिप्पणियाँ पढ़ता हूँ तो पाता हूँ कि जैसे इन सदी के महानायकों ने अपना गृहकार्य पूरा नहीं किया, बस बोलना है इसलिये बोल गये और अपनी बात को वजन देने के लिये कोई पुराने का प्रकरण का उद्धरण दे गये जैसे मोदी विवाद, गुजरात विवाद, हिन्दु-मुस्लिम बहस, मुहल्ला विवाद, अमरीका-समरीका विवाद (जिसमें सागर पुनः टंकी पर चढ़े थे), बैंगाणी बंधु विवाद, नेपकीन प्रकरण आदि आदि.जब देखता हूँ तो लगता है कि अलग अलग लोगों ने, या उन्हीं लोगों ने अलग अलग जगह उसी विवाद को अलग अलग नाम से पुकारा जिससे मुझ जैसे अल्प ज्ञानियों (यह अज्ञानी को सुसंस्कृत भाषा में कहा जाता है-और भाषा का महत्व तो अब सबको ज्ञात है ही) को समझने में बड़ी असुविधा होती है. गल्ती लिखने वालों की भी नहीं है, अब जब कभी यहाँ हुये विवादों को कोई नाम ही नहीं दिया गया तो जिसके जो मन आया वो उसे उस नाम से पुकार गया. सब का भला हो जो अपनी समझ से कुछ तो बता ही जाते हैं वरना अगर कोई लिख देता कि वो उस विवाद में नारद और आप कहाँ थे जो अब चले आये? हम तो समझ ही न पाते कि वो उस क्या और अब क्या? उस का कोई रिफरेंस नहीं और अब जिस पोस्ट पर कहा उसका अभी के विवाद से कुछ लेना देना नहीं, वो तो नारद की तकनिकी समस्या को इंगीत करती पोस्ट है.

खैर, इस बात को मैने क्यूँ उठाया और यहाँ लाकर क्यूँ रोक दिया, इस पर एक बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी देकर फिर शुरु होते हैं.

क्या आपने कभी गौर किया है कि अटलांटिक में और पेसेफिक में जो समुन्द्री तूफान आते हैं, उनके नाम जैसे रीता, कटरीना, बिल आदि कैसे रखे जाते हैं. कौन इनको नाम देता है और कैसे देता है. दरअसल, १९५३ के पहले तक इन्हें इनके लेटिट्यूड और लोन्गीटयूड से जाना जाता था, कोई नाम नहीं. मगर इससे एक आम आदमी को समझने और इस विषय में बात करने में असहूलियत होती थी. तब १९५३ में राष्ट्रीय मौसम विभाग के समुन्द्री मौसम वैज्ञानिकों ने इनके नामकरण की प्रथा शुरु की.शुरु में जैसा की पानी के जहाज को मादा श्रेणी में रखा गया है, इन तूफानों का नामकरण भी महिलाओं के नाम से ही हुआ. इसका और एक पुख्ता कारण रहा होगा कि इन तूफानों के मूड का कुछ पता नहीं- अभी चुप बैठे हैं, एकाएक भड़के तो ऐसा कि सब तहस नहस. क्या पता कब कौन सी बात और किसकी बुरी लग जाये.

अटलांटिक महासागर के तूफानों के लिये ६ लिस्टें बनाई गईं. हर साल के लिये एक-जैसे जैसे तूफान आते गये, नाम अलग होते गये. जैसे अगर रीता २००४ की लिस्ट में है और ७ वें नम्बर पर है तो २००४ में आया ७वां तूफान रीता कहलायेगा. उसके जाने के बाद अब रीता नाम का तूफान इसके सातवें साल में ही आ सकता है, क्यूँकि अगले ६ सालों की लिस्ट तैयार है. जो ६ साल बाद फिर से शुरु होती है. हर लिस्ट में २१ नाम है. ऐसा ही कुछ पैसेफिक में आये तूफानों के लिये भी इंतजाम है. अब मान लिजिये कि एक साल २१ से ज्यादा तूफान आ गये तब क्या होगा? आम धारणा के अनुरुप क्या अगले साल की लिस्ट इस्तेमाल कर लेंगे? नहीं!! इस साल की लिस्ट इस साल के लिये और अगली अगले साल के लिये. तब ऐसे में तय पाया गया कि इस दशा में नेशनल हेरिकेन सेन्टर ग्रीक गणनावली का इस्तेमाल करते हुये उन्हे अल्फा, बीटा, गामा आदि आदि नामों से पुकारेगा.

कुछ रोचक तथ्य इस विषय में और भी है जैसे १९७९ में नारी स्वतंत्रता टाईप आंदोलनकारियों के आगे धुटने टेकते हुये इसमें पुरुष नाम भी शामिल किये गये..एक महिला फिर एक पुरुष, फिर एक महिला फिर एक पुरुष. चलो, पुनः महिलाओं की जीत हुई बहुत नमन महिला शक्ति को.

दूसरा यह कि जब कोई तूफान अत्याधिक कोहराम मचा देता है और बहुत लोग मारे जाते हैं तो उसे रिटायर कर दिया जाता है यानि वो भविष्य में फिर कभी नहीं आयेगा. जैसे कि कटरीना जिसने न्यू ऑरलिन्स में ऐसा मंजर दिखाया कि उसके लिये ऐसा अप्रिय मगर जरुरी निर्णय लेना पड़ा और उसे सेवानिवृत कर दिया गया. इस बात पर कोई विवाद की सुनवाई नहीं होगी. आप इसे तानाशाही मानें तो या लोकतांत्रिक मानें तो. वो रिटायर हो गया और अब नहीं आ सकता, बस्स!! चाहे लाख हल्ला मचा कर देख लो!! :)

और इन तूफानों को नाम देने के पहले उन्हें उष्णकटिबंधीय दबाव के कारण उठे हुये तूफान होना जरुरी है, तभी उन्हें नाम दिया जा सकता है.

तब अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ कि क्यूँ न हम भी अपने चिट्ठाजगत में उठे विवादों को एक स्तर पर पहुँच जाने के बाद नाम देना शुरु कर दें. सब को सुविधा हो जायेगी. लोग उस नाम का लेबल अपनी पोस्ट में लगा लेंगे. सर्च भी आसान हो जायेगी. टिप्पणी में रेफर करना भी सरल. अभी टाईप के विवाद को रिटायर भी कर देंगे...सब साफ सुथरा, निर्मल और सरल. गैर तानाशाही, लोकतांत्रिक.

मैं प्रस्तावित करता हूँ कि फिल्म हिरोईनों के नाम पर इनका नामकरण किया जाये. सुन रहे हो, नारद!!!

रेखा नाम दे दें क्या इस नये वाले को-रिटायर करने की सुभीता को देखते हुये. :)

आप सबके विचार आमंत्रित हैं. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, जून 15, 2007

ऑनलाईन कवि सम्मेलन-१६ जून, २००७

ई कविता और 'हिन्दी सीखो' के संयोजन एवं जनप्रिय कवि श्री अशोक चक्रधर जी के मार्ग दर्शन में काव्य गोष्ठी को नया आयाम देने का अनूठा प्रयास:

ऑनलाईन कवि सम्मेलन

"दूर रह कर भी पास होने का अहसास"

दिनाँक: १६ जून, २००७ शनिवार को भारतीय समयानुसार सायं ७:३० बजे और न्यूयार्क में सुबह १० बजे (EST)



आप सब अधिक से अधिक संख्या में ऑनलाईन होकर श्री अशोक चक्रधर एवं अन्य कवियों की रचनाओं का आनन्द उठायें.

इसी अवसर पर १३ जुलाई से १५ जुलाई, २००७ तक न्यूयार्क, अमेरीका में आयोजित होने वाले

के विषय में भी विशेष जानकारी दी जायेगी.

सम्मेलन की आयोजन समिति के सदस्य आप के प्रश्नों के ज़वाब के लिये उपलब्ध होंगे

इस अनूठे कार्यक्रम में भाग लेने के लिये यहाँ क्लिक करें.

अन्य जानकारी के लिये आप मुझे या ekavita1@yahoo.com पर संपर्क कर सकते हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 11, 2007

वैसे तो मुझको पसंद नहीं

मित्रों, यह कोई कविता नहीं और न ही स्पष्टीकरण है.बस एक मजबूर का मजबूरियों का बखान है.
मजबूरी में आदमी कितना विवश हो जाता है. जो कार्य उसे नहीं पसंद, वो तक करना पड़ता है.जिस मूड़ में लिखी गई है, उसी मूड में पढ़िये और आनन्द उठाईये. इस मजबूरी में अन्तिम छंद चिट्ठाकारी को समर्पित है.





जब चाँद गगन में होता है
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.



चिट्ठाकारी विशेष:

जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.


--समीर लाल 'समीर'

चित्र साभार: गुगल महाराज Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 04, 2007

इक टूटा सा संदेश

एक मेरा प्रिय मित्र कहता है कि आजकल हास्य कुछ ज्यादा हो रहा है तो दूसरा कहता है कि चलो अच्छा है लेख छोटा लिखा. यह साईज पसंद आई, न ज्यादा लम्बा न ज्यादा छोटा. अन्य कहता है कि बड़ी जल्दी खत्म हो गया. सबको पढ़ कर इत्मिनान से आपको पढ़ने आये और आप तो शुरु हुये और खत्म हो गये. जैसे मुन्ना भाई के हॉस्टल का कमरा. अब आप बताओ, क्या करें. हास्य न लिखें कि छोटा न लिखें कि लंबा न लिखें, चिट्ठों पर न लिखें. हम तो अटक से गये हैं. हमें तो साजिश नजर आ रही है कि लोग लिखवाना ही बंद करवाना चाह रहे हैं. जो करो, उसमें मीन मेख. न ये करो न वो करो. क्या लालू समझे हो कि भूसा खायें और डकारे भी न!!

अरे हमारा भी तो कुछ मन करेगा सो करेंगे. तुम कुछ सोचो. अभी समझ नहीं पाये हो हमें. हम बहुत जबरी आईटम है-आईटम गर्ल नहीं राखी सावंत टाईप. मगर जब अपनी पर उतर आयें तो उससे से भी जमकर ठूमका लगाते हैं. लो अब रोना लेकर आये हैं...मन खुश हो जायेगा तुम्हारा कि बहुत हास्य हो गया. बहुत लम्बा हो गया. चलो सब से निजात...अब पढ़ो इसे..झेलो....टिपियाना जरुर...वरना हम बुरा मानते हैं और फिर और जम कर झिलायेंगे...हाईकु लिख मारेंगे ५१ कम से कम...बंद थोड़े करेंगे लिखना...... हा हा

बुरा मानने के चक्कर में कूछ न लिखें तो लगता है कि सबसे दूर होते जा रहे हैं. तब सोचा यही लिख दें कि कुछ नहीं लिख रहे हैं. सब तो हमारी तरह सत्यवादी होते नहीं. अगर हो जायें तो आधे से ज्यादा नेता यही कहते नजर आयें कि कुछ नहीं कर रहे हैं मगर देश चलता जा रहा है.

खैर, उतना भी निकम्मापन अभी हाबी नहीं हुआ है, तो सारी टूटी कवितायें आपकी सेवा में ऊडेल देता हूँ. शायद पूरी न लगें मगर अपने संदेश पूरे दे देंगी, यह मेरा आपसे वादा है. अगर संदेश मिले तो टिपपणी करके सूचित करना :)


लाचारी

रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है.

वो जानती है
भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा.

कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा.




पलायन


गाँव की कच्ची सड़कों पर
स्वच्छंद घूमता रामू!!
तेज रफ्तार भागती
कार की चपेट में आ
अपना एक पांव गवां कर
शहर की सड़कों पर चलना
सीख गया है....

फिर सोचता है
शहर की किस बात पर
गाँव का हर बालक आज
रीझ गया है.




महत्वाकांक्षा

सीमित डोर से बंधी पतंग
सामने असीमित आसमान
मुंडेर पर चढ़
कुछ तो ऊँची हुई उड़ान...

इस चाहत का अंजाम
बैसाखियों पर
लटकता बचपन
और
चेहरे पर बेबस मुस्कान!!




दहेज

मिट्टी के तेल की लाईन में
खड़े लोगों को देख
वो डर जाती है....

दहेज की वेदी पर बलि चढ़ी
उसे अपनी बड़ी बहन
बहुत याद आती है!!



शुद्ध

गाँव के खाने से
बहुत घबराता हूँ...

शहर में रहता हूँ, न!
विशुद्ध नहीं पचा पाता हूँ!!



आरक्षण

ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूची में
खड़ा है....

आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पड़ा है....



इंसान

इंसान
अब रोशनी से
घबराता है....

रोशनी में
चेहरा जो साफ
नजर आता है....



कवितायें

देख कर हालत जहां की
संवेदनायें सब
सो गई हैं

और मेरे दिल से उठती
कवितायें अब
खो गई हैं.


--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 31, 2007

"हास्य-दर्शन"- कवि अभिनव का जयकारा

"हास्य-दर्शन" - कवि अभिनव की प्रभावशाली प्रस्तुति - एक समीक्षा

भाई अभिनव शुक्ल का नाम यूँ तो किसी परिचय का मोहताज नहीं है. आप नियमित उन्हें निनाद गाथा ब्लॉग पर पढ़ते और सराहते आये हैं. यह मेरा सौभग्य ही है कि मेरे पहले कवि सम्मेलन में मंच प्रस्तुतिकरण के समय वो मेरे बाजू में बैठे मेरा हौसला बढ़ाते रहे. हमको अपना बड़ा भाई मानने वाले स्नेही अभिनव ने उसी कवि सम्मेलन के दौरान अपनी नई सी.डी. "हास्य-दर्शन" भेंट की. हमने बड़ी खुशी खुशी अपना अधिकार जताते हुये ले भी ली और धन्यवाद भी शायद नहीं दिया. फिर कभी दे लेंगे सोचते हुए. तब से अब तक वो सी.डी. कई बार सुन चुका हूँ, मगर मन ही नहीं भरता तो सोचा कि धन्यवाद स्वरुप उसकी समीक्षा ही पेश कर दी जाये.



'हास्य-दर्शन' में अभिनव की १९ कविताओं को उनकी अपनी आवाज़ में सुना जा सकता है। इसमें हास्य, व्यंग्य, राष्ट्रीय चेतना तथा जीवन दर्शन से जुड़ी हुई कविताओं को बहुत सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपनी इसी विविधता के कारण यह एलबम हास्य से दर्शन तक की यात्रा तय करता प्रतीत होता है। 'हास्य-दर्शन' का विमोचन 'अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति' के रजत जयंती समारोह में अमेरिका की राजधानी वाशींगटन डी सी में हुआ। 'हास्य-दर्शन' को कवि अभिनव की प्रथम काव्य प्रस्तुति होने का गौरव भी प्राप्त है। अभिनव की कविताओं में जो लोक तत्व है वह अनुकरणीय है। उन्होंने बड़ी सहज भाषा में जटिल से जटिल भावों को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत किया है।

जिन्होने अभिनव को मंच पर बोलते सुना है, वे सभी जानते हैं कि उनमें भाषा की गहनता तथा प्रस्तुति का सौंदर्य एकमएक हो गया है। मैं अभिनव के साथ 'नियाग्रा फाल्स कवि सम्मेलन' के मंच पर काव्य पाठ कर चुका हूँ। मैंने वहाँ देखा कि किस प्रकार श्रोताओं को सम्मोहित करते हुए अभिनव अपने पिटारे में से एक के बाद एक उत्कृष्ट रचना निकाल रहे थे। एक ओर जहाँ उनमें मंचीय कवियों की अदाएँ हैं तो वहीं दूसरी ओर भीषण साहित्यिक रचनाकारों की गम्भीरता भी उनके व्यक्तित्व का अंग है। सामान्य से सामान्य विषय पर बात करते करते वे न जाने कब गहनता के महासागर में प्रवेश कर जाते हैं। यह विषयांतर तथा विविधता अभिनव के काव्य पाठ को तथा उनकी रचनाओं को समृद्ध करती है।

हास्य दर्शन हमें हास्य से दर्शन तक की एक यात्रा पर ले जाता है। एलबम का प्रारंभ भाषा की भावपूर्ण वंदना, "राष्ट्रभाषा हिंदी" नामक रचना से होता है तथा फिर अभिनव हमें हास्य-व्यंग्य लोक में ले जाते हैं। एलबम के अंत में चार गम्भीर कविताओं को स्थान दिया गया है, मेरे विचार से ये कविताएँ बहुत ज़रूरी थीं क्योंकि इन्हीं से श्रोता को दर्शन की अनुभूति होती है। एलबम के दो पड़ाव हैं, एक जब हास्य रचनाएँ व्यंगय में विलीन हो जाती हैं तथा दूसरा जब व्यंग्य रचनाएँ दार्शनिकता को स्थान देती प्रतीत होती हैं। सुस्पष्ट और कानों को अच्छी लगने वाली सुमधुर प्रवाहपूर्ण भाषा तथा सरल प्रस्तुति के कारण कवि सामने बैठ कर आपसे संवाद करता सा प्रतीत होता है।

अभिनव की बहुआयामी काव्य प्रतिभा तथा उत्कृष्ट प्रस्तुति के कारण 'हास्य दर्शन' काव्य प्रेमियों में खासा लोकप्रिय हुआ है। मेरी कार में भी 'हास्य दर्शन' जब तब बज कर मुझे काव्य लोक की यात्रा करवाता रहता है। अगली बार जब आप अभिनव से मिलें तो उनके आटोग्राफ सहित 'हास्य दर्शन' की सीडी को भी अपने साथ संजो लीजिएगा।

एलबमः 'हास्य-दर्शन' - A journey from laughter to philosophy.
कविः अभिनव शुक्ल
परिकल्पनाः अखिल अग्रवाल
परिचयः डा आदित्य शुक्ल
चित्रः कल्पा रमैया
फोटोः शबरेज़ इरफान खान
सर्वाधिकारः दीप्ति शुक्ल

अनुक्रमः

१ राष्ट्रभाषा हिंदी - (हिंदी भाषा से कवि के संबंध की अंतर्गाथा।)
२ वैलेंटाइन डे - (घनाक्षरी छन्दों में प्रस्तुत विनोदपूर्ण प्रेम संदर्भ।)
३ रेल-यात्रा - (बरेली से लखनऊ तक की रेल यात्रा का व्यंग्यपूर्ण वर्णन करती हास्य कविता।)
४ रसगुल्ला - (हलवाईगिरी करने की आनंददायक संस्मरणात्मक कविता।)
५ हमें तो बहुत पैसा कमाना है - (प्लास्टिक समाज पर प्रहार करती सटीक व्यंगय रचना।)
६ मुट्टम् मंत्र - (चेतावनीः स्वास्थय के प्रति जागरुकता मोटापे के लिए हानिकारक है।)
७ इंटरव्यू - (इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के साक्षात्कार पर मज़ेदार हास्य कविता।)
८ वर्लड वार - (आखिर क्यों होती है।)
९ जेब में कुछ नहीं है - (प्रेम के पीछे के सच का खुलासा।)
१० हम तो आई आई एम जाएँगे - (संसद और आई आई एम के मध्य झूलती व्यंग्य रचना।)
११ कोई तो जीवित है - (संवेदनहीनता पर चुटीला व्यंग्य।)
१२ मोटा काग़ज - (शिक्षा व्यवस्था पर क़रारा व्यंग्य।)
१३ साहस - (जोश और हिम्मत का संचार करती उत्साहपूर्ण कविता।)
१४ मशाल दीपक और चिंगारियाँ - (चिंगारी से मशाल बनने की प्रेरणा देती छोटी सी रचना।)
१५ एक स्वप्न - (राष्ट्र भक्ति से परिपूर्ण ओज कविता।)
१६ अंदर से बाहर तक - (तुलनात्मक अध्यनात्मक कविता।)
१७ हम भी वापस जाएँगे - (प्रवासी मनोभावों की सशक्त प्रस्तुति।)
१८ नदी के दो किनारे - (जीवन को प्रकृति से जोड़ती हुई अद्भुत कविता।)
१९ पिता का जन्मदिवस - (बुज़ुर्ग पिता की अवस्था का मार्मिक चित्रण।)




भाई अभिनव और उनके सशक्त प्रस्तुतिकरण की एक झांकी आप यहाँ भी देख सकते हैं. इसी प्रस्तुतिकरण से आप समझ जायेंगे कि हमें अभिनव से इतना लगाव क्यूँ है, आखिर मोटापे का घोर समर्थक जो है. अभिनव के उज्जवल भविष्य के लिये अनेकों शुभकामनायें. उसका नाम होगा तो हमारा भी तो करवायेगा, यह हम तय मान कर चल रहे हैं. :)


पुनश्चः : इस समीक्षा के छप जाने पर अभिनव भाई ने घोषणा की है कि जिसे भी यह सी.डी. चाहिये, उनके हस्ताक्षर के साथ, वो यहाँ टिप्पणी के माध्यम से प्राप्त कर सकता है. हर संभव प्रयास होगा कि आप को सी.डी. जल्द मिले, जब भी आपसे अभिनव भाई की मुलाकात होगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 27, 2007

तुम....सिर्फ तुम

चलो, यह "तुम" शब्द बहुत व्यापक है, फिर आत्मिय भी. और सच में तुम तो तुम हो और तुम्हारे लिये यह गीत:

तुम....

आज फिर जब दो घड़ी को, साथ तेरा मिल गया
क्या वजह थी कौन आकर, ओंठ मेरे सिल गया
बात मेरे मन की मेरे मन में घुट कर रह गई
तू उठा चल कर तो तेरे, साथ मेरा दिल गया.

बाग से आती है खुशबू, उड़ पवन के साथ में,
मैंने समझा तुम खड़ी हो, आज मेरे पास में,
रात भर खिड़की से आ के, चाँदनी छूती रही
यों लगा तुम घुल रही हो,एक उस अहसास में.

मेरे ख्वाबों मे जो बसती, एक वही तस्वीर हो तुम
मेरे जीवन की राहों की, बन गई तकदीर हो तुम
मैं तुम्हें पाऊँ, लिये ख्वाइश सदा जलता रहा हूँ
डूब पाऊँ त्राण जिसमें, उस नदी का नीर हो तुम.

छंद सब चुन कर तुम्हारे,गीत अब यह गा रहा हूँ
खुद उऋण होने को तुमसे,प्रीत करता जा रहा हूँ
आज का यह दौर कैसा, प्रेम भी कर्ज़ा हुआ अब
प्यार टुकड़े, किश्त में करके तुम्हें लौटा रहा हूँ

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 24, 2007

हॉट स्पॉट यानि....

हमेशा हास्य व्यंग्य वगैरह लिखते लिखते ईमेज बड़ी खराब होती जा रही है. सब समझते हैं कि हमें सिवाय ठिठोली के और कुछ आता ही नहीं. जो मिलता है बस मजाक. हमारी अपनी सोच से की गई गंभीर बातें भी मजाक में उड़ा दी जाती हैं. हमसे आधी उमर के लोग चैट पर हमसे कहते है कि और मामू, अभी भी टुन्न हो कि होश में..क्या चल रहा है? लालू की सी स्थिती हो गई है. अब रेल्वे कितना ही बढ़िया काम करे या कोई बेहतरीन योजना घोषित करे, सब एक बार को तो हंस ही देते हैं. इसीलिये आज हमने सोचा है कि बीच बीच में गंभीर चिंतन भी किया करेंगे. इसी के मद्दे नजर आज हम आपको पूरी क्लास लगा कर पढ़ायेंगे:

फुरसतिया जी आये हैं , ले कर कलम दवात
अखबारों मे वह छापते इंकब्लॉगिंग की बात.
इंक ब्लॉगिंग की बात, हस्त लेखन से होती
अरमानी के सूट पर, बाँध ली उन्होंने धोती *
कहत समीर कि सीखो इसमें लिंक लगाना
समझ तुम्हें आ जाये, तब करके दिखलाना.
-समीर लाल ‘समीर’
* अब कम्प्यूटर सामने रखा हो और आप यूनिकोड में टंकण में भी माहिर हों, फिर भी हाथ से लिखकर उसे कम्प्यूटर पर चढ़ाने में तुले हों, इसे अरमानी सूट पर धोती पहनना नहीं कहेंगे तो और तो कोई उपमा मुझे नहीं सूझती!!







उपरोक्त तस्वीर में अगर आप फुरसतिया जी के नाम पर जाकर चटका लगायेंगे तो वह आपको उनके चिट्ठे पर ले जायेगा, जहाँ उन्होने ऐरिहासिक अखबार निकाला है और यदि इंक ब्लागिंग पर चटका लगायें तो वो देबाशीष के चिट्ठे पर, जहाँ उन्होंने इंक ब्लॉगिंग से हम सबका परिचय कराया था. जब सब के पास ले जा रहा है यह चटका, तो हम कौन पाप किये हैं? हमारे नाम पर भी लगा कर देख लो. यह सब संभव होता है, हाईपर लिंक की ही तरह हॉट-स्पाट लिंक देकर. जिस तरह से आप टेकस्ट में हाईपर लिंक देते हैं, वैसे ही चित्र में अमुक स्थान पर हॉट-स्पाट लिंक. और इसे लगाने के औजार के रुप में मैं माईक्रो सॉफ्ट के फ्रंट-पेज (Microsoft Front Page) का इस्तेमाल करता हूँ, जो कि माईक्रो सॉफ्ट ऑफिस के साथ आमूमन स्थाफित रहता है. अगर आपके पास फ्रंट पेज नहीं है, तो आपका सफर यहीं खत्म कर लें. आपने यहाँ तक पढ़ा, आपका बहुत आभार और साधुवाद. अन्य औजारों से भी इसे लगाया जा सकता है, मगर हम यहाँ सिर्फ फ्रंट पेज धारकों को समझा रहे हैं, माईक्रो सॉफ्ट की चमचागिरी में कि शायद उनकी नजर पड़ जाये तो लेपटाप वगैरह कुछ ईनाम में दे दें.

क्रमवार दिशा निर्देश:

१.एक हस्त-लेख (छोटा सा-मात्र सलाह है. बाकि आपकी इच्छा, चाहो तो उपन्यास लिख लो) (ध्यान रहे उसमें उड़न तश्तरी का नाम आये, उसी का लिंक लगाना सिखाऊंगा, इस आलेख में :)) तैयार कर लो.
२.फिर उसकी तस्वीर ले लो (स्कैनर से या कैमरा से, ये आपकी इच्छा पर)
३.फिर उसे किसी फोटो वाली साईट पर चढ़ा लो (जैसे कि फ्लिकर- फ्री है न भाई) .साथ ही सरलता के लिये अपने कम्प्यूटर भी एक कॉपी सेव किये रहो. आगे काम आयेगी.
४.वहाँ से उसका लिंक नोट कर लो (और अपने पास धरे रहो, वो भी अभी आगे काम आयेगा-उस समय मांगूगा तो हे हे मत करने लगना. सम्भाल कर रखो.)
५. अब फ्रंट पेज खोल लें.
६. फिर File> New> Blank Page खोल लें.
७.इस पन्ने के Design View में Insert>Picture>From File क्लिक करके कंडिका ३ में जो कॉपी आपने अपने कम्प्यूटर में सेव की है, उसे खोल लें.
८. अब वह फोटो फ्रंट पेज में खुल जायेगी. (यह अपने आप हुआ, आपकी मेहनत कंडिका ८ का परिणाम, इस कंडिका के लिये आपका योगदान भारत के विकास में नेताओं के योगदान के सम-तुल्य माना जायेगा.)
९.अब फ्रंट पेज में View>Toolbars>Pictures पर क्लिक कर दें.
१०.इस नीचे तस्वीर की तरह की टूल बार आपको दिखने लगेगी.




११. इसमें दायें से पांचवा जो आयताकार चित्र दिख रहा है, उसे क्लिक करें.
१२. फिर माऊस को चित्र पर ले जाकर समीर (आपने शायद उड़न तश्तरी लिखा है, चलेगा, उसी को कवर कर लो) का नाम को इस आयत से कवर कर लो. जैसे ही आप माऊस रिलिज करेंगे, अपने आप हाईपर लिंक का बक्सा खुल जायेगा, वहाँ http://udantashtari.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html का लिंक दे दें.



१३. अब फ्रंट पेज के कोड वाले पन्ने पर जाकर फोटो का लिंक C:\\ या जो भी आपके कम्प्यूटर वाला है, को बदल कर कंडिका ४ वाला लिंक, जो हम कहे थे धरे रहो, आगे काम आयेगा, वो लगा लें.
१४. अब यहाँ से '<'Body'>' के बाद से '<'/Body'>' के पहले तक का कोड कॉपी कर लें.
१५. अब इसे ब्लॉग के पोस्ट वाले पन्ने पर पेस्ट कर दें. बस!! हो गया.
१६. अब अपनी पोस्ट पर जाकर लिंक पर क्लिक करें.

वाह, पहुँच गये उड़न तश्तरी पर. अब वहाँ कमेंट कर दें और फिर जो मर्जी सो करो. हमें क्या!!

आशा है समझ आ गया होगा. अगर नहीं आया तो पूछने में शरमाना मत. सबका बुद्धि पर समान अधिकार थोड़े ही न होता है. कोई जल्दी समझ जाता है, कोई देर से और कोई नहीं भी समझ पाता. यही सब देखकर ईश्वर के कहीं न कहीं होने की भावना बलवती हो जाती है. :) अगर कमेंट नहीं करोगे तो हम समझेंगे कि आपको समझ नहीं आ पाया और ट्रेफिक काउन्टर से हमें मालूम तो चल ही जायेगा कि आप आये थे...हा हा!!!


नोट: वैसे अब तक की हिन्दी इंक ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी पहली पोस्ट कनाडा अमेरिका न जाओ... का सेहरा हमारे फुरसतिया जी के सिर पर जाता है. एक न एक दिन उन्हें इसके लिये पुरुस्कार से नवाजा जायेगा. वो तैयारी रखें. आज से वो ईनामी कहलाये.

अब आज की क्लास खत्म. अब चलो, थोड़े जाम-शाम हो जायें. ऐसे मास्साब फिर नहीं मिलेंगे, जो क्लास के बाद कॉकटेल पिलवायें. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मई 21, 2007

अश्वम जेलम गच्छन्ति

हफ्ते भर पहले समाचार सुनता था:

छ्त्तीसगढ़ के किसी शहर में एक न्यायाधिश महोदय को टहलते वक्त किसी आवारा घोड़े ने काट लिया. इससे नाराज माननीय न्यायाधिश महोदय ने शहर के सभी आवारा घोड़ों को पकड़ने का आदेश दे दिया. नगर निगम के कर्मचारी भाग भाग कर घोड़ों को पकड़ने लगे. आनन फानन में इनाम भी घोषित कर दिया गया: प्रति घोड़ा पकड़वाई: रुपये ३०० मात्र. ७ घोड़े पकड़े जा कर कांजी हाऊस (नगर निगम द्वारा संचालित आवारा पशुओं की जेल) में बंद हैं.




अब यहाँ तक तो समाचार हो गया, जो कि एक सत्य समाचार है. अब आगे उड़न तश्तरी की उड़ान:

इस घटना से मेरी घोड़ों का मात्र गधों के बड़ा स्वरुप होने की सोच को और अधिक बल मिला है.

अरे, काटने के पहले देख तो लो कि किसको काट रहे हो? कोई आम आदमी को काट लेते तो वो आदमी ही हँसी का पात्र बनता. सब कहते कि अब तक उसका दुलत्ती मारना या अगली दो टांगों से धौल जमाना तो सुना था, यह घोड़ा काटना तो पहली बार सुना. भई, कुत्ता काटते तो सुना है. जरुर तुमने ही कुछ शरारत की होगी उसके मुँह के पास जाकर और उसने काट लिया होगा. वरना आजतक किसी और को तो काटा नहीं. कोई कहता कि तुम्हारा बाल देखकर तुम्हें घास का मैदान समझ लिया होगा और बस चरने घुस गया होगा. इसीलिये कहते हैं कि टहलने निकलो तब भी बाल वाल संवार लो जैसे पार्टी वगैरह में जाते हो. टहलने तो सुबह सुबह ऐसे निकलते हो कि मानो अभी भी बिस्तर में ही डले हो. ऐसी बातें करते लोग.

अब दिमाग तो है नहीं, आखिर ठहरे तुम गधे का बड़ा स्वरुप. आव देखा न ताव और इतने बड़े आदमी को काट लिया. तो बंद तो होना ही था. गल्ती तुम्हारी और सारी कौम बदनाम हुई. सब बंद हो गये बेचारे वो भी ईनामी घोषित होकर. हल्का फुल्का अपराधी तो फिर भी चुपचाप जेल होकर लौट आता है, किसी को पता नहीं चलता और आकर फिर भीड़ में शामिल होकर आम सा नजर आने लगता है. मगर ईनामी-बाबा रे बाबा!! आओ अब निकल कर. देखना मिडिया कितना उछालता है. सबकी टीमें पहुँच गई है वहीं कांजी हाऊस के दरवाजे पर बैठी हैं. अब देना जबाब. एक से एक तुमसे भी बड़ी बड़ी बेवकूफी की बातें पूछेंगे. जबाब दे देकर तुम थक जाओगे घोड़ा होना के बावजूद भी, जनता सो जायेगी मगर वो पूछने से नहीं थकेंगे. सारे देश के घोड़े कुख्यात हो जायेंगे सिर्फ तुम्हारी एक बेवकूफी से. खैर, अब जो होगा सो झेलना. बस शुभकामना यही है कि सही सलामत लौट आओ. कहीं एन्काऊन्टर न हो जाये, बहुत फैशन में है. यही चिन्ता खाये जाती है.

वैसे, काश सभी रक्षक ऐसे होते तो दुनिया कितनी खुशनुमा जगह होती. एक गुंडा कुछ हरकत करता. आदेश आता कि सारे गुंडों को बंद कर दो. सब गुंडे एक दुसरे की गुंडागिरी रोकते नजर आते कि कहीं उसके चक्कर में वो भी न बंद हो जाये. वही हाल चोरों, हत्यारों का होता. और सबसे बढ़िया तो नेताओं का होता. सब एक ही जगह मिल भी जाते पकड़ने के लिये. एक को आजीवन होती, पूरी कौम अंदर, हमेशा के लिये. बड़ा आराम लगा सोच कर ही.

फिर सोचता हूँ कि अगर यह सरकारी ३०० रुपये प्रति घोड़ा पकड़वाई स्किम रामचन्द्र जी के जमाने में आ गयी होती तो लव कुश अश्वमेघ यज्ञ वाला घोड़ा पकड़वा कर एक टाईम तो कंद मूल से निजात पाकर पिज्जा वगैरह खा ही लेते. कितने खुश होते बेचारे बच्चे. लेकिन सरकारी स्किमों से कब किसी जरुरतमंद का लाभ हुआ है सो उनका भी नहीं हुआ. कोई आश्चर्य नहीं.

एक विचार और आता है कि अगर ये कांजी हाऊस नगर निगम की जगह पुलिस विभाग के तहत आता होता तो ७ की जगह कम से कम १०३ घोड़े पकड़ में आते. ७ तो यही वाले. ३ रज्जन मियाँ के टांगे वाले घोड़े, उन्हें भी यह उसके घर से धमका के ले आये होते. घर में बंधे थे बेचारे मगर यह उनको आवारा घूमता दर्शाते. वही हाल होता मश्ताक भाई की २ शादियों वाली घोड़ियों का. मश्ताक भाईजान जिद्द करते तो वो भी एक अलग केस में धारा १५१ के तहत बंद पाये जाते. बाकि के ९१ में ईंट भट्टे के ५४ और धोबी घाट के ३३ गधे और बेंदू किसान के ४ खच्चर. यह गधे और खच्चर भी डंडे की भाषा समझते हैं और वो भी पुलिसिया डंडे-बड़े आराम से कहते कि हम घोड़े है. आप भी कहाँ सोच में पड़ गये कि लोग पहचान लेंगे. कोई नहीं पहचान पायेगा. सब बंधकों के ३०० रुपये के हिसाब से बने ३०९००. इसका हिस्सा बांट लगेगा. क्या अब भी आप सोचते हो कि कोई पहचान पायेगा. हवलदार साहब का तो इसमें जो हिस्सा बनेगा सो तो है ही और उपर से बोनस में मश्ताक भाई को छोड़ने के २००० और. वाह भई वाह!!!




उपरोक्त आंकड़ों का प्रतिशत आप किसी भी कारागृह के कार्यालय से पुष्टीकरण करवाने के लिये स्वतंत्र हैं. बहुत अंतर नहीं मिलेगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, मई 18, 2007

चिट्ठाकार मिलन: रमन कौल जी पधारे द्वार हमारे

रविवार को दिन में रमन भाई का फोन आया कि सोमवार शाम को टोरंटो आ रहे हैं. हमें बड़ी प्रसन्नता हुई और हमने आग्रह किया कि भाई, हमारे ही घर रुकें. अब रमन जी संकोची जीव और दूसरा, हमसे पहले कभी मिले भी नहीं थे तो सोचे कि हम कहीं घर पर रुकवा कर सारी शाम कवितायें न झिलवा दें. कहने लगे, आयेंगे जरुर मगर ठहरेंगे अपने रिश्तेदार के यहाँ. हम समझ तो गये कि क्या वजह है मगर फिर भी सोचा कि शाम को आयेंगे और खाना खाने को हम जबरदस्ती रोक ही लेंगे. इस बीच ७-८ की जगह २-३ कविता तो सुना ही डालेंगे मौका निकाल कर. हमें इसीलिये संकोची लोग अच्छे लगते हैं कि खुलकर कविता न सुनाने के लिये बोल नहीं पाते. बस फिर क्या था, हमने बेसब्री से सोमवार शाम का इंतजार करना शुरु कर दिया. ३ बढ़िया वाली कविता कंठस्थ कर लीं और एक गजल का भी तर्रनुम में गाने का रियाज कर लिया. १० और कवितायें प्रिंट करके रख लीं ताकि अगर रुकने के लिये मान गये तो वो इसी यज्ञ में आहूति चढ़ा देंगे.

सोमवार सारा दिन दफ्तर में प्रफुल्लित घूमते रहे. कोई काम नहीं किया रमन भाई को कविता सुनाने की उमंग में. शाम को घर लौट कर बस फटाफट स्नान किया. बढ़िया क्रिम-पाउडर वगैरह लगाकर बाहर बरामदे में ही बैठ गये सड़क पर नजर गड़ाये. आखिर फोटो और कविता सुनाते समय विडियो लेने का भी प्लान बनाये थे, इसीलिये क्रिम-पाउडर.

अति उत्साह में हम भूल ही गये कि अगला भी वरिष्ठ चिट्ठाकार है. सारे इंडीब्लागीज विजेताओं से पहले से मिला जुला है. सब गुर समझता है. हम तो खुद को ही होशियार समझे बैठे थे. शाम ७ बज गये इंतजार करते, रमन भाई नहीं आये और न ही उनका फोन. हमने इस बीच दो तीन बार फोन उठाकर चेक भी कर लिया कि ठीक काम तो कर रहा है कि नहीं. मन को तसल्ली देते रहे कि लम्बा रास्ता है ९०० किमी का, शायद कहीं समय लग रहा होगा बार्डर वगैरह पर भीड़ में कभी कभी २-३ घंटे भी लग जाते हैं क्लिरेंस मिलने में. सवा सात बजे फोन की घंटी बजी और हमारा चेहरा खिल उठा. रमन भाई ही थे. हमने कहा, स्वागत है भाई, कहाँ तक पहुँचे? रमन भाई बोले, पहुँचे हुये तो देर हो गई है. अपने रिश्तेदार के यहाँ हैं. अब बहुत थक गये हैं, कल सुबह ही आ पायेंगे आपके पास. हम तो बुझ से गये. एक दो मनुहार के बाद हमने कल सुबह आने वाली बात मान ली कि कहीं समझ न जायें हमारी स्कीम. मन को मना लिया कि सुबह ही कुछ एक सुना डालेंगे. वैसे हमारा गला शाम को ज्यादा सुर में रहता है. ११ बजे दिन में आने की बात तय पायी गई.

सुबह जल्दी उठकर थोड़ा बहुत ऑफिस का काम निपटाया, फिर तैयार होने लगे. १०.३० बजे दरवाजे पर घंटी बजी. बिना पावडर लगाये भागे दरवाजा खोलने. इसी से बाद में जो फोटू ली गई, उसमें हमारा रंग थोड़ा दबा सा आ गया है. :)

भये प्रकट कृपाला.......

सामने रमन भाई और आशा भाभी खड़े थे. नमस्कार बंदगी हुई और बस फिर ड्राइंग रुम में बातचीत शुरु हुई. टोरंटो आने का मकसद, रास्ता कैसे गुजरा आदि. तब तक साधना (हमारी पत्नी) भी आ गई. उनसे परिचय. फिर महिलाओं की अलग और हमारी और रमन भाई की आपसी बातचीत आगे बढ़ी. हम क्या करते हैं, कब कनाडा आये. रमन भाई क्या करते है आदि सामान्य शिष्टाचार की बातें. हम सोच ही रहे थे कि बात को कैसे घूमा फिरा कर चिट्ठों पर लायें और फिर धीरे से कविता पर. हमने रमन भाई को सूचित किया कि ई-स्वामी जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है. यह उनके लिये समाचार था जो उन्हें नहीं मालूम था. बात शुरु हुई थी कि पत्नी नें बताया कि नाश्ता लगा दिया है. पहले नाश्ता कर लें. हमने पत्नी को आँख भी मारी कि जरा कुछ देर तो रुको. मगर ऐसे मौके पर उनको समझ ही नहीं आता सो आज भी नहीं आया. अब हम सब खाने के मेज की इर्द गिर्द बैठे थे, तो खाने की बात चलना स्वभाविक थी. यह अच्छा बना है, यह कैसे बनाया यानि कि खाने की मेज पर जैसे शिष्टाचारवश बात होती है, बस वो ही.



रमन जी और उड़न तश्तरी (हम)

हम बात का रुख फिर घुमाने के चक्कर में थे तो जुलाई में विश्व हिन्दी सम्मेलन में जायेंगे कि नहीं, से शुरु की कि इस बीच रमन भाई को चाय पीने की इच्छा होने लगी. भाभी जी ने बताया कि रमन भाई चाय के बहुत शौकीन हैं और हर समय चाय पीने को लालायित रहते हैं. रमन भाई ने भी कन्फर्म किया कि खाना कैसा भी हो, चल जाता है. चाय बेहतरीन ही पसंद है और वो भी देशी वाली उबाल कर. अब अच्छी चाय, यानि जिम्मेदारी हमारी पत्नी से लुढ़क कर हम पर आ गिरी.तो हम उसमें व्यस्त हो गये. चाय बना कर फुरसत पायी, तो रमन भाई कैमरा ले आये. फिर फोटो सेशन. साथ चाय भी चलती रही. फोटू का सेशन खत्म हुआ तो रमन भाई ने ऐलान किया कि १० घंटे गाड़ी चला कर वापस पहुंचना है तो अब चलेंगे. हम तो कविता धरे ही रह गये और रमन भाई बच कर निकल गये. हमने भी कहा कि यह आपका आना माना नहीं जायेगा (कैसे मानें जब कविता सुना ही नहीं पाये) अगली बार समय निकाल कर आयें और हमारे पास ही रुकें. उन्होंने भी वादा किया और हमें भी अपने घर आने का निमंत्रण दे गये. अब सोचता हूँ कि किसी समय यात्रा कर ही ली जाये. वहाँ पहुँच कर तो सुना ही लूँगा जी भर कविता और खूब होगी चिट्ठाकारी की बातें!!

हमारी पत्नी हमें भारत की आदत के अनुरुप आज भी लाल साहब ही बुलाती हैं. इस तरह का संबोधन देख आशा भाभी बड़ी खुश हुई और हमें भाग्यवान होने की बधाई दी कि कनाडा/ अमेरीका में भी कोई साहब बुला रहा है. वरना ऐसा नसीब किसी का यहाँ पर कहाँ-यहाँ तो सबको पहले नाम से ही पुकारा जाता है.



बायें से दायें: रमन भाई, साधना, आशा भाभी

बहुत अच्छा लगा रमन भाई और आशा भाभी से मिलकर. सच में लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं.

बस, इस तरह यह चिट्ठाकार मिलन बिना चिट्ठाकारी की चर्चा के ही, यह साबित करते ही बीत गया कि-तू डाल डाल, तो मैं पात पात. यही तो पहचान है वरिष्ठ चिट्ठाकार की कि हम उनको नहीं घेर पाये. नमन करता हूँ रमन भाई को. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल: तुम जियो हजारों साल

आज गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी का जन्म दिवस है. हमारी ओर से अनेकों बधाई और शुभकामनायें.




इस अवसर पर मेरी पसंद का राकेश जी द्वारा रचित एक पुराना गीत पेश कर रहा हूँ

जैसे छंद गीत में रहता

जैसे छंद गीत में रहता, मंदिर में रहता गंगाजल
मीत बसे हो तुम कविता में लहराते सुधियों का आँचल

बच्चन ने तुमको देखा तो निशा निमंत्रण लिख डाला था
रूप सुधा पीकर दिनकर ने काव्य उर्वशी रच डाला था
कामायनी उदित हो पाई सिर्फ़ प्रेरणा पाकर तुमसे
प्रिय-[रवास का मधुर सोमरस तुमने प्यालों में ढाला था
एक तुम्हारी छवि है अंकित काव्यवीथियों के मोड़ों पर
बसी हुई कल्पना सरित में बसा नयन में जैसे काजल

मन के मेरे चित्रकार की तुम्ही प्रिये कूची सतरंगी
तुम अषाढ़ का प्रथम मेघ हो, तुम हो अभिलाषा तन्वंगी
तुम कलियों का प्रथम जागरण,तुम हो मलयज की अँगड़ाई
तुम दहले पलाश सी, मन में छेड़ रहीं अभिनव सारंगी
पा सान्निध्य तुम्हारा, पूनम हो जाती है, मावस काली
खनक रही मेरे गीतों में मीत तुम्हारे पग की पायल

तुम गीतों का प्रथम छंद हो, तुम उन्वान गज़ल का मेरी
तुमने मेरे शिल्पकार की छैनी बन प्रतिमायें चितेरी
वेद ॠचा के गुंजित मंत्रों का आव्हान बनी तुम प्रतिपल
तुमने आशा दीप जला कर ज्योतित की हर राह अंधेरी
तुम गायन की प्रथम तान हो, तुम उपासना हो साधक की
बासन्ती कर रहा उमंगें शतरूपे यह धानी आँचल

जैसे छंद गीत में रहता, मंदिर में रहता गंगाजल
मीत बसे हो तुम कविता में लहराते सुधियों का आँचल Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 16, 2007

का करें इन अनर्गल प्रलापियों का......

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है
आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है
दो पलों को सो गये जो रात में
आपको मालिक मकां, बहरा लगा है.


उपरोक्त पंक्तियाँ चिट्ठाकारी से संबंधित हैं. इन पंक्तियों में कवि ने टिप्पणी पर माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन से जूझते लोगों की वेदना और इस तरह का सुरक्षा इंतजाम करने वालों का संदेश देने का प्रयास किया है. उद्देश्य है दुर्घटना से सुरक्षा भली. सभी एडस विरोधी जागरुकता अभियान के हिमायती भी इस नारे से सहमत हैं और इसको प्रमोट कर रहे हैं. कहीं कुछ गड़बड़ हो जाये, उससे बेहतर है कि सुरक्षा के उपाय पहले से कर लो वरना कहने वालों का क्या है वो तो कह कर निकल जायेंगे-"अब पछतावे क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत." कवि हृदय विशाल होता है. वह चिंतनशील होता है. वह भावुक होता है और उसकी सोच अनंत होती है. वह पागलपन की हद तक सोच सकता है, ऐसा वह सोचता है. वह किसी भी बात का काव्यात्मक छंदमय विवरण कर सकता है, वो ऐसा भी सोचता है. आजकल अगर वो नामी है तो वो कवि कोकिल-कंठी होता है. जितनी मधुर आवाज, उतना सशक्त प्रस्तुतिकरण और उतना नामी कवि. वो स्वरों का उतार चढ़ाव जानता है बिना उसके उसकी कविता कारगर नहीं होती. कविता का अर्थ निकले, यह आज की नव-कविता में आवश्यक नहीं. कविता में छंदात्मक प्रवाह हो, उसमें स्वर निकले और कंठ मधुर हो, यह आज के सफल मंचीय कविता और कवि के सूत्र हैं. बात उद्देश्य से भटक गई हमेशा की तरह. यह बात की प्रवृति है. बहता पानी, जहाँ भी ढलान दिखी, बह चले. आवश्यक नहीं कि वहाँ आवश्यक्ता हो. हमारे जैसा कम बात करने वाला भी बह जाये तो यह बात की तारीफ है, हमारी नहीं.

तो बात कर रहे थे उस मुक्तक की जो उपर लिखा गया है. उसका भावार्थ दर्शाने का प्रयास था.

प्रथम पंक्ति में :

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है

कवि कहना चाह रहा है घिघियाते हुये कि भाई साहब, कहाँ इतनी दिक्कत में फँस गये. लगता है कहीं मन माफिक रच रच कर की गई टिप्पणी छपी नहीं. अगले ने माडरेशन में मिटा दी और आपके मन के भाव की भ्रूण हत्या हो गई. इस बात का तो हम भी विरोध करते हैं. इसके लिये तो आंदोलन की बनती है. स्टेट ट्रांस्पोर्ट की बसों में आग लगाने की बनती है. भ्रूण हत्या को हत्या का दर्जा मिलना चाहिये जिसकी सजा को माफ करने का अधिकार मात्र आज कलाम जी को है और कल अटल जी को होगा. भैरों सिंग जी को तो बिल्कुल भी नहीं. सर्व सम्मती भी तो आखिर कोई चीज है और वो भी सर्व दलीय. वैसे जब तक अटल जी अपनी हामी पॉज के साथ भरें , कोई और ही न अपाईन्ट हो जाये और या फिर कार्यकाल समाप्त हो जाये. बस यही चिंता खाये जा रही है. और कोई भी इस योग्य नहीं. माफी हो जायेगी, यह भी तय है. जब अफजल को हो सकती है तो यह टिप्पणी महाशय तो अभी पैदा भी नहीं हुये थे.


अब अगली पंक्ति:


आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है

यानि यह कहा जा रहा है कि आपके दहलीज पर टिप्पणी करना आसान नहीं. वो माडरेशन में चली जाती है, फिर अप्रूव हो या न हो. और उस पर से पहरा शब्द का बोल्ड होना यह दर्शाता है कि सिर्फ माडरेशन ही नहीं है बल्कि वर्ड वेरीफिकेशन भी चालू है. क्या भाई, अंग्रेजी पढ़ने का इम्तिहान ले रहे हो कि अपनी रक्षा में जुटे हो. आगे, दहलीज का अर्थ चिट्ठे से है जो कि विषय वस्तु है अतः प्रधान की भूमिका में है.


अगली पंक्ति:

दो पलों को सो गये जो रात में

अब चूंकि हिन्दी चिट्ठाकारी अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर हो रही है तो टाईम डिफ्रेंस भी स्वभाविक है. जब भारत में सुबह होती है तो दुबई-कुवैत में दोपहर..लंदन में शाम और अमरीका-कनाडा में रात. ऐसे में यह हमेशा हो जाना संभव है कि जब आप टिप्पणी करें तब वो चिट्ठाकर सो रहा हो. वो आपकी चित्कार व दुत्कार व तारीफी शब्द न सुन पाये, नींद के आगोश में और

चौथी पंक्ति के तहत:

आप उसे बहरा समझ बैठें. मालिक मकां यानि चिट्ठे का मालिक...अरे भाई, वो मात्र सोया है, बहरा नहीं हुआ है. उठेगा तब सुन लेगा. मगर यह व्यवस्था का कमाल है कि संयम खत्म हो गया है. अभी हमने आवाज की और अगर अगले ने तुरंत नहीं सुना का अर्थ कामचोरी, घूस की मंशा और लाल फीताशाही ही लगाना उचित है. अन्य बातों की न तो अहमियत है और न ही गुंजाईश. इस तरह उसे बहरा मान लेना ही बेहतर है.

अगर अहमियत और गुंजाईश चाहिये तो यह माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन को उखाड़ फैंको और खुल्ला खेल फर्रुख्खाबादी का नाराबुलंद करो. गाली बकने वाले और अनर्गल प्रलापी इंतजार में हैं. और आपका बहरापन अलविदा की बाट जोह रहा है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 13, 2007

आप गदहा लेखक हैं……..


आज एक प्रशंसक की अपने लेख पर टिप्पणी मिली. हिन्दी टंकण औजार की अनुपलब्धता की वजह से उन्होंने रोमन में टिप्पणी कर दी. ऐसे होते हैं प्रशंसक कि चाहे जैसे भी हो, अपने भाव जरुर लिख भेजते हैं. हम बहुत खुश हुये. अरे, टिप्पणी तो संस्कृत से लेकर फ्रेंच तक की किसी भी भाषा में मिल जाये. हमेशा आमंत्रित हैं. अंधा क्या चाहे, दो आँख. तुरंत उनकी टिप्पणी पढ़ना शुरु की. आप भी पढ़ें. आपकी सुविधा के लिये उसे देवनागरी में भी टंकित किये देता हूँ.

रोमन में:

Aap ek achche gadha lekhak hain. Aap apni dullati shali se badi karari chot karte hain.Main Gadha nahi, kavita karta hun. Aapke lekh jitne sidhe sadhe dikhte hain,ander se utne hi nukile hote hain. Yahi to asli gadha ki pahchan hai or yahi aapko anya gadhon se alag isthan deti hai. Is lekh se aapne punah sabit kar diya ki Aap ek bahut behtarin gadha lekhak hain. Aapko shat shat naman. Aapke Gadha lekhan ne hume koyal bana diya hai. Likhate rahe, hum aate rahenge.

देवनागरी में उपरोक्त कथन, जैसा मैं पढ़ पाया:

आप एक अच्छे गदहा लेखक हैं. आप अपनी दुल्लती साली से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गदहा नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गदहा की पहचान है और यही आपको अन्य गदहों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गदहा लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गदहा लेखन ने हमें कोयल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.

(नोट: साहित्यिक हिन्दी में गधा को गदहा कहते हैं)

अब हम सोचने लगे कि भाई यह प्रशंसक हैं कि आलोचक. मित्र हैं कि दुश्मन. शत शत नमन भी कर रहा है और गदहा भी कह रहा है.यह बात तो समझ आई कि कैसी भी आवाज में कविता गाता होगा तो गदहे की ढ़ेचू के सामने उसकी आवाज कोयल सी लगेगी, तो उसने अपने आपको कोयल समझ लिया होगा. मगर हमको गदहा कह रहा है, वो भी ऐसा वैसा नहीं, सब गदहों में अपनी अलग पहचान रखने वाला बेहतरीन गदहा. यह भी कह गया कि लिखते रहो, हम आते रहेंगे. लगता है इतना गरिया कर भी पेट नहीं भरा. आगे जब भी लिखेंगे और गरियायेगा.हे प्रभु, रक्षा करना. बस इतना ही हमारे मुँह से निकल पाया. लोग कहते हैं रोमन में हिन्दी लिखने से पूरे भाव नहीं आ पाते हैं, मजा नहीं आता. अब और कैसे भाव देखने हैं? और कितना मजा चाहिये?

याद आने लगा कि यह वही बंदा है, जिसे हमने प्रोत्साहित करके इसका चिट्ठा बनवाया था. देवनागरी में टंकण सिखाया था. लालच थी तो बस इतनी कि यह हमारे लिखे की भी प्रशंसा करेगा और इसी उद्देश्य से उसकी हर आड़ी तिरछी कविताओं को दाद देते रहे. कितनी बार अपने मन को मारा. अपने मानस को पीछे ढकेल दिया और इनकी कविता पर लिख आये- बहुत खूब, मजा आ गया आदि आदि. आज उसका ये सिला मिला है. मानो हम अमरीका हो गये और ये तालिबान. हमसे चलना सीखे और हम ही पर वार.

स्थितियों की गंभीरता भांपते हुये हम तुरंत देवनागरी के सबसे बड़े समर्थक बन गये. सोच लिया कि हम रोमन में लिखी टिप्पणी नहीं छापेंगे. शाम का सूरज छिपता, उसके पहले ही हमारे उन तथाकथित प्रशंसक महोदय का फोन आ गया कि हमारी टिप्पणी नहीं छापी. हमने सोचा कि कैसा बंदा है? मन में तो आया कि पलट कर गाली बक दें. फिर अपनी जमीं हुई छवि का ख्याल करते हुये हिम्मत जुटा कर कहा: काहे नाराज हो, भाई! क्यूँ ऐसी टिप्पणी करते हो? क्या गलती हो गई?

वो आश्चर्य से बोला: काहे की गलती, भाई. तारीफ ही तो किये हैं. हमारे सामने तो प्रिंट पड़ा है, क्या गलत लिख दिया?

हमने कहा:’ अच्छा, जरा पढ़कर सुनाना. खुद ही समझ जाओगे. ‘

फिर जब वो सुनाने लगा तो हम तो आवाक रह गये. आप भी सुनो, उन्होंने क्या सुनाया:

‘ आप एक अच्छे गद्य लेखक हैं. आप अपनी दौलती शैली (उच्च शैली) से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गद्य नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गद्य की पहचान है और यही आपको अन्य गद्यों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गद्य लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गद्य लेखन ने हमें कायल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.’

(नोट: हमारे प्रशंसक अपनी कवित्तमयी भाषा में उच्च शैली को गज़ल के प्रभाव में दौलती शैली कहते हैं)

फिर उन्होंने कहा कि एक स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है वो a की जगह o लग गया है, कायल में. अब उन्हें क्या बतायें कि कहाँ कहाँ स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है. हम तो शर्मसार हो गये कि क्यूँ शक कर बैठे इतने बड़े प्रशंसक पर. सामने होता तो गले लग कर रो पड़ते. फोन पर तो बस सॉरी ही कह पाये.

तो देखा आपने कि कितना सही कहते हैं लोग कि रोमन में लिखने से भाव खो जाते हैं और जो उभर कर आते हैं वो कितने खतरनाक हो सकते हैं. अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

अपील: देवनागरी में हिन्दी लिखना बहुत आसान है, इस लिंक या इस लिंक पर देखें. देवनागरी में लिख कर हिन्दी को समृद्ध बनायें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 09, 2007

सरररर......सबसे तेज!!!

ट्रिन..ट्रिन...

'हेलो, सबसे तेज चैनल "बात-कर"? मैं दस्युराज मरखाम बोल रहा हूँ.'

'अरे दस्युराज, बहुत दिन बाद फोन किया? सब ठीक ठाक तो चल रहा है?'

'हाँ भई, सब ठीक चल रहा है. अभी चुनाव में काफी व्यस्त थे. कल ही फारिग हुये हैं तो सोचा कि अब काम धंधे से लगें. एकाध डकैती डाल ली जाये.'

'यह तो बड़ा नेक विचार है. कहाँ डकैती डालने का विचार है?'

'वही सेठ करोड़ीमल के यहाँ. बहुत माल जमा किये है, स्साला!!. न जाने कैसे ये लोग दो नम्बर का पैसा हजम करते हैं. हम तो जब तक जान की बाजी लगाकर मेहनत से छीनकर न लायें, हजम ही नहीं कर सकते.'

'सेठ करोड़ीमल के यहाँ!! कोई फायदा नहीं. उनके यहाँ तो अभी दस मिनट में सरकारी डाका पड़ने वाला है. हमें लाईव कवरेज का एक्सक्लूसिव कान्टेर्क्ट मिला है.'

'सरकारी डाका??'

'हाँ भाई, आयकर का छापा मारा जा रहा है. अति गोपनीय खबर है. हमारी टीम तो कवरेज के लिये निकल भी गई है स्पॉट पर.'

' बहुत तेज खबर लाते हो भाई!! वाकई, फिर तो कोई फायदा नहीं है वहाँ जाने का. जूठन भी नहीं छोड़ेंगे वो तो.'

'हाँ, तुम्हारे डाके से तो कुछ दिन में आदमी उबर भी जाये. सरकारी डाके में तो रुपये पैसे के साथ इज्जत अलग जाये और सारी जिन्दगी की उगाही बोनस में. जब देखो तब होली दिवाली नज़राना पहुँचाओ, लिस्ट में नाम जो चढ़ गया.'

' बताओ, हमारी तो पूरी टोली तैयार बैठी है. फिर हम सेठ इतवारी लाल के यहाँ डाका डाल देते हैं.'

'दस्युराज, आप वहाँ एक दो दिन रुक कर डाल लें.दो दिन का मसाला तो हमको मिल ही गया है, इस सरकारी डाके से. उसके बाद फिर आपकी कवरेज कर लेंगे.'

'अरे, दो दिन बाद से हम खाली नहीं हैं. राजधानी जाना होगा. चुनाव परिणाम आ रहे हैं. जोड़ तोड़ के बिना सरकार बन नहीं पायेगी. कौनो मेजारटी तो आ नहीं रही. इस बार भी सब हमारी महिमा पर निर्भर करेंगे.'

'तब फिर वहाँ से फुरसत होकर डाल लिजियेगा. न तो सेठ जी कहीं जा रहे हैं, न ही आप और न उनकी दौलत. आराम से डाल लिजियेगा और हम तो हैं ही कवरेज के लिये.'

'नहीं भाई नहीं, हमारे पास बस आज और कल का ही समय है. आप तो अपनी टीम भिजवा कर लाईव कवरेज करवाईये या फिर हम दूसरे चैनल वालों से बात करें?'

'कैसी बातें कर रहे हैं आप? यह मत भूलियेगा कि आपको उठाईगीर से दस्युराज का खिताब दिलाने वाला भी हमारा ही चैनल है. झूठी डकैतियों में भी आपको ही हाई लाइट किया. वारदातों पर वारदात दिखाई. तब जाकर आप जीरो से हीरो बने. बड़े बड़े लुटेरों को बिना कवरेज के निख्खटू बना दिया सिर्फ आपको प्रमोट करने के लिये. आपके नाम की दहशत का माहौल हमने बनाया और आज आप ऐसी बात कर रहे हैं.-

-आपने अगर किसी दूसरे चैनल को अपना काम दिया तो हम फिर किसी और को प्रमोट करेंगे, तब आप हमसे कुछ न कहियेगा. आप तो जानते हैं हम तो मरे गुण्डे तक को वाया आतंकवादी घोषित करवाते हीरो बनवा दें, फिर जिन्दा की तो बात ही क्या है. बहुत तेज चैनल है हमारा. हमसे आगे कोई कहीं नहीं पहुँच पाता. घटनाकार भी नहीं. अरे हमारी तेजी तो ऐसी है कि बच्चा जब घर से गढ्ढे में गिरने के लिये निकलता है तब से कवर करते हैं और तब तक करते हैं जब तक की सरकार उसे गढ्ढे से निकाल न ले. अनेकों उदाहरण हैं हमारी तेजी और फुर्ती के-बंदा कलेक्टरेट में जेब से जहर की बोतल निकालता है और हम कवर करना शुरु कर देते हैं जब तक पुलिस या आम नागरिक उससे जहर की बोतल छीनकर उसे मरणासन्न अवस्था में अस्पताल न पहुँचा दें. हम न तो पुलिस हैं और न ही आम नागरिक कि उसे बचायें. हमारा काम कवरेज करना है, सो हम से बेहतरीन कोई नहीं कर सकता. हमारी कवरेज के लोग मुरीद हैं, कहाँ मिलेगी आपको ऐसी कवरेज?? जाना है तो शौक से जाईये मगर फिर हमसे कोई उम्मीद मत रखियेगा.'

दस्युराज को भावावेश में की गई अपनी गल्ती का एहसास हो गया. वो इस चैनल की फुर्ती और तेजी का आख्यान सुन के भावविभोर हो उठे और अपने उपर किये गये इनके अहसानों से इतने द्रवित हुए कि आँख भर आई.

भर्राये गले से सिर्फ इतना ही बोल पाये कि 'सॉरी' और फोन रख दिया.

अब चुनाव परिणाम आने के बाद ही डाके की सोचेंगे.

तब तक आप देखते रहिये..सबसे तेज चैनल..."बात-कर". Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मई 07, 2007

अरे ओ दकियानुसी!!!

समय बदलता जाता है. मान्यतायें बदलती जाती हैं. हम बदलते जाते हैं.

जब भारत में रहते थे तब कोई भी मित्र सर मुंडाये मिल तो भर जाये. हम झट से अपना मुँह तुरंत उतार लेते थे झूठमूठ और बस, पूछ बैठते थे कि भाई, कब हुआ, कैसे हुआ? क्या बीमार थे?

वो भी सर झुकाये बताता कि हाँ, पिता जी गुजर गये. कोई खास बीमार तो नहीं थे. बस, बुढ़ापा था. रात में खाना खा कर सोये और सुबह.....!!! फिर उसकी आँख भर आती. आगे का हम एकस्ट्रा समझदारी में खुद समझ जाते कि सुबह वो जागे नहीं. उसके कँधे पर हाथ धरते. ढाढस बंधाते और तैहरवीं का निमंत्रण सुनश्चित करते.

बस उसके बाद, एक तेहरवीं की दावत..खुले आम सूतमसात....डट कर भोजन....और फिर सब नार्मल. अगले गंजे का इंतजार.

कितना आराम था. मुंडा सर मतलब शोक का संदेश. न पूछना पड़े और न बताना पड़े. सब कुछ अपने आप में कहता सर. पूर्णतः चमकता सर मतलब तेहरवीं का निमंत्रण पत्र. यह होती है संस्कृति..बिना बोले सब कुछ कह जाती है. जैसे हमारे जमाने की भारतीय कन्या. बस, प्रेमाग्रह के जबाब में पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदना और नज़रें झुका देना मात्र, स्विकारोत्ति का प्रमाण पत्र था.

समय बदल गया है. अब तो मुँह बा कर भी कन्या हाँ बोल दे तो भी शंका बनी ही रहती है कि सच में हाँ कहा है कि सिर्फ फन के लिये कि यार, मैं तुम्हारा रियेक्शन देखना चाहती थी. यू आर टू सेन्टीमेन्टल- अर्थ, बड़े दकियानुसी हो जो हाँ को हाँ समझते हो.

यहाँ मित्र मिले. सर मुंडाये हुये. हमने मुँह उतार लिया. हमारे साथ एक और यहाँ के लोकल संस्कारी मित्र थे. वो उसे देखकर तुरंत बोले-औह मैन!! शेव्ड़-लूकिंग सो कूल-वोव!!!! ग्रेट ड्यूड---हम तो भौचक. एक तो अगले के घर गमीं हो गई और यह बंदा बोल रहा है-शेव्ड़-लूकिंग सो कूल-वोव!!!! मगर यह क्या, अगला भी हंसते हुये कहने लगा कि भाई, बाल साथ नहीं दे रहे थे तो सोचा कि शेव करा लें..मे बी आगे ठीक आ जायें.

और फिर वो कूल ड्यूड मेरी ओर मुखातिब हुआ...वाटस रांग विथ यू? कोई शोक वगैरह तो नहीं हो गया घर में..आपका उतरा चेहरा देख कर लग रहा है कि घर में कोई गमीं हो गई है.

अब उसको कैसे समझाऊँ कि भईये, यह चेहरा तो तेरी खोपड़ी देखकर आदतन उतर गया था. हमारे यहाँ तो सब भला चंगा है. यह तो जमाने में ही आग लगी है जो हमारा चेहरा गड़बड़ नज़र आ रहा है. हम बहुत दकियानुसी जो हैं न!!!


नोट:
आदातानुसार बड़ा नहीं लिखे हैं तो क्षमा किया जाये. वैसे ऐसी ही विडंबना कम कपड़ों के साथ भी है जिसे कभी आभाव माना जाता था वो अब फैशन है. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 03, 2007

धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्थता

समस्त युग पुरुष, जैसे कि फुरसतिया जी तटस्थता पर लिख चुके और नितिन बागला जी पूछ चुके. अरुण(पंगेबाज) दिनकर जी की इन पंक्तियों में नहा कर डूब चुके.


"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"


और ऐसे ही कभी परसाई जी ने हम भारतीयों के बारे में कहा था कि हममें अदभुत सहनशीलता है और साथ ही बड़ी भयावह तटस्थता. कोई हमारे पैसे छीन कर भाग जाये और हम तुरंत दान का मंत्र जपने लगते हैं. मैं परसाई जी की आत्मा से क्षमा मांगते हुए उनसे पूर्णतः सहमत न होने की गुस्ताखी कर रहा हूँ. शायद उनकी बात काफी भारतीयों पर सही उतरे मगर हम पर तो नहीं.

(एक अपवाद है जरुर, कि जब किसी पंगे में दोनों तरफ हमसे भारी बजरंगी होते हैं, तब भी हम मजबूरीवश सहनशील और तटस्थ हो जाते हैं. इसे समझदारी समझा जाये, कायरता नहीं. ऐसे वक्त हम दान मंत्र नहीं जपते तद्यपि जपने का ढोंग जरुर करते हैं)

हमारी सहनशीलता सिर्फ अदभुत ही नहीं बल्कि धार्मिक भी है. शायद इसी से हमारी सहनशीलता को देख, हमें जानने वाले और हमारा परिवार खीझ उठता है. हर विषय में धार्मिकता के साथ इस तरह की बातें स्वभाविक हैं. हमने अक्सर बहूओं को सास की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों पर खीझते देखा है. यह कोई नई या अनोखी बात नहीं. धार्मिक सहनशीलता एक जीवन शैली है, जिसके दो अलग अलग चरित्र एवं पहलू होते हैं. घर में कुछ और व बाहर कुछ और. बहुत घोर धार्मिक महापुरुष देखे, जिन्होंने न जाने कितनी सड़कों पर, रेल्वे की जमीन पर और सार्वजनिक स्थलों पर मंदिर/मजार बना डाले और उनके हटाये जाने पर आंदोलन किये और जेल भी गये. बात मरने/मारने पर आ जाती है. मगर जरा उनसे पूछ कर देखियेगा कि जनता की सुविधा के लिये उनके अहाते में उनकी जमीन पर एक मंदिर/मजार बनवा दें क्या!! सब धार्मिकता एक मिनट में दर किनार हो जायेगी. वो सार्वजनिक धार्मिक हैं, परिवारिक नहीं. वैसी ही धार्मिक सहनशीलता के हम अनुयायी हैं. जब तक हमारी सहनशीलता हमारा व्यक्तिगत नुकसान नहीं करती, हम सहनशील हैं. दूसरा प्रताड़ित होता रहे, हम सहनशील रहेंगे और हर सहनशील व्यक्ति का मूक समर्थन करते रहेंगे.

रही तटस्थता की बात, तो वह हमारी भयावह इसलिये है क्यूँकि उसका आधार पौराणिक है.पौराणिक बातों का इच्छानुसार और समयानुकुल अर्थ निकाला जा सकता है अपनी सुभीता का आंकलन करते हुये. पौराणिकता के कवच में सब अर्थ जायज हो जाते हैं. बस, उसका एक बेहतरीन तार्किक आधार तलाशना होता है. तलाशने से तो कारु का खज़ाना हासिल हो जाता है तो तार्किक आधार की क्या मजाल. इस तरह की कवची अवधारणाओं से तो खुदा भी डरता है कि कब न इंसान अर्थ का अनर्थ कर उसे ही पंचायती चौपाल में खड़ा कर ले. इसीलिये भयावह है. पौराणिकता एक आत्म विश्वास देती हैं और अपने अनुरुप उनके अर्थ को सिद्ध करना एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित स्थिती प्राप्त करता है.

इस धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्था के बीच संतुलन बनाये रखने का हमारा सिद्धांत भारतीय सड़कों पर गढ्ढों से बच कर चलने के सिंद्धांत जैसा है जो कि हर पल बदलता रहता है और जिसके आप कभी अभ्यस्थ नहीं हो सकते, जब तक की भारत सरकार गढ्ढों की गारंटी लेना न शुरु कर दे. अरे बिना गारंटी के, आज जहाँ गढ्ढा है, कल भी वहीं रहेगा, कोई जरुरी नहीं. क्या अभ्यास करें खाक!! इस गढ्ढे को भरने के लिए सड़क पर उससे बड़ा गढ्ढा बना देते हैं.किस को छोड़ें- किस को लांघे. हमसे तो बेहतर शराबी हैं. जितना बड़ा गढ्ढा नहीं, उससे लंबी कुद. क्या पता कितना लंबा गढ्ढा हो. शराबियों का त्रितीय नेत्र खुल जाता है. वो सजग होते हैं. इसीलिये मैं उनका नमन करता हूँ और कायल हूँ. वो सामान्य नहीं होते. वो प्रेरणापरक जीव होते हैं. वो साधुवाद के असली अधिकारी हैं. हर कदम संभल कर उठाते हैं. काश, सब इंसान शराबी होते, तब काहे का पंगा. सब संभले होते. सब संभल संभल कर चलते गढ्ढे बचाते हुए. यह संतुलन का सिद्धांत परिस्थिती जन्य होता है. जैसी स्थितियां दिखीं, वैसी ही संतुलन की कवायत.

परसाई जी की यह बात सही है कि कोई हमारे पैसे छीन कर भाग जाये तब ऐसी स्थिती में हम दान मंत्र जपने लगते हैं. मगर आंख बंद करके नहीं. एक आँख खुली रख कर मंत्र जपना हमने सीख लिया है. यह एक कला है. हम मंत्र जपते हुए भी सब देखते हैं. जानते हैं कि क्या चल रहा है. उसी एक आँख से देखते रहते हैं.

हमारी इन सब स्थितियों से उपजा, जन हित में जारी, सूत्र जिसे आप कुछ दिनों में हर बस पर, चौराहे पर, संसद में, जेल में टंगा पायेंगे. बस मार्केटिंग का बंदा तलाशा जा रहा है, जब योग मार्केटिंग के बल पर विश्व स्तर पर बेच दिया गया तो हम तो मुफ्त दे रहे हैं:


"धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्थता ही एक अति-सफल राजनीतिक जीवन की कुँजी है." -स्वामी समीरानन्द


सूचना: "जो भी राजनितज्ञ इस सूत्र से अभिभूत हो स्वामी समीरानन्द जी के श्रीचरणों के दर्शन को लालायित हों, कृप्या संपर्क करें."

अब देखो, जब कोई हमारे पैसे छीन कर भाग और हम एक आँख बंद किये दान मंत्र का जाप कर रहे थे तब क्या दिखा इस बाईं आँख से और सुनो इस धार्मिक सहनशील और पौराणिक तटस्थ आदमी को. :


मन ही मन में वो हँसता है,
पर आँख में आसूं रखता है
जिसको तुम नेता कहते हो
दिन रात तिजोरी भरता है.

पांच साल में दिखता है
हाथ जोड़ वो झुकता है
वोट तुम्हारा मिल जाये
वादों पर वादा करता है

उसका कोई ईमान नहीं
वादों का सम्मान नहीं
एक बार उसे जितवा देना
फिर तेरा कोई ध्यान नहीं.

बस भाई भतीजा वाद यहाँ
नहीं भ्रष्टाचार अपराध जहाँ
बैठे हैं छिप कर खद्दर में
गाँधी की इनको याद कहाँ.

इनका बस एक ही मकसद है
कुर्सी हथियाने की कसरत है
मंदिर मज्जिद अब तुम जानों
इनको तो पद की हसरत है.

-समीर लाल 'समीर'

नोट: इस आलेख में इस्तेमाल 'हम' और 'हमारा/हमारी' शब्द का अर्थ हम नहीं है, यह प्रतिकात्मक है. इस अवधारणा में विश्वास रखने वाले समस्त श्रृद्धालु इसे स्वयं का द्योतक मान सकते हैं. यह कोई नई बात नहीं है, अक्सर वैदिक ऋचाओ मे इस तरह के कुछ शब्दो का प्रतिकात्मक प्रयोग हुआ है. Indli - Hindi News, Blogs, Links