हिंदी ब्लॉगिंग का साधुवाद युग अब बीत गया। समीरजी तो हो गए बेरोजगार :) मसिजीवी के उपरोक्त आलेख में मैने पढ़ते वक्त कोशिश पूरी की कि स्माईली को ही सत्य मानूँ. प्रयास यह भी किया कि सबसे पहले टिप्पणी करके यह भी बता दूँ कि मुझे बुरा नहीं लगा. उद्देश्य मात्र यह था कि मेरे चाहने वाले एवं जानने वाले, जिसमें
मसिजीवी स्वयं भी हैं, कहीं इस कथ्य को शाब्दिक अर्थों मे न ले लें. मैं आदतानुसार परोक्षरुप से आहत भी नहीं हुआ किन्तु हतप्रद जरुर था. पुनः, इसे पढ़ा. कुछ ही देर बाद छपी भाई
फुरसतिया जी की ब्लॉगर मीट भी पढ़ी और उसमें उल्लेखित इस तथ्य पर उनकी विचारधारा भी. हमेशा की तरह उनका मेरे उपर अडिग विश्वास और असीम प्रेम देखकर मन भर आया. कम्प्यूटर बंद कर दिया.
पिछले २४ घंटो में कई बार पुनः कम्प्यूटर चालू करने के लिये अनायास ही हाथ बढ़ाया. मन नहीं माना, ध्यान बँटा लिया.टीवी देखा, मित्रों से फोन पर बातचीत की, परिवार के साथ समय दिया. मगर यह दूरी लगातार खलती रही. लगा कि मैं अपनी ही दुनिया से दूर क्यूँ हो रहा हूँ.
थोड़ा संवेदनशील हूँ फिर भी जल्दी बुरा नहीं मानता. आदतानुसार परोक्षरुप से जल्दी आहत भी नहीं, फिर भी हतप्रद तो हो ही सकता हूँ. ऐसी स्थितियों में मैं अक्सर त्वरित प्रतिक्रिया से बचने की कोशिश करता हूँ. अगर मुझे हतप्रद कर देने या झंकझोर देने वाले विमर्श या विवाद का विषय बिन्दु मैं स्वयं न हूँ, तब तो मैं शायद किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया भी न व्यक्त करुँ और कोशिश कर इस तरह के विमर्श या विवाद को शीघ्रातिशीघ्र मानस पटल से मिटा दूँ.
जबसे पढ़ा एक भी टिप्पणी करने का मन नहीं बना पाया. खैर, मन तो बन ही जायेगा. संस्कार तो छूटते नहीं. शायद कुछ समय लगे, मन काबू में आ जाये, फिर करेंगे टिप्पणियाँ खूब जी भर के.
रुका नहीं गया. मानस को मनाया और फिर अपनी दुनिया में आया. फिर मित्र मसीजीवी को पढ़ा. फिर भाई फुरसतिया जी को पढ़ा. सब टिप्पणियां पढ़ीं. मित्रों का प्रेम देखा. सभी की टिप्पणियों ने पुनः एक विश्वास दिया. अच्छा लगा पढ़ सुनकर सब कुछ.
ऐसा नहीं है कि चिट्ठों में होते विवाद मुझे उद्वेलित नहीं करते या फिर मैं उनके विरोध में कुछ कहने में सक्षम नहीं या एकदम ही विवेकशून्य हूँ. मगर मुझे व्यक्तिगत तौर पर विवाद पसंद नहीं वो भी कम से कम ऐसे तो कतई नहीं, जिनकी परिणिती मात्र कटुता हो, वह भले ही विचारों की हो या व्यक्तिगत.
मैं दोनों को ही उचित नहीं मानता. एक ही छत के नीचे पले बढ़े, एक ही आदर्शों का पाठ पढ़ते बड़े हुए दो भाईयों तक के विचार अलग अलग होते हैं. तब यहाँ तो सब अलग अलग घरों, अलग अलग परिस्थितियों, अलग अलग संस्कारों से आये लोग हैं. कैसे हो सकते हैं सबके एक से विचार? आप अपने विचार रखिये, वो अपने. दोनों मे जो जो जिसको अच्छा, वो वो उनको स्वीकारें वरना स्वयं के विचार तो हैं ही. कोई भी तो विचार शून्य नहीं. सभी विवेकवान हैं. फिर अपने विचार मनवाने के लिये विवाद कैसा और किस हद तक? सार्थक विमर्श की भी एक सीमा रेखा होती है. सबको आपस में सामन्जस्य बनाना होगा तभी
विकास का एक सशक्त और सुहावनी राह बनेगी.
जैसा कि मैने
अपनी पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया था कि मेरी अपनी निर्धारित सीमा रेखायें हैं. प्रतीक के तौर पर मैंने अपनी कार की रफ्तार दर्ज की थी. मुझे वही अच्छा लगता है और मैं वही करता हूँ जो मुझे अच्छा लगता है, कम से कम ऐसी जगह जहाँ मुझ पर कोई जोर जबदस्ती नहीं है (नौकरी में ऐसा हमेशा नहीं कर पाते) मगर फिर भी मैं अपनी मनमानी करने में किसी मर्यादा का उल्घंन नहीं करता. मैं हर वक्त इस बात का भी ख्याल रखने का प्रयास करता हूँ कि मेरी इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति से कोई आहत न हो. आज और आने वाले कल, दोनों ही वक्त में, न तो मुझे अपने लिखे पर शर्मिंदगी महसूस हो और न ही किसी अन्य पढ़ने वाले को. अगर यही हल्का लेखन कहलाता है तो मैं इसी में खुश हूँ और मुझे इस पर गर्व है. और मुझे स्वयं को तथाकथित विचारोत्तेजक भारी भरकम साहित्यिक लेखन की ओर ले जाने का कोई आकर्षण नहीं है. शायद वक्त, निरंतर पठन कुछ साहित्यिक वजनी शब्दों का भंडार दे जिन्हें में सहज भाव से उपयोग कर पाऊँ मगर उद्देश्य मेरा फिर भी न बदले, बस यही इश्वर से प्रार्थना करता हूँ.
हम हँसते और हँसाते हैं
गम के आँसूं पी जाते हैं
ढ़ेरों जख्मी राह में देखे
मरहम सा रख आते हैं.
नये आये लोगों का अभिनन्दन करना, किसी को अच्छे कार्यों के लिये प्रोत्साहित करना, किसी के अभिवादन के जबाब में अभिवादन करना, किसी के दुख में शामिल होना, किसी के खुशी मे खुश होना, लगातर प्रोत्साहन देना, शाबाशी, धन्यवाद, आभार आदि शिष्टाचारों का कोई युग नहीं होता. यह हर युग में होते हैं और
यही साधुवादिता कहलाती है. यह ठीक वैसे ही है जैसे गाली बकना, निर्थक बहस करना, मारना पीटना, लूटपाट करना, आतंक फैलाना आदि शैतानियत के प्रतीक हैं और इनके भी
कोई युग नहीं होते.जिस दिन समाज से
शिष्टाचार समाप्त हो जायेगा, उस दिन मुझे इस बेरोजगारी के साथ साथ बेजानी भी मंजूर होगी-खुशी खुशी. बिना आहत हुये, बिना हतप्रद हुये, बिना बुरा लगे और बिना किसी प्रतिक्रिया के.
तब तक के लिये-मैं ऐसा ही हूँ. आप मेरे मित्र हैं और आपकी मित्रता को मैं
साधुवाद करता हूँ.
चलिये, आज आपको
स्व.रमानाथ अवस्थी जी की मेरी पसंदीदा रचना सुनाता हूं जो कभी
फुरसतिया जी ने सुनाई थी:
मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।
संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ
यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।
तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।
मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो ।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ
मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
-स्व.रमानाथ अवस्थी