शनिवार, जनवरी 30, 2021

आपदा से निकली ज्ञान की गंगा

 


आपदा में चाहे लाख बुराई हो लेकिन एक बात तो है कि वह एक बड़ी आबादी को ज्ञानी बना जाती है। एक दफा हमारे शहर में बहुत तगड़ा भूकंप आया था। देखते देखते घंसु से लेकर तिवारी जी तक को न सिर्फ इपि सेंटर, रिक्टर स्केल, आफ्टर शॉक आदि जैसे शब्दों का पहली बार पता चला बल्कि वो उनका खुल कर इस्तेमाल भी करने लगे। एक दिन तिवारी जी गुस्से में घंसु से बोल रहे थे अगर हमने मूँह खोल दिया तो संसद में कम से कम ८ रिक्टर स्केल का भूकंप आ जाएगा। हमको ऐसे ऐसे राज पता हैं कि सब लपेटे जायेंगे। घंसु हँसते हुए बोल रहा था कि जो बच जाएंगे, वो आफ्टर शॉक में लपेटे जाएंगे। ज्ञान के स्तर में एकाएक इतना इजाफा तो आपदा के ही बस की बात है। वरना तो घंसु ३ साल तक भरपूर कोशिश के बाद भी ८ वीं न पास कर पाये थे।

फिर जब सुनामी आया तो उनको पता चला कि सुनामी की स्पेलिंग टी से शुरू होती है, तो तिवारी जी ने भी आईने में खुद को इवारी जी बुला कर देखा था। पसंद नहीं आया तो खारिज कर दिया – कोई कृषि कानून तो है नहीं कि खारिज न किया जा सके। सुनामी के मद्दे नजर तब वो नेता जी के लिए कहते पाये गए कि गजब का बंदा है। रेडियो से भी इतनी इतनी ऊंची ऊंची फेंकता है कि सुनामी की लहरें भी बौनी नजर आयें। समुन्द्र वाली सुनामी का तो फिर भी पता कर लो मगर इनके फेके का इपि सेंटर कहाँ है, कोई नहीं जान पाता है। घंसु कहने लगा कि हमने सुना है – ये फेंकते दिल्ली से हैँ और इपि सेंटर मुंबई में होता है।

खैर ये सब आपदा तो क्षण पर को आईं थी, तब इतना ज्ञान दे गईं। अब जो आपदा आई है जो जाने का नाम ही नहीं ले रही है, इससे प्राप्त ज्ञान का तो क्या कहा जाए? लोग पीएचडी हुये जा रहे हैं। तिवारी जी तो अपने नाम के आगे मानद उपाधि प्राप्त डॉक्टर लिखने भी लगे हैँ। किसने दी यह मानद उपाधि पूछने पर उनके बोलने से पहले ही उनके भक्त घंसु गाली बकने लग जाते हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई डॉक्टर साहेब से ये पूछने की? डॉक्टर साहेब कितनी मेहनत करते हैं। पान के ठेले पर १६ १६ घंटे बैठे राष्ट्र हित में बिना थके ज्ञान बिखरते हैं। इनके बिखेरे ज्ञान कणों को न जाने कितने मोर चुग चुग कर अपना जीवन यापन करते हैँ और सेल्फी खिंचाते हैं और तुम पूछते हो किसने दी यह मानद उपाधि? तुम उस समय कहाँ थे जब बाकियों को मानद उपाधि दी जाती थी? पूछने वाला अपना सा मूँह लेकर रह जाता और तिवारी जी और घंसु एक दूसरे को देखकर मुस्कराते।

आजकल लोग एक नया शब्द सीख गए हैं ‘एसिम्प्टमैटिक’। पूछने पर अर्थ बताया कि जिसके लक्षण नहीं दिखते किन्तु वो चीज होती है। जैसे कइयों को न जुकाम, न खांसी है, न बुखार मगर टेस्ट करवाओ तो कोविड निकल आता है।

‘एसिम्प्टमैटिक’ शब्द पर डॉक्टर तिवारी फरमाते हैं कि अगर आप समझना चाहते हैं तो मैं आपको उदाहरण देकर समझा सकता हूँ। इसका सबसे अच्छा उदाहरण देश में हो रहा विकास है। एकदम एसिम्प्टमैटिक विकास। लक्षण कुछ दिखते नहीं, टेस्टिंग के कोई साधन नहीं मगर बताया जा रहा है कि कितना सारा विकास हो गया है।

अक्सर तो एक शिक्षा मंत्री का शिक्षित होना भी एसिम्प्टमैटिक ही रहता है। न डिग्री, न ज्ञान मगर हैं शिक्षा के मंत्री।

बाकी सब तो छोड़ो, यहाँ तो चुनाव के नतीजे भी एसिम्प्टमैटिक ही हैं। हवा चलती है किस दिशा की और नतीजे की पतंग उड़ती है विपरीत दिशा में। विपक्ष है कि चुनावी रणनीति बनाने की बजाए पतंग कटने के इन्तजार में ‘काइट रनर’ होने की प्रेक्टिस कर रहा है। कब किसान इनकी पतंग काटे और ये भाग कर लूट लें। खुद के भरोसे तो कुछ होने से रहा। एक उम्मीद ये भी है कि कभी कभी पतंग खुद ही पेड़ और झाड़ियों में उलझ जाती है और उड़ाने वाले को खुद ही धागा तोड़ कर छोड़ देना पड़ता है।

बाकी नए आयाम और भी आ गए हैँ जैसे कि वादों की होम डिलेवरी, आभासी सेवाओं का कर्ब साईड पिक अप और आपकी उम्मीदों पर अनिश्चित कालीन लॉकडाउन।

अभी तो जाने में समय है इस आपदा को – ज्ञानियों की सुनामी ही न आ जाए।

-समीर लाल ‘समीर’

 भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी ३१,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58094761


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शनिवार, जनवरी 23, 2021

बिजली रानी, बड़ी सयानी

 



समाचार पढ़ा:

"मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने प्रयोग कर दिखा दिया है कि अब बिजली के तार की जरूरत नहीं पडेगी। उन्होंने बिना तार के बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान पहूँचा कर दिखा दिया. वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह रिजोनेंस नामक सिद्धांत के कारण हुआ है।"

यह खबर जहां एक तरफ खुशी देती है तो दूसरी तरफ न जाने कैसे कैसे प्रश्न खड़े कर देती है दिमाग में. अमरीका में तो चलो, मान लिया.

मगर भारत में?

एक मात्र आशा की किरण, वो भी जाती रहेगी. अरे, बिजली का तार दिखता है तो आशा बंधी रहती है कि आज नहीं तो कल, भले ही घंटे भर के लिए, बिजली आ ही जायेगी. आशा पर तो आसमान टिका है, वो आशा भी जाती रहेगी.

सड़कें विधवा की मांग की तरह कितनी सूनी दिखेंगी. न बिजली के उलझे तार होंगे और न ही उनमें फंसी पतंगे होंगी. जैसे ही नजर उठी और सीधे आसमान. कैसा लगेगा देखकर. आँखे चौंधिया जायेंगी. ऐसे सीधे आसमान देखने की कहाँ आदत रह गई है.

चिड़ियों को देखता हूँ तो परेशान हो उठता हूँ. संवेदनशील हूँ इसलिये आँखें नम हो जाती हैं. उनकी तो मानो एक मात्र बची कुर्सी भी जाती रही बिना गलती के. ये पंछी तो बेचारे चुपचाप ही बैठे थे बिना किसी बड़ी महत्वाकांक्षा के. पेड़ तो इन निर्मोहि मानवों ने पहले ही नहीं छोड़े. बिजली के तार ही एकमात्र सहारा थे, लो अब वो भी विदा हो रहे हैं.

विचार करता हूँ कि जैसे ही ये बिना तार की बिजली भारत के शहर शहर पहुँचेगी तो उत्तर प्रदेश और बिहार भी एक न एक दिन जरुर पहुँचेगी. तब जो उत्तर प्रदेश का बिजली मंत्री इस कार्य को अंजाम देगा वो राजा राम मोहन राय सम्मान से नवाज़ा जायेगा.

राजा राम मोहन राय ने भारत से सति प्रथा खत्म करवाई थी और यह महाशय, उत्तर प्रदेश से कटिया प्रथा समाप्त करने के लिए याद रखे जायेंगे. जब तार ही नही रहेंगे तो कटिया काहे में फसांयेंगे लोग. वह दिन कटिया संस्कृति के स्वर्णिम युग का अंतिम दिन होगा और आने वाली पीढ़ी इस प्रथा के बारे में केवल इतिहास के पन्नों में पढ़ेगी जैसा यह पीढ़ी नेताओं की ईमानदारी के बारे में पढ़ रही है.

थोड़ा विश्व बैंक से लोन लेने में आराम हो जायेगा. अभी तो उनका ऑडीटर आता है तो झूठ नहीं बोल पाते, जब तक तार-वार नहीं बिछवा दें कि इस गाँव का विद्युतिकरण हो गया है. तब तो दिन में ऑडीटर को गाँव गाँव की हेलिकॉप्टर यात्रा करा कर बता दो कि १००% विद्युतिकरण हो गया है. तार तो रहेंगे ही नहीं तो देखना दिखाना क्या? शाम तक दिल्ली वापिस. पाँच सितारा होटल में पार्टी और लोन अप्रूव अगले प्रोजेक्ट के लिए भी.

एक आयाम बेरोजगारी का संकट भी है. अभी भी हालांकि अधिकतर बिजली की लाईनें शो पीस ही हैं, लेकिन टूट-टाट जायें, चोरी हो जायें तो कुछ काम विद्युत वितरण विभाग के मरम्मत कर्मचारियों के लिए निकल ही पड़ता है. एक अच्छा खासा भरा पूरा अमला है इसके लिए. उनका क्या होगा?

न तार होंगे, न टूटेंगे, न चोरी होगी. वो बेचारे तो बेकाम हो जायेंगे नाम से भी.

न मरम्मत कर्मचारियों की नौकरी बचेगी, न तार चोरों की रोजी और न उनको पकड़ने वाली पुलिस की रोटी. बड़ा विकट सीन हो जायेगा हाहाकारी का. कितनी खुदकुशियाँ होंगी, सोच कर काँप जाता हूँ. किसानों की खुदकुशी की घटना तो इस राष्ट्रव्यापी घटना के सामने अपना अस्तित्व ही खो देगी हालांकि अस्थित्व बचाकर भी क्या कर लिया. कौन पूछ रहा है. सरकार तो शायद अन्य झमेलों में उन्हें भूला ही बैठी है.

चलो चोर तो फिर भी गुंडई की सड़क से होते हुए डकैती का राज मार्ग ले कर विधान सभा या संसद में चले जायेंगे, जाते ही है, सिद्ध मार्ग है मगर ये बेकार बेकाम हुए मरम्मत कर्मचारी और पुलिस. इनका क्या होगा?

एक तार का जाना और इतनी समस्यायों से घिर जाना. कैसे पसंद करेगी मेरे देश की भोली और मासूम जनता!!

योजना अधिकारियों से करबद्ध निवेदन है कि जो भी तय करना, इन सब बातों पर चिन्तन कर लेना.

मेरा क्या, मैं तो बस सलाह ही दे सकता हूँ. भारतीय हूँ, निःशुल्क हर मामले में सलाह देना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी २४, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57940740


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शनिवार, जनवरी 16, 2021

कलयुग का सेल्फी युग

 



जैसे एक आदमी होते हैं कई आदमी उसी तरह एक युग में होते हैं कई युग.

कलयुग के इस सेल्फी युग में जब व्यक्ति फोन खरीदने निकलता है तब उसमें फोन की नहीं, उस फोन में लगे कैमरे की खूबियाँ देखता है.. फोन की साऊन्ड क्वालिटी में भले ही थोड़ी खड़खड़ाहट हो, चाहे जगह जगह सिगनल लूज हो जायें.. मगर कैमरे की रिजल्ट चौचक होना चाहिये. यहाँ चौचक से यह तात्पर्य नहीं है कि तस्वीर की डीटेल एकदम विस्तार से दिखाये. अच्छे और चौचक रिजल्ट वाले कैमरे का यहाँ अर्थ है कि हम भले ही सच में कैसे भी दिखते हों, फोटो में कैमरा हमें सलमान और पत्नी को कटरीना दिखाये. बाकी की सारी डीटेल विस्तार से छिपाये, यही उम्मीद रहती है दिल में.

कहने का तात्पर्य यह कि आदतें कुछ यूँ बदली कि व्यक्ति खरीदता फोन है, चाहता अद्भुत कैमरा है जो उसे हीरो दिखाये. यह वैसा ही है जैसे इन्सान चुनता अपना नेता है मगर उसे मिलता फकीर है. और फकीर भी ऐसा..जिसके सेल्फी के चलते तो कई बार सेल्फी सोचती होगी अगर ये न होते तो मेरा क्या होता?  इसी शौक के चलते जब वे कश्मीर में नई बनी लंबी सुरंग में खड़े सेल्फी खींच कर यहाँ मोह मोह के धागे सुलझा रहे थे, उस वक्त ज्ञानी लोग उनकी इस सेल्फी के खींचने के कारण की पहेली बुझा रहे हैं.

सेल्फी का माहौल ऐसा चला कि सेल्फी खींचना एक विधा हो निकली. फटो का नाम बदल कर सेल्फी हो गया.   फोटो स्टूडियो खुल गये सेल्फी खींचने वाले..अपना अटपटा सा विज्ञापन करते कि हमारे यहाँ नेचुरल सेल्फी खींची जाती है..बिना सोचे हुए कि नेचुरल चाहता कौन है? लोग तो अपने अच्छे खासे चेहरे को पाऊट बना बना कर बन्दर सा कर लेते हैं..उस पर से फोटो शॉप फोन में ही..कभी कुकर जुबान लगा कर तो कभी सींग लगा कर.

ग्रुप टूर बस से उतरे लोग, हर पर्यटन स्थल के फेमस प्वाईंटस पर कतारबद्ध सेल्फी खींचने के लिए भीड़ लगाये खड़े हैं..दूर से देखो तो भेद कर पाना मुश्किल हो जाये कि सेल्फी खींचने वालों की कतार है या नोट बन्दी के समय वाली एटीएम की कतार है या अच्छे दिनों का इन्तजार करने वालों की..यहाँ भी संभावना वही कि जब तक नम्बर आये आये, बस चलने का समय हो गया..जो सेल्फी खींच पाया उसके चेहरे पर वही विजयी भाव जैसे उस वक्त जो नोट निकाल लेता था मशीन में नोट खत्म होने के पहले.

लम्बी लम्बी सेल्फी स्टिक निकल पड़ी हैं..हाथ का विस्तार सीमित है..लट्ठ का असीमित..शायद इसी लिए लठेतों से लोग डरते हैं. स्टिक दूर से सेल्फी लेगा..मतलब की ज्यादा कवरेज..कवरेज का जमाना है. जितना ज्यादा कवरेज, उतना सफल व्यक्तित्व.

बुजुर्ग परिशां दिखे..कि यह तो हद हुई कि दादी मर गई और बंदा उनकी डेथ बॉडी के साथ सेल्फी उतार कर फेस बुक अपडेट कर रहा है..है तो हद ही मगर उससे कम..जहाँ बंदें को बचाने के बदले उसकी आत्म हत्या की कोशिश को अपने बैकग्राऊण्ड में कैच कर शेयर कर देने की होड़ मची हो.

आज का इन्सान वक्त की महत्ता को अहसासता नहीं...आज का इन्सान गुलाब की महक को महकता नहीं..आज का इन्सान किसी के दर्द से गमजदा होता नहीं..आज का इन्सान उन्हें कैद करता है अपने फोन के कैमरे के माध्यम से..अपनी सेल्फी के साथ.....मात्र वक्त के साथ वो लम्हे बाँटने के लिए जो उसने खुद मिस कर दिये सेल्फी खींच कर बांटने में...बिना उन्हें अहसासे..

न जाने किस ओर ले जायेगा ये सेल्फी का युग इस युग को..इसलिए आज एक सेल्फी खींच लेते हैं कि कल काम आयेगी आज को परिभाषित करने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १७, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57776633

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शनिवार, जनवरी 09, 2021

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को!!

 

जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने.

पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर.

जो भी मिले या हमारे पास से निकले, उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.

हमारे यहाँ तो आज मरे और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें. खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.

मगर यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में. शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में.

खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से भाषण भी तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. बस, यही मन में था और क्या.

शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:

’सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’

आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?

वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि वो इन्वाईटेड नहीं है.

लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:

’भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’

हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है STRICTLY ONLY BY INVITATION याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.

गजब हो गया भई. तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!

सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. आंसू बहा लेंगे. भारत में राजनीति की है , आंसू तो कभी भी बहा सकते हैं

पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है फ्यूनरल मेकअप के लिए. भारतीय हैं तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें.

हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:

"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू"

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १० ,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57625431

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शनिवार, जनवरी 02, 2021

नए जमाने के साथ कदमताल

 


नया जमाना आ गया था. एक या दो बच्चे बस. बेटा या बेटी-क्या फरक पड़ता है? दोनों ही एक समान.

शिब्बू नये जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलाने में विश्वास करने वाला था. खुली सोच का मालिक. ऐसा वो भी सोचता था और उसके जानने वाले भी.

एक प्राईवेट फर्म में सुपरवाईजर था.

एक बेटी की और बस! तय कर लिया कि इसी को पाल पोस कर इसे बहुत अच्छा भविष्य देना है. सबने खूब तारीफ की. माँ बाप ने कहा कि एक बेटा और कर लो, वो नहीं माना. माँ बाप को पुरातन ठहारा दिया और खुद को प्रगतिशील घोषित करते हुए बस एक बेटी पर रुक गया. पत्नी की भी कोई बात नहीं मानी. पौरुष पर उठती उंगलियों को प्रगतिशील मानसिकता ठेंगा दिखाती रही और वो अपने फैसले पर अडिग रहा.

खूब पढ़ाया बिटिया को. इंजिनियर बना गई आई टी में. नया जमाना था. आई टी का फैशन था. कैम्पस इन्टरव्यू हुआ और बिटिया का मल्टी नेशनल में सेलेक्शन हो गया. सब जैसा सोचा था वैसा चला.

मंहगाई इस बीच मूँह खोलती चली गई. माँ की लम्बी बिमारी ने जमा पूंजी खत्म कर दी. उम्र के साथ रिटायरमेन्ट हो गया. नया जमाना, नये लोग. पढ़ाई और नया काम सीखने में वह पुराना ही रह गया, बिना अपडेट हुआ..वर्कफोर्स से बाहर हो गया. उम्र ५८ पार हो गई. नया कुछ करने का जज्बा और ताकत खो गई. घर बैठ गया. बेटी उसी शहर में नौकरी करती रही. कई लाख का पैकेज. जरुरत भी क्या है कुछ करने की, वह सोचा करता. प्राईवेट कम्पनी में था तो न कोई पेंशन ही बनी और न कोई फंड मिला.

बिटिया को तो समय के साथ साथ बड़ी होना ही था तो बड़ी होती गई. शादी की फिक्र माँ को घुन की तरह खाने लगी मगर शिब्बू-उसे जैसे इस बात की फिक्र ही न हो.

पत्नी कहती तो झल्ला जाता कि तुम क्या सोचती हो, मुझे चिन्ता नहीं? जवान बेटी घर पर है. बाप हूँ उसका..चैन से सो तक नहीं पाता मगर कोई कायदे का लड़का मिले तब न!! किसी भी ऐरे गैरे से थोड़े ही न बाँध दूँगा. यह उसका सधा हुआ पत्नी को लाजबाब कर देना वाला हमेशा ही जबाब होता.

पत्नी अपने भाई से भी अपनी चिन्ता जाहिर करती. उसने भी रिश्ता बताया मगर शिब्बू बात करने गया तो उसे परिवार पसंद न आया. दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी लड़के पर थी. कैसे अपनी बिटिया को उस घर भेज दे.

पत्नी इसी चिन्ता में एक दिन चल बसी. घर पर रह गये शिब्बू और उसकी बिटिया.

जितने रिश्ते आये, किसी न किसी वजह से शिब्बू को पसंद न आये. लड़की पैंतीस बरस की हो गई मगर शिब्बू को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता.

लड़की की तन्ख्वाह पर ठाठ से रहता था और बिटिया ही उसकी देखरेख करती थी.

उस रोज शिब्बू को दिल का दौरा पड़ा और शाम को वो गुजर गया.

उसको डायरी लिखने का शौक था. उसकी डायरी का पन्ना जो आज पढ़ा: १० वर्ष पूर्व यानि जब बिटिया २५ बरस की थी और नौकरी करते तीन बरस बीत गये थे तथा शिब्बू रिटायर हो चुका था उस तारीख के पन्ने में दर्ज था...

शीर्षक: बिटिया की शादी

और उसके नीचे मात्र एक पंक्ति:

" मैं स्वार्थी हो गया हूँ."

आज भी न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. प्रगतिशील इंसान की सोच भी कभी कितनी पतनशील हो सकती है?

बिटिया अब घर पर अकेले रहती है. अभी अभी दफ्तर सर घर जाने के लिये निकली है-बेमकसद!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी ०३,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57462723


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शनिवार, दिसंबर 19, 2020

विकास की रेल यात्रा

 


चार दिन बाद गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से लौटा. बचपन में भी हर साल ही गोरखपुर जाना होता था. ननिहाल और ददिहाल दोनों ही वहाँ हैं. तब तीन दिन की रेल यात्रा करते हुए राजस्थान से थर्ड क्लास में जाया करते थे. कोयले वाले इंजन की रेल. साथ होते लोहे के बक्से, होल्डाल, पूरी, आलू और करेले की तरकारी. सुराही में एकदम ठंडा पानी. रास्ते में मूंगफली, चने, कुल्हड़ में चाय. फट्टी बजाकर गाना गा गा कर पैसा मांगते बच्चे.राजनित और न जाने किन किन समस्याओं पर बहस करते वो अनजान सहयात्री जिनके रहते इतने लम्बे सफर का पता ही नहीं चलता था.तीन दिन बाद जब घर पहुँचते तो कुछ तो ईश्वरीय देन( खुद का रंग) और कुछ रेल की मेहरबानी, लगता कि जैसे कोयले में नहाये हुए हैं. इक्के या टांगे में लद कर नानी/दादी के घर पहुँचते थे. फिर पतंग उड़ाना, मिट्टी के खिलोने-शेरे, भालू.हर यात्रा याददाश्त बन जाती. जैसे ही वापस लौटते, अगले बरस फिर से जाने का इन्तजार लग जाता.घर लौट कर फट्टी वालों की नकल करते, उनके जैसे ही गाने की कोशिश,

इस बार जब गोरखपुर से चला तो वही पुराने दिनों की याद ने घेर लिया. मगर एसी डिब्बे में वो आनन्द कहाँ? और यात्रा भी मात्र १६ घंटे की. यही सोच कर एसी अटेंडेन्ट को सामान का तकादा कर कुछ स्टेशनों के लिए जनरल डिब्बे में आकर बैठ गया. कितना बदल गया है सब कुछ. काफी साफ सुथरा माहौल. न तो कोई बीड़ी पी रहा था. न बाथरुम से उठती गंध, न मूंगफली वाले, न कुल्हड़ वाली चाय. जगह जगह ताजे फलों की फेरी लगाते फेरीवाले, प्लास्टिक के कप में बेस्वादु चाय, कुरकुरे और अंकल चिप्स बेचते नमकीन वाले. बस्स!! लोहे की संदुक की जगह वीआईपी और सफारी के लगेज जिनके पहियों ने न जाने कितने कुलियों की आजिविका को रौंद दिया, वाटर बाटल में पानी. आपसी बातचीत का प्रचलन भी समाप्त सा लगा, अपने सेलफोन से गाने बजाते मगन लोगों की भीड़ में न जाने कहाँ खो गये वो हृदय की गहराई से गाते फट्टी वाले बच्चे और राजनित पर बात करते सहयात्री.

कहते है सब विकास की राह पर है. वाकई, बहुत विकास हो रहा है. आम शहरों में न बिजली, न पानी, न ठीकठाक सड़कें..बस विकास हो रहा है. बच्चे बच्चे के हाथ में सेल फोन, तरह तरह की गाड़ी, सीमित जमीनों के बढ़ते दाम, लोगों के सर पर ऋणों का पहाड़, हर गांव-शहर से महानगरों को रोजगारोन्मुख पलायन करते युवक, युवतियाँ. भारत शाईनिंग-मगर मुझे पुकारता मेरे बचपन का भारत-जिसे ढ़ूंढ़ने मैं आया था, न जाने कहाँ खो गया है और अखबार की खबरें कहती है कि इसी के साथ ही खो गई है वो सहिष्णुता, सहनशीलता, आपसी सदभाव और सर्वधर्म भाईचारा. सब अपने आप में मगन हैं.

मुझे बोरियत होने लगती है. मैं उठकर अपने एसी डिब्बे में वापस आ जाता हूँ.

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार दिसम्बर २०, २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57148406

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रविवार, दिसंबर 13, 2020

अगर ससम्मान जीवन जीना है तो वक्त के साथ कदमताल करो

 


किसी ने कहा है कि अगर ससम्मान जीवन जीना है तो वक्त के साथ कदमताल कर के चलो अर्थात जो प्रचलन में है, उसे अपनाओ वरना पिछड़ जाओगे. अब पार्ट टाईम कवि हैं, तो उसी क्षेत्र में छिद्रान्वेषण प्रारंभ किया. ज्ञात हुआ कि वर्तमान प्रचलन के अनुसार, बड़ा साहित्यकार बनना है तो दूर दराज के विदेशी कवियों की रचनाऐं ठेलो.

पोलिश कवियत्री, रुमानिया का कवि, उजबेकिस्तान का शायर, फ्रेन्च रचनाकार, और साथ में इटेलियन चित्रकार की चित्रकारी ससाभार उसी चित्रकार के, जैसे कि उसे व्यक्तिगत जानते हों. वैसे, बात जितनी सरल लग रही है, उतनी है नहीं. मन में कई संशय उठते हैं. अतः मैने अपने मित्र को किसी के द्वारा प्रेषित एक बड़े साहित्यकार द्वारा छापी एक विदेशी कवि की रचना मय चित्र भेज कर उसके विचार जानने चाहे. त्वरित टिप्पणी में उसे हमसे भी ज्यादा महारथ हासिल है. तुरंत जबाब आ गया. कहते हैं कि कविता तो खैर जैसी भी हो, विदेशी होते हुए भी हिन्दी पर पकड़ सराहनीय है.

मैं माथा पकड़ कर बैठ गया. लेकिन फिर सोचता हूँ कि इसमें उसकी क्या गल्ती है. अव्वल तो ऐसी कविताओं के साथ लिखा ही नहीं होता कि यह अनुवाद है या भावानुवाद या किसने किया है और अगर गल्ती से लिख भी दें तो कहीं कोने कचरे में हल्के से और कवि का नाम और उनका देश बोल्ड में.

मगर फैशन है तो है. सब लगे हैं तो हम क्यूँ पीछे रहें. शायद इसी रास्ते कुछ मुकाम हासिल हो.

मूल चिन्ता यह नहीं की कैसे करें? मूल चिन्ता है कि किसकी कविता का अनुवाद करें? वो बेहतरीन रचना मिले कहाँ से, जो हिन्दी में भी बेहतरीनीयत कायम रख सके? घोर चिन्तन और संकट की इस बेला में हमें याद आया हमारा पुराना संकट मोचन मित्र. उसकी दखल हर क्षेत्र में विशेषज्ञ वाली है और इसी के चलते कालेज के जमाने में उसे संकट मोचन की उपाधि से अलंकृत किया गया था हम मित्रों के द्वारा. संकट कैसा भी हो, उन्हें पता लगने की देर है और वो उसे मोचने चले आयेंगे. अतः हमने खबर भेजी कि संकट की घड़ी है, चले आओ और वो हाजिर.

विषय वस्तु समझने, सुनने और अनेकों उदाहरण जो मैने प्रस्तुत किये, देखने के बाद पूरी अथॉरटी से बोले: ’यार, तुम भी तो कविता लिखते हो? एकाध गद्यात्मक कविता निकालो अपनी डायरी से.’ हमने धीरे से अपनी एक कविता बढ़ा दी. एक नजर देखकर बोले, हाँ, यह चल जायेगी क्यूँकि कुछ खास समझ नहीं आ रही कि तुम कहना क्या चाह रहे हो!!’

फिर उन्होंने इन्टरनेट का रुख किया और गुगल सर्च मारी: ’स्विडन के फेमस लोग’. सर्च के जबाब में ओलिन सरनेम चार पाँच बार दिखा, नोट कर लिया. दूसरा सरनेम दो बार दिखा तो वहाँ से फर्स्ट नेम ’पीटर’ निकाल लाये और शीर्षक तैयार ’स्विडन के प्रख्यात जनकवि पीटर ओलिन की कविता’. मेरा तो नहीं मगर इस संकट मोचक का दावा है कि बहुतेरे लोग इसी तरह चिपका रहे हैं अपनी रचनाऐं विदेशी नाम से और चल निकले हैं.

आगे के लिए भी सलाह दी है कि अगर कविता तैयार न हो तो किसी भी जगह से ८-१० लाईन का अच्छा गद्य उठा कर कौमा फुलस्टाप की जगह बदलो. शब्दों की प्लेसिंग बदलो, थोड़ा कविता टाईप शेप देकर ठेल दो, तुम तो कवि हो, इतना तो समझते ही हो. एक विदेशी नाम मय देश के चेपों और बस, चल निकलोगे गुरु.

 

संकट मोचन तो हमारा संकट मोच चले गये, कहीं और किसी और का संकट मोचने और हम खोज रहे हैँ एक नया विदेशी नाम अपनी अगली कविता के लिए.

अपना काम का श्रेय किसी और को देने वाला हम जैसा दानवीर साहित्यकार कहीं न देखा होगा। इतिहास में नाम दर्ज होकर रहेगा.

-समीर लाल ‘समीर’

 

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार दिसम्बर १३ , २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/56998010

 

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शनिवार, दिसंबर 05, 2020

बहुत कमजोर होता है जिज्ञासुओं का पाचन तंत्र

 


तिवारी जी का कहना है कि आजकल वो फैशनेबल हो गए हैं। अचरज बस इस बात का है कि तिवारी जो पहले भी इसी लिबास में रहते थे और आज भी, चलते भी उसी साइकिल पर हैं पिछले कई दशकों से, फिर फैशनबेल होने से क्या फरक पड़ा?

जिज्ञासुओं का पाचन तंत्र हमेशा से कमजोर माना गया है। कोई भी जिज्ञासा पचा ही नहीं पाते। इसीलिए जिज्ञासु अच्छे नेता नहीं बन पाते होंगे। कठोर त्वचा और घनघोर पाचन क्षमता तो नेतागिरी के लिए आवश्यक तत्व हैं। गाली खाने से लेकर पैसा पचा जाने तक में न कोई शर्म आए और न ही डकार, तो ही आप सफल नेता बन सकते हैं।

जिज्ञासु प्रवृति का होने की वजह से मैं भी अपनी जिज्ञासा पचा न पाया और उनसे पूछ बैठा कि आप अपनी ही बात कर रहे हैं न? मुझे तो आप बिल्कुल पहले वाले ही नजर आ रहे हैं, क्या बदला है आपके फैशनेबल हो जाने से?

तिवारी जी उन्हीं जानी पहचानी नजरों से मुस्कराते हुए मुझे देखा जिसमें वो बिना बोले ही बोल जाते है कि तुम कितने बड़े बेवकूफ हो, कुछ समझते ही नहीं? इन नजरों का फायदा उनको तब पक्का मिलेगा जब कभी वो चुनाव जीत कर मंत्री बन जाएंगे। हर नेता चुनाव जितने के बाद उनके वादे याद दिलाने पर ऐसे ही तो मुस्कराता है और बिना बोले बोल जाता है कि तुम कितने बड़े बेवकूफ हो!!

मुस्कराने के बाद करीबी संबंधों की वजह से उन्होंने बताया कि आजकल वो अधिकतर समय स्व-उत्थान में लगा रहे हैं। सफलता के सिद्धांत सीख रहे हैं। जीवन में तरक्की करने के सूक्ष्म सूत्र समझ रहे हैं। ऐसी ऐसी गहन विधायें जान गए हैं कि किसी भी मनचाही मंजिल पर पहुँचने के लिए मंजिल खुद चल कर आप तक आए।

मैं आश्चर्य चकित सा उनकी बात सुन रहा था। मैंने कहा कि आप कहाँ से और कैसे सीख रहे हैं यह बाद में बताइएगा मगर पहले यह बतायें कि उम्र के इस पड़ाव में, जहाँ से इंसान ढलान पर उतरने की तैयारी करता है, तब आप चढ़ने के गुर सीखने निकले हैं?

तिवारी जी पुनः उन्हीं जानी पहचानी नजरों से मुस्कराये। फिर बोले उसका भी जबाब देता हूँ।  मगर पहले यह जान लो कि यूट्यूब पर ज्ञान का सागर है। आजकल यही फैशन ट्रेंड है। हजारों मोटिवेशनल स्पीकर सुबह से शाम तक यही सिखा रहे हैं। बस आपमें सीखने की ललक होना चाहिए। पिछले दो दिनों से तो एक स्पीकर को सुन कर मैं चार बजे सुबह उठ जाता हूँ यूट्यूब सुनने के लिए। वो बता रहे थे कि यदि आप २१ दिन तक कोई भी कार्य लगातार करें तो वह आपकी आदत बन जाता है। २१ दिन के बाद ४ बजे सुबह उठना मेरी आदत बन जाएगा। मैंने तिवारी जी से पूछा तो नहीं किन्तु जो बंदा रात में नींद की गोली खाकर सोता हो, वो चार बजे सुबह जागने की आदत डालने पर क्यूँ उतारू है? और अगर आदत पड़ भी गई तो जाग कर करेगा क्या? सारा दिन जो चौक पर पान की दुकान पर बैठा समय काटता है, उस अकेले के लिए पान वाला चार बजे तो दुकान खोलने से रहा। वैसे भी इन मोटिवेशनल स्पीकर्स को जरूरत से ज्यादा सुनने में और गंजेड़ी हो जाने में कोई खास फरक नहीं है। दोनों ही  निष्क्रियता के चरम पर बैठे मंजिल के खुद चले आने की ललक जगाए बैठे हैं।

तिवारी जी आगे बोले कि उम्र की तो हमसे बात करो मत – जब ७८ साल में बंदा अमरीका का राष्ट्रपति बन सकता है तो मैं कुछ तो बन ही सकता हूँ। मैं उनको क्या बताता कि वो ७८ साल की उम्र में राष्ट्रपति बना जरूर है मगर वो इसके पहले सारा जीवन पान की दुकान पर बैठा ज्ञान नहीं बाँट रहा था।

मैंने उनको समझाया कि नेता बनने के लिये ही अगर यह सब सीख रहे हैँ तो २१ दिन लगातार झूठ, वादा खिलाफी, गुंडई, रिश्वतखोरी, असंवेदनशीलता, अमानवीयता, घड़ियाली आँसू बहाने की प्रेक्टिस करके इन सबको   अपनी आदत बनाइये, फिर देखिए कैसे सफलता की मंजिल आप तक खुद चल कर आती है।  कैसे आपका ही नहीं आपके जानने वालों का जीवन भी सफल हो जाता है।

तिवारी जी आज पहली बार कुछ अलग तरह से मुस्कराये, मानो कह रहे हों कि मैं भी कहाँ यूट्यूब के चक्कर में पड़ा था, असली गुरु तो तुम निकले। आज पहली बार तिवारी जी एकदम मोटिवेटेड दिखे।

उनके इस भाव को देखकर मेरा मन हो रहा है कि मैं भी अपना यूट्यूब चैनल शुरू कर ही दूँ मोटिवेशनल स्पीकिंग का। लोग यही तो चाहते हैं इसीलिए फैशन में भी है।

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार दिसम्बर ६, २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/56820874

 

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