आज माँ को गये पूरे ५ बरस हो गये. लगता है कल ही बात हुई थी.
जाने के एक दिन पूर्व ही फोन से बात हो रही थी. तब सोचा भी नहीं था कि यह बात आखिरी बार हो रही है. भोपाल जा रहीं थी. तय पाया था कि परसों लौट कर फिर बात होगी. वो परसों कभी नहीं आया. भोपाल में ही हार्ट अटैक आया और वो नहीं रही.
भारत में रह रहे मेरे भाई, बहन, पिता जी और सारे परिवार के सदस्यों के साथ वो २८ जनवरी तक रही और मैं परिवार का छोटा, इसमें भी घाटे में रहा, मेरे लिए वो २७ को ही चली गई. हाँ, उस समय कनाडा में २७ तारीख थी और भारत में २८ का सबेरा. सब उसके साथ १२ घंटे ज्यादा रहे और मैं, उसे बाकी सबसे १२ घंटे पहले ही खो बैठा.
फोन आया था दोस्त का. तुरंत पिता जी को फोन लगाया. भोपाल में अस्पताल में थे माँ के पार्थिव शरीर के साथ, बस एक शब्द-हाँ. बाकी मौन सिर्फ अहसास की भाषा अगले ४ मिनट तक!!
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| माँ-श्रीमति सुषमा लाल (२८ जनवरी, २००५) |
लगता है कि कल ही उससे बात करता था. ये ५ साल, एक खालीपन, कब निकल गये मैं नहीं समझ पाया. अभी भी वो रोज मिलती है मुझे ख्वाबों में. कोई रात याद नहीं जब वो न आई हो. जाने क्या क्या समझाती है. मैं झगड़ता भी हूँ वैसे ही जैसे जब वो सामने थी... फिर नींद खुलने पर रोता भी हूँ मगर वो रहती आस पास ही है. तन से नहीं...मन से तो वो गई ही नहीं. चुप करा देती है. कोई जान ही नहीं पाता उसके रहते कि मैं रोया भी.
मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज ५ साल बाद भी. वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था. तुम न देख पाओ तो तुम जानो.
माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर.
विश्व की हर माँ सिर्फ माँ होती है और बस माँ होती है..भगवान की भी कहाँ इतनी बड़ी बिसात कि माँ बन पाये..भगवान होना अलग बात है!!! वो इससे बहुत उपर है.
आज २८ जनवरी है. भारत के हिसाब से उसकी पाँचवीं पुण्य तिथि. मेरे हिसाब से कल थी. खैर!! मैने इस घाटे से समझौता करना सीख लिया है.
माँ २८ को गई तो साधना के पिता उसके ठीक एक दिन बाद २९ जनवरी को. जब माँ गई तब साधना भारत से कनाडा आने के लिए जहाज में थी और जब यहाँ कनाडा में उतरी, तो उसके पिता जी ने दम तोड़ दिया ऐसी खबर आई.
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| साधना के पापा-स्व.श्री के.एन. सिन्हा (२९ जनवरी, २००५) |
हम दो दिन बाद भारत पहुँचे. न मुझे माँ के अंतिम दर्शन हुए और न उसे उसके पिता जी के.
बस, कभी हिसाब करने का मन करता है कि यहाँ आकर क्या खोया, क्या पाया!!
बिखरे मोती का विमोचन हुए बहुत समय नहीं बीता है. आज किसी को वही किताब भेंट करता था. माँ को समर्पित यह पुस्तक अनायास ही माँ की याद सामने ले आई, बस, कुछ पंक्तियाँ बह निकली..अनगढ़ सी...बिना सुधार मय आंसू पेश करता हूँ.
आज फिर रोज की तरह
माँ याद आई!!
माँ
सिर्फ मेरी माँ नहीं थी
माँ
मेरे भाई की भी
मॉ थी
और भाई की बिटिया की
बूढ़ी दादी..
और
मेरी बहन की
सिर्फ माँ नहीं
एक सहेली भी
एक हमराज...
और फिर उसकी बेटियों की
प्यारी नानी भी वो ही...
उनसे बच्चों सा खेलती नानी...
वो सिर्फ मेरी माँ नहीं
गन्सु काका की
माँ स्वरुप भाभी भी
और राधे ताऊ की
बेटी जैसी बहु भी...
दादा की
मूँह लगी बहू
दादी की आदेशों की पालनकर्ता
उनकी परिपाटी की मूक शिष्या..
उन्हें आगे ले जाने को तत्पर...
और नानी की
प्यारी बिटिया
वो थी
अपनी छोटी बहिन और भाईयों की दीदी
और अपनी दीदी की नटखट छुटकी..
नाना का अरमान
वो राधा की सहेली ही नहीं
माँ सिर्फ मेरी ही नहीं..
उसकी बेटी की भी
माँ थी...
माँ
कितना कुछ थी..
बस और बस,
माँ सिर्फ माँ थी..
हर रुप में..
हर स्वरुप में..
मगर फिर भी
सिर्फ मेरी ही नहीं...
माँ हर बार
सिर्फ माँ थी.
अब
माँ नहीं है
इस दुनिया में...
वो मेरे पिता की
पत्नी, बल्कि सिर्फ पत्नी ही नहीं
हर दुख सुख की सहभागी
उनकी जीवन गाड़ी का
दूसरा पहिया...
अब
पिता छड़ी का सहारा लेते हैं..
और फिर भी
लचक कर चलते हैं...
माँ!!
जाने क्या क्या थी
माँ थी
मेरा घर
वो गई
मैं बेघर हुआ!
--समीर लाल ’समीर’
माँ, क्या सचमुच तुझे गये ५ साल हो गये??

























