रविवार, दिसंबर 31, 2006

आपके लिये..

नूतन वर्षाभिनन्दन : दो मुक्तक

-१-

रोशन राहें दूर तलक हैं, मंजिल तक अब जाना है
नये साल में आशाओं का, फिर से खुला खजाना है
अब तक जो भी सीखा तुमने, उसको नींव बना लेना
आने वाले साल मे उसपर, तुमको महल बनाना है.

-२-

खुशहाली हो साथ तुम्हारे, सफल हो साधना तेरी
ईश कृपा हो तुझ पर हर पल, यही अराधना मेरी.
पूरे हों वो स्वपन सभी जो, अब तक तुमने देखे हैं
मंगलमय हो साल तुम्हारा, यही है कामना मेरी.

--नव वर्ष की ढ़ेरों मंगलकामनाओं के साथ

--समीर लाल 'समीर'

हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ...

//भावनाओं में बहकर लेख कुछ ज्यादा लंबा हो गया है कृप्या क्षमा करें//

मम्मी-पापा दोनों आये थे. मई २००४ की बात है. चार महिने मेरे पास रहे. पता ही नहीं चला, कब आये और कब वापस जाने का समय आ गया. बहुत घूमें थे हम सब. कनाड़ा और अमेरीका के अनेकों शहरों में.सितम्बर में जाने से पहले मम्मी एक तोता (बज्जी) खरीद कर मुझे तोहफे में दे गयीं थी. दुकान वाले ने बताया था कि लड़की है तो नामकरण हुआ ऐना. बहुत जल्दी सब से हिल मिल गई. मम्मी के साथ तो दस दिन ही रही और फिर मम्मी पापा भारत लौट गये.वही मेरी और ऐना की आखिरी मुलाकात थी मम्मी से. फिर मेरी पत्नी दो माह बाद ही भारत गई और जिस दिन वह लौटी, मम्मी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. खैर, मेरी बदनसीबी, मैं तो उनकी अंतिम क्रिया के बाद पहूँचा.

इस बीच, पत्नी जब भारत गई थी, तब ऐना की देख रेख की सारी जिम्मेदारी मेरी उपर आ गई. बहुत जल्दी उसने सब सिखना शुरु कर दिया था. उसके मन से इंसानों का डर भी खत्म हो गया था. उसका पिंजड़ा हमेशा खुला रहता था. जब तक मन हो बाहर खेले और फिर अपने आप ही अंदर चली जाती थी. अब तो हम उससे डर कर चलते थे कि कहीं पैर के नीचे न दब जाये मगर उसे हम पर विश्वास था और वह स्वछंद यहाँ वहाँ घुमती थी. काश, हम इंसान भी एक दूसरे पर ऐसा ही भरोसा कर पाते. उसे अपना घंटी लगा खिलौना बहुत पसंद था, हमेशा उससे खेलती. अगर उसे अलग करके दूसरा खिलौना टांग दें तो चीं चीं करके लड़ने लग जाती थी. उसी खिलौने से उसने मुँह से घंटी बजाना सीख लिया था. दिन भर बैठे मुँह से घंटी बजाती रहती. कोई बड़ा ज्ञानी ही जान सकता था कि सच में घंटी बज रही है कि ऐना आवाज निकाल रही है. धीरे धीरे उसके पास ढ़ेरों खिलौनों का आंबार लग गया मगर घंटी वाले खिलौने का मोह उसने कभी नहीं छोड़ा. आज सोचता हूँ तो लगता है हर एक की जिंदगी में एक न एक प्रिय खिलौना जरुर आता है जिसका मोह जिंदगी भर नहीं छूटता, भले आप उससे खेल ना पाये मगर याद रहता है. जैसे हमारे पंकज भाई को उनका पहिये वाला प्लास्टिक का लाल हाथी आज भी याद है. जबकि अब वो २७ साल के हो चले हैं.

उसके आवाज सीख लेने की काबिलयत से प्रभावित हो, मैं उसके लिये एक शीशा खरीद लाया जिसमें आवाज भरने की सुविधा है और जब भी ऐना उसके सामने जाये तो वो बोलता था. मैने उसमें अपनी आवाज में रिकार्ड किया-हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ. ऐना ने बहुत कोशिश की, मगर कभी भी मेरी आवाज कॉपी नहीं कर पाई. लगता है, अपनी आवाज में ही कुछ डिफेक्ट है वरना तो वो घंटी की आवाज सीख ही गई थी.

रात में हमेशा झूले पर चढ़ कर सोती थी. बाकि सारे दिन झूला देखती भी नहीं थी. जब भी घर में किसी को देखती, अपनी खुद की धुन का गाना, चीं चीं आवाज में सुनाती. सोचती थी हमारा दिल बहला रही है, वैसे सच में, बहलाती तो थी. खाने में थोड़ा पिकी थी. हम कोई सा भी लेटेस खा लें, उन्हें फ्रेश रोमन लेटेस (सबसे महंगा) ही खाना है. साधारण वाला लगाकर तो देखो, वो देखे भी न उसकी तरफ. रईसों के बच्चों वाले सारे चोचले पाल लिये थे. हर महिने नया खिलौना, खाने में हाई स्टेन्डर्ड और लड़की थी तो स्वभाविक है, शीशा दिख तो जाये, घंटों खुद को निहारती थी. एक बार शीशा देखे, फिर हमें कि देखो, कितनी सुंदर दिख रही हूँ. सच में बहुत सुंदर थी, दिखने में भी और दिल से भी.

शाम को उसको टीवी देखना बहुत पसंद था, खास कर सिंदूर....., जो ज़ी टीवी पर आता है. उसके टाईटिल गीत में बजते घूंघरु की आवाज पर पूरी तल्लीनता से सुर मिलाकर नाचती थी. हमसे ज्यादा उसे आभास था कि कब आयेगा वो सिरियल. अगर टीवी बंद हो तो हल्ला मचा मचा कर चालू करवा लेती थी और अब देखें, आप ठीक आठ बजे सोती हैं तो उन्हें हल्ला गुल्ला, रोशनी कुछ भी पसंद नहीं. उन्हें उठा कर अलग कमरे में अंधेरा करके, कंबल से पिंजड़ा ढ़को और आवाज न जाये, इसलिये दरवाजा भी लगा दो, तब वो सोयें. वरना मजाल है कि आपको टीवी देखने दे या कोई काम करने दे. गोद में बैठ कर टीवी देखना, खाना खाना आदि उनकी अदायें थीं. नहाने में उसके जैसा खुश होते मैने आज तक किसी मानव को तो नहीं देखा. हर हफ्ते कुद कुद कर बेसिन में नहाती थी, वही उसका बाथिंग टब था. फिर टावेल में लपेट कर उन्हें निकाला जाता था और सुखाया जाता, तब खाना खाकर, उस दिन वो दुपहर में भी सोती.

समय उड़ता चला गया. एक रोज इसको इनकी बेबी सिटर के पास छोड़ने गये कि हम दो दिन को कहीं जा रहे हैं. उसके पास पचास से ज्यादा चिडियां एक वक्त में बेबी सिटिंग को होती हैं और वो चिडियों को प्यार करने वाली जानकार महिला है. उसी ने हमें ऐसी बात बतायी कि हम तो धक से रह गये. इनका गीत सुनकर और अन्य अवलोकन कर उसने बतलाया कि जिसे आप लड़की समझते हैं वो लड़का है. अब लिजिये. खैर हम उसे लड़की ही मानते रहे और न ही कभी उसका नाम बदला.

कुछ समय से हमने महसूस किया कि ऐना कभी कभी उदास हो जाती थी और चुपचाप बैठी रहती थी. हम समझ गये कि अब वो बड़ी हो गई है और उसे साथी की जरुरत महसूस हो रही है. इन सब बातों में हम यूँ भी ढ़ेड समझदार है लेकिन अपने लड़कों के मामले में इसे प्रदर्शीत नहीं होने देते, हालांकि हम समझ वहां भी रहे हैं.

खैर हम ऐना के लिये साथी ले आये. इस बार लड़की परखवा कर लाये, हालांकि कनाडा के हिसाब से कोई सी भी युगलबंदी गाई जा सकती थी, सब जायज होता. मगर यहाँ हमारा भारतीय होना आडे आ गया. नव आगंतुक का नामकरण किन्हीं विशिष्ठ कारणों से किया गया-बोलू. आप भी अगर फुरसतिया जी की तरह सोचेंगे तो समझेंगे कि नामकरण का कारण उसका अत्याधिक बोलना रहा होगा. नहीं भाई, इसकी भी एक दिलचस्प कथा है.



" हमारी ससुराल मिर्ज़ापुर की है. हम गये वहाँ और हमारे ससुर साहब, अब नहीं हैं इस दुनिया में, के मित्र कालिन का धंधा करते थे ,उन्होंने मुझे उनकी फेक्टरी देखने भेजा ,वहां मालिक ने हमारी खातिरदारी की, दामाद जो थे और वो भी विदेश से गये. अपने खास नौकर को न जाने क्या समझा कर हमारे साथ किया. वो हमें गोदाम दिखाने लगा, पहली कालीन दिखाई और कहा कि ई बोलू है हम सोचे कि यह कोई क्वालिटी होती होगी. तब तक दूसरी कार्पेट दिखाई और कहा कि ई रेड है, लाल रंग की थी वो. तब हम यह समझ पाये कि पहले वाली नीली थी इसलिये बोलू ....यह नयी वाली भी नीले रंग की है सो नामकरण हुआ "बोलू". :)


बोलू ने आते ही अपना माहौल जमा लिया, और जैसा कि होता है कि अगर लड़का ज्यादा उम्र तक बिना लड़की के रह जाये तो जब भी लड़की मिल जाये, शादी हो जाये, तो बस गुलामी करने लगता हैं. वो ही ऐना के साथ भी हुआ. सुबह से शाम तक बोलू के पीछे पीछे घुमना, उसे खाना खिलाना, यहाँ तक की ऐना ने अपना झुला भी सोने के लिये उसको दे दिया और खुद नये झुले पर सोने लगी. अपने सारे खिलौने भी उसके नाम. आजकल जैसा होता है, बोलू ने भी इसका खुब फायदा उठाया और खुब ऐश की. सब हथिया लिया और ऐना के हिस्से मे आई हमारी गोद और अपने पिंजड़े का एक कोना. बाकि सब बोलू का हो गया. बोलू हद से उपर व्यवहारिक और व्यवसायिक और ऐना उतनी ही शर्मिली और संस्कारी. बोलू स्ट्रीट स्मार्ट और ऐना, सभ्य पारिवारिक बाला.

आपस में प्रेम तो बहुत था मगर अचानक, शायद, बोलू को चाँद लाने का वादा कर बैठी ऐना ने इतनी ऊँची उड़ान भरी कि प्रेमांध वो छत न देख पाई और टकरा कर गिर पड़ी. फिर ऐना कभी न चल पाई और न उड़ पाई. सब इलाज करा लिये पाँच दिन में. सी टी स्केन से होम्योपेथिक से एंटिबायोटीक...कुछ भी न काम किया.

पांच दिन से डॉक्टर के ऑफिस चक्कर, सी टी स्केन, दुआयें, पूजा पाठ, हमारे प्रिय फुरसतिया जी की मानता, सबने बस इतना ही काम किया कि आज ऐना शांति से ब्रह्म लोक सिधार गई. अब तक तो मम्मी के पास भी पहूँच गई होगी. मगर मम्मी की जिंदा याद, ऐना, हम तुमको नहीं भूल पायेंगे.

तुम्हें सेब पसंद था न!! आंगन में सेब के पेड़ के नीचे ही तुम्हारे पार्थिव शरीर को दफनाया है. अगले बरस जब उसमें सेब आयेंगे, तुम हमें खुब याद आओगी तुम हमारे दिल में हमेशा जिंदा रहोगी. वहां खुब उडना और मम्मी के पास रहना. वैसे तो तुम खुद ही समझदार हो. एक दिन जरुर मिलेंगे फिर.

बोलू भी दुखी है. ऐना तो चली गई मगर शीशा बोलू को देख कर बोल रहा है, "हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ"

अभी बोलू को सोने के लिये अलग कमरे में रख कर आया हूँ, मन भर आया है बिल्कुल वैसे ही, जैसे मम्मी के जाने के बाद पापा को भारत में अकेला छोड़ कर निकला था......

अंत में ऐना की आत्मा को शांति मिले, इस हेतु अनेकों प्रार्थना और उसे नमन और हार्दिक श्रृद्धांजली...तुम हमेशा याद आओगी.





शुक्रवार, दिसंबर 29, 2006

हमेशा देर कर देता हूँ मैं..





उर्दु और पंजाबी के मशहूर शायर मुनीर नियाज़ी. कौन जानता था कि मंच से गुंजती यह आवाज़ २६ दिसम्बर, २००६ की रात में दिल का दौरा पड़ने से हमेशा के लिये चुप हो जायेगी. वैसे नियाज़ी साहब साँस की बीमारी से एक अर्से से परेशान थे.


जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.


उर्दु और पंजाबी की शायरी को मुनीर नियाज़ साहब, जिनका असली नाम मुनीर अहमद था, के निराले अंदाज को सुनकर मुशायरों में आये श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाया करते थे. आपका जन्म १९ अप्रेल, १९२८ को होशियारपुर, पंजाब, भारत में हुआ. आपकी प्रारंभिक शिक्षा साहिवाल जिले में और फिर उच्च शिक्षा के लिये आपने दियाल सिंग कॉलेज, लाहौर मे दाखिला लिया.

नियाज़ी साहब बंटवारे के बाद साहिवाल में बस गये थे और सन १९४९ में ‘सात रंग’ नाम मासिक का प्रकाशन शुरु किया. बाद में आप फिल्म जगत से जुड़े और अनेकों फिल्मों में मधुर गीत लिखे. आपका लिखा मशहूर गीत ‘उस बेवफा का शहर है’ फिल्म ‘शहीद ‘ के लिये स्व. नसीम बेगम ने १९६२ में गाया. बकौल शायर इफ़्तिकार आरिफ़, मुनीर साहब उन पांच उर्दु शायरों में से एक हैं, जिनका कई यूरोपियन भाषाओं में खुब अनुवाद किया गया है.

आपको मार्च २००५ में ‘सितार-ए-इम्तियाज’ के सम्मान से नवाज़ा गया.

मुनीर नियाज़ी साहब के ११ उर्दु और ४ पंजाबी संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें ‘तेज हवा और फूल’, ‘पहली बात ही आखिरी थी’ और ‘एक दुआ जो मैं भूल गया था’ जैसे मशहूर नाम शामिल हैं.

मुनीर नियाज़ी साहब को श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए, उनकी मशहूर रचना पेश करता हूँ:


हमेशा देर कर देता हूँ मैं, हर काम करने में.

जरुरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो,
उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

मदद करनी हो उसकी, यार की ढ़ाढ़स बंधाना हो,
बहुत देहरीना रस्तों पर, किसी से मिलने जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

बदलते मौसमों की सैर में, दिल को लगाना हो,
किसी को याद रखना हो, किसी को भूल जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

किसी को मौत से पहले, किसी गम से बचाना हो,
हकीकत और थी कुछ, उसको जाके ये बताना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..


और मुनीर साहब को आगे सुनें:



फूल थे बादल भी था और वो हंसीं सूरत भी थी
दिल में लेकिन और ही एक शक्ल की हसरत भी थी.

क्या कयामत है मुनीर अब याद भी आते नहीं
वो पुराने आसनां जिनसे हमें उल्फत भी थी.



मैं तो मुनीर आईने में खुद को ताक कर हैरां हुआ
ये चेहरा कुछ और तरह था पहले किसी जमाने में


डर के किसी से छुप जाता है जैसे सांप खजाने में,
ज़र के जोर जिंदा हैं सब खाक के इस वीराने में.
जैसे रस्म अदा करते हों, शहरों की आबादी में,
सुबह को घर से दूर निकल कर, शाम को वापस आने में.



और यह गज़ल देखें:



जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.

अब कौन मुंतजीर है हमारे लिये वहां,
शाम आ गई है, लौट के हम घर जायें तो क्या.

दिल की खलिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र
दरिया-ए-गम के पार उतर जायें हम तो क्या.


मुनीर साहब को पुनः एक बार नमन और भावभीनी श्रृद्धांजली.

--समीर लाल ‘समीर’

गुरुवार, दिसंबर 28, 2006

हजारों ख्वाहिशें ऐसी….

मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान यानि गालिब का आज २७ दिसम्बर को जन्मदिन है. ज्ञात सूत्रों के अनुसार गालिब का जन्म २७ दिसम्बर, १७९७ में आगरा में हुआ था.




चित्र साभार: बोलोजी.कॉम

इसी मौके पर गालिब को याद करते हुये उनके चन्द शेर और गज़ल पेश कर रहा हूँ:

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है


देखिये पाते हैं, उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़
इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है


हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है!


मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श के परे होता काश के मकां अपना
हम कहां के दाना थे, किस हुनर में याक्ता थे
बेसबब हुआ "ग़ालिब" दुश्मन आसमां अपना

अर्श: आकाश ; मकां: घर ; दाना: अमीर ; याक्ता: माहिर ; बेसबब: बिना कारण


ये जो हम हिज्र में दीवारो-दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं
वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं

हिज्र : वियोग , जुदाई ; सबा : हवा ; नामाबर : संदेश पहुंचाने वाला


फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वो ही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

बेसबब : बिना कारण ; पर्दादारी : छुपाया जाना


रग़ो में दौडते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो अब राख जुस्तजु क्या है.

रग़ो में : नसो में ; कायल होना : किसी बात को चाहना ; जुस्तजु :इच्छा

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है



और अब गालिब की एक गज़ल:-

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले .

-समीर लाल ‘समीर’

मंगलवार, दिसंबर 26, 2006

चिट्ठाकारों के लिये गीता सार

मित्रों, यह बात तो मुझे कहने की जरुरत ही नहीं कि मैं आप सबके लिये कितना विचारता और चिंतित रहता हूँ. :)
जो कुछ भी करता हूँ, पढ़ता हूँ, लिखता हूँ, बस हर वक्त आपका ख्याल रहता है और आजकल तो कुछ ज्यादा ही, पता नहीं क्यूँ. :)
अब देखिये, गीता पढ़ी, सार पढ़ा और आप याद आये, तो आप भी पढ़ें, चन्द पंक्तियों में पूरी गीता का सार:

चिट्ठाकारों के लिये गीता सार

क्यूँ व्यर्थ परेशान होते हो, किससे व्यर्थ डरते हो
कौन तुम्हारा चिट्ठा बंद करा सकता है.
चिट्ठाकार न निकाला जा सकता है और न ही निकलता है
.
(भले ही नाम बदल ले, मगर रहेगा जरुर-यह एक लत है)

कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ.
आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है.
कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.

व्यस्तता का दौर चल रहा है...
(चुनाव का समय चल रहा है..किसी के पास समय नहीं है)

वैसे भी तुम्हारा क्या गया, कोई पैसा देकर तो लिखवाये नहीं थे, जो तुम रो रहे हो.
वैसे भी बहुत अच्छा तो लिखे नहीं हो, जो दुखी होते हो.
(वरना तो अखबार में छपते, यहाँ क्या कर रहे होते)
तुमने ऐसा लिखा ही क्या था जो पढ़ा जाता.

तुम्हें तो यूनिकोड में लिखना भी नहीं आता था
जो कुछ सीखा, यहीं से सीखा
जो कुछ सीखा, यहीं लिख मारा.

कम्प्यूटर लेकर आये थे, यूनिकोड सीखकर चले
जो आज तुमने सीखा, कल कोई और सिखेगा
(कोई तुम्हारा पेटेंट तो है नही)

जो टूल लिखने को इस्तेमाल करते हो, वो भी तुम्हारा नहीं है .
आज तुम इस्तेमाल कर रहे हो, कल कोई और भी करेगा और परसों कोई और.

ब्लाग का पन्ना भी तुम्हारा नहीं है, या तो ब्लाग स्पाट का है या वर्डप्रेस का
और तुम इसे अपना मान बैठे हो और खुश हो मगन हो रहे हो.

बस यही खुशी तुम्हारे टेंशन का कारण है.

ब्लाग, ब्लागर बीटा से होता हुआ न्ये ब्लागर पर चला गया
तुम्हारा टेम्पलेट चौपट हो गया और अब तुम रो रहे हो.

जिसे तुम बदलाव समझ रहे हो, यह मात्र तुमको तुम्हारी औकात बताने का तरीका है.
जिसे तुम अपना मानते रहे वो तुम्हारा नहीं.

(अब फिर बैठो और टेंम्पलेट ठीक करो, और जो पुरानी टिप्पणियों के नाम गये वो तो ठीक भी नहीं कर सकते)

एक पोस्ट पर ढ़ेरों टिप्पणियां मिल जाती है,
पल भर में तुम अपने को महान साहित्यकार समझने लगते हो.
दूसरी ही पोस्ट की सूनी मांग देख आंख भर आती है और तुम सड़क छाप लेखक बन जाते हो.

टिप्पणियों और तारीफों का ख्याल दिल से निकाल दो,
बस अच्छा लिखते जाओ... फिर देखो-
तुम चिट्ठाजगत के हो और यह चिट्ठाजगत तुम्हारा है.

न यह टिप्पणियां तुम्हारे लिये हैं और न ही तुम इसके काबिल हो

(वरना तो किसी किताब में छपते)
यह मिल गईं तो बहुत अच्छा और न मिलीं तो भी अच्छा है.

कम से कम छप तो जाता है, फिर तुम्हें परेशानी कैसी?

तुम अपने आपको चिट्ठे को समर्पित करो
यही एक मात्र सर्वसिद्ध नियम है

और जो इस नियम को जानता है
वो इन टिप्पणियों, तारीफों और प्रतिपोस्ट की टेंशन से सर्वदा मुक्त है.


-स्वामी समीर लाल 'समीर'

<< कभी कहीं इसी वातावरण की बातचीत साफ्टवेयर इंजिनियरों के बारे में भी पढ़ी थीं, उसी से प्रभावित>>

सोमवार, दिसंबर 25, 2006

आज का आह्वान

मित्रों, गुजरे जमाने में जब शहरों मे दंगे घिर आया करते थे, तब जन नायक शांति के लिये आह्वान किया करते थे. गाँधी जी ने दंगे रोकने के लिये व्रत रखा. आज के नेता, इसके ठीक विपरीत, जब बहुत दिनों तक शहर में दंगे नहीं होते तो अनमने से हो जाते हैं. उनका आह्वान देखिये और कृप्या यह जरुर नोट किया जाये कि इसका आगामी सरगर्म चुनाव से कुछ लेना देना नहीं है, हम तो उस बारे में चुप हैं और न ही कुछ बोलेंगे:

आज का आह्वान

बहुत दिनों से शहर में, कोई दंगा नहीं हुआ
छुपा हुआ इंसानी चेहरा, फिर नंगा नहीं हुआ
अखबारों की सुर्खियों का रंग लगता उड़ गया
कफन की दुकानों में कुछ धंधा नहीं हुआ .

खो रहा है यह शहर, अपनी जमीं पहचान को
जुट रहा हर आदमी बस आज अपने काम को
इस तरह मिट जायेगी जो दहशती फितरत तो फिर
ढूंढता रह जायेगा तू, खुद ही के खोये नाम को.

मंदिर में आरती गूंजें, तो मस्जिद में अजानें
अपने अपने धर्म की राहें सभी यदि आज जानें
मौलवी पंडित को पूछेगा भला फिर कौन बोलो
भाईयों में शेष हों गर अंश भी रिश्ते पुराने.

चल उठा तलवार फिर से,ढूंढ फिर से कुछ वजह
धर्म का फिर नाम ले तोड़ो इमारत बेवजह
फिर मचे कोहराम और फिर आग उठे हर गली
डूबने पाये शहर का, नाम फिर न इस तरह.

-समीर लाल 'समीर'

शनिवार, दिसंबर 23, 2006

हम अभी भी चुप हैं

यह पोस्ट रिपेयर होने मुन्नु मेकेनिक के यहां गई है. बाद में फिर आयेगी. :)

शुक्रवार, दिसंबर 22, 2006

हम कुछ नहीं कहेंगे

भई, हम तो इन चुनाव प्रचारियों से बहुते परेशान हूँ. चैन ही नहीं लेने दे रहे. सुबह से चार चार बार समाचार आ चुके हैं कि आपका घोषणा पत्र नहीं छ्पा. अब कब तक सहते, हम तो डांट दिये कि यार, जब हमें नहीं छापना है तो काहे पीछे पडे़ हो. हम चाहे हारें या जीतें, हमे नहीं पंगे में पड़ना है और न ही कुछ बोलना है.

हमारा सबसे प्रेम है. हम किसी के बारे में कैसे कुछ कह सकते हैं और न ही यहाँ कोई राजनिती हो रही है कि एक दूसरे पर कींचड़ उछालना नितांत आवश्यक हो और इसके बिना सब बेकार. हम तो बिल्कुल नहीं बोलेंगे और न छापेंगे.

हम तो उस नामांकित चिट्ठाकार का न तो नाम लेंगे और न ही उनका नामांकन खारिज करने को हल्ला मचायेंगे जिसने अपने घोषणापत्र में न सिर्फ मदिरा बल्कि भांग और देशी शराब का भी इस्तेमाल किया है और ठाकुरों से वोट मांग कर (हमको जीताय दो ठाकुर!!) जातिवाद को भड़काने जैसे जघन्य अपराध किये है और अपने जजों के साथ की सांठगांठ को, खुले आम उजागर कर लोकतांत्रिक प्रणाली का मजाक उठाया है. हम तो चुप ही रहेंगे, हमें तो सबसे प्रेम है, आप खुद ही देखें:

जजों की चिंता ना करें.... हम इतने तो लायक हैं कि उ लोग हमरा परचा खारीज नहीं ना करेंगे।

हम तो इनका नाम भी नहीं लेंगे.हमारा तो इनके साथ प्रेम भाव है

हम तो उस दूसरे वाले नामांकित चिट्ठाकार का नाम भी नहीं लेंगे जिसे अपना घोषणापत्र लिखने तक का एक बार में टाईम नहीं है और वादे दूनिया भर के कि यह करा दूँगा, वह करा दूँगा. अरे, घोषणापत्र तो एक सिटिंग में लिखो. ये क्या कि बीच में स्कूल चले गये कि अब आकर लिखूँगा. आपके भरोसे सब रहे तो आप तो स्कूल कट लोगे और बाकी अपनी समस्या लिये टपते रहेंगे.

स्कूल जाने का समय हो गया है। अभी और भी है आकर लिखता हूँ …

हमें तो उनके द्वारा लोगों के वोट के लिये सुन्दरियों के दर्शन का प्रलोभन (घोर असंवेधानिक बात, नामांकन खारिज होने का एक पुख्ता आधार) और वोट न देने वालों को कवियों के साथ कमरे में बंद करने देने की धमकी (जान से मार डालने की धमकी पर तो एक बार विचार भी हो सकता है, मगर उससे भी कई गुना बड़े इस अपराध पर तो अगर नामांकन खारिज नहीं हो, तब तो चुनाव प्रणाली ही शक के दायरे में आ जायेगी). और लुभाने के लिये अंग्रेजी शराब और साथ साथ दो गिलास की फोटो लगाकर सांकेतिक प्रलोभन ऐसा दे रहे हैं कि हम तो खुद ही उन्हें वोट देने निकल पड़े थे, बड़ी मुश्किल से रुके. वैसे अपने नाम के साथ पंडित शब्द का प्रयोग भी जातिवाद उकसाने के लिये किया गया है, यह सब जानते है वर्ना शर्मा जी से भी काम चल सकता था. लेकिन हम तो उनका नाम भी नहीं लेंगे.

हमें क्या करना है. हमारे तो उनसे भी प्रेम भाव है, हम तो कुछ नहीं कहेंगे. बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही उस तीसरे नामांकित चिट्ठाकार के बारे में कुछ कहेंगे. वो तो हमारा शिष्य है. मगर हम उसका नाम नहीं लेंगे. अपने शिष्यों को भी कोई बदनाम करता है क्या? भले ही उसने हमसे सिखी विधा रुपी अस्त्र से ही हम पर वार किया हो मगर यह उसका अधिकार क्षेत्र है, उससे हमें क्या. हमसे कहे कि गुरुदेव हम आपका चुनाव प्रचार करेंगे और एक पोस्ट लिख रहे हैं. हम प्रेमी स्वभाव के अनुरुप आशिष दे दिये और जब पोस्ट देखते हैं तो शिष्य बाबू अपने नारे लगवा रहे हैं हाईकु में. अब भले ही उसने हमारे पिछवाडे पड़े घुरे से कचरा बीन कर छाप दिया, मगर हमें बुरा नहीं लगा. यही तो होता है जब किसी से प्रेम भाव हो. हालांकि शिष्य ने कोई असंवेधानिक कार्य नहीं किया कि बाकियों की तरह इनका परचा खारिज हो, मगर कचरा पेटी में मुँह मारना भी तो शोभा नहीं देता. अब जो कचरे में गया, गया. उसमें कौन ढ़ूँढ़ता है और जो ढ़ूढ़ता हो वो चुनाव में. न न!! मन खराब सा हुआ जा रहा है. पत्थर मारने तक का मन होता.

अब मन खराब हो या अच्छा, हम तो अपना प्रेमभाव बनायें रखेंगे और बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही कुछ छापेंगे.

बाकी के नामांकित चिट्ठाकारों के तो घोषणापत्र तक नहीं आये हैं बाकि तो भगवान मालिक है कि उनका क्या होगा. कहीं लड्डू तो लुटाये नहीं जा रहे कि मुँह बाये खडे रहो, एक आध तो अपने आप आकर गिर जायेगा और जिसकी गरज हो वो खुद आकर इन्हें वोट दे. अब सब तो हम नहीं हो जायेंगे, चलो हम तो अपना वोट इन्हें दे भी देंगे मगर क्या सभी यही करने लगें. क्या सबको अपना चेला समझ कर रखा है कि साहब आ रहे हैं, बिछकर सलाम करो. क्यूँ? अरे बाबू, यही जनता है, इंदिरा गाँधी तक को धूल चटवा चुकी है, तो आप क्या!! और वो भी राजनारायण जैसों के लिये तो हम तो कुछ बेहतर ही हैं.

खैर, हमें तो चुप ही रहना है, बिल्कुल चुप, कुछ भी न तो कहेंगे और न ही छापेंगे और उस पर से घोषणापत्र- वो तो बिल्कुल नहीं. जबकि इनको जीतना था तो घोषणा पत्र में छापते कि:

१.हम चिट्ठाकारों को हिन्दी की अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करायेंगे, भले ही वो उपलब्ध हो तब भी फिर से करायेंगे.

२.टिप्पणी के लाँग इन द्वार पर मेटल डिटेक्टर लगवायेंगे ताकि कोई टिप्पणी रुपी बम लेकर किसी की पोस्ट में न घुसे.

३.परिचर्चा जैसे पवित्र स्थलों पर जूते पहन कर जाने की मनाही करवायेंगे ताकि इनका गलत इस्तेमाल रुक सके.

४.नारद को चव्यनप्राश और ताकत के लिये रोज दो लिटर दूध, ताकि वो थक थक कर धीरे धीरे काम न करे, बल्कि हम जवानों और युवाओं की तरह सजग रहे.

आदि आदि.

हमें तो कुछ घोषणा करनी नहीं है, न ही कुछ कहना है. बिल्कुल चुप रहेंगे और कुछ छापेंगे भी नहीं. हमारा तो सबसे प्रेम भाव है, हम चाहते हैं, सब जीतें और हमारी शुभकामनायें सबके साथ हैं. एक बार टिप्पणियों के सिवाय यहां बस यह कहना चाहता हूँ कि इन सभी उम्मीदवारों को यदि यह लगे कि कैसे युगपुरुष के दर्शन हो गये जो खुद भी रेस में होकर हमारे जीतने की उम्मीद और अभिलाषा कर रहा है और शुभकामनायें देता घूम रहा है और इस तरह मिली तहे दिली शुभकामनाओं को पाकर अगर आपका दिल भर आया हो, आँखें नम सी लगें या गला रुँध जाये, तो चुनाव से नाम वापस ले लेना. मन हल्का लगेगा. हमें बुरा नहीं लगेगा, प्रेम भाव जो है.

हम तो कुछ नहीं कहेंगे, बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही कुछ छापेंगे.


टीप:
कृप्या कोई अन्यथा न ले, यह सिर्फ़ मौज मजे के लिये पोस्ट है और साथ ही जीत सुनिश्चित करने को. किसी को ठेस पहुँचाने को नहीं और न ही दिल दुखाने को. सभी से तो प्रेम भाव है और बाकि तो हम चुप हईये हैं!!! :)

गुरुवार, दिसंबर 21, 2006

कबीर दास का चिट्ठाकाल

आज से ६०० वर्ष पूर्व १३९८ एडी मे कबीर दास का जन्म भारत में हुआ. कहा जाता है कि वो १२० वर्ष की उम्र में १५१८ में समाधिस्त हुये. यही भक्तीकाल का शुरुवाती समय माना गया है. व्यवसाय से जुलाहे होते हुये भी, जिस काम का उस वक्त मशीनीकरण नहीं हुआ था और बहुत मेहनत करना होती थी, कबीर दास जी ने चिट्ठाजगत के लिये इतने दोहे लिखे कि इससे हम सबको सबक लेना चाहिये जबकि हम तो दिन भर कम्प्यूटर पर कार्य करते है और कोई शारीरिक परिश्रम भी ज्यादा नहीं करते.

अब जब उस जमाने में कबीर दास ने अपने सारे दोहे हिन्दी चिट्ठाकारों के लिये लिखे, तो हिन्दी चिट्ठाकार तो रहे ही होंगे नहीं तो क्या उन्हें उस समय सपना आया था? इसका अर्थ यह हुआ कि भक्तिकाल में ही चिट्ठाकाल की भी शुरुवात हुई या उससे भी पहले.

वो तो कतिपय चिट्ठा विरोधी ताकतों ने उन्हें सामाजिक कवि का दर्जा दे दिया कि सब समाज के लिये लिखा गया. सही कहा मगर चिट्ठा समाज के लिये कहते तो बिल्कुल सही होता.

अब इतने सारे दोहे चिट्ठाकारों की समझाइश के लिये लिख गये हैं कि सबकी व्याख्या करना तो यहाँ संभव नहीं है, उदाहरण के लिये ७ दोहों की व्याख्या कर दे रहा हूँ. बाकि कुछ और आगे की जायेगी या यदि आप किसी कबीर दास के खास दोहे पर हमारा व्याख्यान चाहते हों तो टिप्पणी के माध्यम से बतायें, हम कर देंगे. समाज सेवा में तो कभी पीछे हटने का सवाल ही नहीं, यह तो आप सबको पता ही है. :)



आग जो लगी समुंद्र में, धुआं न परगट होए
सो जाने जो जरमुआ जाकी लागे होए.


भावार्थ: जब किसी चिट्ठाकार का कम्प्यूटर या इंटरनेट कनेक्शन खराब हो जाता है तो उसके दिल में चिट्ठाजगत से दूर होने पर ऐसी विरह की आग लगती है कि धुँआ भी नहीं उठता. इस बात का दर्द सिर्फ़ वही जान सकता है जो इस तकलीफ से गुजर रहा हो. बाकी लोगों को तो समझ भी नहीं आता कि वो कितना परेशान होगा अपनी छ्पास पीड़ा की कब्जियत को लेकर.


ऐसी वाणी बोलीए, मन का आपा कोए
अपना तन शीतल करे, औरन को सुख होए.


भावार्थ: जब भी कोई पोस्ट या टिप्पणी लिखो तो उसे रात में लिखकर रख लो, सुबह उठकर फिर पढ़ो कि कहीं भावावेश तो कुछ नहीं लिख गये और तब पोस्ट करो. इससे जहाँ दूसरों का सुख मिलेगा, आपको भी काफी शीतलता का अनुभव होगा. और चिट्ठा लेखन का उद्देश्य भी यही है.अन्यथा तो भडभडाहट वाली पोस्टों और टिप्पणियां ने किस किस तरह के तांडव नृत्य इसी चिट्ठाजगत में करवाये हैं.


बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर


भावार्थ: चिट्ठालेखन में कोई उम्र से छोटा बड़ा नही होता. उम्र भले ही ८० साल हो मगर यदि आप अच्छा नहीं लिखेंगे तो न तो कोई पढ़ेगा और न ही टिप्पणी मिलेंगी. तो आपका लिखना भी बेकार, आपका समय जो खराब हुआ सो तो हुआ ही (खैर जब ऐसा लिखोगे तो वो तो कौडी का नहीं होगा) और अगर किसी ने गल्ती से पढ़ लिया तो उसका समय और आपकी छ्बी भी खराब. अतः भले ही उम्र से कम और छोटे हो, मगर अगर अच्छा लिखोगे तो पूछे जाओगे. सिर्फ उम्र में बड़ा होने से कुछ नहीं होता है.


बुरा जो देखण मै चला, बुरा न मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा तो मुझसे बुरा न कोए


भावार्थ:यह चिट्ठाजगत बहुत विशाल है. इसमें अगर खराब पोस्ट खोजने निकलोगे तो खोजते रह जाओगे और अंत में पाओगे कि सबसे खराब पोस्ट तो तुम्हारी स्वंय की है और तुम व्यर्थ ही यहां वहां टहलते रहे. बस अपने लिखन को चमकाओ और दूसरों की लेखनी में बुराईयां खोजने मत निकलो. जब तुम बहुत अच्छा लिखने लगोगे तो दूसरी तो उससे कम अच्छी अपने आप हो जायेंगी तो खोजने जाने की क्या जरुरत है.


धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घड़ा, रितु आए फल होए


भावार्थ: इन पंक्तियों मे कवि ने सभी चिट्ठाकारों से धीरज रखने की सलाह दी है. अगर आप किसी वरिष्ठ चिट्ठाकार की पोस्ट पर टिप्पणियां और वाह वाही देखकर अपनी पोस्ट को कमजोर समझें और मन उदास होने लगे कि मुझे क्यूँ नहीं इतनी वाह वाही. तो आपको धीरज धरने को कहा गया है. धीरे धीरे सब होगा, उन्होंने भी महिनों सालों मेहनत की है, कई सौ पोस्ट लिखी है, तब जा कर उनका वट वृक्ष टिप्पणी रुपी फल से लहरा रहा है. आपका भी मौसम आयेगा, फल मिलेगा, मगर सब धीरे धीरे होगा, धीरज धरो.


काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगे कब.


भावार्थ: यह खास तौर पर इन बातों को ध्यान मे रखकर लिखी गई है जैसे बिना बताये बिजली कई कई दिन तक गायब रहती है या इन्टरनेट कनेक्शन नहीं मिलता. कम्पयूटर सुधारक नहीं मिलते आदि आदि. तो अगर आज सब ठीक चल रहा है, तो आज ही लिखकर पोस्ट कर दो, कल पर मत टालो. क्या पता कल बिजली गायब रुपी, कनेक्शन गायब रुपी या कम्प्यूटर खराब रुपी परलय आ जाये, तो बस पोस्ट धरी की धरी रह जायेगी, फिर कब छापोगे क्या मालूम और नारद की रेटिंग से जाओगे, सो अलग.

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए


भावार्थ: देखिये, एक दूसरे पर टीका टिप्पणी, परिचर्चा के ज्वलंत मुद्दे, बात के बतंगड बनाने वालों को देखकर कबीर दास रो दिये. झगड़ा दो पाटन के बीच मचा और बाकी भी सब कुद कुद कर एक एक की तरफ हो गये और सब पीस गये. निवेदन है कि कबीर दास जी, जो सब चिट्ठाकारों के लिये इतना कुछ लिख रहे हैं, उन्हें न रुलाया जाये.


तो, अब तो आप मान गये कि और भी दोहे सुनाऊँ. :)


-समीर लाल 'समीर'