गुरुवार, दिसंबर 22, 2016

लोग(लोक) कथा: नियति

एक वन प्रदेश में पिछले लगभग ७ दशकों से शेर राज करता आ रहा था. हर बार चुनाव में छोटे छोटे निरिह जानवरों को डरा धमका कर या कुछ प्रलोभन देकर वो जीत जाता और जिन छोटे छोटे जानवरों नें उसकी बातों में आकर उसे जितवाया था, उन्हीं में से अपनी पसंद की बकरियों और हिरणों के शरीर पर वो काली स्याही से तारीख लिख देता और उस जानवर को उस निश्चित तारीख को शेर के महल में जाना पड़ता और शेर का भोजन बनना पड़ता. सभी जानवर इसे ही अपनी नियती मानकर इसी तरह के जीवन से समझौता कर चुके थे. लगभग सभी बकरियों और हिरणों पर कोई न कोई तारीख लिखी हुई थी.
नये चुनाव का समय आ गया था. इस बार चुनाव में एक बंदर भी खड़ा हुआ. उसने सभी जानवरों को समझाया कि आप लोगों ने इस शेर को इतने दिन राजा जितवाया मगर आप की हालत तो बद से बदतर होती चली गई. ये शेर आप पर काला निशान लगा कर आपका मालिक बन बैठता है और आपको ही अपना भोजन बनाता है. आप मुझे जितवाओं. मैं इस शेर की ईंट से ईंट से बजा दूँगा. मेरे पास योजना है जिसके तहत आपके उपर लगे काले निशान धुलवा कर एकदम साफ करवा दूँगा. शेर को सलाखों के पीछे डलवाने की जरुरत ही नहीं होगी, जब आपके उपर से काली स्याही से लिखी तारीख ही मिट जायेगी तो आपको उसके महल में जाना भी नहीं होगा और वो वैसे ही भूखा मर जायेगा. फिर आप सब सआनन्द अपना जीवन बसर करना.



सब जानवरों को बंदर की बात पसंद आई और इस बार चुनाव में उन्होंने बंदर को राजा चुन लिया. बंदर जैसे ही चुनाव जीता, उसके मन में बचपन से दबी विदेशों के वनों में घूमने की इच्छा बलवति हो उठी. वो नये नये ठाठ बाट के सूट बूट पहन कर विदेशाटन में इतना व्यस्त हो गया कि अपने किये वादे और भोले भाले जानवरों को भूल ही बैठा. बीच बीच में कभी अपने वन प्रदेश में लौटता भी तो, प्रजा से मिलने का मौका ही नहीं निकाल पाता और पुनः अगले विदेश के वनों के दौरे पर निकल जाता. जानवर भी अब उसे दबे छुपे फुसफुसा कर एन आर आई राजा कहने लगे थे. मंत्रीमंडल के साथियों ने उसे इस बात की खबर दी और बताया कि ऐसे में तो आपकी साख गिरती जा रही है, कुछ करिये.
तब एक दिन वह प्रजा के बीच में आया और उनसे कहा कि आप अपनी तकलीफ मुझे बताईये.
एकाएक एक बकरी सामने आई और उसने बंदर को उसकी योजना के बारे में याद दिलाया जिससे उन पर लिखी काली स्याही की तारीखों को धुलवाने की बात थी. राजा मौन रहा किन्तु उसके सबसे विश्वासपात्र साथी नें बकरी को डांटते हुए समझा दिया कि वह तो चुनावी जुमला था.
एक मृत प्रायः उम्मीद को जिस बन्दर के वादे से सभी जानवरों ने पुनः जगा लिया था उसे चुनावी जुमला सुन कर बकरी की आँखों से आँसू गिर पड़े. अन्यथा तो वो सब इसे अपनी नियति मान कर समझौता कर ही चुके थे. रोते हुए उसने बताया कि आज उसके बेटे का नम्बर है और वह अभी शेर के पास गया है, कृप्या उसे बचा लिजिये.
बन्दर राजा थोड़े द्रवित हो गयें और रौंधे कंठ से बोलो, चलो मेरे साथ- कहाँ है तुम्हारा बेटा?
बकरी और अन्य छोटे जानवारों के साथ बन्दर जंगल के भीतर आया तो देखा शेर बस उस बकरी के बेटे को मार कर खाने की तैयारी में ही है. बन्दर पेड़ पर चढ़ गया और इस पेड़ से उस पेड़, उस डंगाल से उस डंगाल पर छलांगे लगाने लगा. बकरी मिमियाते रही कि हे राजन! उसे बचाईये और बंदर राजा इधर से उधर पेड़ों पर छलांग लगाते रहे और शेर ने इस बीच बकरी के बच्चे को खाकर निद्रा देवी की गोद में स्थान प्राप्त कर लिया.
तब बन्दर राजा पेड़ से उतर कर पसीना पौंछते हुए बकरी के पास आये और उसके कँधे पर हाथ रख ढाढस बंधाया. बकरी रोते हुए कहने लगी कि आपने मेरे बेटे को बचाया नहीं.
तब बंदर ने एक टीले पर चढ़कर भाषण दिया जिसका सार यह था कि जीवन मरण तो उपर वाले के हाथ है लेकिन मैनें अगर अपनी मेहनत में कोई कमी छोड़ी हो तो आप जो सजा कहों सो मंजूर और फिर अपने माथे से पसीना पोंछा जो एक घंटे की पेड दर पेड छलाँग लगाने की वजह से निकल आया था.
सभी जानवरों ने हामी भरी और बंदर राजा के नाम का जयकारा लगाया और अपने अपने घरो पर जाकर सो गये.
एक दो दिन बाद सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो गया जिसमें शेर और बंदर अगली शाम को एक साथ शराब के जाम टकरा रहे थे.
प्रजा का मन खट्टा हो गया और बहुत सारे प्रजा के लोग कह रहे हैं कि अगली बार शेर को चुनेंगे.
नोट: बचपन में सुनी एक कहानी पर आधारित इस रचना को किसी भी वर्तमान परिपेक्ष से जोड़ कर न देखें.

-समीर लाल ’समीर’
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सोमवार, दिसंबर 19, 2016

मैं बेवफा सही..वादा फरामोश नहीं..


कभी मेरा मन था कि
एक कानूनी कागज पर
शपथ पत्र की शक्ल में
अपनी मोहब्बत
और
वफा की दुहाई
दर्ज कर रख छोडूँ तुम्हारे हवाले..
ताकि एक सनद मुझे रोके और बाध्य करे,
मेरे लिए बेवफा होना कानूनी अपराध हो जाये...
मगर हालिया हालातों ने
मेरी सोच को लगाम दी है..
जब नोट पर लिखे वादे से
सरकार मुकर जाती है..
तो बेहतर है कि हम मोहब्बत करने वाले
एक ही इल्जाम सर पर लेकर जायें
और वो हो बस बेवफाई का...
कम से कम वादा खिलाफी का इल्जाम
तो हम मोहब्बत करने वालों पर न आयेगा..


-समीर लाल ’समीर’

चित्र साभार: गुगल
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रविवार, दिसंबर 18, 2016

जिम की तौलिया बनाम सरकारी योजनायें

शाम को जब जिम जाता हूँ तो चैक इन करते वक्त वो दो तौलिया देते हैं.
एक तौलिये का इस्तेमाल तो वर्क आऊट करते वक्त पसीना पौछने के लिए और दूसरा, जब वर्क आउट पूरा हो जाये तो लपेट कर सौना (९० डिग्री सेल्सियस पर तपते कमरे में बैठ कर पसीना निकालने की विधी) में जाकर पसीना बहाने और फिर शॉवर में नहा कर बदन सुखाने के लिए.
सौना में जाना मुझे वैसा ही लगता है जैसे  हर वक्त एसी कमरों में रहने वाले नेताओं का किसी गरीब दलित के घर जाकर एक रात बिता कर उनकी समस्याओं को अहसासना. उनका वो खाना साथ में खा लेना जो कि नेताओं के उपभोग के लिए लैब से स्वीकृति प्राप्त हो. जेड सिक्यूरीटी वाले कुछ भी थोड़े न खा सकते हैं. ऐसे परिवेश में जहाँ आपका दिन भर का काम और माहौल आपको एक रत्ती पसीना न बहाने दे, तब श्वेद ग्रंथी पड़े पड़े बंद न हो जाये इस हेतु आप सौना में जाकर पसीना बहाते हैं. कुछ तो फायदा होता ही होगा और उससे ज्यादा मानसिक संतोष की प्राप्ति होती है. सौना में बैठा हर व्यक्ति चेहरे पर ऐसे भाव रखता है मानो वो जाने कहाँ की मेहनत कर रहा हो और पसीना बहा रहा हो. ठीक वैसा ही भाव जो इन नेताओं के चेहरे पर होता है किसी दलित के घर रात बिता कर निकलते हुए मीडिया के सामने आते हुए.
अक्सर अचरज में पड़ जाता हूँ जिम द्वारा प्रद्दत इन तौलियों का साईज देख कर. लम्बाई टोटल ३८ से ४० इन्च. अब जब कोई बंदा जिम आ रहा है तो ठीक ठाक साईज का या ज्यादा साईज का ही होगा जो अपना साईज कम करने में लगा होगा. जिम किसी टी बी का मरीज के लिए टी बी रीहेबीलिटेशन सेन्टर तो है नहीं कि जो आयेगा २२ -२६ कमर वाला दुबला पतला ही होगा. ऐसे में ये तौलिये, न बाँधने में न सम्भालने में. हम जैसे लोगों के लिए, जो जिम की आबादी का ८०% है...उनकी हालत इन तौलियों को लेकर यूँ समझें कि सामने ढ़ाकें तो पिछवाड़ा खुला और पिछवाड़ा ढ़ाके तो सामने खुला. पिक एन्ड चूज़...तो कोशिश होती है कि ऐसा कुछ हो जाये कि साईड खुली रहे. थोड़ा खुला थोड़ा ढका..मानो मल्लिका शेहरावत कपड़े से कह रही हो कि थोडा और छोड़ो न..कितना ढँक देगो..कुछ तो दिखने दो और कपड़ा है कि अपने सामर्थ के अनुरुप ढंक देने को बेताब!!
फिर सोचता हूँ कि ये कोई सरकारी योजना है क्या? दे भी दी और मिली भी नहीं. मिली भी तो पूरी नहीं.

मगर तब सौना में देखा कि कुछ रईसजादे अपनी अलग ही सोच रखते हैं...वो वाकई इन तौलियों को रुमाल समझ कर गले में टांग लेते हैं और मात्र पसीना पौंछने को इस्तेमाल करते हैं..शरीर ढ़ंकने को उनके पास अपनी मँहगी बाथ रोब होती है लम्बे तौलिये नुमा...उनके लिए जिम का तौलिया मात्र एक शिगुफा है..पसीना पौंछो और धुलने फैंको!! पसीना बहाने आये हैं या बाथ रोब का रौब दिखाने, समझ ही नहीं आता.
इन्हें देख कर लगता है मानो साहेब सूट बूट पहन कर अपनी बी एम डब्लु से उतरे हों... और लगे झाडू उठा कर स्वच्छता अभियान चलाने... उन्हें देख कर, कचरा खुद घबरा कर दौड़ पड़ता है कचरा दान की तरफ..कि हे प्रभु..आप यहां कैसे?..शर्मिन्दा करेंगे क्या? हम खुद ही चले जाते हैं कचरा पेटी में..
मगर सौना में ज्यादा आबादी उन लोगों की होती है जो इन तौलियों को कंधे पर टांगे यूँ ही बिना कुछ पहने आ बैठते हैं..मानों देश की आम जनता की हालत इस कहावत से बयाँ कर रहे हों:
’नंगा क्या नहाये और क्या निचोड़े’

-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में प्रकाशित: http://epaper.subahsavere.news/c/15447150

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शनिवार, दिसंबर 17, 2016

लैस कितना ज्यादा



यह उस भक्तिकाल की बात है जब भक्त का अर्थ होता था प्रभु की सेवा में रत. भगवान की पूजा अर्चना करके भक्त अपनी भक्ति भाव को प्रदर्शित करते थे.

वक्त को सबसे बलवान माना गया है, वो कितना कुछ बदल देता है. बन्दर को मनुष्य बना कर दिखा देता है.यह अलग बाद है कि एक जमात इतनी सदियों बाद भी स्वभाव और हरकतों से बन्दर ही रह गई. उस पर से आमजन का दुर्भाग्य यह कि वो उन्हीं को अपना रहनुमा चुन कर उस्तरा थमा देता है. ऐसे में वो बन्दर आमजन का सिर नहीं मूढ़ेंगे तो करेंगे क्या? यही उनका स्वभाव है. इसमें शिकायत कैसी?

वक्त के साथ बदलाव की बयार ऐसी चली कि भगवान के भक्त पाखंडियों की कतार में लगा दिये गये और भक्त शब्द पर कब्जा किसी खास आका के अनुयायिओं का हो गया. इनका भक्ति भाव प्रदर्शन करे का तरीका भी पूजा अर्चना से बदल कर अभक्तों को गाली गलौच करने में बदल गया.

आभाव, जिसे अंग्रेजी में लैस पुकारा गया, का प्रभाव भी बदलते वक्त के साथ ऐसा हुआ कि जिस क्लॉथ लैस को कभी निवस्त्र या नंगा कहा जाता था वो फैशन का परिमाण बन गया. जो कभी शेम लैस माना  जाता था वो आज बोल्ड की परिभाषा बन गई.

नये युग को नई की पहचान देता, हर तरफ लैस ही लैस का परचम लहराने लगा है. लैस कभी इतना ज्यादा हो जायेगा, इसकी उम्मीद न तो लैस ने की होगी और न ही मोर ने.  

कारों में की लैस एन्ट्री, ड्राईवर लैस कारें, पेपर लैस दफ्तर, पल्युशन लैस वातावरण, वर्कर लैस एसेम्बली लाईन (रोबोटिक्स), कमिटमेन्ट लैस रिलेशनशीप, पॉयलट लैस हवाई जहाज, फीमेल/ मेल लैस कपल आदि आदि न जाने कितने सारे लैस.

हिदी मे लिखे जा रहे इस आलेख को भी आप इत्मिनान से हिन्दी लैस आलेख कह सकते हैं. ब्लेम लैस भला मैं कैसे बच कर निकल सकता हूँ मगर मजबूरी है क्या करें? जिस देश की राज भाषा हिन्दी होते हुए भी, हिन्दी दिवस हिन्दी लैस हो गये हैं, हिन्दी दिवस पर कवियों को सम्मान पत्र अंग्रेजी में दिये जा रहे हैं. राष्ट्र विकास की अधिकतर योजनाओं के नाम हिन्दी लैस हुए जा रहे हैं- मेक इन इन्डिया हो, डिजिटल इन्डिया हो, स्मार्ट सिटी हो या कैशलैस सोसाईटी की अवधारणा.  सभी हमारे हिन्दी लैस हुए जाने की चुगली कर रहे हैं.   

कैश लैस सोसाईटी तो खैर जब होगी तब होगी लेकिन फिलहाल तो कैश लैस एटीम, कैश लैश बैंक, कैश लैस आमजन की जेबें हैं. एक उम्मीद कि जिन राजनितिक दलों को नोटबंदी बंदी के पूर्व संज्ञान में न थी, वो भी कैश लैस हो जावेंगे तो शायद भ्रष्टाचार के मूल चुनावों में नोटों की ताकत में कुछ कमी आये, मगर वो भी कानून में संशोधन ला कर नेस्तनाबूत  कर दी गई. अब राजनितिक जितना चाहें, उतना पुराने नोटों में जमा करायें, बीस हजार के नीचे का दान जितना मरजी नगद में दिखाये, कोई पूछताछ न होगी. याने एक बार फिर उस्तरे से आमजन को ही मूढ़ा गया हमेशा की तरह.

जाने कौन सी परिकल्पना को अंजाम देने की तैयारी है, ये तो वो ही जाने मगर एक आमजन के दिल में तो बस यही तमन्ना है कि वक्त एक ऐसा चमत्कार कर दे कि सरकार पॉवर लैस हो, फिर अपने आप करप्शन लैस सोसाईटी से लेकर विकसित देश की अवधारणा तक पूरी होने में वक्त नहीं लगेगा. कैश लैस सोसाईटी तो बहुत छोटी सी बात है.   

-समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, दिसंबर 10, 2016

वापसी के अपवाद



जब कभी वापसी की बात आती है तब सबसे पहले हिन्दी में एक कहावत याद आती है कि धनुष से निकला हुआ तीर और मूँह से निकले शब्द कभी वापिस नहीं लिए जा सकते. ज्ञानी जन सदा से यह कहावत बताते आये हैं ताकि इन्सान अपनी बोली में संयम बरते किन्तु वो हमेशा ही यह बताना भूल जाते हैं कि इसमें अपवाद स्वरुप नेता के बोले वचन आते हैं. नेताओं के द्वारा चुनाव के पहले वादा करते हुए बोले वचनों को चुनाव के बाद जुमला बतला कर वापस लिए जाने का प्रावधान हैं. हर खाते में १५ लाख रुपये पहुँचाने के वादे को जुमले में परिवर्तित होने को अभी देश भूला नहीं है. इस वापसी को आधुनिक राजनीती शास्त्र में यू टर्न कह कर पुकारा गया है.

इस शब्द वापसी की सोच से उबरो तो याद आती है घर वापसी वाली बात. घर वापसी के लिए अनिवार्यतः घर से निकलना जरुरी है तभी तो वापस जा सकते हैं. जो घर से निकला ही न हो उसकी भला वापसी कैसी? मगर नहीं इसमें भी ये नेता अपवाद निकाल कर ले लाये और घर वापसी का देश भर में ऐसा अभियान चलाया कि देश सांप्रदायिकता और असहिष्णुता की आग में जलने लगा. घर और धर्म पर्यायवाची हो गये. जिसे देखो वो अपना राजनेतिक कद बढ़ाने के लिए नित नया परचम लहराने लगा कि फलाने गांव में २००० लोगों की घर वापसी, ढिकाने गाँव में ३००० लोगों की घर वापसी. ये सभी घर लौटने वाले लोग किसी तरह सुबह और शाम की रोटी का जुगाड़ कर रहे थे और राजनीतिज्ञों की नजर पड़ने के पहले उनके लिए उतना ही काफी था. घर से कहीं ऐसे चले जाना कि घर वापसी का जश्न मने और अखबारों में छपे, वो उनकी तकदीर में कहाँ था भला? मगर बस नेतागीरी का अपवाद, बिना हिले डुले, बिना कहीं गये भी घर वापसी हो ही ली.

हर वापसी में इन्हीं नेताओं को क्यूँ अपवाद स्वरुप एक अलग रास्ता दिया जाया है? शायद इसी को वी आई पी कल्चर कहते हैं क्या?

अभी हाल की नोट वापसी का दृष्य देखें. पुराने अमान्य किये गये नोट बैंक को वापस करके नये नोट लेने की जुगत में जब सारा देश कतार में लगे कातर निगाहों से नये नोटों का इन्तजार कर रहा है तब ऐसे में इस वापसी अभियान में कोई भी नेता कतार में लगा नजर नहीं आता और उनके घरों में हो रही शादियों और खर्चों में रुपये की ऐसी नुमाईश, चाहे दक्षिण में बेंगुलुरु में हो या पश्चिम में नागपुर में, कि देखने वाला दाँतों तले ऊँगली दबा ले कि आखिर ये इतने सारे नये नोट ले कहाँ से आये? सारी लिमिट, सारे नियम आम जनता की नोट वापसी के लिए और नेताओं के घर पर डायरेक्ट सप्लाई? बिना इसके ५०० करोड़ और १०० करोड की शादी, ८० लाख, ६० लाख के नये नोट का ठिकाने लगाते हुए पकड़ा जाना बिना मिली भगत के संभव है क्या? इन सब अपवादों का आशीष भी राजनीति के गलियारे से ही बरसता है. जो सुनने में आता है वो अनसुनी घटनाओं का एक छोटा सा प्रतिशत भी नहीं है.

हमने हाल ही में देखा था कि ऋण वापसी में किसान नें आत्म हत्या कर ली और उससे कई लाख गुना ऋण लिया सांसद लंदन जा कर बैठ गया और बैंक है कि उसका ऋण माफ किए जा रही है. गजब अपवाद की ऐसी स्थिती कि अवसाद घेर ले आम जन को.

आज जब मौसम ने ठंड वापसी की दस्तक दी तो मन में एक ख्याल कौंधा कि क्या ठंड का मौसम भी अपनी वापसी में इन नेताओं को अपवाद की श्रेणी में रखेगा? बाकी तो आम जन में न जाने कितने कड़ाके की ठंड में राम नाम सत्य हो जायेंगे.

शायद हाँ क्यूँकि बचपन से सुनते आये हैं कि अरे फलवना तो नेता हैं, उनसे मत उलझना... पावर की गर्मी है उनके खून में. कुछ भी कर सकते हैं.

कर ही रहे हैं!!


-समीर लाल ’समीर’
#Jugalbandi #जुगलबन्दी
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मंगलवार, दिसंबर 06, 2016

सलाहकारों के देश को एक सलाह मेरी भी

समाचार पत्रों से ताजा खबर ये है कि ब्रिटेन में 5 पाउंड के नोट पर विवाद हो गया है, इस नये प्लास्टिक नोट में बीफ की वसा का प्रयोग किया गया है, जिसे TALLOW कहते हैं. इस समाचार का पता चलते ही शाकाहारियों ने तीखा विरोध दर्ज कराया. इन नोटों के विरोध में करीब एक लाख लोगों ने पिटीशन साइन किया है.

खैर, ब्रिटेन के सिखाये तो हम शुरु से हैं. चाय से लेकर संविधान तक. तो इस प्रयोग ने भी एक विचार दे ही दिया. भ्रष्टाचार मुक्त भारत में अब नये बड़े प्लास्टिक वाले नोट ऐसे लाये जायें जिसमें बीफ और पोर्क की वसा का इस्तेमाल हो. अब भ्रष्टाचारी चूँकि रुपये खाता है, घूस खाता है अतः एक बड़ी आबादी तो इसे नहीं खायेगी और नोट खाने खिलाने की समस्या यूँ ही चुटकी बजाते ही खत्म हो जायेगी. बाकी जिन्होंने इसे मेहनत से कमाया है वो इसका इस्तेमाल वैसे ही धड्डले से करेंगे जैसे अपने पर्स, जूते या अन्य लेदर के आईटम का करते हैं. इस्तेमाल से भला किसी को कहाँ गुरेज? निषिद्ध तो खाना है. फिर भी कुछ लोग तो बीफ और पोर्क खाते ही हैं मगर उनकी संख्या हमारे देश में कम ही है तो उन्हें आसानी से धर पकड़ लेंगे.

वैसे भी हम नोट के लिये कागज तो आयात करते ही है, तब ऐसे प्लास्टिक के नोट की छपाई के लिए भी  प्लास्टिक विदेश से आयात कर लेंगे. पाप भी नहीं पड़ेगा कि हमने बीफ और पोर्क की वसा मिलाई.

सलाहकारों के देश में, जहाँ इन दिनों हर पान की दुकान पर ऐसा लग रहा है कि अर्थ शास्त्रियों और सलाहकारों का जमावड़ा लगा है, यह एक सलाह हमारी भी जोड़ ली जाये.

प्लास्टिक के नोटों का छपना छपाना तो वक्त के साथ हो ही जायेगा. जनता को भी आदत पड़ ही गई है बदलाव की घोषणा सुनने और लाईन में लग कर नये नोटों के इन्तजार करने की. एक बार और सही मगर इलाज पुख्ता हो जायेगा.

अगर किसी को इन प्लास्टिक के नोटों के इस्तेमाल से भी परेशानी या परहेज हो तो उनके लिए अन्य रास्ते हैं न..मोबाईल बैंकिंग, कार्ड और ढ़ेरों तरीके अभी नये आ रहे हैं.. सलाहें नित आ रही हैं..सलाहकारों का देश है..चिन्ता की क्या बात है?.


-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के सुबह सवेरे में ५ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित
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रविवार, दिसंबर 04, 2016

गाने की छाप: एक विश्लेषण

बदन पे सितारे लपेटे हुए, ए जाने तमन्ना कहाँ जा रही हो...यह गीत जब कभी रेडियो पर बजता है तब न तो कभी किसी सुकन्या के बदन का ख्याल आता है और न ही फलक पर चमकते सितारों का...बस, जेहन में एक चित्र खिंचता है..शम्मी कपूर का इठलाती और अंग अंग फड़काती व बल खाती शख्शियत...

ऐसे कितने ही गीत हैं जो कभी सिनेमा के पर्दे, तो कभी टीवी के स्क्रीन पर दिख दिख कर आपके दिलो दिमाग पर वो छबी अंकित कर देते हैं कि उन्हें रेडियो पर सुनो या किसी को यूँ ही गाते गुनगुनाते हुए, दिमाग में वही फिल्म का सीन चलने लगता है.

आँधी फिल्म का गाना- इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते..कहीं दूर भी बजता हुआ सुनाई दे जाता है तो दिमाग में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का वो ही सीन उभर आता है.,,जो आँधी फिल्म में देखा था.

मगर कुछ ऐसे भी गीत हैं जो मौका विशेष पर ऐसे बजने लग गये कि उनका मूल सीन ही दिमाग से धुल गया और मौका विशेष से जुड़ा कोई सीन उसके उपर आकर कब्जा कर गया. जैसे शादी की बारात के दौरान बैण्ड वालों ने नागिन गाने की धुन बजा बजा कर, इस गाने की ऐसी बैण्ड बजाई कि अब कहीं दूर दराज से भी नागिन गाने की धुन सुनाई देती है तब न तो १९५४ की वैजन्ती माला याद आती है और न १९७६ की रीना राय...बस याद आता है शराब के नशे में धुत, हाथ से नागिन का फन बनाये जमीन पर लोट लोट कर नागिन बना नाचता हुआ आपका एक दोस्त और मूँह में रुमाल दबा कर उसे बीन की तरह बजाता हुआ सपेरा बना हुआ आपका दूसरा दोस्त,.. किसी अपने ही खास दोस्त की बरात में नाचते हुए. वैसे ही जैसे कि  ’दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात...भी किसी मित्र या रिश्तेदार का चेहरा ही सामने लाता है वरमाला डालते हुए.

इसकी वजह शायद ये होती होगी कि वो गीत, फिल्म और टीवी के इतर अन्य मौकों पर इतनी बार बजा और सुना गया है कि फिल्म का सीन अपना अस्तित्व बचा ही नहीं पाया. कौन जाने इसमें दोष उन गीतों का अन्य मौकों पर अत्याधिक बजा जाना है या उन पर हुए फिल्मांकन का कमजोर होना. जो भी हो, फिल्म का सीन तो दिमाग से निकल ही गया.

’तुम जिओ हजारों साल, साल में दिन हो पचास हजार..इस गीत को सोच कर देखियेगा कि क्या याद आता है? कोई भाई, बहन, भतीजा ही न?

अब बात करते हैं तीसरे आयाम की..जिसमें गीत तो अन्य मौकों पर ही बार बार सुनते आये किन्तु फिर भी वो अपनी मूल छाप ही छोड़ते आये हैं. हालात ऐसे कि जिस दृष्य की वो याद दिलाते हैं उसका मुख्य किरदार अपना चेहरा बदल कर मूल किरदार के चेहरे में नजर आता है.
याद करिये हर बेटी की विदाई के वक्त बजता हुआ वो गीत...’बाबुल की दुआयें लेती जा..जा तुझको सुखी संसार मिले..’ न जाने कितनी बार कितनी बेटियों की विदाई के वक्त यह गीत सुना होगा..मगर चेहरा वही बलराज साहनी का याद आता है.. लड़की का चेहरा तो दोस्त की बेटी का उभरता है मगर विदा करता दोस्त, बलराज साहनी में बदल जाता है मानो अपना यार बलराज साहनी को खड़ा करके बाहर सिगरेट पीने निकल लिया हो. अब न जाने इसमें किरदार का वजन है या फिल्मांकन का..मगर जिन्दा मूल किरदार ही रहा. वही १९६८ का नीलकमल फिल्म वाला बलराज साहनी..

बहुत खोजा..शोध किया..बातचीत की मगर एक ऐसा आयाम खोजने में मैं सफल नही हो पाया जिसमें जब उस गीत के बोल सुनूँ तो न तो फिल्म का सीन याद आये, न मौके पर अत्याधिक बजने की वजह से उस मौके से जुड़े दृष्य का..बल्कि कोई नया सा दृष्य उभरे, एक नया सा चेहरा उभरे...

आज तक कोई भी राजनेता ऐसा न कर पाया कि फिल्म का गीत बजे जिसमें उसका जिक्र न हो और आप के जेहन में उसका चित्र उभर आये.

मगर अभी अभी कुछ रोज पहले एक ऐसी घटना हुई कि, सोशल मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले इसे अच्छी तरह से समझ पायेंगे.. बाकी के लोग इस पैराग्राफ को लाँघ कर आगे पढ़ सकते हैं, एक बड़े टीवी चैनल के एक दिवसीय सरकारी प्रतिबन्ध के मद्दे नजर बने एक कार्यक्रम और हैश टैग ट्रेन्ड की दुनिया में ट्वीटर पर सबको पछाडते हुए ट्रेन्ड #बागों मे बहार है..ने ऐसा माहौल बनाया कि..अब जब भी वो गीत सुनाई देता है तो दिमाग में उभरता है..एक फेमस टीवी चैनल का ब्लैक आऊट हुआ टीवी स्क्रीन और फिर उस ब्लैक आऊट के भीतर से उभरता हुआ मेरे मित्र एक बड़े एन्कर का चेहरा और साथ में दो चेहरों पर सफेदा पोते एथॉरिटी और लठैत बने माईम कलाकार... वो आराधना फिल्म के साथ साथ राजेश खन्ना और फरीदा जलाल का चेहरा जाने कहाँ खो गया और कब..समझ ही नहीं आया. ऐसा पहली बार, कम से कम मेरी याद में हुआ.

आपको कुछ ऐसा याद हो तो बतायें कि जब गाना बजे फिल्म का और आपको याद आये कोई राजनेता या पत्रकार.. या कोई ऐसा चेहरा..जो किसी मौका विशेष के नाम से आपके दिमाग में हथोड़ान्कित न हो....

शायद राजनेताओं के लिए ऐसा कुछ प्रयोग करने का समय आ गया है...करना भी चाहिये..कोई एक फेमस गाना..अपनी याद दिलवाने के लिए...

जोड़ कर देखो न भई नेता जी..शायद कहीं गुंजाईश बने!!

-समीर लाल समीर

भोपाल के सुबह सवेरे में ४ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/15111168
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