आज नारद फीड पर नजर के घोडे दौड़ा रहे थे कि एकाएक नजर एक पाती-समीर भाई के नाम पर गई, हम घबराये कि क्या हो गया, भईया. तुरंत चटका लगाये और पहुँच गये:
एक पाती-समीर भाई के नाम
आपकी कुण्डलियाँ पढ़-पढ़कर हमारा मन व्याकुल हो उठा है कुण्डलियाँ लिखने को, मगर हम ठहरे इसमे बिलकुल अनाड़ी, क्या करें???
अब तक ऐसे कांडों मे न जाने कितने लोगों को अधीर होते, उत्साहित होते, आतुर होते और न जाने क्या क्या होते देखा था, पर आपको इस अंदाज में व्याकुल होते देख हमारे तो आँख से अश्रुधार ऐसी फूटी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. अब जब लेख लिखने लगे हैं तो मन कुछ हल्का होता जा रहा है.आशा है पूरा लेख हो जाने पर आपकी व्याकुलता इन्डेक्स में त्वरित गिरावट आयेगी, ऐसी आशा की जाती है.
बड़ी शिकायती लहजे में कविराज जी कह रहे हैं कि वो प्रतीक जी, जीतू भाई, अनूप जी सबके पास गये और हमें गुगल चैट का आमंत्रण भी भेजे जो हमने स्विकार नहीं किया, इसलिये खुली पाती को ईमेल माना जाये.
वाह कविराज जी, आपने इतने दर खटखटाये मगर हमें एक ईमेल भी नहीं? आपका चैट का आमंत्रण भी मिल गया मगर हम समझे कवि है, जरुर कविता सुनायेगा, इसीलिये टक्कर देने के उद्देश्य से सोचे कि पहले कुछ सुनाने के लिये कवितायें लिख लें तब आमंत्रण स्विकारें. वरना तो आप ही आप सुनाते, हम सिर्फ वाह वाह कहते रह जाते औपचारिकतावश. चूँकि आप भी कवि हैं तो आप भी वाह वाह में छुपे आह आह को समझ न पाते और उसे सही की वाह वाह मान कर झिलाते चले जाते. तो सांप के काटे का जहर उतारने के लिये सांप का ही जहर चाहिये, यही सोच कर कविता लिखने में जुटे रहे और आप ईमेल की आड़ में झाड़ ही काट लिये, पूरी पोस्ट ही लिख मारे. हम घबरा गये, तुरंत आमंत्रण भी स्विकार कर लिये और आपकी पोस्ट रुपी ईमेल पर टिप्पणी रुपी पावती भी धर आये:
देखा था गुगल चैट पर, कल ही आपको कविराज
पेंडिंग पड़ा निवेदन भी, एक्सेप्ट कर लिया आज.
एक्सेप्ट कर लिया आज कि अब हम लिखेंगे लेख
कुण्ड़ली पर जो अल्प ज्ञान है तुम भी लेना देख
कहे समीर कि हमरा तो सिर्फ़ कुण्ड़लीनुमा लेखा
नियम लगे हैं बहुत से, जब असल कुण्डली देखा
कविराज जी, आपका लेख भी अच्छा बन गया. अच्छा कहने के लिये जो मापक यंत्र हमने इस्तेमाल किया है वो लेख को मिली हुई टिप्प्णियों की संख्या है. हालांकि यह यंत्र हमेशा सत्य परिणाम नहीं देता है, ऐसा मेरा मानना है और मेरी यह मान्यता तब और बलिष्ट हो जाती है, जब मेरे लेखों को टिप्पणी नहीं मिलती है. खैर, छोड़िये न इन बातों को, इसमें क्या रखा है. मगर आज तो आपके केस में इस यंत्र ने बिल्कुल ठीक कार्य किया है.
तो आपने लेख लिखने में महारथ हांसिल कर ली. हाईकु में वाह वाही तो आप लूट ही रहें हैं, खास तौर पर ब्लागर हाईकु पर तो सच्ची वाली वाह वाह भी:
समीर नहीं
अब बदलो नाम
कुंडली किंग
हमारी टिप्प्णी:
क्या लिखते हो, भाई.
// ध्यान से देखें, टाईपो नहीं है. टिप्पणी में वाक्य समाप्ति पर सच में पूर्णविराम लगाया है, प्रश्नवाचक (?) चिन्ह नहीं. //
तो हम कह रहे थे कि लेख आप लिखें, हाईकु में आप पताका फहरायें, कविता आप करें, गजल आप लिखें, क्षणिकायें आप लिखें और अब मात्र बचा हुआ एक आईट्म, कुण्ड़ली भी व्याकुल होकर करने लगें तो बाकी सब ब्लागर, जीतू भाई की शैली में, क्या तेल बेचें. कुछ तो छोड़ दो, महाराज. हर मैदान में तो आपका झंड़ा ही फहरा रहा है फुरुर फुरुर..कहीं तो हमें भी, झंड़ा न सही, फटा हुआ रुमाल टांगने की जगह तो दे दो, हे महारथी.
वैसे, हम जानते हैं कि अगर हम नहीं बतायेंगे तो भी आप चुप थोड़े बैठोगे. अरे, जब हमारे चैट का निमंत्रण न स्विकार करने की बात आपने नगाड़ा बजा बजा कर वाया प्रतिक भाई, अनूप भाई, जीतू भाई को बताते बताते पूरे ब्लाग जगत को बता दी तो यह कोई दबेगी छुपेगी थोड़ी. फिर कोई न कोई दयालु आपको वो पता भी बता ही देगा, जहाँ से नियम टीप कर हम पूरी तो नहीं, मगर कुण्डलियों के समान दिखने वाली रचनायें लिखना सीख गये. तो हम भी सोचते हैं कि चलो छोड़ो यार, बता ही देते हैं. ज्यादा होगा तो रुमाल जेब में ही रखे रहेंगे और गाहे बगाहे हाथ से ही हवा में लहरा दिया करेंगे.
ठीक है जैसी हरि इच्छा:
हमने सबसे पहले इसके बारे में पढ़ा था अनुभूति पर और फिर इस बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा, तो सो ही आप भी कर लो और अगर वहां जाकर नहीं पढ़ना तो वह भाग विशेष यहां पुनः आपकी सेवा में पेश है. अब चूँकि लेख का इस्तेमाल आपको जानकारी देने हेतु किया जा रहा है, अतः मुझे विश्वास है कि पूर्णिमा वर्मन जी इसके इस हिस्से के बिना अनुमति के पुर्न-प्रकाशन का बुरा नहीं मानेंगी:
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आशा है अब आप कुण्डली कला मे पारंगत हांसिल करेंगे और शीघ्र ही कुण्डलियाँ दागना शुरु करेंगे.
हम तब तक आपके लिये कुण्डली-वीर का खिताब धो-पोंछ कर रखने की तैयारी में निकलते हैं.
--समीर लाल 'समीर'








