मंगलवार, अक्टूबर 10, 2006

कुण्डली सीखो हे कविराज

// इस लेख के पहले कृप्या एक पाती-समीर भाई के नाम जरुर पढें, तो ज्यादा आन्नद आयेगा//

आज नारद फीड पर नजर के घोडे दौड़ा रहे थे कि एकाएक नजर एक पाती-समीर भाई के नाम पर गई, हम घबराये कि क्या हो गया, भईया. तुरंत चटका लगाये और पहुँच गये:

एक पाती-समीर भाई के नाम

आपकी कुण्डलियाँ पढ़-पढ़कर हमारा मन व्याकुल हो उठा है कुण्डलियाँ लिखने को, मगर हम ठहरे इसमे बिलकुल अनाड़ी, क्या करें???

अब तक ऐसे कांडों मे न जाने कितने लोगों को अधीर होते, उत्साहित होते, आतुर होते और न जाने क्या क्या होते देखा था, पर आपको इस अंदाज में व्याकुल होते देख हमारे तो आँख से अश्रुधार ऐसी फूटी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. अब जब लेख लिखने लगे हैं तो मन कुछ हल्का होता जा रहा है.आशा है पूरा लेख हो जाने पर आपकी व्याकुलता इन्डेक्स में त्वरित गिरावट आयेगी, ऐसी आशा की जाती है.

बड़ी शिकायती लहजे में कविराज जी कह रहे हैं कि वो प्रतीक जी, जीतू भाई, अनूप जी सबके पास गये और हमें गुगल चैट का आमंत्रण भी भेजे जो हमने स्विकार नहीं किया, इसलिये खुली पाती को ईमेल माना जाये.

वाह कविराज जी, आपने इतने दर खटखटाये मगर हमें एक ईमेल भी नहीं? आपका चैट का आमंत्रण भी मिल गया मगर हम समझे कवि है, जरुर कविता सुनायेगा, इसीलिये टक्कर देने के उद्देश्य से सोचे कि पहले कुछ सुनाने के लिये कवितायें लिख लें तब आमंत्रण स्विकारें. वरना तो आप ही आप सुनाते, हम सिर्फ वाह वाह कहते रह जाते औपचारिकतावश. चूँकि आप भी कवि हैं तो आप भी वाह वाह में छुपे आह आह को समझ न पाते और उसे सही की वाह वाह मान कर झिलाते चले जाते. तो सांप के काटे का जहर उतारने के लिये सांप का ही जहर चाहिये, यही सोच कर कविता लिखने में जुटे रहे और आप ईमेल की आड़ में झाड़ ही काट लिये, पूरी पोस्ट ही लिख मारे. हम घबरा गये, तुरंत आमंत्रण भी स्विकार कर लिये और आपकी पोस्ट रुपी ईमेल पर टिप्पणी रुपी पावती भी धर आये:

देखा था गुगल चैट पर, कल ही आपको कविराज
पेंडिंग पड़ा निवेदन भी, एक्सेप्ट कर लिया आज.
एक्सेप्ट कर लिया आज कि अब हम लिखेंगे लेख
कुण्ड़ली पर जो अल्प ज्ञान है तुम भी लेना देख
कहे समीर कि हमरा तो सिर्फ़ कुण्ड़लीनुमा लेखा
नियम लगे हैं बहुत से, जब असल कुण्डली देखा


कविराज जी, आपका लेख भी अच्छा बन गया. अच्छा कहने के लिये जो मापक यंत्र हमने इस्तेमाल किया है वो लेख को मिली हुई टिप्प्णियों की संख्या है. हालांकि यह यंत्र हमेशा सत्य परिणाम नहीं देता है, ऐसा मेरा मानना है और मेरी यह मान्यता तब और बलिष्ट हो जाती है, जब मेरे लेखों को टिप्पणी नहीं मिलती है. खैर, छोड़िये न इन बातों को, इसमें क्या रखा है. मगर आज तो आपके केस में इस यंत्र ने बिल्कुल ठीक कार्य किया है.

तो आपने लेख लिखने में महारथ हांसिल कर ली. हाईकु में वाह वाही तो आप लूट ही रहें हैं, खास तौर पर ब्लागर हाईकु पर तो सच्ची वाली वाह वाह भी:

समीर नहीं
अब बदलो नाम
कुंडली किंग


हमारी टिप्प्णी:

क्या लिखते हो, भाई.

// ध्यान से देखें, टाईपो नहीं है. टिप्पणी में वाक्य समाप्ति पर सच में पूर्णविराम लगाया है, प्रश्नवाचक (?) चिन्ह नहीं. //

तो हम कह रहे थे कि लेख आप लिखें, हाईकु में आप पताका फहरायें, कविता आप करें, गजल आप लिखें, क्षणिकायें आप लिखें और अब मात्र बचा हुआ एक आईट्म, कुण्ड़ली भी व्याकुल होकर करने लगें तो बाकी सब ब्लागर, जीतू भाई की शैली में, क्या तेल बेचें. कुछ तो छोड़ दो, महाराज. हर मैदान में तो आपका झंड़ा ही फहरा रहा है फुरुर फुरुर..कहीं तो हमें भी, झंड़ा न सही, फटा हुआ रुमाल टांगने की जगह तो दे दो, हे महारथी.

वैसे, हम जानते हैं कि अगर हम नहीं बतायेंगे तो भी आप चुप थोड़े बैठोगे. अरे, जब हमारे चैट का निमंत्रण न स्विकार करने की बात आपने नगाड़ा बजा बजा कर वाया प्रतिक भाई, अनूप भाई, जीतू भाई को बताते बताते पूरे ब्लाग जगत को बता दी तो यह कोई दबेगी छुपेगी थोड़ी. फिर कोई न कोई दयालु आपको वो पता भी बता ही देगा, जहाँ से नियम टीप कर हम पूरी तो नहीं, मगर कुण्डलियों के समान दिखने वाली रचनायें लिखना सीख गये. तो हम भी सोचते हैं कि चलो छोड़ो यार, बता ही देते हैं. ज्यादा होगा तो रुमाल जेब में ही रखे रहेंगे और गाहे बगाहे हाथ से ही हवा में लहरा दिया करेंगे.

ठीक है जैसी हरि इच्छा:

हमने सबसे पहले इसके बारे में पढ़ा था अनुभूति पर और फिर इस बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा, तो सो ही आप भी कर लो और अगर वहां जाकर नहीं पढ़ना तो वह भाग विशेष यहां पुनः आपकी सेवा में पेश है. अब चूँकि लेख का इस्तेमाल आपको जानकारी देने हेतु किया जा रहा है, अतः मुझे विश्वास है कि पूर्णिमा वर्मन जी इसके इस हिस्से के बिना अनुमति के पुर्न-प्रकाशन का बुरा नहीं मानेंगी:



कुण्डलियाँ

इसके आरंभ मे एक दोहा और उसके बाद इसमें छः चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में चौबीस मात्रायें होती हैं. दोहे का अंतिम चरण ही रोला का पहला चरण होता है तथा इस छ्न्द का पहला और अंतिम शब्द भी एक ही होता है.

उदाहरण-

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान.
चंचल जल दिन चारिको, ठाऊँ न रहत निदान.
ठाऊँ न रहत निदान, जयत जग में रस लीजै.
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै.
कह 'गिरधर कविराय' अरे यह सब घट तौलत.
पाहुन निशि दिन चारि, रहत सबही के दौलत.


दोहा

इस छ्न्द के पहले-तीसरे चरण में १३ मात्रायें और दूसरे-चौथे चरण में ११ मात्रायें होती हैं. विषय(पहले तीसरे)चरणों का आरम्भ जगण नहीं होना चाहिये और सम (दूसरे-चौथे) चरणों का अन्त लघु होना चाहिये.

उदाहरण-

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय.
जा तन की झाँइ परे, स्याम हरित दुति होय. (२४ मात्राएं)


रोला

रोला छंद में २४ मात्रायें होती हैं. ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्राओं पर विराम होता है. अन्त में दो गुरु होने चाहिये.

उदाहरण-

'उठो उठो हे वीर, आज तुम निद्रा त्यागो.
१२ १२ २ २१, २१ २१ १२ २२ (२४ मात्रायें)
करो महा संग्राम, नहीं कायर हो भागो.
तुम्हें वरेगी विजय, अरे यह निश्चय जानो.
भारत के दिन लौट, आयेंगे मेरी मानो.



गण और मात्राओं के विषय में अधिक जानकारी के लिये अनुभूति पर देखिये.



आशा है अब आप कुण्डली कला मे पारंगत हांसिल करेंगे और शीघ्र ही कुण्डलियाँ दागना शुरु करेंगे.

हम तब तक आपके लिये कुण्डली-वीर का खिताब धो-पोंछ कर रखने की तैयारी में निकलते हैं.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 09, 2006

भगवान से मुलाकत

बीती ४ तारीख को हमारे चिट्ठे पर एकाएक भगवान अवतरित हुये और हमारे कवि सम्मेलन वाले लेख पर टिप्प्णी लिख कर भाग गये.

"अगर पोस्ट कर देते अपने ब्लाग पर, तो हम भी चले आते, चलो खैर...."

और अपना नाम लिख गये कालीचरण. अदा देखते ही हम समझ गये कि हो न हो, यह इस ग्रह का नागरिक तो दिखता नहीं है. जरुर, कोई दिव्य शक्ति का धारक है जो ऎसी बात कर रहा है. हमने तुरंत उनके नाम पर चटका लगाया और पहूँच गये दिव्य लोक "भात भाजी". शक बिल्कुल सही निकला. दरवाजे पर ही तख्ती टांगे बैठे थे, हम अब भी भगवान हैं.."I am STILL God".

हम साष्टांग दंडवत की मुद्रा में आ गये. प्रभु दर्शन को कुण्डी खटखटाई, उधर से आवाज आई " कौन है इतनी रात गये.आराम भी नहीं करने देते". एक बार तो मन किया कि दबे पांव वापस भाग चलें, कहीं प्रभु आराम में विघ्न डालने के उपलक्ष्य में शाप रुपी माला न पहना दें. मगर तुरंत ही दूसरा ख्याल आया कि अब भाग भी जायेंगे तो भी क्या. वो तो भगवान हैं, जान ही जायेंगे कि कौन आया था. अब मरता क्या न करता, डले रहे साष्टांग, जब तक दर्शन नहीं हो गये. भगवान ने दर्शन दिये, हम धन्य हो ही रहे थे कि दहाडते हुये बोले: " कैसे आये हो इतनी रात गये".

घबराये तो हम थे ही सो घिघियाते हुये कहे: "प्रभु, आप तो नाराज हो गये. हमने जब अपने चिट्ठे के दरवाजे पर आपका छोड़ा संदेशा देखा तो क्षमा मांगने तुरंत भागते चले आये. अब आप ही बतायें कि ऎसी बदहवासी में समय का क्या ख्याल रहता है?"

भगवान गरजे:" अच्छा तो तुम हो उड़न तश्तरी. हमें काहे नहीं बताये पहले से, वो बफैलो वाले कवि सम्मेलन के बारे में, हमें भी आना था वहां". हमने उसी घिघियाये अंदाज को बरकरार रखते हुये अपनी बात धरी: " प्रभु, आपको क्या बताते, हम समझें आपको तो पता ही होगा, आप तो अंतर्यामी हैं" प्रभु भी थोडी छाती फुलाते हुये और साथ ही अपने बड़प्पन का परिचय देने के चक्कर में उगल गये: " अरे, अब काहे के अंतर्यामी." अब कह तो गये फिर एकदम सकपका गये कि अरे, यह क्या निकल गया मुँह से. हमने भी स्थिति भांपते हुये तुरंत फायदा उठाया और अपनी मुद्रा, घिघियारी से दो स्तर पदोन्नत कर सहज और फिर मजाकिया कर ली: " क्या प्रभु, आप भी पृथ्वी दोष का शिकार हो गये कि अब बिना बताये कुछ पता ही नहीं चलता फिर तो आप भी उन्हीं स्वयं-भू ईश्वरों की जमात के कहलाये जो सुबह से ही टी.वी. पर आसान जमा कर बैठ जाते हैं. सिर्फ अपनी राग गाते हैं और अपनी दुनिया में ही मगन रहते हैं, भले ही बाकी दुनिया में आग लगे."

प्रभु सकुचाये और उवाचे:" वैसे तो मैने भी उसी महान धरती पर नर्मदा की गोद में जन्म लिया है किन्तु जब यह सारे तथाकथित भगवान झूठमूठ की तपस्या के लिये अप नार्थ में बद्रीनाथ केदारनाथ साईड के जंगलों की तरफ जा रहे थे, हमने असल तपस्या के लिये कांक्रीट के जंगल चुने. हमने अभियांत्रिकी की तपस्या पूरे पांच साल की." अब जब ये सारे भगवान अपने मठ खोल खोल कर भारत में टीवी के माध्यम से प्रसारित एवं प्रचारित हो रहे हैं और प्रचार पाते ही विदेशों की तरफ नजर दौडाते हैं ताकि आर्थिकता का ढांचा भी मजबूत हो जाये, तो हमने सीधे ही अमरीका का रुख किया और यहीं पर मठ की स्थापना कर डाली. प्रचार प्रसार के लिये भी टीवी की बजाय इंटरनेट का हाथ थामा. अब नया प्रयोग है तो समय तो लगेगा ही मगर मै अब तक मिले समर्थन और भक्तों की संख्या से संतुष्ट हूँ और सुनहरे भविष्य के प्रति आशान्वित भी.

हमने बात आगे जारी रखने के उद्देश्य से पूछा, "तो भगवन, जैसी की भ्रांति है कि आप अंतर्यामी हैं, वो क्या गलत है." बोले "भाई, अब तुम से जब इतनी बात हो ही गई है तो किसी से बताना नहीं मगर हम कोई अंतर्यामी-वामी नहीं हैं, वो तो हमारा खबरी है न! नारद, वही हमें सब बताता है सो हम जान जाते हैं. अब पिछले माह काम के अधिकता के कारण उसे दिल का दौरा पड़ा तो हमारी सूचना का साधन बंद. अब तो काफी ठीक हो गया है. कह रहा था एक दो हफ्ते में फिर से काम पर लग जायेगा. मगर अभी डाक्टर ने थोड़ा सतर्क रहने को कहा है तो सारी खबर रोज नहीं दे पायेगा. पता नहीं कोई फार्मूला गांठा है कि कुछ तो रोज सुनायेगा, कुछ एक हफ्ते में और कोई कोई तो महिने में और तो और कोई तो तब तक नहीं, जब तक खबर पैदा करने वाला आकर खुद नारद को खबर न करे. अब देखो क्या होता है, जैसा भी है-है तो बड़ा सहारा.

हम कहे:" महाराज, नारद की अनुपस्थिती में कुछ और खबरिये पैदा हुये थे जो अपनी अपनी राग में लोगों तक सब खबर पहूँचा रहे थे. कुछ तो पूरी कथा की तर्ज पर जैसे ऊ चिट्ठा चर्चा वाले. उसी में तो हमारे कवि सम्मेलन वाली खबर भी थी. आपको मालूम चल जाता अगर इस बीच आप उनको साथ रखते तो. देखिये न, ऎसन छपी थी:

" उधर टोरंटो से तीन घंटे की दूरी पर स्थित बफ़ैलो(क्या नाम है) में आयोजित कवि सम्मेलन में हिंदी के धुरंधर ब्लागर अपने जौहर दिखायेंगे जिनमें शामिल होंगे राकेश खंडेलवाल,अनूप भार्गव और उड़नतस्तरी वाले समीर लाल. "

भगवान एकदम क्रुद्ध हो गये, बोले:" हम तो सिर्फ खबरों पर भरोसा रखते हैं और फिर नज़रिया अपना बनाते हैं कि कैसे उस खबर पर क्या करना है. मगर यहां तो ये अपना नजरिया ही गड़बडा़ देते हैं, किसी की तारिफ और किसी की खिंचाई( हमार नारद की भाषा में-चिकाई) तो कौनों को कवर ही नहीं किये और कौनों को दो दो बार. नहीं भईया, ये कोई खबरी थोड़े ही हैं, यह तो विश्लेषक टाईप कुछ दिखते हैं, इन चिट्ठा चर्चा वालों का काम दूसरा और नारद का काम दूसरा. हमें तो बस खबर बताओ, बकिया हम खुद देख लेंगे.

हम कहे:"आप ठीक कहते हैं भगवान. आप तो सब जानते हैं, इनका काम दूसरा है. यह नारद के विक्लप नहीं. इनकी अलग महत्ता है और नारद की दूसरी" तो भगवान मैं चलता हूँ. आगे कभी ऎसा कार्यक्रम हुआ तो जरुर सूचित कर दूँगा. अगर न भी आ पाया तो ईमेल से, जरा अपना ईमेल दे देते"

भगवान प्रसन्न दिखे, बोले लिखो मगर किसी को देना मत नहीं तो स्पाम की बड़ी समस्या हो जाती है :"दानव डाट नचान ऎट @@@@.com" हमें हल्की सी हंसी आ गई. भगवान तो भगवान. तुरंत समझ गये कहने लगे "बेटा, जब मैं नाचता हूँ तो बिल्कुल दानव हो जाता हूँ और फिर जो तांड़व मचता है कि देखने वाले देखते रह जाते हैं."

हमने तुरंत साष्टांग दंड़वत किया और रुख किया अपने घर का. तो ऎसी रही भगवान से हमारी भेंट.


अब वापस आकर बैठे हैं तो चिट्ठा चर्चा के भविष्य को लेकर चिंता में वजन कम हुआ जा रहा है, थोड़ी मदद करें, बतायें कि नारद की वापसी के बाद चिट्ठा चर्चा का क्या स्वरुप होना चाहिये. क्या, जैसे वो चल रही है, उसे वैसा ही चलाना चाहिये या कि कोई और स्वरुप?



-एक प्रस्तुति के साथ विदाई--

हमरे दर पर आये थे, एक दिन श्री भगवान
हम भी मिलकर आ गये, अपना सीना तान.
अपना सीना तान, वो कुछ परेशान से लगते
नारद की बीमारी से आम इन्सान से दिखते
कह समीर कविराय कि नारद जल्दी आ जाओ
भगवान बहुत ही दुखी दिखे, अब न तड़पाओ.


--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अक्टूबर 06, 2006

अब लगा गुहारें

होगा क्या अब लगा गुहारें, कुछ करके दिखला दो न
उजड़े बाग चमन करने को, कुछ नव पुष्प लगा दो न.

खून खराबे से क्या हासिल है, क्यूँ मारो नादानों को
राह अहिंसा की चलने के, कुछ अब गुर सिखला दो न.

अपना मकसद सबको प्यारा, तुझ पर भी यह बात सही
मंजिल की है राह सही क्या,कुछ इनको भी बतला दो न.

इक धरती के इक टुकडे़ पर, क्यों मचता कोहराम यहाँ
किसकी खेती कौन है जोते, कुछ तो हिसाब समझा दो न.

कल की ही तो बात रहे थे, हम प्याला हम भी तुम भी
फिर क्यूँ हुये खून के प्यासे, कुछ प्रेमसुरा छलका दो न.

कुछ समीर ने समझा है, कुछ तुम समझो तब बात बनें
अगर भेद हो कहीं समझ में, उसे भी आज मिटवा दो न.

--समीर लाल ‘समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 02, 2006

धरम के नाम पर

धरम के नाम पर हम ही, विवादों को उठाते हैं,
भरम इस बात का हमको कहीं कुछ नाम पाते हैं.

बदल जायेगी दुनिया ही, पता तो था जमाने को
मगर फिर भी ये हरकत है, कहाँ हम बाज आते हैं.

दिया सब छोड़ अपनों ने, घिरे तूफ़ान में जब भी
दिखे बस हाथ गैरों के, जो संग अपना निभाते हैं.

पकड़ कर उंगलियां मेरी, जो चलना सीखते मुझसे
सहर की लाल किरणों मे, मुझी को पथ दिखाते हैं.

चमन में हर तरफ अब तक, अंधेरा ही अंधेरा था
वजह थी बेखुदी जिनकी, शमा वे ही जलाते हैं.

लगी है आग बस्ती में, झुलसती आज मानवता
दिये जो आँख में आंसू, उन्हीं से हम बुझाते हैं.

जगो तुम आज जगने को, ‘समीर’ आवाज़ देता है,
मिटाने आज वहशत को, चलो कुछ कर दिखाते हैं.

--समीर लाल ‘समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, सितंबर 30, 2006

नया नाम:डा. अंबेडकर स्मृति चिट्ठा चर्चा

न जाने क्यूँ एक कुंडली टाईप कुछ दिमाग मे आ रहा है:

चलना मुश्किल हो गया, हमें सड़क पर आज
बिन पैसा कौडी दिये, क्यों मांग रहे हो ब्याज.
क्यों मांग रहे हो ब्याज, बंद क्या धंधा कर दें
या कि पढने वालों को ही, हम अंधा कर दें.
कहे समीर कविराय कि फिर हाथ न मलना
चिट्ठे बंद हो जायेंगे, तब जंगल मे चलना.


कल शाम को बैठा चिट्ठा चर्चा देख रहा था. पूरा बचपन से जवानी का समय दिमाग मे घूम गया. न जाने कितनी भूली बिसरी यादों की आंधियो ने आ कर घेर लिया.

१.पांचवीं कक्षा मे था शायद. उस वक्त तक पूरी तरह से निखरा हीरा नही बन पाया था जिसे बाद मे "होनहार बिरवान के, होत चिकने पात" कहावत के अपवाद स्वरुप नवाज़ा गया. निखरा तो क्या, बल्कि कोयला समतुल्य ही कह लें.
जब सारी कक्षा के बच्चे बैठ कर अपनी कॉपियों मे सही के चिन्ह, जो शिक्षक लगाते थे, को गिना करते थे कि किसको ज्यादा मिले. हम कुछ साथी अपनी कॉपी मे गोले गिना करते कि किसको कम मिले. जिसको जितना कम, वो उतना कम मूर्ख. बाकियों से, जो सही गिना करते थे, हम कोई खास वास्ता नही रखते थे.अब तो बहुत बरस बीते ऎसे गोले गिने हुये.

२.एक बार एक शादी मे गया था. लडकी के पिता को लडके वालों से कहते सुना:

" मै तो अपनी तरफ से भरसक इंतजाम कर रहा हूँ, अगर कोई गल्ती हो जाये तो बताईयेगा जरुर". लडके वाले भी अच्छे थे, जानते थे ऎसा शिष्टाचारवश कहा जाता है. किसी ने कोई शिकायत नही जताई. ऎसा नही था कि गल्तियां नहीं हुई होंगी, मगर इतने बडे कार्य मे वह स्वभाविक हैं. वो भी शिष्टाचारी थे सो चुप ही रहे और अच्छी बातें देख कर उन्हें सराहते रहे.

३. ऎसी ही एक शादी मे और गया, वहां भी यही.लडकी के पिता को लडके वालों से कहते सुना:

" मै तो अपनी तरफ से भरसक इंतजाम कर रहा हूँ, अगर कोई गल्ती हो जाये तो बताईयेगा जरुर".

अब बरात आई, सारे बराती नाच नाच कर नशे मे धुत. लडके का पिता को लडकी वालों से यह कहते पाया गया," बाकी तो सब बढियां था, वो बैंड वाले ने हीमेश के गाने की धुन ठीक से नही बजाई". अरे, यह भी खुब रहा, नाचे भी पूरा, पी भी खुब और फिर भी नाराज़गी दर्ज सिर्फ इसलिये कि लडकी वालों ने कहा था कि "बताईयेगा जरुर". अरे, शिष्टाचार भी तो कोई चीज है भाई.

४.अंतिम वाकया, और उसके बाद मुद्दे की बात.
हमारे एक मित्र हैं जिन्हें इस कहावत मे हमारी तरह पूर्ण विश्वास है:
"निन्दक नियरे राखिये......."
एक बार हमारे साथ एक दावत मे साथ गये और भरी भीड मे हमसे जोर से कहे, " भाई साहब, आपके पेंट की जिप खुली है, बंद कर लें". अब जिनकी नजर अब तक नही पडी थी, उनकी भी पड गई और हमने झेंपतें हुये बंद कर ली. और वो हमारे पास आये और धीरे से विजयी मुस्कान लिये कहने लगे, "निन्दक नियरे राखिये.......".
अरे भाई, थोडा और नियरे रहते तो ठीक था, कान मे कह देते, तो कम से कम जिन्होंने अब तक नही देखा, उनसे तो नज़रें नहीं चुराना पडती.

अब आते है, मुद्दे पर, जो इन विचारों से पैदा हुये:

१. चिट्ठा चर्चा का नाम बदल कर उपरोक्त क्रं २ को मद्देनज़र रखते हुये "डा. अंबेडकर स्मृति चिट्ठा चर्चा" कर दिया जाये. अन्य भाषाओं के चिट्ठों के सामने अल्पसंख्यक तो है ही और इसके और इस पर लिखी गई विषय वस्तु के उत्थान के लिये ढेरों सार्वजनिक संस्थान कार्यरत भी है. यहां भी हर रोज नये लोग लिखते रहेंगे, हर रोज नये कारण बनेंगे, पूर्ण उत्थान तो कभी संभव नही है तो सबको अपने विचारोत्तेजक विचारों को व्यक्त करने का भी पूर्ण मौका अनवरत जारी रह सकता है.

२. गल्तियां जानने की सभी को आवश्यकता है और यही एक बहुत ही स्वस्थ परंपरा है मगर कृपया उपर दिया विचार क्रं. ४ पर विचार करें. ईमेल के द्वार हमेशा स्वागत मे पलक पावडे बिछाये खुलें हैं.

सोच रहा था कि क्या कोई वर्तनी सुधारक यंत्र पर कार्य चल रहा है? शायद भविष्य उज्जवल हो.

और एक मुक्तक टाईप भी ख्याल मे आया:

हम तो घबराये से हैं, हर सुबह शाम
कहीं हिसाब मांगने न आता हो पठान.



और

हम तो गड्डों से बच कर उछले
निकल गये वो, जो पीकर निकले.




हमने भी बडे बडे दिग्गजो के देखा देखी गलत गलत अभ्यास से पर दिलेरी दिखाई और लिख आये कि बताईयेगा बिल्कुल उपरोक्त क्रं. २ को मद्देनजर रखते हुये. अभी पलक झपकी भी नही थी कि उपरोक्त क्रं. ३ वाली बात हो गई और हम क्रं. १ की तर्ज पर गोले गिनने लग गये.

बच्चों की नजर अब तक जिस बात पर नही गई थी वो भी जान गये कि पिता जी फुस्सी बम हैं हिन्दी के. अब उन्हें कैसे समझाऊँ कि बेटा ये सब उपरोक्त क्रं ३ के बराती हैं जो नाचे भी खुब, पिये भी खुब और अब शिष्टाचार भी नही निभा रहे हैं.

भाई, कान मे कहने के लिये मेरा ईमेल पता है sameer dot lal AT gmail dot com. बहुते अच्छा फुसफुसाता है.थोडा तो क्रमांक ४ का ध्यान धरो, हे ज्ञानी.

हमें मालूम है बहुत से अभी हमे अभी सीख देंगे कि इस तरह ही सीखा जाता है और यह स्वस्थ परंपरा है. अरे भई, हमे मालूम है लेकिन क्या मजे भी ना लें इतने बडे आयोजन के. है तो बडा स्वादिष्ट.

हमें भी पूर्ण विश्वास है:

"निंदक नियरे राखिये........"

मगर अब सोचते है, इसे बदल दिया जाये

"निंदक अति नियरे राखिये, कान मे फुसफुसाये,
काम भी बनता रहे, औउर कौनों जान ना पाये."



टीप:

इस पोस्ट का आधार सिर्फ मौज मस्ती है. कृप्या इसे किसी भी गौरवशाली अभियान की राह मे रोड़ा न माना जाये और न ही किसी तरह के नये अभियान का शंखनाद. यह किसी व्यक्ति विशेष को नजर मे रख कर नही लिखी गई बल्कि स्व-विचारों की आंधी को नियंत्रित करने का प्रयास मात्र है.

-सभी से क्षमापार्थी---समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 28, 2006

आदमी की सोच मे...

बफैलो कवि सम्मेलन मे जो हमने पढ़ा और जो अब तक मेरे इस चिठ्ठे मे नही है, वो यहां पेश है. इसके अलावा आफिस कुंडलियां, दुविधा वाली कुंडलियां और प्रेम गाथा भी पढ़ी गई, जो कि यहां पूर्व प्रकाशित हैं:

कुंडलियां

॥१॥ //यह आशिष फुरसतिया जी दिये थे, चेट पर//

पाये खुब आशिष, जब हम इधर को घुमे
सफलता तेरे चरण नही, चेहरा भी चुमे.
चेहरा भी चुमे? वो अब दलित है भाई
आरक्षण लग गया, जब से पत्नि है आई.
कहे समीर कि अब बस इतना मिल जाये
हर कविता जो कहूँ वो तेरी दाद ही पाये.



॥२॥

डरते डरते हम आये हैं, कविता पढ़ने आज
ताली जो तुम पीट दो, खुश हो लें कविराज
खुश हो लें कविराज क्या कोई गीत सुनायें
या फिर इक वो गज़ल जो तेरे मन को भाये
कहे समीर कि चलो अब हम कविता हैं पढ़ते
भाग ना जायें लोग बस इतनी सी बात से डरते.


कविता मे:


नेता जी बहुत महान हैं



नेता जी बहुत महान हैं
समाज सेवा बस काम है.

वो जो जेल देखते हो,
जहाँ जाना भी हराम है.
ना जाने कितने कैदी,
इनके भाई के समान हैं.

अंदर ही सारे इंतजाम हैं,
नेता जी बहुत महान हैं

कल तक जहाँ झोपडी थी,
आज कितना खुला मैदान है.
और उस पर बना इनका होटल
इस शहर की शान है.

बार बालाओं को इतमिनान है
नेता जी बहुत महान हैं

इस अनाथालय को देखिये,
रुपये की तो बात ही क्या.
कुछ अदद बच्चे भी यहाँ
इन्ही का गुप्त दान हैं.

इनके बहुतेरे अहसान हैं,
नेता जी बहुत महान हैं

वो जो भीड़ देखते हो,
भक्तों की कतार है.
नेता जी का बंगला नही,
लगता है तीरथ धाम है.

आप भगवान के समान हैं,
नेता जी बहुत महान हैं

--समीर लाल 'समीर'



गीत मे: इस पर आपका खास ध्यान चाहूँगा:

आदमी की सोच


आदमी की सोच मे फिर से कमी हो जायेगी
वक्त के इस साथ चलते, मतलबी हो जायेगी.

देखता हूँ बैठ कर मै इस चिता पर कब्रगाह
छोड दो इस बात को, ये मजहबी हो जायेगी.

अपने आंसू पोंछ कर तू चल नदी के पार तक
जिंदगी अपनी ज़मीं पर,फिर सुखी हो जायेगी.

जान की बाजी लगाते देश की जो आन पर
डर तो ये है एक दिन, उनकी कमी हो जायेगी.

रो रहा हूँ देख कर सूखे हुये उस ताल को
आंसूओं की धार से, कुछ तो नमीं हो जायेगी.

वोट की खातिर दलित की आज़ उसने थाह ली
कितने अरमानों की फिर अब, खुदकुशी हो जायेगी.

-समीर लाल 'समीर'



एक दोहा:

लेक ऎरी की तीर पर, भई कविजन की भीड़
रचना अब कोई और लिखे, तबहिं पढ़ें समीर. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, सितंबर 25, 2006

कवि सम्मेलन बफैलो मे

ग्रेटर बफैलो के हिन्दी समाज के तत्वाधान मे दिनांक २३ सितंबर, २००६ को एक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ.इस कार्यक्रम के आयोजन मे श्रीमती सरिता कंसल और नरेन कंसल एवं साथियों का विशेष योगदान रहा. सम्मेलन बफैलो विश्वविद्यालय के हाल मे आयोजित किया गया.

सम्मेलन मे शिरकत करने पहुंचे ६ कवि, जिसमे अमरीका से पांच और एक कनाडा से आये थे. अमरीका के विभिन्न नगरों से पधारे: घनश्याम गुप्ता जी, अनूप भार्गव जी, राकेश खंडेलवाल जी, अभिनव शुक्ल जी, लक्ष्मी नारायण गुप्ता जी और कनाडा से मै, याने उड़न तश्तरी वाला समीर लाल.

सरस्वती वंदना के साथ निर्धारित समय ठीक सायं ७ बजे कवि सम्मेलन की शुरुवात हुई. राकेश खंडेलवाल जी ने अपने सधे हुये अंदाज मे मंच के संचालन की बागडोर संभाली और बेहतरीन तरीके से इस कार्य को अपने अंजाम तक पहुँचाया.

कवि सम्मेलन की शुरुवात लक्ष्मी गुप्ता जी के द्वारा की गई. विभिन्न दौरों मे उन्होने अपनी प्रसिद्ध पत्नी पुराण का पाठ किया:

पत्नी के बिन नहीं है इस जग में उद्धार।
पत्नी की पूजा करो सब कुछ तज के यार।।
सब कुछ तज कर यार तुम सुनो खोल कर कान।
तिरछी चितवन से तुम्हें कर देगी धनवान।।......


और अन्य रचनाओं के साथ कीर्तन भी किया:

कन्हैया ने पहनी जीन्स, बड़ा रस आयो रे.

लक्ष्मी जी जब अपनी कह चुके तो दूसरे नम्बर पर हम पेश हुये, अपनी कुण्डलियों और हास्य रस की कविताओं के साथ:


विराजमान हैं मंच पर, सब दिग्ग्ज पीठाधीश
हमउ तिलक लगाई लिये, अपनी खड़िया पीस.
अपनी खड़िया पीस कि बिल्कुल चंदन सी लागे
हंसों की इस बस्ती मे, बगुला भी बाग लगावे.
कहे समीर कि भईया, ये तो बहुत बडा सम्मान
इतनी ऊँची पैठ पर, आज हम भी विराजमान.


अंतिम दौर खत्म होने से पहले हमने एक गीत भी तर्रनुम मे गाया:

आदमी की सोच मे फिर से कमी हो जायेगी
वक्त के इस साथ चलते, मतलबी हो जायेगी.
देखता हूँ बैठ कर मै इस चिता पर कब्रगाह
छोड दो इस बात को, ये मजहबी हो जायेगी.......


अपनी पेशकश पूर्णता मे एक अलग पोस्ट के माध्यम से आप तक पहुँचाता हूँ.

फिर भाई अभिनव शुक्ल हाजिर हुये सुपर डुपर स्टाईल मे एक से एक कवितायें लिये और बांधे रहे अंत तक अपना समा:

एक बार नेताजी भ्रमण हेतु जा रहे थे,
रास्ते में सुअर की बच्चा एक आ गया.......


और फिर अपना लोकप्रिय मुट्टम मंत्र:

डाक्टर बाबू कह रहे सुबह सवेरे जाग,
बिस्तर बिखरा छोड़ के चार मील तू भाग,
चार मील तू भाग छोड़ दे घी और शक्कर,
सेब संतरा चाप लगा गाजर के चक्कर,
अंग्रेज़ों की तरह यदि उबला खाएगा,
दो महीनें में बिल्कुल ही दुबला जाएगा।


फिर रसगुल्ले, वेलेंटाईन डे...और भी ढ़ेरों.


अनूप भार्गव जी ने भी अपना समा बांधा और सब उन्हे मंत्र मुग्ध हो सुनते रहे:

रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते
उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे अपनी उपमाएं
होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे



और फिर:

कब तक लिये
बैठी रहोगी मुठ्ठी में धूप को,
ज़रा हथेली को खोलो
तो सबेरा हो ...


फिर:

जज़्बातों की उठती आंधी हम किसको दोषी ठहराते
लम्हे भर का कर्ज़ लिया था बरसों बीत गये लौटाते .....


और भी अनेकों. श्रोताओं ने उनके भारत मे हुये सम्मान पर तालियां बजा कर स्वागत किया.

घनश्याम गुप्ता जी का अंदाज निराला रहा और उनकी प्रस्तुति बहुत बेहतरीन:

मूक चिन्तन भी अधूरा मुखर वाणी भी अधूरी
चेतना के बिम्ब से वंचित कहानी भी अधूरी ........


और

सूर्यमुखी फूलों के हाथों का पीलापन
लिये लिये सिमट गई आखिर संध्या दुल्हन....


बहुत सारी रचनाओं के साथ घनश्याम जी छाये रहे.


और फिर राकेश खंडेलवाल जी, जितना सुंदर और सधा हुआ उनका मंच संचालन रहा, उतना ही गजब का काव्य पाठ. वो तो अपनी हर बात कविता मे ही कहते है, सो मंच संचालन से ले, निमंत्रण तक काव्यात्मक ही रहा:

प्रश्न तो कर लूँ
मगर फिर प्रश्न उठता है कि मेरे प्रश्न का आधार क्या हो
पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो.......


तथा

तुमने कहा न तुम तक पहुँचे मेरे भेजे हुए संदेसे
इसीलिये अबकी भेजा है मैने पंजीकरण करा कर
बरखा की बूँदों में अक्षर पिरो पिरो कर पत्र लिखा है
कहा जलद से तुम्ह्रें सुनाये द्वार तुम्हारे जाकर गा कर



लगभग ११० से अधिक हिन्दी प्रेमी श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो पूरे रात्रि ११.३० बजे तक सुनते रहे. श्रोताओं मे सुभद्रा कुमारी चौहान की सुपुत्री श्रीमती ममता भार्गव की उपस्थिती ने कार्यक्रम मे चार चाँद लगा दिये.

इस मौके पर ली गई चंद तस्वीरें भी पेश हैं:



बायें से दायें: अभिनव शुक्ल, अनूप भार्गव, राकेश खंडेलवाल, लक्ष्मी गुप्ता, समीर लाल


बायें से दायें: राकेश खंडेलवाल, घनश्याम गुप्ता, अनूप भार्गव, अभिनव शुक्ल, समीर लाल


बायें से दायें: घनश्याम गुप्ता,राकेश खंडेलवाल, अनूप भार्गव, सरिता कंसल, नरेन कंसल, अभिनव शुक्ल, समीर लाल


टीप: १.फोटो के आधिक्य मे पोस्ट खुलने मे आ रही दिक्कत के बारे मे जान कर कुछ फोटो को अलग किया जा रहा है और साईज भी छोटी कर दी गई है.

२.राकेश खंडेलवाल जी के द्वारा इंगित किये जाने पर फोटो के साथ नाम जोडे जा रहे हैं.धन्यवाद, राकेश भाई, इस ओर ध्यान दिलाने के लिये.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 21, 2006

दुविधा मे हम फंस गये

बडी दुविधा मे हूँ, मित्रों, कुछ सुझाओ. पेश हैं दो कुंडली नुमा रचनाऎं:

॥१॥
अमरीका आ कर बस गये, पैसा खुब कमाये
बोले अमरीकन दोस्त से, घर की याद सताये.
घर की याद सताये तो एक बंगला तनवा लो
थोड़े पैसे पास के, बाकि का सब करज करा लो
कहे समीर कविराय कि हमने फिर माथा पीटा
घर मकान दुई चीज हैं कैसन समझे अमरीका.

दुविधा: क्या घर और मकान का अंतर समझाना पडेगा?

॥२॥
पंछी को तुम मुक्त करो, किया शंख मे नाद
नेता जी हर घर गये, बिना किसी अपवाद.
बिना किसी अपवाद कि वो ललकार लगाते
अगर किया है कैद तो तू उनको आज उड़ा दे
कहत समीर आंदोलन की वो खुशी मनाये
खोल के बोतल बैठे और साथ मे मुरगा खाये.

दुविधा: क्या मुर्गा पंछी की श्रेणी मे आयेगा?

समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, सितंबर 13, 2006

हिन्दी: ओम भूत भविष्य....

सुबह सुबह अभी आफिस मे आकर बैठा ही था कि एक पुरानी परिचिता भाभी जी का फोन घनघना उठा. जैसे ही फोन उठाया, वो लगभग चहकते हुये बोलीं:

" भाई साहब, भाभी बोल रही हूँ, हैप्पी हिन्दी डे...हम तो कल रात ही सोच कर सोये थे कि सुबह सुबह आपको विश करेंगे" और वो हें हें करके हंसने लगीं. हें हें शायद इसलिये कि आजकल इस तरह के दिनों की बधाई इत्यादि तो उपहास के तौर पर ही दी जाती है.

उनकी बात सुन कर मुँह का जायका बिल्कुल वैसा ही हो गया जैसा कि यहां के समोसे पर केचअप डाल कर खाने पर हो जाता है और हम भी मजबूरीवश समोसा खा लेते हैं. केचअप का स्वाद नज़रअंदाज करते हुये बस समोसे का लुत्फ उठाने की कोशिश करते हैं. ठीक उसी तर्ज पर हमने उनकी बात सुनी...और अंग्रेजी रुपी केचअप मे दबे उनकी भावना रुपी समोसे का लुत्फ उठाते हुये उनका धन्यवाद ज्ञापन किया:

"आपको भी हिन्दी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाऎं एवं बधाई और इस शुभ अवसर पर हमें याद करने के लिये आपका बहुत साधुवाद."

भाभी जी तो जोर जोर से हंसने लगीं.."साधुवाद...हा हा हा...आप भी न भाई साहब..कितने फनी शब्द खोज कोज कर लाते हो...टीचर्स डे पर भी आपकी वो शिक्षक वाली पोयेम पढी थी...क्या फनी लिखते हैं, खुब हंसी आई. गज़ब लिखते हैं आप...कैसे लिख लेते है यह सब..द्रोणाचार्य और उनका वो स्टूडेंट....अरे वो अंगूठे वाला... जैसे पुराने स्टफ...हम तो उनके नाम भी याद नही रह पाते.."

हम सोचने लगे, इतने गंभीर वातावरण मे रची गई वो शिक्षक दिवस वाली रचना पर इनको हंसी आ रही है और वो इन्हे फनी लग रही है सिर्फ़ इसलिये कि वो हिन्दी मे है...क्या हो रहा है यह सब...कहां जा रहे हैं हम...खैर औपचारिकता का निर्वहन तो संस्कारवश करना ही था, सो हम उवाचे:

"चलिये, अच्छा लगा कि आपको रचना पसंद आई. बस दिल मे भाव आ जाते हैं तो कलम चल निकलती है."

" अरे भाई साहब, आपके पास अब तक कलम है?...मेरे दादाजी के पास भी थी एक..आजकल तो पेन का जमाना आ गया है, अब कलम कहां.." उन्होने फैशनवश नये जमाने और पुरानी संस्कृति के अवमूल्यन पर अपने विचार धरे.

हमसे भी रहा न गया और हमने इस फैशनेबल चर्चा मे कुछ और इजाफा करते हुये जोड़ा:

"भाभी जी, आप तो फिर भी कलम और पेन मे भेद कर पा रही हैं..आने वाली पीढी तो कलम क्या होती है, यह जानेगी भी नही."

उन्होंने इसे अपनी तारीफ समझ कर, अपनी आवाज को गंभीरता का लबादा ऊठाते हुये तुरंत जबाब दिया: " जी, सो तो है, समय बदल रहा है बहुत तेजी से.."

फिर अन्य वार्तालाप के बाद फोन रखने के पहले उन्होंने एक धमाकेदार खुलासा किया:

"भाई साहब, आपको तो मालूम है कि हम तो जितना बन पड़ता है, चिंटू (उनका ८ वर्षिय सुपुत्र) को अपने कल्चर और लेंग्वेज के बारे मे सिखाते रह्ते हैं और उसे भी हिन्दी मे काफी मजा आता है. अभी पिछली बार इंडिया गये थे तो वो रोज दादी के साथ टेंपल जाता था..मुझे तो बहुत अच्छा लगता था. वहीं उसने वो वाला सोंग भी सिखा था....क्या नाम है...हम्म्म्म....ओह या, वो वाला...' ओम भूत भविष्य....आगे भी इसी टाईप का कुछ...याद नही आ रहा.."

हमने कहा.."वो गायत्री मंत्र..ऊँ भूर्भुवः स्वः....."

"जी, जी बिल्कुल वही...पूरा तो अब उसे याद नही मगर एकआध लाईन अब भी बहुत अच्छी तरह गा लेता है इस सोंग को.."

अब देखें, जब भाभी जी को खुद ही गायत्री मंत्र याद नही है और उसे वो सांग समझती हैं तो चिंटू तो बच्चा है, वो जो भी गाता होगा उसके लिये तो हिन्दी वाकई " ओम भूत भविष्य..." ही है.

आगे उन्होंने बताया कि चिंटू के स्कूल मे करीब ४० हिन्दुस्तानी बच्चे हैं, जो आज हिन्दी डे सेलिबरेट करेंगे. चिंटू भी चार लाईन की पोयम लिख कर ले गया है, सुनाऊँ आपको..."

"जरुर, जरुर..." हमने कहा, यूँ भी हम महिलाओं को मना करने के आदी नही हैं....उन्होने तुरंत पोयम कहना शुरु की:

"आई एम फ़्रोम इंडिया,
ऎंड आई एम प्राउड.
आई लव माई हिन्दी,
आई से इट लाउड"


सिर्फ़ समझने के लिये:

'I am from India
And I am proud.
I love my Hindi..
I say it loud"


कविता के भाव वाकई सुंदर थे. हमने पुनः आदतन तारीफों के पुल बांधे, उन्हें इस शुभ कार्य के लिये बधाई दी और फोन पर विदा लेने की इजाजत मांगी.

विषय गंभीर था, मगर हर गंभीर विषय पर, एक आम हिदुस्तानी का धर्म निभाते हुये, सिर्फ़ विचार ही कर सकता हूँ और तो क्या करुँ.

कुछ पंक्तियों ने जनम ले लिया इस उहापोह मे:


हिन्दी

भाशा है अस्तित्व खो रही
सिसकी भर के आज रो रही
आओ मिल कर इसे उठायें
बस्ती हो बेजान सो रही.


कोशिश करें तभी होता है
बून्दों से ही घट भरता है
वक्त स्वयं है शीश झुकाता
जब आगे को पग बढ़ता है.



हिन्दी है पहचान हमारी
हिन्दी से सम्मान हमारा
युवजन, जागो! हिन्दी अपनी
मिलकर आज लगाओ नारा.

-समीर लाल 'समीर'


पुनश्चः: भाभी जी का अभी फिर फोन आया था. चिंटू को हिन्दी डे वाली पोयम के लिये प्रथम पुरुस्कार मिला है. बधाई, चिंटू और उसकी मम्मी को.

"हिन्दी दिवस आप सभी को बधाई." Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, सितंबर 08, 2006

तीरंदाजी का शौक

अगस्त के अंतिम पखवाडे की एक सुहानी सुबह. अभी हम उठ कर तैयार होकर कम्प्युटर पर गुगल देवता को प्रणाम कर ही रहे थे कि एकाएक पंकज बेगानी मास्साब गुगल चेट पर अवतरित हुये.हमेशा की तरह, पहला प्रश्न-क्या चल रहा है?...जबाब स्वभाविक था, "बस यूँ ही, आप बतायें आप का क्या चल रहा है?"....बस, इसीलिये तो ये प्रश्न फेका गया था कि हम भी पूँछे. तुरंत मुस्कराते हुये शुरु हो गये: "एक गुप्त प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ"

बताने के तरीके से ही हम समझ गये यह गोपनियता सरकारी विभाग की गोपनीय फाईल वाली है, जिसके बारे मे सबको पता होता है. हम इनकी अगली पंक्ति का इंतजार करने लगे जो वो टाइप करते नज़र आ रहे थे. हमे मालूम था कि गुप्तता का जीवनकाल इनकी अगली लाईन तक ही सीमित है. और क्या बात है, अनुभव कितना काम आता है. जैसा हमने सोचा था वो ही हुआ.

"अभी किसी को बताईयेगा नही, तरकश नये रुप मे आ रहा है, ये देखिये" औपचारिकतावश हमने देखा, औपचारिकतावश काफी सराहा भी, तारिफों के पुल बाँध दिये. पंकज जी अति प्रभावित हुये और लजाते हुये हमे भी तीरंदाज बनने का आमंत्रण दे बैठे. अब हमने तरकश फिर से वाकई मे देखा क्योंकि हम भी इसी मैदान मे खेलने के लिये आमंत्रित थे. लगा कि जो तारिफ हम औपचारिकतावश ब्लाग की टिप्प्णियों की तरह कर गये थे वो बिल्कुल सही निकली. मन को बड़ा संतोष मिला, क्योंकि नेताओं की तरह अपने बयान बदलने मे अभी तक सिद्धहस्त नही हो पाया हूँ. हांलाकि प्रयास जारी है.

हमारे आमंत्रण स्विकार करते ही, पंकज जी की टोन मे थोड़ा स्वभाविक सा फरक आया. निवेदन की जगह आदेशात्मक संदेश आया: " तुरंत बिना पूर्व प्रकाशित रचना( थोडी ठीक ठाक साईज की), एक अच्छी खुद की तस्वीर ( अब ये खुद की तस्वीर और अच्छी, दो विरोधाभाषी आदेश का पालन तो टेड़ी खीर थी, मगर जैसा कि हर वरिष्ट अधिकारी के आदेश मे विरोधाभाषी बातें होती हैं, जिसे मातहत को अपनी समझ से भरसक पूरा करना होता है, हमने भी किया) जल्दी भेजें. हमने घिघियाते हुये और बडी हिम्मत जुटाते हुये पूछा कि जल्दी! मतलब कब तक? और फिर जैसा कि सोचा था अगली पंक्ति: परसों तरकश को पब्लिक कर देंगे, तो कल तक आप दोनों चीजें भेज दें.

अब आप ही बताये कि कब मै ठीक ठाक साईज का लेख लिखूँगा, कब अच्छी और वो भी खुद की तस्वीर खिचवाऊँगा. उस पर से हिदायत कि अभी इसकी गोपनियता भंग नही होनी चाहिये. अरे भईये, गोपनियता भंग करने के लिये भी किसी से बात करनी पड़ेगी और तुमने इतना टाईम ही कहां रख छोड़ा है.

खैर, हम सारा दिन शब्दों के साथ कुश्ती लड़ते रहे. फिर फोटो की खोज. इस बीच ईमेल के जरिये अवतरित हो कर "साईट टेस्ट कर लिजियेगा और जो भी सुधार हो, वो ईमेल कर दिजियेगा.". लो अब और लो. जब तीरंदाजी का शौक आया है, तो झेलो. फिर सारी कुछ चीजें, गोपनीय का चस्पा लगा कर पंकज भाई को भेज दी गई, जो अब सार्वजनिक है. हमने तो इसे पूर्णतः गोपनीय रखा, सिर्फ़ अपनी पत्नी को गोपनियता का वादा लेते हुये बताया और उसने ऎसा ही वादा लेते हुये, अपने भाई को और मात्र तीन सहेलियों को, और उन्होंने भी ' किसी को बताना नही ' की तर्ज पर आगे ....मुझे इससे क्या, मैने तो जो वायदा किया था उसे लगभग निभा दिया, अब इससे ज्यादा क्या कर सकता हूँ. अपनी कमीज पर धब्बे ना आयें फिर भले ही आपके संरक्षण मे पूरा तंत्र भृष्टाचार मे लिप्त हो, तो आप क्या कर सकते हैं सिवाय किले पर चढकर भाषण देने के.

घर वालों और मित्रों को बताया गया कि अब हम अर्जुन हो गये हैं. सबने नाक भौं सिकोड़ ली. तब हमे अपनी गल्ती का अहसास हुआ. फिर से समझाया कि अरे भाई, अर्जुन, अर्जुन सिंग आरक्षण वाले नही बल्कि महाभारत वाले जो तीरंदाजी के लिये जाने जाते थे. तब सबके चेहरे थोडे ठीक हुये. लोगों ने पूछना शुरु किया कि पहले तो कवि सम्मेलनों मे जाते थे, अब फेंसी ड्रेस मे भी जाने लगे क्या? बडा मुश्किल है भाई, इन सबको समझाना.

बहुत पहले खुद की लिखी एक भोजपुरी रचना की दो पंक्तियां याद आ गई:

"नज़रन के तुहरे तीर इहर दिलवा मा लगेला
धडकन मे भईल पीर बरत जियरा सा लगेला."


अब सोचता हूँ ये वाले तीर चला कर भी देखा जाये. तो हमारा पहला तीर चला हमारी शादी की सालगिरह सप्ताह मे: सजनिया बुढिया गईलीं हमार.

अब बाकी तीरंदाजों, जो कि सभी सधे हुये प्रमाणित तीरंदाज हैं, संजय भाई, पंकज भाई, रवि भाई, सागर भाई, निधी जी और लेटेस्ट तीरंदाज शुऎब भाई का क्या हाल रहा, वो तो वो ही जाने मगर हमें तो इन धुरंधरों की भीड़ मे खडे होकर तीर चलाने मे बहुत मजा आ रहा है . अब लोग इनकी तीरंदाजी देखने तो आयेंगे ही तो हम पर भी कुछ नजरें पड़ जायें. बड़े शापिंग माल मे दुकान खोलने का यही तो फायदा है. इसीलिये, आज फिर से एक तीर 'अपराध बोध-एक लघु कथा' चलाया है, देखो निशाने पर लगता है कि नही.

आप भी पधारें तरकश पर. देखिये, क्या धुंआधार तीरंदाजी चल रही है.


-समीर लाल 'समीर'

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मंगलवार, सितंबर 05, 2006

गुरू गोविंद दोउ खड़े

आज शिक्षक दिवस है. सभी गुरुजनों को, जिनसे भी मैने कभी भी, कुछ भी सीखा है, चाहे वो मुझसे उम्र मे बडे हों या छोटे, मेरा हार्दिक नमन, अभिनन्दन एवं साधुवाद.

आज समय बदल गया है, जो कि समय का नियम है. मेरे पिता जी के समय, फिर मेरे समय और फिर मेरे बच्चों के समय मे जहां एक ओर सामाजिक मान्यताऎं बदली तो दूसरी ओर, उसी के अनुरुप परिभाषाऎं.
पिता जी के वक्त पाठशाला ही सब कुछ होती थी, हमारे वक्त तक गुरु जी के घर पर थोडी बहुत ट्यूशन और बच्चों के वक्त तक पूरी साज सज्जा के साथ कोचिंग क्लासेस. इन बदलावों के साथ साथ गुरु शिष्य संबंधों मे भी घोर परिवर्तन आ गया, जो कि हर वक्त महसूस किया जा सकता है. अब यह बात भी सामायिक न हो कर पुरातन लगने लगी है आज की पीढी को:

गुरू गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाय
बलिहारी गुरू आपकी गोविंद दियो बताय.

--कबीर

आज के परिवेश पर आधारित चन्द पंक्तियां पेश हैं:

शिक्षक

शिक्षक को सम्मान नही है
शिक्षण का सम्मान नही है
कैसे रंग रँगी अब दुनिया
शिक्षा भी अब दान नही है.

शिक्षा का बाज़ार यहाँ है
खरीदार हर छात्र यहाँ है
एकलव्य यदि नही दिखे तो
बोलो द्रोणाचार्य कहाँ है?

-समीर लाल 'समीर'

पुनः, सभी गुरुजनों को मेरा हार्दिक नमन.
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शुक्रवार, सितंबर 01, 2006

उसको साथ निभाते देखा

परस्पर विरोधाभास दर्शाती इन पंक्तियों पर आप सुधीजनों का ध्यान चाहूँगा:


हर मौसम को आते देखा, हर मौसम को जाते देखा
हर उत्सव एक नये तरीके, उसको गीत सुनाते देखा.

हैवानो की इस दुनिया मे, इन्सानों की कमी नही है
अनजानों की कब्रों पर जा, उसको फ़ूल चढाते देखा.

मदहोशी के इस आलम मे, जो भी हो बस वही सही है
दुख और सुख दोनों रातों मे, उसको जाम पिलाते देखा.

नफरत की इस आंधी मे, बुद्धि उड़ कर कहां गई है
अपने ही भाई के घर मे, उसको आग लगाते देखा.

शर्तों की बुनियाद कभी भी, रिश्तों का आधार नही है
खुद की हस्ती बेच बेच कर, उसको साथ निभाते देखा.

--समीर लाल 'समीर'


और साथ ही पेश हैं कुछ सामायिक हाईकु:

//१//
वाह रे देश
गरीबी पाती भूख
मूर्ति को दूध.

//२//
नेता की चाल
जनता है बेहाल
वो मालामाल.

//३//
राजनीति है
बेरोजगार रोया
नेता है सोया.

//४//
बाढ़ का नाच
लाशों की बिछी सेज
नेता की ऎश.

//५//
हवाई दौरा
गिध्द हैं घबराये
मंत्री जी आये.

//६//
मेरा ये देश
कितने परिवेष
फिर भी एक.

//७//
नेता का काज
आरक्षण है आज
युवा नाराज
.

--समीर लाल 'समीर'
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सोमवार, अगस्त 28, 2006

हमऊ छुट्टी मनायें...

कुछ समय से लोगों की "छुट्टी का दिन कैसे बीता" पर काफ़ी बेहतरीन गाथाऎं पढ़ रहा था. आज जब नींद खुली तो सोचा, हमऊ हफ़्ते भर का लटका काम निपटाते हुये छुट्टी का सदुपयोग कर डालें.
पहला विचार आया कि कार धोने से शुरुवात की जाये. बस गैराज से गाड़ी निकालने बाहर आ गये. निकलते ही शर्मा जी मिल गये, घूम कर लौट रहे थे. फिर क्या था, चर्चा का दौर चल निकला. फिर सामने ही उनके बरामदे मे बैठ कर चाय पी गई. तब तक मुझे याद आया कि शर्मा जी की एक किताब जो पिछले हफ़्ते लाया था, वो लौटानी है. मै घर के भीतर लौट आया कि उनको किताब ले जा कर वापस कर देता हूँ. घर मे घुस ही रहा था कि बैठक की टेबल पर रखी हफ़्ते भर की डाक का हुजूम दिखाई दे गया. अरे, ना जाने कौन कौन सी जरुरी चिठ्ठियां आकर पडी होंगी. चलो, इनकी छ्टाई कर ली जाये. आजकल डाक मे फालतू विज्ञापन वाली डाक कितनी आने लग गई हैं. सोचा, कचरे का डब्बा यहीं लाकर रख लेता हूँ, उसी मे बेकार डाक फेंकता जाऊँगा, नही तो फिर कचरा बीनने का एक काम और बढ़ जायेगा. कचरे का डिब्बा उठाने पीछे वाले कमरे मे गया, तो डब्बा पूरा भरा मिला. ये लो, अब इसे बाहर कचरे मे डाल कर आयें, तब काम आगे बढ़े. अब कचरा फेंकने जा ही रहा हूँ, तो वहीं सामने तो डाक का डिब्बा है, उसमे बिलों के भुगतान के चेक भी डालता आऊँ, कहाँ फिर चक्कर लगाऊँगा. तो फिर पहले चेक बना लेता हूँ. चेक बुक खोली तो उसमे बस एक ही चेक बचा है. नई चेक बुक निकालनी पडेगी. कहां है...कहां है, अरे हां, याद आया, वो मेरी पढ़ने वाली टेबल की दराज मे रखी है. चेक बुक लेने पहुँचा तो देखो तो जरा, ना जाने कल रात शरबत पीने के बाद बोतल यहीं टेबल पर छोड दी.अभी ठोकर लग कर गिर जाये तो सब जरुरी कागज पत्तर खराब हो जायें. इसे फ्रिज मे रख देता हूँ, नही तो खराब और हो जायेगा.
शरबत की बोतल लेकर रसोई मे आया तो वहां किनारे पर रखा गमले का पौधा काउंटर पर बैठा जैसे मेरी ही राह तक रहा था. बेचारा दम तोड़ने की कागार पर है, कब से पानी नही मिला. वहीं काउंटर पर बोतल रख कर पानी लेने जा ही रहा था कि काउंटर पर किनारे ही मेरा चश्मा दिख गया. ये यहां कैसे आया, कल रात से परेशान हूँ. इसे पढ़ने वाली टेबल पर रख आता हूँ, नही तो वक्त पर मिलता नही है. अरे नही, मगर पहले पौधे मे पानी तो डाल दूँ. वही बेसिन के पास चश्मा रख कर पानी भरने के लिये नल खोला ही था कि बेसिन के बाजू मे रखा टी.वी. का रिमोट दिख गया. पता नही कैसे पहुँचा यहां तक. अपने आप तो चल कर आया नही होगा, शायद कल टी.वी. देखते देखते खाना खा रहा था, उसके बाद हाथ धोते समय यहीं छोड दिया होगा. अरे, जरा भी पानी के छीटें पड़ जाये तो ये मियां तो गये और फिर जब तक नया ना लाओ, टी.वी. देखना बंद. नही, नही, इसे यहां से हटा देता हूँ फिर ही कुछ करुँगा. लेकिन अब तो डिब्बे मे पानी भर ही गया है, पहले पानी ही दे देता हूँ. अब पानी भर कर हमने पौधे का रुख किया तो ना जाने कैसे, छलक कर काफ़ी पानी जमीन पर गिर गया. लो, एक काम और बढ़ गया, इसे पोंछो. पोंछने का कपड़ा ना जाने कहां है, बडी मुश्किल है. वो देखो, सामने ही आंगन मे सुख रहा है.अभी लाकर पोंछ देता हूँ, नही तो पानी सामानों के नीचे घुस जायेगा. तुरंत कपड़ा उठाने बाहर निकल ही रहा था कि दरवाजे से शर्मा जी की आवाज आई कि भाई, वो किताब नही लौटाई, शाम हो गई है आखिर मै कब पढूँगा. मैने शर्मा जी से क्षमा मांगी कि आज तो बिल्कुल समय नही मिल पाया.रात मे खोज कर कल आप तक पहुँचा दूँगा.
शर्मा जी चले गये, मै ढलती शाम का सूरज देख रहा हूँ. काफी थक गया हूँ, छुट्टी का दिन खत्म होने के मुहाने पर है. मै दिन भर व्यस्त रहा मगर: ना तो कार धुली, न शर्मा जी की किताब वापस गई, न चिठ्ठियां छांटी गई, न कचरा फेंका, न बिलों का भुगतान. पौधा अब भी पानी की राह तक रहा है, चश्मा काउंटर से उठकर बेसिन के बाजू मे, और शरबत पढाई की टेबल से उठकर काउंटर पर, चेक बुक दराज से निकलने का इंतजार कर रही है. टी.वी. का रिमोट बेसिन के बाजू मे रखा है. पानी का डिब्बा आधा भरा जमीन पर रखा है और जमीन पर गिरा पानी अपने आप सूख गया है. पोंछे का कपडा वहीं अरगनी पर अपना परचम लहरा रहा है और मै थका हारा आकर सोफे पर बैठ जाता हूँ. अभी ईमेल चेक करना है, ब्लाग पढ़ने है, अपना ब्लाग लिखना है.सोचता हूँ खाना बाहर से ही मंगा लेता हूँ, अकेला रहता हूँ ना, कितना कुछ करुँ, अकेले अब होता नही है.

पहले तो रहीम का दोहा ख्याल आया:

"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय,
सुनि अठिलैहें लोग सब, बांटि न लैहें कोय."


सोचा आप लोगों को बताऊँ या न बताऊँ. फिर ख्याल आया कि बांटने से दर्द मे कुछ सुकुन मिलेगा, सो लिख दिया.

(आधार: एक ईमेल कचरापेटी मे मिला अंग्रेजी पत्र)

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 25, 2006

मेरे दादा जी: डा. शिव रत्न लाल

मेरे दादा जी, जिन्हे हम बाबा पुकारते थे, डा. शिव रत्न लाल, जो कि न सिर्फ गोरखपुर शहर के मशहूर एवं सफल होम्योपेथी के डाक्टर एवं समर्पित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे बल्कि एक समर्पित साहित्यकार भी थे. आप बच्चों जैसे निश्छल और भावनाओं से भरे कवि थे.आपके कई कविता संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुये.



उनके देहावसान के बाद "सदाशय शिव रत्न लाल" पुरुस्कार की शुरुवात की गई जो कि हर वर्ष साहित्यकारों को सम्मानित करता है.

बाबा के समय हमारे घर मे उनकी मित्र मंडली की कवि गोष्ठियां हमेशा होती रहती थी जिसमे जानेमाने नाम हरिवंश राय बच्चन, डा. भगवती प्रसाद सिंह, डा.जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव 'अतृप्त', डा.राम अवध द्विवेदी, रामाधार त्रिपाठी 'जीवन' जी जैसे महान लोगों का जमवाड़ा रहता था.

रामाधार त्रिपाठी 'जीवन' जी तो हरदम ही घर पर मौजूद रहते थे. उनका पेशा स्वतंत्र कविता लेखन ही था. जीवन जी की पुस्तक शोकांजली गांधी जी की हत्या के ४ घंटे के भीतर प्रकाशित होकर बाजार मे आ गई थी. ३० पृष्ठों की यह कविता पुस्तक भी मेरे पास धरोहर के रुप मे मौजूद है और मेरी पसंदीदा कविताओं मे से है. अगर आप लोग पढ़ना चाहेंगे तो यहां पोस्ट कर दूँगा.बहुत प्रभावित करने वाली लेखनी है. बाद मे, मुझे याद है, जीवन जी गायब हो गये थे और बहुत खोजने पर भी कभी नही मिले.

अब आपके लिये अपने बाबा डा. शिव रत्न लाल की दो कवितायें उनके कविता संग्रह 'अन्त: सलिला' से पेश करता हूँ:

संकल्प

विश्व के अनजान पथ पर,
मै अकेला चल पड़ा हूँ॥

कौन जाने दूर कितनी,
है अभी मंजिल हमारी।
और कब तक झेलना है,
संकटों का बोझ भारी॥

पथ असीमित, किन्तु, सीमा-
से घिरा, सब ओर से मैं।
चल रहा हूं लड़खड़ाता,
एक पतले छोर से मैं॥

अनुभवों से हीन मेरे-
पग अचानक डगमगाये।
लाख यत्न किया संभलने-
का, न पर वे संभल पाये॥

लक्ष्य से रह दूर अपने,
राह बीच फिसल पड़ा हूँ।
विश्व के अनजान पथ पर,
मै अकेला चल पड़ा हूँ॥

'भूल' कहती है सफलता-
की रहस्यमयी कहानी।
'भूल' को पहचान लेना,
है चतुरता की निशानी॥

ठोकरें खाकर निराशा-
से न पीछे को हटूंगा।
लाख बार गिरुं भले, पर,
साधना में रत रहूँगा॥

साधना से विरत होकर,
कौन साधक बन सका है।
सफल साधक के सुपथ में,
कौन बाधक बन सका है॥

साधनों को ही जुटाने-
के निमित्त निकल पड़ा हूँ।
विश्व के अनजान पथ पर,
मै अकेला चल पड़ा हूँ॥

है नहीं साहस किसी में,
जो कि मुझको टोक देगा।
देखना है कौन मेरी,
राह आकर रोक देगा॥

मै हिमालय सा खड़ा हूँ,
हो जिसे साहस झुका ले।
आज़माना हो जिसे बल,
आज अपना आज़मा ले॥

है अटल विश्वास मुझको,
मैं न तिल भर भी झुकूंगा।
चल पड़ा हूं जब कि आगे,
ना मुड़ूंगा, ना रुकूंगा॥

सकल संचित साध लेकर,
लक्ष्य ओर मचल पड़ा हूँ।
विश्व के अनजान पथ पर,
मै अकेला चल पड़ा हूँ॥

--डा. शिव रत्न लाल (डा. शिव रत्न लाल के कविता संग्रह 'अन्तः सलिला से)


उदबोधन

जागो पंछी हुआ सबेरा।

बीत गई अब रजनी काली,
कूक उठी कोयल मतवाली।
विहंस पड़ी सुमनों की डाली,
सौरभ से भर अपनी प्याली॥

देखो प्राची के प्रांगण में,
ऊषा ने है हेम बिखेरा।
जागो पंछी हुआ सबेरा॥

नभ ने ओस बूंद बरसाया,
सरिता ने संगीत सुनाया।
कलियों ने यौवन-रस पाया,
मधुप वृन्द उन पर मंडराया॥

बहने लगा मन्द मलयानिल,
प्रात हुआ अब मिटा अंधेरा॥
जागो पंछी हुआ सबेरा॥

चहक उठो अब कुछ तो बोलो,
अलसाई आँखों को खोलो।
उड़ कर नभ में वन वन डोलो,
पंखों पर निज जीवन तोलो॥

अपने बल की करो परीक्षा,
छोड़ो निर्बल नीड़ बसेरा॥
जागो पंछी हुआ सबेरा॥

--डा. शिव रत्न लाल (डा. शिव रत्न लाल के कविता संग्रह 'अन्तः सलिला से) Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अगस्त 22, 2006

हम तो चले परदेश रे भईया....

आजकल प्रवासी, अमरीका-कनाडा प्रवास और प्रवासीयों की जीवन शैली या उन देशों की जीवन शैली बड़ा गरम विषय बना हुआ है, चिठ्ठा जगत मे. कई लेख, निवेदित लेख, शिघ्र लेख, टिप्पणियां और ना जाने क्या क्या खबर मे हैं. इसे लेकर कई तरह की भिड़ंत हुई, यहां तक की एक चिठ्ठा तो भगवान को प्यारा होते होते बचा. भला हो चिठ्ठा जगत के निवासियों का, जिन्होने समझा समझा कर बचा लिया वरना तो अब तक तो सर्व रस्म आदायगी के बाद लोग भूल भी गये होते और भाई जी नये नाम से चिठ्ठा लिखते होते क्योंकि यह भूत तो छूटता नही. लिखते जरुर.
अब कोई समझा रहा है, यहां अच्छा ही अच्छा है, आ जाओ. कोई कहता है कि इस तरफ़ की घास वहीं से हरी लगती है, है वैसी ही भूरी, तो आने के पहले सोच लेना.बहुत पापड़ बेलना पड़ेंगे. यहां तक कि यह भी बता दिया कि कितने तो लौट गये.
हम तो भईया किसी को ना समझायेंगे कि मत आओ. हमने देखा है कि जिसको भी समझाया, वो आया जरुर मगर हमसे संबध खतम कर लिया कि खुद तो ऎश कर रहे हो और हमे मना कर हो. अब तो यह बात गांठ मे बांध कर चलते हैं कि कोई भी पूछे कि क्या प्रोस्पेक्टस हैं. हम बस इतना ही कहेंगे, थोड़ी मेहनत और लगन की जरुरत है फिर सब बढ़ियां. अब कैसे समझायें, थोड़ी मेहनत और लगन से तो हर जगह सब कुछ ठीक है, चाहे यहाँ, चाहे वहाँ.
भले ही कितनी मेहनत करनी पड़े, नये नये कोर्स करने पड़ें, अपने प्रोफ़ेशन को छोड़ कर दूसरा काम करना पड़े, अपना नाम खो देना पड़े, मगर आना जरुर. हम मना नही करेंगे. हम मना भी करें तो तुम मानोगे कहाँ.
बस अनूप जलोटा का एक भजन याद करता हूँ और फिर तुमको सलाह देता हूँ, मात्र एक:

"इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले,
गोविन्द नाम लेकर, यह प्राण तन से निकले."


अब जब आ ही रहे हो, तो मात्र यह ध्यान रखना कि यह बात आपके शहर मे बहुत ना फैले. अब जहाँ बचपन से आज तक रहते आये हैं, वहाँ जब सब जान जायेंगे कि आप अमरीका-कनाडा रहने जा रहे हो, तो एक तो आपका ओहदा बढ़ा हुआ सा, कम से कम आपको, महसूस होने लगेगा. जो दोस्त बिना गाली गलोज से आपको संबोधित करना पसंद नही करते थे, वो भी सभ्यतावश आपसे सभ्य हो जायेंगे और कुछ तो अंग्रेजी मे भी बात करने लगेंगे. आप भी मजबूरी वशा ठिठोली छोड़ कर गंभीरता चेहरे पर चिपका कर घूमना पसंद करने लगेंगे.
महीने भर पहले से ही आप मित्रों के घर या होटलों मे दावत खाने लगेंगे. तरह तरह के गिफ़्ट्स का आदान होता रहेगा. प्रदान का तो सवाल ही नही है क्योंकि आप तो जा रहे हैं और इसी आधार पर जब आयेंगे तो प्रदान करेंगे.
जब आप अपने शहर से निकलेंगे तो आदतन और अन्य किसी काम के आभाव मे, आपके जानने वाले ५०-६० लोग तो आपको स्टेशन छोड़ने आयेंगे ही.फिर शायद एयर पोर्ट पर आपके परिवार, रिश्तेदार और खास मित्रों के साथ मुस्कराते, रोते हुये सबुततन तस्वीर उतरवाते हुये आप विदेश प्रस्थान पर निकलें. अब अगर आप शहर मे थोड़े जाने जाने वाले जन्तु हों तो शायद आपके शहर का दैनिक अखबार भी आप की तस्वीर के साथ आपके विदेश प्रस्थान का समाचार छाप दे.
अब इतना सब हो जाने के बाद, अगर यहाँ आकर आपको नही जमा या बेहतर तरीके से यूँ कहें कि आप इनको नही जमे, तो आप क्या करेंगे.किस मुँह से वापस लौट सकते हैं? लोग क्या कहेंगे? कैसे फेस करुँगा सब को?

तो, फिर अनूप जलोटा टाइप कुछ याद करते हुये,

"इतना तो करना स्वामी, जब हम देश से निकलें,
किसी को भी खबर ना हो, जब हम देश से निकलें."


बस इतना करना कि आने के पहले किसी को बताना मत. जब सब सेट हो जाये और जम जाये तो अगली बार जाकर बता देना. वरना तो बस विदेश घूमने गये थे वो भी तो सम्मान का विषय है.उससे भी समाज मे बहुत अंतर पड़ता है कि छुट्टियां मनाने विदेश गये थे. वैसे आयकर वालों से थोड़ा पंगा होगा मगर वो तो आसानी से निपटाया जा सकता है. जब बड़े बड़े निकल गये तो तुम तो फौरेन रिटर्न हो, माननीय.

तो कब आ रहे हो?? बताना जरुर.....

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अगस्त 21, 2006

शहनाई के शहंशाह 'उस्ताद बिस्मिल्ला खान' नही रहे....



शहनाई वादक 'उस्ताद बिस्मिल्ला खान' किसी भी परिचय के मोहताज नही हैं. उन्होने आज सोमवार को ९१ वर्ष की(२१ मार्च, १९१६ से २१ अगस्त, २००६) अवस्था मे अपनी अंतिम सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके देहवसान से एक युग का अंत हुआ.शास्त्रीय संगीत की दुनिया मे इस कमी को शायद ही कभी भरा जा सके.
ज्ञातत्व रहे कि आप भारत रत्न (२००१) से नवाजे गये थे.आपको बनारस हिन्दु विश्व विद्यालय, बनारस और विश्व भारती विद्यालय, शांति निकेतन ने मानद डी.लिट.से सम्मानित किया. आप संगीत नाट्क अकादमी अवार्ड, तानसेन अवार्ड, म.प्र., एवं पदम विभूषण अवार्ड से विभूषित हुये.आपके शहनाई वादन का प्रसारण हर १५ अगस्त को प्रधानमंत्री के लाल किले से भाषण के बाद दूर दर्शन का दस्तुर बन गया था. यह नेहरू जी के समय से शुरु हुआ था. आप पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे.

भगवान दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें.

रुप हंस 'हबीब' का खत आया,यह खबर लेकर:

"शांत हुई शहनाई जब शहनाई बन गई शहनाई,
खुब बजेगी शहनाई 'हबीब', जिसने बजवाई शहनाई."

समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 18, 2006

मै चुप नही रहूँगा.......

चंद शेर आपकी नजर कर रहा हूँ और फिर एक शेर को कुछ आगे ले कर चलता हूँ:
१.

मौसमी कोई फूल गेसू मे लगाया किजिये
चमन के उसूलों को, कुछ तो निभाया किजिये.

२.

मुर्दों की बस्ती में,गुण्डों की सियासत है
मुँह अपना छिपा लिजिये, इसमे ही शराफ़त है.

३.

सपनों मे जो आया, वो ये साया नही था
पाकर भी जिसे अपना, कह पाया नही था.



अब आगे, २ नम्बर के शेर को:--------------

मुर्दों की ये बस्ती है, गुण्डों की सियासत है
मुँह अपना छिपा लिजिये, इसमे ही शराफ़त है.

चलने को तो चलते हैं, हर राह अंधेरी है
जूगनूँ भी नहीं जलते, इतनी सी शिकायत है.

यादों के तेरे साये, मेरी शामों के साथी हैं
उनकों ना जुदा किजिये, इतनी सी ईबादत है.

रात पूनम की है आई, ले कर के घटा काली,
जुल्फ़ों को सजा दिजिये, ये उनकी शरारत है.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अगस्त 15, 2006

एक अजब सा एहसास....

एक अजब सा एहसास.

पहले इतनी दूर थे कि फोन पर बात करने मे भी तीन दिन मे काल लग पाता था और जब लग भी जाये तो चीख चीख कर बात हो, वो भी हाल चाल जानने तक सीमित.वजह, एक तो आवाज साफ़ नही और उस पर से फोन दर इतनी मंहगी कि महिनों मे एक बार बात हो जाये तो काफी. सिर्फ़ चिठ्ठियां सहारा होती थी विस्तार से बात करने की.ना एस एम एस और ना ही इंटरनेट. मगर जब भी मिले, बड़ा इंतजार होता था मिलने का.तरह तरह की बात, प्यार भरा स्वागत और फिर मिलने का वादा.

धीरे धीरे वक्त बदला, दुनिया बदली, हम बदले और संबंधों की मर्यादायें बदलीं और आंकलन का पैमाना बदला.इंटरनेट आ गया, ईमेल, चैट, वोइस चैट.फोन एकदम सस्ते और एक डायल मे जैसे लोकल बात हो रही हो.एस एम एस और सैल फोन की दुनिया हो गई.ना चिठ्ठी ना पत्री, बस ईमेल और फोन.अब तो भाई का भाई के पास डाक का पता भी नही होता.होता है तो सिर्फ़ मोबाईल का नम्बर और ईमेल.फोन पर बात हो गई आ रहे हैं, स्टेशन आ जाना लेने.ट्रेन एक स्टेशन पहले होगी तो मिस्ड काल दे देना. अब अगर वो लेने ना पहुँचे, तो इंतजार करो, पता तो मालूम ही नही, कहां जाना है.बस, मोबाइल चटकाओ या एस एम एस.

फोन पर दिन मे कई बार और चैट पर लगातार बात होने के परिणाम ये हो गये, कि दूरियों का एहसास ही खत्म हो गया और साथ आई ढ़ेरों पंचायत.इससे यह बात हुई, उसने ऎसा कहा, वो यह कर रहा है आदि आदि.,बस यही सब मसाला हर वक्त.जब मिले तो कुछ नया बिन बताया बचा ही नही, क्या बात करो.सब तो फोन और चैट पर कर चुके.पहले रिश्तेदारों के यहां पहुँचते ही हमारा बच्चों से फ़ेवरेट वार्तालाप रहता था कि कैसे हो? बाप रे, कितने बड़े हो गये, बिल्कुल बदल गये हो? कौन सी क्लास मे पहुँचे? अब तो हर हफ़्ते ईमेल मे फोटो पहुँच जाता है और बकिया सब फोन पर..तो बच्चों से क्या बात करूँ?सारा लेटेस्ट तो जानता हूँ.

नव युवाओं के क्षणिक प्रेम संबंधों का भी शायद यही कारण होगा कि अत्याधिक बातचीत..शायद दूरियों से जिस कसक और मिलने की चाह का जो एह्सास रहता था, वो अब बचा नही.

सब देख देख कर सोचता हूँ कि क्या यह अच्छा हुआ कि खराब.वक्त की वादियों मे खोया हुआ बस उत्तर की तलाश मे हूँ. समझ नही आता.बस चन्द पंक्तियों ने जन्म ले लिया,इस एहसास से:

भूगोल की बात जबसे इतिहास हो गई
रिश्तों के बीच मानिये, मिठास खो गई.


बीता था बचपन जिनके साथ कभी
आज उनके ही पते की किताब खो गई.


भटकती रही जिन्दगी यूँ हर गली
दिन के ढलने से पहले ही रात हो गई.


भीड़ लेकर चली जब जनाज़ा मेरा
गली उनकी जो आई, बारात हो गई.


वादा निभाने को वो ना लौटे 'समीर'
हर शाम जिंदगी बस उदास हो गई.


-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 11, 2006

कहाँ रहती हो तुम, जाना.....?

आज सबेरे जब टहल कर लौटा तो वो नदारत थी.
बड़ी कोफ़्त होती है, जब मन किया आ गयी,जब मन किया-गायब.अभी कुछ साल पहले की ही बात है, हरदम घर मे रहती थी.कभी कभार कहीं जाना भी हुआ तो थोड़ी देर को गई और लौट आई, उस पर भी, अधिकतर तो बता कर ही जाती थी.चुलबुली शूरु से थी, मगर बस आंख मिचौली टाइप शरारत करती थी. इधर कुछ सालों से व्यवाहर एकदम बदल सा गया है. एकदम उदंड, लापरवाह और आवारगी की हद तक स्वच्छंदता.पूरे पूरे दिन गायब रहना.फिर कुछ देर को आ गई और जब तक हम कुछ पूछे ताछे, फिर गायब. ना बच्चों की चिंता, ना उनकी पढ़ाई की फिक्र.
उसके इस स्वभाव से, कभी भी आना और फिर कभी भी चले जाना-उस पर भी जाना अधिक और आना कम, हमने उसका नामकरण ही "जाना" कर दिया है.वो इसे प्यार वाला "जानू" टाइप समझती है और खुश होती है.खैर वो क्या समझे, उससे मुझे कोई फर्क नही पडता है.
टहल कर लौटता हूँ थका हारा तो लगता है उसकी कमी ज्यादा खलती है.खैर, वो नदारत थी और कोई मैसेज भी नही था कि कब तक आयेगी, सो खिड़की, दरवाजे खोल कर बैठ गया.बाहर किरण खड़ी थी.दरवाजा खुलते ही मुस्कराई और घर के अन्दर आ गई. किरण बहुत अच्छी लगती है मुझे. दिन भर साथ बिताता हूँ.बच्चों का भी खुब ख्याल रखती है.उनके नहाने से ले कर खाने और पढ़ने तक साथ साथ रहती है .सुबह सुबह अपने बापू के साथ आ जाती है और शाम को जब उसके बापू अपने काम निपटा कर लौटते हैं, तो वो भी साथ वापस.यही उसका रोज नित का नियम है.कभी भी बापू के जाने के बाद तक नही रुकी. उसके बापू तो बहुत व्यस्त रहते और वो अपना सारा समय मेरे साथ बिताती. इस बीच कभी कभी जाना अगर कुछ देर को आ भी जाती, तो भी वो किरण के रहने का बुरा नही मानती.अब मानती भी क्यूँ. उसका सारा दायित्व तो लगभग किरण ही निभा रही थी, कम से कम दिन मे तो.
इधर मै देख रहा था कि गर्मियों मे तो जाना ज्यादा ही गायब रहने लगी है.कभी कभी तो दो दो तीन तीन दिन तक लगातार. लोकलाज के डर से रिश्तेदारों से भी कुछ कह नही सकते और ना ही उन्हें अपने घर आने की दावत दे सकते हैं कि कहीं वो भी जाना के इस रवैये को ना जान जायें.इसी के चलते सबसे कटते चले जा रहा हूँ.
आज मौसम मे बदली छाई थी.जाना तो कल रात से ही नदारत थी.मै सुबह जल्दी उठ गया था.किरण का इंतजार मन मे लग गया था मगर आज तो वो भी देर से आयी.कुछ बुझी बुझी सी थी.बदली जब आकाश मे छाती है, तो मैने देखा है अक्सर किरण उदास सी दिखने लगती है, ना वो हमेशा वाला तेज, ना चंचलता.बस आयी, और धीरे से बरामदे मै बैठ गई.मैने दरवाजा खोला, फिर भी अंदर ना आई. अब उसके सानिध्य का लोभ संवरण मेरे लिये संभव ना था तो मै भी वहीं कुर्सी खिसका कर उसके पास बैठ गया.वो उदास बैठी रही, मैने भी कारण जानने के लिये कुरेदना अच्छा नही समझा.सोचा वक्त के साथ मन हल्का हो जायेगा तो खुद ही ठीक हो जायेगी.सामने चाय की गुमटी वाला ट्रांजिस्टर पर एक गाना फुल स्पीड मे बजाये हुये है.

" पंछी बनो उड़ते फिरो, मस्त पवन मे"

मुझे लगा कि जैसे जाना के बारे मे जान गया है और मुझे चिड़ा रहा है.मै वैसे भी शांत स्वभाव का आदमी हूँ, खास तौर पर छोटे लोगों से जो गाली गलौज पर उतर आते है या फिर जो हमसे ताकतवर होते हैं. मैने चाय वाले को आवाज लगाई और चाय और मंगोडे मंगवा लिये. किरण ने कुछ नही खाया और कुछ घंटे वहीं बरामदे मे बिताने के बाद, आज रोज की अपेक्षा जल्दी लौट गई. मै भी भीतर लौट आया. मौसम मे उमस होने लगी थी, जाना अब भी गायब थी, रात घिर आयी और मै छत पर आकर टहलने लगा. फिर वही दरी बिछा कर लेट गया और ना जाने कब नींद लग गई.एकाएक आधी रात गये नींद खुली तो नीचे जाना आ चुकी थी. मै आखिर पूछ ही उठा कि कहाँ नदारत थी इतने समय तक.कहने लगी सोनिया जी आयी थी, उन्ही की सेवा मे लगी थी और अभी वापस गईं हैं सो थोडी देर को आ गई हूँ, फिर जाना है,कल दुपहर तक तो मुख्य मंत्री जी वगैरह यहीं पर हैं, उन्ही के साथ रहूँगी. मुझे इसके राजनितिज्ञों के साथ संबंधो पर शूरु से ही नाराजगी रहती थी सो गुस्से मे मै वापस छत पर आकर सो गया और जो होना था सो हुआ.सुबह उठा तो जाना जा चुकी थी. नेताओं से उसे विशेष लगाव है, खास कर मंत्रियों से, वो जहां भी होते है, जाना जरुर साथ देती है, भले हम जैसे चाहने वाले उसके इंतजार मे तड़पते रहें. ये मंत्री भी, खुद की वाली तो घर छोड़ कर निकलते है, वो तो कहीं जाती नही है और हमारी वाली वो जहां जायें, उनकी सेवा मे लगी रहती है. शायद यही हमारी किस्मत है. हम भी चाहने वाले हैं, अक्सर गुनगुना उठते हैं:

" हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक,
खुदा करे कि कयामत हो और तू आये.."

----०-------
मित्रों,
यह रचना पढ़कर आप मेरे चरित्र का आंकलन तो नही करने लगे. अरे, यह तो हमने अभी अपनी भारत यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के दौरे के बाद वहां की बिजली की स्थिती को देखते हुये एक आम आदमी के लिये लिखी थी. इस कहानी मे ‘जाना’ बिजली है और किरण सूर्य देव की प्यारी बिटिया ‘सूर्य किरण’.

समीर लाल ‘समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 09, 2006

फुरसतिया जी से मिल कर गल्ती हो गई...

भारत-दुबई यात्रा हमेशा की तरह मंगलमयी, शुभकारी एवं सुखदायी रही.धन्य हो इस ब्लाग का, धन्य हो ब्लागिंग और धन्य हो ब्लागर्स...कालेज के जमाने के बाद पहली बार इस माध्यम ने करीबी मित्रों टाईप की व्यवस्था फिर से की है.वरना तो बस सब व्यवसायिक या स्वार्थवश...नतमस्तक हूँ ब्लाग का यूँ कहें चिठ्ठाकारी का.
इस माध्यम से, बातचीत हुई:
जीतू भाई(नारद) जितेन्द्र चौधरी से-दुबई मे फोन से कुवैत से और भारत जबलपुर मे भोपाल से फोन पर.
शोयेब भाई से दुबई मे
संगीता मनराल जी से दिल्ली मे-ट्रेफ़िक मे फंसी हुई थी फिर भी फोन उठा ही लिया और फिर मिलने की बात भी हुई..गल्ती मेरी, मुलाकात नही हो पाई.
अभिरंजन कुमार जी-बात हुई, मुलाकात का हमारा राजनितिक वादा राजनितिक ही रह गया.
विजेन्द्र विज-ना बात हुई ना मुलाकात हुई-लखनऊ भाग गये एन समय पर-खैर आगे कभी.
सागर चन्द्र नाहर जी-बिना फोन नम्बर दिये बात करना चाहते थे-हा हा-जैसा होना था हुआ-बात नही हुई.
पंकज बेगानी-खाने की थाली लिये बैठे रहे-हम नही गये बस फोन पर बात हुई-मगर मजा बहुत आया.
संजय बेगानी-पतली आवाज़ के धनी-बस फोन पर बात-इंतजार करते रहे हमारे आने का-और हम कलटी कर गये.
रवि कामदार-ना तय था ना बात हुई.
फ़ुरसतिया: क्या बतायें, बात भी और मुलाकात भी.
पूर्णिमा वर्मन जी-बात भी और मुलाकात भी.
अमित गुप्ता-फोन नम्बर पाने की चाह पूरी नही हुई वरना बात करने की इच्छा बहुत थी.
प्रतीक पांडे-आगरा जाना था, भाई के नम्बर के लिये ईमेल किया, कोई जवाब नही आया, मगर फिर जाना भी नही हो पाया तो कोई चिंता नही.
अब सुनो, हम तो फुरसतिया से मिल कर बहुत ही हद कर दिये.पहली बार जब आगरा गये थे, आगरा का किला देखे और एक ही दिन को गये थे, फिर बहुते पछताये, क्यों सिर्फ़ एक दिन को आये.वही फुरसतिया से मिल कर लगा क्यों सिर्फ़ एक दिन को आये.बडी औसत काया-ना मोटे ना पतले, ना गोरे ना काले, ना लम्बे ना नाटे, ना सुंदर ना बदसुरत मगर इन सब के बावजूद ऎसी विलक्ष्ण प्रतिभा के धनी. क्या लेखनी है कि अच्छे अच्छे पानी भरें भाई.देख कर तो मानने को कोई तैयार ना हो कि यही फुरसतिया है जो चिठ्ठाजगत का पितामह, महा ब्लागर, बडे भईया, और ना जाने किन किन नामों से नवाज़ा गया है.
अब हमारे और हमारे परिवार के बारे मे तो पूरा उन्होंने लिख ही दिया है मगर उन्हे पंकज बेगानी जी की क्लास अटेंड करने की सलाह दी जाती है, हमारी फोटो तो बच गई क्योंकि हम सफ़ेद कुर्ता पजामा पहने थे नही तो अंदाज लगाना पडता..अरे भाई, जरा ब्राईटनेस पर ध्यान दो, वरना हम तो अंर्तध्यान हो जाते हैं.
वैसे हमसे गल्ती हो गई, आगे के लिये सभी को सलाह है: इतनी बडी शक्शियत से मिलना हो तो दो तीन को जाना, एक दो मुलाकात मे तो हवा भी नही लगेगी कि मिले कि नही.
क्या चीज़ हो भाई, फुरसतिया, कौन रचे है तुम्हे....नमित हूँ...आगे और भी बताऊँगा इनकी पोल.
चलते चलते एक शेर:
फिर फुरसतिया जी हमसे कुछ अरसे को दूर हो गये और अनूप भार्गव जी का एक एतिहासिक शेर मै याद करने लगा:

"कल रात एक अनहोनी बात हो गई
मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई"

लेकिन अब सो जाता हूँ, वरना नौकरी चली जायेगी.

समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मई 29, 2006

कदम निशां: हवाई जहाज से

दो तीन दिन पहले भाई फ़ुरसतिया जी एक पोस्ट हवाई अड्डे से दागे थे, पढ कर मन इतना आन्नदित हो गया और एक नये उत्साह के साथ हमने भी ठाना कि हम भी अपनी पोस्ट अगली हिन्दी की पोस्ट कही एतिहासिक जगह बैठ कर लिखेंगे और हमने यह पोस्ट हवाई जहाज मे बैठकर लिख डाली. रात नौ बजे टोरंटो से हवाई जहाज रवाना हुआ लंदन जाने के लिये और जैसे जैसे घडी मे रात घिरती जा रही थी, सूरज चडता जा रहा था और जब घडी मे रात के दो बज रहे थे, तब तक सुरज पूरे शबाब पर था, ना जाने बाहर कितना बजा है, उतर कर पूछ भी नही सकते.अब लंदन मे ही उतर कर पूछूँगा.तब तक एक बडी प्रसिद्ध अंग्रेजी कविता का के भावार्थ मे अपना नज़रिया पेश करता हूँ:

हमेशा की तरह, पहले मूल कविता अंग्रेजी मे और फ़िर मै:

Footprints in the Sand

One night I dreamed
I was walking along the beach with the Lord.
Many scenes from my life flashed across the sky.
In each scene I noticed footprints in the sand.
Sometimes there were two sets of footprints,
other times there were one set of footprints.
This bothered me because I noticed
that during the low periods of my life,
when I was suffering from
anguish, sorrow or defeat,
I could see only one set of footprints.
So I said to the Lord,
You promised me Lord,
that if I followed you,
you would walk with me always.
But I have noticed that during the most trying periods of my life
there have only been one set of footprints in the sand.
Why, when I needed you most, you have not been there for me?
The Lord replied,
The times when you have seen only one set of footprints in the sand,
is when I carried you.

Written By: Unknown


वो कदमों के निशां

एक रात मै स्वपन लोक मे,सागर तट पर टहल रहा था
गिरधर मेरे साथ साथ मे, चर्चा से मन बहल रहा था.

जीवन भर की ढेरों बातें, कुछ मीठी कुछ खट्टी यादें
सबका ब्योरा नील गगन पर,चलचित्र सा चल रहा था.

हैरत से मै देख रहा हूँ, जीवन पथ पर कदम निशां
कहीं पे दो और कहीं अकेले, जीवन ऎसे चल रहा था.

सोचा जब तब रुठ के बोला, इंसानों से निकले तुम भी
साथ निभाने का वादा कर, तू भी मुझको छल रहा था.

सुख मे मेरे साथ चले तुम, दुख मे कसा किनारा हमसे
बात सुनी गिरधर मुस्काये, मेरा मन तो मचल रहा था.

तुझको इस जीवन मे जब भी, गम ने आकर घेर लिया
तुझको अपनी गोद उठाये,वो मै ही तो चल रहा था.

--नज़रिया: द्वारा समीर लाल 'समीर'

अब आगे कहीं और लिखा जायेगा, तब तक के लिये नमस्कार. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 25, 2006

गुलमोहर के दो चित्र

गुलमोहर पर प्रत्यक्षा जी की पोस्ट देखी( इस समय यही शीर्षक अनुभूति के याहू ग्रुप पर चल रहा है). मन मे आया, कुछ मै भी बोलूँ. अब तकनिकी जानकारी के आभाव मे बहुत कुछ तो नही कह सकता, बस अपनी समझ से दो रुबाईयों के रुप मे लिख रहा हूँ, और दोनों एक दूसरे की विरोधाभासी...आप भी देखें ( क्या मालूम रुबाई है भी कि नही :):


गुलमोहर के दो चित्र: रुबाईयां

//चित्र १//

गुलमोहर के फ़ूल से मुझे रुसवाई है
बिखर जाता है जब भी हवा आई है
हमारे नातों मे इसका कोई वज़ूद नही
जुदा ना कभी होने की कसम खाई है.

//चित्र २//

गुलमोहर की रंगीन छटा घिर आई है
कोयल इक गीत नया फ़िर लायी है
चलो हम संग मे गुनगुनायें इसको
जिन्दगी बन कर इक बहार आई है.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 24, 2006

मौत से दिल्लगी

मौत से आज दिल्लगी हो गई
जिन्दगी फ़िर अज़नबी हो गई.

दोस्तों से करता रहा शिकवा
दुश्मनों से यूँ दोस्ती हो गई.

गैर का हाथ थाम कर निकला
वफ़ा की क्यूँ उम्मीद खो गई.

रेहन मे हर इक साँस दे आया
जिन्दगी भी यूँ उधार हो गई.

रात भर आसमान तकता रहा
चांदनी भी थक कर सो गई.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 21, 2006

टोने टोटके: नया ब्लाग: बाप रे बाप

आज़ एक नया ब्लाग देखा: टोने टोटके. कोई भी टोटके काम के नही दिखे.मै चक्कर मे था कि टोने ऎसे मिलें जिससे मालूम चले कि कैसे कुछ भी लिखो उसे अच्छा ही माना जाये, कैसे खुब टिप्पणियाँ बटोरो. कुछ नही मिला. बेकार लगा ब्लाग, ब्लागियों के बीच आये और लिख रहे हैं ना जाने किन बिमारों और परेशानों के लिये ( अब फ़ुरसतिया जी, आप तो गज़ब लिखते हो, आप ही कुछ समझाओ, संजय भाई तो समझा नही पाये).

चलो, एक टोटका मै दे देता हूँ:

ता जिंदगी, जब तक ब्लागी रहो, हर बुधवार, शाम अंधेरा घिरने के बाद, स्नान कर, ढूँढ ढूँढ कर, सबके ब्लाग पर १०८ टिप्पणियाँ करो. फ़िर कुछ भी लिखो, मज़बुरी वश लोग आपको टिप्पणियां भेजते रहेंगे.
अब समझ तो नही आ रहा, मगर पता नही कहाँ ले जा रहे हैं अपने ये टोने टोटके वाले साहिब....मगर मुझ पर ना कर देना कोई टोटका, नाराज़ हो कर, इसलिये क्षमा मांगता हूँ...वैसे कुछ सालिड उपाय बताओ यार, जैसे:



  • पत्नी को कैसे समझायें कि ब्लागिंग करना अच्छी बात है.
  • बास को कैसे सेट करें, कि वो ब्लाग लिखना/पढना आफ़िस का काम माने.


बाकि तो आपकी इच्छा, आप तो अंतर्यामी हैं, सब जानते हैं, तो आप से क्या कहें मगर भईया इस युग मे, जब और भी बहुत सी नौटंकी चल रही है, इसे रहने ही दें, अगर इसमे दम है तो यहाँ अजमायें:

  • अर्जुन सिंग का दिमाग दुरुस्त हो.
  • पाकिस्तान बाज़ आये.
  • हिन्दुस्तान अपनी ताकत पहचाने.
  • मल्लिका और राखी सावंत कपडे पहनना सिखॆं.


और सबसे जरुरी:

  • हमारी कविताओं की गहराई लोग पहचाने, और टिप्पणियां करें.


चलते चलते:


"टोने टोटके देख के, दिया समिरा रोय...
इन बातों को रोकने, क्या बाकी बचा न कोय."


बकिया बाद मे....(जीतू भाई स्टाईल)


(टीप: यह पोस्ट मात्र मनोरंजन के लिये है, किसी की टोने टोटके मे आस्था को ठेस पहुँचाने के लिये नही, उनके लिये तो टोटके वाले भाई साहब लिखते ही रहेंगे.मै तो सिर्फ़ ब्लागरर्स के लिये और अन्य कार्यों के लिये अतिरिक्त टोटकों का नारा लगा रहा हूँ)

--समीर लाल Indli - Hindi News, Blogs, Links

ख्वाबों से भरी आँख

हर शाम जिन्दगी को फ़कत काटता रहा
जामों के बाद जाम हर इक नापता रहा.


ऎसा कहाँ कि तुमसे मुझे आशिकी नही
इक बेवफ़ा से वहमे वफ़ा पालता रहा.


कब दोस्तों से थी मुझे उम्मीद साथ की
अपना ही साथ देने से मै भागता रहा.


बेबात हुई बात पर यह बात क्या कही
बातों मे छुपी बात भी मै मानता रहा.


बिखरे नही समीर की दुनिया सजी हुई
ख्वाबों से भरी आँख लिये जागता रहा.


--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मई 20, 2006

अनुगूँज १९ : संस्कृतियाँ दो और आदमी एक

Akshargram Anugunj
फ़िर एक बार अनुगूँज मे हिस्से लेने की कोशिश कर रहा हूँ, वही अपने तरीके से. मेरी समझ से संस्कृतियों की अच्छाई बुराई के प्रति लोगों का नजरिया वक्त के हिसाब से बदलता रहता है, इन्ही को दर्शाती मेरी प्रस्तुति, कबीर दास के दोहे के साथ:


चलती चक्की देख के,दिया कबीरा रोय,
दुई पाटन के बीच मे,साबुत बचा ना कोय

साबुत बचा ना कोय, आ कनाडा मे बस गये
जवानी के सब दिन, बडी ऎश मे कट गये
कह समीर अब क्यूँ, वही सब बातें हैं खलती
बिटिया भई सयानी, उस पर एक ना चलती.

जब उम्र बढी तब, यह बात समझ मे आई
अपने कल्चर की कहें, हर बात अलग है भाई
दिल करता है चलो, अब भारत मे बस जायें,
बिटिया कहिन, जाना है तो आप अकेले जायें.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 14, 2006

आरक्षण की आग

तिनका तिनका जोड जोड़ कर, नीड़ बनाना जारी है
मक्कारों की आँख लगी है, तूफ़ानों की बारी है.

दुनिया भर मे साख जमा कर, ज्ञान पताका लहराई
सत्ता की लालच मे उनकी, बुद्धि की बलिहारी है.

दलितों का उद्धार जरुरी, कब ये बात नही मानी
आरक्षण की रीत गलत है, इसमे गरज़ तुम्हारी है.

रोक लगानी है समीर,अब और न हो ये मनमानी
आने वाली नस्लों के संग, यह केवल गद्दारी है.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 11, 2006

'लेकिन' का बम या.....

इधर काफ़ी दिनों से, जबसे, लिखने का शौक जाग उठा है, अपनी रचनाओं पर काफ़ी समीक्षायें होती देख रहा हूँ:

  • आपकी कविता बहुत अच्छी लगी लेकिन वर्तनी की त्रुटियों पर ध्यान दें, इस वजह से, आप क्या कहना चाह रहे हैं, समझ नही आ पाया.बधाई स्विकारें.
  • बहुत ही सुंदर लिखा है, मज़ा आ गया लेकिन लय और तुक का आभाव नज़र आया, शब्दों के चयन मे भी सतर्कता बरतें. लिखते रहें.
  • वाह भाई वाह, क्या दोहे और कुण्डलियां लिखी है, लेकिन दोहे के अपने नियम होते है, मात्राओं के और कुण्डलियों के अपने, कृप्या उनका ध्यान रखें अन्यथा बहुत बढिया है. कभी समय मिले तो बताईयेगा, क्या कहना चाह रहे थे.
  • क्या हास्य कविता लिखी है लेकिन जरा इस तरह..... जरा बदल कर पढें, आई ना हँसीं. बहुत बधाई
  • बहुत अच्छा लिखे हैं, मजा आ गया लेकिन ऎसा लगा फ़ास्ट फ़ूड के स्टाल पर खडे हैं, जरा सोच सोच कर लिखा करें, अन्यथा प्रयास सफ़ल है, बहुत बधाई.



आदि आदि आदि...ये 'लेकिन' शब्द तो बिल्कुल बम है...और हमारी रचनाओं की समीक्षाओं मे सर्वव्यापी. तारीफ़ सुन हम उडते उडते चले और बस 'लेकिन' का बम...धम्म्म्म्म...और गिरे मूँह के बल. सारे ख्याल हवा और जान ली अपनी औकात.कुछ विख्यात कविताओं के समूहों, जिन पर मेरी रचनाओं पर यह समीक्षायें की जाती है , पर सरकार से कार्यवाही करने की गुहार करूँगा. भारत सरकार, कम से कम हल्ला मचाने मे, तो हमारा साथ खुले आम देगी क्योंकि इन विख्यात समूहों मे विदेशी शक्तियों का हाथ है और वो हम भारतीयों को कतई रास नही आता.


अब तो मेरी जिन रचनाओं की समीक्षा मे लेकिन शब्द नही दिखता है तो उसके मात्र तीन कारण नज़र आते हैं:

  • या तो समीक्षक ने पढा नही और यूँ ही रिवाज़वश समीक्षा कर दी.
  • या तो उसको रचना समझ नही आई.
  • या उसका हमसे कोई जरुरी काम अटका है.



कल रात देर तक जाग कर, बल्कि यूँ कहें, रात भर जाग कर, अपनी समझ से गज़ल लिखी, रदीफ़, काफ़िया, माकता और मतला, यहाँ तक कि , जो कि जरुरी नही है, फ़िर भी जैसा कि एक दो नम्बर की कमाई वाले रईस बाप की बेटी की शादी मे होता है, अगर रिवाज़ है तो अदायगी होगी, भले ही जरुरी ना हो, की तर्ज़ पर, तख्खलुस का भी ध्यान रखा. मगर बकौल फ़ुरसतिया जी, जैसा कि होता है, कुछ छूट ही गया. अब देखिये:


सुबह उठते ही याहू देवता पर मेरे खाते मे एक ई मेल चहक उठीं, भविष्य वक्तिनी कवित्री की: अरे, आपकी रचना पढी, भाव अच्छे लगे लेकिन आपकी गज़ल मे मीटर नही है, अरे भई, मीटर कहाँ से लाऊँ, जो कार मे है, वो काम नही करता. जो बिजली के लिये लगा है, वो तेज चलता है और पानी वाला चलता ही नही.किस को पूजों, किस को कोसो. नगर निगम का दफ़्तर तो हूँ नहीं जो सब पर सम दृश्टि बनाये रहूँ. आगे तंद्रा भंग करने के लिये छीटें स्वरुप ज्ञान वर्षा कि कैसे आप मीटर के बारे मे विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, कौन सी किताब पढें, कहाँ मिलेगी, और उदाहरण के लिये शेर भी, मीटर के तार से लिपटा हुआ. साथ मे सम्वेदनशील शब्दों मे छिपी भविष्य वाणी: मैने यह किताब बहुत दिन पहले पूरी पढी थी, फ़िर कई और(उनके नाम नही बताये, ट्रेड सिक्रेट) मगर अब भी गज़ल नही लिख पाती हूँ.( शब्दॊं को पडताला, भविष्य वाणी: जब हम इतना करके कुछ नही कर पा रहे हैं गज़ल मे, तो तुम क्या कर लोगे, जबकि बाकी किताबें तो तुम्हे पता ही नही हैं, कुछ दिन कोशिश कर लो, जोश ठंडा पड जायेगा).अब बडे जोरों से सोच रहा हूँ कि कुछ पढाई लिखाई फ़िर चालू की जाये, तभी इस लेकिन बम से कुछ निजात मिलेगी, शायद.

वैसे तो अब इस बम से अब चोली दामन का साथ हो गया है, कि रचना लिखने की देर है और लेकिन का धमाका...अब तो Send दबाते ही दोनो हाथों से कान बंद कर लेता हूँ.और इतने 'लेकिन' के पदक इस वीर की छाती पर टकें है, कि कई बार मानव बम होने का एहसास होने लगता है.


इस लेकिन से निज़ात पाने के लिये उपाय सोच ही रहा था, मन विरक्ति से भरा हुआ था, सब कुछ अपनी रचनाओं की तरह अर्थहीन सा लग रहा था, वही भाव जो सिद्धार्थ को बाह्य भ्रमण के बाद आये और बाद मे उन्हे बुद्ध बनाने मे सहायक सिद्ध हुये.बस फ़िर क्या था, हमने भी ठान लिया कि बोध प्राप्त करना है.अब घर तो क्या, घर के दस किलोमीटर के दायरे मे भी बरगद का पेड नही था.फ़िर ख्याल आया कि छत पर एक गमले मे बरगद का बोनज़ाई लगा है.अंधेरा और बिजली गायब.टटोलते छत पर पहूँचे, और ले आये गमला ड्रांईग रुम मे. एक रस्सी मे बांध कर सोफ़े के उपर टांगा और बैठ गये सोफ़े पर आंख बन्द कर तपस्या मे.मुश्किल से १५ मिनट मे बिजली आ गई, लट्टू जल उठा और हमे लगा, जैसे बोध टाइप कुछ प्राप्त हो रहा है:


दिल के भीतर से आवाज आने लगी(आत्म-बोध) और ले चला उडा कर हमको हमारे कालेज के जमाने मे:
तभी से ये लेकिन शब्द मेरे साथ साथ है.उस जमाने मे प्रेम निवेदन के हमारे बेबाकीपन की चर्चा पूरे क्षेत्र मे थी( सिर्फ़ कालेज के जमाने मे, बाद मे तो इतना बदल गया, कि अब तो शराफ़त का माईल स्टोन जैसा हो गया हूँ), प्रेम निवेदन तो हाथ मे लिये फ़िरता था, और स्वभाव से इतना उदार कि थोडी भी ठीक ठाक कन्या से परिचय हुआ, और निवेदन हाजिर.मगर जवाब हरदम समीक्षा टाईप के ही मिले, थोडा सा शब्द इधर उधर, अर्थ एक:


'आप बहुत अच्छे लगते हो लेकिन एक तो थोडा हाईट काफ़ी कम है, और उस पर से आप इतने मोटे हो, और रंग भी दबा हुआ है, और...और...इसके आगे हम से नही सुना जाता, बस चलते चलते अंतिम शब्द गूँजते रहते कानो मे...'सोरी, बुरा मत मानियेगा, बट मेरा इस विषय मे प्रसपेक्टिव अलग है' कह कर वो तो चलीं जाती और मै खडा सोचता रहता कि अगर लेकिन के बाद वाली बात सत्य है, जो कि मै जानता था कि सत्य है तो फ़िर पहले वाली क्या है कि 'आप बहुत अच्छे लगते हो'...


वो तो आज बरगद के नीचे आत्मबोध ना करता तो यह बोझ लिये एक दिन नमस्ते हो जाता.आत्मबोध ने इस लेकिन की परिभाषा इस तरह बताई:


' लेकिन शिष्टाचार और सत्यता के बीच का सेतु (पुल) है'. लेकिन शब्द के एक तरफ़ शिष्टाचार और दूसरी तरफ़ सत्यता निवास करती है.


इस ज्ञान प्राप्ति के बाद इस परिभाषा के आधार पर पुन: उपर लिखी समस्त समीक्षाओं को फ़िर पढा और भ्रम टूटा कि यह लेकिन कोई बम नही बल्कि सेतु है.मन से बडा बोझ टाइप का उतर गया कि हम मानव बम नही हैं.


मगर, आपको बता दे रहे हैं कि हम ठहरे जबरी स्वभाव के आदमी.इतने प्रेम निवेदन ठुकराये जाने के बाद भी हार नही मानी, बस लगे रहे और कालान्तर मे हम एक गौर वर्णिय( साथ ही बोनस मे सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत) पत्नी की प्राप्ति कर सुखमय जीवन व्यतित करने लगे.

तो अब लेखनी मे भी पीछे नही हटूँगा, किताब पढूँगा, रोज लिखूँगा (बकौल फ़ुरसतिया जी 'हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?') और एक वो मुकाम हासिल करुँगा जहाँ दोनों तरफ़ शिष्टाचार सत्यता से हाथ मिला रहा होगा और हमारी रचनाओं को समीक्षा के लिये 'लेकिन' सेतु की बैसाखियों की जरुरत ही नही रह जायेगी.


चलते चलते देवी नागरानी जी का शेर याद आ रहा है:


फ़िक्र क्या, बहर क्या, क्या गज़ल गीत ये
मै तो शब्दों के मोती सजाती रही.
--देवी


कथा समाप्त: जल्दी फ़िर लिखता हूँ लेकिन समय मिलने पर. :)


--समीर लाल 'समीर'

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रविवार, मई 07, 2006

यह वही वाली पोस्ट है.......

अब पिछली पोस्ट जो आने वाली थी, पर टिप्प्णियाँ आ गई हैं, तो इसे अलग से पोस्ट कर देता हूँ :)

क्या बात है ये जुदा जुदा
-------------------------



चमन सभी का एक, क्यूँ ज़ीनत इनकी जुदा जुदा
बागबां सभी का एक, क्यूँ रंगत इनकी जुदा जुदा.

धर्म ग्रंथ सिखलाते हमको, कैसी हो ये मानवता
सबब सभी का एक, क्यूँ बरकत इनकी जुदा जुदा.

भाई भाई को गोली मारे, किसकी कह दें इसे खता
पालन सभी का एक, क्यूँ हश्मत इनकी जुदा जुदा.

समीर हर पल खोजते, मिल जाये हमको भी खुदा
मुकाम सभी का एक, क्यूँ जन्नत इनकी जुदा जुदा.


--समीर लाल 'समीर'

//बरकत=वरदान
हश्मत-ठाटबाट,मर्यादा// Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 04, 2006

अपना ब्लाग बेचो, भाई.........

आज एक ब्लाग पर पोस्ट देखी, ब्लाग का नाम है छाया, जानकारी लगी है कि किसी भारतीय यायावर का है, क्या बात है, भारतीय और यायावर, इसमे अज़ूबा क्या है, कोई भी एक बात बता देते, दूसरी जोडने मे तो हम खुद सक्षम हैं:

पोस्ट शुरू होती है:

हालांकि मुझे मेरी पिछली दो पोस्ट पर टिप्पणियॉ नही मिलीं, शायद मेरा लिखने का उत्साह जाता रहता,

फ़िर मुझे लगा:

अरे, छाया जी तो उदास टाइप कुछ हो गये, टिप्प्णी न आने से. इसके कई कारण हो सकते हैं;
एक तो आपका नाम पता नही है, पढने से एहसास तो है कि कोई भाई साहब हैं, बहिन जी नही...मगर अब छाया को कैसे संबोधित करें, यह समझ मे नही आ रहा था..जरा फ़ोटू वगेरह लगाओ और वो भी नाम भी साथ मे.कैसी भी फोटो हो, लगा दो, भाई, आखिर हमने भी तो लगाई ही है ना.
दूसरा, टिप्पणी का स्वभाव थोडा ज्ञान के समान है, जितना बांटोगे, उतना बढेगा. जब आप दूसरों के ब्लाग पर टिप्पणी करेंगे तो वो भी, भले ही शरमा कर, आपके ब्लाग पर भी टिप्पणी करेगा. कई बार अपवाद भी पाये जाते हैं, तब आप भी उनके ब्लाग पर टिप्पणी करना बंद कर सकते हैं, या उन से बहुत नाराज़ हों तो टिप्पणी करते रहिये, नीचा दिखाने के लिये.आपका क्या जाता है, सिर्फ़ थोडा सा समय और उसकी क्या कमी है अगर आप सच्चे भारतीय हैं और झूठ ना बोलना हो तो. वैसे समय बचाने के भी कुछ उपाय हैं, कहीं पहले से ही कुछ टिप्पणी टाईप करके रख लें, उदाहरण के तौर पर:

. बहुत बढियां, लिखते रहें.

.मज़ा आ गया, बहुत सुंदर लिखते है आप.

.क्या बात है, वाह.

.बहुत बढिया कटाक्ष किया है.

.मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ.

.बहूत ज्ञानवर्धक जानकारी दी है (यह जीतू भाई के हर साप्ताहिक जुगाड लिंक पर निःसंकोच डाल दिया करें)

.क्या लिखते हैं, हंसते हंसते बुरा हाल हो गया. अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा ( फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पर बिना पढे डाल दें)

.शब्द संचयन को माध्यम बनाकर बडी गहरी बात कह डाली. ( एकदम चल जायेगी मानोशी जी, अनूप भार्गव जी और राकेश जी के ब्लाग पर, पर राकेश जी को ईमेल से भेजना पडेगा क्योंकि उनके ब्लाग पर टिप्पणी का कोई प्रावधान नही है, कुछ तो सिखो उनसे, मगर उसके लिये तो वाकई अच्छा लिख्नना पडेगा (रिस्की फ़िल्ड है) और वो कविता ब्लागियों मे राकेश जी के सिवा कौन जोखिम उठा सकता है)

.बहुत गहरी अभिव्यक्ती है, मज़ा आ गया. ( इसे तो सभी कविता टाईप ब्लागों पर डाल सकते हैं)

.शब्दों के माध्यम से बहुत सुंदर चित्र खींचा है, साधुवाद स्विकार करें. ( इसे भी कविता टाईप ब्लागों पर डाल सकते हैं, पिछली टिप्पणी को बदलने के लिये)

.कहाँ से लाते हो इतनी बढियां फोटो (पंकज भाई के लिये)

.कहाँ थे अब तक, छा गये. ( जोगलिखी पर)

बस कट और पेस्ट. सब अज़माये नुस्खें हैं, मेरी बात मानो, बहुत कारगर हैं.

और तो आप खुद ही समझदार है, साथ ही संवेदनशील भी, जब भी अच्छी और कामन टाईप की टिप्पणी दिखे, बस कट एंड पेस्ट करके रख लो. बहुत काम आती हैं.

और इन सब से ऊपर, पोस्ट कैसी भी हो, टाईटल एकदम धासूँ रखो. वही तो खिंचता है, नारद से नज़र को आपके ब्लाग पर.मैने तो यहाँ तक देखा है, टाईटल के बेस पर लोगों ने क्या क्या बताने के लिये के लिये अपने ब्लाग पर बुला लिया, मसलन:

.अब वो छुट्टी पर जा रहे हैं.

.अब वो छुट्टी से आ गये हैं.

.जल्द ही कुछ पोस्ट करने वाले हैं ( जबकि आज तक नही किया, और उस पर भी टिप्पणियां प्राप्त कर सुशोभित हुये)

.नित्य कर्म कैसे निपटाया.

यहाँ तक कि मै नया चिठ्ठा शुरु कर रहा हूँ, स्वागत करिये( फंस गये ना, करो तो मरो, मालूम है कुछ भी पढवायेगा, और ना करो, तो फिर अपने ब्लाग पर वो भी टिप्पणी नही करेगा..ये तो गज़ब हो जायेगा, ना भई ना)
सबसे मजेदार मुझे लगती है, पलायन की सूचना. मेरी यह दुकान बंद हो रही है, कृप्या अब वर्ड प्रेस पर पधारें. अरे भई, हम कोई तुम्हे एड्रेस से थोडे ही ना जानते हैं, ना ही तुम्हे फ़ेवराइट मे डाले है, हमारा माध्यम तो नारद हैं, तुम जहाँ भी जाओगे, नारद हमें बतायेंगे.
अंतिम सलाह, अगर इतने अति संवेदनशील हो तो ब्लागिंग बंद कर दो और वही पुराना रस्ता अपनाओ, कि दोस्त को चाय नाश्ता कराओ और सुनाओ....ब्लागिंग कि दुनिया वो दुनिया है दोस्त, जहाँ चार पोस्ट तक तो सब संभव है, उसके बाद लौटना संभव नही, अभी भी संभल जाओ.
चलिये, मुझे लग रहा पोस्ट लंबी हो रही है...अब बंद करता हूँ..कबीर दास के इन शब्दों के साथ कि धीरज़ धरो हे छायावादी:

"धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सिंचें सौ घड़ा, रितु आये फल होय"

इंतजार करो, छाया भाई, दिल छोटा ना करॊ...सब ठीक होगा, अभी तो यह शुरूवात है.

--समीर लाल 'समीर'

"कृप्या कोई बुरा ना माने, मेरी किसी को आहत करने की कोई मंशा नही है." Indli - Hindi News, Blogs, Links

तुम ना आये

अनुभूति ग्रुप मे इस सप्ताह का शीर्षक "तुम ना आये" बडा भारी सा है, इसे ह्ल्का करने के नज़रिये से कुछ पंक्तियां पेश हैं:

तुम ना आये
----------------

इज़हार-ए-मुहब्बत करने को
हमने क्या क्या किये उपाय
प्रेम संदेशे लिखकर भेजे
वो भी तुझको मिल ना पाये.

हरकारे खत ले करके पहूँचे
भाई से तेरे पिटकर आये
फ़ोन उठा कर तेरे बापू
शेर की धुन मे दये गुर्राये.

घर से कालेज के रस्ते मे
निकलो हमसे नज़र बचाये
काली कार के काले शीशे
हरदम रहते चढे चढाये.

जब भी फ़ूल खरीदे हमने
धरे धरे हरदम मुरझाये
तेरे गम मे बनी कविता
संपादक ने दई लौटाय.

छत से कुदे हम तो मरने
बैठे अपनी टाँग तुडाये
सारे लोग देखने पहूँचे
ना आये तो तुम ना आये.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अप्रैल 27, 2006

क्या बात है जुदा जुदा: एक नज़रिया

यह पोस्ट कुछ देर मे वापस आ रही है...कृप्या इन्तजार करें.
--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

प्रभु से बडा प्रभु का नाम: चुनाव संग्राम

प्रभु से बडा प्रभु का नाम: चुनाव संग्राम- दोहे-कुण्डलियों के साथ

"प्रभु से बडा प्रभु का नाम
जपते रहो परिवार का नाम
कृपा अगर तुम पर हो जाये
पाओगे एक टिकट ईनाम."


//१// रायबरेली चुनाव

भईया खडे चुनाव मे, कौनो मुद्दा ना मिल पाय
विदेशी बहू के राग मे, पहिले भी मुँह की खाय.
पहिले भी मुँह की खाय कि कैसे अब जीत सकेंगे
मंदिर वहीं बनाने का क्या फ़िर फ़िर मंत्र जपेंगे
कह 'समीर' कि रथ का भी अब चले है उल्टा पहिया
जमानत बस बच जाये तो समझो जीते रे भईया.


//२// उत्तर प्रदेश चुनाव

अब यूपी के चुनाव की बिटवा सम्हालेंगे कमान
बाकी सब बस बैठ कर, उन पर धर रहे ध्यान.
उन पर धर रहे ध्यान कि नाव अब पार कराओ
बाकी सब तो थक गये तुमहि कुछ उद्धार कराओ
कह 'समीर' कि विपक्ष की हालत हो रही है अजब
कहते जे नादान लईका है का हमे हरायेगा अब.

//३// अब एक कबीर दास जी के दोहे के साथ

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर
फल लागे अति दूर कि हमरे छुटके भईया
यूपी की क्या बात देश की खे दो नईया
नेता लोगन सब दर पे तेरे पंजा लिये खडा
टिकट बस दिलवा दे रे बिटवा लायक हूँ बडा.


//४// बस चलते चलते एक क्रिकेट के नाम

धोनी ने है धुन दिया,चऊआ छक्का मार
सबके दिल मे बस गया, क्या मारत है यार.
क्या मारत है यार कि जरा संभल कर मारो
जे हि उतारेंगे भद्द, अगर तुम कहीं पे हारो
कहे 'समीर' कविराय कि करो आहिस्ता बोहनी
लम्बी दौड लगईओ जरा थम थम के धोनी.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

ब्लागर डाट काम के नखरे- कुछ शरमाता है

ब्लागर डाट काम ने खाई सिस्ट्म से कुछ मात
नारद पर है पोस्ट दिखे, ब्लाग पर नज़र ना आत.
ब्लाग पर नज़र ना आत कि लगे जैसे शरमाये
सोचा हमहि टेस्ट करें आखिर क्यों नही छ्पाये
इसी वास्ते ये लिखा देखें चिटका लगवा कर
नारद जी क्षमा करें टेस्ट कर रहा एक ब्लागर.

<<इस पोस्ट का उद्देश्य टेस्टिंग मात्र है, सीधा ब्लाग का पता लिखने पर http://udantashtari.blogspot.com/ सबसे नई चुनाव संग्राम वाली पोस्ट नही दिख रही है, साथ ही जब नारद के लिंक पर क्लिक करो http://udantashtari.blogspot.com/2006/04/blog-post_26.html तो पोस्ट तो दिखती है, मगर टिप्पणी जैसा(पोस्ट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण :)) पन्ना काम नही कर रहा है.किसी को ब्लागर डाट काम के इस नखरे को झेलने की विधी मालूम हो, तो कृप्या ईमेल द्वारा मदद रवाना करें. sameer.lal AT gmail DOT com>>

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अप्रैल 25, 2006

एक भोजपुरी टाईप की गज़ल लिखने का प्रयास

मेरा ननिहाल और ददिहाल दोनो ही गोरखपुर, उ.प्र., है मगर मै पैदाईश से लेकर हमेशा जबलपुर, मध्य प्रदेश मे रहा. हमेशा दादी के मुँह से भोजपुरी सुनते थे या माँ पिता जी से, जब वो दादी से बात करें या कोई रिश्तेदार गहन यू.पी. से आया हो.जब कभी गोरखपुर जाना हुआ, तब थोडा और सुना.बस, इतना ही जानता हूँ भोजपुरी के बारे मे. मगर है यह मेरी भाषा, और मुझे अच्छी भी लगती है. अब जितनी भी जानकारी है और जैसी भोजपुरी (हिन्दी मिक्स) मै बोल सकता हूँ, के आधार पर, बस सोचा क्यूँ ना कुछ अलग सा किया जाये और फ़िर उठाई कलम, और शुरु.बतायें, कैसा रहा यह प्रयास:

नज़रन के तुहरे तीर
-------------------------

नज़रन के तुहरे तीर इहर दिलवा मा लगेला
धडकन मे भईल पीर बरत जियरा सा लगेला

ठुमका लगावत चाल की है बात का कहिन
वनवा मे नाचत जेसन कौनो मयूरा सा लगेला

छतियन पे खडी टिकुर टिकुर ताकती रहिन
रतिया मे वो चमकत कौनो चंदरा सा लगेला

जुल्फ़ि उडत हवाओं मा हररहरर करत रहिन
बदरी उठी है किल्लोल कौनो बदरा का लगेला

खुशबु तोहरे बदन की यूँ छितरात जा बसिन
गेंदा चमेली से सजत कौनो गज़रा सा लगेला

नाम सुन 'समीर' का भौं सिकोड सी लिहिन
हमका तो बुझात तुहार कौनो नखरा सा लगेला.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अप्रैल 24, 2006

कुण्डलियों की सी प्रस्तुति: एक राजनीति के नाम

पुनः भावनाओं को आहत न करें, मेरा कोई भी प्रयास इस दिशा मे नही है और न ही किसी राजनीति के तरीके के समर्थन या विरोध मे,.

//१// रथ यात्रा-पार्ट १

रथ यात्रा देखन पहुँचे हम मित्रन के साथ
गधे गधे तो खुब दिखे घोडे नजर ना आत.
घोडे नजर ना आत कि रथ पर बैठे ले जंतर
घुटी बनात पिलात सबहिं को देश सुरक्षा मंतर
अब आने वाली पीढी को सिखला दो ये सत
पाठ्य पुस्तकों मे बदला दो क्या होता है रथ.

//२// रथ यात्रा-पार्ट २

घर पितामह रह रये घुटनन खुब पिरात
चेलन देश भर घुमते लेकर रथ को साथ
लेकर रथ को साथ कि बिल्कुल भीड न आई
पितामह के आशिष बिन सबने मूँह की खाई
चलते जाते सोचते अब तो ओखल मे है सर
कैसे मुँह दिखायेंगे बीच मे लौट जाये जो घर.


//३// एक नायक पर कातिलाना हमले पर

नायक एक लड रहा, काल के संग मे आज,
दुआ तुम्हारे संग है, तू जीते हो हमको नाज.
तू जीते हो हमको नाज कि तुझको चुनाव हरायें
बीच बाज़ार खडा कर एकदम सिर को झुकवायें
मगर आज तेरे जीवन गीत के हम हैं एक गायक
तुझसे ही है हर मज़ा वरन ये क्या खेल है नायक.


<<धिक्कार है इस कातिलाना हमले पर, और ईश्वर से शीघ्र स्वास्थय लाभ की प्रार्थना>>

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अप्रैल 21, 2006

कुछ नेतागिरी की चाहत मे कुण्डलियाँ

आज फिर जाग उठी नेता बनने की चाहत, कई बार लगता है यही एक रास्ता है ऐश के साथ देश वापस आने का:(मात्राओं की गल्ती मत निकालियेगा, नेतागिरी के हिसाब से ये नगण्य टाईप की गल्ती है, वो भी अगर मानें तब) :) :


//१//

कल रात सपने मे मेरे, आये परम पीठाधीश
हाथ धर सिर पर हमरे, दिन्हें खुब आशीष.
दिन्हें खुब आशीष,कि बोले भारत आ जाओ
नेक कर्म कुछ करो, कि नेता बन जाओ.
हम पूछें कि कैसे करें वोट जुगाड का हल
नोट बाँध कर ले आना बाकि देखेंगे कल.


//२//

नोट बाँध कर आये हैं अब बतलाओ कुछ चाल
कैसे चुनाव निकालें अब तुम्हि संभालो हाल.
अब तुम्हि संभालो हाल कि बेटा रिक्शा मंगवा ले
बैठ शहर भर घूम और उको रथ नाम दिला दे
कहो शहर सुरक्षा को है पहुँची बहूत जबरस्त चोट
वोट उसहि को देना भईये जौन पहूँचाये है नोट.


//३//

भईया की पहचान का नारा, लिये हुये है नाम
इनको जानो ऐसे जैसे, पेट मे बच्चा मूँह मे पान.
पेट मे बच्चा मूँह मे पान जरा कुछ फ़ितरत जानो
करवा देंगे ऐश अगर तुम हमें अपना नेता मानो.
किसी को तो दोगे तुम अपने वोट का लगईया
हम भी बुरे नही हैं फ़िर क्यूँ नाराज़ हो भईया.

--समीर लाल 'समीर'
अप्रेल, २००६ Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अप्रैल 17, 2006

चलो आज़ पीते हैं...

मज़हब, मज़हब के ठेकेदार...सब अपने आप मे पूरी वज़ह हैं कि हम पीते हैं.
रुप हंस 'हबीब' जी, जो आज की गज़ल की दुनिया के एक सम्मानित हस्ताक्षर हैं,
ने मुझे इस गज़ल की जमीन दी और फ़िर इस गज़ल को विशेष आशिष;
आप भी गौर फ़रमायें:

चलो आज़ पीते हैं...

उठाओ जाम मोहब्बत के नाम पीते है <(हबीब जी की पंक्ति)>
बहके उन हसीं लम्हों के नाम पीते हैं.

चमन मे यूँ ही बहकी मदहोश बहार रहे
हर फ़ूल से आती खुशबू के नाम पीते हैं.

मानवता की कहीं अब न बाकी उधार रहे
जपते मंत्रित उन मनको के नाम पीते हैं.

जुडते हर एक मिसरों से दिल को करार रहे
तेरे मिसरे से बनी गज़ल के नाम पीते हैं.

गली मे बसते झूठे मज़हब के ठेकेदार रहे
उनको होश मे लाने की कोशिश के नाम पीते हैं.

आती नसल को याद वो खंडहर मज़ार रहे
फ़र्जी मज़हब की मिटती हस्ती के नाम पीते हैं.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अप्रैल 16, 2006

कंप्युटर कुण्डलियाँ

अब जब शुकुल जी कुण्डलियाँ लिखने की तैयारी कर ही रहे हैं और शायद मेरी कुण्डलियों की दुकान मंदी खा जाये, मैने सोचा कि उनके पहले ही एक बार फ़िर अवतरित हो जाऊं, बाद मे जाने क्या हाल हो. तो इस बार सुनें, कंप्युटर कुण्डलियाँ और हाँ, इस बार दोहे भी खुद के, न.३ कुण्डली जीतू भाई के लिये विशेष, वो फ़ुर्सत मे छतियाना से प्रभावित:)

कंप्युटर कुण्डलियाँ

//१//

विद्या ऐसी लिजिए जिसमे कंप्युटर का अभ्यास
खटर खटर करते रहो लोगन शिश झूकात.
लोगन शिश झूकात याकि बात रहि कुछ खास
इंजिनियर तुमको कहें हो भले टेंथ हि पास.
कह 'समीर' कि बाकी सब बेकार और मिथ्या
अमरिका झट पहूँचाये, है गज़ब की विद्या.

//२//

शादी ब्याह की साइट लाई गज़ब बहार
का करिहे माँ बाप भी जब बच्चे हि तैयार
जब बच्चे हि तैयार भई चैटन पर बातें
बैठ कंप्युटर खोलहि बीतीं जग जग रातें.
कह 'समीर' इंटरनेट ने एसि हवा चला दी
माँ बाप घरहिं रहें हम खुदहि करिहें शादी.

//३//

किताब मे लुकाई के, प्रेम पत्र पहूँचात
मार खाते घूम रहे जबहि पकड में आत.
जबहि पकड मे आत कि हम कैसे बच पाते
कंप्युटर ना आये थे जो ईमेल भिजाते
'समीर' अब तो पढने का नेटहि पर हिसाब
बेकग्राउंड मे चैट चले, सामने रहे किताब.


//४//

कंप्युटर के सामने तुम बैठो पांव पसार
समाचार खुब बांचियें पत्नि ना पाये भांप.
पत्नि ना पाये भांप मांगे चाय की करिये
सिर रात दबाये कहे अब काम मत करिये
कहे 'समीर' कि भईये बडा सफ़ल ये मंतर
उनको मेरा नमन जे बनाये ये कंप्युटर.


--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अप्रैल 14, 2006

मंदिर से अज़ान

आज़ फ़िर एक धमाका, अबकी मज्जिद मे.
एक महिने के भीतर,
कभी मंदिर और कभी मज्जिद,
मगर मरेंगे तो पहले इंसान,
फ़िर ही तो होंगे वो हिंदू या मुसलमान:

मंदिर से अज़ान

अमन की चाह मे
दुनिया नई बना दी जाये
रामायण और कुरान छोड के
इन्सानियत आज पढा दी जाये.

जहां मे रोशनी करता
चिरांगा आसमां का है
सरहद को बांटती रेखा
क्यूँ ना आज मिटा दी जाये.

रिश्तों मे दरार डालती
सियासी ये किताबें हैं
ईद के इस मौके पे इनकी
होली आज जला दी जाये.

आपस मे बैर रखना
धर्म नही सिखाता है
मंदिर के कमरे से 'समीर'
अज़ान आज लगा दी जाये.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अप्रैल 11, 2006

अनुगूँज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व: अपना धर्म चलायें

यह अनुगूँज मे मेरा पहला प्रयास है, वो भी कुण्डली के माध्यम से, एकदम नया तरीका: :)
Akshargram Anugunj

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर
पाछे पाछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर

कहत कबीर कबीर कि भईये ये कैसा जंतर
धर्म बना सिर्फ़ नाम और साधू सब बंदर

कह समीर टीवी पर हम खेलें रंग अबीर
अपना धर्म चलायें किनारे खडे रहें कबीर.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

दुआ के वास्ते जिस मुकां पे आया हूँ

दुआ के वास्ते जिस मुकां पे आया हूँ
वो तेरा घर है जिस मकां पे आया हूँ.

गुजारी तन्हा रातें बिछुड कर कितनी
हिसाब उन रातों का तमाम ले आया हूँ.

ज़ब्त बातें इस जुबां पर कितनी
गज़ल मे ढाल तेरे नाम ले आया हूँ.

फ़िर ना होगी 'समीर' जुदाई अपनी
साथ अपने यकीने-जहान ले आया हूँ.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अप्रैल 10, 2006

चिंकारा बनाम इंसान -कुण्डली

आज सलमान खान को चिंकारा के शिकार के आरोप मे ५ साल की जोधपुर मे सजा सुनाई गई। सलमान जोधपुर जेल मे भेज दिये गये।उसी के मद्देनज़र ये कुण्डलीः

चिंकारा बनाम इंसान

चिंकारा की फोटुआ दई पूजा मे टांग
भूले से गोली चले प्राण तजे श्रीमान
प्राण तजे श्रीमान पांच सालों को अंदर
जोधपुर की गरमी से डर जाये सिकंदर
बचें वो जिनने कितने इंसानों को मारा
तुझको हम न छुडहिं तूने तो मारा चिंकारा।

बचाव कवचः मेरा उद्देश्य किसी ग्रुप या संप्रदाय या व्यवस्था को ठेस पहूँचाना नही है।
यदि मेरी लेखनी से किसी की भावनायें आहत हुई हों,तो क्षमापार्थी हूँ। Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, अप्रैल 08, 2006

मेरा ऊँचा साहित्य पढने का प्रयास क्या कर गया!

आज़कल जब भी कुछ पढता हूँ, दिमाग दिशा ही बदल लेता है.अब देखिये, आज़ स्नान ध्यान कर के सोचा कुछ ऊँचा साहित्य पढूँ और लगा पढने "अमीर खुसरो" को. देखिये, क्या मैने पढा:
अब दिमाग तो दिमाग, चल पडा अपनी रफ़्तार से, बहुत समझाया, नही माना. आप भी देखें कि बिल्कुल हाथ से निकला जा रहा है और क्या क्या लिखता है कुण्डलियाँ टाईप, कुण्डलियाँ इसलिये नही कि मात्रा का टोटल (सही मात्रा की जानकारी के लिये यहाँ http://www.anubhuti-hindi.org/kavyacharcha/Chhand.htm देखें, बडी सरलता से समझाया है पूर्णिमा जी ने) नही बैठ पा रहा है(वैसे ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ ही नही हो रहा, अच्छे अच्छे दिग्गजों के साथ यही हुआ है)...बस वहीं चुक गये. :):

//१//
कनाडा की ठंड

खुसरो दरया प्रेम का उल्टी वा की धार
जो उतरा सो डुब गया जो डुबा सो पार
जो डुबा सो पार हम तो तैर ना पायें
नाव खडी हो पास तबही डुबकी लगवायें
कहे 'समीर' कविराय इस मौसम मे उतरो
ठंड नही क्या वहां जहां रहते हैं खुसरो.

//२//
हेयर स्टाईल

गोरी सोवय सेज पै मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने सांझ भइ चहुं देस
सांझ भइ चहुं देस यहाँ तो भया सबेरा
अमरीका है भाई नही ये देस वो तेरा
कहे 'समीर' कविराय लगे है देसी छोरी
छोटे रखते केस यहां तो सबहिं गोरी.

//३//
खीर की चाह

खीर पकाइ जतन से चरखा दिया जला
आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजा
तू बैठी ढोल बजा और मै गाऊँ गाना
फ़िर कब खीर बनाओगी बतलाओ जाना
कहे 'समीर' कविराय कि तेरी कोहू न समझे पीर
कुत्ते ने जो छोडी है उसहि से गटका ले कुछ खीर.

//४//
नुस्खा

खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग
तन मेरो मन पीउ को दोऊ भये एक रंग
दोऊ भये एक रंग पढहिं हम गोरी से ब्याहे
जागत हर एक रैन रंग श्यामल ही पाये
कहे 'समीर' कविराय रंग ऐसे ना उजरो
धरे और कोई नुस्खा हो तो दे दो खुसरो.

बस, बहुत हो गया...तो मैने किताब बंद कर दी..नई किताब खोली और अबके हाथ लगे 'कबीर'..हर दोहा पढूँ और एक ताजी खबर याद आये और बने एक और कुण्डली..पढें:

अब ताज़ा हेड लाईन्स के साथ कुण्डली:

//१//
योगा महात्म

कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय.
बहरा हुआ खुदाय उन्हे हरिद्वार भिजाओ
बिन दवा के योगा से उपचार कराओ.
कहे 'समीर' कविराय कि ऐ भोले शंकर
जो योगा ना कर पाये उसे तुम मारो कंकर.

(// योगा=योग का अंग्रेजी स्वरुप//)

//२//
बुश की भारत यात्रा

जाति न पुछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का पडा रहने दो म्यान.
पडा रहने दो म्यान ये अब ना काम करेगी
अमरीकी मिसाईल से आखिर कहाँ लडेगी
कहे 'समीर' कविराय कि भुनाओ अपनी पाती
साहब से तुम डील कराओ ना पूछो जाति.

//३//
मेरठ मे मज़नू

पोथी पढ पढ जग मुआ पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय.
पढे सो पंडित होय नही तो रोते रहना
जो रस्ते मिल जाये उसी से इलू कहना
कहे 'समीर' कविराय कि कथा मेरठ की होती
तब मै भी कहता कि बेटा तू पढ ले पोथी.

(// इलू=I love you..://))

//४//
बनारस मे बम धमाका

ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोये
अपना तन शीतल करे औरन को सुख होए.
औरन को सुख होए इसी से लूटिया डुबी
हिम्मत इतनी बढी कि बम बन कर के फूटी
कहे 'समीर' कविराय कि ये हरकत है जैसी
आतंक भी कंप जाये सजा दो इनको ऐसी.

और लिख्नना था मगर दोहा कहाँ कहाँ से लाऊँ.कुछ गैरत ने भी झकझोरा कि कब तक उधार लेते रहोगे, मन कहने लगा:

दोहे खुद के सीखिये, कब तक लिखें कबीर
खुसरो भी अब ना रहे,अब का करें समीर.
अब का करें समीर कि अब खुद ही सीखेंगे
यहाँ वहाँ से टीप कछहु तो लिख ही लेंगे
कहे 'समीर' कविराय तबहि हम मनहिं लोहा
कुण्डलियां जब लिखें लगा कर अपना दोहा.

अब आगे से खुद के दोहे भी लिखूँगा, झेलने तैयार रहिये.
-----------------------------------------------
बचाव कवच: इस पोस्ट से अगर किसी की भावना को ठेस पहुँची हो ( मय बुश के) तो माफ़ करियेगा. बिना माफ़ी मांगे गुजारा भी तो नही है.

बस अब आज के लिये इतना ही .बाकी फ़िर कभी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अप्रैल 06, 2006

महाकवि Robert Frost भाग ४: महा तपस्वी-एक नज़रिया

मेरे अंग्रेजी के सबसे पसंदीदा कवि Robert Frost की एक और कविता "Devotion" ने फ़िर दरवाज़ा खटखटाया. १९२८ मे ४ लाईन मे यह लिख गये. देखा, पढा, फ़िर से पढा और फ़िर से पढा-संदेशा तलाशा और 'समीर' चल पडे आपको बताने. मात्र मेरी समझ या नज़रिया है, गहराई मे छिपे संदेशों को खोजने की.इसी लिहाज़ से कविता पढता हूँ कि भईया आखिर क्या कहना चाह रहे हैं, क्या अंर्तद्वंद चल रहा था, उस वक्त उनके मन मे.

Devotion

The heart can think of no devotion
Greater than being shore to the ocean--
Holding the curve of one position,
Counting an endless repetition.

--Robert Frost

अब मेरा नज़रिया देखें(चेतावनी: सहमत होना आवश्यक नही है):

महातपी (महा तपस्वी)

महासागर के तट से जाना
महातप क्या कहलाता है.
लहरों का तांता लगता है
हर व्यथा नई सुनाता है.

सबके दुख को आत्मसात कर
हँसना उन्हे सिखाता है
जीने का विश्वास दिला कर
घर वापस भिजवाता है.

तटस्थ महातपी सागर का तट
जीवन सुख इसमे पाता है.
मानव इससे कुछ तो सिखो
'समीर' हूंकार लगाता है.

--समीर लाल 'समीर'

अपना नज़रिया बताना ना भूलें, कि आप Devotion की चार लाइनों मे छिपे संदेश पर क्या सोचते है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अप्रैल 03, 2006

पश्चिम मे देशी: विडंबना के दो चित्र

पश्चिम मे पढाई कुछ इस कदर मंहगी है और साथ ही पढाई के लिये लोन मिलने का सिलसिला इतना सरल, कि अधिकतर बच्चे लोन लेकर ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.वैसे ये एक फ़ैशन भी है...ऎसे मे बिटिया की शादी मे नये आयाम इस लोन को लेकर जुड जाते है, क्योंकि हम कितना भी पश्चिम मे रहें, हैं तो देशी ही, दो चित्रों के माध्यम से अपनी दो विरोधाभाषी बात पेश कर रहा हूँ, आशा है, सब कवर हो जायेंगे.

//चित्र १//

लडके के पिता ने
लडकी के पिता से कहा
लडकी तो आपकी नायाब है
नौकरी मे भी कामयाब है
पसंद वो एकदम हमारी है
इस घर मे उसी की इंतजारी है.
मगर हमे सिर्फ़ नौकरी पेशा
लडकी ही चाहिये...
उसकी पढाई का लोन
आप ही चुकाईये...
जब चुक जाये तब आइयेगा,
फ़िर आगे बात चलाइयेगा.



//चित्र २//

लडके के पिता ने
लडकी के पिता से कहा
लोन की आप चिंता ना करें
बिटिया ने पढा है,
वही तो चुकायेगी,
नौकरी करती है अपनी
जिम्मेदारी उठायेगी.
लडकी के पिता को
बात कुछ जम गई...
और सोच यहाँ थम गई..
चलो अपना लोन भी
बिटिया के नाम कराते हैं..
ऎसॆ रिश्ते बार बार
कहाँ मिल पाते हैं.

--समीर लाल 'समीर'

आपके पास कोई नया नज़रिया हो तो बतायें. Indli - Hindi News, Blogs, Links