बुधवार, अक्तूबर 20, 2010

नजरों का यकीं...

कमरे में खड़ा खिड़की के बाहर देख रहा हूँ एकटक. वो नहीं दिखता जो बाहर है. नजर बस टिकी है लेकिन दिख वो रहा है जो मन में है. एक उड़ान मन की. विचारों की. कुछ उधेड़बुन तो कुछ धुंधली तस्वीरें हल्के भूरे रंग की. रंग भरा समय भी कैसे वक्त की मार झेल झेल कर बदरंग हो जाता है.

एक बार अपना सिर हल्के से झटकाता हूँ. खिड़की के बाहर हरियाली लिए सब स्थिर है. शायद हवा न चलती होगी. बंद खिड़की के कांच से हवा का अहसास भी पत्तियों की हलचल से होता है. वो न होती तो पता भी न चलता. सर्दियाँ आयेंगी, बर्फ़ जमीन पर कब्जा जमा कर बैठ जायेगी. पत्तियाँ बुरे वक्त में कहाँ साथ देती हैं? छोड़ कर चल देंगी फिर से बेहतर मौसम आने तक के लिए. अच्छे हालातों में ही अपने भी साथ देते हैं.

ऐसे में काँच के भीतर से झांकते हुए मैं भी भला कहाँ जान पाऊँगा कि हवा चल रही है या थमी. ठीक उन पेड़ों की सांसो की तरह-कौन जाने चलती भी होंगी या थम गई.

बिना पत्तों के ठंड की मार झेलते पेड़ों के ठिठुरते बदन खुद का अस्तित्व बचायें या मुझे हवा का पता दें. गर्दन उठाये बेहतर मौसम की आस में फिर अपनों के वापस आने का इन्तजार ही शायद उन्हें उर्जा देता होगा इस मार को झेल जाने की वरना तो हट्टा कट्टा इन्सान भी अगली सांस के इन्तजार में दम तोड़ दे और वो सांस सर्दीली मार में जमी, चाह कर भी लौट न पाये.

जब पत्ते लौटेंगे तो उनके बीच घिर खुशियाँ मनाते ये पेड़ भूल जायेंगे उस दर्द को, उस तकलीफ को जो इन्होंने इन्तजार करते झेली है और पत्तियाँ उन्हें सुखी देख कुछ समय साथ बिताएंगी, फिर विदा ले लेंगी अगली मौसम की मार अकेले झेलने को छोड़ कर.

यूँ सुनी थी एक कविता उस व्यक्ति की जो निर्वस्त्र एक सर्दीली रात काट देता है नदी के इस छोर पर उस पार जलती चिता से उगती आग की तपन सोच कर..

winter-tree

खिड़की से झांक
देखता हूँ वो
जो दिखता नहीं...

शायद

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?

--समीर लाल ’समीर’

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91 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

nice

Bharat Bhushan ने कहा…

क्या बात है इस शब्द-चित्र की.

'नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा'

बहुत ही सुंदर. वाह!

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

आज तो आपकी पोस्ट की पहली लाईन ने ही आईना दिखा दिया जी, हमें बाहर का दिख जाता है और अपने अंदर का नहीं दिखता।
सरजी, लगता है आज आपको नाराज करके ही मानूंगा। आगे बढ़े आपकी पोस्ट पर तो पत्तियों वाली बात पर अड़चन आ गई है। मेरी नजर में पत्तियां साथ तो छोड़ती हैं, लेकिन खुद को फ़ना करके। पेड़ तो फ़िर सर्दी गर्मी झेल लेते हैं, पुराने स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन जो पत्तियां चली गईं वो तो चली ही गईं। नई आयेंगी और ऐसे ही जीवन चलता रहेगा।
शायद मैं पोस्ट की मूल भावना तक नहीं पहुंच पाया। आशा है इग्नोर कर देंगे।
आज कुछ ज्यादा ही उदास करने वाली बातें लिख दी हैं आपने।

रानीविशाल ने कहा…

बहुत दार्शनिक चिंतन प्रस्तुत किया आज आपके आलेख में आपने ....जिंदगी का यथार्थ.
सच है मौसम की ही तरह यहाँ सब कुछ परिवर्तन शील है. हम अपने मन की खिड़की के कांच के भीतर से हर वक्त कहाँ इसे भांप पाते है ......पत्तियाँ बहार भर की साथी है . जीवन के पतझड़ में इन मायूस सुने पेड़ों सी ही दशा होती है .
इतना रम गई इस आलेख में कि खुद को रोकती ना तो टिपण्णी भी आलेख जीतनी लम्बी होजाती :)
आभार

Amit Sharma ने कहा…

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा
...........
बाबाजी गजब है यह अहसास !

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia) ने कहा…

profound and beautiful like always!

राम त्यागी ने कहा…

aa jao chalo ban jaayen phakeer ....let's act !

Patali-The-Village ने कहा…

लेख अच्छा लगा धन्यवाद|

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

सम्वेदनायें भी कागज पर उतर सकती हैं... वाकई.

विष्णु बैरागी ने कहा…

पूरी तरह सूफीयाना मन:स्थिति दर्शा रही है आपकी यह पोस्‍ट।

Majaal ने कहा…

हरदम हसीं कोई नज़ारा भी नहीं,
मगर इसका कोई का चारा भी नहीं,
नजरिये बदलिए और पाइए 'मजाल',
दिल इस कदर बेचारा भी नहीं !

अब उबर भी आइये जनाब, जो बहला दे दिल को, ग़ालिब हर एक ख़याल वो अच्छा है ...

ashish ने कहा…

अच्छा आलेख और सुन्दर भाव वाली कविता . आभार

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

नज़रों से नज़र आती बातों से, यूँ भी यकीं जाता रहा, न जाने क्यूँ...
ख़्वाब था जो कुछ कि देखा
जो सुना अफ़साना था.

इसलिए नज़रों के देखे पर यकीं करना बड़ा ग़लत होता है बाज मर्तबा... और शीशे की आड़ से देखा सच हमेशा सच हो आवश्यक नहीं. कहते हैं कि शीह्से से गुज़रकर सादी किरन भी सात रंगों की धनक बन जाती है. दरख़्तों का दुःख, पत्तों का फ़ना होना और फ़्लैश बैक में सेपिया के रंग रंग्लिए ज़िंदगी... क्या शब्द चित्र खींचा है समीर भाई!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

बेहतरीन उम्दा पोस्ट

डॉ टी एस दराल ने कहा…

आने वाले सर्दी के मौसम के बारे में सोचकर अभी से सर्दी लग रही है ।
बहुत अच्छी तरह से आपने मन के विचारों को प्रकृति से जोड़कर पेश किया है ।

उम्मतें ने कहा…

पोस्ट का पहला पैरा इतना अर्थपूर्ण है कि इस पर भारी दांव लगानें का ख्याल आया...भले ही मैं जुआ नहीं खेलता !

साधुवाद स्वीकारें !

PN Subramanian ने कहा…

उम्दा पोस्ट. लगता है आपके यहाँ बर्फ पड़नी शुरू हो गयी है.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

अच्छा लगा दार्शनिक चिंतन !

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

aapke post ke saath udasi janchti nahi........aap to sada bahar hi rahan karen.........:)

Dr. Shashi Singhal ने कहा…

गद्य और पद्य दोनों का चित्रण बहुत ही उम्दा है .........

G Vishwanath ने कहा…

शीतकाल में अकेलापन और उदासी और भविष्य की आशाओं का चित्र बखूबी खींचा है आपने इन पंक्तियों में।
शुभकामनाए
जी विश्वनाथ

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

आपने तो बहुत अच्छा लिखा अंकल जी...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपका यकीन बरकरार रहे!
पोस्ट के साथ रचना का जवाब नही!

निवेदिता ने कहा…

bahut bariya hai

निवेदिता ने कहा…

bahut bariya hai

श्याम जुनेजा ने कहा…

दरअसल मैं आपकी "बहुत खूब" के लिए "अइसा क्या" और शुक्रिया के लिए आया था.. यहाँ आकर देखा हम सब आदमी लोग उदासी के अलग अलग स्तरों पर जी रहे हैं और कुछ और उदास हो गया ... हम आदमी लोग सबके सब इतने उदास क्यों हैं ? उदास होने की एक सतत प्रक्रिया क्यों चलती रहती है हमारे भीतर हर समय.. ? इस यक्ष प्रश्न का समाधान तकनीक के इस दौर में भी नहीं मिला तो फिर कभी न मिल पायेगा ...मित्र अग्नि शेखर की यह पंक्ति उद्दृत कर रहा हूँ
"अरे! अरे! आप तो रुकने लगे
सांस तो फूलती ही है पहाड चढते
पहाड चढना
शाश्वत सौंदर्य की रचना प्रक्रिया में
किसी युद्धाहत आकांक्षा का
किसी ठूँठ में अंकुरित हो आना है"

दीपक बाबा ने कहा…

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?

जाने क्यों ? इसी उधेड़बुन में निकल गए इत्ते साल.... पर जाने क्यों अभी भी यकीं नहीं आता.

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण लेख!
" वो नहीं दिखता जो बाहर है. नजर बस टिकी है लेकिन दिख वो रहा है जो मन में है."

इस लाइन ने तो मन मोह लिया.

अनाम ने कहा…

वाह बहुत खूब..
क्या बात कही है...

निर्मला कपिला ने कहा…

नज़रों से नज़र आती बातें कई बार झोठ भी तो होती हैं क्यों कि हम सामने सच देख कर ही मर्म तक नही पहुंच सकते। सही मे यकीं तो जायेगा ही। अच्छी लगी्रचना। शुभकामनायें।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

विचारों में डूब कर वह नजर आता है जो आप सोच रहे होते हैं और तभी कई बार की चीज या प्रतिकृति हमने देखी नईं होती और लगती है की इसको पहले भी कहीं देखा है.
कुछ ज्यादा ही गहरे में डूब कर लिखा आलेख और कविता.

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

शुफियाना अंदाज़ में आपका कहना कुछ अलग रंग दिखाता है, आज की पोस्ट वाकई बेहतरीन है !

shikha varshney ने कहा…

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?

Najren bhi dhoka de hi jatee hain kabhi kabhi ..behtareen kavita hamesha kee tarah.

उस्ताद जी ने कहा…

6.5/10

बहुत उम्दा पोस्ट
लेखन जानदार है
बेशकीमती लगीं ये पंक्ति :
"नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा"

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहरी बात कह दी आपने। नज़र आती हुये पर भी यकीं नहीं आता।

Anand Rathore ने कहा…

nazar nazar ki baat hai... jo jaisa dekhta hai vaisa sochta hai. vaise badi kamal ki baat hai ..andar ka dekhna hi bahar ka dikhna hai... bhasa ghumavdar ho gayi lekin umeed hai aap samajh jayenge... bahut achchi nazar hai..bahut khoob .. .

rashmi ravija ने कहा…

"पत्तियाँ बुरे वक्त में कहाँ साथ देती हैं? छोड़ कर चल देंगी फिर से बेहतर मौसम आने तक के लिए. "
बहुत ही गहन चिंतन वाली पोस्ट...
गद्य को पूर्णता देती कविता भी सोचने को विवश करती है.

Aashu ने कहा…

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?



bahut sundar!!! kabhi sochne ko majboor ho gaya, kabhi saraahne ko...

http://draashu.blogspot.com/2010/10/blog-post_20.html

मनोज कुमार ने कहा…

इस पोस्ट में ज़िंदगी के सरोकारो के संघर्ष को नए अर्थों में बयान करने की कोशिश की गई है।

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

समीर जी, कैसे खींच लेते हैं आप इतने मनमोहक शब्द चित्र?

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

जीवन में आशावादी होना भी सही मायने में अधिकतर फायदेमंद होता है. आपने बुत सही और सटीक ही लिखा ही -
"जब पत्ते लौटेंगे तो उनके बीच घिर खुशियाँ मनाते ये पेड़ भूल जायेंगे उस दर्द को, उस तकलीफ को जो इन्होंने इन्तजार करते झेली है "

ज्ञान वर्धक आलेख के लिए आभार.
- विजय

हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर:

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

हिप्पोक्रेसों की दुनिया में बहुत मुश्किल है कानों और आंखो पर आज भरोसा किये रखना...

वाणी गीत ने कहा…

ज़माने को देख कर कई बार यकीन डगमगाता तो है ...!

vandan gupta ने कहा…

ज़िन्दगी को नये अर्थ देती रचना।

Arvind Mishra ने कहा…

इधर आपकी कवितायें दुःख निराशा संवेदित कर रही हैं -यह अच्छी बात नहीं है -आपके अनुगामी बिचारे अब क्या करें ?

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

शायद

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?

बहुत सुंदर !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?


क्योंकि लोग जरूरत से ज्यादा चालबाज हो गये हैं.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?


क्योंकि लोग जरूरत से ज्यादा चालबाज हो गये हैं.

रामराम.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

मैं भी सोच रहा हूं क्‍या कहूं।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

सुंदर लेखन..उम्दा पोस्ट..
..तन की आँखों से मन की आँखें तेज होती हैं या कहें कि मन बिना तन की आखें अंधी होती हैं.

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.............मन को छू गई............

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

` गर्दन उठाये बेहतर मौसम की आस में फिर अपनों के वापस आने का इन्तजार ही शायद उन्हें उर्जा देता होगा'

सही है, इंतेज़ार ही तो है भारत आने का :)

अनाम ने कहा…

nice post
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S.M.Masoom ने कहा…

लेकिन दिख वो रहा है जो मन में है. एक उड़ान मन की. विचारों की. कुछ उधेड़बुन तो कुछ धुंधली तस्वीरें हल्के भूरे रंग की. रंग भरा समय भी कैसे वक्त की मार झेल झेल कर बदरंग हो जाता है.
पसंद आया यह अंदाज़ ए बयान आपका. बहुत गहरी सोंच है

ZEAL ने कहा…

देखा है जमाना
कुछ इस तरह मैनें

कि

नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा

-जाने क्यूँ?

Awesome !

.

Sunil Kumar ने कहा…

दार्शनिक चिंतन बहुत ही सुंदर

ashokbajajcg.com ने कहा…

बड़ी प्रेरणादायी बातें ,बधाई !

ग्राम -चौपाल में पधारने के लिए आभार .

कडुवासच ने कहा…

... gahan bhaav ... behatreen post !!!

मुन्नी बदनाम ने कहा…

oh Sameer darling, dont worry main hoon na darling. love you.

मुन्नी बदनाम ने कहा…

further you written very nice post darling. Take care. love you darling.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

जब भी ये दिल उदास होता है... जाने कौन आस-पास होता है...

M VERMA ने कहा…

खिड़की से झांक
देखता हूँ वो
जो दिखता नहीं...

देखने और दिखने में सिर्फ और सिर्फ मनोस्थिति की ही भूमिका है.
आज जो दिख नहीं रहा है शायद कल दिखने लगे.

स्वप्निल तिवारी ने कहा…

bharam khulna yahi to hota hai ...badhiya

Pradeep ने कहा…

'नजरों से नजर आती बातों से
यूँ भी यकीं जाता रहा'

गहन चिंतन और अकेलापन लिए एक रचना....

सुधीर राघव ने कहा…

बहुत ही सुंदर.

सुधीर राघव ने कहा…

बहुत ही सुंदर.
http://sudhirraghav.blogspot.com/

रंजना ने कहा…

सचमुच ...आस ही तो जीने का विश्वास और सहारा देती है...

सञ्जय झा ने कहा…

यूँ सुनी थी एक कविता उस व्यक्ति की जो निर्वस्त्र एक सर्दीली रात काट देता है नदी के इस छोर पर उस पार जलती चिता से उगती आग की तपन सोच कर....

nih:shabd::

pranam

Parul kanani ने कहा…

sir ye break mein kahan kho jate hai aap.....panktiyaan jabardast hain..

शिक्षामित्र ने कहा…

परिवर्तन सृष्टि का नियम है। इसका सहज स्वीकार जीवन को अनेक चिंताओं से मुक्त रखता है।

मुन्नी बदनाम ने कहा…

Hi Sameer darling. Again I come to read this post. love you darling take care

cgswar ने कहा…

शानदार लेखन, दमदार प्रस्‍तुति।

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

सर...सही कहा आपने
सब कुदरत का करिश्मा है

Abhishek Ojha ने कहा…

खिडकी पर बैठ के तो मैं पूरा वीकेंड निकाल देता हूँ आजकल. खिडकी और किताब. फील हुई ये पोस्ट.

Unknown ने कहा…

ऐसे में काँच के भीतर से झांकते हुए मैं भी भला कहाँ जान पाऊँगा कि हवा चल रही है या थमी. ठीक उन पेड़ों की सांसो की तरह-कौन जाने चलती भी होंगी या थम गई....

बहुत ही भावपूर्ण समीर जी ... आँखें तो सब की एक सा देखतीं हैं लेकिन फर्क नज़र का होता है ... बेहतरीन पोस्ट ... शुभकामनाएं

Shabad shabad ने कहा…

सुन्दर कविता........
उम्दा पोस्ट !!

priyankaabhilaashi ने कहा…

ह्रदय-चीरती हुई..!!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

समीर जी भूमिका की पंक्तियाँ पढ़ते पढ़ते सोच रही थी कि किसी कहानी की शुरुआत है .....
सच्च आप बहुत अच्छी कहानी लिख सकते हैं .....कहानी क्या आप में तो उपन्यास लिखने की क्षमता है ....
बस आप शुरुआत भर कीजिये ......

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi badhiyaa...

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

Sir thanks for nice comment.behtareen bhavnatmak kavita ke liye badhai

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut gahra lekh, rachna bhi bahut hrdaya sparshi...bahut-bahut badhai

Khushdeep Sehgal ने कहा…

वक्त इनसान पे ऐसा भी कभी आता है,
राह में छोड़कर साया भी चला जाता है,

दिन भी निकलेगा कभी, तू रात के आने पे ना जा,
मेरी नज़रों की तरफ़, ज़माने पे ना जा...

दिल की आवाज़ भी सुन...

जय हिंद...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

हाँ जी ऐसा भी होता है .... देखकर भी यकीन मुश्किल हो जाता है अपनी ही नज़रों का ......
गहरा विचार जो सादगी से रखा आपने.....

उस्ताद जी (असली पटियाला वाले) ने कहा…

इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। क्या अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

उस्ताद जी (असली पटियाला वाले) ने कहा…

इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। क्या अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

उस्ताद जी (असली पटियाला वाले) ने कहा…

इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। क्या अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

दिगंबर नासवा ने कहा…

ज़माने के अनुभव ने बहुत कुछ सीखा दिया है समीर भाई ....
बहुत लाजवाब और उम्दा लिखा है .... गहरी बात आसानी से कह दी आपने ...

Unknown ने कहा…

जनाब समीर साब,बेहतरीन मंजरकशी है पूरे लेख में .....बुरे वक्त में कहाँ साथ देती हैं? छोड़ कर चल देंगी फिर से बेहतर मौसम आने तक के लिए. अच्छे हालातों में ही अपने भी साथ देते हैं.....किसी का शेर है -सुबह का भूल शाम हुई तो घर को लोटा /लोगों को मालूम हुआ तो आये मन बहलाने लोग .समय का बदलाव कड़वा सच है जिसे आपने आपने ही अंदाज़ में पेश किया है .शुक्रिया

नीरज गोस्वामी ने कहा…

क्या कहें ऐसी अद्भुत पोस्ट पर टिपण्णी करना बहुत मुश्किल काम है भाई...

नीरज

Amarjeet Kumar ने कहा…

aapka ye blog mujhe bahut pasand aaya...aapne jo sacchai baya ki hai usne mere dil ko chhu liya...

बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना ने कहा…

भाई समीर जी ! जिन्दगी के इस फलसफे को जिसने शिद्दत से जिया है वही लिख सकेगा ऐसा .
हम तो यही कहेंगे कि अमूर्त को मूर्त बनाने की जादूगरी है आपकी कलम में .....
यदि मैं गलत नहीं हूँ तो आज की रचना कालजयी रचनाओं में से एक है /
भाई मेरे ! एक जादू की झप्पी इधर भी /
उड़न तश्तरी के भीतर एक जादूगर भी है .......काला-जादूवाला /
बच के रहना दुनियावालो !ये दिल तो ऐसे चुराता है जैसे कोई आँखों से काजल /