बुधवार, अप्रैल 21, 2010

मजहबी विवाद, साम्प्रदायिकता और ब्लॉग जगत!!

वैसे तो ऐसे मुद्दों पर मैं कभी नहीं लिखता और न ही मुझे इन विषयों में कोई दिलचस्पी है.

मगर इधर काफी सारे आलेख पढ़े, हलचल देखी और जाना उन ब्लॉग्स के बारे में जो मजहब और साम्प्रदायिकता के नाम द्वेष फैला रहे हैं. मेरा कभी इन ब्लॉगस पर जाना नहीं होता, इसलिए ज्ञात नहीं है कि वो क्या लिख रहे हैं, जो अन्य लोगों की परेशानी का सबब बना है. मगर निश्चित ही कुछ न कुछ तो ऐसा लिख ही रहे होंगे जो इतने सारे अन्य लोगों की भावनाओं को भड़का रहा होगा.

वैसे तो लोगों का कहना है कि कुछ पोर्न साईटस भी हैं, जिनसे कम्प्यूटर में वायरस आ जाते हैं. मेरा उस तरफ भी जाना नहीं होता है, जान बूझ कर, अतः वो भी ज्ञात नहीं.

टाईटिल से ही समझ में आ जाता है कि जाना है कि नहीं. क्लिक करके जाना मेरा कर्म है जिसे करने हेतु मुझे अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है. गुगल सिर्फ बताता है. सो ही ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत कर रहे हैं.

मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है.

सड़क पर पड़े गोबर से तो आप बच कर निकल जाते हैं. दीगर बात है कि कभी भूले से पैर पड़ जाये. गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा सकता. उसे उतनी अक्ल ही कहाँ मगर हम तो समझते हैं न और बच कर निकलते भी हैं. नगर निगम हर जानवर के पीछे तो घूम नहीं सकती कि कब गोबर करे और कब हटायें ताकि किसी का पैर न पड़े.

मुझे तो लगता है कि उनका लिखना जितना गलत है, हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है. अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप. फिर क्यूँ नहीं नजर अंदाज करते उन्हें?? इसमें क्या परेशानी हैं?

क्यूँ गोबर हटाने के लिए नगर निगम का इन्तजार करना, बच कर निकलिये न!! वक्त आने पर नगर निगम अपना सफाई कार्य कर लेगी और ये लोग भी हतोत्साहित हो लिखना बंद कर देंगे. जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो यह लिखेंगे किसके लिए और कब तक?

 

माना कि आप डाईविंग में पारंगत हैं, मगर डाईव तो सही जगह लगाओ!!

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एक रचना

जोड़ पायें  वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये

दिल की आदत तो है धड़कने की
साथ धड़कें   वो धड़कनें चुनिये

कितनी खबरें लहू से रंग छपतीं
देख कर आप कतरनें चुनिये.

दिल ये   पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब भी क्यूँ अनमनें चुनिये.

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब  नये और  झुनझुने चुनिये.

-समीर लाल ’समीर’

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174 टिप्‍पणियां:

Kulwant Happy ने कहा…

हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है।


अदा जी के ब्लॉग़ पर आपका ही जिक्र करके आया हूँ। प्रचार दुसाहस को बढ़ाता है। आपकी बात से बिल्कुल सहमत हैं।

Nishant ने कहा…

उम्दा कविता के साथ बढ़िया लिखा है. लेकिन कौन सुनेगा?

Mishra Pankaj ने कहा…

समीर जी इन्ही सब से हमारा मन भी दुखी हो गया है ,
वैसे तस्वीर तो मस्त है ! :)

--

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप से सहमत हूँ। नगर निगम को प्रतिनिधि मंडल मिला वह गोबर हटाने को तैयार हो गया है। नागरिकों का सहयोग चाहिए। अब आप सहयोग करेंगे या नहीं?
चित्र मजेदार है। क्या डाई है?

Arvind Mishra ने कहा…

बिलकुल ठीक फरमाते हैं समीर साहब आप ..हम भी नहीं जाते उधर !

M VERMA ने कहा…

हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है.'
बिलकुल सत्य
वैसे ये गोबर वाली मिसाल सटीक है
हमी हैं जो भाव देते हैं.

Sadhana Vaid ने कहा…

आपने बिल्कुल सही कहा है ! बेवजह किसी बात का विरोध कर तूल देने से उसका प्रचार ही होता है और ना चाहते हुए भी सामने वाले का मंतव्य सिद्ध हो जाता है ! कविता बहुत प्रेरक और विचारणीय है ! सुबह सुबह बढ़िया पोस्ट के लिये धन्यवाद !

ललित शर्मा ने कहा…

गोबर से बचकर निकलना ही श्रेयकर है।
बिलकूल सही कहा आपने
सौ फ़ीसदी सही।

'अदा' ने कहा…

उनको पढ़ना, फिर भड़कना और भड़क कर कुछ कहना...शायद आप ठीक हैं...
लेकिन अगर कोई किसी बेगुनाह को हमारे सामने जूतम-पैजार करे, उसकी प्रतिष्ठा को तार-तार करे तो हम आँखें नहीं मूँद कर सकते ...फिर तो कुछ कहेंगे ही.....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये

वाह वाह!

मो सम कौन ? ने कहा…

समीर सर,
आपकी राय सबसे अच्छी है।
पोस्ट और कविता भी बहुत अच्छी है।
डाईविंग वाला विज्युअल अच्छा नही है जी(बहुत बहुत बहुत अच्छा है)

बहुत सारी बातें अवायड और इग्नोर करने के ही लायक हैं।

अभय तिवारी ने कहा…

सही हस्तक्षेप।
एक और काम किया जाना चाहिये, वो भी आप ही कर सकते हैं। लोगों को अपनी पसन्द का खुलकर इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करने के लिए ताकि एग्रीगेटर्स पर पसन्द का सही प्रतिबिम्बन हो।
आम तौर पर होता ये है कि जब तक हमें कोई पोस्ट बेहद पसन्द न आए हम उसे पसन्द करने को तैयार नहीं होते, यह रुख़ बदला जा सकता है नहीं तो ये है कि कुल दस लोग मिल कर दस हज़ार के बीच हल्ला मचाए हैं।

गिरिजेश राव ने कहा…

@ अब नये और झुनझुने चुनिये.
छा गए श्रीमन्

संप्रदायिकता को 'साम्प्रदायिकता' कीजिए, माना कि ग़लत है लेकिन इतना भी नहीं कि सही लिखा न जाय। :)

@ मजहबी विवाद
भारत,रूस,चीन,अफगानिस्तान,इराक़,नार्वे,फ्रांस,स्वीडन,स्विटजरलैंड,ब्रिटेन,पाकिस्तान. . विश्व का मानचित्र देख रहा हूँ और नाम बढ़ते ही जा रहे हैं। :(
समय आ गया है कि अब आदमी को मजहब से तौबा कर लेनी चाहिए। फोटो सही है, स्लम डॉग मिलेनियर वाली टंकी होती तो डाइविंग का और मजा आता :) :)

गिरिजेश राव ने कहा…

@ लोगों को अपनी पसन्द का खुलकर इस्तेमाल

अभय जी की बात में दम है। कभी ऐसी ही बात अवधिया जी ने कही थी।

Udan Tashtari ने कहा…

गिरिजेश भाई


सुधार कर दिया है, बहुत आभार!!

मार्गदर्शन बनाये रखिये.

सादर

समीर लाल

गिरिजेश राव ने कहा…

@ मार्गदर्शन
:) :) :) :) :) ...

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

मेरी राय से धर्म जैसे व्यक्तिगत विषय पर हो हल्ला करते लोगों के लिये ब्लाग के दरवाज़े बंद होने ही चाहिये ताकि कोई ऐसा विस्फ़ोटक विचार इधर तो शेष न रहे

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

दोष जानवर का नहीं है क्‍योंकि उसको तो भेजा ही नहीं है। जिसे भेजे के साथ भेजा गया है वो तो संभल ही जाए। आपने जो बात कही है और जो फिल्‍म दिखलाई है - दोनों बेहतर तरीके से अपनी बात कहती हैं।

कुमार राधारमण ने कहा…

दुर्भाग्य यह है कि यह सब तब हो रहा है जबकि हिंदी ब्लॉगिंग गुणवत्ता की दृष्टि से काफी पिछड़ी है और जब-तब इस बात को लेकर भी चर्चा होती ही रहती है कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी ब्लॉग कहां खड़ा है। यह आरोप भी लगता ही रहा है कि ब्लॉग पर अधिकतर वैसे ही लोग हैं,जिनका लिखा कहीं छपने योग्य नहीं होता। ऐसे विवाद न तो हिंदी के हित मे हैं न ब्लॉगिंग के। सबको अपनी बात रखने का हक़ है मगर प्रतिक्रियात्मक पोस्टों से ब्लॉगिंग की गरिमा गिर रही है।

बेचैन आत्मा ने कहा…

बहुत अच्छी गज़ल।
मतला तो लाज़वाब है-

जोड़ पायें वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये

-वाह! क्या बात है!

डाईविंग का चित्र... लोग कैसी-कैसी कल्पना कर लेते हैं!.. हद है।

संजय भास्कर ने कहा…

समीर सर,
आपकी राय सबसे अच्छी है।
पोस्ट और कविता भी बहुत अच्छी है।

संजय भास्कर ने कहा…

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

खुशदीप सहगल ने कहा…

कल चमन था, आज सेहरा हुआ,
देखते ही देखते ये क्या हुआ...

पागलों से सिर टकराओगे तो सिर अपना ही फूटेगा, पागलों का कुछ नहीं होगा...

अगर फूलों के साथ कांटे मौजूद न हो तो फूलों की सही अहमियत कौन जानेगा...

जय हिंद...

उन्मुक्त ने कहा…

मेरे विचार से किसी भी चिट्ठे का बहिष्कार उचित नहीं है।

सबसे अच्छा तरीका है न कूड़ा पढ़ो, न कूड़ा लिखो, न ही उस पर टिप्पणी या उसकी चर्चा करो। उस पर लिखना, टिप्पणी करना उसे ऊर्जा देते हैं।

इसी कारण, मैं बहुत से चिट्ठों को न उन्हें पढ़ता हूं, न ही उस पर टिप्पणी करता हूं। यह बात मैंने अपने दो पुरानी चिट्ठियों 'बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ' और 'एक शब्द, एक हीरो, एक जीरो' में बताने का प्रयत्न किया है।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये..

बढ़िया बात कही आपने इस सुंदर ग़ज़ल के माध्यम से....

समीर जी बस आपसे मिलता जुलता कुछ मेरा भी ख्याल है ना तो कभी ऐसे ब्लॉग पर जाता हूँ और ना ही टिप्पणी देते हूँ...कहा गया है की अगर आप धूल में पैर मारेंगे तो वह उड़कर आपके उपर ही बैठेगा...मज़हबी लोग कभी सुधरने वाले ही नही इनका उद्देश्य बस माहौल बिगाड़ना है....तो भला हम उन्हे तूल देने में क्यों सहयोग करे.....

बढ़िया आलेख...ग़ज़ल भी बहुत लाज़वाब...और ये चित्र तो बड़ा ही मजेदार लगाया एक सुंदर उपदेश के साथ....सार्थक आलेख के लिए धन्यवाद .....

Suman ने कहा…

nice

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

""मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है.""...मैं आपसे एकदम सहमत हूँ ,मैं तो कभी भूले से भी उधर झांकता नही..क्या जरूरत है.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बिलकुल सही लिखा है समीर जी आपने ।
मैंने भी अदा जी की पोस्ट पर यही बात कही है । क्यों न सभी ब्लोगर्स ही इनका बहिष्कार करें । कोई तबज्जो नहीं मिलेगी तो खुद ही ठन्डे पड़ जायेंगे ।

अब इस क्लिप को देखकर भी अक्ल नहीं आई , तो कब आएगी ।
बहुत खूब।

zeashan zaidi ने कहा…

सही कहा! बेवजह किसी बात का विरोध कर तूल देने से उसका प्रचार ही होता है

रंजन ने कहा…

अब भी कोई न समझे तो खुदा उसका भला करे...

आमीन..

राजेश स्वार्थी ने कहा…

आखिरकार आज आपको आना ही पड़ा. साफ जाहिर हुआ कि बात जरुरत से ज्यादा बढ़ गई है.

सुशीला पुरी ने कहा…

समीर जी आपने सही लिखा कि हम ऐसी जगह जाएँ ही क्यों !!! धर्म को लेकर जहर वही लोग फैलाते हैं जो धार्मिक होते ही नही । पर 'ड्राइव' पर क्या स्त्री ही जाती है ???

Vivek Rastogi ने कहा…

अपनी ऊर्जा अच्छा पढ़ने में लगायी जाये वही ठीक है, हम तो उस गली जाते भी नहीं हैं, जहाँ ऊर्जा व्यर्थ हो :)

P.N. Subramanian ने कहा…

एकदम सही मार्गदर्शन दिया है. आभार.

पारूल ने कहा…

दिल की आदत तो है धड़कने की
साथ धड़कें वो धड़कनें चुनिये

vah !

AAPKI DEKHA DEKHI HUM BHI kauvva LIKH AAYE....javab...ghalat ho gaya :( hamaara bhi

प्रवीण शाह ने कहा…

.
.
.
आदरणीय समीर जी,

पूरा मामला जो इस अल्पबुद्धि को समझ में आया वह यह है...

१- सबसे पहले एक या दो अवांछित तत्वों (बहुसंख्यकों की नजर में) ने एक ब्लॉग बनाया।
२- फिर उस तत्व ने पोस्ट लिखी।
३- उस पोस्ट का विरोध हुआ।
४- यह विरोध थोड़ा मर्यादित और थोड़ा अमर्यादित था।
५- फिर उस तत्व ने अपनी समझ से जवाब दे दिया।
६- फिर विरोधियों ने भी अपने जवाबों को पोस्ट रूप में छापा।
७- इन तत्वों को समझाने वाली बीचबचाव करती पोस्टें भी छपीं।
८- इस सारे क्रम में हुआ यह कि वह तत्व और उसके विरोधी और समझाने वाले भी हॉट लिस्ट में लगातार ऊपर आते रहे।

कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस सारे पचड़े में शामिल नहीं थे पर हॉट लिस्ट में रहने की आदत सी थी उन्हें... शायद उन्हें यह सब नागवार गुजरा।

अब होना क्या था...

१- इन सभी तत्वों का बहिष्कार और संकलकों से उनको बाहर करने की गुहार लगाती पोस्ट आने लगी, और हिट हुईं।
२- संकलकों को इन को बाहर का रास्ता दिखाने वरना संकलकों का ही बहिष्कार करती पोस्टें आई औेर हिट हुईं।
३- इसी क्रम में निर्विकार-निरपेक्ष भाव से इस सारे पचड़े से बच कर निकलने की सलाह देती आपकी पोस्ट आई है, और हिट होगी।

कुल मिला कर लब्बोलुबाब यह कि सारे प्रकरण में ब्लॉगवुड को ३०-४० हिट पोस्टें मिल गईं ।

एक बात और कहूँगा कि यह सारा गोबर जिस से इतना परहेज किया जा रहा है दोनों पक्षों के ग्रन्थों के भीतर भरा है... कब तक बचियेगा या बच कर निकलियेगा... कभी न कभी तो फैसला करना ही पड़ेगा... इसे अपनी किताबों से बाहर करने का... इस लिये यह भी जरूरी है... कि चाह कर या अनचाहे... इरादा बनाकर या कटु बहस के दौरान एक दूसरे को नीचा दिखाने के क्रम में... यह गोबर दिखता रहे... इसे हटाने की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हम!

आभार!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

दिल ये पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब ऐसे न अनमनें चुनिये.

बहुत सटीक बात कही है!
आपकी पोस्ट से सहमत हूँ!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

"मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है. "

Main bhee yahee baat kai baar kah chukaa samjhte hee nahee !

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

समीर जी ,मैं आप से पूर्णतया सहमत हूं ,इस बीमारी का सिर्फ़ यही इलाज है ,ऐसे ब्लॉग को और ऐसे लेखकों को महत्व ही नहीं देना चाहिये जिन का मक़सद ही लोगों की भावनाओं को भड़काना है ,
अरे ऊपर वाले ने एक कला दी है लेखन की तो उसे सही दिशा क्यों न दी जाए जो भाइचारा बढ़ाने में सहायक हो न कि क़लम काग़ज़ जैसी पवित्र चीज़ को युद्ध का हथियार बना लिया जाए,धर्म जैसी पावन विचारधारा को युद्ध का कारण बनाना कहां तक उचित है ,जब कि सारे धर्म भाईचारे में ही विशवास रखते हैं,
ब्लॉग वाणी को अपना काम करने दें ,अब ये ज़िम्मेदारी हम सब की है

ऐसी पोस्ट लिखने के लिए बधाई

जी.के. अवधिया ने कहा…

"मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है."

इन ब्लोग्स में लोगों के जाने की वजह है हमारे संकलकों में हॉट लिस्ट में इनका होना। संकलकों के हॉट लिस्ट में बने रहने के लिये ये तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं जैसे कि अपनी पोस्ट पर स्वयं बार-बार टिप्पणी करना, बेनामी बनकर टिप्पपणी करना, फर्जी आईडी बना कर टिप्पणी करना आदि-आदि। संकलकों के हॉट लिस्ट में आने वाले पोस्टों को को पढ़ना एक सहज जिज्ञासा है इसलिये सामान्यजन उन पोस्ट में जाने के लोभ का संवरण नहीं कर पाते। उन ऊल-जलूल पोस्टों को पढ़कर सहज ही आदमी भड़क उठता है और विरोध में टिप्पणी भी कर बैठता है। यद्यपि वह विरोधस्वरूप टिप्पणी करता है किन्तु उसकी यह टिप्पणी उसके निगेटिव्ह पब्लिसिटी को बढ़ावा ही देती है।

सारांश सिर्फ यह है कि यदि ये ब्लोग्स हमारे संकलकों के हॉट लिस्ट में न दिखें तो कोई भी वहाँ नहीं जायेगा, कम से कम वहाँ जाने वालों की संख्या नगण्य तो रहेगी ही।

Shekhar Kumawat ने कहा…

BILKUL SAHI MUDA HE AAP KA

shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

उपेक्षा भी एक इलाज होता है. पर आज किसी में धैर्य नही है. आप इनकी उपेक्षा किजिये, ये गधे के सर से सींग जैसे गायब हो जायेंगे. पर लोग तुरंत पलटवार करते हैं और उनको यही सब तो चाहिये होता है.

रामराम.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर जी संक्षिप्‍त में आपने सही मुद्दे को रेखांकित किया है। माफ करें मैं साम्‍प्रदायिक नहीं हूं। पर आपको गाय के उदाहरण से बचना चाहिए। विवाद शायद इसी तरह पैदा होते हैं। आपतो बेहतर जानते हैं कि गोबर खासकर गाय का गोबर केवल मल नहीं है। वह आज भी धार्मिक उत्‍सवों में पूजा स्‍थलों को लीपने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। दीवाली पर गोवर्धन की पूजा के लिए गोबर के गोवर्धन ही बनाए जाते हैं। नागपंचमी पर गोबर से ही नागदेवता की आकृति दीवार पर उतारी जाती है। आंगन और कच्‍चे घरों के फर्श खासकर रसोईघर गोबर से ही लीपे जाते हैं। और सबसे महत्‍वपूर्ण बात की ग्रामीण इलाको में गोबर के कंडे ईंधन का एक बड़ा स्रोत हैं। माफ कीजिए मैं केवल इस बात को रेखांकित करना चाहता हूं कि हम भी कहीं अनजाने ही तो मजहबी विवाद पैदा नहीं कर देते हैं। लिखते समय शब्‍दों के चुनाव पर ध्‍यान देने की जरूरत भी है। कहीं अनजाने ही किसी को ठेस तो नहीं पहुंचा रहे हैं। शायद आप अपनी बात को किसी और उदाहरण से भी कह सकते हैं।
अविनाश जी से भी गुजारिश है कि गैरवैज्ञानिक बात न करें। भले ही वे मजाक में कह रहे हों। मसलन 'जानवर का तो भेजा ही नहीं है।'

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

एक अच्छी रचना की बधाई ..
मजहबी विवादों पर सही ही कहा है आपने ---
मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये..
.................
विवाद-प्रिय लोग कब बाज आयेंगे ?

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

ई स्विमिंग पूल मे कौन सुंदरी को कुदाया जारहा है?:)

रामराम

Manish Kumar ने कहा…

aur haan animation ke kya kahne..:)

Manish Kumar ने कहा…

गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा सकता. उसे उतनी अक्ल ही कहाँ मगर हम तो समझते हैं न और बच कर निकलते भी हैं. नगर निगम हर जानवर के पीछे तो घूम नहीं सकती कि कब गोबर करे और कब हटायें ताकि किसी का पैर न पड़े. मुझे तो लगता है कि उनका लिखना जितना गलत है, हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है. अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप.

आपकी बातों से अक्षरशः सहमत .

सतीश सक्सेना ने कहा…

आज के समय मज़हब के नाम पर लड़ना और वह भी किसका धर्म अच्छा है ? क्या सन्देश देता है ? केवल मध्यकालीन युग की याद दिलाता है ! क्या कहें इन समझदार भाइयों को ? इतनी ख़ूबसूरत दुनियां और परिवार को भुला दिन रात निकृष्ट कोटि के शास्त्रार्थ में समय बर्वाद करने के पीछे कौन शक्ति काम करती है ?
आधुनिक युग में जीते हम लोगों की नैतिकता कई जगह इतनी बर्बर और बीभत्स हो जाती है कि दिल दहल जाए !

दीपक गर्ग ने कहा…

लगता है ब्लॉग जगत मज़हबी चर्चाओं का एक मंच बन कर रह जाएगा .आप इसको इस तरह का मंच बनने से रोकने का प्रयास करें .आप इस ब्लॉग जगत के वरिष्ठ सदस्य हैं .
रही गप गुब्बारे की बात,ढूंढ रहा हूँ,मिलते ही पिन लगा दूँगा .

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

आपने सही लिखा है लेकिन इस पर कई बार अमल करना मुश्किल हो जाता है. जब हमले जरूरत से अधिक बढ़ जाते हैं तो एक बार प्रत्युत्तर देना आवश्यक हो जाता है. लेकिन आपकी बात में छुपे तथ्यों से सहमत हूं. इन ब्लाग्स पर जाकर पढ़ा अवश्य जाना चाहिये लेकिन टिप्पणी इत्यादि से बचना चाहिये और इनकी धूर्तता पूर्ण बातों का जबाव शालीनता से अपने ब्लाग के माध्यम से देना चाहिये. मेरा सोचना यह है.

जितेन्द़ भगत ने कहा…

कवि‍ता, वि‍चार और तस्‍वीर तीनों अच्‍छे।

aarya ने कहा…

सादर वन्दे!
पोस्ट तो सिखाने वाली है ही लेकिन नीचे दिया गया डाइविंग सेन्स उससे ज्यादा मजेदार है|
रत्नेश त्रिपाठी

रज़िया "राज़" ने कहा…

सर! आजकी आपकी मेरे ब्लोग पर कमेन्ट के लिये बहोत आभारी हुं। आप हंमेशां से सभी को सराहते रहे हैं । आज तक कभी भी आपको किसी भी पोस्ट से दर्द देते नहिं देखा। हंमेशां से आप एक शिक्षक की तरहां रास्ता दिखाते रहे हैं। ये आपका बडप्पन है। मैं हंमेशां से आपकी फोलोअर रही हुं।

SANJEEV RANA ने कहा…

हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है।
BILKUL THIK KAHA AAPNE
HUM HI UN LOGO KO BADHAWA DETE H
JAB HUM KUCH BHI RESPONSE NHI DENGE UNHE TO WO KHUD HI THAKKAR HAAR MAAN LENGE

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बिलकुल सही बात कही आपने, हम सिर्फ आग को हवा देने से बचाना चाहिए. संयमित होकर ही रचना करें और जो ग्राह्य न हो उसे त्याग हीदें. वैसे कविता और चित्र बहुत सटीक लगे हैं.

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

दिल ये पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब भी क्यूँ अनमनें चुनिये.

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये.
Bahut umda panktiyan---sameer ji,
aur lekh men bhee apne bahut sarthak aur samyik vishay uthaya hai-------.

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

यह छूट इसी देश में है
सही विचार

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

दिल ये पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब भी क्यूँ अनमनें चुनिये.

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये.
Bahut umda panktiyan---sameer ji,
aur lekh men bhee apne bahut sarthak aur samyik vishay uthaya hai-------.

kshama ने कहा…

Badehi suljhe hue sanjeeda khayalat hain..bilkul sahi kaha...un sites se bach nikle aur koyi pratikriya na karen!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सही कहा आपने ..पर लगता है की इस विषय सबकी सोच अपनी है ..बच के निकलना है या उसके बारे में आगे बढ़ना है ..खैर हम तो वैसे ही दूर रहते हैं इस तरह के मसलों के ..चित्र और आपकी लिखी रचना बहुत पसंद आये ..शुक्रिया

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

जोड़ पायें वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये

sahi kahaa...aur muddda bhi sahi uthaya... magar kabhi kabhi virodh jataana bhi zaruri ho jata hai. varna log vivadit samagri ko hi gunvatta ka paryaay maan lete hain

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ने कहा…

सही लिखा है। नीर-क्षीर विवेक अभी आना बाकी है।

महफूज़ अली ने कहा…

आदरणीय समीरजी....

मैं भी ऐसे मुद्दों पर नहीं लिखता.... और ना ही दिलचस्पी है.... पढ़े लिखे अनपढ़ ही मज़हब और साम्प्रदायिकता के बारे में बात ज्यादा करते ....हैं.....

आपने फोटो बिलकुल चरितार्थ लगायी है.... बहुत अच्छी और शानदार डेपिक्शन....

सादर

महफूज़..

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

बिल्कुल सहमत !

rashmi ravija ने कहा…

सही है, आपका कहना बिलकुल...अपनी पसंद की चीज़ें पढने को ही समय कम पड़ता है...और अगर उन्हें कोई पढ़ेगा ही नहीं फिर वे लिखेंगे किसके लिए..

राज भाटिय़ा ने कहा…

हमे तो बचपने से एक सीख दी गई है कीचड से बच कर रहो, अगर पत्थर्मारो गे कीचड मै तोअपने ही कपडे खराब करोगे, दाग खुद के ही कपडो पर लगेगे, आप ने बहुत सुंदर लिखा.लेकिन जब कोई एक अकेले को दबाये, जो सच मै निर्दोष है... तो उस का साथ है देना चाहिये, वेसे हम कभी मिल जुल कर नही रह सकते.... कल किसी ओर बात पर टांग किसी ओर की खींचेगे....:)
धन्यवाद

mamta ने कहा…

कितनी सही बात आपने कही है । उम्मीद है कि लोग आपकी बातों को समझेंगे और ध्यान मे रक्खेंगे।

sangeeta swarup ने कहा…

समीर जी ,
आपने बहुत सही तुलना की है कि गंदगी से बच कर निकलना चाहिए... बेवजह तूल दे कर उन लोगों के उद्देश्य को ही हम सफल बना देते हैं....डाइविंग के लिए अच्छी नसीहत. :):)
और गज़ल तो बहुत कुछ कह गयी.....

Suresh Chiplunkar ने कहा…

"…गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा सकता. उसे उतनी अक्ल ही कहाँ मगर हम तो समझते हैं न…"… मार्के की बात है गुरुदेव… सादर नमन स्वीकार करें… (वैसे गाय की जगह किसी अन्य प्राणी का नाम लिया होता तो सिर्फ़ उछल रहा दिल बल्लियों उछलता)… :) :)

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ । आभार |

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

बहुत ही परिपक्व और सुलझी हुई सोच!
बधाई!

महामूर्खराज ने कहा…

आप ने सही कहा है
मेरे प्रपितामह(दादा जी के पिता) जी कहा करते थे
पढ़ना बहुत लोग जानते हैं पर क्या पढ़ना चाहिए ये बहुत कम लोग जानते है।
मैं सदा से ही इसका अनुसरण करता आया हूँ और आपके कथन भी इसकी सार्थकता का उदाहरण दे रहें हैं।

मिहिरभोज ने कहा…

आज से जाना बंद...

राइना ने कहा…

Nice

राइना ने कहा…

Nice

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर जी माफ करें। मैंने सुबह एक टिप्‍पणी डाली थी। पर वह आई ही नहीं। बात महत्‍वपूर्ण है इसलिए एक फिर से कोशिश कर रहा हूं। आपने मुद्दा सही उठाया है। लेकिन मैं आपसे भी एक बात कहना चाहता हूं। आपको इसमें गाय और गोबर दोनों शब्‍दों से बचने का प्रयत्‍न करना चाहिए था। मैं साम्‍प्रदायिक व्‍यक्ति नहीं हूं। आप जानते हैं गाय का गोबर केवल गोबर नहीं है। हर धार्मिक उत्‍सव में पूजा स्‍थ्‍ाल को गाय के गोबर से लीपा जाता है। दीवाली पर गोवर्धन पूजा के लिए गोवर्धन गोबर से बनाए जाते हैं। नागपंचमी पर नागदेवता की आकृति गोबर से दीवार पर बनाई जाती है। गांव के कच्‍चे घरों के फर्श खासकर रसोईघर गोबर से ही लीपे जाते हैं। यहां तक कि शमशान में अत्‍येंष्टि के पहले चिता की जगह को गोबर से लीपा जाता है। सबसे महत्‍वपूर्ण कि ग्रामीण इलाकों में गोबर से बने कंडे ईंधन का एक बड़ा स्रोत हैं। मेरे कहने का अर्थ यह है कि केवल साम्‍प्रदायिक बातें करने से ही विवाद नहीं फैलते हैं। जानकर या अनजाने में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने से भी विवाद फैल सकते हैं। हम सबको चाहिए कि शब्‍दों के चुनाव में सावधानी बरतें।
अविनाश जी से भी माफी मांगते हुए आग्रह करना चाहूंगा कि वे गैरवैज्ञानिक बातें न कहें,भले ही मजाक में कह रहे हों। मसलन 'जानवर में तो भेजा होता ही नहीं है।'

अजय कुमार झा ने कहा…

क्या किया जाए , समीर जी कहते हैं न कि जब हद पार होने लगे तो .........

मगर आपकी लगाई तस्वीर ने ही बहुत कुछ कह दिया , समझने वाले इस पर भी न समझें तो ...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सही. मुझे खुद हैरानी होती है, कि जब आप जान गये कि फ़लां ब्लॉग पर केवल मजहबी मुद्दे छाये रहते हैं, तो वहां जाते क्यों हैं? मैं तो कभी ऐसे किसी ब्लॉग पर जाती ही नहीं. इन्हें तवज्जो देने की ज़रूरत क्या है?

Ram Krishna Gautam ने कहा…

मजहबी चाल हम भी समझते हैं, अब नये और झुनझुने चुनिये...




"रामकृष्ण"

Parul ने कहा…

blog jagat mein ulti-sidhi tarah se khalbali machana hi maksad na ho ye jaruri hai..fully agree with you sir..aur har baar ki tarah kavita bahut hi badhiya lagi :)

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

सही कहा गुरुदेव!! और रचना तो बेजोर कही आपने!!

मीनाक्षी ने कहा…

यही शब्द और भाव मिलते तो बहुत पहले लिख चुके होते....आपके विचारों से सहमत है और अमल भी करते हैं...

nilesh mathur ने कहा…

भैया, एकदम सच बात लिख दी आपने, अब इन फ़िज़ूल की बहस पर विराम लग जाना चाहिए, फोटो तो कमाल की लगाई है, लोग इसी तरह गोते लगा रहे है, आप कुछ ना लिख कर सिर्फ ये फोटो ही दे देते तो भी चलता ! भैया अपने जूते पर चार लाइलें लिखी है आपका कमेन्ट नहीं मिला , जब तक आपका कमेन्ट नहीं मिलेगा दूसरी पोस्ट नहीं लिख पाउँगा ! !

हिमान्शु मोहन ने कहा…

शत-शत सहमत!
बहुत अच्छी रचना है, सामयिक भी। वक़्त वाकई आ चुका है "…और झनझुने" चुनने का।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये।।

सचमुच!
इतना कहने सुनने के बावजूद भी यदि लोग न समझें तो फिर तो ऊपरवाला ही मालिक है....
"कमोड कूदू" विजयुल तो कमाल है :-)

Bhavesh (भावेश ) ने कहा…

पूर्णत सहमत....

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

मजहब और साम्प्रदायिकता के नाम पर विद्वेष बढ़ाना उतना ही भद्दा काम है, जितना निरर्थक चैन-अमन-गंगा-जमुनी संस्कृति आदि के नाम पर जार जार रोना।
दोनो तरह की प्रवृत्ति बहुत बचकानी और कृत्रिम लगती है। यह दोनो प्रकार देखने में मिलते हैं। पहले वाले पर चुपचाप चल देते हैं, पर दूसरे वाले पर कभी कभी रियेक्ट करने का मन करता है।
आपने अच्छा मुद्दा उठाया।

शेफाली पाण्डे ने कहा…

aaj aapne mere man kee baat kah dee...

सुशीला पुरी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
मनोज कुमार ने कहा…

@ मेरा कभी इन ब्लॉगस पर जाना नहीं होता,
--मेरा भी !
@ आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है
-- मेरी भी समझ में नहीं आता।
@ सड़क पर पड़े गोबर से तो आप बच कर निकल जाते हैं.
-- बहुत सही कहा है आपने।
--- बच कर निकलिये न!!
--- लाख टके की बात "माना कि आप डाईविंग में पारंगत हैं, मगर डाईव तो सही जगह लगाओ!!"
सर! क्या फोटो लगाया है!!
---- आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

शंकर फुलारा ने कहा…

ऐसी ही एक सलाह की जरुरत थी ब्लोगर बंधुओं को जो आपकी अँगुलियों से बहुत ही अच्छी तरह से निकली है इसके लिए धन्यवाद |

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

आपके विचारों से 100% सहमत !
बहिष्कार ही इनका उत्तम उपाय है !

परमजीत बाली ने कहा…

समीर जी हमने तो ऐसे आलेख पढ़ना ही बंद कर दिया कभी कोई पढ़ भी ले तो बिना कुछ कहे चलते बनते है....आप सही कहते हैं कि इन्हे अनदेखा ही कर देना चाहिए.....मुझे तो लगता है यह सब टी आर पी के लिए करते हैं...या फिर ऐसे लेख लिखने वाले कूप मडूक हैं....अत: जब तक हम सभी इन्हें नकारेगें नही यह सिलसिला रूकने वाला नही..यही एक रास्ता है इस समस्या से निजात पाने के लिए....

ई-गुरु राजीव ने कहा…

चाचाश्री आपने गोमाता का अपमान किया है !!
और गोबर से ही आज भी करोड़ों गांव प्रातःकाल पवित्र होते हैं.
पर आप गईया की पीठी पर चढ जाइए, आप को छूट है. :)
अच्छी संज्ञा दी है गोबर कहीं के !!
फोटो भी मस्त है. रियल जंप है का !!

साधवी ने कहा…

बहुत अच्छी सलाह दी. तस्वीर मजेदार. कविता बहुत पसंद आ गई.

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है.'
बिलकुल सत्य.

डाईव में मजा आया.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waah kya sahi likha hai

ओम आर्य ने कहा…

Sadar Naman!

हेमन्त वशिष्ठ ने कहा…

...जोड़ पायें वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये ...

शुरुआत से ही बांध सा दिया आपकी इन लाइनों से...और आखिरी लाइनों से अभी तक बंधा हूं...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

गजब छलांग लगाई तो वंदी कमोड में जा गिरी . हा हा बहुत मजेदार ...

दिनेश शर्मा ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने । वर्तमान में ऎसे ही सारगर्भित लेखन की आवश्यकता है।

rajeevspoetry ने कहा…

"मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये"

Bahut achche!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपसे पूर्णतः सहमत ।

अम्मा जी ने कहा…

अरे समीर बिटवा ये किस कुलच्छनी को कमोड मे डाईव लगवाय रहे हो ? हम पूछती हैं कि किसी मुये मुस्टंडे को काहे नाही कुदवाये इसमा? बेचारी अकेली औरत जात को कुदवा दिये काहे से? जवाब देनो पडहै तुमखों.

Udan Tashtari ने कहा…

@ आदरणीय अम्माजी,

उ तो कमोड खुला था, कोई भी कुदे. अब ई कूद पड़ीं तो हम का करें..जोन का जी झुराये, वो कूद जाये..

इसलिए कहे हैं न कि पानी देखकर जरुरी नहीं है कूद जाओ, अब देखिये न, ये रास्ता इनको सीधे गटर में ले जा रहा है फिर भी...

आशीर्वाद बनाये रखिये. कौनो गल्ति हो गई हो तो क्षमा करियेगा. :)

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

उत्तम विचार . आप सचमुच एक सुलझे हुए इंसान हैं .

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सुनिए भाई उड़न तश्तरी जी,
ई त आपका फासिस्ट्वादी ब्लॉग हो गया... हर आदमी को अपना बात कहने का पूरा हक़ है, इसीलिए त बेचारा ब्लॉग लिख रहा है... आप त बहुत पढे लिखे आदमी हैं और हमरा जइसा देहाती भी नहीं हैं... एगो बात बताइए कि आप लोग सब को साम्प्रदायिकता के बारे में पढने से मना काहे कर रहे हैं.. सब को सोचने दीजिए अपना देमाग से, लोग बहुते समझदार है.
रहा बात गोबर अउर गाय क, त सायद आपको मालुम नहींहोगा कि ओहि गोबर से घर लीपा जाता है और गोबर गनेस का पूजा किया जाता है. पढा लिखा लोग घरे से बाहर जाने का टाइम में नाक को रुमाल से तोप लेता है ताकि उसको रोड पर फेंका हुआ कूड़ा का गंदा महँक नहीं लगे... अगर ओही आदमी ई सोचता कि गंदगिये ना रहे त रुमाल से नाक मुँहतोपने का जरुरते नहीं रहेगा...
एक तरफ टीभी में किर्केट का खेला देखिए अ महँगाई भुला जाइए अऊर ब्लॉग में आपका कबिता गजल से फुसला कर असली बतवा भुलएल रहिए... महान हैं आप..कबिता साहित्त पेट भरले में अच्छा लगता है .. भुखल आदमी को रोटी से सुंदर कुछो नही लगता है... अब एही बतिया आपका दोस्त लोग बोलता त साहित्त हो जाता...
जो सोचे सो लिख दिए अब आप छापिए चाहे नही छापिए आपका मर्जी..

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

क्या कहें?????????????????????????????????????????????????????????????
ये और भी हो सकते थे.................आपने सही कहा, हम क्यों उसकी चर्चा कर उसे बढ़ावा दें जिसमें कुछ दम नहीं. वैसे आपकी ये बात भी सही है की ब्लॉग पर भी साम्प्रदायिकता दिखने लगी है. डर है की कहीं यहाँ भी गोधरा और गुजरात न होने लगे?
और हाँ, इन लोगों को डाइव बहुत सही जगह लगवाई है. यहाँ आकर ही तो मन में, तन में शांति आती है.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

boletobindas ने कहा…

आपकी बात लाख टके की है..पर कभी कभी जवाब देना बहूत जरुरी हो जाता है जब कोई देश की संस्कुति को कुएं का मेढ़क बनाने की कोशिश करता है....एक बार ही सही विरोध का स्वर तो उठानी ही चाहिए .... भले ही दोबारा न जाएं....

boletobindas ने कहा…

बाकी आपकी तस्वीर बेहद सही औऱ चोट करने वाली है....

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

आपके विचार परिपक्वा हैं ... वैसे तो इन लोगों को नज़र अंदाज़ करना सही है और ज्यादातर लोग करते भी होंगे ... पर कभी कभी पगला सांड को डंडा भी पढ़ना चाहिए ...

वाणी गीत ने कहा…

हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है...

लाख टके की बात ...!!

ajit gupta ने कहा…

माना की डाइविंग में प्रवीण हैं लेकिन --- ऐसे ही हमारा हाल है। हमें कहाँ अपनी बात रखनी चाहिए इसका भान ही नहीं है। ब्‍लाग धार्मिक बहस के लिए नहीं है उनका स्‍थान अपने सम्‍प्रदायों के मध्‍य है। इसलिए मैं भी ऐसी पोस्‍ट को अनदेखा कर देती हूँ। उन्‍हें अनावश्‍यक प्रचार देना बेवकूफी है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर जी कल आपकी लगाई तस्‍वीर पर उतना ध्‍यान नहीं दिया था। सब उसकी व्‍याख्‍या कर रहे हैं। आपके मन में भी कुछ रहा होगा। कल पृथ्‍वी दिवस भी था। मैं सोचता हूं यह तस्‍वीर कहती है कि संभल जाओ वरना डाइव लगाने के लिए पानी सिर्फ इसी डबरे में मिलेगा। या कि मरने के लिए भी चुल्‍लू भर पानी यहीं से लेना होगा।

zeal ने कहा…

Respected Sameer ji --

'ESCAPISM'

bach kar nikal jao...This is known as Escapism.

It is wise to avoid messing with such people but i feel , rare are they, those who selflessly raise their voice for the benefit of mankind.

If everyone can contribute their two cents in removing the filth, it will definitely clean the road for coming generations.

Its our moral duty to fight for righteousness. If all will turn face against such miscreants and terrorists, then who will fix the head of such ignorants??.

Humanity tells us to correct such people who are mentally sick. They seek our help. They will improve. They will learn. How long they will continue bashing Hinduism? I honestly feel they must be shown light to realize the truth and know the facts. Ignoring them is not a solution. They need to be spoon-fed by wise and sensible people. Love is the cure of hatred.

"Omnia vincit amor" ..( Love can conquer the world)

In my humble opinion....No harm removing filth and making the path clean and joyous for our next generation.

PS-- I agree with Rajesh ji.....Kindly don't compare 'gobar' with filth.

Regards,
Divya

zeal ने कहा…

As far as the picture in your blog is concerned, it very well suits the blog title and content....but i will prefer to say....

"Hawan karte hain to ungaliyan jalti hi hain".

aabhaar !

कुन्नू सिंह ने कहा…

ही...ही....ईतना जबर्जस्त फोटो :))

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

एकदम सही कहा आपने अंकल जी. ऐसे लोगों को लिफ्ट देने की कोई जरुरत नहीं..

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

और हाँ, चित्र तो बड़ा मजेदार लगाया. कोई कमोड में डाइविंग करता है क्या...ही..ही..ही..


************
'पाखी की दुनिया में' पुरानी पुस्तकें रद्दी में नहीं बेचें, उनकी जरुरत है किसी को....

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा

वाह क्या बात कही है...लाजवाब...पोस्ट भी ग़ज़ल भी...ग्रेट समीर भाई ग्रेट...
नीरज

लोकेन्द्र ने कहा…

क्या कहे अब तो कहते भी नही बनता है....

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

लाख रूपये की बात कही हैं .....................जी नहीं आपकी बात अनमोल हैं ...................मैं ज़रा पैर का गोबर धो लू ..................शुक्रिया सर जी ...........

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

सही राय दी आपने !! हिन्दी चिठ्ठाकारी के आरंभिक दौर मे मजहबी कलुषता न के बराबर थी , तब जाना और पढना अच्छा लगता था । क्या वह दौर वापस आ सकता है ... शायद , अगर हम उन विवाद्स्तमक ब्लागों पर जाना ही छोड दे , तब ...

Pratik Maheshwari ने कहा…

बहुत ही अच्छे विषय पर आपने प्रश्न उठाया है.. आशा करता हूँ की कुछ लोगों तक यह बात पहुंचे और आगे से गलती ना दोहराएं..
इस विषय पर इससे सटीक चित्र तो हो ही नहीं सकता.. :)

आभार

संजय बेंगाणी ने कहा…

यह 125 वीं टिप्पणी होगी. अद्भूत. इत्ती टिप्पणियों की कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. धन्य है आप. बधाई! हमें तो 10वाँ हिस्सा ही मिल जाए तो मोनिटर को सिने से लगा लें. भावुक किस्म के इंसान है जी.

अब मुल विषय पर. एक समय था जब कमबख्तों की पोस्टे पढ़ हम में परशुराम जाग जाता. मगर अब ज्ञान चक्षु खुल गए. खामखा बकवास की हिट बढ़ाता ही नहीं. भाड़ में जाए, जिनकी जैसी बुद्धि होगी वैसा ही लिखेगा.

तर्क की भाषा समझे तो उन पर लिखें भी. दिमाग बन्द कर रखा हो तो उन पर लिखना बेकार है.

मैथिली गुप्त ने कहा…

समीर भाई, हमें तो आपकी गजल बहुत पसंद आयी

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

समीर भाई!
आज पहली बार आपके ब्लाग पर दस्तक़ दी। पहले धार्मिक मुद्दों पर ब्लागरों को सलाह। दूसरा ड्राइव लगाती हुई सुन्दरी। तीसरा उम्दा ग़ज़ल। एक के बाद एक तीनों भंगिमाओं से तटस्थ भाव से मैं रूबरू हुआ। तीनों को एक ही साथ पोस्ट करने के पीछे पता नहीं आपका क्या मक़सद था। जहाँ तक मैं समझा रहा हूँ कि आपने भूमंडलीकरण की शक्ति को पहचान ली है। उसी का प्रतिबिंब उसमें परलक्षित हुआ है। आधुनिक दौर में संचार-तंत्रों के व्यापक प्रभाव के समक्ष कूपमंडूपता को नष्ट होना है। आधुनिक युग की राजनीति की मेरर इमेज को भूतकाल के धर्मो में देखा जा सकता है। हमारा सब कुछ श्रेष्ठ और दूसरों का सब कुछ खराब है ऐसा मानना हमारा भ्रम है। क्षेत्रीयता और धार्मिकता संबंधी पुरानी मान्यताएं भूमंडलीकरण के दबाव के कारण सब कहीं चरामरा रही है। भारत उससें अछूता नहीं है। अब हमें धर्मो को मानवतावाद की कसौटी पर कसना ही होगा। आपके मानवादी निर्मल विचारों हेतु- साधुवाद!
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
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dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

जो समझ गये वह उन नासम्झो को भी समझा दे .

आशीष खंडेलवाल ने कहा…

बहुत ही सटीक लिखा गया है.

हैपी ब्लागिंग

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

इस विषय पर आपके द्वारा लिखा जाना सुखद आश्चर्य है. बहुत काम की बात लिखी.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

साथ धड़कें वो धड़कनें चुनिये कितनी खबरें लहू से रंग छपतीं

बहुत सुंदर रचना.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

इतनी सारी टिप्पणियों के लिये आपको बहुत बहुत बधाई. आत्मा गदगद होगई.

makrand ने कहा…

आज के माहोल में बहुत जरुरी पोस्ट, आभार आपका.

makrand ने कहा…

संजय बेंगाणी जी तर्ज पर....टिप्पणीयों की संख्या के लिये बधाई और शुभकामनाएं.

makrand ने कहा…

लगता है इस पोस्ट पर १५० टिप्पणियों का आंकडा पार हो जायेगा. शुभकामनाएं.

ढपो्रशंख ने कहा…

अरे बाप रे....टिप्पणी संख्या देख कर तो चक्कर आरहे हैं. पोस्ट ढे या टिप्पणी? क्या जादूई पोस्ट लिखें हैं आप? सारी दुनियां मे टिप्पणीय़ों का अकाल पडा है. बहार सिर्फ़ यही हैं. भगवान बुरी नजर वालों से बचाये....जरा नींबू मिर्च लगा कर नजर उतार देना.:)

रामराम

ढपो्रशंख ने कहा…

टिप्पणीयों के चक्कर मे पोस्ट का जिकर तो भूल ही गये. बहुत उम्दा और बेहतरीन पोस्ट लिखी है आपने.

Shastri JC Philip ने कहा…

प्रिय समीर जी,

कई महीनों के बात तकनीकी समस्या हल हुई तो अब चिट्ठाकारी में सक्रिय हो गया हूं.

सोचा कि टिप्पणी-प्रारंभ टिप्पणीसम्राट के चरणों में "तशतरी" पेश करके किया जाये. कृपया स्वीकार करें!

आपने जो कुछ लिखा है उसका दिल से समर्थन करता हूं. गलती पढने-प्रचार करने वालों की उतनी ही है जितना लिखने वालों की है.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.IndianCoins.Org

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

ताऊजी तनिक ध्‍यान से देखिए

ओ सुंदरी नहीं

सुंदरा है
सुंदरा।

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

समीर जी मैंने भी वो ब्लॉग मेरी भी नज़र से गुज़रे है..और जिन्होंने भी पढाये...मई उन्हें यही कहना चाहती थी की वो सब जाते ही क्यों है ऐसे ब्लोग्स पर...वो क्या हम -आप क्यों जा कर उनका प्रोत्साहन बढ़ाते है..और मुझे बहुत प्रसन्नता हुई की आप ने ये मेरे मन की सी बात अच्छे तरीके से पेश कर दी. १००% में आपके साथ हु.

anand ने कहा…

Bilkul sahi kaha aapne...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

@ अविनाश जी अगर आपकी बात सही है तो फ़िर चश्मे का इंतजाम करवाओ.:)

रामराम

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

पर एक बात है आज तक ताऊ ने इनको पहचानने मे गलती नही की. कुछ गडबड जरूर है.

विजय प्रकाश सिंह ने कहा…

मैने बचकर निकलने वाले रास्ते का ही इस्तेमाल किया और कभी टिप्पड़ी या जवाबी पोस्ट नही लिखा ।

हर्षिता ने कहा…

इन बातों को ज्यादा तूल न देना ही बेहत्तर है पर पल्ला भी नहीं झाड़ सकते।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

Well done !! I agree 100 % with your views Sameer bhai

JHAROKHA ने कहा…

क्यूँ गोबर हटाने के लिए नगर निगम का इन्तजार करना, बच कर निकलिये न!! वक्त आने पर नगर निगम अपना सफाई कार्य कर लेगी और ये लोग भी हतोत्साहित हो लिखना बंद कर देंगे. जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो यह लिखेंगे किसके लिए और कब तक?
bahut hi seedhi aur sachhi baat kahi hai aapne,sir,wakai me jab ham aisi khabaren padhte hai to fir us samay hamdeemag ki nahi dil ki sunte hai fir vaise hi man ko uddelit karane wale vihhar hi man me aate hai.
is baat ko lekar aapki rachna bhi bahut hi achhi lagi.
poonam

Manish ने कहा…

माना कि आप डाईविंग में पारंगत हैं, मगर डाईव तो सही जगह लगाओ!!

ही ही ही ही .... फोटुआ बड़ी मस्त लगी......

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये.
...बहुत खूब,प्रसंशनीय!!!!

JHAROKHA ने कहा…

क्यूँ गोबर हटाने के लिए नगर निगम का इन्तजार करना, बच कर निकलिये न!! वक्त आने पर नगर निगम अपना सफाई कार्य कर लेगी और ये लोग भी हतोत्साहित हो लिखना बंद कर देंगे. जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो यह लिखेंगे किसके लिए और कब तक?
bahut hi sahi aur seedhi baat kahi hai aapne.kyon ki aesi khabare man ko uddelit kar hi jaati hai fir vivek kaam nahi karta haiaur jajbaat me aakar ham usi raste par chal padten hai.isase vasta rakhti aapki rachna bhi behatareen hai.
poonam

सिद्ध बाबा बालकनाथ त्रिकालज्ञ ने कहा…

आज के इस दूषित माहोल मे बडी सार्थक बात कही गई है.

सिद्ध बाबा बालकनाथ त्रिकालज्ञ ने कहा…

ये स्विमिंग पूल कहां मिलता है? लगता है गर्मी शांत करने के लिये अति उत्तम प्रोडक्ट आया है किसी कंपनी का?

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ऊपर किसकी बात हो रही है कुछ पल्ले नहीं पड़ा .....!!
तौबा .....>>>

कहाँ कहाँ से ढूंढ कर लाते हैं .....ऐसी तसवीरें ....!!

आप भी आजमाइए ....सेहत निखर आएगी .....!!

गज़ल लाजवाब ....!!

jitendra ने कहा…

i do the same from some time and only visit selected blogs to avoide headache.

aruna kapoor 'jayaka' ने कहा…

आपने बिलकुल सही कहा समीरजी!... फिल्मों के प्रचार के लिए भी ऐसे हथकंडे अपनाएं जाते है!...विरोध प्रदर्शन किया जाता है, कोर्ट में केस दायर किये जाते है....जम कर विरोध करना, लोगों को उस तरफ आकर्षित करना होता है!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

सारगर्भित ।

दिलीप कवठेकर ने कहा…

समीरजी, आपका चित्र ही अपने आपमें संपूर्ण पोस्ट है!!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अब आप ही बताएं कि रचना के साथ इतने अच्छे gif लगाएंगे तो रचना से ध्यान तो बंटेगा ही न

dipayan ने कहा…

एकदम सच कहा आपने । हम सबको नज़रिया बदलना होगा । और हाँ, फोटो का तो जवाब नहीं ।

कमलेश वर्मा ने कहा…

समीर दद्दा,आपने जो बात की है,वह पता सब को थी,पर जब आसमान से वाणी हुई...तब आँख खुली..हमेशा की तरह धमाका....उत्तम

कविता रावत ने कहा…

टाईटिल से ही समझ में आ जाता है कि जाना है कि नहीं. क्लिक करके जाना मेरा कर्म है जिसे करने हेतु मुझे अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है.,....
... kash ye saapradayikta ko badhwa dene wale bhi apne vivek se kaam le paate.... shayad unka vivek ek seemit kshetra tak hi hota hoga....unke paas yahi sab rahata hai jo we banthne lagte hai sabko...
Aapki kavita bhi bahut achhi lagi...
bahut shubhkamnayne...

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने उम्दा रचना प्रस्तुत किया है! बहुत ही बढ़िया तस्वीर है! सही कहा आपने कि डाइविंग आती है पर सही जगह पर करनी चाहिए!

पद्म सिंह ने कहा…

ब्लोगिंग अपनी मनोवृत्ति को उजागर करने का एक माध्यम है ... जिसकी जैसी भावना है प्रकट कर रहा है ... करने दीजिए ... उनकी अहं पुष्टि होने दीजिए ... किसी के बारे में चर्चा कर के हम उनका प्रचार ही कर रहे हैं ... रास्ता बचा कर निकल जाना एक तरीका हो सकता है ... लेकिन हमेशा ये बात ठीक ही हो इस से सहमत नहीं हूँ ...मेरा कहना है कि "असत्य और अन्याय के प्रति आँख मूँद लेना उसका साथ देने जैसा ही है" ऐसे लोगों की सार्वजनिक भर्त्सना होनी चाहिए... और लिखा भी जाना चाहिए ... लेकिन उनकी बातों पर सफाई देने के अंदाज़ में नहीं... यद्यपि इनको रोक पाना हमेशा संभव नहीं होता लेकिन गटर और दरिया के पानी में फरक पता करने के लिए इस पोस्ट जैसी चर्चाएं चलती रहनी चाहिए ...
आज की गज़ल, कविता या रचना जो भी है ... निहायत खूबसूरत लगी ... इसके लिया अलग से बधाई

निपुण पाण्डेय ने कहा…

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब नये और झुनझुने चुनिये.

सुन्दर पंक्तियाँ समीर जी!
सही बात कही आपने....गलत के प्रचार करने और उसपे चर्चा करने से ही उसको बढ़ावा मिलता है ...अगर हम अनदेखा कर दें तो उनका साहस कम होता जायेगा ....:)

Vivek Ranjan Shrivastava ने कहा…

बदनाम हुये तो क्या हुये नाम तो हुआ ...लोकप्रियता के लिये कुछ लोग धर्म का ऐसा इस्तेमाल करते ही हैं .. आप सही कह रहे हैं कि गोबर से बच कर निकलना हमारा ही काम है ...

क्या डाइविंग है !!!!!!!

pritima vats ने कहा…

बिल्कुल सही बात कही है समीर जी। मेरा मन भी बहुत दुखी होता है ऐसे बात-विवादों से।

alka sarwat ने कहा…

अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप. फिर क्यूँ नहीं नजर अंदाज करते उन्हें?? इसमें क्या परेशानी हैं?
यही बात तो मेरे आदरणीय पतिदेव फरमाते हैं
लेकिन ये हिन्दुस्तानी जनता सीढियों पे ही अटक जाती है ,कौन समझाए ?
लेकिन चित्र बेमिसाल है
रचना के विषय में कुछ नहीं कहूंगी .....
पहले चाचाओं का शजरा मुकम्मल हो जाए !!!!!!!!!!!

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

सत्य बात है जी ,आज तो शायद बहुतो के यह समझ में आ गयी होगी |

शरद कोकास ने कहा…

समीर भाई यह सही निष्कर्ष है । एक किस्सा याद आया । सड़क चलते एक मित्र ने कहा " यार गोबर जैसा दिखता है " दूसरे ने उसे छूकर देखा " हाँ यार गोबर ही है " दोनो बाजू से निकल गये । पहले ने कहा " अच्छा हुआ पाँव नहीं पड़ा ।

ढपो्रशंख ने कहा…

अभी फ़िर से पोस्ट पढी, बहुत ही सामयिक पोस्ट.

ढपो्रशंख ने कहा…

कविता तो बहुत ही उम्दा है. आपके प्रयत्नों को सलाम. शुभकामनाएं.

seema gupta ने कहा…

डाईव तो गजब की रही हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा

regards

Manoranjan Berojgar ने कहा…

Janab, Aap Bloger hain yaa Shayar. Waise dono mein Lajbab Hain. Khambe ka sadupyog Kutte se behtar kaun Janta hai? Aur Mantri Ka P.A. Bhi.

Maza Aaya Padhkar.

ईपत्रिका ने कहा…

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