सोमवार, मार्च 26, 2007

क्या भाई!! अकेला देख हड़काते हो?

बस क्या!!! मुक्तक महोत्सव ही रुके??

बहुते दुखी हूँ भाई!!

यह भी कोई बात हुई?

आदमी को अकेला देख हड़काते हो?

घटना इस तरह रही. एक शरीफ गीत लेखक(हांलाकि ऐसा कम ही देखने में आता है) अपने मन का, वो भी जनता की फरमाईश पर, एक छोटा सा मुक्तक-महोत्सव करता है. अब जैसा कि हर उत्सव में होता है, आम जनता को थोड़ी सी परेशानी तो होती ही है. नारद नामक सर्वजनिक स्थल पर सिर्फ गीतकार ही गीतकार नजर आने लगते हैं बाकि सब नेपथ्य में चले जाते हैं. जैसा कि हर उत्सव के दौरान होता है, चाहे वो उ.प्र. का चुनावी उत्सव ही क्यूँ न हो. भले बोर्ड की परीक्षा हो. बालक पढ़ ना पायें, मगर उत्सव तो होगा ही और खूब धूम धाम से होगा. जनता झेल पाती है कि नहीं यह तो नहीं मालूम मगर नारद पर उनका वर्चस्व जरुर नाकाबिले बर्दास्त हो जाता है. जब आदमी का बुरा वक्त आता है तो मौहल्ले का जमादार भी समझाईश का पुलिंदा थमा देता है, सो ही उड़न तश्तरी ने किया. तुरंता उड़ान भरी और टिक गई गीतकार के दरवाजे जा कर. लगे समझाने कि यह गलत है जो आप कर रह हो, सबको बराबर मौका मिलना चाहिये, ऐसा थोड़े चलेगा कि नारद पर आप ही आप हों.

जैसा कि हर उत्सव में होता है, आम जनता को थोड़ी सी परेशानी तो होती ही है. नारद नामक सर्वजनिक स्थल पर सिर्फ गीतकार ही गीतकार नजर आने लगते हैं बाकि सब नेपथ्य में चले जाते हैं. जैसा कि हर उत्सव के दौरान होता है, चाहे वो उ.प्र. का चुनावी उत्सव ही क्यूँ न हो. भले बोर्ड की परीक्षा हो. बालक पढ़ ना पायें, मगर उत्सव तो होगा ही और खूब धूम धाम से होगा.


वो तो गीतकार सज्जन व्यक्तित्व के धनी, गीतकार हो कर भी, कि मान गये और उत्सव रोक दिया. बड़ा चिंतन किये, सोचे-समझे और उत्सव रुक गया. अब लो उत्सव रुका नहीं कि ईमेल और टिप्पणियों के माध्यम से फिर लोगों ने उनसे फरमाईश रखी कि रुकना नहीं चाहिये. अब बताओ, किसकी सुनें वो. वो तो थक से गये और ऐसा थके कि चिट्ठा-चर्चा भी सस्ते में निपटा कर भाग खड़े हुऐ.

बड़ा खराब लग रहा है. इतने अच्छे गीतकार. और उससे भी ज्यादा, गीत लिखते हुऐ भी, एक अच्छे इंसान. यह सरासर नाइंसाफी है.

क्या गल्ती है उनकी. यही न, कि सिर्फ़ अपना लिखा छापते रहे. गीतकार जी, मैने आपको पहले भी कहा था कि अच्छा बुरा न परखो. चिट्ठा जगत से कुछ सिखो. अच्छा या बुरा, जैसा भी जो लिखता हो, उसे अपने बैनर के नीचे लाओ, हमें भी ले लो. अब जब गीतकार से महोत्सव मनाओगे तब एक आपकी, एक हमारी..एक एक कई बाकियों की....तो भले ही छपे गीतकार से लेकिन उसका बुरा नहीं लगाया जाता है यहाँ. यहाँ बुरा वो है जो अपने ही लिखे को दो तीन बार से ज्यादा एक दिन में प्रकाशित करे. वो अतिक्रमण कहलाया. मगर प्रकाशन करने वाला अगर गीतकार ही हो और लेखक अलग अलग हो तो फिर ठीक है फिर भले ही आप पूरा पन्ना ही घेर लो, चलता है कोई कुछ नहीं कहेगा..कभी इसकी पाती और कभी उसकी. फिर कभी इसकी कविता और कभी गद्य रुपी होते हुये भी उसकी कविता..बस, शर्त यह है कि बैनर एक होते हुये भी लेखक अलग होना चाहिये.

मगर प्रकाशन करने वाला अगर गीतकार ही हो और लेखक अलग अलग हो तो फिर ठीक है फिर भले ही आप पूरा पन्ना ही घेर लो, चलता है कोई कुछ नहीं कहेगा..कभी इसकी पाती और कभी उसकी. फिर कभी इसकी कविता और कभी गद्य रुपी होते हुये भी उसकी कविता..बस, शर्त यह है कि बैनर एक होते हुये भी लेखक अलग होना चाहिये.


फिर आजकल तो छ्द्म नामों का फैशन चला हुआ है, आप ही काहे नहीं पाँच नाम से लिखते हैं. पहले मुक्तक पर एक...बाकि चार की झूठमूठ चार टिप्पणियां जिन्हें देख दो चार और सच वाली भी आ ही जायेंगी..आपने तो देखा है, आती ही हैं. फिर अगला मुक्तक इसी बैनर में दूसरे नाम से...यह अलाउड है. शुरु करो न, गीतकार पर..मेरे मुक्तक साथी टाइप या हमारे साथी की पाती टाइप, हम भी हाथ बटायेंगे. जब हर कोई इसी तरह चल रहे हैं तो इतने खराब तो हम भी नहीं.

यही तो जमाना है भाई!! आप तो बुरा सा मान गये. इससे काम नहीं बनता. आजकल खुद की तारीफ में भी आत्म निर्भरता का सीजन है. बस यही रास्ता सुलभ और सर्व-स्विकार्य है.

अपना उत्सव जारी रखो. फर्मेट बदल दो. चिट्ठाजगत पर नजर दौडाओ..मेरी बात मानो कि फार्मेट बदल कर भी आप ही आप दिख सकते हो. लोग दिख ही रहे हैं. जब तक कि उस पर रोक नहीं लगती तब तक तो फायदा उठाओ. नैतिकता से काम नहीं बनता. नैतिकता का पालनकर्ता आज की नई दुनिया में पागल और बेवकूफ कहलाता है. जमाना बदला हुआ है, आप भी बदलो न, प्लीज!!

सुनाओ न कुछ मुक्तक!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

9 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

मैंने पहले भी कहा था कि मुक्तक महोत्सव चलता रहना चाहिये। दिन में एक बार प्रकाशित हों सारे मुक्तक। शो मस्ट गो आन! शुरू करें राकेश जी!

बेनामी ने कहा…

समीर भाई

यह आप सही कह रहे हैं. हमने तो अभी शुरु ही किया था गीतकार देखना और वो बंद होने लगा, यह अच्छा नहीं लगा. मेरा समर्थन अनूप जी के साथ है और आपके साथ तो होना ही हे.

--खालिद खान

Pankaj Bengani ने कहा…

Show must go on!!

Show must go on!!

Show must go on!!

Mrinal Kant (मृणाल कान्त) ने कहा…

"आजकल खुद की तारीफ में भी आत्म निर्भरता का सीजन है. बस यही रास्ता सुलभ और सर्व-स्विकार्य है. "
good one!

masijeevi ने कहा…

हम भी अनूपजी का समर्थन करते हैं। फारमेट बदलें पर म‍होत्‍सव चलने दें।

संजय बेंगाणी ने कहा…

मैं दो तीन दिन से चिट्ठा जगत से दूर था. मामला यह लग रहा है की मुक्तक महोत्सव ने एक ही दिन में इतनी पोस्ट भर दी की नारद पर केवल वही नजर आती रही. दुसरो को दुसरे पन्ने पर धकेल दिया गया.
ऐसा पहले भी हुआ है, उनके साथ जो व्यवहार हुआ वही मुक्तक के साथ हो.
इस विषय पर भावुकता या पक्षपात के बिना विचार होना चाहिए.
महोत्सव को रोकना समझ से बाहर है. लेखन जारी रहे.

miredmirage ने कहा…

एक दिन में एक एक चिट्ठा लिखना सही है। फ़िर उसमें जितना चाहे लिखा जाये। किन्तु मुक्तक महोत्सव चलता रहना चाहिये।
घुघूती बासूती

महावीर ने कहा…

मुक्तक महोत्सव को रोक देना तो कुछ ऐसा कहिए कि कवि की कलम छीन ली हो।
लेकिन कवि कहां रुकता है!
"मता ए लौह कलम छिन गई तो क्या ग़म है,
कि खूने दिल में डुबो ली हैं उंगलियां हम ने!!"
भई, मुक्तव-महोत्सव तो चलना ही चाहिए।

Udan Tashtari ने कहा…

वाह, हम सब का आग्रह गीतकार जी ठुकरा नहीं पाये और उन्होंने इस महोत्सव को साप्ताहिक कॉलम बनाकर पुनः शुरु कर दिया है. बहुत आभार गीतकार जी का.

महावीर जी,

आप तो हम सभी को आदेश कर सकते हैं, किसके बस में है कि आपका आदेश न माने. :)

बहुत आभार सबका.

समीर