रविवार, दिसंबर 17, 2006

कृप्या अन्यथा न लें

सन २००६ तो अब बीता ही समझो. बड़ा ऐतिहासिक वर्ष रहा हमारे लिये. इसी वर्ष हमारी उड़न तश्तरी ने चिट्ठा जगत में प्रवेश किया और अन्य चिट्ठाकारों का असीम स्नेह भी पाया. इतने कम समय में ऐसा लगने लगा कि न जाने हम कब से इस हिन्दी चिट्ठा परिवार के सदस्य हैं.

इतने कम समय में ही कितनी नई पहचानें बनीं, कितनी नई मुलाकातें हुई. बहुत ही आन्नदकारी रहा यह अबतक का सफर. इस बीच काफी नियम सीखे, काफी नियम बदलते देखे और काफी नियम बनते देखे.

अब २००६ को धन्यवाद करने को तो बहुत सारी चीजें है, सब तो लिख पाना संभव नहीं है और २००७ के स्वागत का रोमांच भी है कि न जाने क्या क्या ला रहा है अपनी झोली में भर कर.

वैसे जब २००६ पर चिट्ठा जगत के नजरिये से नजर डालता हूँ तो पाता हूँ कैसे हमने पोस्ट लिखना सीखा और कैसे लोगों ने हमारा लिखा पढ़ना सीखा. कैसे हमने औरों के लिखे पर टिप्प्णियां करना सीखा और कैसे लोगों ने हमारे लिखे पर. देखते देखते टिप्प्णियों के तरीके में भी बदलाव देखे. कुछ नये रिवाज भी देखें. कुछ टिप्पणियों को पोस्टों में बदलते देखा तो कुछ पोस्ट रुपी टिप्पणियां देखीं. कुछ पोस्टों पर पंगे होते देखे तो कुछ टिप्पणियों पर दंगे होते देखे. कहीं दिखीं ज्ञान की बातें तो कहीं हास्य और फिर कहीं गीत संगीत. सब देखा, देख रहा हूँ और लगता है कि देखता रहूँगा. लोगों को खुश होते देखा, दम देते देखा और गम पीते देखा. किसी की भविष्यवाणियां की और इसी बहाने अपना वर्तमान सुरक्षित करने का प्रयास किया, कभी टिप्पणी के तरीके बखाने, कुछ विधायें सीखीं तो कुछ सिखायी. कभी चित्रों के माध्यम से बादलों के उस पार गये, उत्तरांचल घुमे फिर कभी खंडहरी किलों में, तो कभी इस पार पचमढ़ी फिर अहमदाबाद फिर गुजरात का डैम और कभी गयाना और न जाने कहाँ कहाँ. इतना सब कुछ बस अपने लेपटाप के सामने बैठे बैठे होता चला गया, एक अजूबा सा लगता है.

कितने जाने अनजानों के बारे में जाना, कितना साहित्य के बारे में जाना. कभी तकनिकी के बारे में, कभी देश विदेश की जानकारी, कभी पुराणों में तो कभी गीता-रामायण में. कभी दंगा प्रधान शहर का और कभी पंगा प्रधान परिवेश का ब्यौरा. कभी जाना कि गीत और गीत का अर्थ क्या होता है तो कभी जाना कि आवारा भीड़ का खतरा क्या होता है. किसी ने बताया कि लड़कियां क्या चाहें तो कोई बता गया कि भैंस के पेट में दर्द क्यूँ होता है. कितने कवि सम्मेलन सुनें, कितनों में बुलाये गये और कितनों में बुलाये जाने की आस लगाये घर में बैठे रहे. न जाने कितने चिट्ठे नये खुले, कितने खुलते ही बंद हो गये, कुछ दम खा कर और कुछ बिना कुछ खाये बंद कर गये तो कुछ ने स्थान बदल लिये. कितने चिट्ठों पर चर्चा हुई और कितनी चर्चा चिट्ठों पर हुई. अथाह सागर में गोते लगा रहे हों जैसे और बस, लगाते ही चले जा रहे हैं.

इसी जगत में अभी अभी एक नया फैशन आया-बुरा मानने का. मगर जैसे ही कोई नया फैशन आता है, नये नये परिवेश और उनकी काट भी तुरंत निकाल लेते हैं हम सब. तो इस नये फैशन के साथ भी नये तरीके दिख रहे हैं. लोग कुछ कहना भी चाह रहें हैं, कह भी रहे हैं और पहले से बढ़ चढ़ कर कह रहे हैं. सहनशीलता नये समय के साथ साथ खत्म होती जा रही है. कतिपय लोग एक दूसरे की टांगे खींच रहे हैं गोया चिट्ठा लेखक, लेखक नहीं कोई सांसद हों. जो उर्जा सार्थक लेखन में लगना चाहिये, वही उर्जा समय के साथ साथ एक दूसरे की खिंचाई में और परनिंदा की गंदी नाली में बहने लगी है और अनेकों उस नाली में कुद कर छपाक छपाक स्नान का आन्नद ले रहे हैं. वैसे तो खिंचाई मौज मजे में, सदभावनापूर्वक करना एक स्वस्थ परंपरा है और मनोरंजक और आन्नददायक भी मगर व्यक्तिगत आक्षेप और द्वेषवश की गई खिंचाई देखकर क्षोब भी होता है और खेद भी.

ऐसे ही माहौल में कुछ और तरीके दिखे कि कुछ भी कहना हो, कह जाओ, सोचो मत और अपना लिखा कथन दुबारा मत पढ़ों. भूल जाओ कि सामने वाले को अच्छा लगेगा कि बुरा. या जो आप कहना चाह रहे हैं वो वाकई आपके शब्द भी कह रह हैं कि नहीं. बस शुरुवात कुछ यूँ करो कि कृप्या अन्यथा न लें और शुरु हो जाओ जो कहना है कि आप बेवकूफ हैं, नालायक है.. और जब बात खत्म करो तो एक स्माईली लगा दो ताकि सनद रहे और बात बढ़े तो आप कह सकें कि मै मजाक कर रहा था, वो देखो स्माईली. यह स्माईली दिखने में जरुर छुटकु सा है मगर मौके पर बजरंगी पहलवान से ज्यादा जबरी और बेहतरीन अंग और चरित्र रक्षक. मुफ्त में अंतरजाल पर उपलब्ध अनेंकों जुगाड़ों का बेताज बादशाह.

आने वाले साल २००७ में तो हमेशा ख्याल रखना होगा और टिप्पणियों का स्वरुप शायद और भी बदले मगर अभी तो कुछ इस तरह का आसार लगता है:

-कृप्या अन्यथा न लें मगर आपकी कविता बहुत अच्छी लगी. :)

-कृप्या अन्यथा न लें मगर आप क्या वाहियात बात करते हैं, बेवकूफी भरी। आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे। :)


आदि आदि...यानि तारीफ में भी और गरियाने में भी, हर जगह -कृप्या अन्यथा न लें का प्रयोग संस्कारों का हिस्सा बन जायेगा. क्या मालूम कब कौन किस बात का बुरा मान जाये. आपकी कौन सी सिरियस बात को मजाक और मजाक को सिरियसली ले लिया जाये. समय बदल रहा है, आप जिसे रोता हुआ समझ रहे हैं दरअसल वो हंस रहा है और जिसे आप हंसता देख रहे हैं वो रो रहा है और जो चुपचाप बैठा है उसका तो क्या-क्या मालूम हंस दे कि रो दे या यूँ ही तटस्थ बना रहे. वैसे तो श्यूर शाट पंगे वाली टिप्पणी में एक से ज्यादा स्माईली लगाने का प्रचलन भी है.


खैर, अब यह सब यहीं छोडें और २००६ को खुशी खुशी एक और वर्षीय अनुभव के खिताब के रुप में अपनी कमीज पर टांक लें और स्वागत की तैयारी करें २००७ की.

यह सब तो नियम है, सब परिवर्तनशील है. समय के साथ आ रहे बदलावों को न हम रोक सकते हैं न आप. बस साक्षी बने इनका स्वरुप देखते रहें और अपने आपको इनके अनुरुप ढ़ालते चलें.

चलते-चलते:
"कृप्या अन्यथा न लें मगर हम तो सोच रहे हैं कि २००७ में हर बार दो टिप्पणी किया करेंगे. एक तो तारीफ वाली और दुसरी एक दम सही सही-अब अगर पंगा हुआ, तो दूसरी से मुकर जायेंगे कि ये कोई और कर गया हमारे नाम से. और बता दें यह तरीका कोई हमने नहीं ईज़ाद किया है, यह दूसरी टिप्पणी का प्रचलन हमने इसी २००६ में कहीं कहीं देखा है, अब याद नहीं आ रहा- कहाँ- कहाँ? :) :)"

कोई बुरा मत मानना भाई, वो देखो, कोने में दो दो स्माईली!!!

वैसे मुझे मालूम है कि कुछ लोगों के साथ वाकई में कोई दूसरा चोरी से टिप्पणी कर गया मगर पुलिस वालों को भी तो चोरों से नये नये रास्ते पता चलते हैं, वरना उन बेचारे नादानों को क्या आता है!! :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

14 टिप्‍पणियां:

mahashakti ने कहा…

अच्‍छा है, गम्‍भीर महोल मे सरल बात

बेनामी ने कहा…

आपका ब्लाग संसार देखता आ रहा हूं काफी समय से, तब कुछ कुछ बात समझ आई. मगर है बहुत लम्बी बात, बहुत सी बातों के बारे में. आप इतनी सहजता से सब कैसे कह लेते हैं.

-खालिद

अफ़लातून ने कहा…

बहुत ख़ूब !

Pankaj Bengani ने कहा…

:D :D :D

तीन स्माइली!!

शब्द आप खुद भर लिजीए!!!

संजय बेंगाणी ने कहा…

कृपया अन्यथा न ले पर आपने कुछ ज्यादा ही लम्बा लिखा है.
बुरा मान गये?
लो जी स्माइली टीका देते हैं :D :D
मैं तो मजाक कर रहा था.
------
अच्छा और उससे ज्यादा शिक्षाप्रद लेख. शायद अब नए साल में कम पंगे हो.

अनूप भार्गव ने कहा…

समीर भाई !
अगर अन्यथा न लें तो एक बात कहूँ ?
चलिये रहनें दीजिये ..

:-):-):-)

अनूप शुक्ला ने कहा…

अरे साल अभी तो बाकी है। अभिऐ से सेंटिया गये! बहरहाल हम अन्यथा न लेकर सामान्य तौर पर यथावत लिये!

ratna ने कहा…

घर वापिस लौटी तो आपकी पिछली कई पोस्ट आज पढ़ पाई। सभी बेजोड़ है। सबकी तारीफ़ यहीं कर दे रही हूँ कृपया अन्यथा न लें।

सागर चन्द नाहर ने कहा…

-कृप्या अन्यथा न लें मगर आप क्या वाहियात बात करते हैं, बेवकूफी भरी। आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे। :)

मैं तो मजाक कर रहा था, वाकई मजेदार लेख है

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

:) :) :)

मैं कुछ लिख नहीं रहा हूं, कृपया अन्यथा मत लीजियेगा.

:) :) :)

rachana ने कहा…

हमने इसे गलती से अन्यथा ले लिया है और बुरा भी मान लिया है क्योंकि बुरा मानना आजकल फैशनेबल जो है!

Manish ने कहा…

खूब किया आपने पिछले साल का लेखा-जोखा !

पूनम मिश्रा ने कहा…

२००६ की विदाई और २००७ के स्वागत का आपका अनूठा ढंग बहुत अच्छा लगा.देखते हैं नया साल आपको क्या क्या दिखाता है.जो भी दिखाए ,कुछ नया सिखाए.

श्रीश । ई-पंडित ने कहा…

(कृपया अन्यथा न लें)x100 "मेरी अगली १०० टिप्पणियों के लिए स्माईली के साथ" :)x100