शनिवार, फ़रवरी 16, 2019

आई लव यू अभिव्यक्ति नहीं, अनुभूति हुआ करती थी



भारत में वेलेंटाईन डे का प्रचलन कब से आया यह तो ठीक ठीक पता नहीं. इतना जरुर याद है जब बीस साल पहले भारत छोड़ा था तब तक कम से कम हमारे शहर, जो महानगर तो नहीं था किन्तु फिर भी बड़ा शहर तो था ही, में नहीं आया था. हमारे समय में तो खैर बीबी को भी आई लव यूबोलने का रिवाज न था. लड़ नहीं रहे. डांट नहीं रहे. मार पीट नहीं कर रहे. तो इसका अपने आप यहीं मतलब होता था कि आई लव यू’.
तारीफ करने में भी यही हाल था. अगर खा रहे हैं तो इसका मतलब ही है कि खाना अच्छा बना है वरना तो मूँह बना कर बोल ही देते कि क्या खाना बनाया है? इतना नमक भी कोई खाता है क्या? कोई तो थाली उठा कर फेंक देते थे. अगर ये सब नहीं किया है मतलब कि खाना ठीक बना है. कपड़े और मेक अप की भी कभी तारीफ न करते. खराब लगा तो जरुर बोल दिया करते थे कि ये क्या कपड़े पहने हैं? या क्या बंदर जैसा मूँह रंग लिया है?
लाल गुलाब की उपयोगिता भी अलग थी. बुके जैसी प्रथा सिर्फ किसी महिला का पुरुष द्वारा मंच से सम्मान के लिये थी. लाल गुलाब अचकन में लगा कर चाचा नेहरु बना करते थे बाल दिवस पर. बारात के स्वागत में भी लाल गुलाब के फूल चाँदी के धागे से लपेट कर लोगों के कोट में लगाये जाते थे. लाल गुलाब देकर प्यार जताना तो ख्वाब में भी नहीं आता था.
तब अगर विवाह पूर्व प्रीत हो जाये तो प्यार का इज़हार नजरों से होता था. किताब में छिपा कर दिये पत्रों से होता था. लड़की की सहेलियों के भाईयों कें माध्यम से होता था. साईकिल से बार बार उसके घर के सामने से निकलने से होता था. गुलाब इज़हार का माध्यम न था. न फोन होते थे, न व्हाटसएप, न फेसबुक. जो था वो बस फेस वेल्यु, वो भी दूर दूर से देखी.
प्रेम पत्र का आदान प्रदान, छिप छिपा कर दो मिनट के लिए उससे उसकी सहेली की उपस्थिति मे मिल कर ही जीवन भर साथ रहने के ख्वाब बुनना और फिर घर से भाग कर शादी कर लेना और पूरे शहर में चर्चा का विषय बन जाना ही प्रथा थी.
इस वेलेन्टाईन डे ने आकर तो एकदम प्रेम क्रांति ही ला दी है. क्रांति भी ऐसी कि एकदम आधुनिक क्रांति. जिस बात के लिए क्रांति हुई, उससे जैसे ही मतलब सधा तो क्रांति का अर्थ ही बदल गया. लोकपाल के लिए क्रांति अलोकपाल पर जा ठहरी जैसे ही सत्ता हाथ लगी. इमानदारी की क्रांति करने से  लाये गये सत्ताधीश खुद ही अपने मित्रों को मालामाल करने में लग गये.
वेलेंटाईन डे के आने से, आज जितना खुले आम प्रेम का इज़हार हो रहा है. जितना आसानी से फूल देकर आई लव यू बोला जा रहा है. जितनी आकांक्षायें गिफ्ट के लेने देन और प्रेम के इज़हार के लिए बढ़ी हैं, प्रेम की उम्र उतनी ही घट गई है. प्रेम बंधन उतने ही ढीले हो गये हैं.
बहुत अधिक मीठा भी कड़वा लगने लगता है. शायद यही कारण होगा. इत्ता ज्यादा प्रेम का इज़हार कि उम्मीदें आसमान छूने लगें और फिर जब हकीकत के धरातल पर कदम रखो तो आसमन दूर नज़र आये और फिर दूरियाँ बढ़ने लगें उतनी ही जितना की आसमान दूर है.
आज के संबंध जितनी आसानी से आई लव यू बोल देने के साथ एक ताजा गुलाब देने से बन जाते हैं, उतनी ही तेजी से गुलाब के मुरझाते ही टूट जाते हैं. अपवाद तो खैर होते ही है.
मगर ऐसा लगता है कि वही वक्त बेहतर था जब इज़हारे मोहब्बत आई लव यूअभिव्यक्ति नहीं, अनुभूति हुआ करती थी..
आई लव यू भी अब एक जुमला ही बन गया है जिसे निभाना कतई जरुरी नहीं.
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में सोमवार फरवरी १७, २०१९ को:    


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रविवार, फ़रवरी 10, 2019

धरना खत्म करने की खबर से पता चला कि वे धरने पर थे


धरना! धरना!! धरना!! आजकल जहाँ सुनो, बस यही सुनाई दे रहा है.
वैसे तो नित नये नये धरने कभी जंतर मंतर पर, कभी रामलीला मैदान पर, तो कभी राजघाट पर और कोई जगह न मिले तो कलेक्ट्रेट के सामने, होते ही रहते हैं. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, किसान आदि धरने पर बैठ भी जायें तो भी न तो मीडिया दिखाता है और न नेता देखता है. धरने भी चर्चा में तभी आते हैं, जब कोई दमदार पूरे दमखम के साथ धरने पर बैठता है और मीडिया उसे चीख चीख कर दिखाता हौ.
जहाँ धरने पर दमदार के बैठने से दम आ जाता है, वहीं बार बार धरने पर बैठने या यूँ कहा जाये कि धरने का लती हो जाने पर दमदार का दम ही कम हो जाता है. फिर न कोई उनको पूछता है और न उनके धरने को नोटिस में लिया जाता है. इनकी हालत काठ की हांडी जैसी है जो बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती. जैसे कि कभी रामलीला मैदान में लोकपाल के लिए धरने पर बैठकर पूरे देश को हिला कर रख देने वाले आजकल कब अपने गाँव में धरने पर बैठते हैं, क्यूँ बैठते हैं, कब उठ जाते हैं, क्यूँ उठ जाते हैं, कोई नहीं जानता. अब तो हालत ये है कि कई बार तो उनके धरना खत्म करने की खबर से पता चलता है कि वे धरने पर बैठे हुए थे.
हाल ही में कलकत्ता का एक धरना बड़े जोर शोर के साथ ऐसी चर्चा में आया कि मीडिया की तो जैसे चल निकली. छप्पर फाड़ टीआरपी बटोरी.
दरअसल इस धरने की खासियत यह थी कि इस धरने में जो धरने गया था, उसे उसी ने धर लिया जिसे वो धरने गया था. जिसने धरा उस पर जिसका वरदहस्त था, वह धरने वाले के धरे जाते ही धरने पर बैठ गया. धरने पर बैठा इसलिए ताकि धरने आये व्यक्ति पर जिसका वरदहस्त है, उसे संदेश दिया जा सके कि अगर आगे सी किसी को हमारे आदमियों को धरने के लिए भेजोगे तो उसे भी धर लिया जायेगा. फिर मत कहना कि हमें बताया नहीं था. बताने का सबसे बेहतरीन साधन धरना ही है एक दमदार के लिए. बाकि तो मीडिया देश भर को चीख चीख खबर पहुँचा ही देगा, इनके चीखने का तो हाल ये है कई बार जन्मजात बहरे को भी इनकी चीख पुकार सुनकर यह मुगालता हो जाता है कि उसको सुनाई देने लगा.
बताया गया कि जो धरने गया था वो भी गया नहीं था. उसे भी जिसका वरदहस्त उसके सर पर था, के द्वारा भेजा गया था.
धरने पर बैठकर इतना तो तय हो गया कि एक की चली सियासी चाल को दूसरे ने धरने पर बैठ कर नाकामयाब कर दिया. मगर इस तरह की सियासी चालें देश के लिए स्वस्थ परंपरा नहीं है. माना कई दशकों से इस तरह की चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है, किन्तु कहीं तो आकर इसे रोकना होगा.जल्द ही कोई और सत्ता हथिया लेगा फिर वही बदले का भाव लिए यही दांव इन पर खेलेगा.
मीडिया फिर मजे लूटेगा. फिर चीखेगा, चिल्लायेगा. डीबेट करायेगा. जैसे ही मामला संभलेगा सब कुछ पूर्ववत हो जायेगा. चुनाव भी निपट लेंगे, फिर साढ़े चार साल शांति और चुनाव के आते ही यही खेल शुरु. जनता सब समझती है. अब ये चालें वोट खींचने के बदले वोट को दूर ले जाती हैं. एक बदलाव तो देख ही लिया कि धरने के लिए गया व्यक्ति खुद ही धर लिया गया वो भी उसके द्वारा जिसे वो धरने गया था.
खैर, अब अगले धरने तक के लिए शांति. चुनाव सामने हैं, अभी तो बहुत धरने होंगे.
मिलते हैं एक ब्रेक के बाद, एक अगला धरना लेकर.
-समीर लाल ’समीर’   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में सोमवार फरवरी १०, २०१९ को:     

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शनिवार, फ़रवरी 02, 2019

महापुरुष कर्मों से बनते हैं, षणयंत्रों से नहीं




पहले के जमाने में एक बार आप महापुरुष घोषित हो लिए तो फिर सर्वमान्य एवं सर्वकालिक महापुरुष होते थे. मरणोपरांत महापुरुष के नाम पर सड़क का नाम रखा जाता था और उनकी मूर्ति चौराहे पर लगा दी जाती थी. हालांकि महापुरुषों की चौराहे पर लगी मूर्ति पर तब कबूतर आकर बैठते और बीट किया करते थे. मगर परिंदे नादान होते हैं अतः उन्हें माफ कर देने की प्रथा रही है. कबूतरों की बीट से सने महापुरुषों की मूर्तियों को आमजन उतने ही श्रद्धा से नमन करते थे, जितना कि वह उन महापुरुषों के जन्म दिवस और पुण्य तिथि पर नहला धुला कर साफ सुथरी की गई मूर्ति के माल्यर्पण के दौरान करते. वो दौर सेल्फी का नहीं था मगर ऐसे विशिष्ट महापुरुषों के कर्म और उनकी मूर्तियों की छबी हर दिलों दिमाग में अंकित रहती.
लोग उनकी प्रतिमा को देख और उनके सदकर्मों के बारे में पढ़कर उनसे प्रेरणा प्राप्त करते और दिल में एक चाह रहती कि मैं भी उनके पदचिन्हों पर चल कर एक दिन महापुरुष बनूँ.
परीक्षा में जब महापुरुष पर निबंध लिखने को आता तो तय रहता था कि ९०% बच्चे तो महात्मा गाँधी पर लिखेंगे ही. बाकी स्वामी विवेका नन्द, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह, रविन्द्र नाथ टैगोर, अंबेडकर, नेहरु, सरदार पटेल, सावरकर आदि आदि. अनेक महापुरुष होते थे. उनको महापुरुष मानना है, या नहीं मानना है, ऐसा कोई विवाद न था. सबका सम्मान करना सभी अपना धर्म समझते थे. निबंधों की पुस्तक में सभी पर निबंध होते.
एकाएक देखते देखते जाने क्या हुआ कि नये महापुरुष बनना ही बंद हो गये. पिछले कितने सारे दशकों में कोई नया महापुरुष आया ही नहीं एक दो अपवाद छोड़ दें तो. कलाम साहब, अटल जी वैसे ही अपवाद कहलायेंगे.
महापुरुष न तो पैदा होते हैं, न ही किसी फेक्टरी में बनाये जाते हैं. वे तो अपने समाज के प्रति संपूर्ण समर्पणभाव से बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के त्याग भावना के साथ कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि उन्हें जन जन महापुरुष मान लेता है.  
तिवारी जी से घंसू जानना चाह रहा है कि आजकल महापुरुष बन क्यूँ नहीं रहे हैं?
तिवारी जी ने स्वच्छता अभियान को धता बताते सड़क पर पान की पीक मारी और कहने लगे कि बन काहे नहीं रहे हैं? हम तो खुद ही महापुरुष मटेरियल हैं. हमने समाज को कितना ज्ञान दिया है. कितनी समस्यायें बिना किसी लाभ के यहीं पान की दुकान पर बैठे सुलझाई हैं. आज ये मोहल्ला जो भी है वो हमारे कारण ही हैं. दरअसल महापुरुष तो बन रहे हैं, उनको पहचनाने वाले बनना बंद हो गये हैं.
इसी पहचानने वालों के अकाल ने ही तो मजबूर कर दिया है कुछ लोगों को कि महापुरुष कहलवाना है तो कोई और रास्ता एख्तियार करो. खुद ही कोशिश कर स्वयंभू महापुरुष बनो.
नये जमाने के महापुरुष बनने के अभिलाषी जान गये हैं अपनी सीमायें. अब उन्हें पता है कि वो एक खिंची हुई लाईन से बड़ी लाईन खींचने की क्षमता नहीं रखते हैं अतः उनके पास बड़ा होने के लिए मात्र एक विकल्प है. पहले से खिंची हुई लाईन को मिटा कर छोटा करना ताकि वह उससे बड़े नज़र आने लगें और लोग भ्रमित होकर उन्हें महापुरुष मान लें. भ्रम का मकड़जाल फैलाने की महारत तो हासिल है ही.
इसी कवायद में पुराने महापुरुषों को गलत ठहराने का अभियान चलाने की परम्परा चल निकली है, ताकि उनको महापुरुषों की सूची से अलग किया जा सके. उनकी मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं. उनकी तारीखें इतिहास और पाठयक्रम में बदली जा रही हैं.
कोई इनको कैसे समझाये कि किसी महापुरुष को महापुरुषों की सूची से निकाल कर आप महापुरुष नहीं बन सकते. महापुरुषों की सूची कोई संसद की सीटें नहीं कि सीमित हों. एक को अलग करो तब ही दूसरा आयेगा.
महापुरुष कर्मों से बनते हैं, षणयंत्रों से नहीं.
सेल्फी और डॉक्टर्ड विडियो से अगर महापुरुष बनते होते तो अब तक लाखों फेसबुकिया महापुरुष का दर्जा पा गये होते. हालांकि वो सोचते तो यही हैं कि वे महापुरुष हो गये हैं और इस चक्कर में वो पुरुष भी नही रह गये हैं.
पाउट काढ़ कर भला कोई पुरुष सेल्फी खिंचवाता है क्या?
-समीर लाल समीर
 
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में सोमवार फरवरी ३, २०१९ को:
http://epaper.subahsavere.news/c/36363231



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रविवार, जनवरी 27, 2019

तुरुप का पत्ता याने की ट्रम्प कार्ड



तुरुप का पत्ता याने ट्रम्प कार्ड जिसमें किसी भी हाथ को जीतने की क्षमता होती है और सभी कार्डों में सबसे बड़ा माना जाता है.
बचपन में जब ताश खेला करते थे और अगर तुरुप का पत्ता हाथ लग जाये, तो क्या कहने. चेहरे पर विश्व विजेता वाले भाव आ जाते थे.
शायद इसीलिए इसे ट्रम्प कार्ड कहते हों, घंसु उत्सुक्तावश तिवारी जी से पूछ रहा है. देखिये न, आज उसी की वजह से महिने भर से भी ज्यादा समय से पूरी अमेरीका की सरकार लॉक आऊट में चल रही है. ट्रम्प के चेहरे पर आज भी वैसा ही विजयी भाव है कि चाहे जो हो जाये, मेक्सिको और अमेरीका के बीच की दीवार तो बन कर ही रहेगी. उसे अपने सामने सारी दुनिया गलत दिखाई देती है और वह सोचता है कि सिर्फ वही सही है हर मामले में.
तिवारी जी मुस्कराते हुए बता रहे हैं कि इसे तो हमारे बचपन में भी ट्रम्प कार्ड ही कहते थे, तब तो यह ट्रम्प कभी राष्ट्रपति बनेगा, यह भी कोई नहीं जानता था. वैसे गनीमत है कि ट्रम्प अमेरीका का राष्ट्रपति है, भारत का प्रधान मंत्री नहीं वरना तो ट्रम्प कार्ड अपने नाम पर ट्रम्प कार्ड करा कर ही मानता. जिसे ७० साल पहले से लोग अपनाते आये थे, उसे एकाएक अपने नाम कर लेता कि ये मैं ही हूँ जिसका ये इतने सालों से बेजा इस्तेमाल करते आये हैं और विजय का क्रेडिट खुद अपने खाते में करते आये हैं.
खैर, ये तो बिना खुद के नाम का हुए कामों को खुद का बताने से नहीं चूकते तो जिस पर नाम हो, उसे भला कैसे छोड़ देते.
वैसे घंसु तुम गलत नहीं हो, आजकल अधिकतर ऐसा ही सोचते हैं. जो जितना अच्छा अभिनय कर लेता है, जो जितनी अच्छी तरह बुलिंग कर लेता है, जो जितना अच्छी तरह रो लेता है, लोग उसको ही पूजने लगते हैं. वह अपने अभिनय, रोने और बुलिंग की क्षमता  के आधार पर अपने उपासक बनाते हैं और उपासक उन्हें आराध्य मान उनके हर सही गलत फैसले को सत्य मान उसे सत्य साबित करने में जुट जाते हैं.
एक झूठ भी बार बार बोलने से सच से ज्यादा मजबूत प्रतीत होने लगता है. यह बात साधक भी जानते हैं और आराध्य भी.
अपने आराध्य को तुरुप का पत्ता मान कर सोचते हैं कि हमने जग जीत लिया.
उन्हें यह भी जान लेना चाहिये कि अपने आराध्य को तुरुप का पत्ता और उसको चैलेंज करने वाले हर इंसान को जोकर मान कर चलना उचित नहीं. जहाँ तुरुप के पत्ते की मान्यता है, वहीं उसी गड्डी से निकले जोकर का भी अहम स्थान है. जो इसे ना माने उसे ’मेरा नाम जोकर’ फिल्म देखना चाहिये. वो भी जोकर का महत्व जान जायेंगे.
जिन्दगी में हर इन्सान एक तुरुप का पत्ता लिये घूम रहा है. कुछ किसी चाल में उसे खेल कर विजेता बन गये हैं तो कुछ मात्र उसके धारक होने की वजह से विजयी भाव लिए घूम रहे हैं. कुछ उसके होने के बावजूद भी उसकी ताकत से अनभिज्ञ याचव भाव धारण किये जिये जा रहे हैं. मगर सभी का जीवन सफल उन खुशियों से होता है जो चेहरे पर मुस्कान और हँसी ला पाये और आस पास खुशियाँ फैलाये. अब इसे जोकर कह कर अपनाओ और हँसो या ऐसा मान लो कि शायद यही जोकर, जीवन की खुशियों का ट्रम्प कार्ड है.
सब सोच सोच का फर्क है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में सोमवार जनवरी २८, २०१९ को:


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रविवार, जनवरी 20, 2019

भूखे रहने से बेहतर है कि खिचड़ी का आनन्द उठाया जाये



मकर संक्रांति के नाम सुनते ही खिचड़ी की याद आ जाती है. यूँ तो बचपन में जब बीमार पड़ते थे तब भी खिचड़ी ही खाने को मिलती थी. बुरा बीमार होने से ज्यादा इस बात का लगता था कि बाकि के सारे लोग तो घर में पराठा सब्जी और पुलाव दबा रहे हैं और हमको खिचड़ी मिल रही है. अपने दुख से ज्यादा दूसरे की खुशी से दर्द होता है.
छात्रावास के जीवन में कई बार मेस बन्द रहने के दौरान जब खुद खाना पकाना होता था तो खिचड़ी और घी के साथ अचार और पापड़ में बहुत आनन्द आता था. भूखे रहने से बेहतर तो है कि खिचड़ी का आनन्द ही उठाया जाये. तब खुद के लिए और रुम मेट के लिए फटाफट कुकर में खिचड़ी बनाकर स्वाद से खाते थे.
जब हम बंबई में पढ़ा करते थे तो कालबादेवी के पास एक होटल सिर्फ तरह तरह की खिचड़ी के लिए ही प्रसिद्ध था और उसी के बाजू में किसी ने उस जमाने में छोले भटूरे की दुकान खोली और घाटा खाकर बन्द कर दी. ऐसी भीड़ लगती थी उसके यहाँ खिचड़ी खाने के लिए कि कई बार तो आधा घंटे इन्तजार करना पड़ता था. एक खिचड़ी जो कभी गरीबों का खाना भी कहलाता था उसे बेच कर वो खिचड़ी वाला करोड़पति हो लिया और छोले भटूरे जैसा उस जमाने का लक्ज़री खाना बेच कर दूसरा दिवालिया. सब किस्मत का खेला है.
ये खिचड़ी भी कई प्रकार की होती है. मेरी पसंद में साबूदाने की खिचड़ी बहुत ऊँचा स्थान रखती है. इसके स्वाद में वो ताकत है कि हम बचपन में दोपहर में खिचड़ी मिलने तक कई पर्वों पर उपवास ही इसलिए रखते थे कि सिर्फ व्रत वालों के खाने में साबूदाने की खिचड़ी होती थी. बाकी को साधारण दाल चावल. जैसे ही साबूदाने की खिचड़ी मिल जाती और उपवास खत्म. फिर थोड़ी देर बाद सारा खाना खाने लग जाते थे वरना तो व्रत वाले सिर्फ एक टाईम का खाना खाते थे.
खिचड़ी के नाम से बीरबल की खिचड़ी भी याद हो आती है. जिस तरह दूर जलती आग से खिचड़ी नहीं पक सकती, उसे आंच पर चढ़ाना ही होता है. नेताओं के वादे भी इसी श्रेणी में आते हैं. बस, कहीं की आंच दिखाकर यहाँ खिचड़ी पकने के सपने दिखाते हैं. आम जनता खिचड़ी खाने की आस लगाये बैठी रह जाती है.
जिस तरह हम नेताओं की इस बीरबल की खिचड़ी वाली सियासी चाल को समझ नहीं पाते और हर बार इसी में उलझ जाते हैं. शायद इसीलिए जब कोई खुसफुस करके बात करते हुए दो लोगों को देख लेता है और समझ नहीं पाता कि क्या बात हो रही है तो पूछता है कि क्या खिचड़ी पक रही है तुम दोनों के बीच?
खिचड़ी की खासियत है कि दाल और चावल आपस में ऐसे घुल मिल जाते हैं कि उनको अलग करना संभव नहीं होता है. कुछ दाल तो कुछ चावल. सब कुछ गुड़मुड़. इसीलिए जब आदमी के सिर के बाल कुछ सफेद कुछ काले रह जाते हैं तो उसे भी खिचड़ी बाल ही बुलाते हैं.
अलग अलग मान्यताओं, अलग अलग विचारधाराओं, अच्छे बुरे, आपसे में जानी दुश्मन आदि जब सब एकसार होकर बस अपनी सियासी भूख मिटाने, एक दूसरे से घुलमिल कर सरकार बनाते हैं तो भी उसे खिचड़ी सरकार ही कहा जाता है. गठबंधन तो संसदीय भाषा में कहते हैं जिस तरह महाठग भी जननायक या नेता कहलाता है.
इसी से ख्याल आया कि आजकल हर बात जब तक महाबात न हो जाये लोगों को चैन नहीं पड़ता. गठबंधन भी महागठबंधन होकर ही मजा देता है. रैली भी अब तो मेगा रैली होने लगी है और जन सभायें भी विशाल जन सभायें. तो फिर खिचड़ी इसमें कैसे पीछे रह जाये?
अतः खिचड़ी ने भी सोचा कि रामलीला मैदान चला जाये और खुद को महा खिचड़ी कर दिया जाये. तब एक महासंगम ने एक राजनितिक दल के लिए खिचड़ी पकाई, जिसमें २० फीट व्यास और छह फीट गहराई वाली कढ़ाई में एक नामी शेफ ने ३ लाख दलितों के घर से मांग कर लाये गये चावल दाल से समरसता खिचड़ी पकाई और लोगों को खिलाई.
बताया गया कि स्वस्थ रहने के लिए खिचड़ी से बेहतर व्यंजन और कुछ हो ही नहीं सकता. अब इसका तो पता नहीं मगर कम से कम इस आड़े वक्त में राजनितिक स्वास्थय के लिए समरसता खिचड़ी तो बहुत जरुरी है.
अब इस खिचड़ी के बहाने और भी कितनी तरह की खिचड़ियाँ अलग अलग दलों में पक रही हैं, कौन जाने? मगर खिचड़ी की तो चल निकली.
-समीर लाल ’समीर’   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जनवरी २०, २०१९ को:

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चित्र साभार: गुगल  Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, जनवरी 12, 2019

पुस्तक मेला बहुत से आयाम खोलता है



अगले साल पुस्तक मेले में आने का मन है. उत्साही लेखक विमोचन के लिए आग्रह करेंगे ऐसा मुझे लगता है. ऐसा लगने का कारण अखबार वालों का अब मेरे नाम के साथ ’लेखक कनाडा निवासी वरिष्ट व्यंग्यकार हैं’ लिखना है. नाम के साथ वरिष्ट लगने लगे तो लिखना कम और ज्ञान ज्यादा बांटना चाहिये. जगह जगह सम्मानित होना चाहिये. किताबों की समीक्षा करनी चाहिये. ऐसा मैं नहीं कह रहा, इतिहास कहता है. 
२० किताबों के विमोचन के लिए २० भाषण लिखना तो बहुत ज्यादा काम हो जायेगा. इसलिये सोचता हूँ कि  भाषण लिखकर पहले से धर लेते हैं..ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये.  कौन इतने ध्यान से भाषण सुनता है, ध्यान तो दूर की बात है, सुनते ही कहाँ हैं? कि लोगों को पता चल पायेगा कि यह तो बार बार वही भाषण पढ़े जा रहे हैं. लोग तो पिछले ३० सालों से वही वही कविता सुना सुना कर १००० मंच लूटे चले जा रहे हैं और हर मंच से कमा रहे हैं. तो हम तो मात्र २० के लिए तैयारी कर रहे हैं वो भी मुफ्त में बोलने की.
उपस्थित गणमान्य साथियों, वरिष्ट साहित्यकारों, प्रकाशकों, लेखकों एवं लेखिकाओं (कवि कवित्रियों इसमें शामिल समझो खुद को)
आज इस पुस्तक के विमोचन के अवसर पर मुझे आमंत्रित करने और मंचासीन होने का सम्मान देने हेतु हृदय से आभारी हूँ. मैं इस पुस्तक मेले का आभारी हूँ जिसकी वजह से मैं हर साल दिल्ली आता हूँ और इस तरह से सम्मानित होता हूँ. एक सम्मान ही तो है जो मुझे जैसे वरिष्टों को साहित्य के क्षेत्र में रोके हुए है वरना रुपया पैसा तो इसमें होता नहीं.
कई बार मैं सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि अगर ये पुस्तक मेला न होता, अगर आप जैसा लेखक न होता, अगर आप जैसा प्रकाशक न होता तो मेरा क्या होता? क्या मुझे कोई सम्मान देता? क्या मुझे कोई पहचानता? क्या मैं दिल्ली आता? हर प्रश्न के उत्तर में एक ही जबाब अन्तर्मन में उठता है..शायद नहीं.
आज जब मुझे इस स्टॉल के सामने से गुजरते हुए पकड़ कर यह बताया गया कि आपको २ बजे विमोचन करना है किताब का. तो मैने पीछे चाय की दुकान पर जाकर फटाफट पुस्तक पलटी. १५ रुपये की चाय जेब से खरीद कर..१८० पन्नों की १० मिनट में पलटा डाली पूरी किताब.
लेखक की लेखन क्षमता अतुलनीय है. पहला पन्ना पलटो और फिर रोक नहीं सकते खुद को आप. पलटते ही चले जाओगे आप (बिना पढ़े)..जब तक की आखिरी पन्ने तक न पहुँच जाओ. इतना मजा आने लगेगा पन्ना पलटने में कि रुकना मुश्किल हो जायेगा. पन्ना पलटने का भी एक अलग मजा है जब विषय वस्तु समझ न आये!! और उससे भी ज्यादा तब...जब समझ आ जाये कि क्या पढ़ रहे हैं!!
आज के इस व्यस्त जीवन में, जब इन्सान सिर्फ भाग रहा है तब यह पुस्तक एक विश्रामालय सी प्रतीत होती है. कुछ देर तो गुजारो मेरे साथ..फिर चले जाना जीवन के साथ..का नारा लगाती है. कम से कम दस मिनट तो ऐसे गुजरे जब मैं इत्मिनान से चाय पीता रहा और मेरी उँगलियाँ भागती रहीं पन्ने पलटने को.
मैं पढ़ रहा था और सोच रहा था कि कितनी अलग दृष्टी है लेखक की बातों को देखने की और उन्हें समझने की. पीज़ा मे रोटी और उसकी टॉपिंग में सब्जी खोज लेने की अनुपम क्षमता लेखक को एक अलग कतार में खड़ा कर देती है. ऐसी दृष्टी और उसे शब्द देना..अद्भुत अनुभव है इस लेखन शैली से गुजरना...गुजरना तो क्या..बह निकलना! प्रवाह भी तो कोई चीज है! कई किताबों में तो इतना बहाव रहता है कि बिना खोले ही किताब का भव सागर पार हो जाते हैं.
लेखक से मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय ज्यादा नहीं रहा. सुबह यहीं स्टॉल के सामने पहली बार मुलाकात हुई मगर उन्होंने विमोचन का निवेदन किया और फ्री में किताब देकर मन मोह लिया. कौन करता है आज के जमाने में ऐसा? हमने साथ में सेल्फी खिंचवाई और उनने फेसबुक पर डाल भी दी है. हमारे पास डाटा प्लान न होने के कारण हम शाम को डालेंगे. अभी रोमिंग में चल रहे हैं. लॉज में फ्री वाई फाई है, वहाँ से कोशिश करेंगे.
जो पढ़ा उसी के आधार पर मैं इस पुस्तक को बहुत उम्मीदों से विमोचित कर रहा हूँ. आशा करता हूँ कि आप भी इसे सर आँखों पर उठाओगे. मूल्य थोड़ा ज्यादा तो है मगर आप अपनी पुस्तक छपवा कर वसूल करने की क्षमता रखते हो, यह भी मुझे ज्ञात है. उसे बाद में वसूल कर लेना. हाल फिलहाल खरीद कर जरुर पढ़ें. वरना लेखक और प्रकाशक को मुझे इस किताब की फ्री प्रतिलिपी देने का क्या फायदा!!
आज आप न खरींदेंगे तो कल हम किस पर बोलेंगे?
आज आपका पुस्तकें खरीदना हमारे भविष्य को पुख्ता करता है. कौन जाने कल हम आपकी पुतक विमोचित कर रहे हों?
पुस्तक मेला बहुत से आयाम खोलता है और इसीलिये मुझे इसका इन्तजार रहता है!! हो सकता है आने वाले वक्त में पाठक भी इस मेले का हिस्सा बनें. वादा है तब हर पुस्तक के विमोचन के लिए अलग अलग भाषण दूँगा.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जनवरी १३, २०१९ को:

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शनिवार, जनवरी 05, 2019

वादे का मतलब ही वो बात है जो पूरी नहीं होनी है



भारत एक उत्सव प्रधान देश है और हम पूरे मनोभाव से हर उत्सव मनाते हैं.
लोकतंत्र में चुनाव भी एक उत्सव है. प्रति वर्ष यह उत्सव भी भारत वर्ष में कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में लगातार मनाया जाता है, चाहे विश्व विद्यालय के हों या पंचायत या निकाय या विधान सभा या फिर लोक सभा या राज्य सभा. हमेशा पूरे जोश खरोश के साथ ये उत्सव मनाये जाते हैं.
चुनाव के उत्सव की खासियत यह रहती है कि इसमें खूब वादे और खूब जुमले वोटरों को लुभाने के लिए किये और बोलें जाते हैं. जो पूरे चुनाव के उत्सव में अपना परचम लहराते हैं और जैसे ही चुनाव खत्म, वादे और जुमले भी खत्म. पूरा करना तो बहुत दूर की बात है, कोई उनकी बात भी नहीं करता.
अगला चुनाव आया और फिर वही माहौल और फिर चुनाव खत्म होते ही सब नेस्तनाबूत!!
ऐसा ही वादों और जुमले का एक उत्सव नये साल के स्वागत का भी है. खूब नाचते गाते पीते खाते ढेर सारे वादे. अंतर सिर्फ इतना ही है कि इस उत्सव में वादे खुद से किये जाते हैं.
उधर चुनाव में पॉवर का नशा, इधर नये साल में अधिकतर को शराब का और बाकियों को माहौल देखकर ही खुमारी चढ़ जाती है. जैसे कि बरात में नाचना आना जरुरी नहीं है मगर माहौल ऐसा होता है कि पिये हो या न हो, नाच सभी देते हैं.
इतने सालों से चुनाव में नेताओं के किये वादों के बार बार टूटते टूटते और उनके जुमलों में बदलते रहने से वादों की परिभाषा ही बदल गई है हम आम लोगों के दिमाग में. अब तो वादे का मतलब ही वो बात है जो पूरी नहीं होनी है. इस नई परिभाषा की हमारे दिल पर इतनी गहरी पैठ हुई कि हम खुद से किये वादों को भी इस श्रेणी में ले आये.
नये साल का स्वागत करते हुए संकल्पों की शक्ल में खुद से अनेक वादे और फिर नया साल शुरु और वादे खत्म. कुछ तो बिल्कुल भुला दिये जाते हैं और कुछ को पूरा करने की हल्की फुल्की सी कोशिश करने के बाद उनका भी वो ही हश्र.
दरअसल हम वादों के प्रति इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि कोई कुछ भी वादे करे या उसे तोड़े, हम पर कोई फरक ही नहीं पड़ता. वादे भी नशे के समान होकर रह गये हैं. एक बोतल खत्म, कुछ देर झूमे, नाचे, गाये और फिर रात बीती. नया दिन आया. नशा गुम. फिर जब अगली बार नई बोतल खुलेगी तो नया नशा!!
इन सब के बीच एक मजेदार बात यह रहती है कि जैसे हर चुनाव में गरीबी हटाने का वादा, सड़क बनवाने का वादा, बिजली पानी का वादा, कर्ज माफी का वादा, खुशहाली का वादा, हर सर को छत का वादा, रहते ही रहते हैं. यह जनलुभावन होते हैं अतः हमेशा रहते हैं और हमेशा रहेंगे क्यूँकि अगर इन्हें पूरा कर दें तो अगली बार क्या वादा करेंगे?
वैसे ही जब हम नये साल पर खुद से वादा करते हैं तो कुछ वादे हरदिल अज़ीज होते हैं मसलन वजन कम करने का या जिम जाने का या योगा करने का, अच्छी मनपसंद नौकरी का जो शायद किसी को कभी मिलती नहीं, सुबह जल्दी उठने का, पैसे बचाने का, खूब पर्यटन पर जाने का, जिन्दगी को खुशी से जीने का, दूसरों की मदद करने का, हैल्दी खाना खाने का आदि आदि. ये सभी वादे इतने मनभावन हैं कि अगर पूरे हो जायें तो आगे करने को बच क्या रहेगा आखिर. अगले बरस फिर नये बरस में खुद को किस तरह ले जायेंगे? कोई उत्साह ही नहीं बचेगा. 
शायद वादे करना और वादों का टूट जाना सांसों के आने जाने की तरह ही है जो हमें जिन्दा रखे है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जनवरी ६, २०१९ को:


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