सोमवार, जुलाई 01, 2013

पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में

सुनिये:

समीर लाल ’समीर’ की आवाज में उनकी एक कविता

 

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधली धुँधली सी स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे था वहाँ का संसार..

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

इसी द्वन्द में उलझा

उग आता है

एक नया ख्याल

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँचुंगा जब वहाँ...

कौन जाने कह पाऊँगा

तब वहाँ की बातें..

कुछ ऐसे ही या कि

बनी रहेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तब कहता हूँ..

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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31 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

वक़्त या जिंदगी अपनी चाल से सब सिखा ही देती है .
आवाज़ की पृष्ठभूमि में बांसुरी की धुन मोहक है !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज मंगलवार (02-07-2013) को "कैसे साथ चलोगे मेरे?" मंगलवारीय चर्चा---1294 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

पृष्ठभूमि का संगीत काव्य-कल्पना को अतीन्द्रिय-सा करता जिससे उठता आपका स्वर एक मरीचिका बो रहा है-और मरीचिका का कोई समाधान नहीं होता !

सतीश सक्सेना ने कहा…

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

वाह भाई वाह ..
यह ग़ज़ल पूरी दीजिये , आनंद आ गया !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दूर कहीं पर सुख की कुटिया छाते रहते,
आने वाले कल की महिमा गाते रहते

कालीपद प्रसाद ने कहा…

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”--

वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है
latest post झुमझुम कर तू बरस जा बादल।।(बाल कविता )

Murari Pareek ने कहा…

कुछ अनसुलझे सवाल जेहन में होते ही है सभी के पर इतनी सुन्दरता के साथ बखान आप ही कर सकते हैं ..बहुत सुन्दर

Kuldeep Thakur ने कहा…


सुंदर प्रस्तुति...
मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 05-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



जय हिंद जय भारत...


मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

Kuldeep Thakur ने कहा…


सुंदर प्रस्तुति...
मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 05-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



जय हिंद जय भारत...


मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

उस पार सदा ही रहस्यमयी लगता है। कुछ रहस्य कभी नहीं खुलते ।
सुन्दर कविता।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

नहुत ही सुंदर, शुभकामनाएं.

रामराम.

Girish Billore ने कहा…

sachy hai bhulai nahee jateen yaden

GYANDUTT PANDEY ने कहा…

तिलस्म क्षितिज के पार ही रहता है!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है ... वो सब कुछ दिखा देता है सिखा देता है ...आपका ये अंदाज़ भी कमाल है समीर भई ...

Ramakant Singh ने कहा…

बांसुरी की धुन ने रचना को सौन्दर्य के साथ गरिमा प्रदान की है सुन्दर गंभीर रचना और वाचन के लिए प्रणाम

Madan Mohan Saxena ने कहा…

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें

संजय भास्‍कर ने कहा…

पढ़ कर मुंह से वाह वाह ही निकलता हैं
सच में बेहद सार्थक रचना है।
बहुत अच्छी लगी

संजय भास्‍कर ने कहा…

Aanad aa gya Gudev

PRAN SHARMA ने कहा…

AAPKEE LEKHNI SE EK AUR SASHAKT AUR
SAARTHAK KAVITA . JAESE BHAAV VAESEE BHASHA . KYAA BAAT HAI , SAMEER BHAI !

Shalini Kaushik ने कहा…

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”
very nice

vijay kumar sappatti ने कहा…

समीर जी .
नमस्कार

बहुत दिन हुए , कहीं गया नहीं . कुछ हालात ही ठीक नही है .

पर आज , अभी आपकी कविता पढ़कर बहुत अच्छा लगा . कई बार पढ़ ली . उस पार का तिलिस्म ने कुछ नया भाव संचार किया मन में.

इस कविता पर बहुत कुछ कहने का मन है ..शब्द नहीं मिल रहे है .

हाँ, ये जरुर कहूँगा कि ये आपकी एक कालजयी कविता है ...

दिल से बधाई दादा.

आपका
विजय

yashoda agrawal ने कहा…

शुभ प्रभात
सच में समार भाई
अच्छा लिखते हैं आप
सादर

lori ali ने कहा…

"Zindagi khud hi ek aazaar hai, jiso jaan ka/ jeene walon ko isee rog me marnaa hoga..." waah janab!

रचना दीक्षित ने कहा…

"वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है".

बेहतरीन गज़ल, मनमोहक आवाज़, सुंदर संगीत. अद्भुत प्रस्तुति.

अजय कुमार ने कहा…

sundar hai ,hamesha ki tarah

आशा जोगळेकर ने कहा…

वक्त के साथ हर सोच बदल जाती है । और ुस पार की कहने कौन आया है आज तक । सुंदर प्रस्तुति ।

आशा जोगळेकर ने कहा…

वक्त के साथ हर सोच बदल जाती है । और ुस पार की कहने कौन आया है आज तक । सुंदर प्रस्तुति ।

Ankur Jain ने कहा…

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

सौ फीसदी सही...बेहतरीन रचना।।।

ashok andrey ने कहा…

aapki bahut sundar v sashakt rachna ko pad kar abhibhut ho gayaa haaon.badhai.

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

कविता को कवि की आवाज़ में सुनना और साथ में इतनी सुरीली धुन... बहुत सुन्दर. जीवन पार जाने कैसा? किसके जैसा? अजीब तिलिस्म... बधाई.

Anupama Tripathi ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति ....आपकी आवाज़ मे सुनने से और गंभीर और सारगर्भित लगी ...!!
शुभकामनाये।