बुधवार, मार्च 24, 2010

निंदिया न आये-जिया घबराए

 

awakening

देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

जो हमें अपनी पहुँच के बाहर दिखता है, जिससे हम भौतिक रुप से, रुपये पैसे से लाभांवित नहीं होते, वो हमें हमेशा ही नीरस लगता है. ज्ञान प्रप्ति के नाम पर कभी कैमिस्ट्री भी पढ़ी थी, तब मजबूरी थी परीक्षा पास करना. आज मजबूरी है, पाप कर्मों के बोझ से खुद को अकेले में उबारना, तो यही मार्ग, भले ही नीरस हो, बच रहता है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.

एक अंतर्द्वन्द उठता है.

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.

सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं.

उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है.

१०० रुपये बेकार ही गये लगता है सी डी खरीदने के. इससे बेहतर तो नींद की गोली खरीदते, जरा सस्ती पड़ती तो अगले दिन के पाप कर्म भी कुछ कम ही होते पुनः उस दिन की रोटी जुगाड़ने की चाह में.

 

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’

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110 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

दर्पण झूठ ना बोले ...मगर दर्पण के सामने खड़े होकर अपने मन में कहाँ झाँका जा सकता है ...

आश्चर्य कि आपको स्वामीजी की सीडी की जरुरत पड़ गयी .... देखा नहीं है स्वामियों का हाल ...हाल की ख़बरों में ....!!

Vishal Kashyap ने कहा…

आपके लेखन में मुझे अपने पण का एहसास हुआ. काफी अच्चा लगा. और मैं इसे अपने BLOG लिस्ट में जोड़ना चाहता हूँ.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

सब कुछ तो लिख दिया -अब बचा क्या लिखने को .

बेहतरीन पोस्ट.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपने नींद लाने का बढ़िया तरीका बताया है!

एक उपाय मैं भी अक्सर आजमाता हूँ-

विस्तर पर लेटकर कठिन विषय की
पुस्तक पढ़ने लगता हूँ
और
न जाने कब नींद आ जाती है!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

नींद की इतनी अधिक चाह
गोलियां खाकर मत होना बेपरवाह
नींद ही अंतिम सत्‍य है
इसे न भूल जाना मनवा


जब न आये नींद और आयें सिर्फ विचार
तो उन्‍हें नोट करते जाएं लिखते जाएं
जिससे भूल न पाएं उनसे संभवत: समाज को
दिशा सही सी दे जाएं


पर चाह को लापरवाह मत होने दें
उन सभी चाहतों को नोट करके
उनसे भरपूर लाभ उठाएं और सबको उठाने दें


विचार तो उड़ते हैं
पर लेखक कापी पर लिखते चलते हैं
वरना विचार तो सबके मन में विचरण करते हैं

संजय भास्कर ने कहा…

maan gaye sameer bahut khoob likha hai

apki lekhni ko salaam

गिरिजेश राव ने कहा…

सुबह सुबह क़ुफ्र की बातें !
कुछ वाक्य बोल्ड में क्यों कर देते हैं? पाठकों की समझ पर शक है क्या ? :)
या वो मामला है स्कूल के दिनों में उत्तर पुस्तिका में अच्छे उद्धरणों को रेखांकित (स्केच पेन से! wow) करने को कहा जाता था ताकि परीक्षक की नज़र पड़े और नम्बर मिलें। लेकिन यहाँ परीक्षक कौन है? आप को नम्बर की फिकर क्यों होने लगी? इतने तो जमा कर रखे हैं!
वहाँ कनाडा के आकाश में व्याध (Orion) दिखता है क्या? और आकाशगंगा?
मुश्किल है ठंड में रात में छत पर लेटे तारों को निहारते नींद के आने की प्रतीक्षा भी नहीं कर सकते :)
मैं तो मुक्त होना नहीं चाहता। दुबारा जन्म लेना चाहता हूँ। 84 लाख में भी विश्वास नहीं इसलिए मनुष्य ही होऊँगा। मेरे विश्वास से फर्क पड़ता है - कुत्ता, बिल्ली, केंचुआ वगैरह सम्भावनाएँ रद्द।

Suman ने कहा…

nice

खुशदीप सहगल ने कहा…

बाबू मोशाय,
हम सब रंगमंच की कठपुतलियां है जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है...वो कब,कहां और कैसे किसकी डोर खींच ले, कोई नहीं जानता...हा...हा...हा....हा...

आनंद फिल्म का ये डॉयलॉग मुझसे भुलाए नहीं भूलता...

लेकिन साथ ही एक और डॉयलाग भी याद आ जाता है...

ज़िंदगी भर सुलगती लकड़ी की तरह धूं धूं कर धुंआ देते रहने से कहीं अच्छा है फूल की तरह थोड़े वक्त के लिए ही खिल कर खुशबू बिखेर जाना..

शायद यही दर्शन है और रात को अच्छी नींद का सबब भी...

जय हिंद..

ललित शर्मा ने कहा…

जीवन भी सीडी की मानिंद चल रहा है,
बाबाजी के प्रवचन पार्श्व से सुनाई देते है,
सीडी बंद होने पर भी सुनाई देते रहेंगें,
क्योंकि वे तो चेतना में गहरे पैठ चुके हैं,
यहां पर ट्रंकोलाईजर नाकाम है।

रामनवमी की शुभकामनाएं

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप के विश्लेषण और निष्कर्ष से सहमत ही हुआ जा सकता है।

Sadhana Vaid ने कहा…

आप भी किस पाप पुण्य के फेर में पड़ गए हैं ! क्या महात्माजी अपनी सारी गठरियां उतार पाए हैं या वे औरों को प्रवचन सुना सुना कर दिग्भ्रमित कर अपने खाते में पाप की एक गठरी और बढ़ा रहे हैं? इंसान विशुद्ध मन से मनुष्यत्व ना छोड़े और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे यही पर्याप्त है ! बेकार रात रात भर प्लेयर चला कर अपना बिजली का बिल मत बढ़ाइये और चैन से सोइए !

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वाह!
समीर जी ,
बहुत बढ़िया ,बिल्कुल सही आंकलन है मानव की फ़ितरत का ,अंत की पंक्तियों में एक जीवन -दर्शन प्रस्तुत कर दिया आपने ,
बधाई हो.

Kulwant happy ने कहा…

मानव मन का विश्लेषण बेहद करीब से किया। चाह बुरी नहीं गरूदेव, स्वार्थ बुरा नहीं, कोई मकसद निश्चित करना बुरा नहीं। वो आप निधारित करना है कि आपका मकसद, स्वार्थ, चाह केवल से ना जुड़ा वो, वो दुनिया का भला करने का हो तो, चाह भी चाह न रह जाती है। कष्ट से दूर ले जाती है।

'अदा' ने कहा…

जवाब नहीं आपका ...स्वामी जी को अगर पता चला कि उनकी सी डी का फंडामेंटल ही आपने ग़लत बता दिया है तो आप समझ सकते हैं कि उनकी 'चाह ' क्या होगी...
और अभी से प्लीज वानप्रस्थ का ना सोचें....माशाल्लाह अभी तो आपके खेलने खाने की उम्र है...
पोस्ट आपकी सिरिअस है लेकिन ..हम अभी सिरिअस नहीं हैं...
हाँ नहीं तो...!!

sangeeta swarup ने कहा…

जीवन के सत्य को मन के अंतर्द्वंद से दर्शाया है..चाहतों से इंसान मुक्त नहीं हो पाता...अब भले ही मुक्त होने की ही चाह क्यों ना हो...जीवन के प्रति विचारणीय पोस्ट.....बधाई

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

हर जगह एक चाह है भले संसारिक ना हो, सभी मनुष्य किसी ना किसी प्रकार की चाह में भागते रहते साधारण मनुष्य को भौतिक सुखो की लालसा रहती है और महात्मा जनो को मुक्ति की पर चाह तो है ही ना.....अपने दिल की बात को बखूबी बयान किया आपने ...बढ़िया विचारों को प्रकट करती एक सार्थक पोस्ट...बहुत बहुत आभार ...

seema gupta ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं

" अक्सर ऐसा होता है, जिन्दगी को करीब से जोडती है ये पंक्तियाँ..."

regards

Rambabu Singh ने कहा…

गुरु जी ,
मुझे नहीं लगता है आपको भी किसी गुरु विशेष की आवश्यकता हो सकती है |
आप के द्वारा कलमबद्ध किया गया एक एक वाक्य किसी गुरु की वाणी से कम नहीं |
अपने आप में कुछ तलासने की कोशिस लग रही है | अंतरात्मा को छू रही है |
बहूत बहूत आभार |

संजय बेंगाणी ने कहा…

१०० रुपये बेकार ही गये....
नहीं गए जी. कोई आराम से सो सके इस लिए जरूरी है कि आप उसकी जैब भरते रहें ... :)

मनोज अबोध ने कहा…

ये मुलाक़ात अच्छी लगी
आपकी बात अच्छी लगी
नींद आयी न जिसमे हमे
हमको वो रात अच्छी लगी

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut umda atm manthan.

Vivek Rastogi ने कहा…

सोचना पड़ेगा, जीवन को इस कोण से भी और समीकरण बनाकर देखने होंगे क्या इससे हमारी जिंदगी के कठिन सवाल हल हो सकेंगे या फ़िर वापिस से कोई नया समीकरण बनाना होगा।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

gr8 !!!!!

संत शर्मा ने कहा…

आत्मचिंतन करता सुन्दर लेख |

"देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं"

भय की वजह से किया गया चुनाब शांति नहीं देता, लेकिन समझ कर किया गया चुनाब जरुर देता है, प्रयास कीजियेगा |

"सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?"

जब गठरी हर हाल में उठानी ही है, तो क्यु न एक यैसी गठरी उठाई जाये जो "जीवन के साथ भी रहें और जीवन के बाद भी" :), वाणिज्य रचा -बसा है आपके अन्दर, why don't you go for big deal. ;)

"सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं"

"उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है ?" आपकी दिमाग में इस प्रश्न का घूमना दर्शाता है की स्वामी जी असर छोड़ गए आप पर ;)

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

कभी हम किसी गुरु की सीडी सुनने को लालायित रहते हैं और कभी कोई हमारा लिखे को पढ़ने को। यही है दुनिया में ज्ञान का आदान-प्रदान। चाहते सात्विक और तामसिक होती हैं। जिन चाहतों से विश्‍व का कल्‍याण हो वे सात्विक और जिनसे दूसरों को कष्‍ट पहुंचे वे तामसिक। जाना सभी को है लेकिन पता नहीं क्‍या सच है? क्‍या हम अपने चोले को यहीं उतारकर चल देंगे और हाथ हिलाते चल पड़ेंगे या फिर अपने साथ कुछ संस्‍कार ले जाएंगे? कुछ पता नहीं। लेकिन इतना अवश्‍य पता है कि समीरजी जब लिखते हैं तो पढ़ने की इच्‍छा जागृत होती है। बस ऐसा ही संतों की वाणी को सुनने में भी होता है। बस वे वास्‍तव में संत हों?

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत कुछ कह दिया आपने अपनी पोस्ट... बाबा और सी .डी . और नींद की गोली ये सब फंडा क्या है ... आप तो अदा की बात पर गौर फरमाए .... आभार .

संगीता पुरी ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...
बढिया आत्‍म विश्‍लेषण .. ये मानव दिलोंदिमाग की ये कशमकश तो चलती ही रहेगी !!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

त्रिवेणी तो वाकई बहुत सुन्दर है.. पूरा सोने पर सुहागा..

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…

आपकी पोस्ट और ब्लॉग पढ़ने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है सर जी......
.....................
विलुप्त होती... नानी-दादी की बुझौअल, बुझौलिया, पहेलियान..परिणाम.........
.........
http://laddoospeaks.blogspot.com/
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

सुशीला पुरी ने कहा…

प्रवचन करने वालों पर करारा व्यंग किया है आपने ,
मुझे तो बेहद अच्छे लगे आपके विचार ....सचमुच 100 रुपए जाया हुये आपके .समीर जी आपको गुरु की क्या जरूरत ???

kshama ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...
Kya kahun/ Lagta hai kiseene mere antarmanki baat likh dee hai!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

महात्मा जी को नमस्कार इनके पास इंसान की परेशानियों का कोई ईलाज नहीं है, ये बोलने जैसा सबसे आसान करते हैं और चैन की नींद सोते हैं...ऐसे महात्माओं की बाड़ सी आ गयी है आजकल बाज़ार में...थोथी सार हींन बातें और प्रवचन बिक रहे हैं...जो मोह त्यागने की बात करते हैं वो खुद कुछ भी त्याग नहीं पाते...प्रवचन सब दूसरे के लिए हैं...खुद के अमल में लाने के लिए नहीं...
मुझे औशो सुनना पसंद है...आपने सुना उन्हें?
नीरज

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही बढ़िया आत्म मंथन...इसके आगे किसी सी.डी. की क्या जरूरत..
पर ये तो बिलकुल सही है कि
नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

Dr Satyajit Sahu ने कहा…

R X PL. TAKE SLEEPING PILL
P S IN LIGHT MOOD DONT MIND

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

अद्भुत! यह आत्म-मंथन गज़ब है.

shikha varshney ने कहा…

पूरा फलसफा तो समझा दिया इन ३ पंक्तियों में....हम - हम रह कहाँ जाते हैं इस जिन्दगी के चक्करों में

रश्मि प्रभा... ने कहा…

cd? aapki soch aapko sukun de jati, neend ki goli bhi nahi, bas kuch likhna tha-hamare liye

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

पढ़ते हुए थोड़ा नीचे आया, बगल में चिंतन-मुद्रा में आपका चित्र देखा ! प्रविष्टि आयेगी ही ऐसी । आभार ।

विनीता यशस्वी ने कहा…

kya khub likha hai apne...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.

ऐसे विचार आना कह्तरनाक है इस उम्र में. "ताऊ अवसाद नाशक टेबलेट" का सेवन क्युं नही कार्ते आप? चकाचक नींद आयेगी.

संजय भास्कर ने कहा…

मानव मन का विश्लेषण बेहद करीब से किया। चाह बुरी नहीं गरूदेव, स्वार्थ बुरा नहीं, कोई मकसद निश्चित करना बुरा नहीं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

सीडी सुनि सुनि जग मुआ, पार भया नहिं कोय। जे अपने अन्दर गया, बाहर आया ओय!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं..

समीर भाई ... ये तो जीवन की नियति है ... सोच सोच और बस सोच ... कभी आशा की सोच कभी निराशा की सोच ... सिलसिला चलता रहेगा जब तक साँसे हैं .. या जब तक सोचने की शक्ति ख़तमनही हो जाती ...

शोभना चौरे ने कहा…

बहुत बढ़िया ,मोक्ष पाने कि इच्छा भी तो इच्छा ही है मोक्ष किसने देखा है ?तथाकथित बाबाओ कि तो अनेकानेक इच्छाये है |सी डी बनाकर भाषण देना आसान है |
इच्छाओ का संसार ऐसा कि मरने के बाद भी नाम रहने कि इच्छा |

mukti ने कहा…

बहुत दिनों बाद आपके यहाँ आना हुआ. बड़ी रोचक पोस्ट है. और ये जो आप बार-बार "मुक्ति का मार्ग" ढूँढ़ रहे हैं, तो इतनी मश्क्कत करने की ज़रूरत नहीं. दिल्ली जाने वाली कोई भी गाड़ी आपको मुक्ति तक पहुँचा देगी और मुक्ति आपको लेने स्टेशन आ जायेगी. हा हा हा हा.
पोस्ट अच्छी है. बहुत से गूढ़ अर्थ समेटे हुये. पर इन लाइनों ने दुःखी कर दिया--
"सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं."
हम सब जानते हैं कि एक दिन सभी को न उठने के लिये सो जाना होगा, तब भी सुनकर दुःखी होते हैं.

nilesh mathur ने कहा…

भैया आज आपके एक अलग रूप से रूबरू हुए हैं हम

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

bahut acchhi post....kuchh pal ko hame bhi adhyatam ki or kheech le gayi lekin jaise hi aap roji roti ki dincharya me lage...hamara man bhi karvate badalne laga...

man ki kashmokash ko behtareen tareeke se likha hai..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

इन अनिद्रा के शिकार स्वामियों की सीडी लेंगे तो ऐसा ही होगा....अब सावधान हो गये न आप? वैसे नींद न आने पर भेडें गिना कीजिये, आंखें बन्द करके..:)

M VERMA ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं
और फिर सब कुछ सुलझ ही जाय माना तो फिर सुलझायेंगे क्या? आखिर सुलझाने के लिये एक बार तो उलझाना ही पड़ेगा.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

अजी गोली मारिये सी डी को और नींद की गोली को।
आपको एक जादुई तरीका बताते हैं।
सोते समय इस मन्त्र का जाप करें ---ॐ नमो भगवते वासु देवाय।
अगर मुश्किल लगे तो --सिर्फ राम--- राम--- राम --ही काफी है।
देखिये कैसे मिनटों में नींद आती है ।

हाँ , अगर सोना चाहें तो । वर्ना कभी कभी जागती आँखों से सपने देखने में बड़ा मज़ा आता है। :)

anjana ने कहा…

दर्द ही दर्द भर गया है दिल मे
इतना भावुक कर दिया इस बेहतरीन पोस्ट ने ।

KAVITA RAWAT ने कहा…

Mahatmaon ki koi kami nahi....... aajkal khoob baj rahen hai.... aur janta hamari bholi-bhali dekhiyega kabhi kaise apna kaam dhaam chhod kar bhagti hai peeche-peeche ..... aap to cd sunte-sunte so gay... aise mahatma kab soyenge.....

pukhraaj ने कहा…

तोरा मन दर्पण कहलाये ..
ये मन बड़ा पापी ..
ये मन ही तो है सारी इच्छाओं की जड़ ... ये मन ही न हो तो कोई इच्छा भी न होगी ....
लो मै एक और इच्छा पाल बैठी इच्छा न होने की ...
कुछ न कहो ..
बस सब कुछ भूल जाओ ... भूलने में ही भलाई है ...
अच्छी पोस्ट .. पढना अच्छा लगा

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रकृति हमें कुछ ऐसे अवसर देती है आत्मावलोकन के लिये । लेखक और कवि को नींद न आने का बहाना नहीं चाहिये पर कईयों को ऐसी स्थितियों में सत्य अनुभव हो जाते होंगे ।

Manish ने कहा…

अध्यात्म की तरफ !!!
यहाँ तक… कि
"सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी. सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं. उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है."

ऐसी बातें !!!! ??? ऐसी बातें तो धार्मिक किताबों में पढ़ा है। लेकिन ऐसा क्या हो गया ?

Abhishek Neel ने कहा…

bahut sahi likha hai sameer ji aapne . raat ko nind na aane par man sahi me adhyatm ki taraf bhagta hai ..

अल्पना वर्मा ने कहा…

'महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं.'
***यह तो बड़ी बढ़िया बात कह दी इतने गंभीर हो कर भी..**

'स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ'
****:)
बहुत ही अच्छा लिखा है...विषय गंभीर था मगर बोझिल नहीं होने दिया .बहुत ही संजीदा !त्रिवेणी भी खूब!हर दर्पण यही कर रहा है आज कल..शायद सभी कुछ confused है!

Ashish (Ashu) ने कहा…

आप का जीवन -दर्शन पर लेख वाकई बेमिसाल हॆ आपका ब्लाग मॆ अप्ने ब्लाग लिस्ट मे रखकर अपने आपको धन्य समझ रहा हू कि अब आपके बिचारो को अपने करीब रख सका हू..रही बात नीद की तो हम तो निशाचर प्रजाति मे मानव हॆ पूरी रात पढाई ऒर दोपहर मे सोना :)

रानीविशाल ने कहा…

Kamaal hai na ....insaan ko kahin bhi chain nahi, yahan ham nind se pareshan hai itani nind aati hai ki lagata hai sleeping sickness ho gai hai aur aap hai jo nind na aane se pareshan hai.
wo geet yaad aagaya "Ram kare aisa ho jaae meri nidiya..." :)

Bahut gahara vichar manthan hai Zivan aur usase bhi age tak ka..!!

आओ बात करें .......! ने कहा…

समीरजी, मुद्दा ये है कि नीद आनी चाहिए.....सुकून मिलाना चाहिए....अब चाहे वो महात्माजी जी की cd सुनने से मिले या माँ की लोरी से......मंथन ठीक है....पर क्रंदन क्यूँ?? नीद की गोली भले ही सस्ती मिलती सो लेकिन सुकून नहीं देती...अब आप तो जिंदादिल हैं.....उड़ते रहिये तश्तरी की तरह.....बाकी रही मुक्ति, तो "वो" दे ही देगा. वो सब लोभ-मोह सबका हिसाब किताब कर लेगा....इसकी चिंता न करिए!!!!

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

समीर भाई,

एक बात कहना चाहता हूं... पर नहीं कहूंगा...

फिर भी एक दूसरी बात कहे देता हूं....

जैसा आपने कहा - एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.
एक अंतर्द्वन्द उठता है

मैं कहता हूं-

ये तो प्रेम की बात है उधो...

बंदगी समझेंगे तो प्रेम भी समझ में आ जाएगा...

स्‍वार्थ अपने क्षितिज तक फैलकर परमार्थ बन जाता है...

इस पर सोचिएगा... दो फायदे होंगे.. पहला जल्‍दी नींद आएगी... और सफलता से सोच गए तो चैंन की नींद आएगी।

dipayan ने कहा…

समीरजी, आपका लेख पढ़कर सोचने पर मज़बूर हो गये की हमे वाकई मे क्या चाहते है पैसा, सुकून, मुक्ती, प्रेम या कुछ और । मन भटकता रहता है, यही प्रश्नो के उत्तर ढूढ़ंने मे । भावपूर्ण लेख ।

kabeera khara bajar mein ने कहा…

Respected samirji
nid kai bhany adhyatm kee galiyoin main chaly gaiy shahab. Budha ne ek mantra diya hai.Appadeepo Bhav usee ka jap karai.

राज भाटिय़ा ने कहा…

नींद लाने का एक आचूक तरीका.....वि्चारो को दिमाग ओर दिल से उस वक्त दुर कर दो बेफ़िक्र हो जाओ नींद जरुर आयेगी. मुक्ति तो हमे इन बाबाओ की सीडी नही दिला सकती, बस धीरे धीरे हम देखे कि किन बातो से हम बेचेन है, ओर उन से प्यार थोडा कम कर लो, मुक्ति तो नही थोडा चेन जरुर मिलेगा

दीपक 'मशाल' ने कहा…

ये ज़िन्दगी भी वेताल अनन्ती ही है.. बहुत ही कमाल का लिखा आपने एकदम बड़े स्वामी जी की तरह.. :)
खासकर ये
सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

वीनस केशरी ने कहा…

आज की पोस्ट पर अपना ही एक शेर कोट कर रहा हूँ

अर्ज है ...


खुद से मिल के, कर सकूं, बातें तो ऐसी हैं बहुत

आइने में पा के, खुद को, लापता रहता हूँ मैं

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

स्वामी जी की सीडी सुनने से अच्छा, देख लेते तो शायद नीद लाने के लिये और हथकन्डे अपना रहे होते..

बाकी सिर्फ़ इतना सोचिये कि ’ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है’..

तब भी बच्चा ’दिल’ न माने तो ’द लास्ट लेक्चर’ देखिये.. :)
http://www.youtube.com/watch?v=ji5_MqicxSo

नही तो टिपियाइये न.. अपना पैशन खत्म मत करिये.. :) अब देखिये आप तो आते ही नही..

boletobindas ने कहा…

जीवन का ये प्रशन कई बार मन में उठता है, पर हर बार सोच का दायरा उसके परे नहीं जा पाता....कुछ हैं जो जीवन की सार्थकता कई चीजों में ढ़ूंढ लेते हैं. पर हम आम इंसान के लिए कई सवाल हमेशा रहस्य ही रहते हैं....भगवान है, क्या आप मुझे दिखा सकते हैं...110 साल पहले नरेंद्रनाथ भारत भू पर पूछते फिर रहे थे, कई महारथी मिले, पर संतुष्ट नहीं हुए नरेंद्रनाथ....उन्हें आखिर परमहंस मिल गए...पर क्या हम नरेंद्रनाथ हैं....मालूम नहीं....सो कुछ दूर इन महापुरुषों के साथ इनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करता हूं....पर 1 कदम भी ठीक से चलना असंभव लगता है....क्या हो पाएगा ये सब.....मालूम नहीं....तब तक जबतक नींद नहीं आएगी....अनेक सवाल जेहन से टकराते रहेंगे....

मनोज कुमार ने कहा…

कस्तुरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे वन माहिं ।
एसे घटि-घटि राम है, दुनिया देखे नाहिं ।।

Laxmi N. Gupta ने कहा…

समीर जी,

मेरी मानो तो और महात्माओं की जगह ओशो के सी डी सुनो। भगवान मिलें या न मिलें किन्तु जोक्स अच्छे हैं।

Manish ने कहा…

गुप्ता जी, ओशो की राय तो मैं भी इन्हें देने वाला था लेकिन ये बुरा न मान जाय सो चुप ही बैठा रहा :) :) जोक्स के अलावा भी सब अच्छा रहता हैं :) :)

khuljaasimsim ने कहा…

चाचा जी
नमस्ते !
अरे कान्हा सोने के चक्कर में पड़ पडा गए आप, मै तो कहता हूँ जो मजा जागते रहने में है वो मजा और कान्हा /
आप हमें ही देख लो ५० वर्ष होगये निद्रा का त्याग किये हुए /
इसलिए कहता हूँ '' जागते रहो ''

Narendra Kumar ने कहा…

मन की शांति केवल दूसरों को खुश देखने से ही मिलती है.कोई अन्य साधन हमें थोड़ी देर के लिए संतुष्ट भले ही करे,लेकिन स्थायी समाधान नहीं दे सकता.शांति तो भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग से ही प्राप्त हो सकती है.हमें दरिद्रों में नारायण को खोजना होगा.यही एकमात्र उपाय है.जो संत स्वयं धर्म का व्यवसायीकरण कर रहें हैं,दूसरों को कैसे शांति दे सकते हैं.

Narendra Kumar ने कहा…

मन की शांति केवल दूसरों को खुश देखने से ही मिलती है.कोई अन्य साधन हमें थोड़ी देर के लिए संतुष्ट भले ही करे,लेकिन स्थायी समाधान नहीं दे सकता.शांति तो भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग से ही प्राप्त हो सकती है.हमें दरिद्रों में नारायण को खोजना होगा.यही एकमात्र उपाय है.जो संत स्वयं धर्म का व्यवसायीकरण कर रहें हैं,दूसरों को कैसे शांति दे सकते हैं.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बहुत बढ़िया!

अभिषेक ओझा ने कहा…

नींद ना आये तो कोई भारी गणित की किताब पढने की कोशिश कीजिये. २ मिनट में आएगी :)

रंजना ने कहा…

दस रुपये की सी डी सौ रुपये में बेच स्वामी जी यदि इच्छा की गठरी फेंकने को कह रहे हैं तो,सोचना चाहिए कि किसी गठरी को बड़ा करने के निमित्त ही तो स्वामी जी भी यह कर रहे हैं...
अब इसके सहारे गठरी कैसे फेंकी जा सकती है भला...

गहरी बातें कहीं आपने...बहुतों के काम में आने लायक...वो भी मुफ्त ही,बिना सी डी का दाम लिए...
अब कहिये बड़े बाबा कौन हुए...

वैसे नींद न आने का एक बड़ा कारण यह भी होता है कि हम
शारीरिक रूप से इतना थके नहीं हैं जितने के बाद एक स्वस्थ सुखद नींद अपने आप पलकों पर सवार हो हमें पटक दे..

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... दार्शनिक भाव ....दार्शनिक होते जा रहे हो समीर जी,बधाई!!!!

amit ने कहा…

कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा

किसी भी जीव से (चाहे मनुष्य हो या पशु), उसकी चाह को अलग नहीं किया जा सकता, चाह विहीन जीव तो मृत समान है, क्योंकि जब किसी भी चीज़ की चाह न रह जाए तो जीवन का औचित्य समाप्त हो जाता है!

बस इतना ही कहूँगा फिलहाल, आपकी पोस्ट ने मन-मस्तिष्क के कुछ तारों को छेड़ा है, डीप रूटिड फिलासोफ़ी है, और इस समय मूड नहीं है! ;)

Parul ने कहा…

koi yun hi nahi kehta ki vo khud se ajnabi hai,pehchaan uski khud mein hi kahin dabi hai.. :)

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! उम्दा प्रस्तुती! बधाई!

S B Tamare ने कहा…

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति /

समः सर्वेषु भूतेशु मद्भक्तिम लभते पराम //

- श्रीमद भगवद गीता [१८.५४ ]

इस प्रकार जो दिव्य पद पर स्थित हो जाता है , वह फ़ौरन-से-पेश्तर परम ब्रह्म का तजुर्बा करता है / वह न तो कभी गमजदा होता है और न ही किसी वस्तु की ख्वाहिश फिर करता है , वो सभी में फर्क को भी फिर नहीं कबूलता , यही वो आला-ये-वजूद है जब ''उसे'' मेरी भक्ति प्राप्त होती है /

जनाब समीर लाल जी ,

बड़ा ही हसींन लेख लिखा आपने मजा आ गया मगर जिस मुकाम पर आपसे मंजिल तक पहुंचाने की उम्मीद थी वंहा आपने फिर से निर्विशेषवाद और शून्यवाद की तरफ लाकर लेख खत्म कर दिया , मै यंहा आपको नहीं उपरोक्त दोनों वाद को कसूरवार ठहराता हूँ क्यों कि इन दोनों ने ऐसी फिजा बाँध दी है कि हम भौतिक आनंद से परे कुछ भी नहीं सोंच पाते और इसके आदि बन चुके है / जब कि आनंद सर्वोच्च पुरूष के बाबत होना चाहिए [ पुरुषः स परः ]

आध्यात्मिक कैनवास पर हम भगवान से आमने-सामने गुफ्तगू कर सकते है , उसके साथ खेल-कूद सकते है और तो और डिनर भी कर सकते है , परन्तु शर्त ये है कि हमारी सेवा -भक्ति में कोइ मिलावट नहीं हो / आपने सच्च कहा मगर स्टिक शब्दों में नहीं कहा जो अब मै कहता हूँ कि ईश्वर से मुहब्बत बिना किसी भौतिक मुनाफे की उम्मीद से होनी चाहिए वरना मिलावट वाली बात हो जाए गी /

गोस्वामी तुलसी दास जी के कथन कि ''भय बिनु होवहि नहीं प्रिती'' को आपने अपने लफ्जो में बयान किया जिससे मै इतेफाक नहीं करता क्यों कि मेरा समझना है कि हमारे हालात किसी लम्बे समय से बीमार बन्दे जैसे है जो बिमारी की वजह से ''असल आनंद'' को महसूस नहीं सकता / मसलन किसी जोंडिस पीड़ित सक्श को ले , एक शेहदमंद की बनिस्पत वो शक्कर खाए गा तो स्वाद मिट्ठे की जगह कडवा लगेगा / ठीक उसी तरह विषयासक्त होने से हमें ''असल आनंद '' उर्फ़ भगवत भाव फिक्का लगता है यदि सचमुच हमें भौतिक दुःख [ निद्रा रोगादि ] से पार पाना है तो हमें जिस्मानी जरूरतों को कम करना होगा और सुखो से मुक्ति पानी होगी /

यथा ''गीता'' अनुसार -

भोगैश्वर्या प्रस्क्तानाम तयापहृतचेतसाम /

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते // [२. ४४]

जो इन्शान भोग-विलास या भौतिक सुख में मोहग्रस्त हो जाते है उनके हृध्य में भक्ति का दृढ निश्चय पैदा नहीं हो सकता / फिर भी निरंतर अभ्यास शायद कभी तो सफल हो जाये गा इस वास्ते जो सर्वोपरि है वो ये है कि हम गाते रहे ---''हरे कृष्ण हरे कृष्ण ! कृष्ण कृष्ण हरे हरे , हरे राम हरे राम ! राम राम हरे हरे !

पुनश्च, उत्तम लेख के लिए आपको शुक्रिया !शुक्रिया !शुक्रिया !

प्रतिश्रुति ने कहा…

इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. ..ऐसा कतई नहीं है। जब न डरे हुए हों, तब आइए अध्यात्म की राह, देखिए यह कैसा खूबसूरत मार्ग है...(अध्यात्म, धर्म से गड्डमड्ड न हों कृपया)

gaurtalab ने कहा…

swami ji bhi agar ghar -grihasti ke chakkar mein pade hote to unhe bhi nind nahi aati..aaj kal sant banna kahi jayada aasan hai.

singhsdm ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...
यह त्रिवेणी अपने आप में मुकम्मल पोस्ट है.....................बेहतरीन लेखन के लिए बधाई.

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है. .....आपने तो बहुत काम की बात बता दी है | आपका सोने का समय ही गलत है जिस समय आप सोते है हम जाग रहे होते है इस लिए आपको नींद कैसे आ सकती है | वैसे भी बाबाओ के प्रवचन सीधे लोगो को बेवकूफ बनाने के काम आते है आप जैसे बुद्धीजीवी लोगो के किसी काम के नहीं है |

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

लगता है अगला संकलन भी ब्लॉग की तरह रिकार्ड तोड़ेगा ......!!

के.आर.रमण ने कहा…

डी-फार्मेटिंग अर्थात् फिर से रॉ बन जाने का प्रयास ही एकमात्र रास्ता प्रतीत होता है। बालसुलभ हृदय और मन। खूब थके और छक के सोए। अगली सुबह फिर नया दिन।

के.आर.रमण ने कहा…

डी-फार्मेटिंग अर्थात् फिर से रॉ बन जाने का प्रयास ही एकमात्र रास्ता प्रतीत होता है। बालसुलभ हृदय और मन। खूब थके और छक के सोए। अगली सुबह फिर नया दिन।

pallavi trivedi ने कहा…

नींद न आने से आप कितने आध्यात्मिक हो गए.....मुक्ति वुक्ति की बात करने लगे! आपको चुपचाप से दो चार ब्लॉग्स के नाम बता दूंगी! उनको पढने से अच्छी नींद आ जाएगी!

Yatish ने कहा…

बहुत खूब !!!

कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
http://qatraqatra.yatishjain.com/

SAMVEDANA KE SWAR ने कहा…

रात के दो बजे लिखने बैठा हूँ, ताकि मह्सूस कर सकूँ आपकी बात को....
गहन रात्रि में, जब मंद मंद समीर का स्पर्श, तन और मन को शीतलता प्रदान करता है, तब सड़कों के फुटपाथ पर न जाने कितनी आदम की संतानें बिना बाबा की सी.डी. और बिना नींद की गोली खाए सोती मिलेंगी... एक पाक नींद के आगोश में सोए इन लोगों की नींद कभी कभी न टूटने वाली नींद में भी तबदील हो जाती है, जब कोई सिरफिरा इनके उपर से अपनी गाड़ी फिराकर निकल जाता है...ये वो मज़दूर हैं, जिनके पास नींद की दौलत है, क्योंकि
सो जाते हैं फुटपाथ पर अखबार बिछाकर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते.

चिराग जैन CHIRAG JAIN ने कहा…

नमस्कार
गत वर्ष आप मेरे ब्लॉग पर आए थे तथा "महावीर भगवान" पर रचित कविता की अनुशंसा की थी।
आपके स्नेह और शुभकामनाओं से मैंने अपने ब्लॉग को वेबसाइट में रूपांतरित कर दिया है।
इस वेबसाइट पर आपको निरंतर अच्छी और सच्ची कविताएँ पढ़ने को मिलती रहेंगी।
आपके सुझाव तथा सहयोग अपेक्षित है।
कृपया एक बार विज़िट अवश्य करें

www.kavyanchal.com

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

नींद का तो अब बुरा हाल है जब बहुत तलछट जमा हो गयी है। अन्यथा याद आता है कि इन्जीनियरिंग के दूसरे साल में चेपमेन की मशीन डिजाइन की किताब के आधे पन्ने पढ़ते पढ़ते जमुहाई और पूरा करते करते नींद पक्की आ जाती थी! :)

राजकुमार सोनी ने कहा…

ब्लाग जगत के अभिताभ बच्चन उर्फ उड़न तश्तरी जी को मेरा प्रणाम,
भाईसाहब आपका प्रोत्साहन मुझे हर समय मिलता रहा है। मैं ही धामड़ आपको जवाब नहीं दे पाया।इस बीच अवलोकन करने पर मैंने पाया है कि आपके बड़े ही जबरदस्त समर्थक है। जाहिर सी बात है कि ऐसा उस आदमी के साथ होता है जो सबका सम्मान करना जानता है। आपसे लंबी बातचीत करने की इच्छा है, लेकिन इधर ललित भाई ने बताया कि आपकी किताब भी आ गई है। यदि यह किताब नेट को छोड़कर कहां और कैसे मिलेगी मुझे बताए.. मुझे लगता है कि जैसा आपका किरदार है उस लिहाज से किताब भी बेहद अच्छी होगी। मैं किताब पर कुछ लिखना भी चाहूंगा।
अरे हां.. ब्लागजगत का अभिताभ मैंने आपको इसलिए लिखा है क्योंकि एक अभिताभ ही है जो सबके साथ फिट है।

राजकुमार सोनी ने कहा…

ब्लाग जगत के अभिताभ बच्चन उर्फ उड़न तश्तरी जी को मेरा प्रणाम,
भाईसाहब आपका प्रोत्साहन मुझे हर समय मिलता रहा है। मैं ही धामड़ आपको जवाब नहीं दे पाया।इस बीच अवलोकन करने पर मैंने पाया है कि आपके बड़े ही जबरदस्त समर्थक है। जाहिर सी बात है कि ऐसा उस आदमी के साथ होता है जो सबका सम्मान करना जानता है। आपसे लंबी बातचीत करने की इच्छा है, लेकिन इधर ललित भाई ने बताया कि आपकी किताब भी आ गई है। यदि यह किताब नेट को छोड़कर कहां और कैसे मिलेगी मुझे बताए.. मुझे लगता है कि जैसा आपका किरदार है उस लिहाज से किताब भी बेहद अच्छी होगी। मैं किताब पर कुछ लिखना भी चाहूंगा।
अरे हां.. ब्लागजगत का अभिताभ मैंने आपको इसलिए लिखा है क्योंकि एक अभिताभ ही है जो सबके साथ फिट है।

JHAROKHA ने कहा…

bahut hi achha likha hai aapne. es baat se jude aur logon ke liye bhi nishchit hi es samasyya se nikalane ka marg milega.

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

सर मैं आपकी बातों से सहमत हूं...हिन्दुस्तान से इतनी दूर रहने के बावजूद...आपको आज भी हिन्दी से बेहद लगाव है...लोग देश छोड़कर निकलते हैं और अपनी संस्कृति को ही भूल बैठते हैं...लेकिन आप ना केवल हिन्दी को अपना योगदान दे रहे हैं बल्कि वहां की मिट्टी में हिन्दी को पहचान भी दिला रहे हैं...मैं आपकी इस मुहिम से काफी प्रभावित हूं...मुझे लगता है हिन्दी भाषा पर आपकी पकड़ काफी मजबूत है...आपके ब्लॉग से काफी कुछ सीखने को मिला...मैं हिन्दी से पी.जी कर रही हूं और फिलहाल मीडिया जगत से जुड़ी हूं...मुझे आपका मार्गदर्शन बेहद पसंद आया...
-मधु चौरसिया
madhu.chrs@gmail.com

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

सर मैं आपकी बातों से सहमत हूं...

राइना ने कहा…

शुक्रिया.

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत घना भाव है!

Ravi Rajbhar ने कहा…

Bahut sunder post hai sir,
mere blog par padhar kar hame kirtarth karen...!

बेचैन आत्मा ने कहा…

छोडना भी बुरा पकडना भी बुरा
चाहना भी बुरा न चाहना भी बुरा
अच्छा तो सिर्फ वर्तमान में जीना है।
---सुंदर पोस्ट।

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

आदरणीय भाई जी ,
अद्भुत समर्पण है आपका भी और मै तो अपना सौभाग्य मानता हूँ जो आप की बहुमूल्य राय तुरंत मिलजाती है /आभारी हूँ और आपकी त्वरा से आनंदित भी/अपनी पुस्तक कृपया भेजिए ,अब इच्छा हो गयी है /मेरा पता -डॉ .भूपेन्द्र ,फ्लैट न. ६,गोपालपुर टावर ,ताला हाउस ,रीवा४८६००१ इंडिया

हर्षिता ने कहा…

जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती प्रस्तुति।

Vaibhav ने कहा…

कसम से आपकी क्रपा से 100 रुपये बच गये सीडी के, आप भी आध्यात्म में डूब गये से लगते हैं :)

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मन में ही विचार उठ रहें हैं .मन से ही
प्रवचन सुन रहें हैं तो सत्य कैसे पता
चलेगा..इसके लिये मन की सीमा से
पार जाना सीखना होगा..
गो गोचर जहाँ लग मन जाई
सो सब माया जानो भाई..
इंद्रियां और उनके विचरने की
सीमा तक मन और माया का ही खेल
है .गन्दगी से गन्दगी साफ़ हो सकती है
क्या ..जीव जागते हुये भी सो रहा है
और सोते हुये भी सो रहा है..ये ठीक है
कि संतो के नाम पर आज पाखंडियों
की भरमार है पर संसार में झोलाछाप
डाक्टर ही नहीं है .अच्छे डाक्टरों की भी
कमी नहीं ..पर तुम्हें इलाज अच्छा ही नहीं
लगता..माया का नशा सहज नहीं उतरता..
एक बात और..धन ,सम्पत्ति को माया नहीं
कहते ..जहाँ जीव का मन फ़ँस जाय वही माया
है..इस मन को कंपन में लगा देने से ये मर जाता
और माया रहित सत्य नजर आने लगता है..
रजीव

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बाप रे आपको तो अब तक नींद आने के कई नुस्खे मिले चुके हैं .....देर हो गयी यहाँ तक आने में :)

zeal ने कहा…

Kindly lend me that CD. It will certainly cure my Insomnia. Accolades for swami ji who created such a wonderful drug ( CD ) to induce sleep.

Jokes apart...

Sameer ji, after reaching this stage, nothing can bring peace to mind.Swamis and CDs and Philosophies, everything fails at this juncture. A person feel detached.

Vanity of vanities !

Solution?

talk to a child...give two minutes to doodhwala..use public conveyance for a day and talk to taxiwala...go and spend an hour in any OPD....listen to someone !

Dusron ki 'gathree' dekhi to apni bahut halki lagi...

Smiles !