रविवार, मार्च 14, 2010

सो कॉल्ड एलीट ग्रुप

सो कॉल्ड एलीट ग्रुप- तथाकथित अभिजात्य वर्ग. आम लोगों की पहुँच से बाहर. आम जन के मानस पर हर वक्त यह छाया रहता है कि जाने कैसी दुनिया होगी उनकी.

एलीट वर्ग में कोई यूँ ही तो नहीं आ जाता-जरुर व्यस्त रहते होंगे. आम जन के बीच बैठ समय बिताने लगें तो फिर काहे के एलीट. बात समझ में आती है. लेकिन उनकी बात समझने में दिक्कत होती है जो आमजन से दूरी मात्र इस कारण कर बैठे हैं ताकि आमजन उन्हें एलीट समझे.

पर्याप्त दूरी बनाये रखने के लिए वो लबादा ओढ़े भले ही घर में दिन के उजाले में सोते रहेंगे और रात गये अँधेरे में यह पता करने धीरे से आकर झाँक जायेंगे कि आमजन ने मुझे एलीट समझना शुरु किया कि नहीं.

एक भय भी रहता होगा उनके मन में कि कहीं लोग पहचान न जायें कि मैं एलीट हूँ ही नहीं, बना एलीट हूँ. ये बात उन चार खास दोस्तों तक ही बनी रहे जो मेरे साथ खुद भी इस नाटक में शामिल हैं, तो ही ठीक. यह भी डर होता होगा कि कहीं उन चार में से एकाध एलीटता से उकता कर वापस अपने मूल खेमें में जाकर भंडा फोड़ न कर दें कि हम चारों रंगे सियार हैं.

ऐसे भयाक्रांत हो जीने से तो बेहतर है कि मूल खेमे में ही रहते हुए जीवन गुजारे भले ही कुछ कम सक्रियता रहे. सक्रियता तो यूँ भी एलीट दिखने के चक्कर में खत्म सी हो ही चुकी है.

हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.

ढोंग में समय न नष्ट करो. उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाओं. क्या पता तुम्हारे कार्य तुम्हें वाकई एक दिन एलीट वर्ग में ले जाकर खड़ा कर दें.

black_king

अब, एक लाल एण्ड बवाल की जुगलबंदी:

मौसम में घटा जब, सुहानी आ जाए
ठहरी हुई लहरों में, रवानी आ जाए

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए

बज़्म फिर रज़्म में, आज बदले नहीं
फिर न बातों में मज़हब-ज़बानी आ जाए

बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

चाँद के कारवाँ के सितारों का नूर,
काश लेकर के उनकी, निशानी आ जाए

सख़्त नफ़रत में माहिर, ज़माने को भी
देखें शायद, यूँ उल्फ़त, निभानी आ जाए

***

बज़्म= सभा, महफ़िल
रज़्म= युद्ध

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93 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

फिर न बातों में मज़हब-ज़बानी आ जाए बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए चाँद के कारवाँ के सितारों का नूर,

खासकर इन पंक्तियों ने रचना को एक अलग ही ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया है शब्द नहीं हैं इनकी तारीफ के लिए मेरे पास...बहुत सुन्दर..

संजय भास्कर ने कहा…

aadarniya sameer ji
मेरे पास शब्द नहीं हैं!!!!
tareef ke liye

ललित शर्मा ने कहा…

चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.

बहुत बढिया ज्ञानवर्धक सुक्ति।
बुकमार्क कर लिया है।
आभार
राम-राम

Priya ने कहा…

elite vastav mein ho na ho....lekin dikhawa chalan mein hai....ye rog infectious disease ke jaisa fail chuka hai....Yakeenan!ek din dharti par ye kuleen,sabhya, sophisticated log badh jaayege....khud ko achcha dikhane ki hod mein aise- waise bhi kuch kar jayenge...rachna jordaar hai

Arvind Mishra ने कहा…

तक़रीर और गजल दोनों बस पूँछिये मत हम भी पढ़कर इलीट हुए
आप की भावनाएं ऐसी ही रहें कभी डिलीट न हों

बेचैन आत्मा ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
..वाह, क्या बात है! इस गज़ल का यह शेर ऊपर की एलीट चर्चा से मेल खता है.
..दरअसल लोग वही नहीं होते जो कि वे होते हैं. न जाने क्यूँ अपने सम्पूर्ण जिस्म में इतना चन्दन-मंदन पोत लेते हैं कि सुंदर तो दिखते हैं मगर खुश नहीं रह पाते..!.. हमेशा डरते रहते हैं. हम जो हैं वैसे ही दिखने लगें तो जीवन जीना बहुत सरल हो जाएगा.

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बढ़िया ज्ञान वर्धक लेख |

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Sadhana Vaid ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ हैं ! ना जाने कुछ लोगों में इतनी हीन भावना क्यों होती है कि वे अपने मूल स्वरूप के ऊपर झूठ का लबादा ओढ़े रहते हैं ! जो सच नहीं है उसे सच दिखाने की कोशिश ही उन्हें ले डूबती है ! बहुत ही बढ़िया आलेख !

राजेश स्वार्थी ने कहा…

आपका इशारा किन लोगों की तरफ है, बहुत साफ साफ समझ आ रहा है.

योगेश स्वप्न ने कहा…

sachai bayan karti, gazal ke sath ek khoobsurat prastuti, behatareen.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सही कहा , मुखौटे आखिर कब तक काम आयेंगे ।

बज़्म फिर रज़्म में, आज बदले नहीं
फिर न बातों में मज़हब-ज़बानी आ जाए

क्या बात है । बहुत बढ़िया ।

RaniVishal ने कहा…

Bahut acchi post acchi bhavnae liye....Gazal bahut khubsurat hai pad kar dil khush ho gaya.
Dhanywaad

ओम आर्य ने कहा…

चलिए आपने लोगों को याद दिलाया...देखिये शायद कुछ असर हो

अजय कुमार ने कहा…

पर्दे में रहने दो , पर्दा न उठाओ

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सच्चाई यही है की जिंदगीं में ढोंग करके टाइम नष्ट करने से कुछ हासिल नही होता क्षणिक भर के लिए कोई मान भी ले तो क्या फ़र्क पड़ेगा एक दिन हक़ीकत तो सामने आ ही जाएगी...बढ़िया बात कही आपने..

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए..

सुंदर शेर...बधाई

seema gupta ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

"जिन्दगी से जुड़े छोटे बड़े वाक्यों को सहजता से प्रस्तुत करने की आपकी एक अनोखी कला है. " बेहद सुन्दर जुगलबंदी , खास कर ये पंक्तियाँ बहुत भा गयी...."

regards

वाणी गीत ने कहा…

जिंदगी भर मूल खेमे में रहे ...बहुत सही कहा ...
और एलिट का चक्कर तो एलिट ही जाने ...
ना एलिट रहे न ही एलिट रहने की कोई ख्वाहिश रही कभी ...
अपनी सहजता के लिए ही जाने जाते रहे हैं ...बचपन से ...:):

सख़्त नफ़रत में माहिर, ज़माने को भी
देखें शायद, यूँ उल्फ़त, निभानी आ जाए ....
बहुत खूब ...

कारस्तानियाँ सारी मेरी नफ़रत मिटाने की रही
देखा मगर जिंदगी और उलझती रही ....

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

हम तो इसीलिये अपनी औकात मे और अपने रामप्यारे के साथ रहते हैं. हम इस एलीट का फ़ंडा बहुत पहले समझ चुके हैं. जो एलीट बने बैठे रहते हैं उनसे जरा उनकी पीडा पूछिये.

लाल और बवाल तो दो श्रेष्ठताओं का एक साथ मिलन है. बहुत सुंदर रचना. लाल साहब और बवाल साहब दोनों को शुभकामनाएं.

रामराम.

खुशदीप सहगल ने कहा…

जाने हम सड़क के लोगों से,
महलों वाले क्यों जलते हैं,
इनसान नहीं वो मौसम हैं,
जो वक्त के साथ बदलते हैं...

जय हिंद...

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI ने कहा…

आपसे मुलाकात सुखद लगी.अब नए सफ़र में नियमित रूप से मिलते रहेंगे,विचारों में ज़रूर एलीट बनें रहें !

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मगर यह बात उस सो कॉल्ड एलीट ग्रुप की समझ से बाहर की है तभी तो वे एलीट श्रेणी में आते है !

ओम सोनी ने कहा…

बहुत खुब। दिल खुश हो गया।

संगीता पुरी ने कहा…

चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.

ढोंग में समय न नष्ट करो. उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाओं. क्या पता तुम्हारे कार्य तुम्हें वाकई एक दिन एलीट वर्ग में ले जाकर खड़ा कर दें.


कमाल की सीख दी है आज आपने !!

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

leadership is not a position, its an action...

एलीट ग्रुप को ये समझना चाहिये.. :)

अजित वडनेरकर ने कहा…

हम तो सिर्फ ये जानते हैं कि आपकी महफिल में जो एक बार आ गया, फिर वो एलीट बना इतराता घूमता है....

संजय बेंगाणी ने कहा…

ब्लॉग लेखन भी एलिट क्लास वाला काम है, मगर अंग्रेजी में. कोई बात नहीं कभी हिन्दी वाला भी एलिटी कार्य हो जाएगा.

Babli ने कहा…

बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए
ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए..
अद्भुत सुन्दर पंक्तियाँ! आपकी जितनी भी तारीफ की जाए कम हैं! लाजवाब और उम्दा पोस्ट!

kshama ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए ..
Kya gazab likhte hain aap..alfaaz nahi milte ki kuchh kaha jay..

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

स्वयं की खोज

Parul ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए
khoobsurat alfaaz!

HARI SHARMA ने कहा…

shaandaar sameer dadaa

rashmi ravija ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
सुन्दर पंक्तियाँ...
ऐसे एलिट होने से क्या फायदा....कि हर पल खुद को असुरक्षित महसूस करते रहें...

अल्पना वर्मा ने कहा…

--100 baton ki ek baat kahi--अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है--

Ghazal bhi bahut achchee lagi.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

mulamma to ek n ek din utarta hi hai. bahut achchha. ghazal, kavita jo bhi kahen man ko moh gayi.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
waah

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए


पोस्ट के साथ-साथ रचना भी बहुत बढ़िया है!
इसे इच्छा कहें या सन्देश!
अगर दोनों ही कहें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी!

अमिताभ मीत ने कहा…

सख़्त नफ़रत में माहिर, ज़माने को भी
देखें शायद, यूँ उल्फ़त, निभानी आ जाए

बढ़िया है सर !

dev ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

Kammal hai. Mubarak ho.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सख़्त नफ़रत में माहिर, ज़माने को भी
देखें शायद, यूँ उल्फ़त, निभानी आ जाए

बहुत सुन्दर जुगलबंदी और कुछ शिक्षा भी देती आपकी पोस्ट....आभार

जी.के. अवधिया ने कहा…

"चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते."

बिल्कुल सही कहा आपने!

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.
गागर में सागर भर दिया आपनें,उम्दा चिंतन.

Md Firoj Akhtar ने कहा…

good blog

shikha varshney ने कहा…

अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.
laakh take ki baat......
sundar prastuti.

अभिषेक ओझा ने कहा…

जो हैं वही तो रहेंगे ! और उसमें बुराई भी क्या है. ये सन्देश 'सो काल्ड...' वालों की समझ में कहाँ आएगा?

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सही कहा ...मुखोटा है जब तक चले तब तक चले जुगलबंदी बहुत पसंद आई बेहतरीन शुक्रिया

Shefali Pande ने कहा…

bahut badhiya lekh hai....us par jugalbanee ne kamaal kiya hai....laal aur babaal, donon ko salaam..

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

एलिट बनने में दुख ज्‍यादा है सुख कम है। मैं तो उकता गयी हूँ इस प्रश्‍न से कि क्‍या आपके पास समय है? मैं अक्‍सर सभी से कहती हूँ कि एकदम ठाली हूँ आप तो काम बताएं। लेकिन वो फिर नहीं मानता कि अरे आपका बडप्‍पन है, बस आप थोड़ा समय दे दें। सच समीर जी एकदम खास होने में जो मजा है वो अभिजात्‍य में नहीं। लेकिन कुछ लोग है वे तभी आपको सम्‍मान देते हैं जब तक की आप के पास समय नहीं है। इसलिए ही लोग समय नहीं है का ढोंग रचते हैं। आपकी गजल की तो सभी ने तारीफ की है, इसलिए उसके लिए तो मैं क्‍या लिखू? मैं तो आपके गद्य की प्रशंसक हूँ।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बढ़िया पोस्ट. एलीट दिखना फैशनेबल होगा.

सबसे बढ़िया लगी लाल और बवाल की जुगलबंदी. पढ़कर आनंद आ गया.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

क्या कहने जी।

दीपक 'मशाल' ने कहा…

पुराने ज़माने में उम्दा बातों या चीज़ों पर कुछ न्योछावर करने की रीत होती थी.. अगर आज आपकी इस पोस्ट पर कुछ न्योछावर करना चाहूं तो बिक जाऊँगा, पर न्योछावर पूरी ना होवेगी..

M VERMA ने कहा…

चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते.

पर चाँदी दुबकी हुई है मिट्टी की परतो के बीच और चाँदी की परत चढे हुए चमक रहे हैं एक अर्से से.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

मैंने अभी अभी कहीं टी आर पी का लफड़ा तो नहीं के अंतर्गत लिखा है
"अच्छे रचनाकार इन सब बातों की चिंता भी नहीं करते. उनका तो टी आर पी तो स्वयमेव बढ़ा हुआ रहता है" शत प्रतिशत लागू होता है यहाँ. श्री लाल जी के इस पोस्ट में "हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है....
बहुत सुन्दर... और वैसे भी समीर भाई साहब हमेशा किसी को ठेस पहुंचाने वालों में से नहीं हैं. सभी को प्रोत्साहित ही करते हैं. क्या इनसे सीखा नहीं जा सकता?

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

"अच्छे रचनाकार इन सब बातों की चिंता भी नहीं करते. उनका तो टी आर पी तो स्वयमेव बढ़ा हुआ रहता है" हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है. ढोंग में समय न नष्ट करो. उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाओं. क्या पता तुम्हारे कार्य तुम्हें वाकई एक दिन एलीट वर्ग में ले जाकर खड़ा कर ....
यहाँ यह सिद्ध कर रहा है कि ऐसे रचनाकार कभी टी.पी.आर. के भूखे नहीं रहेंगे. क्या बढ़िया बातें लिखी हैं. वैसे भी समीर भाई साहब को हमने देखा हमेशा प्रोत्साहित करते. कोई भीअन्यथा टिपण्णी नहीं करते...... बहुत सुन्दर

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना जी धन्यवाद

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

इन्ही एलीयाटीयो से तो मुश्किल मे पड जाता है समाज

चंदन कुमार झा ने कहा…

बेहतरीन !!!

AMIT TIWARI 'Sangharsh' ने कहा…

वाह...
वाकई में... आपके अन्दर वो कला है कि आप जो भी विषय छू लेते हैं.. बढ़िया बन ही जाता है.. एक अति सामान्य सी लगने वाली बात पर एक बेहतरीन प्रस्तुति...

amit ने कहा…

बात तो आप ठीक ही कह रहे हैं पर उस ईगो का क्या किया जाए, उसको भी तो सहलाना आवश्यक है, इसलिए उन लोगों द्वारा एलीट क्लब बनाया जाता है जो बाकी किसी चीज़ में आम जन से अलग नहीं होते! अब दो तरह के एलीट होते हैं ना, जो किसी कारण से एलीट होते हैं (संपत्ति, इंटलेक्ट, पॉवर, इत्यादि) और जो खामखा एलीट होते हैं!! ;)

S B Tamare ने कहा…

भगवन !
आखिरी दो लाईनों ने उछल उछल के खूब दिल को छुआ !
जो खिलाफत के खिलाफ किसी पहाड़ जैसे जज्बे वाले की उम्मीद की बानगी है , मुबारक !
बांकी रह गयी बात एलियन गुरुप उर्फ़ अभिजात वर्ग उर्फ़ उच्चे लोगो कि तो ये तो दानिशमंदी कम और पसंद या ना-पसंद का जाती मामला बनता है वैसे ये तो जाहिर सी बात है कि , यदि निशाचर ना हो तो इन्शान तो फिर पहचान के खतरे के मुहाने पर ख़ुदकुशी को तैयार खडा मिले गा / वैसे जिस मुर्गे की कलंगी बड़ी और फुदनेदार ज्यादा हो तो वो मुर्गा मुर्गियों के बिच पहचाना खूब जाता है /
पुनश्च, साफगोई भरा अंदाजे बयान खूब पसंद आया मुझे /
अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया !

MADHUKAR SARAN ने कहा…

आप को नववर्ष की शुभकामनाएं.......

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
बहुत शानदार.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बातो बातों में ही आप बहुत कुछ कह गये और हमारे जैसों को तो साथ में सीख भी मिल गई :-)

"इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए"
गजल की ये पंक्तियाँ तो कमाल की लगी!!
बेहतरीन!

Srijan ने कहा…

यहाँ चेहरों पर चढ़े हैं कईं चेहरे.......
यही बात आप कह गए गहरे, impressive

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

समीर भाई
इशारा किस की ओर से ये तो समझी नहीं :)
Who is this " Elite " ??
परंतु रचना और आलेख हमेशा की तरह उम्दा लगे
स्नेह सहित,
चैत्र नवरात्र की मंगल कामना
- लावण्या

शरद कोकास ने कहा…

समीर भाई , आपने इन सो काल्ड एलीत्स के बहुत थोड़े गुणधर्म बताये। अब तो इन लोगों की दूसरी तीसरी पीढ़ी आ गई है और यह वह थोड़ी बहुत शर्म भी बेचकर खा गये हैं जो इनके बाप-दादा के पास थी । अब इन्हे अभावों के सुख की इस दुनिया में लौटाकर लाना कठिन है । ठीक है इनका साथ न सही .. हमे क्या ?

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

नववर्ष विक्रमी सम्वत् २०६७ मंगलमय हो। शुभकामनाएँ।

Rekhaa Prahalad ने कहा…

नववर्ष विक्रमी सम्वत् २०६७ मंगलमय हो। शुभकामनाएँ!

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

बहुत सुन्दर भाव..खूबसूरत रचना..बधाई !!
______________
आपको भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2067 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!

इंदु पुरी ने कहा…

चाहता था कि लगा लूं गले आगे बढ़ कर
या ठहाके मार कर हँसु खुल कर
किसी मस्त धुन पर थिरकू मैं भी
या रो लूं सबके सामने जी भर कर
खुद से ही दूर हो गया 'एलिट' बन कर
गर्व से कहता हूँ जानता नही पड़ोसी को
मुस्कराता भी नही उसके नन्हे बच्चे से मिल कर
खुद के चारों खड़ी कर दी दीवारें इतनी
कि अपने आप से बेगाना हो गया
डरने लगा हूँ खुद से ,समीरजी !
कभी खोल से निकल ना जाऊं
जो हूँ किसी दिन उसी रूप में ना आ जाऊं
जो ख़ूबसूरती थी मेरी दरअसल
शायद दोबारा ना उसे पा पाऊँ
'एलिट' भी ना बना 'आम' को भी भूल जाऊं

KK Yadava ने कहा…

चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.
..........ऐसे लोगों पर सटीक व्यंग्य..बेहतरीन प्रस्तुति !!

____________

शशांक शुक्ला ने कहा…

आखिर लोग इलीट क्यों बनना चाहते है?क्या वो अपनी जीवन शैली से परेशान हो गये है। या दूर के ढोल सुहावने लगते है

sangeeta swarup ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए

*****

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी...खास तौर पर ये शेर तो गज़ब के हैं.....बधाई

pukhraaj ने कहा…

जिन्दगी में कुछ ऐसा भी करते चलें ,
की मौत पर छप कर कहानी आ जाए ,
सख्त नफरत में माहिर जमाने को देखें '
शायद यूँ उल्फत निभानी आ जाये

ये सभी बाते आपके कथन को ... उस एलीट क्लास को ....स्पष्ट कर देती हैं

Ram Krishna Gautam ने कहा…

Very Nice Post Sir...



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http://dhentenden.blogspot.com



Ram Krishna Gautam

रंजना ने कहा…

"इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए !!!"


इसे सहेजकर रख लिया अपने पास...

बेजोड़...लाजवाब...बेहतरीन....

निर्मला कपिला ने कहा…

वाह वाह हम ति ईलीट होने से रह जाते अगर आज ये पोस्ट न पढते क्या जुगलबन्दी है गज़लें पढ कर आनन्द आ गया। धन्यवाद

zeal ने कहा…

So called elite people...

"Dhobi ke kutte, na ghar ke na ghat ke"

zeal ने कहा…

kuchh galat likh diya kya?

Mayur Malhar ने कहा…

bhaut sunder sirji maza aa gaya

anjana ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

बहुत ही बढिया है ये पंक्तिया...

सुमन'मीत' ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए
कहानी अकसर मरने के बाद ही बना करती है
really touching
suman'meet'

अबयज़ ख़ान ने कहा…

अब राजा और रंक का फर्क तो मिटने लगा है.. लेकिन अमीर और गरीब की खाई और गहरी होती जा रही है.. जुगलबंदी बहुत ही शानदार है.. आपके लिखे पर कमेंट्स करना तो चिराग को लौ दिखाने के बराबर है...

ज्योति सिंह ने कहा…

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए
bahut hi shaandaar aur laazwaab rahi dono rachnaye .

manu ने कहा…

कविता पर आज ध्यान नहीं जा रहा..
आपका लेख पढ़ कर सोचने पे मजबूर हैं फिलहाल...

हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ?

Neha ने कहा…

aapki lekhni ke baare me kuchh bhi kahne layak main khood ko nahi samajhti....to meri or se dhanyawaad is saugaat ke liye.....aur navvarsh ki shubhkamnayen

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

banavati chehara..ant me bahut dukh deta he..fakkhad rahne ka apna mazaa hotaa he..jese ham he.kher..
jugalbandi vakai..umda he..vese yah aapki beshkeemati pratibha he ji jo hame aanand ke saagar me le jati he

चन्दन कुमार ने कहा…

धन्यवाद सर आपने वह रचना मुझे भेजी..........बहुत बहुत शुक्रिया

ज्योति सिंह ने कहा…

हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.

ढोंग में समय न नष्ट करो. उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाओं. क्या पता तुम्हारे कार्य तुम्हें वाकई एक दिन एलीट वर्ग में ले जाकर खड़ा कर दें
bahut khoobsurat nasihat ,aml bhi kiya jaaye to aur bhi behtar rahe .

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut achi gajal likhi ha bahut2 badhai...der se hi sahi :]

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

आज तो आपने काफी अंदर की बात बता दी है| बढ़िया लेख है |

Kulwant Happy ने कहा…

देर से आता हूँ, लेकिन सच में बहुत कुछ अधिक पाता हूँ, बहुत कुछ अधिक पाता हूँ।

उम्र रखे विचार और नीचे कविता अद्भुत थी। बहुत कुछ कह गए अलफाज आपके।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

ग़ज़ब भाई ... शेरो में कमाल है ...