शनिवार, मार्च 17, 2018

मुख्य चुनाव बड़े दगाबाज रे!!


हमारे समय में स्कूलों में बोर्ड परीक्षा से पहले प्रिपरेशन एग्जाम होते थे. हमारा भी रिकार्ड ऐसा रहा कि प्रिपरेशन एग्जाम का कोई रेजल्ट देख ले तो समझे इस बार बोर्ड की परीक्षा में तो मेरीट में पहला नम्बर इनका ही आयेगा. शहर के सारे कोचिंग क्लास वाले आकर फोटो ले गये, अपने विज्ञापन वाले होर्डिंग पर लगवाने के लिए. होर्डिंग बोर्ड छपवा भी लिए इस बाबत कि ये जो प्रथम स्थान पर आये हैं इन्होंने हमारी कोचिंग क्लास से पढ़ाई की है. बंदा एक, क्लेम करने वाले शहर के सारे कोचिंग वाले. जैसे जब सारे विपक्षी एकजुट होकर किसी को चुनाव लड़वा कर जितवा देता हैं तो सब क्लेम करते हैं कि हमारे कारण जीता, जबकि वो केंडिडेट भी जानता है कि वो जीता नहीं हैं, जनता ने सामने वाला को हराया है.
वैसे तो इन कोचिंग क्लासेस का कोई ध्यान से एनालिसिस करे तो जाने कि हम हम न हुए, सद्दाम हुसैन हो गये हैं. एक साथ दस जगह दिख रहे हैं जबकि हैं असल में ग्याहरवीं जगह. हम कभी किसी कोचिंग क्लास में गये ही नहीं. होर्डिंग बोर्ड पर टंगे अधिकतर बच्चों का यही हाल है. अगर वे कोचिंग में जाते तो मेरिट में आने के लिए पढ़ते कब? हमारे एक धनिक मित्र जब सुनते कि कोई बहुत मेहनत से काम कर रहा है पैसा कमाने की चाह में तो वह आश्चर्य करते कि जब सारा समय काम करने में ही लगा दो तो पैसा कब कमाओगे? कालांतर में वह मित्र विदेश में जा बसे और बैंकें टकटकी लगाये उनका इन्तजार कर रही हैं.
हम दरअसल गये तो उन मास्स्साब के घर ट्यूशन पढ़ने जिनकी देखरेख में स्कूल की परीक्षा होती थी. प्रिपरेशन एग्जाम स्कूल का इन्टरनल होता था, तो मास्साब की असीम कृपा बरसती थी. बोर्ड एग्जाम में न तो सेंटर खुद का स्कूल होता था और न ही अपने मास्साब इन्विजिलेटर अतः कृपा अटक जाती. तो जब बोर्ड एग्जाम का रेजल्ट आता तब भगवान ही मालिक होता. ले दे कर किसी तरह गुड सेकेन्ड डिविजन भी आ जाये तो प्रसाद चढ़ाने वाली बात समझो. जैसे कई लोग चुनाव में जमानत न जब्द होने को ही जीत मान बैठते हैं. कोचिंग क्लास वालों का तो ऐसा नुकसान होता कि कई तो बोर्ड भी नया नहीं पुतवाते. फोटो हमारी लगे रहने देते और नाम बदल कर जो पहला आया होता उसका लिख देते. कौन जाता है मिलान करने भला? उनके बोर्ड पर फोटो ही फोटो तो होती है..और होता भी क्या है? यह मंत्र इन्होंने मीडिया से सीखा है जिसके लिए कहा गया है कि बड़ी खबर को बड़ा बनाने के दायित्वों के बोझ के तले दबा मीडिया चैनेल दबते दबते कितना छोटा हो गया ये वो खुद भी न जान पाया..
होते तो दोनों ही एग्जाम थे मगर कितना फरक. वही सिलेबस, वही किताबें, उसी में से प्रश्न...जबाब देने वाला बंदा भी वही मगर परिणाम एकदम विपरीत. सब सेटिंग का जमाना है. सेटिंग है तो सारा जहाँ आपकी मुट्ठी में वरना आपकी हैसीयत मिल जाये मिट्टी में. चुटकी भर का समय लगता है.
ऊपर कही गई बातें भले मजाक लग रही हो मगर सत्य यही है. कभी तय करके कोई स्कूलों, कोचिंग आदि का सर्वेक्षण करे तो सत्य मिलता जुलता निकलेगा. बस, ध्यान रहे कि सर्वेक्षण सही का सर्वेक्षण हो, चुनावी नहीं.
कल ही ऐसी ही किसी बात पर हमसे कहा गया कि आप मजाक बहुत करते हो. हँसा हँसा कर पेट में बल पड़वा देते हो. कभी लॉफ्टर चैलेंज में ट्राई करो न?
मैं समझ ही नहीं पाता कि मैं बात विसंगतियों पर कर रहा हूँ और उनको चुभने की बजाय हंसी आ रही है, लॉफ्टर लग रहा है.
जब तक व्यंग्यकारों और मसखरों को एक ही नजर से देखा जाता रहेगा, व्यंग्य के माध्यम से तंत्र और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर किया गया तीखे से तीखा प्रहार और तंज बेअसर जाता रहेगा. समाज के ठेकेदारों और सियासत करती सरकारों को यही सुहाता है.
आज पान खाने निकले तो मुन्ना पूछने लगा कि ये चुनाव और उप चुनाव में क्या अंतर है? होते तो दोनों चुनाव ही हैं. दोनों से चुनकर नेता विधान सभा और लोकसभा में ही जाते हैं फिर दोनों के परिणाम इतने अलग अलग कैसे? उपचुनाव में जो पार्टी जीतती है वो चुनाव में नहीं जीतती और जो चुनाव में जीतती है, वो उप चुनाव में नहीं?
मुन्ना जिज्ञासु है, हल्की फुल्की दलीलों से सरकता नहीं. बात स्कूल वाला उदाहरण देकर समझाई. नेट प्रेक्टिस में प्लेयरों की परफोर्मेन्स का उदाहरण देकर समझाई और भी अनेकों अनेक उदाहरण दिये, तब जाकर वो इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विपक्ष को अपनी उर्जा मुख्य चुनाव में बेवजह खर्च नहीं करना चाहिये. उसे अपनी सारी उर्जा, धन, बल, दल बदल आदि सब उपचुनावों के लिए बचा कर रखना चाहिये. बस!! तय इतना करते चलें कि इतनी सीटों पर समय बेसमय मिलाकर उपचुनाव हो लें कि वे बहुमत में आ जायें. उपचुनाव किसी जीते नेता के द्वारा किसी वजह एवं पद प्राप्ति के कारण सीट खाली करने या दिवंगत हो जाने पर सीट खाली हो जाने पर करवाये जाते हैं. इसमें से कम से कम एक तो वो तय कर ही सकते हैं- भले वे किसी को कोई पद दिलवा कर सीट तो खाली नहीं करवा सकते मगर दूसरे में तो वो सक्षम हैं ही. नेता बने ही उस राजमार्ग पर चल कर हैं.
हमने तो कम से कम तय कर लिया है कि जब भी चुनाव लड़ेंगे, विपक्ष के उम्मीदवार बन उपचुनाव ही लड़ेंगे. मुख्य चुनाव तो बड़े दगाबाज रे!!
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मार्च 18, २०१८ :

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रविवार, मार्च 11, 2018

सिर्फ पाप का नहीं, धर्म का घड़ा भी फूटता है


हमें बचपन से सिखाया जाता है कि किसी की मदद करना हमारा धर्म है. याने कि अगर कोई गिरा मिल जाये तो उसे हाथ बढ़ा कर उठाना चाहिये. हम धर्म के निर्वहन के लिए इतने आतुर हो जाते हैं कि कई बार तो किसी को गिरा ही इसलिए देते हैं ताकि उठा पायें. आखिर धर्म भी तो निभाना है तो उसके लिए मौका भी बनाना है.
सरकार भी हम ही जैसे लोगों से बनती है. वो भी बचपन से यही सीखते हुए बड़े होते हैं. अतः जनता पर १०० परेशानियों का बोझ पहले डालते ही इसलिए हैं ताकि उसमें से ५-१० को उठा कर जनता को राहत महसूस करा कर धर्म का निर्वहन करें. धार्मिकता का पाखंड लंठई की लफ़्फ़ाजी पर सदैव भारी पड़ता है. अतः जनता सारी परेशानी भूल कर हल्की सी राहत से प्रसन्न हो जाती है और सरकार यथावत अपने परेशानी परोसने और राहत पहुँचाने के कार्यक्रम में आमजन को उलझा कर अपना और अपनों का खजाना भरती रहती है. १० पैसे पेट्रोल का दाम बढ़ा कर २ पैसे कम देने का तमाशा हम बरसों से देखते आ रहे हैं.
वैसे सच तो यह है कि जहाँ एक ओर गिरे को उठाना हमारा धर्म है, वहीं उठे को गिराना हमारा डीएनए है. हमारा धर्म और डीएनए हर कोण से एक दूसरे का परस्पर विरोधी होते हैं. हम उजाले में धर्म के नाम पर जितने कार्य करते हैं, अँधेरे में ठीक उसके विपरीत अपने डीएनए के गुलाम हो जाते हैं. सारे बाबा दिन भर धर्म का ज्ञान बांटते हैं और पीठ पीछे रंगरेलियाँ मनाते हैं. धर्म के नाम पर भक्तों को बेवकूफ बनाकर अपना पूरा एम्पायर खड़ा कर लेते हैं. आजकल कितने ही बाबा इस चक्कर में जेल यात्रा पर हैं और कितने ही वेटिंग लिस्ट में अपना नम्बर आने का इन्तजार कर रहे हैं. इनकी हालत देखकर मुहावरे ही बदल देने का मन हो आता है. कभी पाप का घड़ा फूटा करता था, आज धर्म का घड़ा फूटता है.
इसी डीएनए के चलते हम आदतन गिराने का ही काम करते हैं. लोगों का मनोबल गिराते रहते हैं. यह कहने की बजाये कि तुम कोशिश करो, सफल हो जाओगे अक्सर हम हतोत्साहित करते हैं. कोई बच्चा आईएएस बनने की इच्छा जाहिर करता है तो कह देते हैं कि ये तुम्हारे बस का नहीं, क्यूँ समय खराब करते हो. चुपचाप फलानी नौकरी मिल रही है ले लो वरना इससे भी हाथ धो बैठोगे. अगर वो मान जाये तो हम खुश और न माने और फेल हो जाये तो दस बार कोसने को तैयार कि हमने तो पहले ही कहा था. अब लेओ, दोनों हाथ से निकल गई.
कुछ पदों की मांग पूरी न होने पर लोग पूरी सरकार तक गिरा देते हैं और देश को चुनाव का भार और खर्च वहन करने को मजबूर कर देते हैं. जहाँ प्रयोजन करने में तकलीफ उठानी पड़ती है, मेहनत करनी पड़ती है वहीं डीएनए जनित कार्यों को करने में आनन्द का अहसास होता है. धार्मिक कार्य करना हमारे लिए प्रयोजन है इसीलिए किसी को उठाने के दिखावे में कुछ तकलीफ उठानी पड़ती है. वहीं किसी को गिराने में हम आन्नदित हो उठते हैं. कई बार तो इसी डीएनए के चलते हम खुद को ही इतना गिरा देते हैं कि खुद की नजरों में गिर जाते हैं. फिर खुद को इस बोझ से मुक्त करने के लिए धर्म का सहारा लेकर हरिद्वार जाकर गंगा स्नान कर सारे पाप धोकर खुद को फिर से अपनी नजरों में उठा लेते हैं भले लोग पापी ही समझते रहें.
धर्म अधर्म हम खुद ही तय करते हैं और उसी की दुहाई देते हुए जिन्दगी गुजार देते हैं.
इसी गिराने के डीएनए की कड़ी में हाल ही में महापुरुषों की प्रतिमायें गिराने का सिलसिला शुरु हुआ है. शर्म तो जब हमें धार्मिक स्थलों को गिराने में न आई, तो भला महापुरुषों की प्रतिमायें गिराने में क्या आयेगी?
आस्था का ध्रुवीकरण कुछ ऐसा हो गया कि अगर तुम्हारी आस्था के प्रतीक किसी महापुरुष की मूर्ति तुम्हारी सरकार के वक्त बीच चौराहे पर लगी थी तो हमारी सरकार के आते ही हम उसे गिरा देंगे..महापुरुषों के योगदान को भी मानव जाति, राष्ट्र और विश्व से अलग हटाकर आस्थाधारकों की पार्टी लाईन से जोड़ दिया गया है. बदले की भावना इतनी बलवती हो गई है कि तुम मेरी आस्था को गिराओ, मैं तुम्हारी को गिराऊँगा. लेनिन गिरे हैं तो गाँधी, अम्बेडकर, पेरियार सबकी आफत आन पड़ी. उन्हें भी गिरा दिया गया. महाराणा प्रताप, लक्ष्मी बाई आदि जैसे योद्धा अंडर ग्राऊन्ड होने की तैयारी में लग लिये होंगे कि कौन जाने कब उन पर कहर बरस जाये?
अब तो माहौल देखकर ऐसा लगता है कि प्रतिमायें भी मोबाईल होनी चाहिये. प्रतिमा और जीते जागते इन्सान में यही तो फरक है कि प्रतिमा बेईज्जति होने पर न तो खुद से हट नहीं सकती या न ही कोई उन्हें उठाकर मार्गदर्शक मंडल में ले जाकर नहीं बैठाल सकता है.
काश! इन प्रतिमाओं को पैर न सही, पहिये लगा कर स्थापित किया जाये. कल जब इनमें आस्था रखने वालों की सरकार चली जाये तब वे सरकार से जाते जाते अपने महापुरुषों को भी साथ लेते जायेंगे और फिर जब कभी सरकार बनी तो वापस लेते आयेंगे.
सरकार का आना जाना अब महापुरुषों की महापुरुषाई तय करने लगा है. तब ऐसे में इसके सिवाय तो कोई रास्ता नजर नहीं आता. आप को कोई और उपाय सूझे तो बतायें...
प्रतिमाओं का इस तरह गिराया जाना, यह एक संकटकाल है जिससे सिर्फ देश ही नहीं, हमारी मानसिकता गुजर रही है...इसका उपाय जरुरी है वरना जल्द ही यह नासूर बन जायेगा!!
-समीर लाल समीर 
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मार्च ११, २०१८ को प्रकाशित:

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शनिवार, मार्च 03, 2018

सरकार मीडिया की है या मीडिया सरकार की


लोकतंत्र में सरकार जनता की होती है, जनता के द्वारा चुनी जाती है और सिर्फ जनता के लिए काम करती है. सरकार का काम होता है कि जनता की भलाई के लिए कार्य करे. यूँ तो एक स्तर पर आकर किसका क्या काम है इस के मायने ही बदल जाते हैं. कर्जदार का कार्य एवं दायित्व होता है कि कर्जा जिससे लिया है उसे वापस चुकाये. मगर आजकल स्तरीय कर्जदार का काम हो गया है कि कर्जा लो और विदेश भाग जाओ. मानो कर्जा न हुआ विदेश जाने का वीसा लगवा लिया हो.  
सब कुछ बदला बदला सा है आजकल. गधे कभी बोझा ढ़ोने का कार्य किया करते थे. अब वो भी अपना काम छोड़छाड़ कर कुर्सी पर सज कर बैठे हैं. खादी पहनने लगे हैं. आज खादी फैंसीड्रेस की सबसे पसंदीदा पोशाक का दर्जा हासिल किये है चाहे स्टेज से हो या रियल लाईफ में. बहुरुपियों का लिबास!
रोजगार कार्यलाय में जब बेरोजगार रजिस्ट्रेशन कराते थे तो उम्मीद होती थी कि सरकारी नौकरी लग जायेगी. आने वाले समय में रोजगार कार्यालय जाओगे तो वो इस सलाह के साथ शहर के उन दफ्तरों के पते देंगे जिनके सामने गुमटी लगाने की जगह खाली होगी कि वहाँ जाकर पकोड़े की दुकान खोल लो. शायद तब तक इस हेतु प्रधानमंत्री पकोड़ा रोजगार योजना के तहत लोन भी दिया जाने लगे और चूँकि प्रधानमंत्री की योजना है तो कर्जा माफ हो जाने की गारंटी भी साथ है.
अब सरकार जनता बनाती नहीं, जनता को पैसों से प्रभावित और भ्रमित करके जनता से बनवाई जाती है और वो सरकार काम उनके लिए करती है जो इस भ्रम का आसमान पैदा करने के लिए पैसा लगाते हैं. चंद मुट्ठी भर धनाढ्य देश चलाते हैं. सरकार के हर कदम उनकी भलाई के लिए उठाये जाते हैं और जनता को इस भुलावे में जिन्दा रखा जाता है कि यह कदम एक लम्बे समय में जाकर उनके ही फायदेमंद साबित होंगे. फायदा कब होगा उसकी तारीख आगे खिसकती चलती है और भोली जनता उस खिसकती तारीख को पकड़ने के लिए दौड़ लगा रही होती है.
कभी सड़क के किनारे छिप कर बैठे बच्चे एक दस के नोट को महीन धागे से बाँध कर सड़क पर छोड़ देते थे. जैसे ही कोई राहगीर उसे देखकर लोगों की नजर बचा कर उठाने की कोशिश करता, बच्चे धागे से खींच कर उस नोट को आगे बढ़ा देते. वो राहगीर कई बार उसे उठाने की कोशिश करता और फिर झैंप कर मूँह चुराता नजर आता जब बच्चे उस नोट को खींच कर अपने कब्जे में करके जोर जोर से हँस कर उसका मजाक उड़ाते. आज अच्छे दिनों की तारीख उसी नोट के समान हो गई है. सरकार मजे ले रही है इसे खिसका खिसका कर और जनता बेवकूफ बन रही है. आगे चल कर ये मजे लूट कर हँसेंगे और जनता झेंप कर मूँह छिपायेगी.
तकलीफ की बात यह है कि यह दस का नोट वो काठ की हांडी है जो बार बार चढ़ कर भी नहीं जलती. बच्चे बार बार नोट बाँध कर खेल खेलते हैं और राहगीर बार बार यह सोच कर बेवकूफ बनते हैं कि शायद अबकी बार यह सच में गिरा हुआ नोट हो. सरकार भी जानती है इस मानसिकता को भली भाँति इसीलिए तो कभी एक महीना, कभी २०१५ तो कभी २०१७ और अब २०२२ में अच्छे दिन की तारीख फेंकती रहती है और जनता बेवकूफ बनती रहती है.
इसी बदलते क्रियाकर्म में मीडिया भला कैसे पीछे रह जाये? जिस न्यूज़ चैनल का काम न्यूज़ दिखाना है वो न्यूज़ बनाने का काम करने लगा है. समाचार सुनाने के बदले समाचार गढ़ने लगा है. जिसका काम था कि समाचार की सत्यता बता कर अफवाहों को विराम दे, सनसनी न फेलने दे वो आज अफवाहों का पंडोरा बॉक्स होकर सनसनी फैला रहा है. उद्देश्य मात्र इतना कि टीआरपी बढ़े, सरकार की वाहवाही बढे और संगाबित्ती में कमाई बढ़े. बस्स!! समाचार और उसके सुनने वाले गये तेल लेने.
कई बार तो समाचारों का नाट्य रुपांतरण देखते हुए अहसास होता है कि मर्डर के समय अगर कोई वहाँ था तो ये मीडिया वाले..और इतनी खूबी से नाट्य रुपांतरण करते हैं कि बॉलीवुड के निर्माता दांतों तले ऊँगली दबा लें. फिल्म अवार्ड समारोह में अब एक केटेगरी मीडिया के बेस्ट नाट्य रुपांतरण की भी होना चाहिये.
हाल ही में एक जानी मानी अभिनेत्री के बाथ टब में डूब कर मर जाने का समाचार का नाट्य रुपांतरण टाईप करते करते जब समाचार दिखाने वाला बाथ टब में लेट कर दिखाने लगा कि किस तरह आप टब में पूरी तरह समा सकते हैं, तब बाथ टब के ऊपर से पानी बहा कि नहीं, यह तो नहीं पता मगर देखने वालों के सर के ऊपर से जरुर बह गया. हद हो गई. कभी कोई आग में जल कर मर जाये, तब दिखाना जरा आग में जल कर समाचार पढ़ते हुए.
टीआरपी ही सब कुछ है. भगवान है चैनलों के लिए. सच हो या झूठ..टीआरपी मिलना चाहिये मानो कि टीआरपी न हो वोट हो, चाहे जैसे भी मिले..सच बोल कर या झूठ बोल कर..वोट मिलना चाहिये. बिना टीआरपी चैनेल नहीं और बिना वोट सरकार नहीं.
दोनों का नेचर इतना ज्यादा मिलता जुलता है इसीलिए तो आजकल समझ नहीं आता है कि सरकार मीडिया की है या मीडिया सरकार की है. साड़ी और नारी वाले अलंकार का उदाहरण बने हैं ये दोनों:
सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है।
समझने की कोशिश भी बेकार है. आप सिर्फ आम जनता हो- आप तो बस सड़क पर पड़े नोट को देख कर ललचाओ और उसे उठाने की कोशिश करते हुए हार कर झेंप जाओ. आपके हिस्से इनकी हँसी आयेगी. उसी से खुश हो लेना ..आंसू मत बहाना!!
आपका आंसू पानी है और इनकी हँसी मोती!!
-समीर लाल समीर     
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में< रविवार मार्च ४, २०१८ :
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