गुरुवार, दिसंबर 22, 2016

लोग(लोक) कथा: नियति

एक वन प्रदेश में पिछले लगभग ७ दशकों से शेर राज करता आ रहा था. हर बार चुनाव में छोटे छोटे निरिह जानवरों को डरा धमका कर या कुछ प्रलोभन देकर वो जीत जाता और जिन छोटे छोटे जानवरों नें उसकी बातों में आकर उसे जितवाया था, उन्हीं में से अपनी पसंद की बकरियों और हिरणों के शरीर पर वो काली स्याही से तारीख लिख देता और उस जानवर को उस निश्चित तारीख को शेर के महल में जाना पड़ता और शेर का भोजन बनना पड़ता. सभी जानवर इसे ही अपनी नियती मानकर इसी तरह के जीवन से समझौता कर चुके थे. लगभग सभी बकरियों और हिरणों पर कोई न कोई तारीख लिखी हुई थी.
नये चुनाव का समय आ गया था. इस बार चुनाव में एक बंदर भी खड़ा हुआ. उसने सभी जानवरों को समझाया कि आप लोगों ने इस शेर को इतने दिन राजा जितवाया मगर आप की हालत तो बद से बदतर होती चली गई. ये शेर आप पर काला निशान लगा कर आपका मालिक बन बैठता है और आपको ही अपना भोजन बनाता है. आप मुझे जितवाओं. मैं इस शेर की ईंट से ईंट से बजा दूँगा. मेरे पास योजना है जिसके तहत आपके उपर लगे काले निशान धुलवा कर एकदम साफ करवा दूँगा. शेर को सलाखों के पीछे डलवाने की जरुरत ही नहीं होगी, जब आपके उपर से काली स्याही से लिखी तारीख ही मिट जायेगी तो आपको उसके महल में जाना भी नहीं होगा और वो वैसे ही भूखा मर जायेगा. फिर आप सब सआनन्द अपना जीवन बसर करना.



सब जानवरों को बंदर की बात पसंद आई और इस बार चुनाव में उन्होंने बंदर को राजा चुन लिया. बंदर जैसे ही चुनाव जीता, उसके मन में बचपन से दबी विदेशों के वनों में घूमने की इच्छा बलवति हो उठी. वो नये नये ठाठ बाट के सूट बूट पहन कर विदेशाटन में इतना व्यस्त हो गया कि अपने किये वादे और भोले भाले जानवरों को भूल ही बैठा. बीच बीच में कभी अपने वन प्रदेश में लौटता भी तो, प्रजा से मिलने का मौका ही नहीं निकाल पाता और पुनः अगले विदेश के वनों के दौरे पर निकल जाता. जानवर भी अब उसे दबे छुपे फुसफुसा कर एन आर आई राजा कहने लगे थे. मंत्रीमंडल के साथियों ने उसे इस बात की खबर दी और बताया कि ऐसे में तो आपकी साख गिरती जा रही है, कुछ करिये.
तब एक दिन वह प्रजा के बीच में आया और उनसे कहा कि आप अपनी तकलीफ मुझे बताईये.
एकाएक एक बकरी सामने आई और उसने बंदर को उसकी योजना के बारे में याद दिलाया जिससे उन पर लिखी काली स्याही की तारीखों को धुलवाने की बात थी. राजा मौन रहा किन्तु उसके सबसे विश्वासपात्र साथी नें बकरी को डांटते हुए समझा दिया कि वह तो चुनावी जुमला था.
एक मृत प्रायः उम्मीद को जिस बन्दर के वादे से सभी जानवरों ने पुनः जगा लिया था उसे चुनावी जुमला सुन कर बकरी की आँखों से आँसू गिर पड़े. अन्यथा तो वो सब इसे अपनी नियति मान कर समझौता कर ही चुके थे. रोते हुए उसने बताया कि आज उसके बेटे का नम्बर है और वह अभी शेर के पास गया है, कृप्या उसे बचा लिजिये.
बन्दर राजा थोड़े द्रवित हो गयें और रौंधे कंठ से बोलो, चलो मेरे साथ- कहाँ है तुम्हारा बेटा?
बकरी और अन्य छोटे जानवारों के साथ बन्दर जंगल के भीतर आया तो देखा शेर बस उस बकरी के बेटे को मार कर खाने की तैयारी में ही है. बन्दर पेड़ पर चढ़ गया और इस पेड़ से उस पेड़, उस डंगाल से उस डंगाल पर छलांगे लगाने लगा. बकरी मिमियाते रही कि हे राजन! उसे बचाईये और बंदर राजा इधर से उधर पेड़ों पर छलांग लगाते रहे और शेर ने इस बीच बकरी के बच्चे को खाकर निद्रा देवी की गोद में स्थान प्राप्त कर लिया.
तब बन्दर राजा पेड़ से उतर कर पसीना पौंछते हुए बकरी के पास आये और उसके कँधे पर हाथ रख ढाढस बंधाया. बकरी रोते हुए कहने लगी कि आपने मेरे बेटे को बचाया नहीं.
तब बंदर ने एक टीले पर चढ़कर भाषण दिया जिसका सार यह था कि जीवन मरण तो उपर वाले के हाथ है लेकिन मैनें अगर अपनी मेहनत में कोई कमी छोड़ी हो तो आप जो सजा कहों सो मंजूर और फिर अपने माथे से पसीना पोंछा जो एक घंटे की पेड दर पेड छलाँग लगाने की वजह से निकल आया था.
सभी जानवरों ने हामी भरी और बंदर राजा के नाम का जयकारा लगाया और अपने अपने घरो पर जाकर सो गये.
एक दो दिन बाद सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो गया जिसमें शेर और बंदर अगली शाम को एक साथ शराब के जाम टकरा रहे थे.
प्रजा का मन खट्टा हो गया और बहुत सारे प्रजा के लोग कह रहे हैं कि अगली बार शेर को चुनेंगे.
नोट: बचपन में सुनी एक कहानी पर आधारित इस रचना को किसी भी वर्तमान परिपेक्ष से जोड़ कर न देखें.

-समीर लाल ’समीर’
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2 टिप्‍पणियां:

PRAN SHARMA ने कहा…

Bahut khoob

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-12-2016) को "हार नहीं मानूँगा रार नहीं ठानूँगा" (चर्चा अंक-2567) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'