बुधवार, अक्तूबर 28, 2015

जिल्द इक किताब का...

दो काल खण्ड
इस जीवन के
और उन्हें जोड़ता
वो इक लम्हा
जो हाथ पसारे
लेटा है इस तरह
दोनों को समेटता
मानिंद जिल्द हो
मेरी जिन्दगी की
किताब का!!

-समीर लाल ’समीर’


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14 टिप्‍पणियां:

Dr. Monika S Sharma ने कहा…

खूब... बढ़िया कही ....

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Pallavi saxena ने कहा…

बहुत खूब।

Kavita Rawat ने कहा…

दार्शनिकता का पुट लिए सुन्दर प्रस्तुति ..

Asha Joglekar ने कहा…

बहुत बढिया।

Arun Roy ने कहा…

इधर आप छोटी छोटी कविताओं में बड़ी बड़ी बात कह रहे हैं।

रचना दीक्षित ने कहा…

अच्छा नजरिया जीवन दर्शन का.

Ankur Jain ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति। छोटी सी रचना किंतु गहरी बात।

gyanipandit ने कहा…

बेहतरीन पोस्ट

raj sha ने कहा…

बस बीती मिसालों के सिवा,
जिंदगी क्या है, ख्यालों के सिवा?
जिंदगी क्या है, सवालों के सिवा?

कंचनलता चतुर्वेदी ने कहा…

सुन्दर

Abhishek Neel ने कहा…

काफ़ी अच्छा ब्लौग है आपका समीर जी. मैं बराबर आपके ब्लौग पर आपकी नई रचनायें पढने के लिये आता हूँ. मगर एक शिकायत है कि आपकी कृतियाँ काफ़ी अन्तराल पर आती हैं. अगर और कोई अच्छा ब्लौग आप बता सकें हिंदी का तो बड़ी प्रसन्नता होगी. मैंने काफ़ी खोजा पर उदसीनता ही हाथ आयी. कोई अच्छा ब्लौग हिंदी में मिला ही नहीं. मैं भी लिखता हूँ ब्लौग. मेरा पता है washermansdog.blogspot.com. आपके मार्गदर्शन की अपेक्षा में - अभिषेक नील.

savan kumar ने कहा…

सुन्दर शब्द रचना

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी ने कहा…

बेहद प्रभावशाली......बहुत बहुत बधाई.....