रविवार, सितंबर 05, 2010

अक्सर दिल करता है मेरा

अक्सर दिल करता है मेरा

चलूँ, बादलों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात

चलूँ, उन पहाड़ों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ से आता है सूरज
जिसे देख मेरा चाँद
छुप जाता है
जाने किस परदे की ओट में

चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ
मिलूँ, उन मछलियों से
जिनके साथ भी रहता है
एक चाँद
उस रात झील में देखा था उसे

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...

-समीर लाल ’समीर’

यहाँ सुनिये:

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109 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

चाँद से आप का नया रिश्ता मालूम हुआ सुंदर रचना बहुत बहुत वधाई

Anjana (Gudia) ने कहा…

very beautiful :-)

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

चाँद भी बड़ा बदमाश है... कभी पानी में अठखेलियाँ करता है तो कभी प्रियतमा के चेहरे में नज़र आता है...जाने कितने रूप हैं उसके| बहुत सुन्दर कविता|

ब्रह्माण्ड

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

"एक भौरा भी छुपा है गुलाब मे "

बहुत कुछ कह्ती अच्छी कविता समीर जी !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

आपका चाँद बहुत खूबसूरत है सर!
--
कल्पना की इस उड़ान पर
हम तो बस रीझकर ही रह गये!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

एक चांद
उस रात झील में देखा था उसे चलूं,
गली के उस मोड़ तक चलूं देखूं,
उस कोने वाले मकान को
जहां रहती हो तुम…
और साथ दिखती है
चांद की परछाई…


वाह क्या बात है समीर जी !

तहत में बहुत शानदार पढ़ा है ।

- राजेन्द्र स्वर्णकार

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

उम्दा । कल्पनाओं के सुन्दर पंख । आमीन्।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

एक स्वप्नदृषा हृदय की कविता है ये तो. सुंदर.

SANJEEV RANA ने कहा…

देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात

bahut sunder

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

समीर बाबू,
आज त कमाल चाँद लगा रखे हैं चारो तरफ..गुलज़ार साहब का कलाम याद आ गयाः
चाँद होगा, ज़मीं की बात करो
हमसे उस महजबीं की बात करो.
बात तुमपर ही ख़त्म होती है,
हमसे चाहे कहीं की बात करो.
बहुत सुंदर!!

Arvind Mishra ने कहा…

श्रृंगार रस जिंदाबाद !

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना... अंतिम पंक्तियों ने तो मन मोह लिया....

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना... अंतिम पंक्तियों ने तो मन मोह लिया....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

चकोर की अभिलाषा --अति सुन्दर ।
बगीचे के गुलाब --इनमे खुशबू है की नहीं ?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गली के मोड़ पर हम तो चाँद ही देखते रहे, चाँद की परछाईं तो साँवली होती है।

mehek ने कहा…

bahut rumani rachanawo chand,ye gulab behad sunder.

seema gupta ने कहा…

देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात
मन को छु गयी ये पंक्तियाँ बेहद ही खुबसूरत..
regards

Mansoor Ali ने कहा…

बादल-पर्वत झाँक लिए फिर उनकी खिड़की याद आई!
नाप के झील की गहराई फिर उनकी खिड़की याद आई!
भौंरा फूलो को ढूंदे ज्यूँ बगियाँ-बगियाँ भटक लिए!
चाँद तो नुक्कड़ ही पर निकला, उनकी खिड़की याद आई!!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

चार चांद लग गए।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aapka chand bada khubsurat hai...:)

Ashish (Ashu) ने कहा…

vaah sir ji...aap itna acha likhte hai ki kya kahe...sir ji aapke chad ko mera salam...(to sir ji india kab aa rahe hai?)

Ashish (Ashu) ने कहा…

vaah sir ji...aap itna acha likhte hai ki kya kahe...sir ji aapke chad ko mera salam...(to sir ji india kab aa rahe hai?)

बवाल ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना ! उतना ही सुन्दर वाचन । जय हो बड्डे।

Babli ने कहा…

चलूँ, उन पहाड़ों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ से आता है सूरज
जिसे देख मेरा चाँद
छुप जाता है
जाने किस परदे की ओट में ..
वाह क्या बात है! बहुत ख़ूबसूरत पंक्तियाँ! शानदार और लाजवाब रचना!
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

sandhyagupta ने कहा…

देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात

अत्यंत सुन्दर और भावपूर्ण ! जिस विधा में लिखें आप अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

भावपूर्ण कविता ,वाचन भी सुन्दर !

AlbelaKhatri.com ने कहा…

हाँ समीर जी,
बहुत लम्बी चटाई है

आओ बैठो !
आपके लिए ही बिछाई है हा हा हा हा

________________ये टिप्पणी मैंने गिरीश बिल्लोरे जी के ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी के जवाब में लिखी थी, परन्तु वहां पेस्ट नहीं हो रही थी, इसलिए यहाँचिपकादी.............


बहरहाल आज बहुत दिनों बड़े आपको पढ़ने का सौभाग्य मिला ......आनन्द आगया

वाह वाह बहुत सुन्दर और प्यारी कविता !

P.N. Subramanian ने कहा…

सुन्दर रचना.

Coral ने कहा…

behatarin !

Prem Farrukhabadi ने कहा…

चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई... -समीर लाल ’समीर’ यहाँ सुनिये:

बहुत सुन्दर कविता.

सुनीता शानू ने कहा…

समीर भाई वो चाँद सूरज ताका-झाँकी वाले हमारे ही देश में मिलेगें जी। कनाडा में तो मिलने वाले हैं नही। तो बस आकर ही मिल लेना...:)

Divya ने कहा…

superb !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज तो बहुत बढ़िया कल्पना सजा दी है.... चाँद

झील में और सूरज से चाँद का छिपना ...बहुत सुन्दर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ye khwaahishen kitni masoom hain

shikha varshney ने कहा…

आज तो श्रृंगार रस में रची बसी है कविता :) बहुत सुन्दर.

rashmi ravija ने कहा…

वाह! ....बड़ी भावभीनी रचना है...

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

चलें चाँद के पार चलें
ज़िंदगी ख़त्म भी हो जाये अगर
न कभी ख़त्म हो उल्फ़त का सफ़र
चलें चाँद के पार चलें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समीर भाई ... ये रोमेंटिक अंदाज़ बहुत मस्त है ..... मज़बूत ....
भाभी को प्रणाम ...

arun c roy ने कहा…

sunder kavita..

'उदय' ने कहा…

... bahut sundar !!!

cmpershad ने कहा…

"चलूँ, बादलों के पार चलूँ"

चलो दिलदार चलो, हम है तैयार चलो :)

मनोज कुमार ने कहा…

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...

आपकी भाषिक संवेदना हमें आपकी आत्‍मीय दुनिया की सैर करा गई!

गीली मिट्टी पर पैरों के निशान!!, “मनोज” पर, ... देखिए ...ना!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई..

बहुत खूब ..अलग अंदाज़ दिखा आपके लिखे का इस में ....बहुत बढ़िया

रवि धवन ने कहा…

arey waah! behad khubsurat chaand ki tarah.

Suman ने कहा…

bahut sunder kavita...........

रचना दीक्षित ने कहा…

देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात
पिछली पोस्ट की तरह फिर किसी नई खोज पर निकले हैं क्या ?पिछली बार यारों बुला लिया इस बार चाँद बुला लिया

पद्म सिंह ने कहा…

चाँद की परछाई ...
अच्छी रचना !

santosh kumar ने कहा…

" चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ
मिलूँ, उन मछलियों से
जिनके साथ भी रहता है
एक चाँद
उस रात झील में देखा था उसे"
समीर जी आपकी कविता को पढ़ने में जितना आनंद आया उतना ही सुनने में भी ! अब तो अक्सर आता रहूँगा ! धन्यवाद मेरे ब्लॉग को अपने कॉमेंट्स से सुसज्जित करने के लिए !

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना हमेशा की तरह ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई..


आजकल क्या बात है? फ़िजा बदली बदली सी लगती है? शृंगार रस का शौक कुछ जियादा ही ठाठे मार रहा है आजकल. खुदा खैर करे.:)

रामराम.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

चाँद की परछाईं शीर्षक होना था ना... :) भंवरा नहीं दिखा मुझे पर कुछ है तो सफ़ेद सा..

शेफाली पाण्डे ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता ...

kshama ने कहा…

Kya gazab ki rachna hai!
Sarw shreshth blogger hone ke liye dheron badhayi!

abhi ने कहा…

बहुत खूबसूरत है :) :)
बहुत सुन्दर

सुमन'मीत' ने कहा…

बेहतरीन कविता................

मो सम कौन ? ने कहा…

खूबसूरत पोस्ट लगी जी।
गोदियाल जी का कमेंट भी ध्यान खींच गया।

mridula pradhan ने कहा…

very good.

Pratik Maheshwari ने कहा…

बहुत सुन्दर... चाँद हर प्रेम कहानी का हिस्सा ज़रूर होता है :)

संगीता पुरी ने कहा…

बेहद सुंदर ...

खुशदीप सहगल ने कहा…

कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया,
और कुछ तल्खी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया,
हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब,
आई तो बरसात, बरसात ने दिल तोड़ दिया...

जय हिंद...

Mahak ने कहा…

देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...


पूरी की पूरी कविता बहुत ही खूबसूरत बन पड़ी है लेकिन ये अंतिम lines तो सचमुच दिल ले गयीं ,बहुत बढ़िया

महक

vikram7 ने कहा…

देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...
kya baat hae,samiir ji. khuubsuurat rachana

Sourabh Choudhary 'Suman' ने कहा…

bahut badiya samir ji... bahut bahut badhai ho is sundar rachana ke liye...

ललित शर्मा-ললিত শর্মা ने कहा…

बहुत बढिया कविता है समीर भाई

हिन्दी सेवा जारी रहे।

आभार

'अदा' ने कहा…

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...

कौनो एड्रेस-उड्रेस बता देते ...पड़ोसन का ...
हाँ नहीं तो..!!
बहुत सुन्दर कविता...!

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना..........
बढ़िया कल्पना !!!!

Sadhana Vaid ने कहा…

चाँद की तलाश का यह अभियान बहुत अच्छा लगा समीर जी ! बहुत खूबसूरत रचना है ! बधाई एवम शुभकामनाएं !

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

चांद से मिलने की ख्वाहिश आपकी जरूर पूरी हो...साथ ही
आपके मार्ग-दर्शन के लिए शुक्रिया सर जी

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी कविता। बिम्बों का उत्तम प्रयोग!

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।


हिंदी और अर्थव्यवस्था
, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

शिक्षामित्र ने कहा…

बाल-हृदय की जिज्ञासावृत्ति से सराबोर युवा-मन प्रेम का सत्त्व ऐसे ही तलाशता है।

Shah Nawaz ने कहा…

चलूँ, बादलों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात

बहुत ही बेहतरीन रचना........ बहुत खूब!

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

shaffkat ने कहा…

खूबसूरत लिखा है .आप की चाह आकाश से कोने वाले मकान तक खूब पहुची.आनंद आगया.पर साथ ही ग़ालिब साब का शेर भी याद आरहा है
हज़ारों खाहिशें ऐसी के हर खाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमा फिर भी कम निकले

arvind ने कहा…

चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ
मिलूँ, उन मछलियों से
जिनके साथ भी रहता है
एक चाँद
उस रात झील में देखा था उसे.....vaah...aap bhi chand ke aashik hain.

विवेक सिंह ने कहा…

पहले उस कोने वाले मकान में ही चले जाइये न । अल्लाह ने चाहा तो चाँद, तारे, समन्दर सब वहीं नसीब हो जाएंगे ।

singhsdm ने कहा…

नए रिश्ते में बंधी रचना....आप भी चाँद से मरासिम हैं मालूम न था...अच्छी कविता के लिए आभार

Tripat "Prerna" ने कहा…

bahut bahut badhai...sunder abhivyakti :)

http://liberalflorence.blogspot.com/

Roshani ने कहा…

आदरणीय भाई जी, प्रणाम. चाँद हमारी भाभी जी हैं. है ना भाई जी? हमने सही कहा ना? :)
गुस्ताखी के लिए माफ़ी :)
आपकी भावनाओं और कल्पनाओं का स्वरुप इस रचना में देखने को मिला.
साथ ही प्राय: सभी ब्लॉगों में आपकी नि:स्वार्थ टिप्पणियाँ दिखाई दे जाती हैं इसके लिए भी आप बधाई के पात्र हैं.
प्रणाम
रोशनी

कविता रावत ने कहा…

उस रात झील में देखा था उसे चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...
.....sundar masoom ahsas...

रानीविशाल ने कहा…

जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...
वाह ! बहुत मोहक अंदाज़ ...
आपकी आवाज़ में रचना को सुनाने के अनुभव बहुत अच्छा रहा ....आभार !

हेमन्त वशिष्ठ ने कहा…

देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात
...खूबसूरत ...बेहद खूबसूरत ...

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

बैशाखनंदन सम्मान के लिए ढेरों बधाई|
ब्रह्माण्ड

वाणी गीत ने कहा…

इ लीजिये ...हम तो बुझे थे कि चाँद आपके घर में ही है ...
ये तो कोई और खिड़की से झाँक रहा है ...

अदा का सवाल मेरा भी है ...:)

राम त्यागी ने कहा…

मन तो मेरा भी करता है ..पर !
बहुत दिन से बात नहीं हुई ..किसी दिन फोन पर बात करते हैं ..

डॉ. नूतन " अमृता " ने कहा…

Udan tastri ji... chaand kaa jikr bakhubi kiya ..chaliye usi bahane nukkad vale makan tak walking....kavita bahut sundar hai.laajwaab

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

is naacheej ko bhi apne saath le chalna...

कुमार राधारमण ने कहा…

इस कविता में,प्रेयसी के संदर्भ के बावजूद,सर्वत्र प्रकृति के प्रति आकर्षण ही बिखरा पड़ा है। आज की ज़रूरत भी,कवि के लिए अनुकूल भी।

adwet ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

निर्मला कपिला ने कहा…

चंचल मन की अभिलाशायें ज़िन्दगी भर पूरी नही होती कुछ न कुछ चाहता ही रहता है। कल्पनाओं के पंख नही होते न इस लिये हो आयें चाँद पर मगर वहाँ ठोस चट्टानो के कुछ नही मिलेगा। बहुत अच्छी लगी रचना । बधाई और शुभकामनायें

vivekmishra001 ने कहा…

अच्छी रचना.

Arpit Shrivastava ने कहा…

Waah!!! Bahut Hi sundar Rachna.

विवेक मिश्र ने कहा…

अच्छा लेखन ,बधाई ।

venus**** ने कहा…

hmmm..mujhe lgtaa thaa..ye chaand sirf meraa hi he.:).....pr..dhere dhere jaan rhi hun...isne sabpe apnaa jaadu chlaa rkhaa he.....
hmm..thodi si jalan hui..chaand pe itni achaa rchnaa maine kyun nhi likhi.....bahut hii khoobsurat rchnaa
take care

upendra ने कहा…

sameer sahab

kalpana ki bahoot achchhi udan....

very nice

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

लगता है आज चाँदद का ही दिन है, जिसे आप निहार रहे हैं हर जगह , बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

Parul ने कहा…

sir..jab aksar dil kare..to dil ki aksar kar leni chahiye :)....ek pari katha si parikalpna..bahut sundar :)

सुधीर कुमार शर्मा ने कहा…

aap mere blog par aaie
aapka bahut bahut dhanyvad
aapko ganesh charturthi ki puri report di jaiegi.
aap aise hi margdarshan karte rahen.
again thanx
sudhir kumar sharma
www.brahminpatrika.tk

Virendra Singh Chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर विचार हैं आपके ...

इंसान जो सोचे,
गर वो हो जाए.
कहने की ज़रूरत नहीं ,
मज़ा आ जाए.

बहुत ही उम्दा रचना ....

Virendra Singh Chauhan ने कहा…

अक्सर दिल करता है मेरा चलूँ, बादलों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात चलूँ, उन पहाड़ों के पार चलूँ


ये पंक्तियाँ इतनी अच्छी हैं ,
कि बार -बार पढ़ने को मन करता है .
जानता कि हूँ ये नामुमकिन है,
फिर भी पक्षी बन उड़ने को मन करता है .

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

उस रात झील में देखा था उसे चलूं,
गली के उस मोड़ तक चलूं देखूं,
उस कोने वाले मकान को
जहां रहती हो तुम…
और साथ दिखती है
चांद की परछाई…
उम्दा । कल्पनाओं के सुन्दर पंख

JHAROKHA ने कहा…

चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ
मिलूँ, उन मछलियों से
जिनके साथ भी रहता है
एक चाँद
उस रात झील में देखा था उसे
Adarneey Sir,
Bahut samvedanatmak aur bhavpoorn rachna---apka prakriti ke prati prem pradarshit kartee huyi.
Poonam

ADITYA ने कहा…

बेहतर...बेहतर...बेहतरीन लिखा है आपने।
कनाडा में भी धड़कता है हिंदुस्तानी दिल,
छोटी सी कविता मेरी भी ....आपके जवाब के इंतजार में।

यादें जब भी आती हैं, तेरी
दिल भर जाता है जज्बातों से

सागर से भी गहरी तेरी आंखें
पहाड़ से भी ऊंचे तेरे सपने

खुशबू सा तेरा अहसास
जो रहे मेरे आस-पास
आदित्य वर्मा

ADITYA ने कहा…

बेहतर...बेहतर...बेहतरीन लिखा है आपने।
कनाडा में भी धड़कता है हिंदुस्तानी दिल,
छोटी सी कविता मेरी भी ....आपके जवाब के इंतजार में।

यादें जब भी आती हैं, तेरी
दिल भर जाता है जज्बातों से

सागर से भी गहरी तेरी आंखें
पहाड़ से भी ऊंचे तेरे सपने

खुशबू सा तेरा अहसास
जो रहे मेरे आस-पास
आदित्य वर्मा

ADITYA ने कहा…

बेहतर...बेहतर...बेहतरीन लिखा है आपने।
कनाडा में भी धड़कता है हिंदुस्तानी दिल,
छोटी सी कविता मेरी भी ....आपके जवाब के इंतजार में।

यादें जब भी आती हैं, तेरी
दिल भर जाता है जज्बातों से

सागर से भी गहरी तेरी आंखें
पहाड़ से भी ऊंचे तेरे सपने

खुशबू सा तेरा अहसास
जो रहे मेरे आस-पास
आदित्य वर्मा

brandMARIO ने कहा…

namaste... meri hindi itni achchi nahin hain lekin koshish kartha hoon :-)

aapki ek help chahiye thi... mein indiblogger me ek contest me

bhaag le raha hoon aur aapki vote ki bohut zaroorat hain..
krupya post padkar zaroor vote karein...

http://www.indiblogger.in/indipost.php?post=30610

bahut bahut dhanyavaad... bahut mehebaani hogi...

mamta ने कहा…

बिलकुल चाँद जैसी सुन्दर रचना !

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

शब्द सामर्थ्य इसे कहते हैं.
सुंदर अभिव्यक्ति.
और जब यह तेरी नजरें ...
ठहरतीं हैं
मेरे चेहरे पर ठिठक के
- विजय तिवारी

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

शब्द सामर्थ्य इसे कहते हैं.
सुंदर अभिव्यक्ति.
और जब यह तेरी नजरें ...
ठहरतीं हैं
मेरे चेहरे पर ठिठक के
- विजय तिवारी