गुरुवार, सितंबर 24, 2009

खामोश रहना मुझे पसंद है.

याद है जबलपुर से दिल्ली जाया करता था. यदि कोई साथ में नहीं है तो मैं टी सी से निवेदन करके अपनी एसी में अन्दर की बर्थ, जिसके लिए हर साईड बर्थ वाला इच्छुक होता है, साईड बर्थ वाले से बदल कर पर्दा खींच कर बैठ जाया करता था.

पूरे सत्रह घंटे का सफर ५ से ६ घंटे सोने के सिवाय या तो किताब पढ़ते या खिड़की से बाहर झांकते बिना एक भी शब्द बोले गुजार दिया करता था.

लोग मुझे हरदम बातूनी ही समझते रहे हैं आज भी. लेकिन मेरी पसंद चुप रहना ही है. मुझे कितने भी लम्बे समय तक चुप रहने, अकेले बैठे रहने में बोरियत का अहसास नहीं होता.

शायद सभी के साथ ऐसा हो कि जैसे वो जाने जाते हैं, या जैसे वो माने जाते हैं या जैसे वो दिखते हैं या जैसे वो व्यवहार करते हैं दरअसल वो और उनकी पसंद उससे जुदा होती है.

वैसे भी मेरा मानना है कि चुप रहकर या मौन रहकर बहुत सी समस्याओं को हल अपने आप ही स्वतः हो जाता है. बात तो तब बढ़ती है, जब दोनों पक्ष बोलते हैं. एक यदि चुप ही रह जाये या बहुत कम बोले तो बात बढ़ने की गुजांईश जरा कम ही होती है. मौन की भी अपनी आवाज होती है जो बोलने वाले तक आपके भाव पहुँचा देती है.

अक्सर चुप रह जाने वाले व्यक्ति को कायर भी समझ लिया जाता है लेकिन उससे फर्क क्या पड़ता है. ऐसा समझना भी एक ललकार जैसा ही है. हाँ, अगर ऐसा लगे कि बिना बोले शायद आप की चुप्पी की फायदा उठाकर बात समाप्त होने के बजाय बढ़ाई जा रही है और मौन घातक सिद्ध हो सकता है, तो फिर जुबान तो साथ है ही, जरुर बोल देना पसंद करता हूँ लेकिन उतना ही, जितना जरुरी है.

वैसे अक्सर ही मैने अपने आसपास मेरी खामोशी से परेशान होते लोगों को देखा है. खीझ भी उठते हैं लोग मुझ पर कि कुछ तो बोलो.

मूड स्विंग हर मानव के साथ होता है. कभी खुश तो कभी दुखी. कभी प्रफुल्लित तो कभी उदास. कारण कुछ खास नहीं होते-बस यूँ ही.

कभी बेवजह बोल देने का मन भी हो आता है, कभी मजाक करने का भी, कभी ठिठोली भी. कोशिश होती है कि किसी का अपमान न हो. जब मजाक करता हूँ तो मजाक सहने का माददा भी रखता हूँ. लेकिन वो जो बेसिक नेचर है, वो नहीं बदलता और लौट लौट कर उसी पर आ जाता हूँ.

क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?

samla1

एक गज़ल कहने का मन हो आया है:

मरने वाले से पूछो तुम जहर की खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

खुद ही देख लेना तुम क्‍या ये गुल खिलाती है
कह रही बहुत कुछ है ये लहर की खामोशी

कहना भी तर्रनुम में जो ग़जल लिख चले हो
जान लोगे तुम खुद ही इस बहर की खामोशी

हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी

दी है ये खबर किसने लोग लड़ रहे हैं सब
यूं न बदज़ुबां होगी उस कहर की खा़मोशी

-समीर लाल ’समीर’


जरुरी नोट:

दो दिनों के लिए एक ऐसे स्थान पर आ गया हूँ, जहाँ इन्टरनेट की डायल अप की सुविधा अपनी गति से चल रही है. अधिकतर तो बैठी ही है मौन. पुराने समय का भारत याद आ रहा है जब १९९९ में छोड़ा था. उस वक्त डायल अप लगा कर हर पन्ने के खुलने के लिए वैसे ही इन्तजार करना पड़ता था जैसा नेताओं के चुनाव घोषणा पत्र में किये गये वायदा वाले पन्नों के खुलने का इन्तजार करना होता है. खुल गये तो वाह वाह, नहीं खुले तो हमें तो मालूम ही था.

शनिवार को घर से स्थितियाँ यथावत हो जायेंगी. पोस्ट तो शेड्यूल्ड है तो हो ही जायेगी. कमेंट भी टॆलिफोन से एप्रूव हो जायेंगे समय बे समय. दूसरे चिट्ठे पढ़ने की कोशिश करता हूँ. देखें, कितना सफल हो पाते हैं.

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117 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

कुल मिला कर कला और कलाकार की जय!
आप खामोश रह कर बोलना सिखाने की क्लास ले रहे हैं?

Rama ने कहा…

हर बार की तरह आपकी लेखनी गुदगुदा गई...धन्यवाद..
इस समय मैं कैलीफोर्नियां में हूं इधर आना हो तो संपर्क करियेगा..शेष आपकी सीख मौन की साधना कर रही हूँ :)

डा.रमा द्विवेदी

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

समीर जी मैं तो यही समझता था की आप बातूनी होंगे, पर मेरा guess गलत निकला | चलिए अब तो सच पता चल गया |

विपरीत परिस्थितियों मैं खामोस रह जाना आसान नहीं होता..... वैसे खामोस रहना भी एक कला के सामान है |

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

में तो मौन को सबसे बड़ा हथियार मानता हूँ याद कीजिए अपने पूर्व प्रधानमंत्री नर सिम्ह्वा राव को , मौन रहकर पुरे पांच साल भारत की सरकार चला गए |

अनूप शुक्ल ने कहा…

गुस्से के पाले में कबड्डी खेलने पर भी ऐसा होता है:बड़बोला मौन हो जाता है, मितभाषी बड़बोला हो जाता है। धीमे बोलने वाला चिल्लाने लगता है। चिल्लाने वाला चिंघाड़ने लगता है। चिंघाड़ते रहने वाला हकलाने लगता है। हकलाते रहने वाले के मुंह में ताला पड़ जाता है।
होता होगा कोई कायर हम आप तो शायर हो लिये।
हम तो भगवतीचरण वर्मा की कहानी दो बांके के देहाती को याद कर रहे हैं: ”मुला स्वांग खूब भरयो।”

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

समीर जी,


पसंद आई गज़ल और आपकी खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

अश’आर दिल कोछूते हुये बहुत कूछ कह जाते हैं खामोशी से।

मैं भी अंतर्मुखी तो नही पर मौन का साधक जरूर हूँ, घंटों बिना कुछ बोले अपने में ही गुम रहना पसंद आता है।

बहुत ही अच्छी पोस्ट!!!

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

M VERMA ने कहा…

कौन कहता है आप बातूनी नही है. मौन का बातूनीपन शायद सबसे सघन होता है
I can hear the sounds
With your singing dart.
Silence is the best speaker
Hear the sound by heart.
गज़ल ने तो दिल को छू लिया.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

मूड स्विंग हर मानव के साथ होता है. कभी खुश तो कभी दुखी. कभी प्रफुल्लित तो कभी उदास. कारण कुछ खास नहीं होते-बस यूँ ही.

यह तो बहुत ही सटीक बात कही आपने.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

मूड स्विंग हर मानव के साथ होता है. कभी खुश तो कभी दुखी. कभी प्रफुल्लित तो कभी उदास. कारण कुछ खास नहीं होते-बस यूँ ही.

यह तो बहुत ही सटीक बात कही आपने.

sonia ने कहा…

bahut sundar dhang se aapane maun ko abhivyakt kiya. dhanyavad.

भानाराम जाट ने कहा…

पहली बार आया हूं आपके ब्लाग पर. आपने मौन के फ़ैलाव को अच्छी अभिव्यक्ति दी है. बहुत सुंदर.

भानाराम जाट ने कहा…

पहली बार आया हूं आपके ब्लाग पर. आपने मौन के फ़ैलाव को अच्छी अभिव्यक्ति दी है. बहुत सुंदर.

आशीष खंडेलवाल ने कहा…

वाह लाजवाब गजल और मौन की परिभाषा तो बडी मस्त है।

हैप्पी ब्लागिंग।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

मौन परमात्मा है. आज आपके साथ बहुत बडी उप्लब्धि जुडने की प्रबल संभावना है. यह ताऊ देवैज्ञ की भविष्यवाणी है.

अब हमने भी ज्योतिष की भविष्यवाणियां करना शुरु कर दिया है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

दो दिनों के लिए एक ऐसे स्थान पर आ गया हूँ, जहाँ इन्टरनेट की डायल अप की सुविधा अपनी गति से चल रही है. अधिकतर तो बैठी ही है मौन. पुराने समय का भारत याद आ रहा है जब १९९९ में छोड़ा था.

ऐसी जगह आप कहीं मौन धारण करने की वजह से जानबूझकर तो नही चले गये हैं?

रामराम.

राजेश स्वार्थी ने कहा…

आपके मौन में भी शेर की दहाड़ है. बड़े बड़े बतकहिंयां शांत हो जाते हैं आपके मौन को देखकर.

Mired Mirage ने कहा…

शायद चुप रहने वाले में बहुत आत्मविश्वास होता है। शायद अधिक बोलने वाला अपने आप से डरता है। मैं तो चुप नहीं रह सकती। कोई न मिले तो स्वयं से बोल लेती हूँ। बिना आवाज के भी बात हो सकती है।
घुघूती बासूती

Devendra ने कहा…

आपका लेख पढ़कर महाभारत के -विदुर- याद आ गये।

Devendra ने कहा…

आपका लेख पढ़कर महाभारत के -विदुर- याद आ गये।

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

मौन रहकर बहुत सी समस्याओं को हल अपने आप ही स्वतः हो जाता है...

kya kahoon bus maun hoon...
:)

aur ye ghazal 'original' aapki hai...

ya 'lamaskaar' branded ?

jo bhi hai 'Awesome' Ghazal...

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

खामोशी के क्षणों में ही हम स्‍वयं से बातचीत कर पाते हैं। ऐसे कितने ही अनसुलझे राजों से पर्दा उठता है जिन्‍हें हम बोलते हुए नहीं सुलझा पा रहे थे। सफर में बेमतलब की बातों से खामोशी ही भली लगती है। नए विषय की वार्ता के लिए बधाई।

जी.के. अवधिया ने कहा…

मौन एक व्रत है और व्रत से लाभ ही होता है।

Arvind Mishra ने कहा…

क्या हो गया अब -मौन अचानक ही मुखर हो उठा !

रंजन ने कहा…

चुप्पी तो बहुत मुश्किल कला है.. आपने साध ली बधाई..

sonia ने कहा…

बहुत सुंदर पोस्ट.

mehek ने कहा…

कहना भी तर्रनुम में जो ग़जल लिख चले हो
जान लोगे तुम खुद ही इस बहर की खामोशी

हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी

ye sher bahut pasand aaye. khamshi ke saaz bhi kabhi tarannum se lehrane dene chahiye.sahi hai kuch masle aise hi haal ho jaate hai tab.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

एक खामोश पसंद व्यक्ति इतनी बड़ी बड़ी सोचनीय और स्मरणीय और अनुकरणीय बातें कह जाता है सच में बहुत बड़ी बात है..जिसे शब्द सुनना कम पसंद हो उसके पास शब्दों के सागर हो...मुझे लगता नही पर जब आप कह रहे हैं तो मानना ही पड़ेगा.वैसे मेरे हिसाब से मौन रहने वाला व्यक्ति भी बातुनी हो सकता है..क्योंकि चुप रह कर भी बातें ख़तम थोड़े ही होती है..वो तो मस्तिष्क और मन में निरंतर चलती रहती है..

ग़ज़ल अच्छी लगी..जैसा हमेशा लगती है......बधाई..

Murari Pareek ने कहा…

खामोश रहना | सिर्फ जुबान का होता है विचार अनवरत चलते रहते हैं जब खामोश होते है हैं तो मन के अन्दर बहुत कुछ चल रहा होता है | खामोशी सागर मंथन जैसी है | विचार सागर मंथन और उसमे बहुत से अमूल्य रत्न प्राप्त होते हैं |

शिवम् मिश्रा ने कहा…

मेरी माँ भी येही कहेती हैं,"एक चुप सौ को हराता है |"
बहुत बढ़िया आलेख | आभार |

P.N. Subramanian ने कहा…

कम बोलने वालों से लोग डरते हैं क्योंकि मालूम रहता है की वह गूंगा कतई नहीं है. आपकी रचना बहुत अच्छी लगी.

रज़िया "राज़" ने कहा…

मैं जहां तक आपको जानती हुं आप हर रंग में रंग जानेवाले इन्सान हैं। आदमी का मेनेजर जब उदास या ख़ामोश होता है जब दर्द हो। ये दर्द कोइ सा भी हो सकता है। अपना नहिं पराया भी हो सकता है।

जैसे कि अगर हमारा कहीं मेले में या भीड में चले गये वहां कभी चाट,या कुछ खाते हुए अगर कोइ ग़रीब बच्चा हमें अपनी ओर तकता हुआ दिखाइ दे तो भी दर्द होता है।

मेरा मानना यही है कि फ़िलहाल आप किसी दर्द से गुज़र रहे हैं। हैं ना?

समीरभाई को तो सदा बोलते ही रहना चाहिये वरना हमारा ब्लोगर "ख़ामोश: हो जायेंगे।

अन्तर सोहिल ने कहा…

अरे आप के साथ भीईई ऐसा होता है????
सचमुच मैं भी ऐसा ही हूं

प्रणाम स्वीकार करें

अर्कजेश ने कहा…

एक चुप्प हजार सुक्ख ।
खामोशी पर बढिया गज़ल ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुनते आये हैं, की एक चुप सौ को हरावे.
लेकिन कभी कभी खामोशी भी एक अपराध बोध का अहसास देती है.
वैसे यदि मौन रहकर ही काम चलता रहे, तो बेकार में बड़ बड़ क्यों करना है.
आखिर ब्लोगिंग भी तो विचारों की मौन अभिव्यक्ति ही है.
हमेशा की तरह ग़ज़ल कमाल की और सामायिक होते हुए तर्कसंगत है.

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, हर पंक्ति अपने आप में लाजवाब, आभार

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुखी विवाहित जीवन का मन्त्र एक मनोरोग विशेष्य्ग से सीखें.
जब एक बोले तो दूसरा चुप रहे.
यदि दोनों बोले तो मुसीबत, यदि दोनों चुप तो भी मुसीबत.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

हार्दिक बधाई..यह आपके ब्लाग पर 14999 वीं टिप्पणी है. शुभकामनाएं.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

और ये बना इतिहास.....हार्दिक बधाई..यह आपके ब्लाग पर 15000 वीं टिप्पणी है. शुभकामनाएं.

संजय बेंगाणी ने कहा…

:। मौन टिप्पणी...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

भविष्य के लिये शुभकामनाएं... अग्रिम हार्दिक बधाई २५००० के लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के ये.....यह आपके ब्लाग पर 15001 वीं टिप्पणी है. शुभकामनाएं.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी

बहुत बढ़िया.... खामोश रह कर बात करना भी एक कला है और यह हर किसी के बस की बात नहीं ..कई बार जी दिखता है वह सच नहीं होता है

हरिओम तिवारी ने कहा…

gahara pani mon hi rahata hai .aap to samudra nikale .
if ur silent it means ur creating something .congratulations.

हर्षवर्धन ने कहा…

खामोश :)

cmpershad ने कहा…

"क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?"

हां जी,.........मैं चुप हूँ:)

राज भाटिय़ा ने कहा…

समीर जी....अरे बाबा बिन बोले केसे गुजारा होता है...

POTPOURRI ने कहा…

समीरजी अब मैं समझी की इतना अच्छा आप कैसे लिख लेतें है. मौन रह कर बहुत कुछ सोच लेतें है और उसको शब्दों में परिवर्तित कर लेते है.

अभिषेक ओझा ने कहा…

मौन तो गंभीर होने का परिचायक है. आपकी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते लोग आपको मजाकिया समझने लगे हैं :)

विनीता यशस्वी ने कहा…

Mujhe to post ka TITLE hi sabse zyada pasand aa gaya...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi sahi kaha....

Vaibhav ने कहा…

ek baat kahani thi....is topic se thodi hat kar hai
Aap ko dekh kar "Saurabh Shukla ji" (are wahi Satya film wale Kallu Mama) yaad aa jate hain...kya aapse kaha hai kisi ne???? reference ke liye:http://en.wikipedia.org/wiki/Saurabh_Shukla

post to jandar hai hi :)

पंकज सुबीर ने कहा…

ख़ामोशी की भी जुबान होती है । और आपकी और मेरी ये आदत तो मिलती है । दिल्‍ली से भोपाल लौटते समय पूरा आठ घंटे का सफर खिड़की से बाहर देखने में ही बिताता हूं । सहयात्री से बात करना भी नहीं भाता । ग़ज़ल तो पहचानी हुई दिख रही है शायद तरही वाली है । लगभग डेढ़ माह तक नेट की दुनिया से दूर रह कर वापस आया हूं । आशा है आपका योग और भ्रमण चल रहा होगा ।

अजय कुमार झा ने कहा…

उडनतशतरी ...मौन .....यानि..साईलेंसर मोड पर.....कमाल की गज़ल है.....क्या ये भी साईलेंसर मोड में है...जो भी हो गुरू देव ...मौन मौन में ..ही रिकार्ड बना दिया आपने....मुबारक हो......

K M Mishra ने कहा…

"पूरे सत्रह घंटे का सफर ५ से ६ घंटे सोने के सिवाय या तो किताब पढ़ते या खिड़की से बाहर झांकते बिना एक भी शब्द बोले गुजार दिया करता था."

कुछ ऐसे ही नखरे हम भी कभी कभी दिखा लेते हैं ।

योगेश स्वप्न ने कहा…

safal hi safal hain aap to, badhia likhte hain.

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

मौन परमात्मा है. आज आपके साथ बहुत बडी उप्लब्धि जुडने की प्रबल संभावना है. यह ताऊ देवैज्ञ की भविष्यवाणी है.

अब हमने भी ज्योतिष की भविष्यवाणियां करना शुरु कर दिया है.
@ ताऊ जी !

आप ताऊ है कुछ भी कर सकते है तो ज्योतिष की भविष्यवाणियां क्यों नहीं ! आपकी भविष्य वाणी ताऊ .इन पर पढ़ आये है |

kshama ने कहा…

मौनम् सर्वार्थ साधनम् ....
कविता के बारेमे ...मरनेवाला तो मर गया , जीने वालों से पूछो उसने क्यों ज़हर लिया ?

आपके लेखन पे कमेन्ट करनेकी काबिलियत नही रखती...फिरभी कर दिया...कुछ गलती / गुस्ताकी हो तो क्षमा करें !

Pankaj Mishra ने कहा…

अब मै क्या बोलू हमेशा की तरह पढ़ कर चुप चाप चला जा रहा हु .

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

15 हजारवीं टिप्पणी तो हम करने मे कामयाब रहे पर १५०००१ वीं टिपणी का श्रेय श्री संजय बेंगानी जी के हाथ आया. बहुत बधाई संजय बेंगानी जी को.

पुन: आपको भी बहुत बधाई और शुभकामनाएं.

रामराम.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मौन रह के भी बहुत कुछ बोल देते है आप तो !
अब देखिये न की आप ऐसी जगह पर है जहा इन्टरनेट डाउन लोदिंग भी दिक्कत कर रही है, फिर भी आपने इतना कुछ कह डाला,
बहुत सुन्दर !!

'अदा' ने कहा…

हम बोलेगी तो बोलेंगे की बोलती है....इसलिए हम कुछ नहीं बोलेगी....:-)

Shefali Pande ने कहा…

हमसे क्या कहते हैं ....हम तो मौन रहकर ही शिक्षण कार्य किया करते हैं

प्रवीण शाह ने कहा…

.
.
.
खामोश रहना मुझे भी पसंद है...
पर यह पोस्ट नहीं रहने देती...
सोचने को भी बहुत कुछ मिला आज...

प्रेमलता पांडे ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट!

पंद्रह हजार से ऊपर टिप्पणी प्राप्त हिंदी चिट्ठाकार होने की बधाई!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सच कहा आपने, खामोशी बहुत खूबसूरत होती है पर विरले ही नसीब होती है.

डा० अमर कुमार ने कहा…


Who knows, What lies within !
लोग समझेंगे कि मैं इन्ट्रोवर्ट और स्नाब हूँ, सो
मैं जल्द ब जल्द किसी से घुल-मिल न पाता रहा ।
अब तक यह स्वीकार करने में मुझे झिझक होती रही ।
आज यह पोस्ट देख कर मेरा भी कुछ हौसला बढ़ा, सहमत हूँ ।
मौन रह कर बेलगाम ख़्यालों को भटकाना और भटकते रहने देना सुख देता है ।

आइये, हम मिल कर एक नया गुट बनायें.. क्या आप इस गुट में शामिल होना चाहेंगे ?

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अक्सर मौन भी बहुत कुछ कह जाता है.....

समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…

दी है ये खबर किसने लोग लड़ रहे हैं सब
यूं न बदज़ुबां होगी उस कहर की खा़मोशी

खामोशी के पीछे बहुत से रहस्य छुपे रहते है .बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति . क्या कहने ..... आभार

खुशदीप सहगल ने कहा…

गुरुदेव, लखनऊ में मन बेहद उदास है...नेट पर एक बेहद ज़रूरी काम था...उसे ही निपटा रहा था...आपकी पोस्ट पर नज़र पढ़ गई...मौन पर जो आपने लिखा...वही मैंने लखनऊ में महसूस किया कि मौन बिना बोले कितना कुछ बोल जाता है...अब ये संयोग ही है कि जो आपने लिखा, ठीक वैसा ही मैंने अपनी पोस्ट में भी लिखा...शायद टेलीपेथी इसे ही कहते हैं...आपने हज़ारों मील दूर होते हुए भी मेरी व्यथा बिना कहे सुन ली...कहीं कोई कमेंट देने का मन नहीं था, लेकिन यहां खुद को रोक नहीं पाया...

sandeep sharma ने कहा…

टिप्पणी आपकी इस पोस्ट पर देना चाहता था, बहुत सुन्दर लिखी है कविता और पोस्ट दोनों ही...

लेकिन क्या करूँ...
अभी अभी डायरेक्ट ऑनलाइन से मालूम चला है की आप पंद्रह हजार पार पहुँच गए हैं...

ऊपर वाली लाइन को रद्द समझा जाये और केवल नीचे वाली लाइनों पर ध्यान दें...

श्री समीर लाल जी उड़न तश्तरी वाले,
अभी अभी किसी ने सुचना दी है की आप पंद्रह हजार के पार चले गए हैं... (टिप्पणियों के मामले में)
हमारी बधाई स्वीकार करें... भगवान आपको दिन दूना और रात चौगुना करे (यहाँ भी टिप्पनिया पढ़ी जाएँ... )

किरान्गचुलेसन....

महफूज़ अली ने कहा…

yeh baat to sahi chuppi mein bahut taaqat hai........ SILENCE IS THE BIGGEST LOUD.......

amit ने कहा…

मौन बैठने से शरीर और दिमाग की बैट्री रीचार्ज होती है ऐसा मेरा अभी तक अनुभव रहा है। यार-दोस्तों आदि में मैं कितना ही बोल लूँ और लोग मुझे बातूनी कहें लेकिन घर में मैं अधिकतर मौन ही रहता हूँ! इसलिए यदि दोस्तों के बीच चुप बैठा रहूँ तो उनको लगता है कि कदाचित्‌ मेरी तबीयत खराब है जो मैं चुप बैठा हूँ, ही ही ही!! :D

drparveenchopra ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा यह लेख हमेशा की तरह।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

समीर लाल जी!
आज बहुत व्यस्तता रही इसलिए देर से आया हूँ!
बस इतना ही कहना चाहता हूँ-
आपको सम करते हैं प्यार,
इसीलिए तो हो गई हैं-
टिप्पणियाँ पन्द्रह हार के पार!!

भइया चुप रहने में ही भलाई है।

हुन्गामा के हंगामें से

अपने राम को क्या लेना-देना।

सही रास्ता चुना है,

दूर-दूर रह कर ही मजा लेना!!

दिलीप कवठेकर ने कहा…

baahar jo dekhate hai,
vo samjhenge kis tarah,
itane gamon kee bheed hai,
is aadamee ke saath....

Manoj Bharti ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति है ।

मौन को भी व्यक्त करने के लिए बोलना ही पड़ता है । एकांत व मौन की साधना से जहां एक ओर स्वयं का अवलोकन करने का अवसर मिलता है; वहीं दूसरी ओर स्वयं के सान्निध्य का आनंद भी मिलता है ।

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

मौन के भी अपने स्वर होते हैं
मौन की भी शक्ति होती है
मौन हमें अपने आप से मिलाता है
मौन हमें प्रकृति से जोड़ता है
मौन की अनुगूंज ही परमपिता तक पहुंचती है !

भाई समीर जी आपके अंतर्मन की बात भी
अच्छी लगी और ग़ज़ल भी !
ख़ास तौर पर ये शेर :
हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी


[समीर जी नेट की स्पीड का तो जिक्र ही क्या करना ? जब तक यहाँ गूगल इमेज का एक पेज पूरा खुलता है तब तक आप जैसे महारथी झंडा गाड़ चुके होते हैं :) ]

चलते-चलते एक बात और -
बाहर भाई लोग 15000 टिप्पणी पाने पर मुबारकबाद दे रहे हैं ...... अब इन्हें कौन समझाए की कितने घाटे का सौदा है, कम्बख्त जितना इनवेस्टमेंट किया उसका 10% भी रिटर्न नहीं है !

Apoorv ने कहा…

आजकल परदेस मे नोस्टाल्जिया का मौसम चल रहा है क्या सर जी..वैसे नये पक्ष भी पता चले आपके व्यक्तित्व के चुप रहना और टी सी से सलट लेना ;-)
पोस्ट की खामोशी गहरे तक खामोश कर गयी.

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

आपके पहलू में भी आकर है रुकी देख लिया
हम तो समझे थे यहीं पर ठहरती खामोशी

Billore G ने कहा…

hazoor je ittee saareetippaniyaa kya karoge kuchh idhar bhee bhej do benami hee sahee

Nitish Raj ने कहा…

सबको पता है कि आप चिट्ठे पढ़ने में भी सफल हो ही जाएंगे।
आप खामोशी से खामोश रहकर
चुप्पी तोड़ गए,
हुजूर, आप चुप रहकर भी
बहुत कुछ बोल गए।

बहुत बढ़िया लगा फिर वो ही पुराना अंदाज। आपने जो ये चलन चलाया है बहुत ही बेहतरीन बन पड़ा है। गद्य-पद्य साथ-साथ। बहुत ही उम्दा लगा कला के महारथी का ये नजराना।

Nitish Raj ने कहा…

15000 टिप्पणीयों के कीर्तिमान पर आपको बहुत-बहुत बधाई समीर जी।

मीनू खरे ने कहा…

मौन रहकर बहुत सी समस्याओं को हल अपने आप ही स्वतः हो जाता है...

बहुत अच्छी पोस्ट!!!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

कहीं ये खामोशी कान के पर्दे न फाड़ दे।
छेदती है यह।

सतीश सक्सेना ने कहा…

प्रणाम के साथ शुभकामनायें स्वीकार करें !

बी एस पाबला ने कहा…

क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?

अक्सर होता है।
तभी तो संगीता जी को, आपकी पोस्ट के पहले ही, बिन माँगी सलाह दे आए थे कि मौन भी बहुत कुछ कहता है, मैंने जाना है।

बी एस पाबला ने कहा…

... और 15000 टिप्पणियोंनुमा मील के पत्थर की बधाईयाँ आपको

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

मैं तो जानता हूं - मौन ज्यादा सोचता और सटीक बोलता है।
और अपने के बारे में जानता हूं कि जितना मौन होता हूं, उतना शृजन करता हूं!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

पहली ही टिप्पणी में दिनेश जी ने सारा सारांश कह दिया है ।

मौन कई बार एक अनिवार चेतना या विचार का अभिव्यक्तन भी है । मौन गहरा हो तो अभिव्यक्ति के कई आयाम यूँ ही खुलने लगते हैं ।

आपकी गजल ने बहुत लुभाया । आभार ।

रचना त्रिपाठी ने कहा…

यह पोस्ट पढ़ने के बाद एक बार फिर से कोशिश करुँगी कम बोलने की। मै अगर चुप हो जाती हूँ तो लोग मुझे बीमार समझने लगते है।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

"मुझे कितने भी लम्बे समय तक चुप रहने, अकेले बैठे रहने में बोरियत का अहसास नहीं होता."

ऐसा लगा जैसे आपने मेरे मन की बात लिख दी...अब इस पर क्या कहूँ..??अंग्रेजी में जो कहते हैं कह दूं...? "वाईज मैन थिंक अलाईक " ...:))
आप को वाईज कह दिया आपने बुरा तो नहीं माना ? :)) :)) :))
ग़ज़ल बहुत अच्छी है...बहुत माने बहुत ही अच्छी...
नीरज

हेमन्त कुमार ने कहा…

बधाई हो । अब आप की टिप्पणियां सचिन की रन संख्या को जल्द ही पार करे और साथ ही हर पोस्ट पर शतक पर शतक लगे ।
एक बात आप की पोस्ट के संबंध में--
"सौ वक्ता को एक चुप्पा आसानी से बिना प्रयास के ही हरा देता है ।"
आभार..!

अनिल कान्त : ने कहा…

आपकी लिखी गज़ल पसंद आई

Manish ने कहा…

bilkul mujhe bhi aisa rahna achchha lagta hai...


baki to maine apna safarnama likh hi diya hai bahut pahle hi..:) :) :) :)

aapka blog save kar ghar le ja rahaa hoon...vahin fursat se padhunga...

kyonki idhar bhi dial-up seva hai..:) :)

aapko aur bhabhi ji ko navratri ki dheron shubhkamnaayen...

बेरोजगार ने कहा…

"खामोश रहना मुझे पसंद है" सही है क्योंकि आंटी जी बोलती होंगी.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समीर भाई ........... किसी काम से आजकल टैक्सस में हूँ ........आपकी ग़ज़ल का आनंद ले रहा हूँ ....... अकेले में छुट्टी का दिन .... ब्लोगेर्स की रचनाओं का आनंद ......... चाय की प्याली हाथ में ........... पुरानी यादों की खुली किताब ................ और सब कैसे हैं .......... भाभी को और आपको और घर में सभी को ......... नवदुर्गा पूजन और दशहरे की शुभकाननाएं

Nirmla Kapila ने कहा…

मुझे तो लगता है आप बोल कर हमे चुप करवाने की कोशिश कर रहे हैं गज़ल बहुत अच्छी है । लगता है इस बार 100 पर पोस्ट का टार्गेट है ? शुभकामनायें

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

आपकी चुप्पी से तो डर लगता है.

साधवी ने कहा…

बहुत खूबसूरत मौन की जुबान रही. गजल बहुत अच्छी लगी.

Priya ने कहा…

khamoshi asar kar gai

हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी

दी है ये खबर किसने लोग लड़ रहे हैं सब
यूं न बदज़ुबां होगी उस कहर की खा़मोशी

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

पहली कोटा से...सौवीं रावतभाटा से...
पूरी सदी का फेरा लिया है...आपको घेर लिया है..

कहना भी तर्रनुम में जो ग़जल लिख चले हो
जान लोगे तुम खुद ही इस बहर की खामोशी

बहर खूब ख़ामोशी बयां कर रही है....

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

ए ल्लो ...
खामोशियाँ,
ग़ज़ल बन कर
गुनगुनानें लगीं ..
समीर भाई ,
आप के स्वभाव के हर पहलू के
दर्शन हो रहे हैं
और
सभी पसंद आ रहे हैं ..:)

- लावण्या

अजित वडनेरकर ने कहा…

मरने वाले से पूछो तुम जहर की खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

कुल मिलाकर हम जैसी ही हैं आपकी भी आदतें। हम भी घंटों बिना बोले रह लेते हैं। यूं कहें कि जबर्दस्ती बोलते हैं। पर लोग हमें बातूनी समझते हैं।

शरद कोकास ने कहा…

आपकी ज़िन्दगी की खुली किताब का यह पन्ना मुझे अपनी रेल यात्राओं की याद दिला गया जब सफर मे चुपचाप रहकर मै कवितायें लिखा करता था वे कविताएँ मेरे संग्रह में " लोहे का घर " शीर्षक से संकलित हैं कभी पढ़वाउंगा आपको ।

Ulook ने कहा…

हाँ होता है जी मेरे सांथ भी एसा जैसा ही कुछ कुछ
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एक बात पूछूं बुरा तो नहीं मानेंगे?
आपके भी कहीं कमप्यूटर चिप तो नहीं लगी है कहीं?
कैसे इतना कुछ कर लेते हैं?

श्रद्धा जैन ने कहा…

मैं भी बिलकुल आपके जैसी ही हूँ
साइड बर्थ लेकर पर्दा खींच कर सफ़र करने वाली
लोग हंसते हैं कि तुम साइड बर्थ क्यों चुन रही हो
कितनी छोटी है

और मजे की बात यही है की मैं भी बातूनी जानी जाती हूँ
हंसमुख चंचल और हर बात हवा में उडाने वाली
मेरे पति भी यही कहते हैं कि तुम बात कभी गंभीरता से नहीं लेती
मगर शयद मैं हर बात गंभीरता से लेती हूँ
आप सच कहते हैं लोग शायद जुदा ही जाने जाते हैं

GATHAREE ने कहा…

बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी , ज्ञान प्राप्त करने के लिए
मौन तपस्या का ही सहारा लेते हैं

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

Khamoshi ka bhi apna maja hai..Apni bat kahkar ap khamosh hain aur log us par tippani dene ke liye betab hain...lajwab !!

rajkumar jha ने कहा…

deepti nawal ki pusatk mein ek nazm hai...jab bahut kuch kehne ko ji chahta hai...tab kuch bhi kehne ko ji nahin chahta.
khamoshi ek jubaan hai aur hum iske kayal..

बवाल ने कहा…

कहना भी तर्रनुम में जो ग़जल लिख चले हो
जान लोगे तुम खुद ही इस बहर की खामोशी
बहुत ग़ज़ब की बात कह डाली महाराज। दिल जीत लिया और पोस्ट पढ़कर आपको याद करके आज ख़ूब रोए भी।

चाहत ने कहा…

आप खामोश रह कर
इतना अच्छा लिख रहें हैं
तो आप खामोश ही
सही हैं
ऐसी खामोशी बहुत अच्छी हैं

Acharya Kishore Ji ने कहा…

aapki khamoshi bahut kuchh kehti hain.....umeed hain ki aap aisi khamoshi se hamesha kuchh naa kuchh kehte rahenge

manu ने कहा…

khoobsoorat lagi ghazal ..
badhaai ho

रंजना ने कहा…

वाह ...आपके मन की पढ़कर " सेम पिंच " करने को मन हो आया...बिलकुल यही हाल अपना भी है...

गजल तो लाजवाब है ही......

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

ज्यादातर लोग कम ही बोलते हैं . बहुत दिनों बाद कुछ घंटो के लिए ट्रेन के स्लीपर क्लास में यात्रा करनी पड़ी तो लगा आजकल एसी में लोग ज्यादा बात करते हैं. सही बात कही आपने मौन की दुनिया ही अलग है . अलग है उसका संवाद अलग है उसका संगीत .

ujjwal subhash ने कहा…

आपकी टिप्पणी से हमें लिखने का हौसला मिलता है. बहुत आभार.

ujjwal subhash ने कहा…

Aaaap ka blog behad acgha laga or subhkamnaon ke liye sukariya or aap ko sapariwar deepawali ki subhkman..

or abhaar

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi ने कहा…

समीर लाल के ब्लाग पे जाऐँ
रचनाओँ से दिल बहलाऐँ

है यह ब्लाग बहुत ही सुंदर
क्योँ न इसे हम सब अपनाऐँ

डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी