रविवार, जून 14, 2009

गज़ल मुझसे रुठी है..

पिछले तीन हफ्तों से हर हफ्ते तीन चार दिन बाहर जाना हो रहा है. मौका ही नहीं लग पा रहा है कि ब्लॉगजगत की बहुत सुध ली जाये मगर फिर भी प्रयास जारी है. अगला हफ्ता फिर व्यस्त है. उसके बाद शायद कुछ राहत हो. अभी दो हफ्ते पहले कैलिफोर्निया यात्रा के दौरान इन प्यारे तोताराम जी से मुलाकात हुई और कुछ बात हुई.

तोताराम

कैद!!


कुछ सोच की
आसमानी सरहदें..
कुछ अनुभव के
नुकीले किनारे..

कुछ सामाजिक मर्यादाओं की
चहारदीवारियाँ..
कुछ कुटुम्बीय मान्यताऐं
मानिंद खेत की मेढ़ें..

कुछ व्यक्तिगत व्यवहारजनित
मान्यताऐं..

इन सबके भीतर
सिमटता हुआ
इक
मेरा जहाँ..

और

मैं

उस जहाँ को सोचता हूँ!!

-कैद में कौन कब खुश रहा है?






अहमियत!!


उपर से चौथी पंक्ति में
बायें से तीसरा शब्द
दायें से गिनों
तो पाँचवां
और नीचे से हिसाब लगायें
तो
सातवीं पंक्ति..

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!


-समीर लाल 'समीर'



एक जरुरी सूचना: मेरी पुस्तक ’बिखरे मोती’ जीतने का सुनहरा मौका

आप कविता लिखते हैं और हिन्दी ब्लॉगरों के बीच ख़ास मुकाम बनाना चाहते हैं? आप कविता के अच्छे पाठक हैं, कविताओं की समालोचना में यक़ीन रखते हैं। तो हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के जून 2009 अंक में भाग लीजिए और उपहार स्वरूप ले जाइए मेरी नवीनतम प्रकाशित कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति। अंतिम तिथि- 15 जून 2009। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।


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89 टिप्‍पणियां:

tanu sharma.joshi ने कहा…

Aapke simte jahan ki kasak...jitna aapko dukhi karti hai...utna hi bakiyon ko bhi...!!

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह वाह प्रभु..भाई किसने कैद कर लिया हमारी उड़नतश्तरी को..मुझे तो पहले से ही शक था की ..अमेरिका की नजर है इस पर....मगर आप चिंता न करें..हम कुछ न कुछ इंतजान कर देते हैं...कैद से छूटने का...

और गुरूजी..इतनी गहरी गहरी बातें लिखोगे..तो कसम गज़लें रूठें न रूठें..हम जरूर रूठ जायेंगे...कुछ तो सोचो ..प्रभु हम बच्चों का..अभी नादाँ है..क्या इत्ता समझ लेंगे..

ये तोतु भेई आपने आपने बिलकुल भारीभरकम पला है...हमारे तोते तो इसके सामने ...गौरैया लगेंगे...जल्दी आइये ..ज्यादा छुट्टी नहीं मिलेगी..

tanu sharma.joshi ने कहा…

aur han aapke mitthu miyan bahut khubsurat hain....p)

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

चलिए व्यस्तता की बीच भी अच्छी रचनाओं का प्रस्फुरण हो रहा है .

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

समीर भाई आप की उम्दा गज़ल पढकर बहुत खुशी हुई !
और ये सुफेद पक्षी तो काकाकौआ जैसा लग रहा है - वाह !
- लावण्या

ओम आर्य ने कहा…

achchhi rachna sameer ji.

M Verma ने कहा…

-कैद में कौन कब खुश रहा है?
कैद मे खुश तो कोई नही पर कुछ कैद भी खुशनसीबो को ही मिलता है
atyant prabhavi rachana

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहर टूटी और बात नहीं तो ग़ज़ल न सही कविता तो हुई।

गुस्ताख़ ने कहा…

एक फिल्म का गाना याद आ रहा है.. कैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी.. तो कहने का गर्ज ये कि कैद भी रोमांटिक हुआ करती है। बहरहाल, दद्दा आपने पूछा कि दिखते नहीं कहां रहते हो.. सब कुशल है..। मंगल है। बस रोज़ी-रोटी के लिए पहले एक महीने बंगाल में रहा। चुनाव कवर करने के लिए वो भी गांवों में तो अंतरजाल से दूर ही रहा। ऐसे में ब्लॉग जगत से कट गया था। फिर, बजट के लिए दौरे पर हूं.. और कोई बात नहीं। कलम में बुहत स्याही बाकी है दद्दा.. अभी तो।

woyaadein ने कहा…

पहली बार सफ़ेद तोता देख रहा हूँ.....कहीं ये भी अपने देश का तो नहीं जो दूर देश में होने की वजह से अपनी रंगत गँवा चुका है....पशु-पक्षी भी आखिर जड़-प्रेमी होते हैं......क़ैद में रहना तो किसी को नहीं भाए, मगर ग़ज़ल आपसे रूठकर कहाँ जाए ??

साभार
हमसफ़र यादों का.......

Arvind Mishra ने कहा…

शुक्रिया

अक्षय-मन ने कहा…

आज तो आपने बहुत गहेरा लिख दिया न जाने कौन से सोते मर्म को जगा दिया.......
आपकी रचना बहुत अच्छी लगी.......
और आपकी तस्वीर तो लाजवाब है.......

अक्षय-मन

संजय बेंगाणी ने कहा…

टिप्पणी छोड़ मैं तो कविता लिखने की ट्राई मारता हूँ. ;)

amit ने कहा…

तोता काफ़ी बड़ा है, एक बाज़ के आकार सा, लेकिन फोटो में बहुत प्यारा सा लग रहा है, आशा है वैसे भी प्यारा होगा। सफ़ेद तोता कभी नहीं देखा! :)

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कभी कभी गजल सही मे रुठ भी जाती है पर आप जैसे हरफ़नमौला उसे मानने पर मजबूर कर देते हैं. उम्मीद है व्यस्तता के चलते हुये भी आपका आवागमन चलता रहेगा.

बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

P.N. Subramanian ने कहा…

किताबों में कैद होने पर तो ग़ज़ल रूठेगी ही... हमने बस यों ही लिख दिया. आपकी दोनों रचनाएँ बहुत खूबसूरत हैं.

Anil Pusadkar ने कहा…

तोताराम तो सुन्दर है और रचनायें भी।

Milan ने कहा…

nice one..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह!!!!अद्भुत!!!इतना बढिया लिखा है और कहते है, गज़ल आपसे रूठी है!!!
एक लिन्क दे रही हूं समय निकाल कर देखें ज़रूर.
www.avojha.blogspot.com

रंजन ने कहा…

समीर भाई सफेद तोता वो भी मेगा साईज का.. पहली बार देखा.. शानदार तोता है..

दोनों कविताऐं गहरे अर्थ लिये..

मीत ने कहा…

कुछ सोच की
आसमानी सरहदें..
कुछ अनुभव के
नुकीले किनारे..
इन सबके भीतर
सिमटता हुआ
इक
मेरा जहाँ..
और
मैं
उफ़ क्या लिखते हैं आप...
बहुत सुंदर भाव...
मीत

नीरज गोस्वामी ने कहा…

तोता राम भी आपकी तरह मस्त और हट्टे कट्टे लग रहे हैं...दोनों रचनाएँ बहुत अच्छी कहीं हैं आपने...इतनी व्यस्तता के बावजूद कविता की सरिता बह रही है...और क्या चाहिए?
केनेडा का कार्यक्रम रद्द होने का मुझे आपसे अधिक अफ़सोस है...अगली बार सही...
नीरज

पंकज बेंगाणी ने कहा…

दोनों कविताएँ काफी अच्छी लगी. नीचे वाली ज्यादा अच्छी लगी. और यह भी अच्छा लगा कि आपकी साइडबार अब पोस्ट से डबल बडी हो गई है! :)

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बड़े तोता राम है जी यह तो :)

कितनी अहिमयत है ...
बहुत पसंद आई ..

राज भाटिय़ा ने कहा…

समीर जी केद मै भी बहुत खुशी होती है, लेकिन केसी केद..... जब प्यार हुआ इस पिंजरे से तुम कहने लगे कि उड जाओ.....हम सभी भी तो इस केद मै खुश है,ओर जो इस पिंजरे से उड जाये उसे वाज झपटा मार कर खा जाता है.
बाकी आप की रुठी हुयी गजल बहुत सुंदर लगी.
धन्यवाद

Science Bloggers Association ने कहा…

अरे, गजल रूठी है तो क्‍या हुआ, कविता से तो काम चल रहा है।
लगे रहिए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अभिषेक ओझा ने कहा…

तोताराम तो बड़े प्यारे हैं और रचना का तो कहना ही क्या !

मुनीश ( munish ) ने कहा…

o what a lovely parakeet and poetry as well!

SWAPN ने कहा…

ब्लॉगर दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहर टूटी और बात नहीं तो ग़ज़ल न सही कविता तो हुई।

6/15/2009 08:28:00 पूर्वाह्न
main dwivedi ji ki baat se sahmat hun.

bhawna ने कहा…

"chiya" god me baithe mere bete ne aapki "tote" waali foto dekhte hi pratikriya di.......:)
gajal to nahin bani lekin kavita achhi ban padi hai .
oh main chook gai ....kyonki main kavita me kuch kachhi hoon par aapka blog padhna bhata hai :)

परमजीत बाली ने कहा…

समीर जी,बहुत बढिया रचना लिखी है।"कैद" कविता की अंतिम पंक्तियां आदमी की बेबसी को जाहिर करती है।जो आज ब्लोग जगत मे भी देखने को मिल रही है।

कुछ व्यक्तिगत व्यवहारजनित
मान्यताऐं..

इन सबके भीतर
सिमटता हुआ
इक
मेरा जहाँ..

और

मैं

उस जहाँ को सोचता हूँ!!

-कैद में कौन कब खुश रहा है?

शोभा ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है। वाह

दिगम्बर नासवा ने कहा…

vaah..sameer भाई........... gazal roothee है........... किस माध्यम से क्या कहा है........... मन की दर्द को क्या khoobsoorti से utaara है ....... मान गए ustaad जी........... दोनों kavitaaon में chupe gahre bhaav को samajhnaa और samjhaana aasaan नहीं था....... पर आपकी kalam ने ये कम कर दिया............. sajeev kavitaayen हैं दोनों

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ख़ूबसूरत कविता है . अरे आपकी तोता के साथ भी अच्छी पटती है फोटो देखकर लग रहा है . बधाई हो

Shefali Pande ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना .....

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

हर स्थल की अहमियत है और हर बात की।
हां रूठना और सधना तो लगा रहता है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

VAAKAI BLOG SANSAAR SOONA HAI.

poemsnpuja ने कहा…

samir ji gazal ki kya mazaal aapse rooth jaaye, kaan pakad kar seedha kar dijiye...ya fir mana hi lijiye.
doosri wali kavita khas taur se bahut acchi lagi.

Nirmla Kapila ने कहा…

aji hame to bina jeete hee apki kitab mil gayee kavita bahut bhavmay hai aabhar

स्वप्न मंजूषा शैल ने कहा…

bahut khoosurat,
ekdam jabardast...
mmmmmere paas ab shabd nahi hain tareef ke

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!
... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!!!

अनूप शुक्ल ने कहा…

घर की बात घर में ही रखिये! जो रूठा हो उसे मना लो!

Mansoor Ali ने कहा…

आप तो कैद होने वाली चीज़ नहीं है, आपसी निरंतर उड़ान तो शायद ये तोता भी न भरता हो.
"अपनी-अपनी वुस -अते फिक्रो यकीं की बात है,
जिसने जो आलम बनाया वोह उसी का हो गया."

-m.hashmi

साधवी ने कहा…

मुझे नहीं लगता है कि आपको कभी भी पूरी तरह समझ पाऊँगी.

विनय ने कहा…

प्रभाबशाली रचनाएँ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कैद में है बुलबुल, सय्याद मुस्कराये,
कहा भी न जाये चुप रहा भी न जाये।

समीर भाई! बहुत खूब।
आपकी यही अदाएँ तो मन को लुभाती है।

रचना त्रिपाठी ने कहा…

मैं तो फोटो ही देखती रह गई। कितना बढ़ियां कम्बीनेशन है।
अति सुंदर।

रचना त्रिपाठी ने कहा…

मैं तो फोटो ही देखती रह गई। कितना बढ़ियां कम्बीनेशन है।
अति सुंदर।

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

अपने राम को तो कविता बहुत दूर की चीज दिखती है ।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

समीर भाई,
गजल बहुत सुंदर लगी.
धन्यवाद

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

श्री समीर जी,

मैं आपकी ब्लॉग प्रतिब्द्धिता का कायल हूँ। फुरसत मिली तो ब्लॉग है ही और नही है तो भी।

रचनाओं के लेकर इतना कुछ कहा गया है कि मुझे अपने विचार छोटे जान पड़ते हैं, फिर भी कहूंगा कि :-

कैद में कौन खुश रहा? एक ऐसा मन्त्र है जो फड़फड़ाने को मजबूर कर देता है, फिर कैद कहाँ?

उम्दा रचना के लिये साधुवाद।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

भैया जी, आजकल रूठने-मनाने का दौर कुछ ज्यादा ही चल रहा है। ग़ज़ल भी रूठने लगी है।

खैर तब तक दूसरा दाँव आजमाइए। आप को कई मालूम हैं।

Manish Kumar ने कहा…

अच्छा लगा आपकी रचना क़ैद को पढ़ना

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत अच्छा ......
एक नई पत्रिका समकालीन ग़ज़ल देंखे

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

चिंतन का सार ऊड़ेल दिया है आपने इसमें। छोटी पर प्रभावशाली रचना।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

न जाने कैसे कह रहे है आप ग़ज़ल आप से रूठ गई . दिन बा दिन आपकी ग़ज़ल परिपक्व हो रही है .

दीपक ने कहा…

यहाँ कितने लोग-कितने लोगो से रुठे है ...और आप फ़कत गजल के रुठने पर लिख रहे है ।

अभी तो लोगो को मनाना होगा :)

hempandey ने कहा…

प्रशंसा के लिए एक ही पंक्ति काफी है-
'कैद में कौन कब खुश रहा है?'

"अर्श" ने कहा…

DEKHAN ME CHHOTAN LAGE GHAW KARE GAMBHI WAALI BAAT KO SARTHAK KIYAA HAI AAPNE ... WESE BHI MAIN AGAR KAHUN TO CHHOTI RACHANAAYE JAYDA BHV SAMETE RAHTI HAI ... JO MUJHE KHAS KAR LUBHAATI HAI... BAHOT HI KHUBSURATI SE AAPNE BAAT KAHI HAI ... BAHOT BAHOT BADHAAYEE SAHIB..

ARSH

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!
.....Gajal ko itna bhav denge to wah ruthegi hi, yah to duniya ka rivaj hai.
_________________________
मेरे ब्लॉग "शब्द-शिखर" पर भी एक नजर डालें तथा पढें 'ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड'' एवं अपनी राय दें.

Pyaasa Sajal ने कहा…

gazab gazab ki baatein likhi hai aapne :)

hindyugm me kavita bheji hai...aapki pustak jeetne ka laalach aisa tha rok nahi paaya khud ko!!

संजय सिंह ने कहा…

न गजल आपसे रूठी है न आप गजल से दूर हें. सायद दूर होने का एहसास ही किसी व्यक्ति को उसके सबसे करीब लाने की पहली कड़ी होता है. बहुत सुन्दर रचना है.

डॉ .अनुराग ने कहा…

कविताएं भी खूबसूरत है .हाथ पे बैठा पक्षी भी......किताब हमने पहले ही जीत ली है........

Dr.T.S. Daral ने कहा…

कुछ मान्यताओं और मर्यादाओं की कैद मिलना तो खुशनसीबी की बात है.
वर्ना आजकल सबसे ज्यादा कमी तो इन्ही की देखने में आती है.
रचना और तस्वीर दोनों बहुत अच्छे लगे.
शुक्रिया.

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ ने कहा…

जीवन की गणित में
कुछ सवाल हल नहीं किये जाते।
वो होते है सिर्फ
जीने के लिए।

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति। जबसे पढ़ा है तबसे मेड़ पर अटका हुआ हूँ।

संदीप शर्मा ने कहा…

रचना त्रिपाठी ने कहा… मैं तो फोटो ही देखती रह गई। कितना बढ़ियां कम्बीनेशन है।

आपकी रचना पढ़कर मन रूमानी हुआ... और रचना जी का कमेन्ट पढ़कर और भी मज़ा आया.... तोते का और आप का कितना बढ़ियां कम्बीनेशन है... है ना....

महफूज़ अली ने कहा…

mera hausla badhaane ke liye dhanyawaad....... main apke dwara diye gaye comments ka shukraguzaar hoooon.....

cartoonist anurag ने कहा…

sabse pahale aapko bahut-bahut dhanyavaaad. apka aashirvad aour margdarshan hamesha milta rahega ye ummeed hai.....

AAPKI RACHNA BAHUT HI SUNDAR LAGI...
BADHAI........

अल्पना वर्मा ने कहा…

सफ़ेद तोता?
आप की टूटी बहर की रचना तो बाद में पढ़ी तोताराम को देखते रहे ..

-कैद--एक कटाक्ष है
-अहमियत -सशक्त अभिव्यक्ति.

गौतम राजरिशी ने कहा…

लाजवाब कविता दोनों की दोनों...
बिखरे मोती अभी कुछ दिनों पहले पहुँची है हमारे पास गुरू जी की कृपा से।

mehek ने कहा…

sunder mithumiya hai,magar sach kaid mein kaun khush raha hai,dikhawa bas reh gaya hai khushi ka.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

सही है कितने बंध हमारे समाज के और परिवार के बनाये हुए । पर यही तो कभी बहुत प्यारे थे ।
मिठ्ठु तो नही लगते ये ।

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

-कैद में कौन कब खुश रहा है?
bahut khoob likha
sachche arthon main

A_N_Nanda ने कहा…

ग़ज़ल रूठी, कुछ ज्यादती तो नहीं हुई
अब चाहिए तनिक सिचाई, फिर बंजार ज़मीं
हरियाली में तबदील होगी जरुर, कोई देर नहीं
फिक्र न करो, गुनगुनाते रहो,बस यूँही बस यूँही

pukhraaj ने कहा…

सच कहा है आपने ...
पिंजरे की बुलबुल पिंजरे मे कब खुश रहती है ...
पंखों को बाँध , उड़ना भूल कर सलाखों मे
जीना कब सीखती है....

प्रवीण जाखड़ ने कहा…

आप कहीं वन्यजीव संरक्षण कानून का उल्लंघन करके तो तोते नहीं सहला रहे हैं समीर साहब? पर सहला रहे हैं। बहुत अच्छे। आपकी दूसरी गजल बेहद पसंद आई।

KK Yadav ने कहा…

...Tab to Totaram bhi apki boli bolne laga hoga...lajwab prastuti.
_____________________________
अपने प्रिय "समोसा" के 1000 साल पूरे होने पर मेरी पोस्ट का भी आनंद "शब्द सृजन की ओर " पर उठायें.

abhivyakti ने कहा…

समीर जी,
आपके बिना ब्लोगजगत सूना लगता है...
आपको सुन्दर कविता की बधाई..

प्रकाश सिंह

ALOK PURANIK ने कहा…

अजी
आपसे कौन रुठ सके है जी।

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

खुदा गवाह है की हर अच्छी रचना कदखाने में ही सृजित हुई है....................

चन्द्र मोहन गुप्त

Dhiraj Shah ने कहा…

sundar kavita ,nice..

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आपकी रचनाएँ अब केवल रचना नही लगती हमे,
कितने जज़्बात पिरोती है ये,
कभी कभी आँखों को भिगोती है ये,
सचमुच मे आप की लेखनी मे,
सच्चाई का अहसास होता है,
एक एक शब्द का भाव,
अपने मे बहुत ही खास होता है.

Priya ने कहा…

aapke tota ram bhi achchey lage....aur to 2nd wali kavita ka kya matlab hain.....pata hain hamne to counting bhi shuru kar di thi.... dimaag ka dahi ho gaya ....phir pata chala ye to bes uhi aapne likh diya..... but bahut acchi lagi

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

आपकी अद्भुत सृजनशीलता का कायल हूँ....वाकई आपकी रचना तमाम रंग बिखेरती है...साधुवाद.***
"यदुकुल" पर आपका स्वागत है....

जगदीश त्रिपाठी ने कहा…

आपको धन्यवाद। कैद में कौन खुश रहता है। कोई नहीं। पर कैलीफोर्निया में तो आप खुश रहे ही होंगे।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार वे पांच चीजे हैं जिन्हें हमारे यहाँ त्यागने की बात सुनते आये हैं हम. किन्तु पश्चिम मोह से छूट गया दीखता है.
आपको पढ़कर, Father's Day, Mother's Day...का मतलब और ठीक से समझ आता है. यहाँ तो हर रोज़ ही हरेक का होता आया है, क्यों वहां कम से कम एक दिन तो किसी के लिए रखना ही पड़ता है...
विश्वास और पक्का होने लगता है कि हम तो गंवार ही भले भाई...

अंकित "सफ़र" ने कहा…

नमस्कार समीर जी,
बहुत सुन्दर रचना है, सही बात है कैद में कौन खुश रहता है.

©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) ने कहा…

अति सुन्दर एवं संवेदनशील रचना ।

प्रदीप कांत ने कहा…

उपर से चौथी पंक्ति में
बायें से तीसरा शब्द
दायें से गिनों
तो पाँचवां
और नीचे से हिसाब लगायें
तो
सातवीं पंक्ति..

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!

बेहतरीन ....