अभी अभी शादी से लौटे, तब ख्याल आया कि कल तो हमें कुछ लिखना नहीं है. कल हम ३० अप्रेल को सारे ब्लॉगर द्वारा वर्जनिया टेक की घटना के विरोध में ब्लॉग न लिखने के समर्थन में नहीं लिखेंगे. तब सोचा, सबको बता दें कि आ गये हैं पहले से बेहतर होकर जो कि आप निम्न पंक्तियों से समझ जायेंगे:
दो दिन की छूट....
कई माह तक कसरत करके
थोड़ा वज़न घटाया था
तले भूने का मोह छोड़ कर
नया रुप कुछ पाया था.
शर्ट हमारी लटक रही थी
गेलिस से थी पैन्ट टंगी
हमरी फिटनेस की बातों से
सारी खबरें खूब रंगी.
हमसे पूछें अदनान सामी
कैसे दुबले होते हैं
हमने कहा-क्या जानें वो
सारा दिन जो सोते हैं.
खेल सीख कर हमसे सारे
वो दुबले हो अब गाते हैं
हमको जाना था शादी में
हम कार चलाये जाते हैं.
सुबह शाम बस दावत चलती
हलुआ पूरी खाते हैं,
जितना वजन घटाया था
दुगना उससे पाते हैं.
इतने दिन की मेहनत सारी
अब तो मटिया मेट हो गई
शर्ट कसी है पेट के उपर
पैन्ट लगे लंगोट हो गई.
मोटों की बिछड़ी दुनिया में,
फिर से मेरी पूछ हो गई!!!!!
मेरी मेहनत की अब दुश्मन
दो ही दिन की छूट हो गई!!!
--समीर लाल 'समीर'
रविवार, अप्रैल 29, 2007
दो दिन की छूट....
गुरुवार, अप्रैल 26, 2007
ये तो छूट चिटिंग है!!!
आज मन खिन्न है, इसलिये नहीं कि हम बेवकूफ हैं. बल्कि इसलिये कि हमें बेवकूफ बनाया गया है. अरे, यह भी कोई बात हुई, सब मिल कर गुट बनायें है और हम अल्प संख्यकों को, ( १९३५ की पुरानी गणना के आधार पर, हालांकि आजकल हम ज्यादा हैं) उल्लू बना रहे हैं. कहते हैं कि तुम हमें टिप्पणी दो, हम तुम्हें देंगे. कोई कहता है कि इसे ऐसा मानो कि तू मेरी पीठ खूजा, और मैं तेरी. अरे मियाँ, सब माने लेते हैं. मगर यह क्या झटके बाजी है. हम लिखें चार छः लाईन की कविता या दस लाईन की रिपोर्ताज और आप लोग, जिसमें गौर तलब आलेख में समीर लाल, लम्ब लेख में फुरसतिया और अभी अभी नये रिकार्ड बनाते हुऎ अति लम्ब लेख में रवि रतलामी...और इसी गुट में अपनी सफल घुसपेठ कायम करते हुये लम्ब लेख लेखक मालवा नरेश माननीय अतुल शर्मा...माननीय इसलिये कि जो भी हमें सफलतापूर्वक लपेटता है उसे हम माननीय मान लेते हैं और फिर बंदा हमारे मध्य प्रदेश का है, जब तक मालवा प्रदेश अलग नहीं बन जाता.. इस माननीय श्रेणी में आजतक फुरसतिया जी को छोड़ कर, अरुण( हमरे पंगेबाज), हमरे मित्र काकेश (कौवों के राजा) और आज ही से पंकज बैगांणी भी पहले से मौजूद हैं. अन्य भी कई हैं.
अब आप हमारे जैसे चार लाईना वालों बीस को पढ़ कर टिप्पणी करके २० ग्राहक बना लो, अपने यहाँ टिप्पणी करने के लिये और हमें उतनी देर अकेले आपकी कभी न खत्म होने वली रचना को पढ़वाने में उलझा कर रखो. यह ठीक बात नहीं है. एक न एक दिन खमिजयाना भुगतना होगा. लिखो लिखो, खूब लिखो!! हमें क्या, कलई खुलते समय थोड़े लगता है...नहीं खुलेगी तो मसीजिवि से खुलवायेंगे ही ...वो तो इसमें स्पेशलाईज करते हैं. :)
यह सब तो सिर्फ़ सूचनार्थ था मगर दरअसल हम तीन दिन को एक शादी में यहाँ से ६०० किमी दूर मांट्रियाल जा रहे हैं कल. दोपहर तक निकलेंगे- ५ घंटे मे पहूँच जायेंगे मगर शायद शादी की अफरातरफी और उत्साह में अन्तरजाल पर ना आ पाये तो आपसे आकर रविवार को नई लम्ब पोस्ट के साथ मिलेंगे, जब भारत में सोमवार होगा. तब तक के लिये, सबको समीर लाल का लाल सलाम और उड़न तश्तरी का हरि ओम!! इतने जिक्रों के बाद भी हमें मालूम है कि राकेश खंडेलवाल भाई साः इस बीच हमारा महौल संभालें रहेंगे, क्यूँ भाई जी, सही है न!!!
जब राकेश भाई का नाम ले लिया है तो बिन मुक्तक के यूँ तो मैं जाने वाला नहीं. तो लो, सुनो एकदम ताजा मुक्तक:
अब तो लगता है, सूरज भी खफा होता है
जब भी होता है, अपनों से दगा होता है.
सोचता हूँ कि घिरती हैं क्यूँ घटायें काली
क्या उस पार भी, रिवाजे-परदा होता है.
तो अब आप दो-तीन दिन इत्मिनान से रहें, हम आकर मिलते हैं. मगर कोई भरोसा नहीं कि वहाँ से कनेक्ट हो जायें.
सोमवार, अप्रैल 23, 2007
मूषक पीर सही न जाये!!
मैने देखा है जो चुप रहता है और सीधा होता है, उसका फायदा सब लोग उठाते हैं. अब जरा सी आत्मा, बेचारा चूहा, क्या हालत कर डाली है सबने उसकी. कहाँ तो गजब का मान सम्मान था. गणेश जी तक उस पर बैठ कर सवारी करते थे. हर समय लड्डू के पास बैठा कर रखते थे कि जितना खाना है खाओ. उसके नाम लेकर शेर लिखे जाते थे: मूषक वाहन गजानना बुद्धिविनायक गजानना।.. और एक आज का समय आया है. अब गणेश जी भी यात्रा पर कम ही निकलते हैं और जब कभी कहीं जाना भी हो, तो ऐसा माहौल है कि बिना बुलेट प्रूफ गाड़ी में निकल ही नहीं सकते. चूहा वहाँ से भी बरखास्त! बस पुरानी फोटूओं में उनके साथ दिख जाता है.
वैसे भी आज के जमाने में, जो भी कभी बड़े काम का रहा हो या बड़े नाम का रहा हो, जब किसी काम का नहीं रह जाता तो उसे पूजनीय घोषित कर किनारे बैठा देने का रिवाज है और फिर खूब करो उसकी छत्र छाया में उसके पुराने प्रभाव और नाम का इस्तेमाल. वो कुछ नहीं कहेगा, बस पूजते रहो.वो इसी में खुश रहता है. इस तरह का प्रयोग राजनीति में तो खूब होता है.
ये तो मानव हैं, समझते हैं, चल जाता है. मगर चूहा!! वो तो बेचारा मूक प्राणी है. कुछ बोल नहीं पाता. चुप रहता है तो तुम तो उसकी हालत और खराब किये दे रहे हो. मूक प्राणी से झटकेबाजी. फोटो की पूजा करते हो और जिंदा को पिंजडे में फंसाने की फिराक में हो. क्या क्या नहीं जतन करते. कभी पिंजडा, कभी उसमें ब्रेड का टुकड़ा अटका कर ऐसी चालबाजी से आमंत्रित करते हो जैसे डिनर पर बुलाया है. तुम्हारा बस चले तो उसके पिंजडे में घुसने के पहले नाटकबाजी में द्वारचार का आयोजन भी करा दो. गले मिल कर मिलनी सिलनी हो जाये और जैसे ही बेचारा डिनर करने अंदर जाये और बाहर से ठक-बन्द, अटक गया. उसका तो तुमने, अपनी इसी करनी से, इंसानों पर से विश्वास ही डुलवा दिया. जब यह चाल न चलती, तो आंटे की गोलियां, लड्डू का भ्रम पैदा करती, बना कर उसमें चूहा मार दवाई डाल कर जगह जगह बगरा दी. सीधा सादा चूहा बेचारा, गणेश जी ने लड्डू का लती बना दिया, बस भ्रमवश खा ले और तुम्हारा काम बन गया. वो मर गया. हँसते खेलते परिवार का एक सदस्य गुजर गया. तुम्हें सुकुन मिल गया. नाक पर रुमाल धर कर उसका पार्थिव शरीर सड़क के किनारे फेंक आये और आकर शांति से चाय पीने लगे. हो गये खुश!! क्यूँ ?? कभी सोचा, उसके परिवार पर क्या गुजरी? खैर, इस तरह सोचो, यह तुम्हारा स्वभाव नहीं. मैं भी कहाँ बीन बजा रहा हूँ, तुम तो मुर्राते ही रहोगे. वो एक पोराणिक शेर है न: भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय. --इसी दिन के लिये लिखा गया होगा.
बात चलती है चूहे की और मैं बार बार तुम पर आ जाता हूँ. मैं भी न!! जब तब अखबार पढ़ता हूँ. देखता हूँ कि मेडिकल साईंस में बड़ी रिसर्च चल रही है. तरह तरह की दवाईयां बन रही हैं. तरह तरह के परिक्षण किये जा रहे हैं. बहुत तरक्की चल रही है. परिक्षण सफल रहा. चूहे पर किया गया. चूहा बच गया. जिस तरह उसका व्यवहार होना चाहिये था, वैसा ही हुआ परिक्षण के बाद. बिल्कुल स्वस्थ. अब वो अगले परिक्षण के लिये उपयोगी नहीं क्योंकि एक
ठीक डर है तुम्हारा. तुम इंसान हो, इंसान की तरह ही तो सोच सकते हो. इसमें क्या गलत है. अरे, अगर उसे नहीं मारोगे तो कल को यही चूहा न उठ खड़ा हो कि तुम मेरे कारण बचे. अपनी सेहत का और सम्पति में एक हिस्सा मेरा भी लगाओ. डर स्वभाविक है. जैसा अपने आस पास होता देखते हो, उसी से तो सीखते हो. ठीक तो किया जो मार दिया उसको.
किसी ने यह भी सही ही कहा है:
सच मानो या झूठ इसे तुम,
गुर सारे जिंदा रहने के,
यह जीवन ही सिखलाता है.
लेकिन जो चुप रहता है और सीधा होता है, उसे कमजोर न समझो. वो जब बोलता है न!! तब सारे पूँजी का जमा खर्च एक ही बार में बोलता है. जबाब देना भारी हो जाता है. चुप रहने वाला विचारक होता है और विचारक के तर्कों का तो तुम्हारे पास यूँ भी जबाब नहीं होता.
तो सुनो, बताओ!! आज चूहा पूछता है कि "आखिर उसकी ही ऐसी क्या खता है जो उसे तुम अपने परिक्षण का साधन बनाये हो और फिर मार देते हो ? क्या तुम्हें और कोई नहीं मिलता?"
तुम्हारे पास कुछ देर तक बहस करने की शक्ति तो हमेशा रही है जिसके आधार पर तुम अपना गलत सही सब सिद्ध करने की कोशिश करते हो. अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने लगते हो. तुम उस चूहे को भी जबाब देने लगते हो, अपने बड़े बड़े सुने हुये तर्कों के साथ:
क्यूँ न करें तुम पर परिक्षण? क्यूँ न मारे तुमको? तुम और हो किस काम के?
तुम जिस गोदाम में घुस जाओ, वहाँ का सारा अनाज खा जाओ. पूरे देश को खोखला कर डाल रहे हो. तुम्हारे पास कोई काम नहीं, सिवाय नुकसान करने के और अपनी जमात बढ़ाने के. बिना सोचे समझे बच्चे पैदा करते जाते हो. हर तरफ बस गन्दगी फैलाते हो. जहाँ से गुजर जाओ, पूरा माहौल खराब कर दो. बदबू ही बदबू. तुम्हें पकड़ने के लिये लोग पिंजड़ा लगाते है, तुम बच निकलते हो. जो भी जाल बिछा लो, तुम्हें उसे कुतर कर बच निकलने के सब गुर मालूम हैं. अरे, तुम खुद बच कर निकल लो तब भी ठीक. तुम तो जिस पर अपनी उदार नजर रख दो, उसे तक जाल कुतर कर छुड़ा ले जाते हो. तुम बस चेहरे से भोले लगते हो, अंदर से कुछ और ही हो. बिल्ली तक को चकमा देकर निकल जाना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है. तुम तो पूरे समाज के लिये घातक हो. दफ्तर की जरुरी जरुरी फाईलें तक कुतर डालते हो. न जाने कितने साक्ष्य मिटा डाले इस तरह तुमने, कुछ पता भी है.कई बार तो लगने लगता है कि तुम भ्रष्ट नौकरशाहों और क्रिमनल्स के लिये कमीशन पर काम करते हो. अरे, हमने तो यह तक देखा है कि जब माड लगा तिरंगा झंडा गणतंत्र दिवस पर फहरने के बाद स्वतंत्रता दिवस के लिये लपेट कर रखा गया, तब तुम उसे तक कुतर गये. राष्ट्र के सम्मान का जरा भी ख्याल नहीं. तुम देशद्रोही हो. तुम महामारी फैलाते हो. (शायद यह प्लेग की बात की है)!!!
चूहा तुम्हारी हर बात को गौर से सुन रहा है चुपचाप. जो चुप रहते हैं न! वो बहुत समझ कर और गौर से सुनते हैं. लो, अब वो चूहा कह रहा है:
वही तो!! फिर हम को ही क्यूँ. नेताओं को क्यूँ नहीं पकड़ते. उन पर क्यूँ नहीं करते यही परिक्षण और सफल होने के बाद उन्हें क्यूँ नहीं मार देते. तुमने जितने भी कारण गिनाये हैं, बताओ तो जरा, उनमें से कौन सा इन नेताओं में नहीं है? अरे! हम जो महामारी फैलाते हैं न प्लेग की. वो तो एक गाँव या ज्यादा ज्यादा एक शहर में सीमित होकर रह जाती है. और ये तुम्हारे नेता!! ये जो महामारी फैला रहे हैं-भ्रष्टाचार की, संप्रदायिकता की, धर्म के नाम पर बँटवारे की-वो तो पूरे राष्ट्र को संक्रमित कर रही है. कोई भी इस संक्रमण की चपेट से नहीं बच पा रहा है. न तो इसका कोई इलाज है, न दवा!!
अरे! हम जो महामारी फैलाते हैं न प्लेग की. वो तो एक गाँव या ज्यादा ज्यादा एक शहर में सीमित होकर रह जाती है. और ये तुम्हारे नेता!! ये जो महामारी फैला रहे हैं-भ्रष्टाचार की, संप्रदायिकता की, धर्म के नाम पर बँटवारे की-वो तो पूरे राष्ट्र को संक्रमित कर रही है. कोई भी इस संक्रमण की चपेट से नहीं बच पा रहा है. न तो इसका कोई इलाज है, न दवा!!
हर गली कूचे से लेकर, ब्लॉक से शहर तक, प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर तक हर जगह बहुतायत में हैं. पकड़ो न इन्हें!!! करो न परिक्षण!! मारो न इन्हें. हम लिख कर दे सकते हैं कि हमारी प्रजाति तो खत्म हो सकती है, मगर ये तुम्हें अपनी उपलब्धता की कमी का एहसास कभी न होने देंगे. हम छोटे से प्राणी, कितना अन्न खा जायेंगे, कितना बिगाड़ कर लेंगे.
अब तुम्हारे पास जबाब नहीं है. बहस तो शुरु कर ली, पूरा ज्ञान एक ही बारी में उलट कर रख दिया और अब खिसकने का रास्ता देख रहे हो!! खिसको..खिसको!! यही तुम्हारी फितरत है. जब जबाब न सूझे, तो खिसक लो!!
वाह रे इंसान! बहुत खूब. नमन करता हूँ तुम्हारी होशियारी को.
गुरुवार, अप्रैल 19, 2007
बुढापा देख कर रोया...
पिछली पोस्ट की भूमिका देखकर एक मित्र ने विनोदवश प्रश्न उठाया कि क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है कि किसी कविता की सिर्फ भूमिका ही पढ़ी गई और लोगों ने कविता पढ़ी ही नहीं क्योंकि भूमिका बहुत लंबी थी. अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं, मगर जब से उन्होंने इस तरफ नजर डलवा दी, लगने लगा है कि हो तो सकता है.
होने को तो कुछ भी हो सकता है!!
जब एक भ्रष्टाचारी मंत्री हो सकता है
और एक गुंडा संतरी हो सकता है.
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
जब जेलर को कैदी पीट सकते हैं
और बाहुबली चुनाव जीत सकते हैं
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
जब बंग्लादेश भारत को हरा सकता है
और निर्दलीय सरकार गिरा सकता है..
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
बिल्कुल हो सकता है..इसलिये हम इस कविता की कोई भूमिका नहीं लिखेंगे. डॉक्टर ने हमसे क्या कहा और यह कविता हमारी डॉक्टर की वार्तालाप का नतीजा है, इसके लिये भूमिका की क्या जरुरत है. वो तो आप पढ़कर खुद ही समझ सकते हैं और हमें तो यह तक बताने की आवश्यकता भी नहीं है कि यह रचना भी बाल महिमा, रक्तचाप पुराण, मोटापा व्यथा की श्रृंखला की ही कड़ी है. 
बुढापा देख कर रोया……..
कोहरे में धुंधला दिखता है
इसमें कौन अजूबा है
लेकिन मेरी पत्नी का मुँह
इसी बात से सूजा है.
कहती है कि नज़र तुम्हारी
अब तुमसे नाराज़ हो गई
और चिपक लो कम्प्यूटर से
हालत कैसी आज हो गई.
डॉक्टर बाबू बतलाते हैं
चिंता की यह बात नहीं है
बुढ्ढों के संग हो जाता है
डरने वाली बात नहीं है.
हमने बोला, होता होगा
मगर हमारे साथ हुआ है,
बुढ्ढों की क्यूँ बातें करते
जवां मर्द के साथ हुआ है.
भरी जवानी नस नस में है
दिल भी मेरा नाच रहा
मेरी प्रेम भरी कवितायें
बच्चा बच्चा बांच रहा.
एक जवानी उम्र चढ़ाती
एक जवानी मन की है
जिसके मन पर छाई उदासी
उसकी चिंता तन की है.
मुझसे खाते रश्क हैं वो भी
जो अब तक कालेज में हैं
उनके क्या क्या प्रेम तरीके
सब मेरी नालेज में हैं.
आगे जब भी बात करो तुम
हमको बुढ्ढा मत कहना
तोड़ फोड़ मचवा दूँगा मैं
फिर मेरी हरकत सहना.
मैं तो बस कहने आया था
तुम अपना कुछ ध्यान करो
उम्र तुम्हारी गुजर रही है
युवकों का सम्मान करो.
-समीर लाल ‘समीर’
सोमवार, अप्रैल 16, 2007
गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा
स्वामी समीरानन्द की प्रवचनमाला: ई X Factor क्या है. भाई!!
अभी कुछ दिन पहले पंकज ने मेक्सिम पत्रिका से मन्दिरा बेदी की तस्वीरें अपने ब्लाग पर छापी थी और कहा कि मन्दिरा जो कि अपने X-Factor के लिए हमेशा चर्चा में रही. इस बात पर उनके पाठकों ने X Factor के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट की. पंकज इस X Factor को समझाने का जिम्मा उसी वक्त, वहीं टिप्पणी में, हमारे उपर टरका कर किनारे हो गये और रोज पूछते हैं कि क्या हुआ, कब लिखोगे. यह उनकी आदत है कि कहीं पर कुछ भी फैला लो और फिर किसी के सर पर भी टोपी रख दो कि जरा इसे साफ कर देना और उस पर से तुर्रा कि जरा जल्दी और ठीक से और शुरु तकादे की झड़ी. मगर फिर भी हम सब झेलते हैं और उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं. दिखने में दुबले पतले, एक औसत और आम नागरिक, हर चीज में नार्मल टाईप मगर फिर भी न जाने क्या बात हैं उसमें कि सब उससे जुड़ना चाहते हैं. उससे बात करना चाहते हैं, मिलना चाहते है. यह वो भी नहीं जानता. कोई विशेष खासियत वाली बात नहीं मगर फिर भी एक अद्दश्य, अनजान कोई बात है बंदे में और वो ही तो X Factor कहलाता है. X Factor का धारक खुद नहीं जानता कि उसमें X Factor है. बस लोगों को आकर्षित करने की, सम्मोहित करने की एक आलोकिक और अदभूत इनबिल्ट शक्ति- यही X Factor है.
यह X Factor अधिकतर (अधिकतर शब्द पर गौर फरमाये अर्थात सबमें नहीं) सेलेब्रेटी म्यूजिक और फिल्म स्टार्स में बहुतायत में पाया जाता है. लोग पागलो की तरह टूट पड़ते हैं उनकी झलक पाने. अब यह टूटन कभी कभी Sex Appeal से भी प्रभावित होती है और यही X Factor की परिभाषा की समझ में द्वंद पैदा कर देता है. मगर मेरी समझ से X Factor और Sex Appeal के मायने आपस में एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं, यह मैं आपको उदाहरण देकर बाद में समझाता हूँ. अभी के लिये तो बस इतना जान लें कि यह एक नहीं हैं. मगर एक का दूसरे में सम्मिश्रण मिठास और बढ़ा देता है.
यूँ तो यह X Factor सेलेब्रेटी म्यूजिक और फिल्म स्टार्स की बपौती नहीं है, यह पंकज का X Factor साबित कर ही चुका हैं. पंकज तो पंकज, मैने तो X Factor की एक अच्छी खासी मात्रा लालू प्रसाद यादव तक में देखी है और भी कई नेताओं में है मगर सब नेताओं में हो, यह जरुरी नहीं. मुलायम सिंग और नितिश कुमार में नहीं है जबकि तीनों एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं. एक सी इमानदारी (यहाँ इमानदारी शब्द का वैसा ही प्रयोग है जैसे अंधेरे को अंधेरा न कह कर रोशनी का आभाव कहा जाये या फिर लॉस को निगेटिव प्राफिट), एक सी हरकतें, एक से पद, एक से राज्य, लगभग एक सी वेशभूषा मगर लालू में जो X Factor है, वो उनको इन दोनों से अलग करता है. लालू आपके शहर में आयें तो भीड़ जमा होती है, उनकी झलक पाने के लिये और नितिश और मुलायम के लिये भीड़ जमा करनी होती है, ताकि ये भीड़ की झलक पा लें तो कार्यकर्ताओं की रोजी रोटी चलती रहे. खैर, इन सबसे क्या लेना देना, हम लोग तो X Factor समझ रहे थे. किसी ने बताया है कि कुछ क्रिमिनल्स में भी X Factor होता है मसलन दाऊद में है मगर और न जाने कितनी जेलों में बंद क्रिमिनल्स में नहीं है.
एक सी इमानदारी (यहाँ इमानदारी शब्द का वैसा ही प्रयोग है जैसे अंधेरे को अंधेरा न कह कर रोशनी का आभाव कहा जाये या फिर लॉस को निगेटिव प्राफिट), एक सी हरकतें, एक से पद, एक से राज्य, लगभग एक सी वेशभूषा मगर लालू में जो X Factor है, वो उनको इन दोनों से अलग करता है.
तो X Factor का तो ऐसा है कि यह खरीदा नहीं जा सकता, यह पहना नहीं जा सकता, यह सीखा नहीं जा सकता बस उपर वाले की मेहरबानी है. है तो है नहीं है भूल जाओ. कुछ नहीं कर सकते इसकी प्राप्ति के लिये. आप अपनी जुगत भीड़त लगा कर मंत्री का पद ला सकते हैं, उपाधि ला सकते हैं, पुरुस्कार ला सकते हैं, मंचों पर उच्च स्थान पर विराजमान हो सकते हैं मगर X Factor नहीं ला सकते, यह तो कुछ लोगों के साथ उपर से पैक करके भेजा जाता है. पैकिंग उम्र के किस पड़ाव में खुलेगी, कोई नहीं जानता बस इतना पता है कि आपका X Factor आपके साथ ही विदा हो जायेगा.
मुझे तो लगता है कि हमारा हिन्दी चिट्ठाजगत भी इससे अछूता नहीं है. यहाँ भी लोग हैं X Factor के साथ.
याद आता है कभी सागर ने कहा था, अलविदा चिट्ठाजगत.ऐसा मनुहार मचा, ३० ३० कमेंट, रुक जा भईया, न जा. तेरे बिन हम नहीं रह पायेंगे और जाने क्या क्या, तब जा कर वो रुके. फिर देखता हूँ रचना जी को, वो तो सिर्फ नारद छोड़ने की बात कर रहीं थी, उस पर ३० लोग भीड़ लगा लिये कि अरे कहाँ जा रहीं हैं, हमारा क्या होगा. और एक हमें देखिये, चिट्ठाचर्चा छोड़ने का एलान किये, फिर इंतजार करते रहे कि लोग मनायेंगे कि न जाओ. कोई आया ही नहीं मनाने बल्कि शुभचिंतक पंकज ऐसे कि कहने लगे मैं स्वयं चाहता हुँ लालाजी कुछ समय के लिए चिट्ठाचर्चा से अवकाश लें...तो हम खुद ही लौट आये वरना तो समझो बाहर ही हो गये थे. आखिरकार तीनों ही तो चिट्ठाकार हैं. तीनों को ही अपने लेखों पर ठीकठाक टिप्पणियां मिल जाती हैं और तीनों को ही चिट्ठाजगत जानता है. फिर ऐसा क्या है कि लोग उन्हें रोकने के लिये बिछ बिछ गये और एकदम वैसी ही घटना में हमारे लिये बिछना तो दूर, सलाह मिलने लगी कि ठीक है अवकाश ले लिजिये. यह जो अनदेखा अंतर है न!! जो दिखता नहीं मगर है, वही X Factor है. यह लोगों को आपकी तरफ आकर्षित करता है अनायास ही. आप कुछ नहीं करते. न ही सजते हैं, न ही कोई खास अदा दिखाते हैं मगर यह फेक्टर लोगों को बरबस ही आपकी ओर आकर्षित करता है. किसी में कम, किसी में ज्यादा और किसी में बिल्कुल नहीं. स्त्री या पुरुष से कोई फर्क नहीं पड़ता. अब देखिये रचना जी में है तो सागर में भी है. हममे नहीं है. जाहिर है तभी तो कोई रोकता नहीं.
यह जो अनदेखा अंतर है न!! जो दिखता नहीं मगर है, वही X Factor है. यह लोगों को आपकी तरफ आकर्षित करता है अनायास ही. आप कुछ नहीं करते. न ही सजते हैं, न ही कोई खास अदा दिखाते हैं मगर यह फेक्टर लोगों को बरबस ही आपकी ओर आकर्षित करता है. किसी में कम, किसी में ज्यादा और किसी में बिल्कुल नहीं.
मैने कई लोगों को X Factor और Sex Appeal में कन्फ्यूज होते देखा है. अब पंकज और सागर के उदाहरण से तो आप समझ ही गये होंगे X Factor और Sex Appeal का आपस में कुछ लेना देना नहीं. कहाँ ये दोनों सीधे सादे बालक और कहाँ Sex Appeal .
चलते चलते बताता चलूँ कि यह X Factor कोई नया आईटम नहीं है या हम पहले नहीं जो इससे परेशान हो कर लिख रहे हैं. तुलसी दास जी के समय में भी जब X Factor के आभाव में उनका नाम नहीं हो पा रहा था और उनकी योग्यता के सामने नाकारे कवि, उनसे ज्यादा नाम कमा रहे थे सिर्फ X Factor के चलते, तब उन्होंने यह एक लाईन का शेर कहा था जिसमें उन्होंने X Factor को हवा बताया है और नाकारे कवियों को धूल ( तुलसीदास जी अक्सर प्रतीकों में बात कहते थे, सीधे नहीं (शायद विवादों से बचने को ऐसा करते रहे होंगे)):
गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा ।
अर्थात हवा का साथ पाकर धूल आकाश पर चढ जाती है — गोस्वामी तुलसीदास
आशा है मित्रों की X Factor को लेकर जिज्ञासा कुछ हद तक शांत हुई होगी.
शुक्रवार, अप्रैल 13, 2007
मोटापा बदनाम हो गया!!
अजीब दो गले लोग हैं. एक तरफ तो कहते हैं, प्रगति होना चाहिये- चहुंमुखी प्रगति एवं सर्वांगीण विकास. इंडिया उदय और न जाने क्या क्या नारे. अब जब विकास की राह पर हम इसका अक्षरशः पालन करने लगे तो कहते हैं कि मोटापा हानिकारक है. यार, हम क्या करें. हम तो मानो फँस कर रह गये. सुनो तो बुरे बनो, न सुनो तो बुरे. इससे अच्छा तो हम नेता होते तो ही ठीक था. सुन कर भी हर बात अनसुनी कर देते. देख कर अनदेखा कर देते.
अब तो हमारे अड़ोसी पड़ोसी भी हमको मोटा कहने में नहीं सकुचाते. ये वो ही लोग हैं, जो कभी हमें बचपन में अपनी गोद में लेकर हमारे गाल नोचते थे. मोटे हम तब भी थे. मगर तब सब हमें हैल्दी बेबी, क्यूट, गबदू बाबा और न जाने क्या क्या कह कह कर प्यार करते थे, आज वो ही बदल गये हैं. मोटा कहते हैं. जमाने की हवा के साथ बह गये हैं सब. हमको तो मोटापे का पैमाना बना कर रख दिया है. जब भी किसी मोटे की बात चलती है, कहते हैं, इनसे ज्यादा मोटा है कि कम. मानो कि हम हम नहीं, मोटापे के मानक हो गये..
वैसे इन्हीं लोगों को जब जरुरत पड़ती है, तो इन्हें ही हम महान नजर आने लगते हैं. उस दिन भाई जी और भाभी जी का ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं था, तो हमें ही ट्रेन में सीट घेरने भेजे थे. हम अकेले ही दो सीट घेर लिये थे. फिर यह लोग बड़े आराम से यात्रा करते निकल गये और चलते चलते हमें हिदायत दे गये कि वजन कुछ कम करो. अरे, अगर उनके जैसा वजन होता तो दो लोग लगते उन दोनों के लिये सीट घेरने के लिये और फिर भी शायद कोई वजनदार धमका कर खाली करा लेता. एक तो इनका काम अकेले दम करो और फिर नसीहत बोनस में सुनों. अजब बात है.
इन्हें मोटा होने के फायदों का अंदाज नहीं है. अज्ञानी!! मूर्खता की जिंदा नुमाईश! अरे, मोटा आदमी हंसमुख होता है. वो गुस्सा नहीं होता. आप ही बतायें, कौन बुढ़ा होना चाहता है इस जग में? मोटा आदमी बुढ्ढा नहीं होता (अगर शुरु से परफेक्ट मोटा हो तो बुढापे के पहले ही नमस्ते हो जाती है न!! राम नाम सत्य!!). वो बदमाश नहीं होता. बदमाशों को पिटने का अहसास होते ही भागना पड़ता है और मोटा आदमी तो भाग नहीं सकता, इसलिये कभी बदमाशी में पड़ता ही नहीं.
नादान हैं सब, मुझे उनसे क्या!! मैं तो देश की समृद्धि और उन्नति का चलता फिरता विज्ञापन हूँ और मुझे इस पर नाज है.
दुबला पतला सिकुड़ा सा आदमी, न सिर्फ अपनी बदनामी करता है बल्कि देश की भी. मैने ऐसे लोगों की पीठ पीछे लोगों को बात करते सुना है. कहते हैं, न जाने कहाँ से भूखे नंगे चले आते हैं. मुझसे से मेरी पीठ पीछे भी कोई ऐसा कहे, यह बरदाश्त नहीं. हम तो मोटे ही ठीक हैं. अरे, अपना नहीं तो कम से कम अपने देश की इज्जत का तो ख्याल करो.
जिस तरह से महानगरों के कुछ क्षेत्रों में विकास, मॉल, कॉल सेंटर आदि की जगमगाहट को राष्ट्र का विकास का नाम देकर भ्रमित किया जाता है. ठीक उसी तरह मोटापे से ताकतवर होने का भ्रम होता है, भले अंदुरीनी स्थितियाँ, राष्ट्र की तरह ही, कितनी भी जर्जर क्यूँ न हो. भ्रम में ही सही, एक बार को सामने वाला डरता तो है. दुबलों से तो भूलवश भी आदमी नहीं डरता और बिना डराये कौन सा काम हो पाता है.
जिस तरह से महानगरों के कुछ क्षेत्रों में विकास, मॉल, कॉल सेंटर आदि की जगमगाहट को राष्ट्र का विकास का नाम देकर भ्रमित किया जाता है. ठीक उसी तरह मोटापे से ताकतवर होने का भ्रम होता है, भले अंदुरीनी स्थितियाँ, राष्ट्र की तरह ही, कितनी भी जर्जर क्यूँ न हो. भ्रम में ही सही, एक बार को सामने वाला डरता तो है. दुबलों से तो भूलवश भी आदमी नहीं डरता और बिना डराये कौन सा काम हो पाता है.
मुझे मोटापे से कोई शिकायत नहीं है, मगर मोटापे को साजिशन बदनाम होता देखता हूँ तो दिल में एक टीस सी उठ जाती है और उसी वेदना को व्यक्त करती यह रचना पेश है:
मोटापा बदनाम हो गया
आज हमारे गिर पड़ने से
एक अजब सा काम हो गया.
सारी गल्ती उस गढ्डे की
मोटापा बदनाम हो गया.
बच्चे बुढ़े जो भी आते
जोर जोर से हँसते जाते
हड्डी लगता खिसक गई है
कमर हमारी सिसक रही है
मरहम पट्टी मालिश सबसे
थोड़ा सा आराम हो गया
सारी गल्ती उस गढ्डे की
मोटापा बदनाम हो गया.
बिस्तर पर हम पड़े हुये हैं
लकड़ी लेकर खड़े हुये हैं,
घर वाले सब तरस दिखाते
दुबलाने के गुर सिखलाते.
सुनते सुनते रोज नसीहत
पका हुआ सा कान हो गया.
सारी गल्ती उस गढ्डे की
मोटापा बदनाम हो गया.
खाने को मिलती हैं दालें
बिन तड़के और बंद मसाले
लौकी वाली सब्जी मिलती
मेरे मन की एक न चलती
मुझको बस दुबला करना ही
मानो सबका काम हो गया
सारी गल्ती उस गढ्डे की
मोटापा बदनाम हो गया.
--समीर लाल 'समीर'
नोट: यह मोटापा व्यथा मेरे द्वारा पूर्व रचीत "बाल महिमा" और "रक्तचाप पुराण" श्रृंखला की ही कड़ी है.
मंगलवार, अप्रैल 10, 2007
बिजली के खम्भे, गालियाँ और कुत्ते!!
बिजली विभाग और उसकी रहवासी कॉलिनियों से मेरा बड़ा करीब का साबका रहा है. पिता जी बिजली विभाग में थे और हम बचपन से ही उन्हीं कॉलिनियों में रहते आये.
मैने बहुत करीब से बिजली से खम्भों को लगते देखा है, एक से एक ऊँचे ऊँचे. उच्च दाब विद्युत वाले लंबे लंबे खम्भे और टॉवर भी, सब लगते देखें हैं.
जब बड़े टॉवर और खम्भे लगाये जाते थे साईट पर, तब खूब सारे मजदूर जमा होते थे. खम्भा उठाते और खड़ा करते वक्त सामूहिक ताकत एकत्रित करने के लिये वो नारे के तर्ज पर गंदी गंदी गालियाँ बका करते थे. गाली का पहला भाग उनका हेड मजदूर चिल्ला कर बोलता और बाकी के सारे मजदूर सुर में उसे पूरा करते हुये ताकत लगाते थे और खम्भा खड़ा कर देते.
जब भी कोई मंत्री निरीक्षण के लिये आते, तब उन मजदूरों को गाली न बकने के निर्देश दिये जाते. मैं आश्चर्य किया करता. अरे, खम्भा तो निर्जीव चीज है. इन गालियों के असली हकदार की उपस्थिती में ही उन पर पाबंदी! यह तो अजब बात हुई!! मगर यही तो होता है लोकतंत्र में. जो जिस चीज का असली हकदार होता है, वो ही उससे वंचित रहता है. सब कुछ उल्टा पुलटा. जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में, बिल्कुल उदासीन और निर्जीव-बिना गड़े खम्भे के समान. उनसे बेहतर तो मुझे यह निर्जीव खम्भा ही लगता है. शायद कल को गड़ा दिया जाये तो खड़ा तो हो जायेगा. ये तो यूँ उदासीन ही पड़े पड़े व्यवस्था पर कुढते हुए इसी मिट्टी में मिल जायेंगे एक दिन.
जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में, बिल्कुल उदासीन और निर्जीव-बिना गड़े खम्भे के समान. उनसे बेहतर तो मुझे यह निर्जीव खम्भा ही लगता है. शायद कल को गड़ा दिया जाये तो खड़ा तो हो जायेगा. ये तो यूँ उदासीन ही पड़े पड़े व्यवस्था पर कुढते हुए इसी मिट्टी में मिल जायेंगे एक दिन.
तो बात चल रही थी, मंत्री जी के निरीक्षण की. तब सब मजदूर ताकत इकट्ठा करने और दम लगाने के लिये दूसरे नारों का प्रयोग करते. सरदार कहता, "दम लगा के" पीछे पीछे सारे मजदूर ताकत लगाते हुए कहते, "हइस्सा" और बस खम्भा लग जाता. मंत्री जी के सामने तो यह महज एक शो की तरह होता. हल्के फुल्के खम्भे खड़े कर दिये जाते. फिर मंत्री जी का भाषण होता. वो चाय नाश्ता करते. कार्य की प्रगति पर साहब की पीठ ठोकी जाती और वो चले जाते. और फिर भारी और बड़े खम्भों की कवायद चालू...बड़ी बड़ी मशहूर हीरोइनों के नाम लिये जाते सरदार के द्वारा और बाकी मजदूर उन नारों वाली गालियों को पूरा करते हुए ताकत लगाते और खम्भे खड़े होते जाते.
मैं तब से ही गालियों के महत्व और इनके योगदान से परिचित हूँ. क्रोध निवारण के लिये इससे बेहतर कोई दवा नहीं. बहुत आत्म विश्वास और ताकत देती हैं यह गालियाँ. जितनी गंदी गाली, जितनी ज्यादा तर्रनुम में बकी जाये, उतनी ज्यादा ताकत दिलाये. काश इस बात का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाता, तो न तो च्यवनप्राश बिकता और न ही गुप्त रोग विशेषज्ञों की दुकान चलती. जड़ी बूटियों से ज्यादा ताकत तो इन गालियों में हैं, वरना वो मजदूर जड़ी बूटी ही खाते होते. गालियाँ तो बस गालियाँ होती हैं:
मुफ्त का उपाय सीधा-सादा,
भरपूर ताकत का पूरा वादा.
उम्र के साथ साथ बाद में इन गालियों के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के विषय में भी ज्ञानवर्धन होता रहा. (फुरसतिया: गालियों का सांस्कृतिक महत्व और फुरसतिया: गालियों का सामाजिक महत्व, इसी लेख का अंश याद आता है: )
गाली का सबसे बडा़ सामाजिक महत्व क्या है?
मेरे विचार में तो गाली अहिंसा को बढा़वा देती है। यह दो प्राणियों की कहासुनी तथा मारपीट के बीच फैला मैदान है। कहासुनी की गलियों से निकले प्राणी इसी मैदान में जूझते हुये इतने मगन हो जाते हैं कि मारपीट की सुधि ही बिसरा देते हैं। अगर किसी जोडे़ के इरादे बहुत मजबूत हुये और वह कहासुनी से शुरु करके मारपीट की मंजिले मकसूद तक अगर पहुंच भी जाता है तो भी उसकी मारपीट में वो तेजी नहीं रहती जो बिना गाली-गलौज के मारपीट करते जोडे़ में होती है। इसके अलावा गाली आम आदमी के प्रतिनिधित्व का प्रतीक है। आप देखिये ‘मानसून वेडिंग’ पिक्चर। उसमें वो जो दुबेजी हैं न ,जहां वो जहां मां-बहन की गालियां देते हैं पब्लिक बिना दिमाग लगाये समझ जाती है कि ‘ही बिलांग्स टु कामन मैन’।
तब हमारे पास एक कुत्ता होता था. हम चाहते तो उसका नाम कुत्ता ही रख देते. मगर फैशन के उस दौर की दौड़ में हाजिरी लागाते हुए हम ने उसका नाम रखा - टाईगर. बस नाम टाईगर था अन्यथा तो वो था कुत्ता ही. वो तो हम उसका नाम टाईगर की जगह बकरी भी रख देते तो भी वो रहता कुत्ता ही, न!! ना