शनिवार, अगस्त 24, 2019

समस्यायें परेशान करतीं तो उनसे मूंह फेर लेते हैं नेता जी



बचपन से परिचित - हम सहपाठी थे दर्जा आठ तक.
फिर उसकी पढ़ाई की रफ्तार शनैः शनैः मद्धम पड़ गई और ११ वीं तक आते आते उसकी शिक्षा यात्रा ने उस वक्त के लिये दम तोड़ दिया.
अक्सर मौहल्ले के चौराहे पर खड़ा दिखता ४-६ आवारा लड़कों के साथ. किसी ने बताया कि अब वो छोटी मोटी चोरी की वारदातों में शामिल रहने लगा है. स्वभाव से मिलनसार एवं व्यवहारकुशल.जब भी दिखता तो हाथ उठा कर अभिवादन करता और चाय के लिये जरुर पूछता. यह उसकी आदत का हिस्सा बन गया था. पूछना उसका काम होता और मना करके किसी कार्य की जल्दी बतला कर निकल जाना मेरा.
दरअसल मैं डरा करता था कि कहीं उसके साथ साथ किसी लफड़े में न अटक जाऊँ. वो भी शायद समझता होगा तो बस, इतना सा कह कर मुस्करा देता कि ठीक है. आगे कभी सही. मेरे लायक कोई काम हो तो बताना. यह पूछना भी उसकी आदत का ही हिस्सा था अन्यथा किसी चोर से क्या काम बतायें? यही उसकी सहृदयता की निशानी है. धार्मिक वो शुरु से रहा. मंदिर मे सुबह शाम दोनों वक्त माथा टिकाने जाता. बस, कभी कभी मौका देख कर चढ़ावे पर हाथ साफ कर लेता.
फिर सुना बड़ी चोरियों में उसकी गैंग चलने लगी. बहुत कर्मठ है. इलेक्ट्रानिक्स गुड्स की चोरी में स्पेशलाइजेशन हासिल कर लिया. शहर उपर नाम चलने लगा और वो चोर से प्रमोट होकर गुण्डे की केटेगरी में आ गया. आदत वही: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना और मेरा विदा हो जाना.
कहते हैं उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और हौसला फौलादी. गुण्डागर्दी में भी वो जल्द ही ग्रेड ए का गुण्डा हो लिया. बहुत नाम कमाया. आधा काम तो उसके नाम से हो जाता. वो स्वयं सिर्फ बड़े केसेस हैंडल करने जाता जैसे मकान खाली कराना, चुनाव के दौरान नेताओं के लिये बूथ केप्चरिंग आदि. रसूकदार हो लिया और कालांतर में उच्चस्तरीय गुण्डागीरी के राजमार्ग की स्वभाविक मंजिल को हासिल करते हुए वह नेता हो गया.
शिक्षा और शिक्षा के समाज में योगदान का उसे पूरा भान था. जीजीविषा ऐसी कि ११वीं में दम तोड़ी शिक्षा यात्रा को उसने पुन: जीवित किया और अपने नाम के चलते किसी को भेजकर उसने इस बीच १२वीं और फिर बी.ए. और एल.एल.बी. की उपाधि अर्जित की.
अपनी रसूकदारी और अनेकों नेताओं पर पुराने अहसानों के चलते पार्टी टिकिट से विधायक का चुनाव लड़ा और जैसा की होना था-जीता भी भरपूर मार्जिन के साथ. एक बार नहीं. लगातार दो बार और आज भी तीसरे दौर में विधायकी बरकरार है.
जैसा बताया कि उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और आदमी काम का, अतः इस बार उसे मंत्री बनाया गया. भावुक हृदयी होने के कारण जनसमस्यायें उसे विचलित करतीं अतः अक्सर उनसे वह मूँह फेर लेता.
कुछ दिनों पहले पुनः दिखा. मानो पद प्रतिष्ठा का घमंड उसे छू तक न सका. वही तरीका: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना-इस बार लाल बत्ती की कार को किनारे रोक कर उसने यह रसम अदायगी की अतः स्वभाविक रुप से हमेशा की तरह मैं मना नहीं कर पाया और उसके साथ वहीं चाय पी.
बड़ा दबदबा. पीछे पीछे पुलिस की गाड़ी. हालांकि उसे कुछ भी नया नहीं लगता होगा. पहले भी उसके पीछे पुलिस की गाड़ी रहती ही थी. मगर तब जनता की उससे सुरक्षा की वजह से. आज जनता से उसकी सुरक्षा की वजह से. बस, इतना सा ही तो अंतर पड़ जाता है गुण्डे से नेता की यात्रा तय कर लेने में. आज जब उसकी चुनाव बाद शोभा यात्रा निकलती है तो भी वह बीच में, चारों ओर पुलिस और समर्थक टाईप आवारा बालक. बहुत पहले भी कई बार उसकी ऐसी ही यात्रायें पुलिस ने निकाली हैं मौहल्ले में मगर तब वो शिनाख्ती परेड की शक्ल में होती थीं और वो कुछ इसी अन्दाज में तब भी मुस्करा कर ही पुलिस को बताया करता था कि फलानी जगह से यह चुराया और फलानी जगह से वो. साथ साथ बहुतेरे आवारा लड़कों की भीड़ भी ऐसे ही चलती थी कुतहलवश.
वह यारों का यार है. पहचान वालों से पैसा लेकर काम करना उसे गवारा नहीं और बिना पैसे लिये कोई काम आज तक उसने करवाया नहीं. अतः उसकी पहचानवालों का उसके माध्यम से कोई कार्य नहीं होता किन्तु किसी को उसने कभी नहीं भी नहीं कहा. एक सकारात्मक सोच का धनी-हमेशा हाँ में ही जबाब देता.
चाहे वो मंत्री हो गया हो किन्तु जमीन से उसका जुड़ाव वन्दनीय है. वह जमीनी नेता के तौर पर जाना जाता है. जमीन से लगाव ऐसा कि क्षेत्र की सारी कभी विवादित रही जमीनों पर आज उसका मालिकाना हक है और सारे कागजात उसके नाम. शहर के बीचों बीच एकड़ों में जमीन का मालिक.
समाज में उनके सराहनीय कार्यों एवं क्षेत्र विकास को समर्पित जीवनशैली को देखते हुए विश्व विद्यालय शीघ्र ही उन्हें मानद डाक्टरेट देने पर विचार कर रही है. सारे जुगाड़ सेट हो चुके हैं.
आज उसका मौहल्ले में सम्मान समारोह है. मुझे मंत्री जी का परिचय देने के लिये मंच से बोलना है. अतः, सोच रहा हूँ इसी में से उनके स्वभाव के मुख्य मुख्य अंश निकाल कर पढ़ दूंगा. अब कहाँ समय मिलेगा फिर से नया लिखने का?
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त २५, २०१९ में प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/42836995



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शनिवार, अगस्त 17, 2019

विपश्यना के राजपथ का साईड वॉक



हाल ही गोयनका जी के विपश्यना शिविर से लौटे. एक अद्भुत अनुभव. शायद अब बार बार जाना हो. लेकिन हम जैसे व्यंग्यकारों का मन तो हर जगह से कुछ और ही खोज लाता है. हमें तो राजपथ पर भी चलवाओ तो भी नजर साईड वॉक पर ही रहती है. अन्यथा मेरा अब मानना है कि हर व्यक्ति को अगर मौका लगे तो जीवन काल में एक बार इस शिविर में जरुर जाना चाहिये, फिर तो आप अपने आप बार बार जायेंगे.
शरीर से जब आत्मा अलग होती होगी, तो कैसा अहसास होता होगा? जानना चाहते हैं? आज के जमाने में इसका अहसास करना है तो आज के जमाने में पहुँच जाईये किसी भी गोयनका जी के विपश्यना शिविर में. जैसे ही पहुँचेंगे, वो आपसे आपका फोन, कागज, पैंसिल सब कुछ जमा करवा लेने के बाद कहेंगे कि अब किसी से कोई बातचीत नहीं, न ही आँख से संपर्क, न गाना, न इंटरनेट, न टीवी, न समाचार पत्र. जो हो वो बस आप अगले १० दिनों के लिए. ५ मिनट में जान जायेंगे उस अहसास को.
फिर शील, झूठ नहीं बोलना, काम और क्रोध से परे रहना, किसी जीव को मारना नहीं का प्रण दिलवाया जाता है. अकसर यह आश्रम बहुत बड़े हरे भरे पेड़ों से घिरे जंगलनुमा स्थानों में बस्ती के शोरगूल से दूर होते हैं. ऐसे में यह जंगल मच्छरों के लिए स्वर्ग हैं. उस पर से उन्हें तो जैसे गोयनका जी ने जेड सिक्यूरीटी दे दी हो. उन मच्छरों की जितनी मर्जी हो, उतना आपको काटें मगर आप उन्हें छू भी नहीं सकते, मारने की बात तो दूर. वो तो हम हिन्दुस्तान से हैं और जेड सिक्यूरीटी मिले लोगों के कारनामों और शोषण को जानते हैं, इसलिए मच्छर का द्वारा काटे जाने का उतना बुरा नहीं लगा. शिविर में सिखाया ही यह जा रहा था कि कुछ भी सदा के लिए नहीं है. अतः मच्छर काटेगा, हमारे खून से उसका पेट भर जायेगा, फिर वो उड़ जायेगा. विपश्यना करने तो हम गये थे, अतः नियम का पालन भी हमें ही करना था. मच्छर तो वहीं रहता है, वो थोड़ी न विपश्यना करने आया था. यूँ भी जेड सिक्यूरीटी प्राप्त व्यक्ति को आपके शोषण का अधिकार आप स्वयं ही देने के आदी भी तो हो.
सुबह ४ बजे जागने से लेकर रात १० बजे सोने जाने तक सुबह एक नाश्ता और ११ बजे दिन में एक खाने पर ११ घंटे पीठ सीधी रखे ध्यान में बैठे बैठे शरीर की क्या हालत हो जाती है, वो तो आप समझ ही सकते हो. ऐसा नहीं कि इससे बदत्तर आपके शरीर के साथ और कुछ हो नहीं सकता. रोड़वेज की सरकारी बस में मध्य प्रदेश की सड़कों पर १२ घंटे के सफर का रियाज यहाँ काम आया. लेकिन उस सफर में इतना इत्मिनान रहता था कि घर पहुँच कर आराम से लम्बा सोवेंगे. मगर यहाँ तो कल सुबह फिर ४ बजे जागना है. ऐसे में पुनः ५० पार हिन्दुतानी होने का फायदा मिला. सोने के पहले अमृतांजन का घुटने से लेकर सर तक लेपा और तान कर सो गये. बढ़िया नींद आ जाती थी.
अमृतांजन बनाने वाले ने भी कभी न सोचा होगा कि वो हम ५० की उम्र पार कर चुके हिन्दुस्तानियों के लिए वाकई अमृत बना रहा है. सर दर्द तो, जुकाम तो, घुटने में दर्द तो, नींद नहीं आ रही है तो, जुकाम लगा तो, नाक सूखी तो, कहीं हल्का सा जल गया तो, कहीं कीड़े न काट लिया तो और आज कहीं कोई दर्द नहीं है तो यूँ ही लगा लिया कि कल दर्द न हो जाये, मने हर हाल में अमृतांजन लगाना जरुरी है. आदत ऐसी कि सब ठीक ठाक हो तो भी बिस्तर के बाजू में अगर अमृतांजन की शीशी न हो तो टेंशन में नींद नहीं आती कि अमृतांजन खत्म है.  
अमृतांजन न हो गया कि जैसे भारत में हमारे पड़ोस में एक ८५ वर्षीय मलहोत्रा जी रहा करते थे, उनकी छड़ी, टार्च और घंटी हो गई हो. वे रोज सोने के पहले बिस्तर पर लेटे लेटे घंटी बजा कर अपने बेटे को बुलाते और कहते बेटा, वो छड़ी मेरे नजदीक खड़ी कर दे और टार्च में देख लेना कि मसाला तो है न? रात में बाथरुम जाना हुआ तो?
बेटा रोज झल्लाता कि क्या बाबू जी!! आप भी अब सिर्फ परेशान करते हो!! २ साल हो गये बिस्तर पकड़े. आँख से दिखता नहीं है और केथेटर लगा है. दिन में दो बार नर्स पेम्पर बदल कर जाती है और आप हो कि टार्च में मसाला और छड़ी रोज चैक करवाना छोड़ ही नहीं रहे. अब बेटे को कौन समझाये कि साईकोलॉजिकली बाबू जी को कितना इत्मिनान मिलता होगा और नींद आ जाती होगी कि टॉर्च और छड़ी साथ में है. बेटा बुढ़ापे की छड़ी होता है, भी तो अधिकांशतः अब साईकोलॉजिकल बल ही देता है. फिर अपवाद तो हमेशा होते ही हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त १८, २०१९ में प्रकाशित:

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चित्र साभार: गूगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, अगस्त 10, 2019

टी आर पी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आर आई पी (RIP) न देने लगें



कोई सुन्दर बाला आपसे कहे कि वो २०-२० मैच में हिस्सा लेकर लौट रही है, तो सीधा दिमाग में कौंधता है कि चीयर बाला होगी. किसी के दिमाग में यह नहीं आता कि हो सकता है महिला लीग का २०-२० खेल कर लौट रही हो. वही हाल हमारा होता जा रहा है जब शाम हमारे घर लौटते समय कोई मिल जाये और उसे हम बतायें कि जिम से लौट रहे हैं. सब समझते हैं कि ऑडिट करके आ रहे होंगे या जिम में एकाऊन्टेन्ट होंगे. सी ए होने के यह लोचे तो हैं ही. शरीर देखकर कोई यह सोच ही नहीं पाता कि बंदा कसरत करके लौट रहा है. कई मारवाड़ी मित्र सोचते हैं कि बोलने में मात्रा गलत लगा दी होगी तो पूछते हैं कि कहाँ से जीम कर लौट रहे हो? उनको लगता है कि किसी दावत से जीम (खा) कर लौट रहे हैं. 
अतः अब हमने यह सोच कर बताना ही बंद कर दिया है कि बाद में तब बतायेंगे जब करनी और कथनी एक सी दिखने लगेगी. हालांकि जिम जा जा कर हम वजन के जिस मुकाम से लौट कर आज जिस मुकाम पर खड़े हैं, इस मुकाम तक आने के लिए हमें जितना वजन घटाना पड़ा, उसका आधा वजन घटा कर बंदे देश भर में फिटनेस गुरु से बने फिटनेस के मंत्र बांटते नहीं थक रहे. वो ९० किलो से ८० पर आकर अपनी शौर्य गाथा सुना रहे हैं और एक हम हैं कि १२० से १०० पर आकर भी मूँह खोलकर बता नहीं पा रहे हैं कि जिम से लौट रहे हैं. ऐसा मानो कि कोई एवरेस्ट के बेस कैम्प नेपाल तक जाकर लौट आया हो दिल्ली वापस और देश भर को पर्वतारोहण के तरीके और गुर सिखा रहा हो और मीडिया उसके इर्द गिर्द लट्टू सी नाच रही हो. एक हम हैं कि एवरेस्ट पर झंडा गाड़ कर वापस उतर रहे हैं और किसी को दिल्ली में कानों कान खबर तक नहीं है. 
मीडिया भी एवरेस्ट पर चढ़कर कवरेज करने से तो रही और सनसनीखेज की तलाश भी अनवरत बनी रहती है तो ऐसे ही लोग बच रहते हैं जो बेस कैम्प से लौट नुस्खे बांट रहे हों और पत्रकार उनसे पूछ रहे हों कि आप युवाओं को पर्वतारोहण के लिए क्या टिप देना चाहेंगे? और टिप के नाम पर बंदे ज्ञान का मंत्र उच्चारण शुरु कर देते हैं.
वक्त वक्त की बात है. एक दिन हम भी एवरेस्ट से उतर कर जब दिल्ली पहुँचेंगे तो तहलका मचायेंगे, ऐसा विचार है मगर तब तक मीडिया ऐसे छद्म पर्वतारोहियों से इन्टरव्यू ले लेकर पर्वतारोहण का ही क्रेज  खत्म कर डालेगी तो हमारी सुनेगा कौन?
ये वैसे ही है जैसे कि बच्चे आज भी बोरवेल में गिरते हैं मगर कोई खबर तक नहीं लेता. सब मीडिया की अति का कमाल है. एक समय में २४ घंटे बोरवेल में गिरने को ऐसी हाईप दी कि अब क्रेज ही खत्म हो गया. एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब मर्डर, रेप, रेल दुर्घटनायें, भ्रष्टाचार, बाबाओं का सियासत से मिल कर रचा जा रहा सामराज्य एवं तांडव, सिस्टम की कार गुजारियाँ आदि सब बच्चे के बोरवेल में गिरने जैसा ही बिना कान पाया हादसा होने लगेंगे. न कोई सुनाने वाला होगा और न कोई सुनने वाला. 
सजग होना होगा मीडिया को कि दिल्ली की गोदी से उतर कर हिमालय की वादी तक पहुँचे पर्वतारोहण की खबर जुटाने. खबर की तह को पहचाने बजाये इस्त्री से बनी फुलपेन्ट की क्रीज को जायज ठहराने के. उसे फरक करना होगा खबर और सनसनीखेज चमकदार वारदात के बीच. वरना शायद एक रोज टीआरपी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आरआईपी (RIP) कहने लग जायेंगे. तब हाथ मलने के सिवाय कुछ न बच रहेगा. याद रहे सोशल मीडिया नित जिम जा जा कर मजबूत हुआ जा रहा है.

यूँ तो मीडिया में हिम्मती और दिग्गज अपवाद हैं, जान की परवाह किये बगैर सच को सच कहना जानते हैं- उन्हीं से कुछ सीख ले लो. रेमन मैग्सेसे सम्मान यूँ ही नहीं मिला करते. 
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ११, २०१९ के अंक में:
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शनिवार, अगस्त 03, 2019

चाय की एक गरमागरम चुस्की के साथ


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.
उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.
वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो. 
फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.
हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है. 
बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.
हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है. 
अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.
गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.
बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.
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समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ४, २०१९ के अंक में:


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शनिवार, जुलाई 06, 2019

कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है!!


कुछ दिन पहले फ्रांस ने जब बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित किया तो वो इस तरह का ५५ वाँ देश बना. सबसे पहले १९५७ में स्वीडन ने इसकी शुरुवात की थी

हमारा जन्म १९५७ के बाद हुआ. मगर जब किस्मत में पिटना लिखा हो तो कौन बचा सकता है? अतः भारत में पैदा हुए. शायद पिछले जन्म में नेता रहे होंगे या पहुँचे हुए बाबा, इसलिए कर्मों का फल भुगतने भेजे गये हों भारत. रुप रंग में भी उन्हीं कर्मों की सजा का स्वरुप झलकता है.
बचपन में नित ही कूटे पीटे जाते रहे. सिर्फ माँ बाप से पिटते, तो भी चला लेते. मगर वो जमाना ऐसा था कि पड़ोस वाले चाचा भी हाथ साफ कर लेते थे. घर आकर बताओ तो फिर पिटो कि जरुर तुमने कोई बदमाशी की होगी.
स्कूल में मास्साब लोग तबीयत से पीटा करते थे. कभी खुद की गल्ती पर तो कभी सहपाठी की गल्ती पर. मगर पिटते जरुर थे नियमित रुप से. हमारे एक मित्र थे गुड्डू. एक रोज उनके पिता जी ने उसे घर की दलान में जबरद्स्त पीटा छड़ी से. पूरे मोहल्ले ने देखा. किसी बुजुर्ग ने आगे बढ़कर गुड्डू को बचाया. पूछने पर गुड्डू ने बाताया कि उसने तो कोई गल्ती की ही नहीं है. तब उसके पिता जी बोले कि नहीं की है तो क्या हुआ. करेगा तो जरुर, बदमाशी इसका हर रोज का काम है और आज मुझे दो दिन के लिए दौरे पर जाना है. वे टैक्स विभाग में काम करते थे अतः शायद एडवान्स टैक्स का अभिप्राय भली भाँति समझते रहे होगे. 
हद तो तब हो गई जब हमारे एक अन्य मित्र मंटू घर की छत पर सिगरेट पीते हुए पकड़ा गये. उनके पिता जी अभी उनकी पिटाई कर ही रहे थे कि हम पहुँच गये किस्मत के मारे उनके घर. तब उसके साथ साथ हमें भी पीटा गया कि तुम इसके साथ दिन भर रहते हो तो तुमसे ही सीखा होगा इसने सिगरेट पीना. हमने कहा कि हम तो पीते ही नहीं सिगरेट. तो फिर पीटे गये कि नहीं पीते तो इसे पीने से रोका क्यूँ नहीं? हमको बताया क्यूँ नहीं? अब हम क्या कहते, चुपचाप पिट लिए मित्र का साथ साथ. जबकि सच्चाई तो यह थी कि वो अपने पिता को अपना रोल मॉडल मानता था और चूँकि वो सिगरेट पिया करते थे अतः उन्हीं के समान दिखने के लिए मंटू उन्हीं की पाकिट से चुरा कर सिगरेट पिया करता था. मुझे लगता है कि अगर उसे सिगरेट पीने के बदले चोरी करने के लिए पीटा गया होता तो शायद ज्यादा उचित होता. मगर जिसके हाथ में पीटने का अधिकार हो वो तो बस मौका खोजता है. उचित अनुचित की आप जानो.
वैसे भी आजकल सब तरफ ऐसा ही माहौल दिख भी रहा है. कोई बल्ले से मार रहा है. कोई रोमियो स्कॉवाड के नाम पर भाई बहन को ही पीटे डाल रहा है. कोई गाय का इलाज करवाने ले जाते व्यक्ति को गौ तस्कर कह कर पीट रहा है. कोई शिद्दत से की गई मोहब्बत को मजहब से जोड़कर लव जिहाद का नाम देकर पीटे डाल रहा है. मुद्दा कोई भी हो, बस मतलब पीटने से है. अब सईंया भये कोतवाल तो डर काहे का की तर्ज पर लोग कानून हाथ में लिए घूम रहे हैं. पीटने का मौका खोज रहे हैं. झूठी ताकत के नशे में डूबे हैं.
खैर, फ्रांस में नया नया आया बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी करार देने वाला कानून थोड़ा ध्यान से पढ़ा. पता चला कि हालांकि बच्चों को चपत लगाना गैर कानूनी बना दिया गया है मगर माता पिता के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है. फ्रांस की सरकार का मानना है कि मात्र गैरकानूनी करार कर देने से माता पिता को लगेगा कि वो गैरकानूनी काम करने जा रहे हैं अतः वह नहीं करेंगे.
मुझे लगा कि यह तो अपने यहाँ भी हो ही रहा है. लोग घूस खाये जा रहे हैं. घूस खाना गैर कानूनी तो है ही बल्कि सजा का प्रावधान भी है किन्तु घूस खाने वाला यह भी जानता है कि अगर पकड़े गये तो घूस खिलाकर बच जायेंगे. अगर भारत भी ऐसे ही बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित कर दे तो अपने यहाँ तो वो बच्चे जो अब तक नहीं पिट रहे हैं, वो भी इसी चक्कर में पिट जायेंगे कि कानून हमारा क्या बिगाड़ लेगा?
कानून को चैलेन्ज करने में जो मजा हमें आता है वो पालन करने में कहाँ? कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है.
तभी तो जिस कोने में पान थूकना मना लिखा होता है, वहीं लोग शान से सीना तान कर पान थूकते हैं.
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई ७, २०१९ में


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शनिवार, जून 29, 2019

क्रिकेटरों के लिए रिटायरमेंट के बाद रोजगार का नया अवसर



आज सुबह से ही चौक पर भीड़ लगी है. विश्व कप चल रहा है. बिट्टू ने टीवी दुकान के बाहर निकाल कर रख दिया है. आज भारत पाकिस्तान का मैच होना है. पान की दुकान, चाय की दुकान सब आजू बाजू में ही हैं. कहीं भी बैठ लो और मैच के मजे लो.
चौक पर मैच देखने का आनन्द ही अलग होता है. टीवी के समानन्तर एक कमेन्ट्री चौक पर बैठे एक्सपर्ट भी देते चलते हैं. थर्ड एम्पायर का निर्णय तो बाद में आता है, उसके पहले ही चौक पर तय हो जाता है कि आऊट था कि नहीं और अगर थर्ड एम्पायर का निर्णय उनसे अलग आया इसका मतलब थर्ड एम्पायर ने पैसे खायें हैं. हर भारतीय चौके, छक्के पर, हर पाकिस्तानी कैच ड्राप पर, हर पाकिस्तानी विकेट गिरने पर बकायदा नगाड़े बज कर नाच होता है. वहीं हर भारत के गिरते विकेट पर, पाकिस्तानी चौके छक्के पर, हर भारतीय कैच ड्राप पर नगाड़े के बदले गालियाँ और सलाहों का अम्बार लग जाता है. ऐसा नहीं वैसा करना था. ये शॉट गलत लगाया. अगर भारत की टीम का कोच इस चौक पर आ जाये तो अपनी अज्ञानता पर शर्मिन्दा हो जाये. 
बहुत से लोग भारत की टीम की टी शर्ट पहन कर आये हैं. किसी ने गाल पर भारत के झंडे का टैटू लगवा रखा है. कोई भारत का झंडा थामे है तो कोई विंग कमांडर अभिनन्दन का पोस्टर.. पूरा का पूरा माहौल एकदम उत्सव का. सब पहले से मान कर चल रहे हैं कि पाकिस्तान को तो हराना ही है, भले विश्व कप कोई भी ले जाये.
इस बार के चुनाव के बाद से एक नया डायलॉग भी चल पड़ा है कि चाहे कैसी भी बैटिंग कर लो, चाहे कैसी भी बालिंग कर लो, जितेगा तो भारत ही. मैने पूछा भी कि इतने विश्वास से आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? खेल है कोई भी हार जीत सकता है? जबाब मिला कि आप तो चुनाव के समय भी कहाँ हमारी बात मान रहे थे. मेरे पास चुप रह जाने के सिवाय रास्ता न था मगर मन ही मन सोचना तो मना नहीं है अतः सोचा कि यहाँ तो खुले में मैच हो रहा है और रन भी कोई ईवीएम तो गिन नहीं रही फिर भी ऐसा विकट विश्वास. चुनाव की तरह ये भी नहीं कह सकते कि कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है.
इसके अलावा कुछ अंतर और आये हैं. रनों के साथ जय श्री राम का उदघोष, चौक्के छ्क्के को विंग कमांडर अभिन्नदन के शौर्य से जोड़ कर उसके पोस्टर लहराना हर चौक की कहानी बन गये हैं.
घंसू भी आज क्रिकेट का बल्ला लेकर आये हैं. क्रिकेट का महापर्व चल रहा हो और घंसू पीछे रह जायें, ऐसा कैसे हो सकता है. मैच शुरु होने में अभी समय है. घंसू बीच सड़क में चौक्का छक्का मारने की मुद्रा में बल्ला घुमा रहे हैं. कभी कभी दो चार कदम आगे दौड़ कर भी बल्ला घुमा रहे हैं.
तिवारी जी ने आवाज लगाई कि भाई घंसू, अगर नेट प्रेक्टिस हो गई हो तो आ जाओ, पान खाया जाये. घंसू के आने पर तिवारी जी चुटकी लेते हुए कहने लगे कि बड़ी स्टाईल से शॉट लगा रहे थे घंसू. कोहली और धवन की बेटिंग भी फीकी लगेगी इसके सामने तो. लगता है अगले विश्व कप की तैयारी कर रहे हो. तुम्हारा सेलेक्शन तो पक्का समझो. तुम्हें कोई नहीं रोक सकता सेलेक्ट होने से.
घंसू जोर जोर से ठहाके लगाने लगा. कहने लगा कि यहाँ किसे क्रिकेट खेलना है. मैने तो आज तक मौहल्ले की  क्रिकेट टीम से भी नहीं खेला, विश्व कप में क्या खेलूंगा?
जो खेल खेलना नहीं, उसके लिए नेट प्रेक्टिस क्यूँ कर रहे हो फिर? तिवारी जी ने जानना चाहा.
घंसू बताने लगे कि दरअसल वो अगली विधानसभा के चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं. भाषण देना सीख लिया है. झूठे वादे करना सीख लिया है. घड़ियाली आंसू बहाना सीख लिया है. बस एकाएक पता चला कि एक नई विधा में भी महारत होना चाहिये और वो है क्रिकेट के बल्ले से सरकारी अधिकारियों की कुटाई करने की. तो उसी की नेट प्रेक्टिस कर रहा था. विश्व कप का मौका भी है. सोचा लगे हाथों प्रेक्टिस भी कर लूँ और किसी को पता भी न चलेगा कि मैं विधायकी की तैयारी कर रहा हूँ.
मैने देखा तिवारी जी घंसू की दूरद्दष्टिता से अभिभूत उसे एकटक निहार रहे हैं. उन्होंने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया और विधायक भवः का आशीष दिया. तिवारी जी आँखों में खुशी के आंसू हैं.
घंसू ने खुशी में दो तीन बार फिर बल्ला घुमाया और तभी उधर से जय श्री राम का उदघोष गूंजा.
मैच प्रारंभ हो चुका है. भारत बैटिंग करने उतर रहा है.
अब इन क्रिकेट के खिलाड़ियों के लिए भी क्रिकेट से रिटायर होने के बाद एक नया रोजगार का अवसर हो गया है. वे विधायकी का चुनाव लड़ सकते हैं.
-समीर लाल समीर
   
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ३०, २०१९ में:




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