शनिवार, दिसंबर 08, 2018

पहले भी अमृत कहाँ निकला था?



तिवारी जी रिटायरमेन्ट के पहले विभागाध्यक्ष थे एवं उनके विभाग में अनेक कर्मचारी उनके अन्तर्गत काम करते थे. घंसु ने उनसे आज एक मेनेजमेन्ट फंडा पूछा कि यदि आपका कोई कर्मचारी दिन में १८-१८ घंटे कार्य करे. कभी छुट्टी पर न जाये तो आप उसे कैसे पुरुस्कृत करेंगे और क्यूँ?

तिवारी जी ने पान थूका और प्रवचन मोड में आ गये जैसे कि भरे बैठे हों.
’मैं उसको तुरंत नौकरी से निकाल देता’
और अब सुनो क्यूँ?
ये जो फेक्टरियों में, दफ्तरों में, स्कूलों में एक पाली का समय दिन में ८ घंटे (+/- १ घंटे) का तय किया गया है सारी दुनिया में वो बहुत ही वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर किया गया है. अगर कार्य ज्यादा है तो तीन पाली चला लो और हर पाली में अलग कर्मचारी लाओ.
ऐसा माना जाता है कि ८ घंटे तक मन लगा कर काम कर लेने के बाद आपकी कार्यक्षमता में कमी आने लगती है, यह शरीर और दिमाग की प्राकृतिक प्रक्रिया है. यह ठीक वैसा ही है जैसा ८ घंटे शरीर को आराम देने के लिए सोने की सबसे उत्तम अवधि है.
अब यदि कोई, जैसे टॉप मैनेजमेन्ट आदि यदि ८ घंटे से ज्यादा काम करते हैं तो दरअसल वो अपना सोशलाईजेशन और काम दोनों एक ही समय करते हैं. डॉक्टर को दिखाना, बाल की हजामत बनवाना, दर्जी को कपड़े सिलने के नाप देना, निमंत्रण पर फिल्म देखना, विदेश से आये मित्रों के साथ झूला झूल आना, उनको आरती में चार घंटे टहला लाना, अपने शहर में रोड शो टाईप करके घूमा लाना, भी काम के समय ही कर लेने को, क्यूँकि किसी को जबाब तो देना नहीं है, काम नहीं कहते हैं. एक आम कर्मचारी को इन सबके लिए छुट्टी लेना पड़ती है.
कम्पनी का मालिक अपनी माँ से मिलने जाये या किसी मित्र की बिटिया की शादी में शामिल हो आना और साथ ही उस शहर में एक दो व्यापारियों से कुछ देर मिलकर कुछ नये व्यापार की सोच लेते आना तो इसे घर जाना कहेंगे कि बिजनेस ट्रिप? अब किसी कम्पनी के मालिक अपने दोस्त के साथ खाना खाने जाता है या विदेश घूमने जाता है और साथ ही वो एक दो बिजनेस की डील भी कर आता है या बिजनेस डील करने जाता है और समुन्द्र घूमना या ढोलक बजाना भी साथ ही कर आये तो भी जब निचोड़ निकालोगे तो ८ घंटे ही काम के निकलेंगे या निकलने चाहिये. बाकी तो जो लोग छुट्टी लेकर करने जाते हैं वो तुम फ्री में कम्पनी या देश के खर्च पर कर आये.
तिवारी जी आगे बोले:
मेरी नजर में अगर कोई ८ घंटे से ज्यादा काम कर रहा है या छुट्टी नहीं ले रहा है तो इसके कारण तलाशना चाहिये. वर्क लाईफ बैलंस की चिन्ता न भी हो क्यूँकि परिवार की चिन्ता ही नहीं है, उनको तो कब का छोड़ दिया सिवाय जरुरतवश इस्तेमाल करने के तो भी:
·         क्या उसे अपना काम समझ नहीं आ रहा है जो वो उसे ८ घंटे में खत्म नहीं कर पा रहा है? क्या उसे ट्रेनिंग की जरुरत है या उसे कार्य से मुक्त कर देना चाहिये क्यूँकि वो इस योग्य नहीं है?
·         क्या उसे काम को अपने मातहतों को देना नहीं आता या फिर सब अपने कंट्रोल में रखने के लिए वो देना नहीं चाहता. अपने कंट्रोल में रखने का कारण क्या है?
·         क्या वो कोई ऐसा कार्य कर रहा है जिसके उसके छुट्टी पर जाने से खुलासा हो जाने का खतरा है?
·         क्या वो मित्रों को सामान्य प्रणाली के बाहर जाकर मदद करने के लिए एक्स्ट्रा टाईम में लेखा जोखा बदल रहा है?
·         क्या वो काम के समय को मक्कारी में काट रहा है और फिर एकस्ट्रा टाईम काम में दिखाकर वाह वाही लूटना चाहता है.

यह सब सतर्क होने के अलार्म हैं. जो भी व्यक्ति अपनी निर्धारित समय से ज्यादा दफ्तर में बैठा है और निर्धारित छुट्टी नहीं लेता, उसे फोर्सड छुट्टी पर भेज दिया जाना चाहिये और उस दौरान उसका कार्यभार किसी ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाना चाहिये जो इन्डिपेन्डेन्ट हो और इस बात की जाँच होना चाहिये कि आखिर बंदा छुट्टी पर क्यूँ नहीं जाता? कुछ तो वजह रही होगी वरना कोई यूँ ही दीवाना नहीं होता!!
यह भी जान लेना चाहिये कि शराब का लति हो (अल्कोहलिक) या काम का लति हो (वर्कोहलिक), नशे की हालत में कोई भी सही निर्णय ले पाना संभव नहीं है अतः उनको नशा उतर जाने तक न तो गाड़ी चलाना चाहिये और न ही कोई जिम्मेदारीपूर्ण कार्य करना चाहिये. देश चलाना तो बहुत दूर की है.
कोई भी अजर अमर तो होता नहीं. उसके आने के पहले भी काम चल ही रहा था और उसके जाने के बाद भी काम चलता ही रहेगा.
अगर पहले समुन्द्र मंथन होकर अमृत नही निकला था तो वो तो अब भी नहीं निकला तो आखिर १८ घंटे किया क्या और छुट्टी न लेकर कौन सा अमृत निकल आया, यह समझ नहीं आया. १८ घंटे बिना छुट्टी लिए कार्य करने का निष्कर्ष सिर्फ इतना निकला है कि पहले भी अमृत कहाँ निकला था?
रिपोर्ट कार्ड तो यही कहता है.
समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार ९ दिसम्बर, २०१८ के अंक में:
 http://epaper.subahsavere.news/c/34707280





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चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, दिसंबर 02, 2018

ठेके पर तलाक और आईनों का सरकारी हो जाना...



आज सड़क के किनारे लगे नए विज्ञापन के बोर्ड को देखकर चौंक गया. फ्लैट १००० डॉलर + जीएसटी में डाइवोर्स और उस पर से विज्ञापन भी एकदम ज़िंदा- बोर्ड जिस तार से गाड़ा गया था वो हवा के थपेड़े न झेल पाया और एक टांग से उखड़ा टेड़ा टंगा था.
सही मायने में देखा जाए तो तलाक भी तो इसी तरह का होता है. परिवार उखड़ जाता है जिंदगी की झंझावातों के थपेड़े खाकर. फिर न वो खुश और न ये खुश . एक तिरछा जीवन मात्र इसलिए कि जब आंधी आई तो दोनों अपने अहम् में खुद को साबित करने में अकेले ही भिड़ पड़े बिना एक दूसरे का हाथ थामें और बिना एक दूजे की साथ की ताकत को समझे. मैं भला क्यूँ हाथ थामूं तुम्हारा? क्या मैं सक्षम नहीं? दिखा ही दूंगा कि मैं अकेला ही काफी हूँ.
पहले लोगों को समाज की नजर की चिंता होती थी तो बड़ी से बड़ी बात हो जाए मगर निभा जाते थे यह सोच कर कि समाज क्या कहेगा? तलाकशुदा व्यक्ति समाज की नज़रों में गिर जाते थे अतः लाख खटपट और असामंजस्य के बावजूद भी संबंध निभा ले जाते थे.
अब समाज की चिंता तो छोड़ो, माँ बाप तक से तो नजर की शर्म बची नहीं है. कॉमन लॉ, सेम सेक्स मैरेज जैसे वक्त में क्या समाज की नजर और क्या माँ बाप की? खुद की नजर की तो परवाह रही नहीं. जाने इनके घरों में आईने हैं भी या नहीं? या आईने होंगे भी तो सिर्फ मेकअप के लिए, असली चेहरा दिखाने को नहीं. आईने भी तो सरकारी हो गए हैं अब ..झूठ बोलना सीख चुके हैं. सेल्फी और आईने की शक्ल एक सी हुई जाती है ..फिल्टर लगा कर जैसी चाहो वैसी तस्वीर देखो!
ऐसे वक्त में अहम की टकराहट में तलाक को रोकने और टालने के लिए मात्र अर्थ (रुपया हो या डॉलर) ही बचा था जिसके डर से नई पीढ़ी इस ओर कदम बढ़ाने से कतराती है. वकीलों की मोटी फीस, वो भी न जाने कब तक भरनी पड़े, जब तक की केस न खत्म हो जाए और फिर भारी भरकम सेटेलमेंट और मेन्टनेन्स का पैसा. इंसान सोचता है कि इससे अच्छा तो बिना तलाक के ही खरी खोटी सुनते सुनाते, लड़ते झगड़ते  ही काट लेते हैं.
आज उस रोक की दीवार को भी जब इस विज्ञापन के माध्यम से आधा गिरते देखा तो लगा की आह! यह रोक भी चल बसी.  कम से कम वकील की फीस की चिंता तो हटी. १००० + जीएसटी. देशी बन्दे हैं हम. इसे इस तरह पढ़ते हैं कि फीस १००० है, नगद दे देंगे. रसीद भी नहीं चाहिये. तब कैसा जीएसटी?
किसी ने कहा की जीएसटी न देना तो नैतिकता के आधार पर धोखा है सरकार के साथ. हमने सिर्फ उसकी आँख से आँख मिलाई और वो सॉरी कह कर चला गया.
जाने क्या समझा होगा नजर मिलाने को इनमें से:
१.     धोखेबाजों से धोखा भी कोई धोखा होता है बुध्धु?
२.     नैतिकता की उम्मीद उससे जो यूं भी नैतिक जिम्मेदारी से मूंह मोड़ने की तैयारी में है?
३.     तुम उस वक्त कहाँ चले जाते हो जब राजनेतिक गठबंधन अपने गठबंधन तोड़ते हैं? उस वक्त जीएसटी का ख्याल आता है क्या तुम्हें?
४.     जीएसटी दे भी दें मगर ऐसे व्यक्ति को जिसका काम ही झूठ को सच साबित करना है? उसे अगर हम जीएसटी दे भी देंगे तो भी वो साबित कर ही देगा कि जीएसटी उसका मेहनताना है.
५.     फिर सरकार लाख सर पटके, अदालत से वो आदेश ले ही आयेगा कि तलाक के केस में वसूले गए जीएसटी पर सरकार का कोई हक नहीं है.
६.     एक रास्ता और है कि जीएसटी का आधा हिस्सा पार्टी फंड में बेनामी जमा करा दो तो कोई पूछताछ न होगी.
खैर, जो भी समझा हो, हमें क्या? चला तो गया.
अब मुझे इंतज़ार है एक ऐसे विज्ञापन का जो ये कहे कि फ्लैट फीस ५००० + जीएसटी. जीरो सेटलमेंट और मेंटेनेंस की गारंटी. जैसे कह रहा हो कि तलाक और ठिकाने लगाने की सुपारी मानो इसे. आज ही संपर्क करें – इमेल: फलाना @ फलाना डॉट कॉम.
वैसे आज कल चल निकला प्री नेपच्युल एग्रीमेंट भी तो इसी दिशा में एक कदम है मानो शादी नहीं हो रही बल्कि पार्टनरशिप में बिजनेस करने जा रहे हों.
ये शादी, तलाक, प्री नेपच्युल को आज न जाने क्यूँ राजनितिक बनते गठबंधंन, टूटते गठबंधंन और मुद्दा आधारित समर्थन से जोड़ कर देखने का मन किया. कोई खास अंतर तो अब बचा नहीं है.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार दिसम्बर ०२, २०१८

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शनिवार, नवंबर 24, 2018

काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता


कहते हैं जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती हैं. मान लेते हैं कि आती होंगी. मगर जोड़ियों के पहले इंसान पधारता है और वो धीरे धीरे इतनी तिकड़म बैठालना सीख गया है कि ईश्वर को तो ठेंगा दिखाये बैठा है और बदमाशी की इंतहा तो देखें कि दिखाता है ठेंगा और कहता है लाईक किया, थम्स अप. ईश्वर भी ठेंगे को लाईक मान कर फेसबुकिया हुए गिन गिन कर मुग्ध होता रहता होगा. खुद ही सोचें कि न ईश्वर बदला और न ही इंसानों को पूंछ लगने लगी तो फिर जोड़ियों के यह स्वरुप कैसे बदल गये कि कोर्ट तय करने लगा कि चलेगा, तुम भी जोड़ी ही हो, रह लो सुरेश और मुकेश साथ में. और तुम रीना और टीना, तुम भी जोड़ी ही कहलाओगी. इतने पर भी चैन न पड़ा तो शादी करके जोड़ी कहलाना भी जरुरी नहीं रहा, ऐसे ही रह लो साथ तो भी जोड़ी.
अब तो हालत ये हो लिए हैं कि चाईना अपना चांद बना रहा है. उधर अमेरीका जुटा है कि हम अपना खुद का आसमान बनायेंगे. पूरा शहर कृत्रिम आसमान से ढक देंगे और उसके भीतर का मौसम जैसा हम चाहें, वैसा. जैसे ही मौसम खराब हो, कृत्रिम आसमान से शहर को ढक दो और बेहतरीन सावन का मौसम लाकर झूला झूलो. वैसे इस बात का ज्यादा प्रचार प्रसार अभी हुआ नहीं है क्यूँकि अभी ऐसा कुछ बना नहीं है. वरना इस बार कम से कम दिल्ली तो यह कृत्रिम आसमान का जुमला ही जितवा दे. प्रदुषण मुक्त शहर कि धुँआ कृत्रिम आसमान में लगे एग्जॉस्ट से बाहर और अंदर सब हरा ही हरा.
खैर, कृत्रिम आसमान का सपना तो अभी नहीं दिखा पायेंगे क्यूँकि फोटो में ही सही, अभी उदाहरण दिखाने के लिए कहीं भी वो है नहीं. तो इस बार भी झूठ का आसमान ही तानेंगे, करना धरना तो कुछ है नहीं. करना होता तो आज रेल्वे ट्रैक पर खाली समय में प्राईवेट ट्रेन चल रही होती. सारे शहर स्मार्ट सूटेड बूटेड हो गये होते. पूरे देश की नहरों पर सोलर पैनल लगे होते, हर वस्तु डिजिटल होती है. हालांकि एक वस्तु तो वाकई स्मार्ट भी हो गई और वो है ईवीएम. 
बात चल रही थी जोड़ियों की और भटक कर कहाँ जा पहुँची? महत्वाकांक्षायें और आशायें इतना बढ़ गई हैं कि ऊपर से बनाई जोड़ी में अगर अटक भी जायें तो उससे निकलने के रास्ते भी इन इन्सानों ने कई बना लिये हैं. जैसे अपने यहाँ कानून बनाते समय उसमें एक लूपहोल जरुर छोड़ देते हैं ताकि सक्षम बच निकलें. उनका बड़ा से बड़ा लोन माफ करके उनको विदेशवास पर भेज दिया जाता है और किसान का छोटा से छोटा लोन उसे फंदे पर लटकने को मजबूर कर इहलोक की यात्रा पर भेज देता है.
आजकल माहौल देख कर तो वाकई ऐसा लगने लगा है कि शादियाँ कम हो रही हैं और तलाक ज्यादा. जिसे देखो वो ही तलाक की राह पर है. समझौता करने को कोई तैयार ही नहीं.
संबंधों के निर्वहन भी जरुरतों और सहूलियत की वजह से हो रहे हैं. शादियाँ और तलाक देखकर लग रहा है कि मानों राजनितिक दलों का गठबंधंन और जरुरत खत्म हो जाने पर या महात्वाकांक्षा पूरी न होने पर संबंध विच्छेद. कॉमन लॉ की तरह बाहरी समर्थन के गठबंधंन. कुल को आगे ले जाने के लिए नहीं मगर अपने लिए किए गये सेमसेक्स विवाह की तरह देश को आगे बढ़ाने की बजाय खुद के सत्ता सुख के लिए गठबंधंन.
कहने को तो यह भी कहते हैं कि नेता बनाये नहीं जाते, पैदा होते हैं. सही है मगर जो नेता पैदा होते हैं और सही की राजनीति में आते हैं वो उस स्व-व्यक्तित्व में अपनी तिकड़म से घूर्तता मिलाते हैं, संवेदनशीलता को मारते हैं और तब जाकर सत्ता सुख पाते हैं.
दोष किसे दें- ईश्वर को या इंसान को, जिसे ईश्वर ने बनाया.
हम तो यह भी नहीं प्रार्थना कर सकते कि काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता. ये धूर्त तो उसे बदल कर ईश्वर को ठेंगा दिखा देते हैं और जनता को भ्रमित करते हैं कि हमने ईश्वर के निर्णय को लाईक किया है.
-समीर लाल ’समीर’     

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर २५, २०१८

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शनिवार, नवंबर 17, 2018

काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती


कल शाम दफ्तर से लौट कर हेयर कटिंग करवाने चला गया. पहले से फोन पर एप से रिजर्वेशन करा लिया था तो तुरंत ही नम्बर आ गया. दिन भर दफ्तर की थकान, फिर लौटते वक्त ट्रेन में भी कुछ ज्यादा भीड़ और उस पर से बरफ भी गिर रही थी तो मोटा भारी जैकेट. जैकेट उतार कर जरा आराम मिला नाई की कुर्सी पर बैठते ही और नींद के झौके ने आ दबोचा.
इस बीच कब वो बाल काटने आई, उसने रिकार्ड से पिछली बार के कटिंग की पर्ची निकाल कर कब पढ़ा कि साईड में १ नम्बर और ऊपर २, वैसे ही काटना है क्या? और कब हमने हमेशा की तरह पूरे भरोसे के साथ मुंडी हिला कर हामी भर दी, पता ही न चला.
वैसे भी अब यहाँ इतने भारतीय हो गये हैं कि ये भी जान गये हैं कि एक सच्चा भारतीय हाँ कहने के लिए मुंडी ऊपर नीचे हिलाने के बदले साईड बाई साईड हिलाता है अन्यथा पहले यह पूछ लिया करते थे कि हाँ बोल रहे हो या ना? 
बाल काटने के बाद जब उसने गरम तौलिया माथे पर रख कर हल्की सी मसाज की तो जैसे पुनः स्फूर्ति लौटी. सामने शीशॆ पर नजर पड़ी तो एकाएक पहचान वाले को देखकर हैलो बोलने ही वाले थे कि समझ आया अरे, यह तो हम ही हैं. मगर हमारे बाल? सफाचट?  सफाचट मतलब कि एकदम छोटे छोटे. मरा हाथी भी तो सवा लाख टाईप.
एकदम से घबरा कर हमने उस लड़की से पूछा कि ये बाल इतने छोटे क्यूँ काट डाले? ये किस बात का बदला निकाल लिया. हमारे खिलाफ तो कोई #मीटू भी नहीं है फिर हमसे यह बर्ताव? इस पर उसने पिछली कटिंग की पर्ची दिखलाई और कहा कि मैने आपको यह पढ़कर सुनाई भी थी और आपने हाँ भी कहा था, तो काट दिये.
हमने कहा कि चलो हाँ तो भले ही नींद में कहा होगा या इतने सालों में आजतक ऐसा धोखा नहीं हुआ इस हेतु अति अविश्वास में कह दिया होगा मगर हमारी तो पिछली बार क्या कभी भी ऐसी हजामत नहीं बनी है जो आपने बना डाली. तो ये नम्बर कहाँ से आये हमारी पर्ची पर?
बड़ी हलचल मची. खोजबीन की गई तो पता चला कि किसी और की पर्ची प्रिंट हो गई थी और हजामत बन गई हमारी. मगर अब क्या हो सकता है? भले ही पर्ची गलत प्रिंट हुई हो मगर हामी तो हमने भी भरी थी. हमारा आलस्य, हमारी नींद, हमारा सजग न रहना, हमारे हाँ और ना के बीच कोई भेद न रहना और भी न जाने क्या क्या वजह हो सकती हैं जिस पर दोष डाला जा सकता है मगर भुगतना तो हमको ही है और वो भी तब तक, जब तक बाल फिर से एक निश्चित समय के बाद स्वतः उग नहीं आते.
थोड़ी देर दुखी होने के बाद तय किया कि मायूसी की चादर उतारी जाये और इसमें भी कुछ खुश होने का कारण खोजा जाये. यूँ भी तकलीफ जब हद से गुजर जाये तो आंसू हंसी में तब्दील हो जाते हैं. बस कुछ ऐसी ही सोच लिए विचार कर मुस्कराये कि अब कम से कम कुछ दिन तक सुबह कंघी करने की झंझट से मुक्ति मिलेगी और उससे भी बड़ी मुक्ति उस ग्लानी से मिलेगी जो कंघी से लिपट कर आये कभी न लौटने वाले बालों को देखकर होती थी कि हाय!! अब के बिछड़े तो शायद फिर कभी ख्वाबों में मिलें. फिर अब ठंक का मौसम आ गया है, टोपी उतारो तो सब बाल बिखरे छितरे, उससे भी छुटकारा मिला..बाल हों तो बिखरें. टोपी भी उदास होगी कि अब किसे छेडूँ? अब कौन मुझ पर #मीटू लगायेगा? कल को हालात ऐसे ही रहे तो लड़के लड़कियों से ऐसी दूरी बनायेंगे कि लड़कियाँ भी सोचेंगी कि अब किस पर #मीटू लगायें. घिघियायेंगी लड़को के सामने कि बात तो करो हमसे..कसम #मीटू की ..कभी जो #मीटू का नाम भी लिया तो.
खैर, तेल, जैल, शेम्पू आदि के पैसे भी तो बचेंगे ही कुछ समय के लिए. मगर बड़ी बात तो यह है कि एक आध साल में वैसे भी समस्त बालों का ओम नमः स्वाहा तो होना ही है तो एकाएक झटका लगने की बजाय ये उसी का एक रिहर्सल मान लेते हैं. सही रिहर्सल रहे तो मंच पर सही में उतरते वक्त कम नरवसनेस रहती है. यह हम कवियों से बेहतर कौन जानता है. 
चलो, हमारी तो जो गत हुई सो हुई, आप अपनी देखो. चुनाव सामने हैं. कुछ सीख ले सको तो ले लो हमारी हालत से. अभी वो आयेंगे आपके पास कि प्रभु!! आपको पिछले चुनाव में हमने यह पर्ची सुनाई थी कि आपका विकास होगा, अच्छे दिन आवेंगे, आपके खाते में १५ लाख हम पहुँचावेंगे, हम आपकी गरीबी मिटावेंगे, आपकी पूजा पाठ के लिए हम राम मंदिर यहीं बनायेंगे आदि आदि. और तुम पिछले पांच साल से भागते दौड़ते हमारी तरह नींद और आलस्य की चादर ओढ़े कहीं बिना सजग हुए मुंड़ी न हिला बैठना वरना इनके जीतते ही जब ये अपने गुरुर और पॉवर की गरमी का असर तुमको ऐसा दिखायेंगे तो स्फूर्ति की बजाय करेंट लगेगा. फिर तुम्हारे हाथ बच रहेगा अगले पाँच साल तक मुंड़ी हिलाते रहना. फिर उसमें से खोजने को खुश होने के साधन भी न बचेंगे क्यूंकि एक ही बहाने से आखिर कितनी बार खुश हो सकते हो.
काठ की हांडी बार बार थोड़े न चढ़ती है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार नवम्बर १८,२०१८ में:

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शनिवार, नवंबर 10, 2018

सेल्फी खींच कर डीपी बनाओ कि हम जाग गये हैं अब



जबसे इन्टरनेट और व्हाटसएप की दुनिया आबाद हुई है मानो दुनिया ही बदल गई है. जो जैसा दिखता है वो वैसा होता नहीं है. या यूँ कहें जो जैसा होता है वैसा दिखता नहीं है.
अपवादों को छोड़ दें तो आभासी दुनिया में सेल्फी ने सेल्फ कॉन्फिडेन्स बूस्टर का काम किया है. जीरो सेल्फी में हीरो नजर आता है. फिल्टर लगा कर जब सेल्फी खींच कर लगाई तो बहुत सारे काम्पलिमेन्ट तो हमें ही मिल गये कि कनाडा जाकर रंग साफ हो गया है जबकि असलियत तो ये हैं कि जो काम सैकड़ों फेयर एण्ड लवली क्रीम हमारी जवानी में न कर पाई, वो काम एक फिल्टर ने सेल्फी पर कर डाला. काश!! हमारी जवानी में भी सेल्फी का दौर होता. कई बार मन यही सोच कर रुआंसा सा हो जाता है. फिर मन को खुद की सेल्फी दिखा कर खुश कर लेते हैं.
मेरे एक मित्र जो अपने घर से चार कदम नुक्कड़ पर पान खाने भी कार से जाते हैं और लौट कर कुछ और काम करने के पूर्व आराम करते हैं. कौन जाने कार में चढ़ने उतरने से थके या पान खाने में जबड़े हिलाने से मगर थके जरुर. वो आये दिन अपनी सेल्फी हाफ पैण्ट और टीशर्ट पहन कर पसीना पसीना पोज में चढ़ाते हैं कि फीलिंग हैप्पी- फुल मैराथन. मुझे पूरा विश्वास है कि मैराथन भी उन्होंने उसी कार में बैठ कर पूरी की होगी मगर सेल्फी खिंचवाने के लिए उतरने चढ़ने में पसीना पसीना हो गये होंगे.
मैराथन जहाँ एक ओर आयोजकों की मोटी कमाई का जरिया बना हुआ है वहीं दूसरी ओर दौड़ने वालों से ज्यादा सेल्फीबाजों का महोत्सव बन गया है. उस रोज उनके घर फोन लगाया तो नौकर से पता लगा कि साहब और मेमसाहब दोनों फोटोग्राफर को लेकर मैराथन में गये हैं सेल्फी खिंचवाने. नौकरों का यही हाल है घर का भेदी लंका ढाहे. नौकरों के चक्कर में बहुतेरे साहब लंबा नपाये हैं फिर चाहे वो सीबीआई या आरबीआई के सरकारी नौकर ही क्यूँ न हों. तो इतना सा खुलासा अगर इस नौकर ने कर भी दिया तो ठीक है.
हम तो खैर उस देश के वासी है जिसका विकास ही सेल्फी की जकड़ में है. जिसका विकास एम्बेस्डर स्वयं सेल्फी पीर है. कैमरे पर चौकीदारी करने वाला कमरे के पीछे भागीदारी में जुटा है. कैमरे पर सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाला कैमरे के पीछे मितरों के विकास में लगा है.
मैराथन से याद आया आजकल शुभकामनाओं का मैराथन उत्सव चल रहा है. जैसे मैराथन में कोई दौड़ता है, कोई चलता है, कोई सिर्फ आता है मगर सेल्फी सभी खिंचाते हैं और डीपी बनाकर चढ़ाते हैं. वैसे ही उत्सवधर्मी देश में शुभकामनायें देने का ऐसा प्रचलन चल पड़ा है कि अगर कोई पैमाना हो इसे नापने का तो दिल्ली के प्रदुषण से ज्यादा घातक सिद्ध होगा.
एक एक बंदा एक एक बंदे को एवरेज चार से छः बार बधाई और शुभकामनायें चिपका रहा है फिर भी और चिपकाने को भूखा है, मानो ससुराल में जमाई जी का स्वागत हो रहा है. एक पूड़ी ओर. जमाई बाबू खा खाकर बेहोश होने की कागार पर हाथ से प्लेट ढांके हैं मगर सासु माँ साईड से जगह देखकर एक पूड़ी और सरका ही गईं. भ्रष्टाचारी नेताओं की भूख को पछाड़ने का माददा अगर किसी में है तो वो शुभकामनाओं के प्रदानकर्ताओं में है.
स्टीकर, कॉपी पेस्ट, टेक्सट, जीआईएफ, जेपीजी, विडिओ, पीडीएफ, यूट्यूब और भी न जाने क्या क्या है इस शुभकामनाओं के मैराथन में..मगर हर का सार..बधाई और शुभकामनायें. हालत ये हो गये हैं कि मरनी करनी में भी बधाई और शुभकामनायें देने से न चूक रहे हैं ये लोग.
आपके पिता जी दुखद निधन पर सादर नमन. ॐ शांति. गोवर्धन पूजा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें. ईश्वर आप पर ऐसी ही कृपा सालों साल बरसाये, यही कामना.
दूसरा कह रहा है, रात के ग्यारह बज गये हैं. १० बजे के बाद से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ रही हैं दिल्ली में. अभी तक कर्ण भेदी पटाखों की आवाज थम नहीं रही. दुखद एवं शर्मनाक. दीपावली के इस पर्व पर आप सभी को बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें. धूम धड़ाके के साथ मनायें.     
इन आभासी दुनिया के शुभकामनाकर्ताओं ने मार्केट पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि अब आप किसी के घर सच में जाकर शुभकामना दें तो अगला सोचता है कि मिठाई खाने भुख्ख्ड़ चले आये वरना शुभकामना तो व्हाटसएप पर भी दे सकते थे.
लोगों की परवाह किये बगैर जो जितनी शुभकामना बरसा रहा है वो उतनी पा रहा है, फिर भले ही अंदर अंदर लोग उससे चाहे परेशान ही क्यूँ न हों. कौन देखने जा रहा है कि क्या वो सच में आपको शुभकामना दे रहा है कि भरमा रहा है. यह बात हमारे सेल्फी पीर और उनकी टीम भली भाँति जानती है और इसी तरह विकास की सेल्फी चिपका चिपका कर झूठ सेल्फी ही सही, वोट तो ले ही जायेगी आपका.
फिर आप जैसे आज शुभकामना संदेश डिलिट करने में परेशान हो, तब विकास की तस्वीरें डिलिट करते रहना, वो तो पाँच साल को पुनः स्थापित हो ही जायेंगे.
सोते रहना है कि जागना है अब, आप तय करो और एक सेल्फी खींच कर डीपी बनाओ कि हम जाग गये हैं अब.   
समीर लाल ’समीर’  
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ११, २०१८
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शनिवार, नवंबर 03, 2018

पब्लिक सर्वे, प्रीपोल सर्वे और अब चायनीज़ सर्वे


एक चायनीज़ सर्वे के मुताबिक २०१९ लोकसभा चुनाव में राहुल जी सबसे लोकप्रिय नेता के रुप में उभर कर आ रहे हैं और उनका प्रधान मंत्री बनना तय है. ८७% का रुझान है. जनता मन बना चुकी है. बहुत बड़े बदलाव के संकेत हैं. तिवारी जी पान की दुकान पर बैठे घंसु को बता रहे हैं.
आंतरिक सर्वे, पब्लिक सर्वे, प्रीपोल सर्वे और भी न जाने कितने तरह के सर्वे सुने हैं मगर चायनीज़ सर्वे? यह कौन सा सर्वे होता है? घंसु समझने की कोशिश कर रहा है.
हाँ, चायनीज़ सर्वे. यह वैसा ही है जैसा सारा चायनीज़ माल. क्वालिटी की कोई गारन्टी नहीं मगर चमक दमक में सबसे तेज. तिवारी जी ने समझाया.
सो तो अपने देशी सर्वे की भी क्या गारंटी होती है? सबके अपने अपने सर्वे वाले हैं, वो ही सर्वे करते हैं, वो ही किनका सर्वे करना है, उनको चुनते हैं और वो ही परिणाम घोषित करते हैं, वो ही कमाते हैं, वो ही प्रसाद पाते हैं. हमारे पास तो आज तक कोई सर्वे वाला पूछने नहीं आया कि किसको वोट डालोगे? तो आखिर किससे पूछ कर गये सर्वे वाले? हमारे तो पहचान में भी कोई नहीं कहता कि उनसे किसी ने पूछा? शायद चुपके से सुन कर चले जाते हों सर्वे वाले, कौन जाने!! घंसु सोच रहा है.
वैसे तो अब टेक्नालॉजी का जमाना है. अलेक्सा, गुगल, सीरी आदि सब घरों और फोनों में घुसे हैं. आप क्या सोच रहे हैं, क्या सर्च कर रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं, सब कलेक्ट हो रहा है. एलेक्सा सुनती है कि बंदा राम राम करता रहता है, तो बीजेपी को वोट नोट कर लेती हो, क्या पता? दिन भर में एक भी बार राम नहीं, तो कांग्रेस का. नारंगी कुर्ता खरीद लाये तो दुकान का बिल देख कर बीजेपी वरना कांग्रेस. विचारणीय तो है ही. सर्वे ही तो है गलत निकल जाये तो निकल जाये.
वैसे कभी कभी सर्वे मुझे देशी कट्टा जैसा लगता है. बस, चमकाने के काम आता है, चलाने के नहीं. चला दिया तो कोई भरोसा नहीं, उल्टा ही चल जाये या कहो, चले ही न.
घंसु को अभी भी चैन नहीं पड़ रहा था चायनीज़ के नाम से. बोला कि देश हमारा, चुनाव हमारा, चुनाव हमारे नेताओं का, चुनने वाले हमारे लोग, फिर इसमें चाईना का क्या रोल? मजाक है क्या कोई?
तिवारी जी उखड़ पड़े कि तुम सर्वे पर तो बहुत कूद रहे हो कि चायनीज़ क्यूँ? तब काहे चुप बैठे थे जब महापुरुष भी हमारे देश का, सम्मान देने वाले भी हमारे देश के, जमीन भी हमारे देश की, टेक्सपेयर भी हमारे देश का जिनके पैसे से उस महापुरुष की मूर्ति बनवाई, एकता भी हमारे देश की(स्टेच्यू ऑफ यूनिटी) तो फिर उसे बनाने वाला चाईना क्यूँ? तब काहे नहीं कूद कूद कर पूछे कि ऐसा कैसे हो गये? वो मेक इन इन्डिया वाला शेर कहाँ गुम हो गया, उस नारे का क्या हुआ? वो भी जुमला ही था या हमारे यहाँ लोहार और मूर्तिकार नहीं बच रहे अब? हो सकता है जीएसटी की भेंट चढ़ गये हों सब.
तिवारी जी को उखड़ता देखकर घंसु ने पैतरा बदला और कहने लगा कि आपने वो नारा तो सुना ही होगा ’हिन्दी चीनी भाई भाई’, बहुत पहले हकीकत फिल्म में भी दिखाया था. तो क्या फरक पड़ता है इस भाई के घर बना या उस भाई के घर. एक ही बात तो हुई न!!
अब तुम मेरा मूँह मत खुलवाओ घंसु! एक तो यह नारा ही गलत है. हिन्दी भाषा है, चीन की बोली को भी आमतौर पर चीनी भाषा बोलते हैं, तब भाई कैसे? भाषा स्त्रीलिंग हैं. बहन बहन हो सकती हैं और बहने हैं तो अलग अलग घर गई और अलग अलग घर की हो गईं. यही मान्यता है.
तिवारी जी आप समझ नहीं रहे. असल में चीन में रहने वाले लोगों को चीनी कहते हैं न इसलिए इसका तात्पर्य लोगों से है. घंसु बता रहे हैं.
तो हिन्दुस्तान में रहने वाले कब से हिन्दी कहलाने लगे. उनको हिन्दु कहने की कवायद भी अभी पिछले ४ सालों का ही सियासती खेला है, वरना तो हिन्दु, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी और जो भी हिन्दुस्तान में रहता है, हिन्दुस्तानी ही कहलाता है. यूँ भी जबसे हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा दिया गया था तब से हमेशा धोखा ही हुआ है उनसे.
वैसे तो ३००० हजार करोड़ की मूर्ति का तो छोड़ो, ३ करोड़ का ठेका भी मिलना हो तो सगा भाई ही भाई को धोखा देकर हथिया ले. ऐसा ही होता आया है. फिर हिन्दी चीनी वाले भाई भाई की तो बात ही न करो.
अपवाद तो खैर हर जगह होते हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ४, २०१८

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शनिवार, अक्तूबर 27, 2018

रावण के पुतला दहन में पटाखे छोड़ने की कहाँ मनाही है?



नये नये कनाडा आये थे. जब पहली बार अपने एक नये गोरे दोस्त के मूँह से सुना था कि इस बार वीक एण्ड पर वो अपनी मम्मी और उनके बॉय फेण्ड के घर डिनर पर जायेगा तो बड़ा अजीब सा लगा था. हम जिस संस्कृति और जो देखते हुए बड़े होते हैं, उसी के आधार पर हर बात का एक निश्चित खाका दिमाग में बना लेते हैं.
अभी हाल ही में कनाडा की राजनिति में पैर जमाने की कोशिश की. पत्नी चुनाव लड़ीं. लगा ही नहीं कि कोई चुनाव लड़ भी रहे हैं. न लाऊड स्पीकर, न बैनर पोस्टर, न मंच मचान, न रैली और चुनावी सभाएँ, न किसी के हाथ जोड़ना, न किसी के पैर छूने, न झूठे वादे, न दारु बंटवाई, न पैसे देकर भीड़ जुटाई. बस कुछ डीबेट लायब्रेरी या स्कूलों में या लोकल टीवी पर, कुछ डोर टू डोर खटखटा कर लिटरेचर थमाया, अपनी वेब साईट और सोशल मीडिया के पेज का लिंक, निर्धारित सड़को पर दो फुट बाई दो फुट के छोटे छोटे प्लास्टिक के साईन बोर्ड और बस हो गया चुनाव. ८ बजे वोट डालना बंद. ८ बज कर १० मिनट पर परिणाम घोषित. हार गये तो घर जाकर सो जाओ. जीत गये तो घर जाकर सो जाओ. और हाँ, जाते जाते वो सड़को से साईन बोर्ड उतार कर लेते जाना वरना ७२ घंटे बाद सिटी उतार कर ले जायेगी और आप बिल और पेनाल्टी भर रहे होंगे बोर्ड की संख्या के आधार पर. न लड्डु बँटे, न नगाड़े, न जुलूस निकला, न रंग गुलाल, न माला पहनाई गई और न बम पटाखे फूटे. ये कैसा चुनाव? एकदम फीका फीका. मिठाई बिना शक्कर वाली. हम जिन चुनावों में पले बढ़े हैं, उनकी चमक ही कुछ और होती थी.
इन लोगों ने वो चुनाव देखे नहीं हैं तो इनको इसी में मजा आ जाता है. किसी प्रत्याशी नें दूसरे प्रत्याशी के सोशल मीडिया पर दिये स्टेटमेन्ट को स्टुपिड स्टेटमेन्ट क्या कह दिया, बवाल मच गया कि डर्टी पॉलिटिक्स..सामने वाले को माफी मांगना पड़ी तब बवाल थमा. माहौल माहौल की बात है.
अब तो हमारी आदात पड़ गई है ऐसे चुनाव देखने की. मम्मी के बॉय फ्रेण्ड और पापा मम्मी दोनों ही बॉय देखने सुनने की. वक्त के साथ दिमाग समझौता कर लेता है मगर प्रथम दृष्टा तो आज भी शादी बारात की सोचो तो दुल्हा दुल्हन के तौर पर लड़का लड़की ही विचार में आते हैं.
होली की बात सोचो तो आज भी वारनिश, काला पेंट, कीचड़, चटख वाले गीले रंग कि होली का हफ्ता निकल जाये मगर रंग न छूटे, भांग, गुजिया, नमकीन, साथियों की नगाड़े बजाती नाचती नशे में झूमती टोली. आजकल तो सुनते हैं कि होली पर लोग फैमली के साथ हिल स्टेशन और पिकनिक आदि पर चले जाते हैं.
दिवाली की याद यूँ है कि हरी रस्सी वाले सुतली बम, लक्ष्मी बम, लाल हजारों पटाखों वाली लड़ी जो पड़ पड़ बजाना शुरु हो तो २० मिनट तक बजती ही जायें, राकेट, अनार, सात आवाज वाला बम, पटक बम ..याद करुँ तो लिखते ही चला जाऊँ. जो शाम से बजना शुरु हों तो रात २ बजे तक बजते ही रहें. तब पंडित जी लक्ष्मी पूजन का मुहर्त निकालते थे और हम बच्चे इन्तजार करते थे कि जल्दी से पूजा खत्म हो तो पटाखे चलायें. लड़ियों वाले पटाखे में से बिना फूटे उछल कर दूर जा गिरे पटाखे और फुस्सी निकल गये बम अगली सुबह गरीब बच्चे बीनकर ले जाते थे और उनकी दिवाली उसी से अगले रोज मना करती थी.
अब सुना पटाखे चलाने का मुहर्त अदालत तय कर रही है. शाम को ८ से १० बजे तक फोड़ लो वो भी बिना आवाज वाले, हरित क्रांति के तहत बिना धुँआ वाले. लड़ी फोड़ना बैन. डिजिटल इंडिया में जहाँ अब हर पेमेन्ट ऑन लाईन करने पर जोर है, वहीं पटाखे ऑनलाईन बिकने पर बैन. ये कैसा आधा डिजिटलाईजेशन है. सही है दो हजार के नोट वाला गाँधी के चश्में वाला स्वच्छता अभियान जैसा. चश्में के एक शीशे पर स्वच्छ लिखा है और दूसरे पर भारत है. एक शीशा दिखाने का और दूसरा देखने का.
गरीब की किस्मत के लड़ी से उड़े बम भी ये ले उड़े. खैर, गरीब की तो वैसे भी किसी ने क्या सुध ली है सिवाय चुनावों के दौरान आसमान दिखाने के.
चुनाव में जब पूरे देश में पटाखे चलाये जायेंगे तब उस पर कोई बैन नहीं सुना? शायद इसलिए कि शहर का इतना बड़ा वाला दूसरा प्रदुषण शहर से हटकर राजधानी निकल जायेगा, यह सोचकर पटाखों वाला प्रदुषण कम नजर आया हो चुनाव के जुलूस में, तो जाने दिया हो. कौन जाने!!
रावण के मरने पर पुतला दहन में पटाखे छोड़ने की कहाँ मनाही है?
-समीर लाल ’समीर’   
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २८, २०१८


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शनिवार, अक्तूबर 20, 2018

शेक्सपियर सही कहे थे कि नाम में क्या धरा है?



अच्छा हुआ शेक्सपियर मौका देख कर १६१६ में ही निकल लिए. अगर आज होते और भारत में रह रहे होते तो देशद्रोही ठहरा दिये गये होते और कुछ लोग उन्हें बोरिया बिस्तर बाँध कर पाकिस्तान जाने की सलाह दे रहे होते. ये भी कोई बात हुई कि कह दिया ’नाम में क्या रखा है, गर गुलाब को हम किसी और नाम से भी पुकारें तो वो ऐसी ही खूबसूरत महक देगा’. इतनी बुरी बात करनी चाहिये क्या?
मैने भी एक बार कोशिश की थी जब मंचों से गज़ल पढ़ना शुरु की. तब मन में आया था कि अपने नाम ’समीर’ में से एक शब्द साईलेन्ट मोड में डाल देते हैं और खुद को मीर पुकारेंगे तो शायद मंच लूट पायें. बाद में मंच बुजुर्गों की सलाह मान कर नाम मे ’स’ पर से साइलेन्सर हटाया और गज़ल के व्याकरण समझने में मन लगाया. सिर्फ मीर और गालिब नाम रख लेने से आप मीर और गालिब सा लिखने लगेंगे, इससे फूहड़ और क्या सोच हो सकती है.
उस रोज पान की दुकान पर तिवारी जी बोले कि अब अपने घंसु को ही देख लो. माँ बाप ने कितनी उम्मीद से नाम घनश्याम दास रखा था मगर वे रह गये घंसु के घंसु. सुबह खाने को रुपये हैं तो शाम जेब खाली. घनश्याम दास नाम रख देने से कोई अपने आप बिड़ला तो नहीं हो जाता. सारा जीवन गुजार दिया घंसु ने मगर साईकल को ही गाड़ी कहते रह गया.
घंसु भी भला कहाँ चुप रहते. उखड़ पड़े कि ऐसे में आप ही कौन कमाल किये हैं? नाम के बस तिवारी हो और रोज शाम सूरज ढलते ही दारु और मुर्गा दबाते हो. सोचते हो कि अँधेरा हो गया अब भगवान क्या देख पायेगा कि आप क्या कर रहे हो? वहाँ ऊपर सब नोट हो रहा है. नाम तो आपका बदला जाना चाहिये.
तिवारी जी क्या जबाब देते. अब वे मूँह में पान भरे धीरे से मुस्कराते हुए कह रहे हैं कि शेक्सपियर सही कहे थे ’नाम में क्या धरा है..’
घंसु बोले कि तिवारी जी कुछ उधार मिल जाता तो सोच रहा हूँ एक चाय का ठेला खोल लूँ. नाम में तो वाकई कुछ नहीं धरा. अब काम में क्या धरा है वो अजमा कर देख लूँ. कौन जाने कल को देश की बागडोर ही हाथ लग जाये?
तिवारी जी उधार तो तब दें जब खुद के पास कुछ हो, अतः जैसा कि होता है सलाह ही दे दी. देख घंसु, देश में लाखों चाय वाले हैं. उस लाईन से देश की बागडोर पाने में काम्पटिशन बहुत है. उससे अच्छा तो एक बार फिर नाम बदल कर ललित, नीरव, विजय टाईप कुछ रख ले और बैंक से लम्बा कर्जा मांग. मांगने में तो तेरी क्षमताओं के आगे वो निश्चित ही फीके हैं, फिर भी कर्जा लेकर देश के बाहर भाग ही लिये. तो तू भी कोशिश करके देख ले. मिल जाये तो विदेश निकल लेना वरना तो विदेश जाना इस जन्म में तेरे भाग्य में नहीं.
घंसु असमंजस में है कि बात देश की बागडोर संभालने की थी और तिवारी जी कर्जा लेकर विदेश भाग जाने की बात कर रहे हैं?
तिवारी जी समझा रहे हैं कि तूँ असमंजस में न प़ड़. एक बार कर्जा लेकर विदेश निकल कर तो देख. जो देश की बागडोर संभालते हैं न, तब तू उनकी बागडोर संभालेगा. कुछ समझा? अब घंसु की मोटी बुद्धि भी समझ चुकी थी कि आगे क्या करना है?
मगर एक बात फिर भी नहीं समझ आई कि शहर का नाम बदलने से क्या हासिल? क्या इलाहाबाद का नाम बदल प्रयागराज कर देने से इलाहाबाद हिन्दु हो गया या पहले मुसलमान था? क्या संगम स्नान अब और अधिक पाप धो डालेगा? क्या गंगा अपने आप साफ हो जायेगी? क्या सुलाकी के लड्डु अब ज्यादा मीठे हो जायेंगे? क्या कुँभ की महत्ता बढ़ जायेगी? क्या पुराने दबंगों की दबंगाई अब नये दबंगो के हाथ चली जायेगी? किसी भी क्या का क्या जबाब होगा, कौन जाने मगर यह हर सरकार के हथकंड़े हैं. किसी के किसी वजह से, तो किसी के किसी के किसी वजह से.
मुझे अपना बचपन का साथी रमेश याद आ रहा है. जब वो होमवर्क न करके लाता तो मास्साब की मार से बचने के लिए वो उनको अन्य बातों में उलझाता कि मास्साब मुझे फलाने ने गाली बकी. फलाने ने मारा. मास्साब उसी को सुलझाने में ऐसा उलझते कि असल मुद्दा होम वर्क पूछने का वक्त ही नहीं मिल पाता. रमेश मेरी ओर देख मंद मंद मुस्कराता और धीरे से आँख मारता.
बाकी तो आँख मारने का अर्थ निकालने में आप समझदार हैं ही!
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २१, २०१८

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