रविवार, सितंबर 16, 2018

आँख खुली रखना जागना नहीं है, जागरुक होना जागना है.


जिस तरह हर पर्व की एक अलग पहचान होती है, वैसे ही चुनाव की भी है. यह लोकतंत्र का एक बड़ा पर्व है. बताते हैं इस दौरान पूर्व चयनित नेता नगर वापस लौटता है. उसके भीतर का पिछले चुनाव जीतने के बाद से मर चुका इंसान पुनः अगली जीत तक के लिए जीवित हो जाता है. वह एकाएक जेड सुरक्षा से निकल आम जनता के बीच एकदम सुरक्षित महसूस करने लगता है. वह पुनः संवेदनशील हो जाता है और आम जनता की समस्याओं पर उसकी आँख की अश्रुग्रंथी पुनः झिरने लगती है, मानो पाँच से सूखे पड़े कुँए में एकाएक झिर फिर से खुल गई हो.
जो नेता पिछला चुनाव हार गये थे या जो इस बार गुंडई का राजमार्ग पार कर नेतागीरी में उतरे हैं,वो भी सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर बगुलाभगत की तरह सजधज कर आम जनता के बीच हाथ जोड़ कर चले आते हैं. फिर होड़ लगती है कि कौन आमजनता को कितना बेवकूफ बना सकता है?
इस पर्व में हर जाति धर्म को लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. अमीरों और अभिजात्य वर्ग का तो रुपया ही सब कुछ होता है अतः वो धर्म और जाति के बंधन से मुक्त इस पर्व पर वो पिकनिक मनाने निकल जाते हैं. उनकी जगह उनका रुपया इस उत्सव में उनकी हाजिरी लगता है और बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. जाति धर्म गरीबों के हिस्से की जागीर है जो उन्हें डराने से लेकर बांटने तक के लिए काम आता है. नेता जाति और धर्म के नाम पर क्या खेल खिलाना है और क्या खेल खेलना है, बखूबी जानते हैं. यह चुनावी पर्व इस खेल का पाँच साला ओलम्पिक का सा महत्व रखता है.
जिस तरह भयंकर मधुमेह की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति मात्र मिठाई का नाम सुनकर उसके स्वाद को अहसास कर प्रसन्न हो लेता है. वो यह भली प्रकार जानता है कि अब यह मिठाई उसके नसीब में नहीं. वैसे ही गरीब आम जनता के लिए भी चुनाव के वक्त नेताओं के किये वादे कुछ देर को ही सही, एक प्रसन्नता की अनुभूति तो दे ही जाते हैं. अच्छे दिन, बैंक में रुपया, नौकरियों का अंबार, किसानों की सरकार आदि ऐसी ही कुछ मिठाईयों के नाम हैं, जो ये नेता इन्हें चुनाव के दौरान सुनाते हैं. नेता उन गरीबो में आस जगा देता है, जो उनके लिए अगले पाँच सालों के इन्तजार को झेल जाने का संबल बन जाता है.
आस में जिन्दा रखने की ताकत है. आस संजीवनी है. शायद इसीलिए वो माँ बाप जिनके बच्चे विदेशों में जा बसे हैं, लम्बा जीते हैं क्यूँकि उन बुजुर्गों में एक बार उनके वापस आने की आस बाकी रहती है, जो जहाँ एक ओर उनके आँसू गिरवाती है तो दूसरी तरफ उनके जिन्दा बने रहने की वजह बनती है.
अदालतों के फैसले का एक लम्बा सिलसिला भी उन कैदियों में वो ही आस भर देता होगा कि शायद अगली पेशी में छूट जायें और देखते देखते आजीवन कारावास के १४ साल इसी आस और इन्तजार के खेल में बीत जाते होंगे. वरना तो अगर अदालत पहले दिन ही फैसला दे दे और फिर बिना किसी आस के उन चाहरदिवारियों के बीच १४ साल काटने हों तो शायद एक साल में ही वो कैदी दम तोड़ दे. मुझे लगता है अदालतों में लगता एक लम्बा समय, छोटी अदालत से बड़ी अदालत का सफर एक अभिशाप नहीं, ऐसे लोगों के लिए वरदान ही है. इसे जारी रहना चाहिये.
घंसू को चुनाव बहुत पसंद हैं. वह समस्त राजनितिक दलों पर समदृष्टि रखता है. वह दलगत राजनिती से ऊबर चुका है. वह हर दल की रैली और चुनावी सभा में जाता है. वह हर दल के जिन्दाबाद का नारा उठाता है. उसे इस हेतु नोट मिलते है. दारु, गोस्त, पकोड़े, समोसे, पूरी, सब्जी, जलेबी आदि उसका पेट भरते हैं. देने वाला नेता हिन्दु है कि मुसलमान, पाने वाला तो उसका पेट ही है जिसे भरना उसके जिन्दा रहने के लिए जरुरी है.
नोट वोट की तरह ही छुआछूत से परे होता है. हिन्दु दे तो, मुसलमान दे तो,वह नोट ही रहता है. दरगाह वाला नोट घूमते फिरते मंदिर में चढ़ जाता है और मंदिर वाला दरगाह में. घंसु भी नोट के बदले वोट और हर प्रत्याशी के लिए पोस्टर चिपकाने से लेकर बैनर लगाने तक का काम करता है. चुनाव के दौरान ही उसकी कोशिश होती है कि आने वाले समय के लिए भी कुछ रकम सहेज ले.
सहेज कर तो खैर वो बैनर का कपड़ा बचा कर अपने कफन के लिए भी रख लेता है. उसे पता है कि अगर अगले चुनाव के पहले वो मर गया तो ये नेता नहीं लौटने वाले उसके कफन का इन्तजाम करने. इनका अपनापन चुनाव तक ही सीमित है.
इतना समझदार तो खैर हर आमजन है मगर ऐसी समझदारी किस काम की कि आप खुद ही सामने वाले के लिए मखमल की शेरवानी का इन्तजाम करवा कर खुद के लिए कफन सहेजो.
समझ सको तो जागो. आँख खुली रखना जागना नहीं है, जागरुक होना जागना है.  
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर १६, २०१८ में:


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शनिवार, सितंबर 08, 2018

तेल में आग और रुपये पर पानी


तिवारी जी का पुराना बकाया है घंसू पर. आज जब तिवारी जी ने पुनः तकादा किया तो घंसू भड़क उठे. उधार का व्यवहार ही यह है कि जब अपना ही पैसा वापस मांगो तो भीखमंगे से बत्तर नजर आते हो.
क्या मतलब है तिवारी जी आपका? कोई भागे जा रहे हैं क्या?
तिवारी जी भी गुस्से में आ गये बोले कि भाग तो नहीं रहे मगर रुपया भी तो वापस नहीं कर रहे हो? चार साल हो गये. दो महिना में लौटा देंगे बोल कर लिया था. हर चीज की एक हद होती है. रकम भी छोटी मोटी तो है नहीं, पूरे ५० हजार हैं. वो तो भला मानो कि हम ब्याज नहीं लगा रहे! किसी किसान से पूछ कर देखो कि सरकार कैसे ऋण देती है और कैसे ब्याज वसूलती है? हमारी जगह सरकार से कर्जा लिए होते तो अब तक किसी पेड़ में टंगे मिलते आत्म हत्या करके.
घंसू थोड़ा सकते में आ गये मगर रुपये तो हैं नहीं लौटाने को, तो कुछ न कुछ तो माहौल खींचना ही पड़ेगा. ये घंसू ने मौजूदा सरकार से खूब सीख लिया है पिछले चार सालों में. अतः घंसू ने पैंतरा बदला और बोले कि तिवारी जी आप तो पढ़े लिखे हैं. आप समझदार हैं. ऐसा बोल देने से सामने वाला बेवकूफ बनने को तैयार हो जाता है, यह घंसू जानता है. वो आगे बोला - देखिये रुपये की हालत? कितना गिर गया है. फिर इसके चलते पैट्रोल और डीज़ल के भाव में भी आग लगी है. थोड़ा बाजार संभल जाने दिजिये. रुपया मजबूत हो जाने दिजिये, लौटा देंगे आपका पैसा.
तिवारी भड़क गये कि क्या सोच कर लिये थे उधार? और फिर रुपये के गिरने से तुम्हारा क्या लेना देना? कोई डॉलर में कर्जा लौटाने की सोच रहे हो क्या हमारा? पैट्रोल में आग लगे या पानी, तुम तो अपनी साईकिल में घूमते हो, तुम्हारा क्या बनना बिगड़ना है इससे? जबरदस्ती की बहानेबाजी करते हो. कभी तेल में आग तो कभी रुपये पर पानी.
’कमजोर इन्सान पर तो सब जोर चलाते हैं’ घंसू रुँआसे से हुए बोल रहे हैं. साहेब भी तो चार साल पहले बोले थे कि १५ लाख सबके खाते में डलवा देंगे, उनसे क्यूँ नहीं कुछ कहते आप? वो ही आ जाते तो हम आप का कर्जा आपके मूँह पर दे मारते. हमें भी कोई अच्छा नहीं लगता है कर्जा अपने उपर रख कर.
आजकल तो वैसे भी अपनी गल्ती का ठीकरा दूसरे के सर पर फोड़ने का फैशन चल पड़ा है. रुपया गिरा तो १० साल पहले की नीतियों का दोष. पैट्रोल के दाम बढ़े तो पुरानी सरकार के कर्जे की वजह से. काला धन नहीं आया तो २० साल पहले के किसी नियम की वजह से. नोटबंदी फेल हो गई तो पुरानी सरकार की अदूरदर्शीता से. जी एस टी, दलित कानून सब पुरानी सरकार के कारण. हिन्दु मुस्लिम तो नेहरु की गल्ती. तो फिर ये जो सरकार आई इसने क्या किया, इसका कोई हिसाब है क्या? कि सिर्फ पुरानी फिल्मों को चलता देखते रहे? और ये पता करते रहे कि पिछले ७० साल में क्या गलत हुआ? उसमें खुद के भी ५ साल गिना गये वो पता ही नहीं. तिवारी जी चिल्ला रहे हैं.
और घंसू, तुम सुनो!! ये सब सरकारी चोचले, इसकी गल्ति उसकी गल्ति वाले इन राजनितिज्ञों के लिए छोड़ दो. ये इनको ही सुहाते हैं. हम तुम साधारण लोग हैं, इनके चक्कर में हम भी लड़ बैठेंगे. फिर न हम आपस में बात करेंगे और न ही आपस में मदद.
तुम कोशिश करके जब सुविधा हो मेरा पैसा लौटा देना मगर इनका जामा पहन कर मानवता से मानव का विश्वास मत डिगाना. ५०,००० रुपये बहुत कम कीमत है मानवता को दांव पर लगाने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’    
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर ०९, २०१८ में:

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मंगलवार, सितंबर 04, 2018

देखना बस इतना है कि क्या क्या ऊबर होगा?


कल एक दफ्तर के मित्र के नये फ्लैट पर जाना हुआ. नया खरीदा है. जवान बालक है और कुछ साल पहले ही कैरियर की शुरुआत की है. फ्लैट देखकर मुन्नाभाई एमबीबीएस फिल्म के मुन्नाभाई हास्टल का कमरा देख सर्किट का डॉयलॉग याद आ गया...ये क्या भाई!! अभी तो कमरे में घुसे ही हैं और कमरा खतम!
३०० स्क्वायर फीट का फ्लैट. वाटर फ्रन्ट पर. एक कमरा. वाशरुम और एक दीवाल पर चिपका मार्डन किचन. दफ्तर के एकदम नजदीक. दाम सुना तो याद आ गया बहुत पहले एक बार खुद का ठगा जाना हालांकि ठगे तो कई बार गये हैं. एक बार देश में एक नये शहर में एक होटल में ठहरे थे. रात खाली थी तो सोचा कि नौ से बारह फिल्म देख ली जाये उमराव जान. अखबार में देखा कि किस थियेटर में लगी है. होटल से बाहर आये. ऑटो वाले को बताया थियेटर का नाम और उसने एक घंटे में पहुँचा दिया थियेटर ४०० रुपये लेकर उस जमाने में. फिल्म देखकर निकले और एक ऑटो वाले से कहा कि फलाना होटल जाना है, चलोगे. वो बोला वो सामने मोड़ पर ही तो है आपका होटाल, क्यूँ ऑटो कर रहे हैं? नजर उठा कर देखा तो वाकई १० कदम पर होटल था. पहले वाला ऑटो वाला सारी दुनिया घुमा कर होटल के पास में ही छोड़ गया और हम जान ही न पाये. आज जब इस फ्लैट का साईज और दाम सुना तो न जाने क्यूँ मेरे मन में हजारों प्रश्न उठ आये. उत्सुकता रोक पाने की मददा भी बढ़ती उम्र के साथ कम होती जाती है.
पूछ बैठे कि पार्किंग भी है क्या साथ में? मित्र कहने लगे कि कार ही नहीं है तो पार्किंग किस लिए चाहिए? मैने कहा मगर कभी अगर भविष्य में खरीदो तो कहाँ खड़ी करोगे? वो कहने लगा कि क्यूँ खरीदूँगा भविष्य में भी कार? दफ्तर बाजू में है. कहीं अगर जाना भी पड़ा तो ऊबर बुला लेता हूँ. आखिर जरुरत ही क्या है कार रखने की? पार्किंग, इन्श्युरेंस, मैन्टेनेंस की कौन झंझट उठाये और फिर कार तो हर बीतते दिन के साथ, चलाओ या खड़ी हो पार्किंग में, दाम में कम ही होती जायेगी. बेकार इन्वेस्टमेन्ट है जी. बात ठीक सी भी लगती है. खुद ही बेवकूफ से नजर आये जो खुद के लिए एक और बीबी के लिए एक कार लिए बैठे हैं.
फिर मैने उससे पूछा कि इस किचन में खाना कैसे बनाते हो? वो बोला कि खाना कौन बनाता है? ऊबर किचन को ऑर्डर करो, एकदम घर का बना खाना पहुँचा कर जाता है. हर रोज मनपसंद की डिश बताओ. खाना किस लिए बनाना? मैने पूछा कि यह तो बड़ा मंहगा पड़ता होगा? दो घंटा खाना बनाने पर खर्च करने की बजाये अगर दो घंटा कोई कमाई का कार्य करो तो १५ मिनट की कमाई में खाना कवर हो जायेगा. मुझे फिर पहले वाली बेवकूफ होने की फीलिंग आई.
तब हमने पूछा कि अगर मेहमान आयें तो कहाँ बैठाओगे, कहाँ खिलाओगे और कहाँ सुलाओगे? अब वो हंसने लगा..क्या बात करते हैं आप? मेहमान अब कहाँ आते हैं? जो अगर आ भी जायेगा पुराने ख्याल वाला कोई तो उसके लिए एयर बी ऎन्ड बी है न! खाना किसी रेस्टॉरेन्ट में मिल कर खा लेंगे, वहीं बैठ लेंगे और बतिया लेंगे. आखिर बतियाने को कुछ खास होता भी कहाँ है, सारी बातचीत तो व्हाटसएप पर होती ही रहती है लगातार.एक बार फिर..वही फीलिंग.
फिर भी एक प्रश्न तो बचा ही था कि कल को शादी होगी तब? वो कहने लगा कि शादी किसलिए? लिव ईन की बात चल रही है. डबल बैड तो लगा ही है. वो भी ऊबर से खाना मंगाती है. कैरियर उसके लिए भी बहुत मायने रखता है. शादी और बच्चे वच्चे करने में हम दोनों का कोई विश्वास नहीं है. आगे चलकर किसी चैरिटी के माध्यम से किसी बच्चे की पढ़ाई और रख रखाव स्पॉन्सर कर देंगे. वे स्पाँन्सर्ड बच्चे से बात कराते रहते हैं. बच्चे से चिट्ठी भी भिजवाते हैं और तस्वीरें भी भेजते रहते हैं. लगता ही नहीं कि अपना बच्चा नहीं है.
अरे, मगर माँ बाप तो आ ही सकते हैं न तुम्हारे पास? न न!! वो तो मस्त हैं फाईव स्टार टाईप सारी लक्जरी वाले ओल्ड एज होम में. घर बेच कर वो खुद वहाँ शिफ्ट हो गये हैं. उन्होंने तो मुझे १८ साल का होते ही अलग कर दिया था कि अब खुद को संभालो. मगर वो बहुत बढ़िया लोग हैं इसलिए अक्सर संडे वगैरह को मौका निकाल कर हम कहीं साथ में लंच वगैरह कर लेते हैं. फैमली बाईन्डिग तो है ही न!!
फिर पता चला ऊबर स्कूल, जहां से मन हो- लाग ऑन करो. पिछली बार के आगे पढ़ाई शुरु.
मुझे एकाएक लगा कि मैं कितने पुराने जमाने का बुढ़ा सा इन्सान हूँ. जमाना बदल रहा है. कल को ऊबर घर होंगे, ऊबर बीबीयाँ होंगी, ऊबर माँ बाप होंगे, ऊबर बच्चे होंगे, ऊबर दोस्त. जिस शहर गये, वहाँ अलग मगर उपलब्ध.
ये ऊबर युग अनोखा युग है और अनोखा होगा. देखना बस इतना है कि क्या क्या ऊबर होगा?
ऊबर अहसास, ऊबर मोहब्बत, ऊबर रिश्तों का युग दरवाजा खटखटा रहा है.
स्वागत करने के तैयार रहो.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर ०२, २०१८ में:


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शनिवार, अगस्त 25, 2018

विश्व स्तरीय साहित्यकार



सुन्दरियाँ चाहे वो मोहल्ला सुन्दरी हो, या शहर या प्रदेश या राष्ट्रीय या विश्व सुन्दरी, उनके अन्दर उनकी प्राथमिक योग्यता याने सुन्दरता निश्चित ही होती है. वो सुन्दर होती हैं. सुन्दरियों में भी अधिकतम सुन्दरी विश्व सुन्दरी बन जाती है, मगर मोहल्ला स्तर वाली सुन्दरी भी सुन्दर तो होती है.
यही हाल अन्य क्षेत्रों में अक्सर देखने में आता है. जैसे की पहलवान, मुक्केबाज, धावक, तैराक आदि. सभी किसी भी स्तर के हों मगर होते अपने क्षेत्र के उस स्तर पर धुरंधर ही हैं. ऐसा कभी नहीं होगा कि पहलवान जी राज्य स्तर पर खेलते हैं मगर कभी अखाड़े में नहीं उतरे हैं.
नेतागिरी में भी चुने हुए नेताओं में भी यही देखने को आता है, जिस स्तर पर भी जीत कर आये हों, नेतागिरी के प्राथमिक गुण जैसे मक्कारी, भ्रष्ट मानसिकता आदि तो कम से कम होते ही हैं. इसके बिना कैसा नेता? दो चार अपवाद हो सकते हैं मगर सच कहें तो चार भी ज्यादा कह गए भावुकता में आकर. नेतागिरी में तो कई ऐसे गुणधारी भी नेता बनने की होड़ में हैं जिन्हें कोई पूछ नहीं रहा है. तो उसी प्राथमिक गुणधर्मिता के आधार पर गुंडागिरी में नाम रोशन किये हैं. वैसे तो बहुत महीन रेखा है दोनों क्षेत्रों के बीच और इस पार से उस पार आना जाना लगा ही रहता है. कभी कभी कोई जगा जाए तो मालूम पड़ता है जैसे कि एकाएक मालूम चले अरे, ४० लाख घुस आये बंगलादेश से और हमारे बीच बैठे हैं. फिर सब शांत और फिर आना जाना जारी.
मगर इन सब से भिन्न हिंदी साहित्यकारी, जिसमें लहलहाने और जगमगाने के लिए न तो प्रदेश, न राष्ट्र और न ही विश्व स्तर पर आपको साहित्य रचने की आवश्यकता है. एक बड़े ऊँचे साहित्यकार(विश्व स्तरीय) से चर्चा के दौरान जब मैंने कहा कि मै बहुत मेहनत कर रहा हूँ. हर सप्ताह अखबारों में लिख रहा हूँ. नियमित पत्र पत्रिकाओं में आलेख आ रहे हैं. किताब भी लिख चुका हूँ और एक अन्य किताब भी जल्द ला रहा हूँ. अब आप बतायें कि क्या किया जाये एवं और कितनी मेहनत करूं कि आपकी तरह विश्व स्तरीय न सही, प्रदेश स्तरीय साहित्यकार ही कहला जाऊँ?
वे बड़ी अजीब सी निगाह से मुझे बड़ी देर तक देखते रहे फिर एकाएक बोले; अगर तुम अपना समय लिखने पढ़ने में ऐसे ही लगाते रहे तो नाम कब कमाओगे? बिना नाम कमाए भी कोई स्तरीय हो सकता है क्या?
स्तरीय साहित्यकार कोई अपने लेखन से बनता है क्या भला?
अरे, कुछ मित्रता बनाओ और सम्मान वगैरह अर्जित करो. इसी मित्रता से तरह तरह के पुरूस्कार से नवाजे जाओ. विभिन्न साहित्यिक सम्मेलनों में शिरकत करो. इन कार्यक्रमों में मुख्य अथिति एवं अध्यक्ष बनो. फिर भले ही तुम अपना खुद कुछ भी न लिखो मगर दूसरे के लिखे पर अपने विचार लिखो, बोलो और उसकी बेहतरी के लिए सुझाव दो, तब जाकर एक लंबे समय में स्तरीय कहला पाओगे. ऐसे लिखते रहे तो सिवाय समय खर्चने के कुछ भी हासिल न होगा.
एक बार शहर, प्रदेश और देश में पहचान बना लो तो विश्व स्तर पर तो एक दो विश्व हिंदी सम्मेलन में इन्हीं सब परिचयों के चलते या तो बुलावा बुलवाने का इंतजाम कर लो या खुद ही चले जाओ तो भी बिल्ला वगैरह तो मिल ही जाता है. फिर किसे मालूम की बुलवाए गए हो या खुद आ गए हो. सब पहचान और नेट्वर्किंग की बात है. विश्व हिंदी सम्मेलन में शिरकत अपने आप तुमको विश्व स्तरीय बना देगी, वरना तो कौन सा हिंदी साहित्यकार विश्व स्तर पर पढ़ा जा रहा है जो वो स्तर हासिल हो.
जो विश्व स्तर पर अपना स्थान बना गए उनके समय न तो विश्व हिंदी सम्मलेन होते थे और न ही स्थान बनाने की हाथापाई. तब वे वाकई लिखा करते थे.
वैसे स्तर हासिल करने का एक नया तरीका और भी है की पहले कोशिश करो की बुलावा मिले विश्व हिंदी सम्मलेन में आने का और न मिलने पर, उस सम्मेलन को ही दौ कौड़ी का ठहरा देने वाला आलेख लिख मारो तो भी सारे न बुलाये गए आपको सम्मानित कर ही डालते हैं और अगली बार बुलाये जाने की संभावनाएं भी बलवती हो जाती हैं.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में अगस्त २६, २०१८ में:

http://epaper.subahsavere.news/1790548/SUBAH-SAVERE-BHOPAL/26-august-2018#page/8/2

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शनिवार, अगस्त 18, 2018

सिद्धान्त गुजरे जमाने की बात है



डिस्काउन्ट का अपना वैसा ही आकर्षण है, जैसा किसी सेलीब्रेटी का. प्रोडक्ट की कितनी उपयोगिता है, कितनी गुणवत्ता है, सब गौंण हो जाता है, जब उस पर डिस्काउन्ट की घोषणा होती है. डिस्काउन्ट रुपी पुष्परस ग्राहक रुपी मधुमख्खियों को अपनी और आकर्षित करता है झुंड के झुंड में.
जैसे विदेशों में कभी सलमान, कभी कटरीना, कभी शाहरुख आदि अपना कार्यक्रम देते हैं तो क्या कार्यक्रम है, इस बात से ज्यादा उनका नाम भीड़ खींचता है. उन्हें तो स्टेज पर आकर उछलना कूदना है. गाना कोई और गायेगा. फिर भी नाम उनका शो. क्यूँकि उनके नाम में भीड़ जुटाने की ताकत है.
वही डिस्काउन्ट का हाल है. दुकान के बाहर बस इतना बोर्ड लगाने की जरुरत है कि भारी डिस्काउन्ट और फिर देखो, कैसे भीड़ खिंची चली आती है. दुकान के बाहर डिस्काउन्ट और सेल का बोर्ड दुकान में भीड़ बढ़ाने का सफल मंत्र है.
आप दुकान के बाहर बोर्ड लगा कर देखो कि हम बार्गेन नहीं करते, न तो गुणवत्ता से, न ही दाम से. यकीन जानिये, कुछ गिने चुने सिरफिरे भी अगर दुकान पर फटक जायें तो. मगर डिस्काउन्ट और सेल का बोर्ड सबको आकर्षित करता है.
मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा है कि जब कहीं डिस्काउन्ट लगता है तो पत्नी सिर्फ डिस्काउन्ट को सलामी देने के लिए जो कुछ खरीद कर लाती है, वो शायद अगर डिस्काउन्ट न लगता तो न तो उसकी जरुरत थी और न ही खरीदा जाता.
डिस्काउन्ट का स्वभाव है कि वो आपको वो माल बेच लेता है जिसकी आपको जरुरत भी नहीं है. मने अगर ३०% डिस्काउन्ट पर आप वो सामान ले आये जिसे आप बिना डिस्काउन्ट के शायद न खरीदते, तो आप ७०% बेकार में खर्च कर आये हैं.
उस रोज एक ऐसे मित्र कार के चार टायर रिक्शे पर लाद कर लाते मिले जिनके पास कार ही नहीं है. पूछने पर पता चला कि ४०% डिस्काउन्ट चल रहा था सो खरीद लाये. आगे पीछे कार तो खरीदना है ही. देखते हैं कब कार पर डिस्काउन्ट लगता है.
इधर दर्जी के यहाँ डिस्काउन्ट लगा तो हमने भी लगे हाथ बंद गले का सूट सिलवा ही लिया और उस पर सुनहरे तार से लाईन लाईन अपना नाम भी कढ़वा लिये हैं. क्या पता कल को प्रधान मंत्री बन जायें तब कहाँ सिलवाने जायेंगे? कौन जाने तब डिस्काउन्ट मिले न मिले. डिस्काउन्ट का ऐसा उपयोग हमारी दूर दृष्टि और पक्के इरादे का ध्योतक है, जो कि हमारे देश चलाने के लिए सुपात्र होने को साफ दर्शाता है.

हमारे नेता इस व्यवहार को जानते हैं. वे अपने वादे इसी डिस्काउन्ट की तर्ज पर बेचते हैं. जितना बड़ा डिस्काउन्ट याने कि वादे जितने चमकदार, उतनी भीड़, उतने वोट.
वो दिन दूर नहीं, दूर तो क्या होना शुरु हो ही गया है, जब डिस्काउन्ट के चलते लोग हनीमून ऑफ सीजन में डिस्काउन्ट पर मना आयेंगे, फिर शादी मुहर्त देखकर होती रहेगी. वरना तो शादी के मौसम में पहाड़ भी लूटते हैं.
वैसे डिस्काउन्ट का एक अन्य आयाम भी है जिसे निगेटिव डिस्काउन्ट कहते हैं. जिस तरह एकाऊन्टिंग में निगेटिव प्राफिट मतलब लॉस होता है. मगर जिस तरह हार हताशा के बदले अगर सीख बन जाये, लेसन लर्न्ड बन जाये तो हार हार नहीं होती, जिन्दगी की सीख और आने वाली जीत होती है.
निगेटिव डिस्काउन्ट मतलब कि प्रिमियम..याने कि पावरफुल लोगों को निगेटिव डिस्काउन्ट दो और अपना मतलब साधो. वही तो डिस्काउन्ट देने का हेतु है.
प्रिमियम मतलब कि घूस...मौका देखो और निगेटिव डिस्काउन्ट से समझौता करो.
आज का वक्त डिस्काउन्ट का है. फिक्स प्राईज़ की दुकान अब नहीं चलती.
सिद्धान्त गुजरे जमाने की बात है और समझौता आज के ज़ज्बात हैं.    
इसे समझना होगा...
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त १९, २०१८ के अंक में:



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रविवार, अगस्त 12, 2018

स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं...



हम साल भर पाप करते ही इसलिए हैं ताकि सालाना गंगा स्नान में उन्हें धोकर गंगा माई हमको पुण्य प्रदान करे. पाप न करेंगे तो गंगा माई धोएगी क्या? पुण्य प्राप्त करना है तो पाप करो. यही हमारा सिध्द नियम है.
वही हाल स्वर्ग पहुँचने का मार्ग दिखाने वाले बाबाओं के आश्रम का है. आश्रम में ऐसे ऐसे निकृष्ट धतकरम होते हैं कि उन्हें देख जान कर अगर नरक भी पहुँच जाओगे तो लगेगा वाकई अगर कोई जगह स्वर्ग है तो वो यही है.
जितना पाप इन पावन नदियों के तट पर और इन सिद्ध बाबाओं के घर पर होता है, उसके सामने सब कुछ पुण्य ही नजर आएगा.
हम उत्सवधर्मी इसी तर्ज पर हर बरस रावण बनाते ही इसलिए हैं ताकि उसे मार सकें. उसका दहन कर सकें. फिर सब तालियाँ बजा कर नाचें कि रावण मारा गया. पाप पर पुण्य की विजय हुई. अंधेरों पर उजाले की विजय हुई भले ही दो दिन से बिजली न आई हो और सारा शहर अँधेरे में डूबा हो. अंधेरों पर उजाले के विजय जुलूसों में जेबकतरों की पौ बारह हो लेती है. रावण तो जाने कब का मारा गया. अब तो गली गली रावण का पुतला बना कर उसे मारने वाले खुद ही रावण से बदतर कृत्यों में लिप्त है. गली गली सीताओं का अपहरण हो रहा है. अब बचाने को कोई हनुमान तो दूर, थाने में रिपोर्ट लिखने को हवलदार भी तैयार नहीं. कानून बनाने वाले इन रावणों के आका हैं और कुछ तो खुद ही रावण को भी शर्मसार करने में जुटे हैं. यही आका सबसे जोरशोर से राजधानी में दशहरे पर तीर चलाते हैं नकली रावण को मारने. जनता ताली पीटती है कि रावण मारा गया. इस तरह जनता को गुमराह कर असली रावण फिर साल भर के लिए मस्ती काटने को निकल पड़ता है. पाप का घड़ा सिर्फ मुहावरे में भरता है. असल में तो अब पाप का घड़ा बनाने वाले हों या क़ानून बनाने वाले, उसमें सुराख की समुचित व्यवस्था बना कर रखते हैं. पाप करते चलो, सुराख उसे कभी भरने न देगा.
साल भर कबूतरों को पकड़ कर पिंजड़े में बंद किया ही इसलिए जाता है ताकि स्वतंत्रता दिवस पर हर शहर, राजधानी से मंत्री जी लोग उन्हें उड़ा कर आजाद करें और जनता ताली पीटे कि देखो देखो, वो आजाद हो गए. आजादी का उत्सव मन गया. झंडा लहर गया. नेता जी के भाषण हो गये. आजादी के गीत बज गए. मिठाई बाँट दी गई. तमाशा खत्म. अब घर जाओ, अगले साल फिर आना.
हर मूंह में माइक घुसा कर प्रश्न पूछने वाला ये मीडिया कभी इन कबूतरों से अपना जाना पहचाना प्रश्न क्यूँ नहीं पूछता है कि हे कबूतर जी, आपको आजाद होकर कैसा लग रहा है? अब आप उड़कर कहाँ जायेंगे,क्या कमाएंगे, क्या खायेंगे?
कबूतर भी आम जनता की तरह वैसा ही मूक और निरीह प्राणी है, जिसे अपनी नियति पता है. वो हर मुसीबत में आँख मींच कर राम नाम जपने लगता है और हर दशा को प्रभु की मरजी मान कर इत्मीनान धर लेता है. उसके लिए ‘स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ मात्र एक वैसा ही आजादी के समय का नारा है, जैसा आज ‘गरीबी हटाओ, फलाने को जिताओ’ जो १०० रुपये की एवज में वो हर चुनावी सभा में लगाता है. यह चुनावों के महापर्व पर उसकी कमाई का साधन है. सच सोच है कि हकीकत में अगर गरीबी हट जाए तो अगले चुनाव में नारे कौन लगाएगा? और स्वतंत्रता अगर सबको दे दें तो अगले साल स्वतंत्रता दिवस पर आजाद किसे करेंगे?
इन आजाद किए गए कबूतरों में कुछ कबूतर तो बार बार पकडे जाने के इतना अभ्यस्त हो गए हैं कि नेता जी के आजाद करते ही कुछ देर में उड़ कर खुद ही फिर से पिंजड़े में आकर बैठ जाते हैं. कबूतरों का एक वर्ग ऐसा भी होता है जो कुछ देर उड़ने के बाद नजदीक के पेड़ो में बैठकर, बहेलिओं के आने का इंतज़ार करने लगता है. जैसे ही बहेलिया आता है, यह आत्मसमर्पण कर देते हैं. कुछ के लिए बहेलिओं को जाल बिछाना पड़ता है मगर आखिरकार कैद में आ ही जाते हैं.
एक छोटा सा उत्साही युवा कबूतरों का वर्ग ऐसा भी होता है, जो इस आजादी को असल आजादी मान कर, नेता जी के भाषण पर भरोसा करते हुए, खुले आसमान में ऊँची स्वच्छंद उड़ान भर देता है. उसे क्या पता कि उस उंचाई पर इन्हीं के पाले बाज़ उसके आने का इंतज़ार कर रहे हैं. बाजों को भी तो उत्सव की दावत उड़ाना है.
इसीलिए बुजुर्ग कबूतर युवा कबूतरों को समझाते पाये जाते हैं कि साल में एक दफा थोड़ी देर के लिए ही सही, अगर आजाद उड़ान भरना चाहते हो, तो इनकी गुलामी को अपनी नियति मानकर चुपचाप पिंजड़े में बंद रहना सीख लो, वरना ये धरती पर दिखते जरुर हैं, इनके हाथ आसमान तक जाते हैं. यहाँ ये नेता और वहां बाज कहलाते हैं. ऊँचा उड़ोगे तो बाज का शिकार बन जान गंवाने के सिवाय कुछ हाथ न आयेगा.
स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं. तभी इस स्वतंत्रता के उत्सव का मजा आयेगा वरना तो कौन आजाद है भला?
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में अगस्त १२, २०१८ में:


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शनिवार, अगस्त 04, 2018

अगले चुनाव में वापसी के लिए वापसी ही मुख्य मुद्दा



लड़की रईस परिवार की और लड़का नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार का. मोहब्बत में पड़ लड़की लड़का शादी की जिद्द ले बैठे. रईस पिता के रईसी चोचले. लड़के को घर जमाई बनाना है मगर सीधे कहेंगे तो कौन मानेगा भला? वो भी तो अपने पिता की इकलौती संतान है. अतः लड़के के पिता को फरमान भेजा गया कि क्या आपका घर इस काबिल है कि हमारी बेटी वहाँ आरामपूर्वक रह पायेगी? लड़के का पिता भी बेटे के प्यार में अपमान झेलने को मजबूर रहा. उसने खबर भिजवाई कि जी, एकदम फिट व्यवस्था है. बहु के लिए कमरे में टीवी लगवा दिया है और कमरे से जुड़ा बाथरुम भी बनवा दिया है जिसमें वेस्टर्न स्टाईल टॉयलेट भी लगवा दिया है. गरीब का बोला सच भी रईस की नजर में झूठ ही होता है. अतः रईस ने कहा कि तस्वीरें दिखाओ. बहरहाल, एक बार अपमान झेल लो तो आप बार बार अपमान झेलने को बाध्य हो जाते हैं. अतः तस्वीरें खिचवाई गई अलग अलग कोणों से और भिजवाई गई. मगर बात मान लेने के लिए तस्वीर मंगवाई गई हो तब तो मानें. इधर तो मामला ही दूसरा था.
अतः कहा गया कि तस्वीर से पता नहीं चल रहा है कि आपके घर में नेचुरल लाईट आती भी है कि नहीं. एक विडिओ बना कर लाओ जिसमें घर की गली के मोड़ से घर में घुसने और कमरे तक जाने का और टायलेट का स्पष्ट चित्र हो. इस मांग का उद्देश्य मात्र इतना है कि या तो परेशान होकर लड़के वाले खुद ही कह दें कि आप अपनी लड़की अपनी रईसों की बिरादरी में ब्याह दो या फिर कह दें कि हमसे इससे ज्यादा न हो पायेगा. अगर आपको नहीं पसंद आ रहा है तो हमारा लड़का ही आपके यहाँ आकर घरजमाई बन कर रह लेगा. बेटी रईस की है. नाजो नखरों में पली है, पिता उसे भला कैसे मना करे तो यह पैतरा काम आ जायेगा.
फिलहाल तो विडिओ का इन्तजार है मगर यह भी तय है विडिओ भी भला क्या तसल्ली करा पायेगा? फिर फरमान आयेगा कि आपके यहाँ एसी नहीं है. दिन रात एसी मकान और कारों में बंद रहने वाली लड़की के लिए नेचुरल लाईट की मांग, यह बात अपने आप में अचंभित करती है. वो भी तब जब बिजली कम्पनी की लाईट सिरे से नदारत है- घंटे भर भी आ जाये तो बहुत. फिर जनरेटर या इन्वर्टर से एक मध्यमवर्गीय परिवार में पंखा भी चल जाये तो जन्नत माना जाता हौ. यूँ भी महानगर के घोर प्रदुषण में कौन भला चाहेगा कि नेचुरल रोशनी और हवा में रहा जाये. होना तो यूँ चाहिये कि ऑक्सीजन मास्क है कि नहीं, वह पता किया जाना चाहिये. पता तो यह  करना चाहिये कि घर पूरी तरह से सील बंद है कि नहीं ताकि बाहर का प्रदुषण घर में न घुसे.
शायद विडिओ बनाया जा रहा है, पेश किया जायेगा मगर साथ ही साथ रईस के घर में यह तैयारी भी चल रही है कि अगला कदम क्या होगा? जल्दबाजी में भले और कुछ न सोच पायें तो भी कम से कम समय खरीदने के लिए इतना तो कह ही सकते हैं कि हम यह चाहते हैं कि आप बरातियों का स्वागत पान पराग से करें, क्या आपके पास इसका बजट और इन्तजाम है, कृपया सबूत भेजें.
यही हाल देश से कर्जा ले भागे देश के दामाद भूपू सांसद दारुकिंग का है. रुपया बोलता है तो सुना था मगर रुपया पोण्ड में भी बोलता है, यह अब जाना. रईस रुपये में हो, पोण्ड में हो या डॉलर में, रईस तो रईस ही होता है और उसके चोचले हर जगह एक से होते हैं.
नागरिक हमारा, कर्जा खाया वो हमारा, सारा जीवन जिस देश में गुजारा वो हमारा और अब जब जेल जाने का समय आया तो फैसला तुम्हारा? तुम हमसे पूछ रहे हो कि उसे कहाँ रखोगे? क्या खिलाओगे? कैसे स्वागत करोगे?
हर बात में झूठ बोलने के आदी हम, इस केस में क्यूँ सच्ची तस्वीर और विडिओ लेकर उस विदेशी कोर्ट में घिघिया रहे हैं. हजार फोटोशॉप करके देश को गुमराह करने वाले आज एक फोटोशॉप ऐसी नहीं कर पा रहे हैं कि वो विदेशी कोर्ट गुमराह हो कर ही सही, हमारे अपराधी को जो हमारे देश का नागरिक है, उसे हमें हमारी न्यायिक प्रक्रिया से गुजारने के हमें सौंप दें. अरे, भेज दो ताज होटल की तस्वीर और बता तो उसे आर्थर रोड़ जेल. चुनाव जीतने के लिए ऐसी हरकत कर सकते हो मगर अपराधी को लाने के लिए नहीं?
जरुर कुछ न कुछ तो बात है कि आज हम फोटोशॉप न कर वही तस्वीर भेज रहे हैं जो सही के हालात हैं. डिजिटल और स्मार्ट इंडिया की यह कैसी तस्वीर कि एक विदेशी कोर्ट आपको आपका नागरिक सौंपने को तैयार नहीं डिजिटल इंडिया में ले जाने के लिए?
एक बार हिम्मत दिखा कर कहो तो कि घर मेरा, नाच भी मेरा है, तुम कौन हो कहने वाले कि आंगन टेढ़ा है?
मगर अगर हम यह हिम्मत दिखायेंगे तो कहीं कुछ राज ऐसे न खुल जायें कि हिम्मत का दिवाला निकल जाये!! एन्टीगुआ ने तो बता ही दिया कि कैसे भारत से उन्हें क्लीयरेन्स दिया गया ऐसी ही दूसरे कर्जा खाकर भागे नागरिक के लिए जो अब एन्टीगुआ का नागरिक बन गया है.
ऐसे में यही मुफीद है कि भूल जाओ वो हमारा नागरिक है फिलहाल तो उनका मेहमान है जो अब वापस नहीं आने वाला. ये वही वाला काला धन है जिसे सब जानते हैं कि देश का है मगर विदेश में हैं और लाख दावों के बावजूद भी वापस नहीं आने वाला. वापस से खैर भारत में आ बसे गैर नागरिक भी नहीं जाने वाले. दिखावे के लिए दो पाँच हजार घुसपैठिये इधर उधर कर भी देंगे तो भी चुनाव के लिए एक मस्त मुद्दा तो मिल ही गया है.
अगले चुनाव में वापसी के लिए वापसी ही मुख्य मुद्दा बन कर रह जायेगा – चाहे काला धन की हो, काले धनधारी की हो या घुसपैठियों की हो.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त ५, २०१८ के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/30913506

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मंगलवार, जुलाई 31, 2018

चाय की गरमागरम चुस्की के नाम


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.
उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.
वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो.
फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.
हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है.
बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.
हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है.
अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.
गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.
बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.
-समीर लाल ’समीर’


www.gyanvigyansarita.in के अगस्त अंक में प्रकाशित पेज १४ और १५ पर

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सोमवार, जुलाई 30, 2018

मजे काटना हमारे डीएनए में है


पड़ोसी से संबंध अच्छे नहीं हैं, कहना भी संबंधों की लाज रखने जैसी ही बात है. दरअसल संबंध इतने खराब हैं कि दोनों ही ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते, जब वो दूसरे को जान माल का नुकसान पहुँचा सकें. पड़ोसी के घर शादी की खबर सुन कर फिर भी आदतन बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर नाचना शुरु हो जाता है. मालूम है कि न तो शादी में आपको बुलाया जायेगा और न ही शादी के बाद आपसे कोई संबंध अच्छे बना लिये जायेंगे. मगर फिर भी मात्र इस बात के कारण हुई शांति को कि शादी निर्विघ्न संपन्न हो जाये और उसके बाद लड़की की विदाई और अगुवाई में कोई बाधा न पड़े, अच्छे संबंधों की तरफ उनके बढ़ते कदम मान लेने की गल्ती हर दफा करते नजर आते हैं और फिर लड़ाई पर उतर आते हैं. पकवान न सही, उसकी महक से ही तर हो लेते हैं.मजा आता है.  
मजे काटना हमारे डीएनए में है. मजे हम पान की दुकानों पर काटते हैं, मीडिया की डीबेट में काटते हैं. संसद में भाषण देते हुए काटते हैं. चुनाव लड़ने में काटते हैं. चुनाव जीत कर काटते हैं. चुनाव हार कर काटते हैं.
आश्चर्य तब होता है जब लोग मजे काटने में इतना लिप्त हो जाते हैं कि उन्हें किसी की जान बचाने की परवाह से बढ़कर उसके मरने का विडिओ बनाना ज्यादा जरुरी लगता है. दिल्ली के चिड़ियाघर में जब एक बालक शेर के पिंजरे में गिर गया था तो तमाम लोगों ने हर एंगल से १५ मिनट का तब तक उसका विडिओ बनाया, जब तक की शेर ने उसे मार नहीं दिया. कोइ भी बंदा रस्सी लटकाते, कुछ बचाने का इन्तजाम करते नजर नहीं आया. फिर मजे काटने के लिए दिन भर उसे जगह जगह फॉरवर्ड करते रहे. ऐसी ही न जाने कितनी घटनायें रोज हो रही हैं. लोग मजे ले रहे हैं.
एक भीड़ बंदों को पीट पीट जान से मार डाल रही है और तो दूसरी एक भीड़ उसका विडिओ बना कर मजे काटने का जुगाड़ बना रही है मगर वो भीड़ न जाने कहाँ गुम है, जो उस बंदे को बचाये. फिर सब इसे मॉब लिंचिंग का नाम दे देते हैं और नेता ऐसे करने वालों पर आगे से कड़ी कार्यवाही का उदघोष कर फिर अगली घटना के इन्तजार में लग जाते हैं. मीडिया सर पीट पीट कर डीबेट करा कर अलग मजे लूटती है.
मजे लूटते लूटते अब हमारी संवेदना भी लुप्त होती जा रही हैं. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, जब तक बात खुद पर न आ जाये. हम भी किसी के खींचे हुए विडिओ को फॉरवर्ड करने में व्यस्त हैं.
जिन बातों से हमें कुछ लेना देना नहीं, बल्कि नुकसान ही होना है, उसमें भी हम मजे लेने लगते हैं. चुनाव पाकिस्तान के, खुश हम हो रहे हैं कि वो हमारे प्रधान मंत्री जी की तारीफ कर रहा है. मीडिया डीबेट सजाये बैठा टीआरपी लूट रहा है. पाकिस्तान के चुनाव का एनालिसिस पाकिस्तान से ज्यादा हमारे यहाँ हो रहा है. ७१ सालों में न जाने कितने चुनाव हो गये, कभी उनसे न तो संबंध सुधरे और न ही दोनों तरफ से कोई कठोर कदम उठाये जाते हैं इस दिशा में. दोनों के लिए मुफीद है संबंधों का खराब रहना. दोनों को ही चुनाव जिताने में काम आता है आपसी संबंधों के सुधार का जुमला. कड़े कदम उठाने की बात इतनी कड़ी है कि कदम उठते ही नहीं कभी.
यह वैसा ही है जैसे कि गरीबी हटायेंगे, बेरोजगारी मिटायेंगे आदि. गरीबी हटा देंगे तो अगले चुनाव में वोट कहाँ से लायेंगे? बेरोजगारी मिटा दें तो अगले चुनाव में रैलियों में भीड़ कहाँ से जुटायेंगे? पड़ोसी मुल्क से संबंध सुधार हो जाये तो फिर देश के अन्य मसलों से जनता का समय समय पर ध्यान भटकाने के लिए बमों की फोड़ा फाड़ी का कार्यक्रम कहाँ संपन्न करायें?
उधर भी नये प्रधान आ गये हैं. उनकी जुमलेबाजी भी जारी है. भारत एक कदम बढ़ाये तो हम दूसरा बढ़ायेंगे.
अब इसका अर्थ क्या है और कौन से कदम को पहला मानेंगे? किस तरह से मानेंगे? यह मजा लूटने का मुद्दा है. खूब डीबेट चल रही है. सोशल मीडिया पर भक्त इसे साहब से प्रभावित होकर दिया गया बयान बता रहे हैं और कह रहे हैं कि अब पड़ोसी मुल्क से संबंध सुधर कर ही रहेंगे और जो कोई उनकी इस बात का विरोध कर रहा है कि संबंध नहीं सुधर सकते, उसे पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे जा रहे हैं.
अजब विरोधाभास है. मजा काटने के चक्कर में हम कर क्या रहे हैं, कह क्या रहे हैं, यही नहीं पता.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जुलाई २९,२०१८ के अंक में:



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शनिवार, जुलाई 21, 2018

चीयर्स का मर्म अब तक कोई नहीं जान पाया है


बचपन में हमारे शहर में मेला लगा करता था और उसमें नौटंकी, नाच, दंगल आदि हुआ करते थे. दंगल में दारा सिंह, चंदगी राम जैसे बड़े बड़े नाम आते थे और लड़ा करते थे. असल मुकाबला होता था. बहुत भीड़ लगा करती थी. तब असली घी का जमाना था, हर चीज असली हुआ करती थी. पता ही नहीं चला कि कब असली घी से बदल कर बातें वनस्पति घी पर चली गईं और फिर सफोला और ओलिव ऑयल का जमाना चला आया. सब कुछ फटाफट बदलता चला गया और हम देखते रह गये.
फिर भारत में टीवी आ गया. असली दंगल नूरा कुश्ती में बदल गये. सब तय तमाम तरीके से दंगल अब स्टेजड टीवी पर देखने लगे. ड्ब्लूडब्लूएफ पर नकली पहलवानी में लोग असली दंगल से ज्यादा रोमांच पाने लगे और भूल गये कि हम अब भ्रम की दुनिया के वासी हो गये हैं. अब हम ब्रेड पर भी मख्खन की जगह ओलिव ऑयल लगाने लगे हैं और एकच्यूल से वर्चयूल में बेटर नज़र आने लगे हैं.
हालांकि टीवी जब आया था तो मात्र ३ घंटे को कृषि दर्शन, गीत माला, समाचार आदि लेकर आया था. मगर किसी भी लत को लगाने के लिए यही तरीका तो होता है. पहले पहल दोस्त एक कश ही लगवाते हैं चरस का. फिर चरसी आप खुद हो लेते हैं. फिर सुबह से शाम तक खुद ही नशे में डूबे रहते हैं. उस तीन घंटे की टीवी नें सड़को से, खेल के मैदानों से, असल दुनिया से अलग कर आज हजारों चैनलों के २४X७ के जाल में फंसा दिया है. उसी के एक्सटेशन में इन्टरनेट चरस से आगे ड्रग्स का इन्जेक्शन बन कर ऐसा चिपक गया है कि आँखे खुलना भी बंद हो गई हैं. अब तो बच्चों से भी बातें इन्टरनेट पर चैट से हो जाये तो ठीक वरना तो कोई और तरीका बर नजर नहीं आता.
सपने में दिखा कि वक्त आ रहा है जब धर परिवार में शाम को एक बार दिन भर का बुलेटिन एलेक्सा या सीरी जैसी कोई एप १ मिनट में समराईज़ करके सुना देगी और आपको पता चल जायेगा कि कौन बीमार पड़ा, किसे क्या खुशी मिली, कौन मर गया और कौन कितना दुखी है और कौन आपको कितना प्यार करता है. जब से मिलना जुलना कम हुआ है, आई लव यू वाले ईमोटिकॉन कुछ ज्यादा बिकने लगे हैं. अगले रोज आप भी एप पर ही ऑल द बेस्ट भेजते नजर आयेंगे.  
आजकल मन भी जल्दी ऊब जाता है लोगों का हर बात से, शायद यही फटाफट हो रहे परिवर्तन की वजह हो. कोई थम कर एन्जॉय करना ही नहीं चाहता अपनी उपलब्धियों को. कल जिसकी चाह थी, उसके आज मिलते ही अगली चाहत पंख पसार कर उड़ान भरने लगती है. लोगों का मन ड्ब्लूड्ब्लूएफ से भी भरना ही था तो अब ये न्यूज चैनल उस गैप को भुनाने मे लगे हैं.
रोज शाम डीबेट के नाम पर नूरा कुश्ती का आयोजन कराते हैं. हम समझते है कि देखो वो कितना बहस कर रहे हैं हमारे लिए. वो देखो वो हार गया उस मुद्दे पर. वो देखो वो जीत गया. वो भारी पड़ गया. वो उठ कर चला गया मगर दरअसल बात टीआरपी की है. जीतता चैनल है. हारता दर्शक याने जनता और मुद्दा है. और पैनल पर आये बहसकर्ता और बहस कराने वाला टीवी का वो एंकर बहस के बाद प्रेस कल्ब में जाम टकराते जश्न मनाते हैं कि अहा!! क्या बेवकूफ बनाया!! मस्त टीआरपी मिली.
आजकल तो इन टीवी बहसों में उत्तेजना को इतना बढ़ा देते हैं कि विभिन्न दलों के प्रवक्ता मारापीटी पर उतर आते हैं. कौन जाने वो ड्ब्लूड्ब्लूएफ वाली स्टेज्ड मार कुटाई है या ६० और ७० के दशक वाली दारा सिंह की असली कुश्ती?
सुना है आजकल तो प्रेस कल्ब में ये सब जब बहस के बाद जाम टकराते हैं तो इस बात पर बहस कर रहे होते हैं कि कल टीवी पर किस बात पर बहस करना है? विषय तय होते होते सब टुन्न हो लेते हैं इसलिए अगले रोज बहस में आश्चर्यचकित नज़र आते हैं खुद के तय किये मुद्दे पर भी.
इस बदलती दुनिया की स्पीड देखकर मुझे उम्मीद है कि कल को ये डीबेट भी अपना स्वरुप बदल लेंगी. पार्टियाँ प्रवक्ताओं की जगह पहलवानों को भेजा करेंगी. टीवी स्टुडियो में कुर्सी और गोल टेबल के बदले फाईटिंग रिंग हुआ करेगा. प्रवक्ता रुपी पहलवान एकदूसरे को पटक पटक कर मारेंगे. टीवी एंकर एम्पायर होगा जो पहले से विजेता तय करके बैठा होगा. वो पिटने वाले को इसलिए विजेता घोषित करेगा कि वो कितनी जबरदस्त तरीके से पिटा. पीटने वाला इसी में खुश कि पीट दिया. जनता तो खैर हाथ मलने को बाध्य है ही सो वो भी हाथ मलेगी और फिर सब भूल भुला कर ताली पीटने लगेगी.
चुनाव और टीवी की डीबेट में इतना तो कॉमन है ही कि बेवकूफ जनता बनती है और बकिया शो और चुनाव पूरा होते ही साथ में जाम खड़काते हैं और एक दूसरे के गले लग जाते है, चीयर्स बोलते हुए.
चीयर्स का मर्म अब तक कोई नहीं जान पाया है.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार २२ जुलाई, २०१८ में प्रकाशित:



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