रविवार, जनवरी 30, 2011

मिल लो भोलाराम से…

ये हैं हमारा जबलपुरिया तोताराम. बढ़िया सीटी बजाता है, मिट्ठू बोल लेता है, फोन की घंटी हू ब हू वैसे ही बजाता है जैसे सचमुच फोन आया हो. जब घर के लोग फोन उठाने भागते है तो बस तोताराम की खुशी देखते ही बनती है कि क्या बेवकूफ बनाया. मैंने जब इसका नाम भोलाराम रखा था तो पत्नी ने बताया कि यह तोता नहीं तोती है. उसकी बहन के यहाँ रहता है, उसकी बहन ने ही उसको बताया है.

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अब देखकर हम क्या पहचान पाते कि तोता है कि तोती जब आजकल लड़के लड़कियों में भेद कर पाना ही मुश्किल हो चला है. सुबह हो, दोपहर हो या शाम, लड़के हों या लड़कियाँ. चेहरा पूरा गमछे/स्कार्फ से ढँका, जींस, टी शर्ट और उपर से एप्रोन. स्पोर्टस शूज़ और दस्ताने. सर टोपी से ढका. सब मोटरसाईकिल भी चलाते हैं, स्कूटी भी..भला कोई कैसे पहचानें?

समझ नहीं आता ये सब क्यूँ आखिर? धूप भी नहीं तो भी गमछानुमा कपड़ा लपेटे हैं जैसे कि कॉलेज नहीं, डकैती डालने जा रहे हों कि कोई पहचान न ले.

मित्र की बिटिया से इस विषय में जानना चाहा तो कहती है कि डस्ट और पल्यूशन से स्किन खराब हो जाती है इसलिए ब्यूटी केयर का यह तरीका है.

ऐसी कैसे ब्यूटी की केयर जिसे कोई देख ही न पाये. एक जुमला है beauty lies in the eye of the beholder याने सुन्दरता आपमें नहीं होती देखने वाले की नजरों में होती है .अब जहाँ नज़र दौड़ाओ वहीं गमझा लपेटा चेहरा दिखे तो कैसी ब्यूटी और किसकी नज़र. अब निर्भर करता है कि गमछा कितना सुन्दर है. पैकिंग खुले और अंदर से क्या निकले, कोई गारंटी नहीं.

गारंटी का जमाना रहा नहीं तो भी जीना तो है इसी जमाने में अत: संतोष करने और कोसने को, दोनों के लिए ही पुरानी पीढ़ी अनेक उपाय दे गई है. संतोष करना हो और जिसकी बहु सुन्दर न निकले, तो कहता नज़र आयेगा कि सुन्दरता को चाटना है क्या? वो तो सूरज की रोशनी सी है, दो पल की मेहमान. सुबह आई, शाम चली. काम तो सीरत और संस्कार ही आने हैं. कोसना हो तो कहते नजर आयेगा कि न सूरत, न शक्ल और नखरे ऐसे कि गमछा लपेट कर स्कूटर में फुर्र इधर और फुर्र उधर. घर के काम धाम से तो दूर दूर तक कोई मतलब नहीं.

इसका ठीक उल्टा अगर सुन्दर आ जाये तो कोसने और संतोष करने का इसका ठीक विपरीत डायलॉग रेडीमेड तैयार है.

अब सुन्दरता अगर सूरज की रोशनी ही मान ली जाये तो भी जरा उनसे पूछ कर देखो तो उस ध्रुव के उस भाग में रहते हैं, जहाँ सूरज छः माह तक निकलता ही नहीं, एक किरण के लिए क्या तड़पन होती है, मैने जानता हूँ और उस पर से जब टीवी में दूसरे देश में सूरज निकलते तस्वीर दिखती है तो सांप लोट जाता है जिगर पर.

एक अनुपात में सब कुछ हो तो ही बेहतर.

ना अति बरखा ना अति धूप।
ना अति बकता ना अति चूप।।

जाने बात कहाँ की कहाँ चली गई. बात चली थी जबलपुरिया तोताराम से. एक वाकया याद आया कि मेरे मित्र के पिता जी को बहुत शौक था कि ऐसा तोता पालें जो बोलता हो. सलाहकारों के इस देश में आप विचार तो करके देखो, सलाह देने वाले हजार हाजिर हो जाते हैं. किसी ने बताया कि जिस मिट्ठू के गले में लाल रंग का छल्ला बना हो, उसे लालमन तोता कहते है, वो बोलता है. वही खरीदियेगा.

बस, फिर क्या था. हमारे मित्र के पिता जी एक दिन एक ठेले वाले सेखरीद लाये लाल रंग के छल्ले वाला लालमन तोता ३०० रुपये का और साथ में ८०० रुपये का पिंजरा और जाने क्या क्या.

फिर रोज उसको सिखाये-बेटा बोलो, राम राम!! वो बोलने को बिलकुल भी न तैयार. हफ्ते भर बाद उसे नहलाया गया तो लाल छल्ला गुम. वो ठेले वाला पेन्ट करके बेच गया था. ठगे से बेचारे लालमन की जगह साधारण तोता लिए बैठे रहे और मृत्युपर्यंत उनकी आँखें उस ठेले वाले को खोजती रहीं.

कई बार विचार आता है कि ऐसा ही कुछ स्नान अपने नेताओं को करवाने का इन्तजाम चुनाव के पहले होना चाहिये ताकि पता तो चले कि सच के लालमन हैं कि रंगे हुए.

फिर लगता है कि सब किस्मत की बात है. अब इसे ही देखो-ये मेरा भोलाराम न तो तोता है और न लालमन फिर भी बोल लेता है मगर खाने में शौक काजू बदाम का ही है नेताओं टाईप क्या किया जाये.

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नोट:

यह शायद भारत से अंतिम पोस्ट इस बार के लिए. २ को जबलपुर से और ४ को भारत से प्रस्थान. अब कनाडा पहुँच कर फिर लिखते हैं भारत यात्रा के कुछ रोचक किस्से और भी बहुत कुछ जो पिछले दिनों देखा, अहसासा, जेहन में दर्ज किया मगर समयाभाव में लिखा नहीं.

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85 टिप्‍पणियां:

Coral ने कहा…

बहुत सच है ...beauty lies in the eye of the beholder... पर चेहरा ढकने के सौ फायदे ना लड़के छोडना चाहेंगे ना लड़किया

आपकी यात्रा सुखद हो ...आभार

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सही कहा , आजकल लालमन (तोते) कहाँ मिलते हैं ।
बढ़िया व्यंग लिखा है ।
जल्दी ही मिलते हैं ।

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Bahut Khub-Baut Khub

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तोता, तोती का अन्तर, क्या ढूढ़ेंगे कविवर?
क्रोध आ जाये और फिर अश्रु बन निकल जाये तो मान लीजिये दोनों जीवन जी लिये।

विष्णु बैरागी ने कहा…

आपकी कल्‍पनाशीलता पर नई पीढी को भरोसा है इसीलिए अब अब चेहरे की नहीं, गमछे की सुन्‍दरता देख कर आगे की सोचिए।

जानने की जिज्ञासा है कि भारत के संस्‍मरण भारत मे ही रहते क्‍यों नहीं लिखे गए। फाजदारी से बचने के लिए शायद।

उम्‍मीद करें कि ये संस्‍मरण 'महासंग्रामी' ही होंगे।

Arvind Mishra ने कहा…

मुंह पर गमछा बांधे बस केवल आँख की पुतलियाँ खोले तन्वंगियों /शोडषियों का इन दिनों दिखना सचमुच बहुत बढ़ता गया है -मैं भी सोचू क्या बात है -हिम्मत नहीं हो रही थी पूछने की -तरह तरह की बातें आती थी मन में -मगर आपने सच बता ही दिया ....आभार इसलिए!
आपकी वापसी यात्रा मंगलमय हो !

अजय कुमार झा ने कहा…

अच्छा अच्छा तो तोतामन से मन भर बातें की जा रही हैं । वो गमछे मफ़लर वाली बात खूब चलाई आपने , कई तो इसलिए बांधे घूमती हैं कि कहीं बापू और भईया ने देख लिया तो राम कसम वेलेंटाईन डे न मन पावेगा इस दफ़े :)

जबलपुर और कनेडा के बीच में सुने हैं कि दिल्ली फ़िर एक मर्तबा पडता है ? साबित करिए तो


भ्रष्टाचार के खिलाफ़

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

@@आजकल लड़के लड़कियों में भेद कर पाना ही मुश्किल हो चला है. सुबह हो, दोपहर हो या शाम, लड़के हों या लड़कियाँ. चेहरा पूरा गमछे/स्कार्फ से ढँका, जींस, टी शर्ट और उपर से एप्रोन. स्पोर्टस शूज़ और दस्ताने. सर टोपी से ढका. सब मोटरसाईकिल भी चलाते हैं, स्कूटी भी..भला कोई कैसे पहचानें?..समझ नहीं आता ये सब क्यूँ आखिर? धूप भी नहीं तो भी गमछानुमा कपड़ा लपेटे हैं जैसे कि कॉलेज नहीं, डकैती डालने जा रहे हों कि कोई पहचान न ले..............
यह नव संस्कृति है.इस पर सलाह देने का मतलब कई एक विकासवादी संगठनों से पंगा लेना.अब भला इस बारे में बोले तो बोलेंगे कि बोलता है.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bholeram ki baaton me beauty per jo ishaara kiya , mazedaar raha

Kajal Kumar ने कहा…

:)

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत मज़ेदार पोस्ट है

धूप भी नहीं तो भी गमछानुमा कपड़ा लपेटे हैं जैसे कि कॉलेज नहीं, डकैती डालने जा रहे हों कि कोई पहचान न ले.

कई बार विचार आता है कि ऐसा ही कुछ स्नान अपने नेताओं को करवाने का इन्तजाम चुनाव के पहले होना चाहिये ताकि पता तो चले कि सच के लालमन हैं कि रंगे हुए.

ये पंक्तियां बहुत ही सटीक हैं .

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

तोते की पहचान का सरल उपाय-कुछ दाने डालिये खाता है तो तोता है, खाती है तो तोती है.. तरकीब काका हाथरसी जी की..

mridula pradhan ने कहा…

हफ्ते भर बाद उसे नहलाया गया तो लाल छल्ला गुम.
thagne ka ye tareeka pahli baar sune aur bahut ashchry hua.padhne men atyant manoranjak.

सतीश सक्सेना ने कहा…


ब्लॉग जगत में लालमन तोते बहुत मिलते हैं ....चाहिए हों तो बताना !
एक के साथ ४ फ्री...
शुभकामनायें !

sada ने कहा…

धूप भी नहीं तो भी गमछानुमा कपड़ा लपेटे हैं जैसे कि कॉलेज नहीं, डकैती डालने जा रहे हों कि कोई पहचान न ले.

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत गहरी सच्चाई को गमछा लपेटकर आपने सामने रख दिया है। एक शे’र अर्ज़ है,
क़तरे में दरिया होता है
दरिया भी प्यासा होता है
मैं होता हूं वो होता है
बाक़ी सब धोखा होता है

पद्म सिंह ने कहा…

कई बार विचार आता है कि ऐसा ही कुछ स्नान अपने नेताओं को करवाने का इन्तजाम चुनाव के पहले होना चाहिये ताकि पता तो चले कि सच के लालमन हैं कि रंगे हुए.

यहाँ आपको विरोधाभास मिल सकता है... ये वाले लालमन तो रंगे हुए नकली होते हैं लेकिन बोलने में टुइयाँ होते हैं...

खुशदीप सहगल ने कहा…

गुरुदेव,
ये तोते की भलमनसाहत आपकी संगत का असर है...

छोटे शहरों में स्कॉर्फ से मुंह इसलिए ढके जाते हैं कि प्रियतम की बाइक के पीछे बैठे हुए कोई मेरे या आप जैसे चाचा-ताऊ न देख लें और घर जाकर शिकायत न कर दें...

जय हिंद...


समीर जी की किताब- इतना पहले कभी नहीं हंसा

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

आपकी पोस्ट से कुछ दिन पहले पत्नी की कही बात बरबस याद आ गयी, जो उसने अपने मायके में पलने वाले तोते को कही थी :

तेरी जैसी ही हुई, मै शादी के बाद।
आती तो होगी तुझे मिठ्ठू मेरी याद।

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

तोते भी थक गए बोलते बोलते

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट ...आपकी यात्रा मंगलमय हो.

ajit gupta ने कहा…

भोलाराम हरी मिर्च भी खाता है या नहीं? अब आप भी कहाँ लड़के-लड़कियों के भेद की बात लेकर बैठ गए, जर्मनी का वाकया याद है हमें तो। हा हा हाहा।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

नमस्कार !
तोते की पहचान का सरल उपाय-कुछ दाने डालिये खाता है तो तोता है, खाती है तो तोती है.. हां हां हा !
सादर

PN Subramanian ने कहा…

बहुत बढ़िया रहा. इस गमछे से तो हम भी परेशान रहे हैं. किससे कहें. लोग क्या सोचेंगे!

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

सुन्दरता आपमें नहीं होती देखने वाले की नजरों में होती है ............. बहुत ही सही बात कहीं आपने. बेहतरीन प्रस्तुति. यात्रा के लिये शुभकामनाये.

aradhana ने कहा…

आहा! क्या तोतामयी पोस्ट है. मजेदार ! हमारे यहाँ भी एक तोता था, जो मेरा नाम "गुड्डू" बहुत अच्छे से बोलता था :-)
सतीश जी का कहना सही है लालमन ब्लॉगजगत में खूब मिल जायेंगे, पर उनकी असलियत तो नहलाने के बाद ही सामने आयेगी और ये काम करेगा कौन यानी बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?

सुज्ञ ने कहा…

लालमन के बहाने 'लाल' मन जान लिया
और इसी बहाने सार्थक व्यंग्य पान किया!!

shikha varshney ने कहा…

एक ही पोस्ट में गमछा ,सुंदरता.तोता तोती,लालमन और न जाने क्या क्या ..ये आप ही कर सकते हैं बस.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वाह ! क्या बात है ! कालेज की लड़कियों से लेकर नेता सबको लपेट लिए ...

anshumala ने कहा…

अच्छा है जब पता ही ना चले की लड़का है की लड़की तो लड़किया ज्यादा सुरक्षित रहेंगी मनचलों से | बाकि नेताओ को नहलाने की क्या जरुरत है सब जानते है की ये रंगे सियार है | कहते है तोते को मिर्ची खिलाइए तो फटा फट बोलेगा पर खिलाने से पहले "पेटा" वालो से पूछ लीजियेगा वरना तोता बोलना सिखते ही वहा जा कर शिकायत कर देगा तो मुश्किल होगी |

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

सब कह रहे हैं कि गमछा लपेटने से लड़कियां छेड़छाड़ से सुरक्षित रहेंगी... पर इस चक्कर में कभी कभी लड़के भी छेड़ दिए जाते हैं ;) ;)
लालमन तोता आजकल बहुत दुर्लभ है जी.. पेंट वाले ही ज्यादा मिलते हैं... हाँ पेंट अच्छा वाला होता है.. आसानी से छूटता नहीं.. :)

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

इन गमछों-स्कार्फों का वही इस्तेमाल अधिक उपर्युक्त लगता है जो श्री झा जी और खुशदीपजी उपर बता चुके हैं । अलबत्ता चुनाव पूर्व इन नेताओं को तो सार्वजनिक रुप से नहला ही लेना चाहिये । इस सुझाव में पर्याप्त दम दिखता है ।

पुनः शुभकामनाएँ...

Abhishek Ojha ने कहा…

तोती भोलाराम :)
बढ़िया. यात्रा शुभ हो.

साँड-ए-नखलेऊ ने कहा…

हर सांड लखनवी दिखाई देता है? ये लखनऊ की तहजीब है भाई जान।

आदाब

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

बहुत ही प्यारा मिट्ठू है!
अपने संस्मरण से आपने इसे अमर कर दिया है!

घनश्याम मौर्य ने कहा…

बढि़या प्रसंग लिखा है आपने। लाल रंग के छल्‍ले के पेन्‍ट होने की बात से जसपाल भटटी का टीवी सीरियल फलाप शो याद आा गया जिसमें बॉस का गुमशुदा कुत्‍ता न खोज पाने पर उनका स्‍टाफ एक मरे हुए हूबहू सफेद कुत्‍ते को काले रंग का पेन्‍ट करवा कर क्रियाकर्म के लिए बर्फ की सिल्‍ली पर रखवाते हैं। रंग उतरने पर ही असलियत का पता चलता है

कुमार राधारमण ने कहा…

भोलाराम को लालमन बना के देना था न मित्र के पिताजी को!

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

वाह तोता राम से नेता जी और गमछे से उसके पीछे की सुन्दरता तक एक व्यंग्यात्मक, रोचक और दिशा बोधी पोस्ट.
- विजय तिवारी ' किसलय '

ppaliwal ने कहा…

रचना को पढने मे मजा आया.मैंने ही व्यंग की सिफारिश की थी. बहुत बहुत धन्यवाद .सुबह ही पढ़ ली थी लेकिन टिपियाने का मौका अभी मिला.
क्योंकि मै एक भारतीय विद्यार्थी हूँ इसलिए तकनिकी रूप से मै भी एक तोता ही हूँ

रट रट के डिग्री लिए , काम जाने न कोई
अब बइठे है बेरोजगार , इस देश का क्या होई .


और जहाँ तक लडकियों का सवाल है , लड़कियां एक गंभीर विषय है ,लेकिन चाय की थडी के लुक्के साथियों के साथ हम इस निष्कर्ष पर पहुचे है की यह कोई समस्या नहीं है ,क्योंकि make-up भी तो एक तरह का गमछा ही है.कायदे से आप इन्हें नकाब मै ही देखते है .वैसे गमछे का भी अलग ही मजा है ,swine फ्लू के दिनों मै हम भी लगाये घुमते थे.

cmpershad ने कहा…

`पत्नी ने बताया कि यह तोता नहीं तोती है. '

तभी तो कहा है- हर इक की दुम उठा कर देखा/हर इक को मादा पाया :)

mukesh ने कहा…

bahut badhiya sameer ji
totaram sorry toti ram ke madhyam bahut shandar baat kahi apne

राज भाटिय़ा ने कहा…

अरे इस तोती कॊ संग ही ले जाओ कनाडा, हम ने भी एक तोता भारत से लाना हे, यहां करीब ४० हजार € का मिलता हे, आप की यात्रा शुभ हो

रवि धवन ने कहा…

बढिय़ा पोस्ट रही।
ये डॉयलाग शानदार था, फुर्र इधर तो फुर्र उधर।
मेरी सलाह मानें तो आप नेताओं और लड़के-लड़कियों का भेद खोलने के लिए जासूसी का काम भोलाराम को सौंप दीजिए। आजकल बादाम-काजू खा रहा है। दिमाग भी तेज हो गया होगा।

वाणी गीत ने कहा…

हमारे कॉलेज के ज़माने में (जो आपके भी रहे होंगे)) फैशन ऐसा था की दूर क्या पास से देखकर पता नहीं चलता था की अमुक लड़का है या लड़की ...लम्बे बाल , बेलबौटम,प्रिंटेड शर्ट...लड़के- लड़कियां सब एक जैसे ही दीखते थे, बिना मफलर लपेटे ...शुक्र मनाएं की आजकल स्कार्फ हटाने पर तो पहचाने जा सकते हैं ...

धोने पर निकला लाल रंग असली पहचान बता देता है ....व्यंग्य अच्छा है !

Rajesh Kumar 'Nachiketa' ने कहा…

तोता तोती का अंतर पहचानना बहुत आसान है.....बहुत पहले किसी ने बताया था....
अगर तोता खा "रहा" है तो "तोता"....
और अगर खा "रही" है तो "तोती"....
आजमा के बताइयेगा...
वैसे अच्छा व्यंग.

: केवल राम : ने कहा…

व्यंग्य ..लेकिन शिक्षाप्रद

रूप ने कहा…

bhai wah, tote ke bahane netaon ko nahlane ki kawayad achchhi hai . par nahlayenge kaise , scarf bandhe bina bhi to awran lapete pade hain. !

Deepak Saini ने कहा…

एक बार मैने भी एक तोता पाला था, पाला क्या था अपने खेत मे पकड लिया था, वैसा ही जैसा आपने बताया गले लाल छल्ले वाला, बोलता बहुत था, आवाज की हू ब हू कापी करता था। एक दिन पता नही कैसे पिजरे की कुण्डी खुल गयी तो जब वो उडा तो माँ- बहन की गंदी गंदी गालियाँ देता हुआ भागा। मेरे घर मे कोई गाली नही देता लेकिन उसे किसने सिखा दी आज तक समझ नही आया।
मुंह पर गम्छा तो बस इसिलिए रहता है कि कोई पहचान वाला या घर का सदस्य देख न ले

आपकी यात्रा सुखद हो ...आभार

Ravi Rajbhar ने कहा…

netao ko bhi aise hi parkha jaye .

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

नुस्‍खे हैं या चटके हैं
तोतीराम का एक बनाओ ब्‍लॉग
फिर करो टिप्‍पणी
उसके बाद तोती को छोड़ दो
लॉगिन करके जीमेल की ईमेल में
फिर होंगी टिप्‍पणियां दे दे दनादन

मुझे तो लग रहा है
यही है टिप्‍पणियों का राज
बोली लगवाओ आज

आओ गले मिलें
प्‍याज मेड इन चाइना

जेब में सबकी, मौजूद हैं बापू

रंजना ने कहा…

"डाकुओं की तरह..."

हा हा हा हा...मुझे भी ऐसा ही लगता है....

सच कहा आपने,काश जो नेताओं को भी नहलाने का इंतजाम हो चुनाव से पहले...पर लगता तो नहीं कि निकट भविष्य में ऐसा कुछ होगा....

चलिए आप जगह पर पहुँचिये...

आपकी फुरसतिया पोस्टों और टिप्पणियों का हमें इन्तजार है...

anju ने कहा…

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य.इतनी सारी बातें एक सूत्र में पिरोने का काम सिर्फ आप ही कर सकते हैं .
आपकी यात्रा मंगलमय हों ...

anju ने कहा…

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य.इतनी सारी बातें एक सूत्र में पिरोने का काम सिर्फ आप ही कर सकते हैं .
आपकी यात्रा मंगलमय हों ...

anju ने कहा…

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य.इतनी सारी बातें एक सूत्र में पिरोने का काम सिर्फ आप ही कर सकते हैं .
आपकी यात्रा मंगलमय हों ...

निर्मला कपिला ने कहा…

ापने यहाँ भी एक तोताराम थे कुछ दिन हुये एक गिद्द उठा कर ले गया और तोती इतना शोर करती थी कि उसे छोड देना पडा। व्यंग के साथ साथ विचारनीय बातें भी कह गये। आपकी यही शैली तो दिल को छूती है\ अब इन्तजार करते हैं अगली पोस्ट का। शुभकामनायें यात्रा मंगलमय हो।

"पलाश" ने कहा…

sameer ji aap ne kya analysis ki hai
pad kar anand aa gaya ..
ek teer se do nishane shadhana to koi aap se seekhe ..
bahut achchha wyang ..

कुश्वंश ने कहा…

"सुन्दरता आपमें नहीं होती देखने वाले की नजरों में होती है" बहुत ही सही बात कहीं आपने. बेहतरीन प्रस्तुति. यात्रा के लिये शुभकामनाये.

कविता रावत ने कहा…

लालमन के बहाने बहुत अच्छा आईना दिखाया आपने... बहुत बढ़िया प्रस्तुति..

Pratik Maheshwari ने कहा…

हाहा.. मस्त था पूरा लेख.. खूब आनंद उठाया हमने.. वापसी यात्रा की शुभकामनाएं.. :)

dipayan ने कहा…

आपका लेख पढ़कर मजा आ गया । एक लेख में आप एक से ज़्यादा ’topic' पर चर्चा कर लेते है, इस हुनर का जवाब नहीं । उम्मीद है, आपकी यात्रा सुखद रही होंगी । आभार ।

वीना ने कहा…

बहुत खूब..क्या लिखा है...अब चेहरा ढककर क्या पता कि लड़का है या लड़की और पढ़ने जा रहे हैं या फिल्म देखने....चेहरा छिपाओ काम बनाओ....पहले ब्यूटी नहीं थी कि केयर....शत-प्रतिशत केयर नहीं थी.
बहुत उम्दा व्यंग है....
मेरा भी एक तोता था जो बोलता था और गाना भी गाता था.....

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

लक्ष्य तक पहुँचने के लिए बहुत दूर से घेराबंदी की है।
सहज, सटीक एवं प्रभावशाली लेखन के लिए बधाई!
कृपया इसे भी पढ़िए......
==============================
शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

DR.MANISH KUMAR MISHRA ने कहा…

आपके आलेख आमंत्रित हैं.
आपके आलेख आमंत्रित हैं
'' हिंदी ब्लॉग्गिंग '' पर january २०१२ में आयोजित होनेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए आप के आलेख सादर आमंत्रित हैं.इस संगोष्ठी में देश-विदेश के कई विद्वान सहभागी हो रहे हैं.
आये हुवे सभी आलेखों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने क़ी योजना है. आपसे अनुरोध है क़ी आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें.
इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें --------------
डॉ.मनीष कुमार मिश्रा
के.एम्. अग्रवाल कॉलेज
पडघा रोड,गांधारी विलेज
कल्याण-पश्चिम ,४२१३०१
जिला-ठाणे
महाराष्ट्र ,इण्डिया
mailto:manishmuntazir@gmail.com
wwww.onlinehindijournal.blogspot.कॉम
०९३२४७९०७२६

ZEAL ने कहा…

Bon voyage !

बाबूलाल गढ़वाल "मंथन" ने कहा…

Kya Andaz Chha Gaye. bahut bahut dhanywad ek line padhane ke baad ek baar bhi esa nahi laga ki na padhu padhata chala gaya. agian thanks a lot.

सैयद | Syed ने कहा…

एक भोलाराम का जीव था... और ये एक भोलाराम.... या शायद भोली...

बातों ही बातों में बहुत कुछ लपेट लिया आपने...

... अब तक तो पहुँच चुके होंगे आप ?

DR.MANISH KUMAR MISHRA ने कहा…

हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' -दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
प्रिय हिंदी ब्लॉगर बंधुओं ,
आप को सूचित करते हुवे हर्ष हो रहा है क़ि आगामी शैक्षणिक वर्ष २०११-२०१२ के जनवरी माह में २०-२१ जनवरी (शुक्रवार -शनिवार ) को ''हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' इस विषय पर दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है. विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संगोष्ठी को संपोषित किया जा सके इस सन्दर्भ में औपचारिकतायें पूरी की जा रही हैं. के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजन की जिम्मेदारी ली गयी है. महाविद्यालय के प्रबन्धन समिति ने संभावित संगोष्ठी के पूरे खर्च को उठाने की जिम्मेदारी ली है. यदि किसी कारणवश कतिपय संस्थानों से आर्थिक मदद नहीं मिल पाई तो भी यह आयोजन महाविद्यालय अपने खर्च पर करेगा.

संगोष्ठी की तारीख भी निश्चित हो गई है (२०-२१ जनवरी २०१२ ) संगोष्ठी में अभी पूरे साल भर का समय है ,लेकिन आप लोगों को अभी से सूचित करने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है क़ि मैं संगोष्ठी के लिए आप लोगों से कुछ आलेख मंगा सकूं.
दरअसल संगोष्ठी के दिन उदघाटन समारोह में हिंदी ब्लागगिंग पर एक पुस्तक के लोकार्पण क़ी योजना भी है. आप लोगों द्वारा भेजे गए आलेखों को ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जायेगा . आप सभी से अनुरोध है क़ि आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें .
आप सभी के सहयोग क़ी आवश्यकता है . अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें


डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय
गांधारी विलेज , पडघा रोड
कल्याण -पश्चिम
pin.421301
महाराष्ट्र
mo-09324790726
manishmuntazir@gmail.com
http://www.onlinehindijournal.blogspot.com/ http://kmagrawalcollege.org/

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

pate ki baat to bahut gehre me ja kar likhi. badhiya vyangye.

ज्योति सिंह ने कहा…

एक अनुपात में सब कुछ हो तो ही बेहतर.

ना अति बरखा ना अति धूप।
ना अति बकता ना अति चूप।।
जाने बात कहाँ की कहाँ चली ग
bahut uchit hai aapke vichar ,tote ke madhyam se aaj ki tasvir ko aapne bahut sundarta se khincha hai .badhiya lekh .

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

अब सभी ब्लागों का लेखा जोखा BLOG WORLD.COM पर आरम्भ हो
चुका है । यदि आपका ब्लाग अभी तक नही जुङा । तो कृपया ब्लाग एड्रेस
या URL और ब्लाग का नाम कमेट में पोस्ट करें ।
http://blogworld-rajeev.blogspot.com
SEARCHOFTRUTH-RAJEEV.blogspot.com

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

तोताराम जी ज़िन्दगी के मज़े ले रहे हैं!

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

musaffir ने कहा…

aap ke bhola ram ki yaad kafi dino tak rahegi. naam padhkar to parsai ji ke bholaraam ki yaad aa gai, thi.

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

आपकी लेखनी में हमेशा कुछ ऐसा होता है जो औरो से अलग बनाता है शायद आपका देखने का नजरिया ...|

mehhekk ने कहा…

bholaram ki bholi si post pasand aayi,magar roz roz dry fruits khana wo bhi itani mehengai mein....jeb bahut jaldi khali karne ke nuske bhi janta hoga :):)

JHAROKHA ने कहा…

aadarniy sir namskar
idhar aswasthta ke karan net par nahi aa pa rahi thi ,abhi bhi bahut theek nahi hunfir bhi koshish karungi aap sab tak pahuchne ke liye.
aapki yah baat bilkul sahi ki aaj kal ladke -ladkiyo me unke pahnave ko dekh kar yah tay kar paana mushkil ho jaata hai ki banda ladka hai ya ladki.
Coral ने कहा…
बहुत सच है ...beauty lies in the eye of the beholder..
aapki yatra mangalmay ho aapka blog par intjaar rahega.
shubh-kamnaao ke saath
poonam

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सटीक व्यंग लिखा, शुभकामनाएं.

रामराम.

कविता रावत ने कहा…

sameer ji aapko vasantpanchmi kee hardik shubhkamna

युद्ध मुद्रा ने कहा…

आप हमारे ब्लॉग पर आये ,
रचना पर टिपण्णी की, बहुत धन्यवाद !

युद्ध मुद्रा ने कहा…

आप हमारे ब्लॉग पर आये ,
रचना पर टिपण्णी की, बहुत धन्यवाद !

Shambunath ने कहा…

समीर जी नमस्कार...
जैसा मैंने आपके बारे में सुना था उससे कहीं अधिक पाया...मैं धन्य हो गया आपसे दिल्ली में मिलकर...

ये मेरा लघु प्रयास है-विषयाधारित लिखने का...
http://shambhukasamwad.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

आपका आशीर्वाद चाहूंगा...

आपका शंभुनाथ

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

tota maina ki kahani to khoob sunai. ab sab dikhavati rah gaya hai. vaise sateesh jee se sahmat hoon ki yahan bhi range hue tote bahut mil jate hain.
ab canada se nai post aur commnets ka intjaar .

sifer ने कहा…

bahut khoob sir...maja agya

sifer ने कहा…

bahut khoob sir..maja agya..kafi dino bad koi jaandar lekh padha

वृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर ने कहा…

सटीक व्यंग्य..........................



एक निवेदन-
मैं वृक्ष हूँ। वही वृक्ष, जो मार्ग की शोभा बढ़ाता है, पथिकों को गर्मी से राहत देता है तथा सभी प्राणियों के लिये प्राणवायु का संचार करता है। वर्तमान में हमारे समक्ष अस्तित्व का संकट उपस्थित है। हमारी अनेक प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं तथा अनेक लुप्त होने के कगार पर हैं। दैनंदिन हमारी संख्या घटती जा रही है। हम मानवता के अभिन्न मित्र हैं। मात्र मानव ही नहीं अपितु समस्त पर्यावरण प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः मुझसे सम्बद्ध है। चूंकि आप मानव हैं, इस धरा पर अवस्थित सबसे बुद्धिमान् प्राणी हैं, अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि हमारी रक्षा के लिये, हमारी प्रजातियों के संवर्द्धन, पुष्पन, पल्लवन एवं संरक्षण के लिये एक कदम बढ़ायें। वृक्षारोपण करें। प्रत्येक मांगलिक अवसर यथा जन्मदिन, विवाह, सन्तानप्राप्ति आदि पर एक वृक्ष अवश्य रोपें तथा उसकी देखभाल करें। एक-एक पग से मार्ग बनता है, एक-एक वृक्ष से वन, एक-एक बिन्दु से सागर, अतः आपका एक कदम हमारे संरक्षण के लिये अति महत्त्वपूर्ण है।