बुधवार, अक्तूबर 27, 2010

लबड़हत्था....

बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता.

पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़ने का सिलसिला शुरु हुआ.

अम्मा हुड़कती कि लबड़हत्थे से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा? (उत्तर प्रदेश में बाँये हाथ से काम करने वालों को लबड़हत्था कहते हैं)

आदत छुड़ाने के लिए खाना खाते वक्त मेरा बाँया हाथ कुर्सी से बाँध दिया जाता. मैं बहुत रोता. कोशिश करता दाँये हाथ से खाने की लेकिन जैसे ही बाँया हाथ खुलवा पाता, उसी से खाता. मुझे उसी से आराम मिलता.

एक मास्टर साहब रखे गये थे, नाम था पं.दीनानाथ शर्मा. रोज शाम को आते मुझे पढ़ाने और खासकर दाँये हाथ से लिखना सिखाने. जगमग सफेद धोती, कुर्ता पहनते और जर्दे वाला पान खाते. ऐसा नहीं कि बाद में और किसी मास्टर साहब ने मुझे नहीं पढ़ाया लेकिन उनका चेहरा आज भी दिमाग में अंकित है.

बहुत गुस्से वाले थे, तब मैं शायद दर्जा तीन में पढ़ता था. जैसे ही स्कूल से लौटता, वो घर पर मिलते इन्तजार करते हुए. पहला प्रश्न ही ये होता कि आज कौन से हाथ से लिखा? स्कूल में दाँये हाथ से लिख रहे थे या नहीं. मैं झूठ बोल देता, ’हाँ’. तब वो मुझसे हाथ दिखाने को कहते और बाँये हाथ की उँगलियों में स्याहि लगी देख रुलर से हथेली पर मारते. उनकी मुख्य बाजार में कपड़े की दुकान थी. पारिवारिक व्यवसाय था. उन्हीं में से थान के भीतर से निकला रुलर लेकर आते रहे होंगे क्यूँकि जिन दो साल उन्होंने मुझे पढ़ाया, एक सा ही रुलर हमेशा लाते.

फिर मैं जान गया कि वो स्याहि देखकर समझ जाते हैं. तब स्कूल से निकलते समय वहीं पानी की टंकी पर बैठ कर मिट्टी लगा धो धोकर स्याहि छुड़ाता और फिर घर आता.

मगर दीनानाथ मास्टर साहब फिर दाँये हाथ पर स्याहि का निशान न पाकर समझ जाते कि कुछ बदमाशी की है. मैं फिर मार खाता.

इसी दौर में मैने यह भी सीख लिया कि सिर्फ स्याहि धोने से काम नहीं चलेगा तो दाँये हाथ की उँगलियों में जानबूझ कर स्याहि लगा कर लौटता. ऐसा करके काफी हद तक मास्टर साहब को चकमा देता रहा और मार खाने से बचता रहा.

फिर जाने कैसे उनकी पहचान मेरे क्लास टीचर से हो गई. फिर तो वो उनसे पूछ कर घर पर इन्तजार करते मिलते. गनीमत यह रही कि परीक्षा में नम्बर बहुत अच्छे आ जाते तो बाँये हाथ से लिखना धीरे धीरे घर में स्वीकार्य होता चला गया और दीनानाथ मास्टर साहब को विदा दे दी गई. हाँ, खाने के लिए फिर भी बहुत बाद तक टोका गया.

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उसी बीच जाने कहाँ की शोध किसी अखबार में छपी कि बाँये हाथ से काम करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं और किसी सहृदय देवतुल्य व्यक्ति ने पिता जी को भी वो पढ़वा दिया. पिता जी ने पढ़ा तो माता जी को ज्ञात हुआ. एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया.

तब मैं चाहता था कि वो मेरे बड़े भाई को अब डांटे और मास्टर साहब को लगवा कर उसे रुलर से मार पड़वाये कि बाँये हाथ से लिखो. मगर न जाने क्यूँ ऐसा हुआ नहीं. बालमन था, मैं इसका कारण नहीं जान पाया या शायद मेरी विलक्षणता अलग से दिखने लगे इसलिये उसे ऐसे ही छोड़ दिया होगा. ऊँचा पहाड़ तो तभी ऊँचा दिख सकता है, जब नापने के लिए कोई नीचा पहाड़ भी रहे. वरना तो कौन जाने कि ऊँचा है कि नीचा.

लबड़हत्थों की जमात में अमिताभ बच्चन जैसे लोगों का साथ मिला तो आत्मविश्वास में और बढ़ोतरी हुई और मेरी उस शोध परिणाम में घोर आस्था जाग उठी. काश, उस पेपर की कटिंग मेरे पास होती तो फ्रेम करा कर नित दो अगरबत्ती लगाता और ताजे फूल की माला चढ़ाता.

शोध परिणाम तो खैर समय, जरुरत, बाजार और स्पान्सरर्स/ प्रायोजकों के हिसाब से बदलते रहते हैं मगर अपने मतलब का शोध फ्रेम करा कर अपना काम तो निकल ही जाता. फिर नये परिणाम कोई से भी आते रहते, उससे मुझे क्या?

किन्तु सोचता हूँ क्या इससे वाकई कोई फरक पड़ता है कि आप बाँये हाथ से काम करते हैं या दाँये? फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.

 

 
नोट:
सोच रहा हूँ कि जल्दी से इसे लिखकर छाप देता हूँ इससे पहले कि कोई शोध परिणाम ऐसा कहे कि ब्लॉग पर लिखने से इन्सान पागल हो जाता है इसलिए प्रिंट की पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिये. वैसे कुछ कदम इस दिशा में बढ़ते दिखे तो हैं.

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115 टिप्‍पणियां:

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

विलक्षण प्रतिभाधारी लबड़हत्था जी को हमारा नमन !

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

सोच रहा हूँ कि जल्दी से इसे लिखकर टीप देता हूँ इससे पहले कि कोई शोध परिणाम ऐसा कहे कि .......

Ravindra Nath ने कहा…

हा हा हा अति सुन्दर।

मनोज कुमार ने कहा…

तो अब पता चला कि टॉप के ब्लॉगर होने का क्या राज़ है!!!!
मैं भी एक टीचर रखता हूं जो सिखाए कि बांए हाथ से कैसे की बोर्ड पर टाइप किया जाता है!!!!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

..एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया. ..

..अज्ञानता और अंधविश्वास ने बच्चों, औरतों और समाज के कमजोर वर्ग को भरपूर दुःख पहुंचाया है। भला हो ज्ञान-विज्ञान का जिसने उन्हें सम्मान के साथ जीने लायक बनाया।
..बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बचपन में मैं जब किसी बच्चे को बाएं हाथ से लिखते देखता तो अचरज में पड़ जाता और घर आ कर प्रैक्टिस करता कि वह लिख सकता है तो मैं क्यूँ नहीं...लेकिन लिख नहीं पाया..हाँ मेरा बांया हाथ भी काफी सक्रीय हो गया। क्रिकेट खेलते वक्त उलट के शाट मारने में काफी मजा आता था।

सतीश सक्सेना ने कहा…

नए नाम के लिए हार्दिक शुभकामनायें

गुड्डोदादी ने कहा…

समीर बेटा जी
आशीर्वाद
आपका लेख लबड़हत्था अच्छा लगा
मेरा पोता नम्बर ६ भी बाएँ हाथ से खाता लिखता है उसे गूली बुलाती हूँ
पढ़ कर सूनाउंगी
धन्यवाद

NK Pandey ने कहा…

ओह्ह समीर भाई अब समझ आया आपने ये विलक्षण प्रतिभा बायें हाथ की वजह से पाई है। तभी तो इतनी टिप्पणी देना इतनी पोस्ट करना सबके दिल पर राज करना जाने क्या-क्या...:)ओह्ह कितना काम करते हैं आप। जबलपुर पहुँचे की नही?

Coral ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने... मै भी एक लबड़हत्थे कि मा हू ...
चिन्मयी तब १-२ साल कि रही होगी जब प्ले स्कूल में उसे मारा जाता था और रोज़ बोलती थी मुझे डॉली आंटी खाने के वक्त मारती है, पहले मै समझ न पाई क्या बात है जैसे ही समझा हमने टीचर को समझाने कि कोशिश कि, पर आज भी वो चोट कही असर कर गयी है कभी वो बाये हात से चित्र बनाती है कही दाये!खाने के वक्त भी यही हाल होता है!

आपका लिखने का अंदाज़ बहुत ही खूबसूरत है हसी भी आई और वो दर्द भी महसूस कर पाई !

----------------
फिर से हरियाली की ओर........support Nuclear Power

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अब त एस्टैब्लिश हो गया कि ई ब्लॉगिंग आपके लिए बाएँ हाथ का खेल है!!

Sunil Kumar ने कहा…

प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती अच्छी लगी यह पोस्ट .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

अमिताभ बच्चन लीग में शामिल होने की बधाई!

विष्णु बैरागी ने कहा…

कुछ बातें उदाहरणों से ही समझ आती है। बात नई नहीं होती, कहने का अन्‍दाज, उसका तरीका नया होता है और आपकी यह पोस्‍ट इसका सुन्‍दर उदाहरण है।

'तथ्‍य' से अधिक आनन्‍द 'कहन' में आया।

Anand Rathore ने कहा…

main aaj bhi brush baayen haath se karta hoon..mere daant bahut chamkile hain... ye kahin lbadhatha hone ki vajah se to nahi..hahahaaa... maja aaya.. padh ke ..baal man ki masoom soch jaan ke.. subah subah acchi post..

Shekhar Suman ने कहा…

अच्छा तो यहाँ राज़ छुपाये बैठे थे.....अब पता चला...अब तो लगता है मुझे भी कुछ सीखना पड़ेगा...

Majaal ने कहा…

किसी बाए हाथ वालें ने, दाए हाथ वाला होने बचने की जुगत से, खुद को बचाने के लिए कारनामे किये और वो शब्द ' हथकंडा ' के नाम से प्रसिद्ध हुआ वत्स ....

लिखते रहिये ....

खुशदीप सहगल ने कहा…

शोध बिल्कुल सही है...लबड़हत्थे वाकई हरफ़नमौला होते हैं...

वैसे मक्खन टाइप एक लबड़हत्थे का बायां हाथ काम करते वक्त मशीन में आ गया...दोस्त ने पूछा...फिर क्या हुआ था...जवाब मिला...मैं भी कच्ची गोलियां नहीं खेला...मेरा काम करने वाला बायां हाथ जा रहा था, इसलिए मैंने भी चालाकी की...मशीन से झट बायां हाथ निकाल कर दायां हाथ अंदर डाल दिया...

जय हिंद...

राम त्यागी ने कहा…

और लगे हाथ ओबामा भी छाप दिया सबूत के साथ ...अरे जी हम तो वैसे ही मान गये थे कि आप विलक्षण हैं :-)

वैसे ऐसे लोग कम होते हैं इसलिए विलक्षण माने जाते हैं , आजकल तो माईनोरिटी में ही हर जगह भलाई है ! भीड़ तो भीड़ ही होती है !!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

लबड़ हत्थे तो हमारे परिवार में भी बहुत है पर उनमे अभी वो विलक्षण प्रतिभा नजर नहीं आ रही :)

seema gupta ने कहा…

लबड़हत्था ये शब्द पहली बार सुनने को मिला......
regards

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अब तो मैं भी इन्टेलीजेन्ट बन जाऊंगा :)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सारा खेल तो दिमाग का है, वहीं मचती है जीवन की धमाचौकड़ी। अभिव्यक्ति बायें ओर से हो या दायीं ओर से।

PN Subramanian ने कहा…

विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में शामिल हैं, ढेर सारी बधाईयाँ. आलेख को पढ़ते पढ़ते स्क्रोल डाउन करते वक्त नीचे किसी कविता के न पाए जाने पर आश्चर्य भी हुआ!

Arvind Mishra ने कहा…

ओह बालक समीरलाल के साथ तो तो बहुत ज्यादती हुयी .....मास्टर साहब हैं या गोलोकवासी हुए ..नहीं नहीं ऐसे ही पूछ रहा हूँ नहीं तो एक पैग उनके नाम बाएं हाथ से !

कुमार राधारमण ने कहा…

कंप्यूटर ने दो काम किए हैं। एक तो यह कि पेन छुड़ा दिया। दूसरा यह कि बांये-दायें का चक्कर नहीं। दोनों हाथ एक साथ चलाइए।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

badhiya hai ...khabbu log sach me khub hote hain .. achha sansmaran hai ....

G Vishwanath ने कहा…

आप इतना अच्छा लिखते हैं कि हम सोच रहे थे कि लिखना आपके लिए बाएं हाथ का खेल है।
आज से कहूंगा कि वह दो दाहिने हाथ का खेल है!

इस विषय पर हमने भी कुछ लिखा था।
ज्ञानजी के ब्लॉग पर उसे पिछले साल छापा था
शीर्षक था "क्या लेफ़्ट राईट नहीं है?"

कडी है:
http://halchal.gyandutt.com/2009/06/blog-post_15.html

यदि रुचि और समय हो तो कृपया पढें।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

क्षितिजा .... ने कहा…

'फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती.'...

आपने बिकुल सही कहा समीर जी ... बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढ़ के ...

खासकर जो आपने 'नोट' लिखा है वो और भी अच्छा लगा ..

अल्पना वर्मा ने कहा…

'लबड़हत्था' ..यह नाम पहली बार सुना है..जानकारी बढ़ी.
'प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं. '
सही कहा..

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

" क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.......बहुत अर्थपूर्ण बात है.......

अन्तर सोहिल ने कहा…

बायें से लिखने पर मार, यानि सभी लोग विलक्षण प्रतिभा के खिलाफ होते हैं और उभरने नहीं देना चाहते।

काश किसी ने पहले बताया होता।
अब तो बायें हाथ से लिखने का अभ्यास करना भी असंभव होगा।:)

प्रणाम

Abhishek ने कहा…

लबड़हत्था .... हा हा हा हा हा. मैंने इतना मजेदार नाम कभी नहीं सुना. मेरी माँ भी 'लेफ्टी' हैं.

Parul ने कहा…

sir..maine aksar dekha hai ki left handed log genious hote hai..aisa nahi ki aapki tarif karni hai...vakai aisa hai :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

यह भी खूब रही!
लबड़हत्था का सही विश्लेषण किया है आपने!
--
य़ैंक गॉड!
मेरे घर में तो कोई भी लबड़हत्था नही है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोचक प्रस्तुति ..."लबड़हत्था...शब्द तो सुना था पर अर्थ आज समझ आया ....और आपकी विलक्षणता का कारण भी .... .

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लगी आप की बात हमारी बीबी भी दाये हाथ से ही सारे काम काज करती हे, छॊटा बेटा पहले दाये हाथ से ही सब काम करता था, जब पता चला तो उसे समझाना शुरु किया.... अब दोनो हाथो से सभी काम कर लेता हे, बहुत खुब लेकिन कभी कभी कठिनाई होती हे दुसरो को, वेसे हमारे यहां सब समान मिलता हे दाये हथ से काम करने वालो के लिये

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

ajit gupta ने कहा…

मास्‍टरजी तो पीछे ही पड़ गए? ऐसा भी क्‍या?आपने भी सारी ही तरकीबे आजमा ली वाह। इसीलिए कहते हैं कि खब्‍बू तेज होते हैं।

shaffkat ने कहा…

जनाब समीर लाल साब ,आनंद आ गया मैं भी तमाम आपकी आपबीती जेसा ही भुगतने के बाद भी बाएँ हत्ता हूँ मगर बचपन में मेरा क्रिकेट कोच केवल बटिंग बेटिग दाएँ हात से करवाने में कामयाब हो सका था शायद मेरे शोक के कारण .बहरहाल इतिहास गवाह है दुनिया में बहुत सी विलक्षण प्रतिभाएं बाएँ हाथ वाली गुजरी हैं.

Bhushan ने कहा…

मैं बाएँ हाथ से बैंजो बजता था. आपका कष्ट समझ सकता हूँ. एक मशहूर कवि की पंक्तियाँ हैं- आदमी अपने दाएँ हाथ की नैतिकता से इस कदर मजबूर है कि सारी उम्र गुजर जाती है परंतु....बायाँ हाथ ही धोता है. यह भी पूछने को दिल करता है कि लबड़हत्थे प्राकृतिक और जन्मजात वामपंथी होते हैं या नहीं.

shikha varshney ने कहा…

समीर जी! अब ये साबित हो चुका है कि बाएं हाथ से लिखने वाले ज्यादा इंटेलिजेंट होते हैं :).

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

behtaren sansmaran likha hai aapne thanks

रचना ने कहा…

pratibhashaali hi haen aap

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

लबड़हत्था.... हाहाहा...
नया शब्द है हमारे लिए तो...
’काश, उस पेपर की कटिंग मेरे पास होती तो फ्रेम करा कर नित दो अगरबत्ती लगाता और ताजे फूल की माला चढ़ाता’.
आखिर उसी कटिंग की बदौलत दिन जो बदले...वाह

सोचता हूँ क्या इससे वाकई कोई फर्क पड़ता है कि आप बाँये हाथ से काम करते हैं या दाँये? फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.
बस यही तो विशेषता है समीर लाल जी....
आप हंसते हंसाते कितनी बड़ी शिक्षा दे जाते हैं.

पद्म सिंह ने कहा…

विलक्षण तो विलक्षण होते हैं ... हत्थे चाहे लबड हों या दबड ... इसी बहाने हत्थे भी मशहूर हो जाते हैं ... देखा गया है किसी का कोई अंग असामान्य हो, जैसे छह ऊँगली हो, दाँत एक पर एक चढ़े हों, या खास जगह मस्सा या फिर काला निशान (लच्छन) हो तो लोग उसे भाग्यशाली मानते हैं ... फिलहाल ... स्याही वाली चालाकी विलक्षणता की वजह से थी ... लबड़हत्था की वजह से नहीं ...ऐसैच लगता है ...

शारदा अरोरा ने कहा…

बालमन की यादें बांटने का शुक्रिया ,

rashmi ravija ने कहा…

सच जानने के बाद भी शायद ही कोई ऐसी माँ होगी..जिसने कोशिश ना की हो कि बेटा दायें हाथ का ही उपयोग करे...क्यूंकि वे सोचती हैं, बच्चे को यह ज्ञान ही नहीं किस हाथ का प्रयोग करना चाहिए.
अब तो बहुत बड़े बड़े नाम हैं....

"ब्लॉग पर लिखने से इन्सान पागल हो जाता है इसलिए प्रिंट की पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिये. वैसे कुछ कदम इस दिशा में बढ़ते दिखे तो हैं."
किस दिशा में?...पागल होने के या प्रिंट में छपने के ? स्पष्ट नहीं हुआ...:) :)

स्वाति ने कहा…

kafi rochak likha hai...

सुज्ञ ने कहा…

बदलती मान्यताएं, बदलते मानक।

"ऊँचा पहाड़ तो तभी ऊँचा दिख सकता है, जब नापने के लिए कोई नीचा पहाड़ भी रहे. वरना तो कौन जाने कि ऊँचा है कि नीचा."

एक प्रेरक सुक्ति ही बन गई।

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

हाथ की करामात .....|

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

एक और खब्बू उस्ताद की जय!

cmpershad ने कहा…

Lefty is Lucky :)

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत खूब आपका नाम अब मशहूर लोगो कि सूचि में आ जायेगा ...
आपको हार्दिक बधाई ..शुभकामनाये :)


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क्यूँ झगडा होता है ?

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

आपकी कहानी तो काफ़ी दिलचस्प है. पढ़कर मज़ा आया. लेख के अंत में आपने जो लिखा
उससे भी मैं सहमत हूँ .

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

bahut hee rochak jankaree mili...labrhatha ke bare me itna achchha collection padhkar maza aa gaya

शिक्षामित्र ने कहा…

बालपन की मौलिकता को विकसित होने का अवसर कम ही मिल पाता है। हम बच्चों को अपने जैसा बनाना चाहते हैं-बगैर इस पर विचार किए कि खुद हम ही क्या हैं!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

किसी अखबार में छपी कि बाँये हाथ से काम करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं और किसी सहृदय देवतुल्य व्यक्ति ने पिता जी को भी वो पढ़वा दिया. पिता जी ने पढ़ा तो माता जी को ज्ञात हुआ. एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया.

खब्बू को लबडहत्था और उलटे सीधे काम करने वाले को लबाडू (लपाडू) कहते हैं. और ये दोनों ही असाधारण शक्तियों के स्वामी होते हैं.:)

आज समझ आगया.

रामराम

ali ने कहा…

दिलचस्प ! अब ये मत कहियेगा कि 'की बोर्ड' भी एक ही हाथ के भरोसे है :)

रंजना ने कहा…

कहावत है कि "यह तो उसके बाएं हाथ का खेल है..."

आपके लिए शायद कहना पड़े - यह उसके दायें हाथ का खेल है...

पहले सचमुच बाएं हाथ से खाने लिखने या किसी भी पूजा पाठ को स्वीकार नहीं जाता था...पर अब स्थिति और लोगों की सोच काफी बदल गयी है...लेकिन सच है कि ऐसे लोग प्रतिभाशाली होते हैं..क्योंकि शरीर विज्ञान के हिसाब से इसका सम्बन्ध केवल हाथ से नहीं दिमाग से भी है..

M VERMA ने कहा…

प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है'
लबड़हत्था के पास फिर भी हत्था है पर जब मैने एक ऐसे व्यक्ति को देखा जिसका कोई हाथ ही नहीं था और वह विलक्षण प्रतिभा का धनी था तो यकीन हुआ कि प्रतिभा हाथ या पैर के सहयोग से बेशक आती हो पर उसकी आश्रित नहीं है.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

लबडहत्था क्यो ना हुये हम . वेसे एक काम हम बाये हाथ से ही करते थे ........... अब तो जमाना जेट का है इस्लिये वह आदत भी जाती रही .

डॉ. नूतन - नीति ने कहा…

aapke baayen hatho ka kamal vala ye lekh labdhattha mai kal charchamanch me le jana chahungi... kal ki charcha mei... aapka swagat.. Dhanyvaad

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

मेरा पुत्र अतुल भी लबडहत्था ही है । जहाँ तक प्रतिभा की बात की जावे तो यथा नाम तथा गुण की तर्ज पर स्वयं को उपरोक्त स्वनामधन्य हस्तिस्यों से कम तो नहीं समझता । शायद हो भी...
सुसील बाकलीवाल

निर्मला कपिला ने कहा…

अज राज खुला आप ब्लागिन्ग की ऊँचाईयां क्यों छू रहे हैं।विलक्षण प्रतिभाधारी लबड़हत्था जी को बहुत बहुत शुभकामनायें।

मुन्नी बदनाम ने कहा…

Oh Sameer darling what a surprising similarity? do you know I am also Labbadhatthi...love you darling

मुन्नी बदनाम ने कहा…

Oh Sameer darling what a surprising similarity? do you know I am also Labbadhatthi...love you darling

Vivek Rastogi ने कहा…

उल्टे हाथ के प्रतिभाशालियों में एक से बड़कर एक हैं वैसे ये लबड़हत्था पहली बार ही सुना है।

प्रवीण शाह ने कहा…

.
.
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लबड़हत्था !!!

बढ़िया है, मजा आया पढ़ कर...

आभार आपका!


@ आदरणीय धीरू सिंह जी,

जमाना भले ही जेट का हो... पर लब्बे हाथ की जरूरत हो है ही... या फिर मैं गलत सोच रहा हूँ... ;)


...

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

बाऊ जी
नमस्ते!
पोस्ट पढ़ते समय, सीधे हाथ से दलिया और नीम्बू का अचार खा रहा हूँ और किस्मत पर नाज़ कर रहा हूँ के मैं लबड़हत्था नहीं दबड़हत्था हूँ!
जय हो!
आशीष

अभिषेक ओझा ने कहा…

तो अब आप प्रिंट में लिखेंगे ? इससे ये मतलब तो नहीं निकलता कि ब्लॉग पर कम लिखेंगे? वही इधर भी ठेल दीजियेगा :)

हम तो दाहिने हाथ वाले निकल गए अब हाथ बाँध के भी लबड़हत्था तो नहीं बन सकते ! :(

राजेश उत्‍साही ने कहा…

आपकी इस पोस्‍ट में जिस असली बात पर एकाध को छोड़कर बाकी लोगों ने ध्‍यान नहीं दिया। मुझे लगता है महत्‍वपूर्ण बात यह है कि बच्‍चों का विकास स्‍वाभाविक तरीके से होने देना चाहिए। वे दाएं हाथ से लिखें या बाएं।
आपके मास्‍टर जी और उनके रुल ने सिरहा दिया।

abhi ने कहा…

हम भी मानते हैं की बाएं हाथ से लिखने वाले ज्यादा इंटेलिजेंट होते हैं..,.सो आप भी हैं...और विलक्षण प्रतिभा के धनी :)

वैसे ये बात शायद बाहर हद तक सही भी है की "lefties" थोड़े अलग जरुर होते हैं :)

सुमन'मीत' ने कहा…

जानकारक पोस्ट

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

हम तो आप को पहले से मानते हैं कि
आप कुछ भी लिखें हमें उसमें शुभ सन्देश
अवश्य मिलेगा .
- विजय तिवारी "किसलय "

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

गुरु आप जानते ही हो कि हम भी बाम हस्त हैं. पर कित्ते सफ़ल हैं आप जानते हैं रोज़ रोज़ घुट-घुट के जीते हैं. सोचते हैं ये जीना भी कोई जीना है लल्लू

लेखिका - Rashmi Swaroop ने कहा…

:)

Hi Sir...

apan bhi left-handed hain... par prabhu ki daya se mom dad ko pehle se hi intution ho rakha tha ki lefty people are extra-ordinary and lucky... or extra-ordinary or lucky or both.. :p

...thank god !

par dev-tulya logo ne unhe ye batane ki badi hi koshish kari ki lefty hona achi adat nahi hai..!!
bas mummy papa ko hi enlightenment nahi hua.. :P

...thank god !

Awesome post humesha ki tarah... aap to kamaal hain sir ji!

:D

मो सम कौन ? ने कहा…

किसी शोध के बारे में तो ऐसा नहीं कह सकते लेकिन ऐसा कुछ है जरूर। कला का क्षेत्र हो, साहित्य का क्षेत्र, खेल का क्षेत्र, राजनीति का क्षेत्र और अब ब्लॉगक्षेत्रे भी, लबड़ह्त्थों की पर्सेंटेज कुल आबादी में उनकी पर्सेंटेज से ज्यादा है।
आपकी बात पर इतना कहना भर है - left is always right.

उस्ताद जी ने कहा…

7/10

बहुत सुन्दर संस्मरण जिसे पढ़कर बरबस बार-बार मुस्कराहट आ जाती है. सधी और कसी हुयी पोस्ट जिसके प्रवाह में पाठक बह सा जाता है.

Vandana ! ! ! ने कहा…

लबडहत्था .... यह तो आज ही पता चला. और अगर ये भी पता होता कि बाएं हाथ वाले ऐसे प्रतिभा के धनी होते है तो हम भी एक मास्टर लगवा लेते बचपन में, बाएं हाथ से लिखवाने की प्रैक्टिस करवाने के लिए :-)
अब समझ में आया कि ये लिखना आपके बाएं हाथ का खेल क्यूँ व इतना अच्छा क्यूँ है?

रानीविशाल ने कहा…

प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.
सुन्दर मनोरंजक ठंग से कितना अच्छा सार्थक सन्देश दिया है आपने ...लेकिन यह तो सिद्ध हो गया कि इतनी खुबसूरत रचनाएँ घड़ना आपके बाए हाथ का खेल है :)

निवेदिता ने कहा…

ha sach me baya hath se likhne wale ki budhhi tej hoti hai

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut acha laga aapka lekh mere paas abhi do chatra han jo bayen haath se likhte han main jaanti hun unka bhavishya ujjaval hai..sahi baat hi likhna chaiye ulte se likhe ya seedhe se...aish bhi shuru men ulte haath se likhti thi..khati thi ...ab bhi kabhi2 kar deti ha..hamne koi jor jabardasti nahi ki bas hamen dekhkar khud hi jayada kaam seedhe haath se karti ha..

aapko itni achi post ke liye aapko bahut-bahut badhai..

Anjana (Gudia) ने कहा…

और मैं एक लबड़हत्थी... same pinch :-) Very nice post!!!

Bhushan ने कहा…

आपके यहाँ लबड़हत्थों की गोष्ठी हो गई है. अच्छा लगा. बधाई.

Anu Singh Choudhary ने कहा…

आपने मेरी शंका आज दूर कर दी समीर जी। मेरा चार साल का बेटा भी तो लबड़हत्था ही है। जानती थी कि लबड़हत्थे विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं। एक मिसाल मिली, और छोटे से आदित के लिए एक टन उम्मीद भी!

माधव( Madhav) ने कहा…

मै भी अभी जयादा तार बाए हाथ का ही प्रयोग करता हूँ , मम्मी मना करती है

बाए से काम जारी रखु या दाया पकड़ लू , आपसे सलाह चाहिए

माधव( Madhav) ने कहा…

nice

जोशिम ने कहा…

खब्बुओं में एक बायां हाथ बयाँ अपना भी :-) - शानदार [ एक बार सूरज प्रकाश जी ने भी बाएँ हाथ वालों पर लिखा था - दो एक साल पहले ]

anju ने कहा…

आपकी पोस्ट पढ़ कर अपना बचपन याद आ गया ,मेरा छोटा भाई भी बांये हाथ से काम करता था और उसे भी सीधे हाथ से काम करने को मजबूर किया जाता था.वो सीधे हाथ से लिखना तो नहीं छोड़ पाया पर खाना सीख गया .हम भी उसे खब्बू कह कर चिढ़ाते थे .पर आज में महसूस करती हूँ कि कितना दर्द सहा होगा उसने .

रंजन ने कहा…

ओह आज पता चला आपकी प्रतिभा का राज.. :)

डॉ टी एस दराल ने कहा…

लबड़हत्था ! समीर जी यह तो नया शब्द सीखने को मिला ।
सही कहा है कि आदमी जिंदगी भर कुछ न कुछ सीखता रहता है ।
एक आम सी बात को अपने बहुत दिलचस्प अंदाज़ में प्रस्तुत किया है ।

santoshpandey ने कहा…

bade bhai namaskaar. gazab ka lekhan hai. vilakshan.ab to aapke blog ka niymit pathak ban gaya hu.
santosh pandey
sarerang.blogspot.com

उस्ताद जी (असली पटियाला वाले) ने कहा…

29.5/30
सशक्त।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आपने सिद्ध भी तो कर दिया की आप विलक्षण प्रतिभा के धनी है...बढ़िया आलेख...बधाई

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

रोचक आलेख लगा। वैसे ऐसे लोग बहुत प्रतिभाशाली होते हैं।

पलाश ने कहा…

hamne bhi jab likhna ar khaana seekha tha to left hand kaa hi use karte the , likhne k aada to righ hand se pad gai kintu khana aaj bhi left hand se hi achchha lahta hai, haan sabke saamne me khane mai right hand ka use karti hun
ham jaiso k liy baht koob likhaa aapne

अभिषेक शुक्ला ने कहा…

सर,
स्कूल के ज़माने में एक दोस्त हुआ करता था, अमित निरंजन. वो भी आपकी तरह लबड़हत्था (बड़ा दबंग टाइप का शब्द है ये) था. स्कूल की क्रिकेट टीम का कैप्टन था, बाएं हाथ से खेलता था, बाकी सब काम भी बाएं हाथ से करता था, और साथ ही अच्छे मार्क्स भी लाता था. इसके बावजूद उसके घर के लोगो के मन में ये फांस गडी थी कि हमारा बेटा बाएं हाथ वाला है. घर वालो की इस चीज़ से अमित भी थोडा चिढ़ा रहता था. मेरा दोस्त था तो मुझे उससे सहानुभूति रहा करती थी. फिर कालेज और कैरियर के लिए हम अलग-अलग शहरों में चले गए. पिछले करीब चार साल से उससे बात तक नहीं हुई. आपकी इस पोस्ट ने उस दोस्त की याद दिला दी. पता करता हूँ कि उसका फोन नंबर क्या है और फ़ौरन उसे कॉल करता हूँ.
धन्यवाद, इस तरह अमित की याद दिलाने के लिए.

अजय कुमार ने कहा…

आप लोगों के लिये तो सबकुछ ’बांये हाथ का खेल ’ है ,हा हा हा हा

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

समीर जी, सही कहा आपने प्रतिभा दांया बांया देख कर नहीं आती।

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सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्‍कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।

sandeep sharma ने कहा…

mazaa aa gaya bau ji...
labadhatha... :)

dusri post bhi khoobsurat hai...
जब से बसाया तुझे अपने दिल में,
दिल की हिफ़ाजत मैं करने लगा हूँ...
नहीं कोई मेरा, दुश्मन जहाँ में
अपनों से खुद मैं, डरने लगा हूँ

mehhekk ने कहा…

ha ha this reminded me of my chilhood ,i also used to eat and write with left hand,and mom used to tie left hand while eating,now the position is few things i do with right hand and few with left hand,:):),very interesting post.

AAPKO aur bhabhiji ko diwali ki hardik shubkamnaye.

RAJWANT RAJ ने कहा…

shtk pr bhut bhut bdhai .ykinn in hatho me kitna dm hai btane ki jroorat nhi . tmam comments iski gwahi de rhe hai .
bhut achchha aapka lekh .in tmam sthitiyo se gujrne ki vjh se aapki mnhsthiti ko khoob achchhe se smjh pa rhi hu .

RAJWANT RAJ ने कहा…

shtk pr bhut bhut bdhai .ykinn in hatho me kitna dm hai btane ki jroorat nhi . tmam comments iski gwahi de rhe hai .
bhut achchha aapka lekh .in tmam sthitiyo se gujrne ki vjh se aapki mnhsthiti ko khoob achchhe se smjh pa rhi hu .

mridula pradhan ने कहा…

bahot sundar sansmaran.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सही है समीर भाई .. मैं भी दोनों हाथों से काम करता हूँ .. पर मुझे कोई फर्क नहीं लगा ... जिसने जो करना है वो कर्तेगा ... बाएं या दायें ... क़ि फर्क पैंदा है .....

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

समीर जी,
ये labadhattha maine bhi pahali baar suna. vaise aap ka kahana sahi hai ki baayen hath se kaam nahin karna chahie ये main bhi bachpan se sunati aa rahi hoon.
vaise ye vilakshan to kaha hi jata hai kyonki samanyawah koi bhi baayen hath se kaam nahin kar skata hai. so jo vilakshanta payi jati hai vahi aapmen bhi hai. isi ka punya pratap hai ki aap shirsh par baithe hain.
mera net kaam nahin kar raha hai so transliterate nahin ho raha hai. kshama.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

आपके चेहरे को भी देख कर अनुमान तो होता है की
लबड़हत्था विलक्षण और प्रतिभाशाली होता ही होगा. :)

सुंदर रोचक प्रस्तुति.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

आपका लेख देख कर मुझे अपने बेटे का खयाल आया वह भी बांये हांथ से लिखता और खाता था । हम भी उसे कहते कि कम से कम खाना तो दायें हाथ से खाओ । उसकी छोटी बुआ भी ऐसी ही है पर मेरे सास जी की डांट की वजह से वे दोनो ही हाथों से काम करना सीख गईं । रंगोली भी बायें हाथ से बहुत बढिया बनाती हैं । यह कुछ जेनेटिक होता है और जिसके लिये जो सहज हो वही करने देने से स्वाभाविक विकास होगा यही सही है । बहरहाल और वामहस्त प्रतिभाशाली व्यक्तियों को प्रणाम ।

**/+#-#_-dheeru-*+ ने कहा…

bahut khub kaha shriman ji aap ko labad hatha...........

vaise ye duniya hi hoti hai jiska nazariya insan ko pehchan deta hai aur aap ko bhi 1 vishisth si pehchan di kyon ki aap ka yu ulte hath se kaam karna trend se hath kar tha aur jo log trend se hath kar kuch karte hai unhe kuch na kuch jaroor kaha jata hai.....

lakin aap ki ye bachpan ki smriti kafi rochak or mazedar lagi...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत से लोगों को ये ग़लतफहमी है के बाएं या दायें हाथ से लिखने वालों की बुद्धि में फर्क होता है जबकि ऐसा है नहीं...आपने जो लिखा बहुत रोचक अंदाज़ में, जो आपका अपना है, सच लिखा है और क्या खूब लिखा है...वाह.

नीरज

अविनाश ने कहा…

हम दर्पण के सामने के लबड़हत्‍थे हैं
इसलिए कम आपसे, मेरे किस्‍से हैं

पागल आप तो नहीं हुए हैं पर अब
सच है यह कि पढ़ने वाले हुए हैं
और हम आपको पढ़ने वालों में
शुमार-बेशुमार हैं पर टिप्‍पणियां
नहीं लिखते हैं इसलिए क्‍योंकि
उनका आपके ब्‍लॉग पर अंबार है।

इस समाज में सब नंगे हैं

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग खुशियों का फैलाव है

deepakchaubey ने कहा…

दीपावली के इस पावन पर्व पर ढेर सारी शुभकामनाएं

Kaushalendra ने कहा…

ई देखव ... बित्ता भर का ब्लॉग, बारह गज की टिप्पणियाँ ......
फुलझड़ी का आदत अबहूँ नहीं छूटा है का ? खुद तो लिखिके सूत गइलन, आ हम रतिया भर टिप्पनिये पढ़त रह गइलन /
बाकी, एह बतिया से त हमहूँ सहमत बानी के बालक के सुतंत्र विकास होखे के चाहीं / राउर हंसी-हंसी मं केतना वैज्ञानिक संदेसा दे देले बानी /
ए भाई लोग ! देखअ, बायाँ हाथ से लिखे पर आपन बबुआ-बबुनी पर अतियाचार मत करिहा ........समीर भाई कहले बाणन /

Manish ने कहा…

वाह जी लबड़हत्थे जी!!
ईश्वर का लाख लाख शुक्र है कि हम नही हैं... आप जैसा महान मुझे नही बनना.

रूलर वाली स्पेशल जीवनी से अपनी जीवनी और अपनी मान्सिक कला याद आ गयी थी. मेरी तरह ही आप भी या कहे आप जैसा मैं भी था.. होशियारी के मामले में... :P