रविवार, अक्तूबर 10, 2010

प्यार तुम्हारा इक दिन..

एक बार भारत यात्रा के दौरान एक कवि सम्मेलन में शिरकत कर रहा था. एक कवि महोदय ने गीत प्रस्तुत किया. उसकी धुन मुझे बहुत पसंद आई और कई दिनों तक जेहन में गुँजती रही. फिर उसी धार पर मिसरा लिया और रचा अपना गीत. बहुत बार तो मंच से सुना चुका लेकिन फिर वही. ब्लॉग पर खोज रहा था तो पता लगा कि आप सबको तो पढ़वाया ही नहीं. तो आज वो ही सही:

 

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं..

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

तनहा तनहा सर्दीली भीगी रातों में
विरह अगन से बदन मेरा जल जाता है
बरसाती आँधी वो जब जब भी चलती है
महल हमारे सपनों का फिर ढह जाता है
मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

-समीर लाल ’समीर’

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107 टिप्‍पणियां:

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
सुन्दर-भावपूर्ण अभिव्यक्ति । बधाई । शुभ नवरात्रि ।

संजय भास्कर ने कहा…

गुरुदेव,
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं.... प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है

....बेहतरीन भावों से सजी है आपकी यह पोस्ट

संजय भास्कर ने कहा…

समीर जी
"ला-जवाब" जबर्दस्त!!
हम तो आपकी भावनाओं को शत-शत नमन करते हैं.
.शब्दों को चुन-चुन कर तराशा है आपने ...प्रशंसनीय रचना।

Anu Singh ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं

बहुत खूब समीर जी। ऐसे ही गज़ल, गीत लिखते रहिए यही कामना है।

M VERMA ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
शानदार रचना.

मनोज कुमार ने कहा…

@ मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..
** आपकी इस ब्लॉग यात्रा के साथ जीवन के हर पल का आनंद मिलता रहा है। आज उसका राज़ पता चला है कि आप मधुमास लिए फिरते हैं ताकि हम बार-बार खुशियों को महसूस कर पाएं। सादर नमन!! अभार!!!
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

ललित शर्मा ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

बस यही प्यास और आस कायम रहे
जो निरंतर सृजन को बाध्य करती रहे

आभार

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

प्यार की यह क्षुधा बनी रहे ......

Sunil Kumar ने कहा…

क्या बात है समीर लाल जी इतना सुंदर गीत छिपा के रखा था बधाई

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

लाजवाब पंक्तियाँ ! मज़ा आ गया !

अजय कुमार ने कहा…

उत्तम भाव ,कुछ पीछे चला गया मैं।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

Achha geet ban pada hai sameer ji...madhumas le kar ghumne wala gar geet rachega ..badhiya hoga hi..

अजय कुमार झा ने कहा…

आह ...आप और आपकी पातियां अक्सर ये बात करते हैं ...और क्या खूब बात करते हैं ..सच में कसम से

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

उत्तम रचना....बेहतरीन भावों से सजी लाजवाब पंक्तियाँ.... समीर जी

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI ने कहा…

गुरुजी,दिल में जब मधु-मास लिए फिरते हो तो विरह की अगन आपका बदन कैसे जला रही है?
उम्मीद करता हूँ की जिसे आप ढूँढ रहे हैं वह जल्द मिलेगा !

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं.

बहुत सुंदर कविता समीर जी
इस कविता के बाद भी कह रहे हैं छंदों का ज्ञान नहीं ??

seema gupta ने कहा…

ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.
" बेहद सुन्दर और मधुर गीत.."
regards

रश्मि प्रभा... ने कहा…

प्यार की आस ...... और सफ़र
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

वाह

Anjana (Gudia) ने कहा…

तनहा तनहा सर्दीली भीगी रातों में
विरह अगन से बदन मेरा जल जाता है
बरसाती आँधी वो जब जब भी चलती है
महल हमारे सपनों का फिर ढह जाता है

बहुत सुंदर गीत!
सादर

KK Yadava ने कहा…

सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

.बहुत खूबसूरत भाव..बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं.

बहुत भावमयी गीत ..सुन्दर रचना ..

डा० अमर कुमार ने कहा…

.




































इक दिन हासिल हो शायद :(

उस्ताद जी ने कहा…

4/10

उत्तम

Dr.Bhawna ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

Bahut khubsurat hain ye panktiyan..bahut-bahut badhai..

वन्दना ने कहा…

लाजवाब रचना …………भावों को सम्पूर्णता प्रदान की है।

SURINDER RATTI ने कहा…

Sameer Ji,

Wah kya baat hai

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
Surinder Ratti
Mumbai

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

वाह...वाह...वाह
कमाल का गीत है...
बहुत पसंद आया समीर लाल जी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 12 -10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

cmpershad ने कहा…

`प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो....'
.............. बधाई हो... :)

"अभियान भारतीय" ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं

पंक्तियों ने बेहद प्रभावित किया.........सुन्दर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें !!

PN Subramanian ने कहा…

इसी उम्मीद पर तो दुनिया कायम है. डायलाग मुझसे भी पुरानी है. लेकिन चला लें.

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

वाह! समीर जी,बहुत भावपूर्ण गीत है। बहुत गहराई तक दिल में उतर गया।

यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का

उपेन्द्र " the invincible warrior " ने कहा…

बेहतरीन रचना....

Suman ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं.nice

शारदा अरोरा ने कहा…

सुन्दर गीत , जब तब आप इस मधुमास में झांक कर कवितायेँ रचते रहें ...जैसे कोई खजाना हो .

shikha varshney ने कहा…

प्यार की आस लिए बढ़िया गीत है.

ज्योति सिंह ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
bahut hi badhiya ,man ko chhoo gaye ye saral bhav .

Parul ने कहा…

ishq se labalab...na jane kaun kaun doobega.. :) beautiful!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं..

ये आस जल्द पूरी हो :)

arun c roy ने कहा…

"प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं"
सुन्दर-भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत ही सुन्दर गीत है ....बेहतरीन तरीके से इसके लफ़्ज़ों को पिरोया है आपने ..बहुत पसंद आया यह ...

वाणी गीत ने कहा…

सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं....
दूर के ढोल सुहावने होते हैं शायद ...:)

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

प्रेम की खूबसूरत अनुभूति को समेटती सुन्दर कविता....बधाई.

shaffkat ने कहा…

मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं.
janab khoosurat nazm dil ko chukar pathak uski apni dunya mein chod jati hai .jese muje sahir saab ki nazm ..dharti dharti parbat parbat...yaad aye aur chl pada yaadon ka karvan...mere vichar mein yahi rachyita ki safalta hote hai ki veh apne mein pathk ko bhi samole.shukriya.kisi ki baat hai-jane kis desh mein rehte hain woh moonis woh gamkhar, roz jinki koi baat sunate the sunane wale.mata e dil viran hai kab se .kya hua gam ko sar ankhon pe uthane wale...

sada ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

बहुत ही सुन्‍दर एवं भावमय प्रस्‍तुति ।

Shekhar Suman ने कहा…

वाह समीर जी, इतनी अच्छी रचना हमारे सामने अब ला रहे हैं...बहुत ही खुबसूरत..सुन्दर भाव.. यूँ ही लिखते रहें

मेरे ब्लॉग पर इस बार
एक और आईडिया....

'उदय' ने कहा…

... बहुत सुन्दर ... बेहतरीन !

विष्णु बैरागी ने कहा…

निर्जन में बज रही बॉंसुरी की टेर का आभास करा रही है आपकी ये पंक्तियॉं।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

पढ़कर अब चैन नहीं मिलेगा
सुनने की आस लिए बैठा हूँ मैं ।

बहुत सुन्दर रचना और धुन भी उतनी ही मधुर होगी । ऐसा लगता है ।

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

बेहद उम्दा ...
आभार .

सुनीता शानू ने कहा…

बहुत सुन्दर! आप बहुत सुन्दर लिखते हैं समीर भाई। अच्छा लगा पढ़कर।

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

पूरा वाक्या याद दिला दिया भाई साहब मज़ेदार

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

इस गोष्ठी में हम भी तो थे सरकार याद आया सामने वाली कतार में

amit-nivedita ने कहा…

मैं तो आपके लेखन पर कमेंट करने मे अभी अबोध हूं।बहुत गहराई है आपके विचारों मे और साथ साथ बहु आयामी तरंगे भी हैं उनमें।आप तो बलॉगाचार्य हैं ब्लॉग जगत के।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं

बहुत बढ़िया रचना हैं . फोटो मेरे ख्याल से विजय तिवारी जी "किसलय" के जन्मदिन के अवसर पर ली गई है .... सुन्दर प्रस्तुति...आभार

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

समीर भाई,
आज तो आप की रचना पढ़ कर ऐसा लगा कि, शायद ये कल की ही बात हो जब हिंदी साहित्य संगम http://www.hindisahityasangam.blogspot.com/ की काव्य गोष्ठी में आपने ये रचना सुनाकर (सुनाकर नहीं बल्कि तरन्नुम में गाकर ) सबका दिल जीत लिया था. सच वो पल हमारे लिए सदैव अविस्मरनीय रहेंगे.

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

-समीर लाल ’समीर’


- विजय

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
--
बहुत ही सुन्दर और भावप्रणव गीत रचा है आपने!
--
वैसे भी छंदबद्ध रचना करना
सभी के बस की बात नही है!

MEDIA GURU ने कहा…

sabkuchh samjh me aa gaya ..........hamari duaa hai jaldi vapas mile

अभिषेक ओझा ने कहा…

पढवा तो दिया सुनवायेगा कौन? एक ऑडियो तो बनता है,

rashmi ravija ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं

क्या बात है..बहुत खूब....बड़ी खूबसूरती से दिल के भावों को शब्दों में ढाला है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जी धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम का कोमलतम एहसास।

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण रचना . बधाई

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

प्रेमकी कोमल भावनाओं को समेटे यह गीत, बसआपकी आवाज़ की कमी खल रही है!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत है समीर जी.

Bhushan ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

एक घर की तलाश है हम सब की जो निरंतर रहती है. सुंदर लेखन. बधाई.

रानीविशाल ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं
वाह ....बहुत सुंदर गीत
आभार

राम त्यागी ने कहा…

छा गये जनाब ! जय हो !!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

सुन्दर गीत.. सुन्दर कवि... अति सुन्दर भाव...

क्षितिजा .... ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....


बहुत सुंदर प्रस्तुति समीर जी ... शुभकामनाएं

hem pandey ने कहा…

प्यार हासिल करने और बाँटने की ही वस्तु है |

Asha ने कहा…

सुब्दर भाव लिए रचना |बधाई
मेरे ब्लॉग पर आकार प्रोत्साहित करने के लिए आभार
आशा

हास्यफुहार ने कहा…

मुझे यह पोस्ट अच्छी लगी।
हज़ामत पर टिप्पणी के लिए आभार!

Kailash C Sharma ने कहा…

मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..

..............लाज़वाब भाव और उतनी ही सुन्दर अभिव्यक्ति...दिल को छू लिया...आभार...

Kailash C Sharma ने कहा…

मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..

..............लाज़वाब भाव और उतनी ही सुन्दर अभिव्यक्ति...दिल को छू लिया...आभार...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मज़ा आ गया समीर भाई ....
इतनी लाजवाब चीज़ों को भूला मत करो भाई .... कुछ आनंद हमें भी लेने दिया करो ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रियवर समीर जी
नमस्कार !
कुछ विलंब से आया हूं , लेकिन ऐसा रूमानियत से लबरेज़ गीत पढ़ कर "सॉरी" "अफ़सोस" या और कुछ कहने को मन ही नहीं हो रहा …
गुनगुनाने लगा है मन
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूं मैं …

क्या बात है !

मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूं मैं …


हुज़ूर , आपने जैसे गाया था , उसका रस और आनन्द हमारे हिस्से में भी तो आना चाहिए था … !
आज कल में इसकी ऑडियो क्लिप लगा ही दें साथ ही साथ …
दराल साहब सहित हम सबकी मुराद पूरी हो जाएगी

शुभाकांक्षी
- राजेन्द्र स्वर्णकार

रचना दीक्षित ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
लाजवाब पंक्तियाँ अब तक तो आस पूरी हो गयी होगी

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना! उम्दा प्रस्तुती!

ZEAL ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....

I will pray for you to get your love.

.

DEEPAK BABA ने कहा…

तनहा तनहा सर्दीली भीगी रातों में
विरह अगन से बदन मेरा जल जाता है



वाह दद्दा, आपका एक रंग यह भी........ बढिया....

डॉ. नूतन - नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़ज़ल गुनगुनाते रहे आप.. चलिए देर आये दुरस्त आये... हमने भी अब इस खूबसूरत ग़ज़ल का आनंद लिया ... बहुत खूब...

boletobindas ने कहा…

बहूत ही सुंदर गीत है। एक फिल्मी गाना याद आ गया। बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता जाए बंजारा, लेके अपने दिल का इकतारा.....।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आपका सुंदर गीत पढ़ने को मिला.वो भी प्यार की खुशबू लबरेज़. मज़ा आ गया.
आप ने मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल पढ़ी,सराहना की.धन्यवाद.
उम्मीद है ब्लॉग पर मिलते रहेंगे.

कुँवर कुसुमेश

JHAROKHA ने कहा…

aadarniy sir
behad hi khoob surat aur dharamai pravah me baha le gai aapki kavita.
aapne sach hi likha ki man me jo bhav aate hai vo kis vidh ka roop lelain ye to rachna purn hone ke baad hi pata chalta hai ki vastav me hamne kya likha ,geet,gazal chhand ya kavita.
bahut hi sundar rachna.
जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं
poonam

mridula pradhan ने कहा…

bhawpurn rachna. bahut sunder.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
Hum sabkee kisee na kisee insan kaho, wastu kaho, ya fir koee sapna kaho yahee bhawana hotee hai.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बड़ा प्यारा गीत है।

Dorothy ने कहा…

बेहद खूबसूरत रचना.
आभार.
सादर डोरोथी.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह, पढ़ कर अच्छा लगा.

makrand ने कहा…

bahut sundar rachana.

makrand ने कहा…

bahut sundar rachana.

makrand ने कहा…

प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं..

vaah vaah!!

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

बहुत ही सुंदर.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

बहुत तराशी हुई रचना है, आनंद आगया.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

बहुत तराशी हुई रचना है, आनंद आगया.

ढपो्रशंख ने कहा…

फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

बहुत ही गरिमामयी रचना।

ढपो्रशंख ने कहा…

फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.

बहुत ही गरिमामयी रचना।

मुन्नी बदनाम ने कहा…

प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं

love you Sameer darling.

बेनामी ने कहा…

bahut gajab

अम्मा जी ने कहा…

समीर बिटवा बहुते अच्छा लिखते हो हमरी त तबियते मस्त हुई गई ई पढकर। जीयो खूब जीयो।

अम्मा जी ने कहा…

अऊर बिटवा इन बदनाम गलियों मा काहे जात हो? कऊन है ई मुई मुन्नी बदनाम?

S.M.MAsum ने कहा…

जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं

ati suder sameer jee.

खुशदीप सहगल ने कहा…

ओह रे ताल मिले नदी के जल से,
नदी मिले सागर से, सागर मिले कौन से जल में.
कोई जाने न...

जय हिंद...

Sunil Sarve ने कहा…

appki kavita "udan tashtari" padhkar dil khush ho gaya.. :)
Keep the good work going !!

GOD BLESS
n wish u a very happy diwali :))

H P SHARMA ने कहा…

bade bhai pranaam.

is geet ke rachiyata ko naam se yad kar lete to unhe bhi achcha lagegaa. dinesh raghuvanshi ji manch ke bahut lokpriya kavi hain aur unki sabse badee visheshta ye hai ki vo man ke bheetar se kavita nikaalte hain. kabhi talkhi bhi hai kabhi nirasha bhi. mere achche dost hai aur priya kavi bhi.
गीत तुम्हारे तुमको सौंप सकूँ शायद
बस्ती-बस्ती गीत लिए फिरता हूँ मैं

प्यार की उन नन्हीं-नन्हीं सी राहों ने
पर्वत जैसी ऊँचाई दे डाली है
लेकिन सच्चाई ये किसको बतलाऊँ
शिखरों पर आकर मन कितना ख़ाली है

खुद से हार गया पर सब की नज़रों में
हर बाज़ी में जीत लिए फिरता हूँ मैं

तुम्हें देखकर सूरज रोज़ निकलता था
तुमको पाकर कलियाँ भी मुस्कुराती थीं
तुमसे मिलकर फूल महकते उपवन के
तुमको छूकर गीत हवाएँ गाती थीं

बरसों बीत तुमने छुआ था पर अब तक
साँसों में संगीत लिए फिरत हूँ मैं

उजियारों की चाहत में जो पाए हैं
अँधकार हैं, मेरे मीत सँभालो तुम
स्म्बन्धों के बोझ नहीं उठते मुझसे
आकर अब तो अपने गीत सँभालो तुम

जो भी दर्द भी मिला दुनिया में रिश्तों से
गीतों में, मनमीत! लिए फिरता हूँ मैं

कब तक, आखिर कब तक इक बंजारे-सा
बतलाओ तो मुझको जीवन जीना है
कब तक आख़िर कब तक यूँ हँसकर निश-दिन
अमरित की चाहत में यह विष पीना है

चेहरे पर चेहरे वालों की दुनिया में
दिल में सच्ची प्रीत लिए फिरता हूँ मैं

Udan Tashtari ने कहा…

प्रिय मित्र शर्मा जी

शायद आपने गीत के पूर्व की भूमिका नहीं पढ़ी, जो मैं कहीं भी इस गीत को सुनाने के पूर्व अवश्य सुनाता हूँ और जब से रघुवंशी जी का नाम और गीत सुनिता शानु जी ने याद दिलाया, तब से उनका नाम भी भूमिका में कहने लगा हूँ.

मेरा सौभाग्य था कि रघुवंशी जी, डॉ कुंवर बेचैन एवं राकेश खण्डॆलवाल जी के साथ एक ही मंच पर सन २००७ में पढ़ा था जिसका निमंत्रण एवं आयोजन सुनीता शानु जी ने किया था. वही एक मुलाकात रही रघुवंशी जी से और वहाँ उन्होंने यही गीत जो आपने लिखा है, सुनाया था गाकर.

धुन कानों में बस गई. मुखड़े का एक मिसरा भी लेकिन बाकी न तो बोल याद रहे, न रघुवंशी जी का नाम. इसे मेरी कमजोर याददाश्त कहें या जो भी उचित समझें, मान लें.

बाकी मिसरे उसी धुन पर हैं मगर जुदा है और शायद इंगीत भी अलग ढंग से किये गये हैं.

एक धुन, एक ख्याल, मुखड़े का पुनरुपयोग तो सदा से होता आया है किन्तु फिर भी यह गीत दिमाग में कैसे आया, मैने भूमिका में लिख ही दिया था.

आशा है आपके मन का संशय दूर हुआ होगा. यदि अभी भी कुछ संशय हो तो अवश्य सूचित करें.

सादर शुभकामनाएँ...

समीर लाल