रविवार, अगस्त 15, 2010

मुद्दतों बाद….

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

आज एक गज़ल, जो चंद रोज पहले महावीर ब्लॉग पर छपी थी. महवीर ब्लॉग से अपनी गज़ल का छपना एक गौरव की अनुभूति देता है, बहुत आभार महावीर जी एवं प्राण जी का इस इस स्नेह के लिए. देखें इस गज़ल को, एक अलग तरह का प्रयोग है हर शेर के शुरुवात में मुद्दतों बाद के इस्तेमाल का:

 

 

मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा

-समीर लाल ’समीर’

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112 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

संजय भास्कर ने कहा…

रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा -समीर लाल ’समीर’

अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं.... बहुत सुंदर कविता....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

बहुत उम्दा!
हक़ीक़त तल्ख़ है लेकिन बद्क़िस्मती से बहुत से घरों की हक़ीक़त यही है

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

दो दिन जो मैं रहा गांव से बाहर
मोहल्ले वाले पहचानना ही भूल गए।

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

उम्दा गजल के लिए आभार
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।

हिंदी सेवा करते रहें।

जय हिंद

राम त्यागी ने कहा…

आपको भी और सभी देशवाशियों को हार्दिक शुभकामनायें इस महान दिन पर ...
गजल में भी व्यंग्य छुपा है :)

Ashish (Ashu) ने कहा…

vaah sir ji, bahut hi achi gajal hai......aaj bahut din baad itni achi gajal padhne ko mili hai thanks sir ji thanks a lot.......love you....

Ashish (Ashu) ने कहा…

vaah sir ji, bahut hi achi gajal hai......aaj bahut din baad itni achi gajal padhne ko mili hai thanks sir ji thanks a lot.......love you....

Atul ने कहा…

Aapko bhi swatantrata diwas ki hardik badhai.

प्रमोद ताम्बट ने कहा…

मुद्दतों बाद किसी को अच्छी गज़ल सुनाते देखा। बधाई समीर जी ।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in
http://vyangyalok.blogspot.com

seema gupta ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ
मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

बेहद खुबसूरत ग़ज़ल.....
regards

Arvind Mishra ने कहा…

क्या खूब ? मुद्दतो बाद ही सब खुराफात की जड़ है और आपने इसी को इतना ताब दे दिया ,सर चढ़ा लिया -अब हम भी सावधान हो लिए हैं मुद्दतों बाद को फटकने नहीं देगें ..बड़ी खतरनाक है यह तो !

'अदा' ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

आप तो हर बार गज़ब कर जाते हैं..ये मुद्दतों बाद वाला फ़ॉर्मूला ग़ज़ल के लिए बहुत शानदार है लेकिन आप पर लागू नहीं होता...:):)
बहुत खूबसूरत है.. हर आशार...
शुक्रिया...
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ...!

सुज्ञ ने कहा…

आपने कह तो दिया…

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा

gaurtalab ने कहा…

बेहद खुबसूरत ग़ज़ल.....

P.N. Subramanian ने कहा…

हम जो लिखना चाह रहे थे उसे श्री प्रमोद ताम्बट जी ने लिख दिया. अब केवल "बढ़िया" से काम चला लें.

Parul ने कहा…

puri ghazal ...khoobsurat hai..awesome!

P.N. Subramanian ने कहा…

हाँ आप के सेव के पेड़ को देख एक बात याद आ गे. एरिज़ोना में (फिनिक्स) हमारी भांजी रहती है. उनके घर में भी सेव का पेड़ है और खूब होता है. वहां की विषम जलवायु में वह कौन सी वेराइटी है. क्या भारत के गरम भागों में उसका प्रत्यारोपण हो सकेगा? दिसंबर में आते वक्त दो चार पौधे ले आयें. जबलपुर में लगा दें.

ana ने कहा…

shandar gazal hai aapki...........

sanu shukla ने कहा…

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा

बहुत बेहतरीन गजल है ...

Shah Nawaz ने कहा…

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा

बेहतरीन ग़ज़ल!

आपको भी परिवार सहित स्वतंत्र दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मुद्दतों बाद मेरा घर मुझे अपना लगा,
गुनगुनाते जब उन्हे एक फूल सजाते देखा।

Dr. Mukul Srivastava ने कहा…

बहुत सुन्दर गज़ल दीवाना करके छोड़ेंगे

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी यह गज़ल महावीर ब्लॉग पर भी पढ़ी थी ...फिर से पढ़ना अच्छा लगा ...

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

बहुत मार्मिक बात कह दी है ...

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
सीधी चोट करती बात............
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

आपको और आपके परिजनों स्वतंत्रता दिवस की असीम हार्दिक शुभकामनाये
...

मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

बहुत सुन्दर प्रस्तुति....वाह ..आभार

Mahfooz Ali ने कहा…

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा........

इन पंक्तियों ने दिल को छू लिया....


बहुत सुंदर ग़ज़ल....

--
www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

मुद्दतों बाद नहीं, हमने तो आपको हमेशा ही अच्‍छा लिखते देखा।

वाणी गीत ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा...

मुद्दतों बाद बुत कुछ देखा आपने ...
मगर इतनी मुद्दतें हुई क्यों ...
जवान थे तो उड़ते फिरते रहे चमन में ....
बुढ़ापा देख पुराना घर याद आया ....:):)

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ...
जितनी भी है ... आज़ादी मुबारक..!

Rajeev Bharol ने कहा…

बहुत अच्छी गज़ल समीर जी.

धन्यवाद.

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

खुबसूरत ग़ज़ल,
बहुत सुंदर,
बधाई!

ali ने कहा…

मुद्दतों बाद एक अच्छी गज़ल हमने भी पढ़ी है !

शहरोज़ ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा


maarmik !!
भाई sab !यह सच है और यही सच है!!

samay हो तो अवश्य पढ़ें:

पंद्रह अगस्त यानी किसानों के माथे पर पुलिस का डंडा
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_15.html

ajit gupta ने कहा…

बहुत अच्‍छी गजल, बधाई।

शहरयार ने कहा…

बढ़िया लिखा है आपने.

मेरा ब्लॉग
खूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचें
http://iamsheheryar.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

वन्दना ने कहा…

बेहतरीन उम्दा गज़ल्।
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

Dr.Bhawna ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा

kamal ki panktiyan hai..bahut khubsurat gajal.bahut2 badhai...

माधव ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा
waah

शागिर्द - ए - रेख्ता ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा


kya kahne bhaissab... wah wah.
Zindabad zindabad

shikha varshney ने कहा…

ये वहां भी पढ़ी थी यहाँ पढकर फिर से आनंद आया .

shikha varshney ने कहा…

ये वहां भी पढ़ी थी यहाँ पढकर फिर से आनंद आया .

cmpershad ने कहा…

बाद मुद्दत के मुरादें बर आई हैं :)

Rajat Narula ने कहा…

bahut hi umda rachna hai !

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

बहुत सुन्दर गजल है |

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

बहुत सुंदर !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 17 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

ज्योति सिंह ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा
bahut khoob ,haardik badhai aazadi ke avsar par aapko saparivaar .

Priya ने कहा…

muddato baad ham bhi laute hai yahan
bahut khoob

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
बहुत सुन्दर गज़ल है समीर जी. शुभकामनाएं.

mukti ने कहा…

सीधी-सच्ची गज़ल...

मनोज कुमार ने कहा…

मुद्दतों बाद एक अच्छी ग़ज़ल पढने को मिली!

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

देर से ही सही आपको स्वतंत्र दिवस कि ढ़ेर सारी शुभकामनाएं. और फिर इन पंक्तियों के लिये भी कि............
ek aur achchhi post ke liye dher sari badhaiyan...........

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा...

बहुत ही बढ़िया लगा यह शेर ...बहुत खूब समीर जी

M VERMA ने कहा…

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा
आँखे जब मुद्दतों बाद खुलेंगी तो दाम तो चुकाना ही होगा.
और फिर जब खुद की खुद से पहचान हो जाये तो क्या कहने ...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

मुद्दतों बाद ये आई है तश्तरी में ग़ज़ल
यूएफओ लगती है पास से इसको देखा.

nilesh mathur ने कहा…

वाह! क्या बात है, बहुत सुन्दर !

राहुल प्रताप सिंह राठौड़ ने कहा…

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

वाह क्या बात कही ...टच कर गयी |

राजकुमार सोनी ने कहा…

मैं तो आपका प्रशंसक हूं इसलिए यह तो कहूंगा ही कि आप हमेशा जानदार और शानदार लिखते हैं... लेकिन यह क्या मेरे अलावा ऊपर और भी कई लोग है जो मेरी बात का समर्थन कर रहे हैं।
धांसू गजल....
बधाई आपको.

अजय कुमार झा ने कहा…

सच में ही बेहतरीन पंक्तियां हैं ...........बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत ही सटीक रही आज की आपकी पोस्ट!
--
एक छंद देखिए-

मेरे आजाद भारत को अब देखिए,
हो रहे कत्ल हैं बेसबब देखिए,
इस नई नस्ल को बेअदब देखिए,
कैसे आ पायेगा मुल्क में अब अमन।
उन शहीदों को मेरा नमन है नमन।।

Vivek Rastogi ने कहा…

आजादी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

ग़ज़ल और सेब दोनों ही रसदार, वाह.

Akhtar Khan Akela ने कहा…

jnaab aapki muddton ke bad kaa istemaal krna mene to muddton baad nhin blke pehli bar dekhaa or bs chaa gye jnaab aap to bhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan

अमृत उपाध्याय ने कहा…

बेहतरीन...कविता आज़ादी की शुभकामनाएं

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

लाजवाब गजल, बहुत शुभकामनाएं.


रामराम

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

लाजवाब गजल, बहुत शुभकामनाएं.


रामराम

शोभना चौरे ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
दिल को छु गए ये शेर |

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi behatreen rachna sir ji....

swaarth ने कहा…

मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा
................
अच्छे विम्ब, प्रभावी शब्द

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

समीर भाई ..एक एक शेर ..नग कि तरह बैठा दी हैं आप गजल के अंगूठी में..

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

लाजवाब्! बेहतरीन! मन को छू जाने वाली रचना....

अजेय ने कहा…

मुद्दतों बाद आज टिप्पणी कर रहा हूँ . 15 अगस्त की शुभ्कामनाएं देने के लिए.एक पोसट देखें.

http://ajeyklg.blogspot.com/

arun c roy ने कहा…

bahut sunder rachna! muddaton baad aisee gazal padhne ko mili..

रानीविशाल ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा
Behad khubsurat .....har sher vastvikta ke dharatal se juda hua hai...Dhanywaad.

boletobindas ने कहा…

मुद्दतों बाद कुछ होता हो
मुद्तों बाद ख्बाव आते हों
मुद्तों बाद वगैरेह वगैरह होता हो..पर आप तो हर बार कमाल करते हैं.....देखा हर काम मुद्दतों बाद नहीं होता...मानते हैं कि नहीं....?

मो सम कौन ? ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल है सर जी।
पढ़वाने के लिये आभार।

खुशदीप सहगल ने कहा…

मुद्दतों किया है तेरा इंतज़ार ऐ सनम,
जो सुनाई अंजुमन में शब-ए-गम की आपबीती,
कभी रो के मुस्कुराए,
कभी मुस्कुरा के रोए...

जय हिंद...

'उदय' ने कहा…

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा
... बेहतरीन अभिव्यक्ति !!!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति!


“कोई देश विदेशी भाषा के द्वारा न तो उन्नति कर सकता है और ना ही राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति।”

किलर झपाटा ने कहा…

हमारे काम का तो सिर्फ़ सेब का झाड़ लगा। जमकर सेब खाने को मिले तो मज़ा है।
बाकी बकबक, शेर के पहले शेर के बाद अपनी समझ के परे है। अपन तो एक ही शेर को जानते हैं, दारासिंह। उसके आगे क्या और पीछे क्या ? समझे जानी।

निर्मला कपिला ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
वाह समी जी क्या शेर कहे हैं बधाई।

sada ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा ।
गहरे भाव लिये हुये, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

KK Yadav ने कहा…

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा
...बहुत खूब..खूबसूरत अभिव्यक्ति..बधाई.

'डाकिया डाक लाया' पर भी आयें तो ख़ुशी होगी.

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी गज़ल है समीर भाई ।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा


वाह...वाह.......क्या बात है जी ......!!

बल्ले-बल्ले ......ख्वाब हम देखते रहे और आना-जाना आपके यहाँ होता रहा .....

चलिए मुद्दतों बाद की ये खुसी आपको मुबारक ......!!


सुंदर ग़ज़ल .......!!

Coral ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा ...

बहुत सुन्दर प्रस्तुती

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा
...Khubsurat abhivyaktiyan..badhai.

_________________________
'शब्द-शिखर' पर प्रस्तुति सबसे बड़ा दान है देहदान, नेत्रदान

Dinesh Sharma ने कहा…

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा

बहुत बढिया।

साधवी ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा


वाह.

हिमांशु पाण्डेय ने कहा…

मुद्‌दतों बाद किसी ने मुझे पुकारा है
एक पल रुक कर हम सोचने लगे
क्या यही नाम हमारा है।

बहुत अच्छी गजल है। धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समीर भाई ... बहुत की खूबसूरत ग़ज़ल है ये ..... आज़ादी का जश्न मुबारक हो ...

lk ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ल....

Unknown ने कहा…

muddaton bad main lauta hoon yahan;
kisi ki gazal padhkar, khud ko muskurate dekha..

ek uttam rachna ke liye badhai sameer ji.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

पूरी की पूरी गज़ल बहुत खूबसूरत और आखरी के शेर तो बस मन भिगो गए.
सुंदर उम्दा अभिव्यक्ति.

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
बहुत उम्दा!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

मुद्दतों बाद कुछ पढने को जी चाहा
देखा तो खुद को आपको पढ़ते देखा
==========================
सुन्दर ग़ज़ल
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

Sanjeet Tripathi ने कहा…

ग़ज़ल बहुत शानदार है.

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये.

आर के वर्मा ने कहा…

बहुत अच्छी लगी गजल.

Babli ने कहा…

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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा
मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा..
वाह क्या बात है! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब कविता!

निर्झर'नीर ने कहा…

मुद्दतों बाद हम जो इधर से गुजरे
गुलशन के हर एक गुल को महकते देखा .............वाह जनाब शब्द नहीं है या यूँ कहो की अल्पज्ञानी है ...जो भावों को आपकी तारीफ़ में शब्द न देसके

रंजना ने कहा…

नायाब रचना...कितने भी बार पढने पर यह नयी ही लगेगी..

Gourav Agrawal ने कहा…

हमने तो कुछ ही पलों में इस रचना से
जीवन के हर पहलु को करीब आते देखा

बेहतरीन रचना

Gourav Agrawal ने कहा…

बस एक रचना और .... छोटी सी

होती है क्या क्षमता रचनाकार की
आपने फिर से समझा दिया
जो देखा मुद्दतों में आपने
चंद शब्दों में हमें दिखला दिया

rashmi ravija ने कहा…

मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

कमाल की पंक्तियाँ हैं...बहुत सुन्दर

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

समीर जी,
मुद्दतों बाद पढ़कर इस ग़ज़ल को सच में
आज खुद अपने आप को मैंने शर्माते देखा
- विजय

Pratik Maheshwari ने कहा…

मुद्दत्तों बाद ऐसा बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ के बहुत अच्छा लगा..
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं..
"कन्नू की “गाय” ते माँ का “Cow”" ज़रूर पढ़ें और अपने विचार दें..

आभार..

sunita upadhyay ने कहा…

आपकी कविता बहुत मार्मिक है .भावनाओ से परिपूर्ण,बहुत सुन्दर

Rajey Sha ने कहा…

shubh ank hai 108

mehhekk ने कहा…

behad sunder,muddaton baad aisi sunder gazal padhi. khas kar 3rd and 4th sher waah waah.

venus**** ने कहा…

hmmmmm..bahut bahut shurkiyaa....
mujhe ik aisi rchnaa se rubrro hone ka moukaa ddene ke liye..........thanxx...reaaly grt
take care

mai... ratnakar ने कहा…

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा


ultimate!!!!!!!!!! afsos hai ki itanee khubsoorat panktiyaan itnee der baad padh saka. badhaee