बुधवार, अगस्त 12, 2009

संगत कीजे साधु की...

आस पड़ोस समझ कर और जानकर मकान खरीदने के दिन अब खत्म हुए. आज जान भी गये और कल पड़ोसी किसी और को बेच गया, तब? और यूँ भी आपको अपने घर में रहना है, पड़ोस में तो नहीं.

याद है वो जमाना भी, जब बाप दादाओं का बनाया घर पुश्त दर पुश्त चलता रहता था. पूरा का पूरा मोहल्ला-तिवारीपुर. हर घर तिवारियों का. न बिकना और न खरीदा जाना.

मगर भारतीय हैं तो जरा देख परख कर ही छः साल पहले घर खरीदा था. तबसे देखा दिखाया सब जाता रहा. सामने पीछे, इस बाजू और उस बाजू सब बदल गये हैं. सब नये. एक बाजू तो इतने दिनों में तीन बार.

एकदम पड़ोस में पिछले ४ माह से नये लोग आ गये हैं. दो लड़के, 'क्रिस' और 'एरेन', एक माँ 'आईवी'. नाम से जान गये होंगे कि भारतीय तो नहीं ही हैं. पहले मैं समझता था कि भाई भाई होंगे. रहते, आते जाते, मिलते पता चला कि सेम सेक्स पार्टनर हैं. माँ एरेन की है. धन्य हुए ऐसा पड़ोस पाकर.

रोज सुबह देखता हूँ. एरेन कार से क्रिस को स्टेशन छोड़ने जाता है. रास्ते में रुक कर दोनों कॉफी खरीदते हैं और फिर क्रिस को स्टेशन छोड़ एरेन अपने दफ्तर.एरेन मात्र ५ घंटे की नौकरी करता है और क्रिस पूरे ८ घंटे वाली. शाम को भी एरेन स्टेशन जाकर क्रिस को ले आता है. दोनों रास्ते से कॉफी खरीदते हुए और एक कप माँ के लिए लेकर लौटते हैं.

अक्सर ही जब वो लौटते हैं तो देर हो चुकी होती है और मैं बरामदे में बैठा उन्हें लौटता देखता हूँ. हाय हैल्लो और कुछ औपचारिक बातचीत भी तभी हो जाती है.बाकी तो शनिवार, इतवार को जरा ज्यादा बात हो ले तो हो ले.

दिमाग ही तो है. कुछ भी देखे और उड़ान भरने लगता है.

सोचने लगता हूँ कि एरेन की माँ पर क्या गुजरती होगी, जब दोनों लड़के उसे गुडनाईट कह कर सोने जाते होंगे. क्या सोचती होगी वह?

पता नहीं हम भारतियों की तरह शायद उसने भी कभी अपने पुत्र के होने की खुशियाँ मनाते हुए कभी सोचा होगा कि सुन्दर सी काबिल बहु आयेगी मेरे अँगना.

खैर, अब जैसी भी आ गई वैसी ही सही कह के तो बहुत सी माँऐं अपना जीवन काट लेती हैं लेकिन यहाँ तो आई कहाँ-आया !!!!!

सर पकड़ लिया होगा, जब लड़का पहले दिन अपने पार्टनर को मिलवाने लाया होगा.

सात जन्मों का साथ !

माना कि प्रगतिशील लोगों के मूँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगती मगर कई बातें भी तभी तक अच्छी लगती हैं जब तक दूसरों के साथ घटित हों वरना अच्छे अच्छे प्रगतिशील पटखनी खाये पड़े देखे हैं मैने.

ये तो वैसी ही बात है जैसे किसी के शैतान बच्चे को देखकर खूब खुशी से पूछो कि इसके कारण तो काफी चहल पहल रहती होगी घर में. चहल पहल तो उसे समझ में आती है जो दिन भर उसकी शैतानी झेलता है. आप क्या है, दस मिनट को आये. उसकी हरकतों का मजा लूटा और निकल लिए.

खैर, ढूँढो तो कचरे में भी मोती मिल जाये. वैसे ही इसमें भी एक फायदा जरुर एरेन की माँ को हुआ होगा कि बहु सास वाली खटखट से बच गई और जो बहु की मूँह दिखाई और अन्य आयोजनों के लिए ज्वेलरी वगैरह सहेज कर रखी होगी, वो भी पूरी की पूरी खुद की हो गई. ठाठ से पहन कर घूमो!!

कल शाम बिजली कड़कती थी. घनघोर बादल छाये थे. धुआँधार बारिश. दो घर छोड़ हमारी सड़क के मोड़ पर पूरा जंगल है और सामने ही कुछ दूर पर ऑन्टारियो लेक. उस पर से ये मौसम. समा ही बँध गया.

बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठे, 'मौसम है आशिकाना, ऐ दिल कहीं से उनको...' पाकीज़ा के गीत की मद्धम आवाज, बेहतरीन स्कॉच का गिलास और उस पर से हवा के साथ आती बारिश के पानी की छिटकन..आह्ह!!!

पत्नी को आवाज देता हूँ कि बाहर ही आ जाओ और मौसम का आनन्द लो. रोमांटिक मौसम है. सास बहू सीरियल तो रोज ही आना है.

बरामदे के अँधेरे कोने में कुर्सी पर बैठे(अलग अलग कुर्सी पर :)) हम मियाँ बीबी मौसम का आनन्द ले रहे थे. ज्यादा सोचो मत, इस उम्र में अलग अलग कुर्सी पर बैठ कर ही मौसम का सही आनन्द लिया जाता है. रह रह कर बिजली चमकती और पूरा एरिया चमक उठता. ऐसे में मेरी नजर एरेन के घर की बालकनी पर पड़ गई. नजर है, घूमना स्वभाव है, घूम गई.

एरेन और क्रिस भी मौसम की रुमानियत में डूबे, एक दूसरे से आलिंगनबद्ध मद्धम गति के नाच में मशगूल हैं. वाईन का गिलास भी सामने दीवार पर रखे हैं. इरादे कुछ नेक नहीं. वैसे पति पत्नी ही तो हैं तो फिर इरादों की नेकता पर क्या प्रश्नचिन्ह !!

बेटे का फोन आता है. "डैड, गुड न्यूज़!!"

बता रहा है कि अब वो शादी करने को तैयार है. कह रहा है कि लड़की देख रहा है. बड़ी खुशी हुई कि कम से कम लड़की देख रहा है. लगा कि जैसे गंगा नहा गये.

बड़ा बेटा पिछले दिसम्बर में एक लड़की से ही शादी कर ही चुका है. छोटे ने भी वैसा ही करने की ठानी है. कम से कम ये जनरेशन तो तर ही गई, समझो.

आने वाली जनरेशन के लिए भी शुभकामनाऐं ही दर्ज कर सकता हूँ वरना अड़ोस पड़ोस का आपके व्यक्तित्व निर्माण पर गहरा असर तो होता ही है इसलिए तो बचपन में बड़े बुजुर्ग डांटा करते थे कि फलाने के साथ मत रहो, फलाने के साथ मत खेलो.

सीखा तो यही है: 'संगत कीजे साधु की...'



आकाश
में
बिजली की डरावनी तड़कन
बादलों की खूँखार गरजन
अपना आपा खोती
तेज मूसलाधार बारिश...

लगता है..

मेरी ही तरह
देख कर दुनियाँ की हालत..

कोई
उस पार भी
हैरान है

और

शायद
मेरी ही तरह
वो भी
परेशान है!!!

-समीर लाल 'समीर'


नोट: पिछली पोस्ट 'एक हारा हुआ योद्धा' के लिए अपने प्रशसकों, पाठकों और मित्रों से क्षमाप्रार्थी. पोस्ट का उद्देश्य कतई अपने दुख और मानसिक तनाव से आपको दुखी और तनावग्रस्त करना नहीं था. बस, मन की बात थी और धारा प्रवाह अपने साथियों के बीच बह निकली. इतने कमेंट और इतने सारे व्यक्तिगत ईमेल इस विषय को लेकर आ गये हैं कि अब सही तनाव हुआ है कि सबका जबाब कैसे दूँ. :) आपने समझा, समझाया, साथ दिया-आप सभी का बहुत आभारी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

97 टिप्‍पणियां:

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

समस्या तो यह है कि आजकल संगत करने के लिये साधु ही नही मिल रहे है । जो मिलते है वे सब शैतान ही मिलते है । आपके बच्चे हिन्दुस्तानी संस्कृति को अपनाये हुये है यह आपके दिये हुये संस्कारो का परिणाम है ।

अनूप शुक्ल ने कहा…

गंगा नहाने की बधाई!

M VERMA ने कहा…

शायद
मेरी ही तरह
वो भी
परेशान है!!!
====
उसकी परेशानी (उस पार वाले की) खत्म हो न हो. आप क्यो परेशान है? अगर है तो ये परेशानी खत्म हो यही कामना है

राजीव तनेजा ने कहा…

सच कहा आपने...

सज्ज्न लोगों की संगत ही हमेशा बढिया रहती है...

ये जानकर खुशी हुई कि कम से कम ये जनरेशन तो तर ही जाएगी...


बधाई...

Vivek Rastogi ने कहा…

हमारी आने वाली पीढ़ी की हमें ज्यादा चिंता है क्योंकि हमारे लिये तो वो ही नेक्सट जनरेशन है, बस आपकी शुभकामनाओं की ही जरुरत है, कि वो लड़्की से ही शादी करे। :)

वैसे बारिश का सीन बहुत रुमानी लिखा है आपने।

Arvind Mishra ने कहा…

समीर जी अब वतन लौट आईये -कैसे कैसे दिन देखने को मिल रहे हैं !

वाणी गीत ने कहा…

कविता अच्छी है ...!!

Mansoor Ali ने कहा…

एरन बहू लाया है य घर-जमाई, ज़रा सुनिश्चित कर लेवे [नाम पर ना जाये], आप तो बडे प्रमाणिक ब्लागर है.

पंकज सुबीर ने कहा…

एक माह के लिये कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट से अवकाश लिये हुए हूं । फिर भी आज मन नहीं माना तो आ गया । बहुत अच्‍छी पोस्‍ट है एक कमी है झील पर उमड़ते बादलों और जंगलों का एक चित्र भी होता तो हम भी घर बैठे कनाडा की सैर कर लेते । जहां तक पोस्‍ट के पहले भाग का सवाल है वो तो पूरी तरह से 'रंगे-समीर' से ओत प्रोत है । आपके व्‍यंग्‍य की धार तो आनंद ही ला देती है । बधाई कि बेटे ने आज के दौर में भी एक लड़की को पसंद किया है । अचानक ही एक शेर बन गया है यहीं बना है और यहीं लगा रहा हूं । अच्‍छा लगे तो होमवर्क समझ कर ग़ज़ल को पूरी कर दें ।
ज़ात, मज़हब कुछ भी हो उसकी नहीं परवाह है
पर बहू लाये जो बेटा, कम से कम नारी तो हो
आशा है आपका स्‍वास्‍थ्‍य अब ठीक होगा । मैं भी पिछले दस दिनों से स्‍पांडिलाइटिस का भीषण अटैक झेलनके के बाद योग की शरण में हूं तथा बहुत फायदा मेहसूस कर रहा हूं । अपना ध्‍यान रखें । पिछली पोस्‍ट नहीं पढ़ी थी तथा पढ़ूंगा भी नहीं । आपसे मुझे ऊर्जा मिलती है ।
आपका ही अनुज
सुबीर

Mansoor Ali ने कहा…

modern saadhu ki sangat mein kya-kya padhne mil raha hai !

मैथिली गुप्त ने कहा…

साधु समीर, इसीलिये तो हम आपके ब्लाग पर आते हैं:)

अभिनव ने कहा…

:)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

समीर लाल जी।
आपने अपने मनोभावों को करीने से पेश किया है।
इस सजे-सँवरे आलेख के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत बड़ी तसल्ली है कि कम से कम लड़की देख रहा है

Nirmla Kapila ने कहा…

माना कि प्रगतिशील लोगों के मूँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगती मगर कई बातें भी तभी तक अच्छी लगती हैं जब तक दूसरों के साथ घटित हों वरना अच्छे अच्छे प्रगतिशील पटखनी खाये पड़े देखे हैं मैने.
सब से दमदार और सच्ची बात कही है संगत कीजे साधू की कहीं आपका इशारा समीर बाबा जी की ओर तो नहीं ? बडिया पोस्ट आभार्

AlbelaKhatri.com ने कहा…

sameerlalji,
sabse pahle toh aapko swasth aur mast dekh kar jo khushi hui aur hoti jaa rahi hai vah hamaare liye badi mahatvapoorna hai.,,dusri baat ye hai ki aap jo baar-baar is umra, is umra kaa dhol peette hain vah chor ki daadhi me tinke jaisa prateet hota hai .....

dada,
khoob enjoy karo...life ko...ye ishwer ki bahut badi den hai aur banda is den ka fan hai..

vaise bhi
BHUDHAAPE KI ADAAON KO KOI MAASOOM KYA JAANE ?
YAHIN AAKAR TOH MANZIL KA PATA MAALOOM HOTA HAI..........
aapne bahut hi umda aur raspoorna aalekh aaj prastut kiya hai
aapko naman
abhinandan !

P.N. Subramanian ने कहा…

क्या आपने आइवी के मन की बात जानने की कोशिश नहीं की.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

परेशानी में समझें शान
तभी संभलेंगे मेहमान

संगीता पुरी ने कहा…

चलिए भई .. आपकी तो निभ गयी .. हमें अपने बच्‍चों को सिखाना है .. संगत कीजिए साधु की .. नहीं नहीं , साध्‍वी की !!

अनिल कान्त : ने कहा…

अच्छी लगी आपकी पोस्ट :)

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

ये तो आप के एक पड़ोसी की बात है और न जाने कितनी दुखियारी एरेन, बहू का सपना तोड़ कर मन मार बैठी होंगी.

सोच कर तकलीफ़ सी हो रही है
संस्कृति पता नही कहाँ खो रही है,

cmpershad ने कहा…

"वैसे ही इसमें भी एक फायदा जरुर एरेन की माँ को हुआ होगा कि बहु सास वाली खटखट से बच गई .."

हां साहब! बच्चों को पालने की झंझट भी नहीं:)

>आने वाली बहू के लिए बधाई। तो एक और दावत की जबलपुर में तैयारी हो रही होगी। शुभकामनाएँ॥

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

खैर, ढूँढो तो कचरे में भी मोती मिल जाये. वैसे ही इसमें भी एक फायदा जरुर एरेन की माँ को हुआ होगा कि बहु सास वाली खटखट से बच गई और जो बहु की मूँह दिखाई और अन्य आयोजनों के लिए ज्वेलरी वगैरह सहेज कर रखी होगी, वो भी पूरी की पूरी खुद की हो गई. ठाठ से पहन कर घूमो!!

सही कहा आपने संगत कीजे साद्गू की...क्योंकि साधू जन हर बात मे अच्छाई ढुंढ ही लेते हैं जैसे आपने ढूंढ ली?

पर ई बताया जाये कि ये ठेलमठाली कहां से हो रही है?:)

रामराम.

गिरिजेश राव ने कहा…

अभी आभासी दुनिया का सच आना बाकी है। जब आदमी का पार्टनर 'रोबोट' होगा/होगी या होगागी।

जब चाहा जैसा चाहा प्रोग्राम कर लिया! वैसे सुना है कि अभी से उनके सम्भावित विद्रोह पर गुप्त बैठकें होनें लगी हैं।

कैसा जमाना आ गया है ! हम बुढ़ौती देख भी पाएँगे कि नहीं ?

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

यह लेख शायद आपकी डायरी का एक भाग है। जीवन के बेहद करीब और आत्मीय भी। जब चीजें अपने हाथों से छिटकनें लगती हैं तब उन्हें हम जनरेशन गैप की संज्ञा देने लग जाते हैं। यह संज्ञा ठीक भी है क्योंकि समय बदल रहा है और समय के साथ रिश्तों के मायने और दायरे भी।

anitakumar ने कहा…

जब आदमी आदमी न रह कर भगवान बनने की कौशिश करे तो ऐसा तो होना ही है, मेवे जैसे स्पर्म सहेजे फ़्रीजर में,मर्द भी जब जन्म देने लगे बच्चों को,टेस्ट ट्युब में पैदा किए बच्चे तो, तो प्रकृति सोचे एक मॉडल से काम चलता है तो दूसरा मॉडल क्युं बनाऊँ।

रचना ने कहा…

Read the full post at one go
no comments on content except that your writings have a depth

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बधाई हो दोनों लड़के सही दिशा में गए हैं...कम से कम खानदान तो चलेगा...वर्ना एरन और सेम के खानदान का तो बेंड बज गया समझो...आप यकीनन बहुत खूबसूरत जगह रहते हैं...लेक के पास...स्वप्न लोक में...वाह...इसकी भी बधाई स्वीकार करें...वैसे इस उम्र में पति पत्नी के अलग अलग कुर्सी पर बैठने में ही भलाई है वर्ना स्वास्थ्य बिगड़ने का अंदेशा रहता है...:))
नीरज

बी एस पाबला ने कहा…

क्या बात है समीर जी!

मौसम है आशिकाना… बेहतरीन स्कॉच का गिलास… हवा के साथ आती बारिश के पानी की छिटकन… अँधेरे कोने में अलग अलग कुर्सी पर बैठे मौसम का आनंद लिया जा रहा!!

नजर है, घूमना स्वभाव है :-) ऐसी बातें तभी अच्छी लगती हैं जब तक दूसरों के साथ घटित न हों

हम तो पटखनी खाये पड़े हैं आपकी योद्धा पोस्ट से क्योंकि जवाब तो पहले दिन ही महसुस हो गया था, फोन पर!!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

माँ दा लाडला बिगड़ गया |

कुश ने कहा…

काम की बात परफेक्ट तरीके से कहने का हुनर आप जानते है.. और वो भी रोचक अंदाज़ में.. इस बार भी आपने वही किया है..

"उस पार कोई परेशां होगा.." बहुत खूब लिखा है आपने..

कुश ने कहा…

काम की बात परफेक्ट तरीके से कहने का हुनर आप जानते है.. और वो भी रोचक अंदाज़ में.. इस बार भी आपने वही किया है..

"उस पार कोई परेशां होगा.." बहुत खूब लिखा है आपने..

अन्तर सोहिल ने कहा…

14-15-16 तीन दिन के छुट्टियां हैं, हमने तो 4-5 के ग्रुप में घूमने जाना तय किया है। पहले तो दो जने भी चले जाते थे।
लगता है कि अगर एक ही कमरा लेते हैं (बजट बचाने के लिये) तो होटल मैनेजर और स्टाफ घूरने ना लगे। ;)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

बहुत मजेदार.
हमारे चुन्नू-मुन्नू के लिए तो अभी से उनकी अम्मा तय करके बैठी है की कैसी बहुएँ लाएगी. मैं समझाने की कोशिश करता हूँ की "तुम्हें क्या पता पच्चीस साल बाद क्या ज़माना आ जाए".
मुझे झिड़की के सिवाय और क्या मिल सकता है?

परमजीत बाली ने कहा…

समीर जी,आप की यह पोस्ट भविष्य की ओर इशारा कर रही है.वैसे शुरूआत तो हो चुकी है.......आने वाले समय में ऐसे माँ बाप जरूर अपने भाग्य को सराहेगें जिन के बेटे लड़की से शादी करेगें।....वैसे एक बात तो आपने बहुत सही कहीं कि सास बहू की खटपट जरूर कम या कतम हो जाएगी...इससे।
बहुत बढिया रचना लिखी है।बधाई।

विवेक सिंह ने कहा…

अच्छा तो ये फोटू आपने भी लगा दिया,

पहले जब यह रोजाना अखबार में आता था तो बड़ा वाला लड़का एक दिन बड़े जोश में अखबार लेकर हमें दिखाने आया, और बोला : पापा ! देखो कैसे एक दूसरे का पर्स चुरा रहे हैं !

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

वाकई में आप तो धन्य हो ही गये होंगे ऐसा पड़ोस पाकर.:)

संजय बेंगाणी ने कहा…

साधु की संगत में तो कुँवारे रह जाएंगे महाराज :) किसी रसीया की संगत की बात करें :)

neelima sukhija arora ने कहा…

क्या कहें समीर जी, वाकई दुनिया में सब कुछ स्वीकार्य हो चुका है। लोगों के बारे में तो पता नहीं पर कहीं न कहीं एक पेरेंट के तौर पर आपका चिंतित होना उचित ही लगता है। खासकर जब आप भारत में नहीं है। कम से कम यहां यह सब कुछ इतना ओपन तो नही ही है।

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

साधुवाद

Puneet Sahalot ने कहा…

namastey uncle..!!

bahut dino baad aapke blog par aana hua. ye post me jo kuchh aapne bataya hai ab shayaad yaha bhaarat me b aam baat jo ho jaye... Delhi Highcourt or fir 477...

par ye sab baatein ek aam insaan ki samaj se to pare hi lagti h... ab kon jane kis k mann me kya h.. or sab apni marzi k maalik h to jo jiska jee chahe wo hi karega... rokne wale bhi rok nahi sakte h...

Arkjesh ने कहा…

"संगत कीजे साधु की..."
इसीलिये तो आ गये हम संगत करने ...
बात ठीक ही है, ऐसे कई काम हैं जो मां-बाप नहीं चाहते कि उनकी औलाद करें । इनमें से यह भी एक है ।

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

बेहतरीन लेख है बहुत पसंद आया

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sameer bhai aise nazaare to ab Bharat mein bhi dikhne lagenge.....thoda aur intezaar karo.....kaanuni maanyta to shayad mil hi gayee hai....samaajik maanyata bhi mil jaayegi......

Canada mein to aapne Barsaat ka aanand le liya.....hamaare Dubai mein to hum ye bhi nahi kah sakte..."CHALO JAANA DHOOP KA AANAND LEN" ......
JORDAAR KAVITA KE LIYE DHANYVAAD

Abhishek ने कहा…

बधाई हो.. शादी की मिठाई का क्या सीन है?

Ancore ने कहा…

"संगत कीजे साधु की..."
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं.......?

एकलव्य ने कहा…

यही तो फर्क है देश और विदेश के पडोसियो में . बड़ा सटीक सूक्ष्मलोकन कर आपने पोस्ट में आपने भावो को व्यक्त किया है जो सोचने के लिए विवश करते है . प्रस्तुति के लिए आभार.

'अदा' ने कहा…

समीर जी,
इस उम्र में आप अलग-अलग कुर्सी पर बैठते हो बहुत बुरी बात,,, वो भी ऐसे मैसम में,,,
हम तो सोच भी नहीं सकते,,,,
और टाक-झाँक तौबा-तौबा ,,,
कितना बुरा असर पड़ता होगा आपके पड़ोस में,,,
जोक्स अपार्ट, बहुत ही सुन्दर रचना, सामयिक तो हैं ही,,, मैं खुद न्यूयार्क मैं एक नज़ारा देख कर दंग रह गयी,, दो युवक सड़क पर चुम्बन लेने में लीन थे और दोनों की मूछें थी मैं आज भी सोच कर हँसते हँसते बेहाल हो जाती हूँ,,, जीवन में पहली बार ऐसा दृश्य देखा था,,,अज भी मेरे घर वाले मेरे चेहरे का भावः नहीं भूलते हैं,,,,
हा हा हा हा हा हा

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट है.

Atmaram Sharma ने कहा…

समीर भाई, लगता है यक्ष-प्रश्न स्मरण हो आया है और देखिये कि कमाल का मुद्दा छू दिया. हालाँकि - एक हारा हुआ योद्धा - में कविता सचमुच बहुत उच्च श्रेणी की थी.

रंजना ने कहा…

यही कोई आठ साल पहले की बात है,छोटा भाई उस समय कनाडा में ही था और उसने हमें फोन कर बताया कि उसका एक कनेडियन मित्र यहाँ आ रहा है,जिसे आतिथ्य की जिम्मेदारी हमारी है....
अस्तु, उसकी यथोचित आतिथ्य के बाद जब रात को सोने की बारी आई तो मेरे पतिदेव उन्हें साथ देने गए...क्योंकि अपने यहाँ रात को भी अतिथि को अकेले छोड़ना आतिथ्य धर्म की अवहेलना है..स्त्री हुई तो घर की कोई स्त्री सदस्य और पुरुष हुआ तो पुरुष सदस्य कमरे में साथ सोते हैं....उसने पतिदेव को अपने भर पूरा टालने की कोशिश की पर सफलता नहीं पायी...

अगले दिन छोटे भाई का मेल आया कि उसे अकेले सोने दिया जाय..क्योंकि उसका दोस्त बड़ा ही क्षुब्ध है कि वह चरित्र का बड़ा पक्का है, वह कोई गे तो नहीं जो किसी पुरुष के साथ सोयेगा.......

हम आशचर्यचकित ठगे से रह गए थे.....

खैर अब तो भारत के लिए भी यह बहुत ही सामान्य बात हो गयी है....हमें ही अपने को अभ्यस्त करना होगा यह सब देखने सुनने के लिए.....

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सटीक दर्शन बढ़िया भावः अभिव्यक्ति . आभार....

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर पोस्ट.....बहुत अच्छी लगी कविता. आभार.

हितेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा…

Bahut barhia...

http://hellomithilaa.blogspot.com
Mithilak Gap...Maithili me

http://muskuraahat.blogspot.com
Aapke Bheje Photo

http://mastgaane.blogspot.com
Manpasand Gaane

raj ने कहा…

HI,

I am a doctor living in UK(DURHAM).
The post made interstinf reading.I have 2 young children growing up in UK,and it worries me to see how the English culture might affect them!

Thanks you

poemsnpuja ने कहा…

badi soch samajh kar sangat karni padti hai aajkal to...pahle to bas yahi dhamkaaya jaata tha ghar me ladkon se door raho...jald hi wo din bhi aane wala hai ki ladkiyan jab ghar se niklengei to mummy hidayat degi...beti pasand tumhari khud ki hai...kamse kam ladke ko pasand karna :)jaisa bhi ho, ham adjust kar lenge :)

Reetesh Gupta ने कहा…

लालाजी,
हर बार की तरह भावनाओं से ओतप्रोत लेखन...
मैंने पहले भी कहा है आपकी लेखनी में माँ सरस्वती विराजमान हैं....आपका मन और भावनायें यूँ ही बनी रहें....बधाई

भूतनाथ ने कहा…

कभी-कभी तो यूँ सोचने में बेशक कैसा-सा तो लगता है....मगर यह भी तो सच है कि उसके बाद हम वहीँ...उन्हीं चीज़ों में उलझे रह जाते हैं....गोया कि यही हमारा चुनाव है....!!
हाँ सच समीर कोई उस पार भी हैरान है...परेशान है....!!बेशक सब लोग अपनी ही तरह के होते हैं....बेशक सबको अपनी ही तरह होने की स्वाभाविकता और स्वाधीनता है....फिर भी कुछ बातें जो आदमी के कैजुअल स्वभाव के थोडा विपरीत लगती हैं...इसलिए अजीब भी लगती हैं....बेशक शायद यह नैतिकता वाला मामला ना भी हो...मगर असंगत तो प्रतीत होता है....फिर भी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता,क्यूंकि यह भी मेरी नज़र में असंगत है....हाँ मगर आपकी कविता मुझे अजीब से ढंग से छू सी गयी है...उसके लिए आपका आभार....!!

भूतनाथ ने कहा…

कभी-कभी तो यूँ सोचने में बेशक कैसा-सा तो लगता है....मगर यह भी तो सच है कि उसके बाद हम वहीँ...उन्हीं चीज़ों में उलझे रह जाते हैं....गोया कि यही हमारा चुनाव है....!!
हाँ सच समीर कोई उस पार भी हैरान है...परेशान है....!!बेशक सब लोग अपनी ही तरह के होते हैं....बेशक सबको अपनी ही तरह होने की स्वाभाविकता और स्वाधीनता है....फिर भी कुछ बातें जो आदमी के कैजुअल स्वभाव के थोडा विपरीत लगती हैं...इसलिए अजीब भी लगती हैं....बेशक शायद यह नैतिकता वाला मामला ना भी हो...मगर असंगत तो प्रतीत होता है....फिर भी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता,क्यूंकि यह भी मेरी नज़र में असंगत है....हाँ मगर आपकी कविता मुझे अजीब से ढंग से छू सी गयी है...उसके लिए आपका आभार....!!

alka sarwat ने कहा…

आप भी हैरान परेशान हो गये .अभी तक तो मैं दो ही हैरान परेशान से परेशान थी ,एक तो ब्लाग स्पाट.काम पर थे ,दूसरे ये हैरान परेशान बिहार की राष्ट्रीय बीमारी है ,आपकी हैरानी परेशानी किसी तीसरी कटेगरी की है क्या ?

निपुण पाण्डेय ने कहा…

समीर जी ,

हमारी तरफ से भी शुभकामनाये आपकी अगली जनरेशन के लिए .....:)
लेख बहुत अच्छा है
पता नहीं प्रगतिशील समाज कैसे सब कुछ उचित मान लेता है ....:)
कुछ दिनों पहले मैंने भी इसी विषय पर कुछ लिखा था और २-४ दिन बाद ही कहीं ब्लोग्स पे कुछ कुछ अपने बारे में ही पढने को मिल रहा था ......

sarwat m ने कहा…

समीर भाई, यह बीमारी नई नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहली चोरी छुपे होता था, अब खुल्लम खल्ला.आप तो गोरखपुर से हैं और फिराक गोरखपुरी इस मामले में मशहूर रहे हैं. अपने देश में भी अब खुल्लम खुल्ला वाला मामला तेज़ हो गया है. अभी जब सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में राहत देने के संकेत दिए थे तो लखनऊ में भी 'लैंगिकों' ने एक बडा जुलूस निकला था. मुंबई में तो इनकी संख्या बता पाना मुश्किल है. आप की दृष्टि अच्छी है, कविता हमेशा की तरह बेहतरीन है... और हाँ... आप मुझे बिलकुल ही भूल गये ना!

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

समीर जी आपने सही मैं गंगा नहा लिया |

दर लगता है अपने से नहीं बेटों से पता नहीं स्वछंदता की दुहाई देकर कब कह दे पापा ये लो आपकी बहु ... नहीं बहु नहीं शायद बहा ...

venus kesari ने कहा…

आपकी खरी खरी पोस्ट पढ़ कर दिल खुश हो गया


आपकी पिछली पोस्ट आधी अपढ़ कर छोड़ दी थी पूरी पढी ही नहीं और न ही कमेन्ट किया था क्योकि मुझे समझ ही नहीं आया था की इस पोस्ट पर मई क्या कहूं

वीनस केसरी

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बधाई हो सच में गंगा नहा लिए ..बहुत खूबी से आपने अपनी बात कह दी है ..

swati ने कहा…

aapki lekhan kala ka jawaab nahi.....

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

मैं तो साधुओं की संगत से इसलिए दूर रहता हूं कि कही लोग मुझे भी साधू ही न समझ लें :-|)

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

"बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठे, 'मौसम है आशिकाना, ऐ दिल कहीं से उनको...' पाकीज़ा के गीत की मद्धम आवाज, बेहतरीन स्कॉच का गिलास और उस पर से हवा के साथ आती बारिश के पानी की छिटकन..आह्ह!!!"

हाई-हाई.......!@ किसी को नशा है, जहां में खुशी का, किसी को नशा है गम-ए-जिन्दगी का.......!!
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"....बरामदे के अँधेरे कोने में कुर्सी पर बैठे(अलग अलग कुर्सी पर :)) हम मियाँ बीबी मौसम का आनन्द ले रहे थे. ज्यादा सोचो मत,......."

जनाव, हम खूब समझते है एक "ही" कुर्सी पर न बैठ पाने की मजबूरी :-))

जितेन्द़ भगत ने कहा…

समस्‍या को सही अंदाज में पेश कि‍या आपने।

योगेश स्वप्न ने कहा…

sameer lal ji , kisi bhi vishay ko bada interesting bana ka likhte hain , bahut badi quality hai. lekh achcha laga.

amit ने कहा…

मैथिली जी की टिप्पणी को अपन मानते हैं लेकिन संजय भाई ने जो बात कही है वह भी विचारणीय है। लेकिन मेरे ख्याल से रसिया व्यक्ति सैटल नहीं हो सकते, भटकते ही रहते हैं इस फूल से उस फूल, वे भी एक तरह के साधु ही हुए जो एक जगह सैटल नहीं हो सकते।

आपकी एक्सपर्ट राय क्या है समीर जी इस विषय में?

और कनाडा में बैठे-२ गंगा स्नान की डबल बधाई, एक स्नान की अनुभूति की और एक उस कारण की जिसके चलते यह अनुभूति हुई! :)

बाकी मैं समझता हूँ कि समलैंगिक संबन्ध पहले जमाने में भी होते होंगे लेकिन आज की तरह खुलापन न होने के कारण इतने रोशनी में नहीं आते थे, इग्नोर किए जाते थे।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

बहू मिली तो लाखो पाए , अबकी बार ही सही लड्डू तो खिलवाये

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

समाज-विहारों-मठों में क्रिस एरन वाला कल्चर बहुत समय से रहा होगा। अन्यथा वे अभी पटपट कर सामने न आये होते।
सब भगवान के जीव हैं। :)

KK Yadav ने कहा…

Ek bar Ayodhya ke sadhuon ke chakkar men pad gaya tha...tab se dur se hi Ram-Ram !!

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. "शब्द सृजन की ओर" पर इस बार-"समग्र रूप में देखें स्वाधीनता को"

शिवम् मिश्रा ने कहा…

=--..__..-=-._.
!=--..__..-=-._;
!=- -..@..-=-._;
!=--..__..-=-._;
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HAPPY INDEPENDENCE DAY
..
Jai Hind, Jai Bharat.

vikram7 ने कहा…

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

bhut hi achhe visay ko utha ya hai aap ne duniya kahan se kahan jaa rahi hai kya is girte mahoul me hum apni sanskrti sabhyta aur bhartiyta ki rachha kkr paayege yeg gahra prshn hai
saadar
praveen pathik

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

....Par ab to sadhu ki paribhasha bhi badal gai hai.kahan-kahan khojen.

स्‍वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं. स्वतंत्रता रूपी हमारी क्रान्ति करवटें लेती हुयी लोकचेतना की उत्ताल तरंगों से आप्लावित है।....देखें "शब्द-शिखर" पर !!

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

"संगत कीजे साधु की" अपने पड़ोस के साधुओं से तो आपने मिलवा ही दिया..:) बस डर है कि सत्संग का कहीं असर न हो जाये, सुना है सत्संग में बड़ी महिमा होती है।

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

नमस्कार समीर जी हम कहा से कहाँ जा रहे है और आगे कहा जायेगे इस कथित प्रगति के नशे में कुछ पता नहीं
सादर
प्रवीण पथिक

शरद कोकास ने कहा…

समीर भाई कितनी सरलता से आप इस उत्तर आधुनिक युग का सत्य बखान कर गये.ऐसा नहीं है कि संस्कृति का यह वर्तमान स्वरूप हम भारतीयों को ही व्यथित करता हो .आप देखियेगा आप के पड़ोस मे और भी ऐसे लोग होंगे.शायद 50 वर्ष बाद यह सब कुछ स्वाभाविक सा लगता प्रतीत हो.. लेकिन तब हम कहाँ होंगे ..कविता अच्छी लगी ..यह उस द्रश्य का असर है जिसे आपने छत से इतर देखा है ..

संजीव गौतम ने कहा…

कई बातें भी तभी तक अच्छी लगती हैं जब तक दूसरों के साथ घटित हों वरना अच्छे अच्छे प्रगतिशील पटखनी खाये पड़े देखे हैं मैने.
आज की उपलब्धि

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

अच्‍छा हुआ आपने क्षमा मांग ली वरना...

दरअसल अमिताभ बच्‍चन को हारे हुए योद्धा के रूप में नहीं देख सकते उसी तरह स्‍टार ब्‍लॉगर को हताश नहीं देख सकते।


गंगा तो नहा लिए अब चार धाम की तैयारी यानि दूसरे सुपुत्र के विवाह की। पहली बार प्रमोशन हुआ स-सुर के रूप में इस बार इंक्रीमेंट लगेगा।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

बरामदे के अँधेरे कोने में कुर्सी पर बैठे(अलग अलग कुर्सी पर :)) हम मियाँ बीबी मौसम का आनन्द ले रहे थे. ज्यादा सोचो मत, इस उम्र में अलग अलग कुर्सी पर बैठ कर ही मौसम का सही आनन्द लिया जाता है. रह रह कर बिजली चमकती और पूरा एरिया चमक उठता. ऐसे में मेरी नजर एरेन के घर की बालकनी पर पड़ गई. नजर है, घूमना स्वभाव है, घूम गई.
एरेन और क्रिस भी मौसम की रुमानियत में डूबे, एक दूसरे से आलिंगनबद्ध मद्धम गति के नाच में मशगूल हैं. वाईन का गिलास भी सामने दीवार पर रखे हैं. इरादे कुछ नेक नहीं. वैसे पति पत्नी ही तो हैं तो फिर इरादों की नेकता पर क्या प्रश्नचिन्ह !!

bahut hi behtar andaz.badhai!

Manish Kumar ने कहा…

जानकर खुशी हुई कि ऍसे पड़ोसियों और समाज की संगत का असर आपके परिवार तक नहीं पहुँचा है। वैसे इधर तो शुरुआती दौर है शायद ऐसी हवा कुछ दशकों में भारत भूमि पर भी बहने लगे।

PRAN SHARMA ने कहा…

SAMEER JEE ,KYA HEE KHOOB KAHAA HAI
AAPNE-- SANKAT KEEJE SADHU KEE
KABHEE MERE HRIDAY SE BHEE
YE UDGAAR NIKLE THE--
SANT SAREEKHA KOEE SAATHEE
MIL JAAYE TO BAAT BANE
NAS-NAS KO MAHKAA DETEE HAI
IK LAKDEE HEE CHANDAN KEE
BHAI SAHIB ,AAPKI LEKHNI
KE AAGE NATMASTAK HOON.DHERON HEE
SHUBH KAMNAYEN AAPKO AUR PARIWAR-
JANON KO.

Shefali Pande ने कहा…

बहुत मुश्किल ज़माना आ गया है ..आगे आगे देखिये होता है क्या ? एक विचारणीय पोस्ट के लिए बधाई ..

अभिषेक ओझा ने कहा…

आने वाली पीढी तो पता नहीं क्या-क्या दिखाएगी :)

विनय ओझा 'स्नेहिल' ने कहा…

sameer jee gay culture ke oopar bahut badhiyaa vyang laga. aap vyang ke madhyam se bahut badee samasya kee or ishara kiya jiska samna kisee bhee baap ko kabhee bhee karna pad sakta hai. Main to sochkar sihar uthta hun.

विनय ओझा 'स्नेहिल' ने कहा…

bahut badhiyaa sameer ji.aap kee kalm yun hee asardaar tareeke se chaltee rahe.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

Very True...All the Progressive ideas seem good till they are with some strangers ...& not within your immediate FAMILY ...

Good Post ...Sameer bhai, &
good poem too ...

my sympathies & good wishes are still with Aren & Chris ...

Tomorrow -
- is another DAY , INDEED !!

berojgar ने कहा…

maza aa gaya sir ji...par 'eren wala' nahi..

रामकृष्ण गौतम ने कहा…

"संगत कीजे साधू की" यही अपने आप में काफी है सर!
गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं!

महफूज़ अली ने कहा…

waaqai mein sangat bahut hi soch samajhkar karni padti hai.......

ab kya kahen aise vikirit logon ko........ kul mila ke .....padh kar bahut mazaa aaya......

कमलेश वर्मा ने कहा…

समीर भाई ,आप को मेरा उत्साह बढाने एवम त्रुटियों को दूर करने की सलाह लिए मै आपका आभारी हूँ ,और भविष्य के लिए आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखता हूँ ,धन्यवाद ;

Pushpendra Paliwal ने कहा…

बड़ा interesting पड़ोस है आपका.