गुरुवार, फ़रवरी 14, 2008

बीबी तो इन्तजार करेगी ही..

चार दिन बाद गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से लौटा. बचपन में भी हर साल ही गोरखपुर जाना होता था. ननिहाल और ददिहाल दोनों ही वहाँ हैं. तब तीन दिन की रेल यात्रा करते हुए राजस्थान से थर्ड क्लास में जाया करते थे. कोयले वाले इंजन की रेल. साथ होते लोहे के बक्से, होल्डाल, पूरी, आलू और करेले की तरकारी. सुराही में एकदम ठंडा पानी. रास्ते में मूंगफली, चने, कुल्हड़ में चाय. फट्टी बजाकर गाना गा गा कर पैसा मांगते बच्चे.राजनित और न जाने किन किन समस्याओं पर बहस करते वो अनजान सहयात्री जिनके रहते इतने लम्बे सफर का पता ही नहीं चलता था.तीन दिन बाद जब घर पहुँचते तो कुछ तो ईश्वरीय देन( खुद का रंग) और कुछ रेल की मेहरबानी, लगता कि जैसे कोयले में नहाये हुए हैं. इक्के या टांगे में लद कर नानी/दादी के घर पहुँचते थे. फिर पतंग उड़ाना, मिट्टी के खिलोने-शेरे, भालू.हर यात्रा याददाश्त बन जाती. जैसे ही वापस लौटते, अगले बरस फिर से जाने का इन्तजार लग जाता.घर लौट कर फट्टी वालों की नकल करते, उनके जैसे ही गाने की कोशिश,
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इस बार जब गोरखपुर से चला तो वही पुराने दिनों की याद ने घेर लिया. मगर एसी डिब्बे में वो आनन्द कहाँ? और यात्रा भी मात्र १६ घंटे की. यही सोच कर एसी अटेंडेन्ट को सामान का तकादा कर कुछ स्टेशनों के लिए जनरल डिब्बे में आकर बैठ गया. कितना बदल गया है सब कुछ. काफी साफ सुथरा माहौल. न तो कोई बीड़ी पी रहा था. न बाथरुम से उठती गंध, न मूंगफली वाले, न कुल्हड़ वाली चाय. जगह जगह ताजे फलों की फेरी लगाते फेरीवाले, प्लास्टिक के कप में बेस्वादु चाय, कुरकुरे और अंकल चिप्स बेचते नमकीन वाले. बस्स!! लोहे की संदुक की जगह वीआईपी और सफारी के लगेज जिनके पहियों ने न जाने कितने कुलियों की आजिविका को रौंद दिया, वाटर बाटल में पानी. आपसी बातचीत का प्रचलन भी समाप्त सा लगा, अपने सेलफोन से गाने बजाते मगन लोगों की भीड़ में न जाने कहाँ खो गये वो हृदय की गहराई से गाते फट्टी वाले बच्चे और राजनित पर बात करते सहयात्री.

कहते है सब विकास की राह पर है. वाकई, बहुत विकास हो रहा है. आम शहरों में न बिजली, न पानी, न ठीकठाक सड़कें..बस विकास हो रहा है. बच्चे बच्चे के हाथ में सेल फोन, तरह तरह की गाड़ी, सीमित जमीनों के बढ़ते दाम, लोगों के सर पर ऋणों का पहाड़, हर गांव-शहर से महानगरों को रोजगारोन्मुख पलायन करते युवक, युवतियाँ. भारत शाईनिंग-मगर मुझे पुकारता मेरे बचपन का भारत-जिसे ढ़ूंढ़ने मैं आया था, न जाने कहाँ खो गया है और अखबार की खबरें कहती है कि इसी के साथ ही खो गई है वो सहिष्णुता, सहनशीलता, आपसी सदभाव और सर्वधर्म भाईचारा. सब अपने आप में मगन हैं.

मुझे बोरियत होने लगती है. मैं उठकर अपने एसी डिब्बे में वापस आ जाता हूँ और खो जाता हूँ शिवानी की किताब ’अतिथी’ में. सामने की बर्थ पर बैठी महिला कोई मोटा अंग्रेजी उपन्यास पढ़ रही है और उसके ipod के ईयर फोन से बाहर तक सुनाई देती अंग्रेजी गाने की घुन माहौल को संगीतमय बना रही है.

उसी महिला को देखकर न जाने क्यूँ अनायास ही याद आ गया-ओह!! आज तो वेलेन्टाईन डे है. :)

सोचता हूँ घर जाते समय एक गुलाब खरीद लूँगा-बीबी इन्तजार कर रही होगी. अब मैं इस त्यौहार को मानूँ न मानूँ-क्या फरक पड़ता है. बीबी तो गुलाब का इन्तजार करेगी ही-यही आज के जमाने का चलन है. साथ तो चलना होगा.

पुन्श्चः मैं किसी विकास के विरोध में बात नहीं कर रहा. बस, आज कल याददाश्त के साथ कुछ पंगा हो रहा है, तभी तो उस मोहतरमा को देखकर वेलेन्टाईन डे याद आया वरना तो भूल ही गये थे.इसीलिये मेरी याद के पुराने भारत के लापता हो जाने पर उसका हुलिया लिपिबद्ध कर रहा हूँ ताकि दर्ज रहे और याददाश्त बनी रहे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

39 टिप्‍पणियां:

david santos ने कहा…

Hi, Udan!
Thanks for your posting.

Happy Valentine,`s Day!

कमलेश मदान ने कहा…

आप आये वैलेन्टाइन से सॉरी! बहार आयी

masijeevi ने कहा…

क्‍या मित्र अपनी स्मृति का संभालिए ।।
रेलवे की इतनी तारीफ स्पॉंसर्ड लेखन है क्‍या... :)

Gyandutt Pandey ने कहा…

अरे, अब पता चला कि पत्नीजी को वेलेण्टाइन दिवस पर फूल देना चाहिये। शाम हो गयी है - अब तो फूल तोड़ना भी पाप है।
धर्मसंकट में डाल दिया! :-)

रंजू ने कहा…

बहुत दिनों के बाद आपका लिखा पढ़ा ..अच्छा लगा !!

sunita (shanoo) ने कहा…

आप हर रोज क्यों नही उन्हे गुलाब देते...क्या प्यार एक ही दिन के लिये होता है...हर रोज दिजिये फ़िर देखिये उन्हे कभी इन्तजार न होगा की गुलाब आने वाला है और ना ही कभी आप भूलेंगे की गुलाब आज ही ले जाना है...एवरी डे इज वेलेन्टाइन डे...

Tarun ने कहा…

humari samajh ke sang panga ho reha hai aapki yadast ke saath, kahin hawa me hi to koi locha nahi hai.....global warning type.

To aapne bhi "cha" bara karhi liya :)

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आप की रेल यात्रा में छुपी पीड़ा को मैं समझ रहा हूँ...विकास की कीमत चुकानी पड़ती है और ये कीमत सच में बहुत ज्यादा है..हम अपने आप में ही सिमट गए हैं...बहुत अच्छा लगा आप को पढ़ना...यूँ ही थोड़े ही लोग आप की अनुपस्तिथी को महसूस करते थे. आप भी कमो-बेश उस युग के हैं जिस के की हम हैं और हमारे युग की पत्नी अब फूल देने पे कहती है " छोडो भी... ये चोंचले शोभा नहीं देते जी आप को..."
नीरज

rajivtaneja ने कहा…

आपको पुन: सक्रिय देख कर अच्छा लग रहा है.....

अपना तो रोज़ का काम है रेल में सफर करना....

आपने बहुत दिनों या सालों बाद किया ..इसलिए आप बदलाव महसूस कर रहे हैँ

सही है कि ...दुनिया बदल रही ..लोग बदल रहे हैं....

यारी-दोस्ती सबके मायने बदल रहे हैँ
कोशिश यही करें कि इस आपाधापी भरे माहौल में में हम आप ना बदलें.....

Manish ने कहा…

बाकी बातें तो आपने सही पकड़ी पर राजनीति या किसी अन्य विषय पर बहसबाजी तो अब भी आम है रेल के डिब्बों में। शायद आपके डील डौल को देख कर सामने वाले हिम्मत नहीं कर पाए होंगे बोलने की :)

Rajesh Roshan ने कहा…

यादे अमूल्य होती है और बदलाव प्रकृति का नियम फ़िर कुछ बदलाव अच्छे के लिए हों हो इसमे बुराई कुछ नही है. अच्छा लिखा है आपने

सुजाता ने कहा…

अब मैं इस त्यौहार को मानूँ न मानूँ-क्या फरक पड़ता है. बीबी तो गुलाब का इन्तजार करेगी ही-
***
क्या उलटा हो जाए । क्या पता बीवी ही गुलाब लेकर आपका [?] इंतज़ार करती मिले ...
:-D

सिरिल गुप्त ने कहा…

इतने दिनों बाद आये हैं आप! अब जमे रहियेगा, ब्लाग जगत को आपकी कमी महसूस हो रही थी.

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

प्रेम के इजहार में इससे सुंदर और कोई उपहार हो ही नही सकता , किंतु सिर्फ़ वैलेन्टाइन डे में ही क्यों , अन्य दिन क्यों नही ?

yunus ने कहा…

वाह भैया अच्‍छा ये है कि आप धीरे धीरे फिर से नजर आने लगे हैं । वरना तो हम गुमशुदा की तलाश वाले विज्ञापन देने वाले थे । चलिए अब चाहे रेल पर लिखें या तांगे पर वेलेन्‍टाईन पर या लोटे पर । बस मौजूद रहिए ।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

गए काम से गुरुदेव……पिछली पोस्ट और यह आज की पोस्ट बता रही है कि सरक रहे हो बुढ़ापे की ओर धीरे-धीरे, बीते समय की याद और उसकी आज से तुलना, यह सटीक लक्षण है बुढ़ापे का!! ;)

आवृति बढ़ाएं।

वैसे वादे के मुताबिक इस भारत यात्रा के दौरान बासी और चटनी छत्तीसगढ़ में आपका इंतजार कर रही है आदरणीय!!

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

भैया राजस्थान से कहाँ से जाया करते थे। इधर बाराँ से कोटा तक तो हमने उन दिनों रोज ही कोयले वाली रेल का सफर किया है। हर स्टेशन पर रुकने और बीच में किसी किसी स्टेशन पर पानी पीने वाली रेल याद बहुत आती है।
गुलाब की खूब याद दिलाई सुबह से चार बार आँखों ही आँखों में थमा चुके हैं एक दूसरे को, पाँचवें का नंम्बर आने वाला है।

Reetesh Gupta ने कहा…

अच्छा लगा पढ़कर ...बधाई

Lavanyam - Antarman ने कहा…

अरे ...सच मेरे सपनों में बसा भारत इतना बदल गया है क्या ?

आपको और भाभी जी को भी बधाई वेलेंटाइन दे की
Do keep writing -
- we miss your august presence in HINDI BLOG WORLD --

PD ने कहा…

Main to phul lekar ghumta rah gaya...
koi nahi li mera phul... :(
anyway, happy V.day to all of you.. :D

आशीष ने कहा…

महाराज आपने किस जमाने की बात की है

अरुण ने कहा…

yये रेल दिल्ली नही आती क्या,हमने तो कल भी पता किया था अभी भी जबलपुर दिल्ली के बीच रेल सेवा चालू है जी..आप दिल्ली आ जाये हम आपको आपकी पसंद दीदा रेल यात्रा अवश्य करायेगे..वही बीडी के धुये वाली ..:)

विस्फोट ने कहा…

इन बदलावों को विकास कह दिया गया है.
जिन छोटे-छोटे बदलावों का आपने जिक्र किया है उसकी और हम कितना ध्यान दे रहे हैं यह टिप्पणियों से पता चल रहा है.
भारत धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और लोग विकास के पीछे भाग रहे हैं. हो सकता है विकास पूरी तरह से आ जाए लेकिन तब न भारत रहेगा और न ही इंसानियत.
विकास के नाम पर जीवंत मिट्टी को हम प्लास्टिक और लोहे का कबाड़ बना देने पर आमादा हैं.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

जानकर अतीव प्रसन्नता सी महसूस हुई कि आप गोरखपुर के रहने वाले हैं। चूंकि मेरी भी ससुराल गोरखपुर में है, इसलिए आपसे एक प्रकार की निकटता सी महसूस हो रही है।

संजय बेंगाणी ने कहा…

तो हनिमून समाप्त हुआ :)


हैप्पी वेलेंटाइन डे...मुझ से तो उच्चारण ही नहीं होता.

पूराने सफर याद हो आये...

Rohit Tripathi ने कहा…

Bahut bahut sundar likha aapne samir ji.. aapki tippaniya to bahut jagah padhii thi aaj aapke lekhan ka bhi swad liya aur swad bhi aisa ki ab hamesha ke liye aadta pad jayegi hume iski....... bahut acha likha aapne
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Rohit Tripathi ने कहा…

धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

:-), :-)

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Priyankar ने कहा…

अरसे बाद लौटे, पर इतनी अच्छी पोस्ट लेकर सो सब दोष माफ़ .

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

समीर जी
बहुत खूब

' ने कहा…

बीती बाते याद कर बड़ी सुखद अनुभूति होती है . आगे यह भी तो बताये कि फिर क्या आपने वैलेंटाइन के दिन भाभी जी को गुलाब का फूल देकर आपने प्रेम का इज़हार किया . हाँ सर एक बात याद आ गयी कि कहते है कि पुराने जमाने मे लोग आपने प्रेम का इज़हार सांकेतात्मक तरीके से कर लिया करते थे तो किसी को कानोकण खबर भी न होती थी . पर अब तो फूल देकर इज़हार करना पड़ता है .इसमे ख़तरे भी कम नही है कहीन किसी ने देखा लिया तो हा हा हा

बेनामी ने कहा…

wah bhai aapnerailyaatraka tulnaatmak chitrankanpathneeya shabdo me kiya.
badhaee

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

किस जनरल डिब्बे की बात कर रहें हैं आप ? बाथ रूम की गंध से तो ए सी वाले डिब्बे भी गंधा रहे हैं ।
शायद आप के गुलाब की खुशबू ने आपको सराबोर कर दिया ।
अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी पढ कर बहुत अच्छा लगा ।

अतुल शर्मा ने कहा…

रेल के साथ यादों का भी सफर!
अच्छा लगा

महावीर ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपकी रेल यात्रा का वर्णन। "मगर मुझे पुकारता मेरे बचपन का भारत - जिसे ढूंढने में आया था, न जाने कहां खो गया है।" - पढ़ कर रेलों के सफर की यादें ताज़ा हो गईं।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' ने कहा…

मैं किसी विकास के विरोध में बात नहीं कर रहा. बस, आज कल याददाश्त के साथ कुछ पंगा हो रहा है, तभी तो उस मोहतरमा को देखकर वेलेन्टाईन डे याद आया वरना तो भूल ही गये थे.इसीलिये मेरी याद के पुराने भारत के लापता हो जाने पर उसका हुलिया लिपिबद्ध कर रहा हूँ ताकि दर्ज रहे और याददाश्त बनी रहे.
baat to bilkul sahee hai beetee yaado ko
aise hee sanjonaa ham kalamkaaron kee zindagee kaa maqsad hai...
badhaaiyaan

अजय यादव ने कहा…

आपकी सक्रियता (जो इस बीच कुछ कम नज़र आ रही थी और अब उम्मीद है कि फिर से अपनी पुरानी रंगत में होगी) को देखकर आपकी याददाश्त पर संदेह होता तो नहीं... पर आप कहते हैं तो मान लेते हैं! वैसे इस महिला विशेष को देखकर ही आपको ’वैलेन्टाइन डे’ याद क्यों आया? कुछ घपला तो नहीं है....... :)

- अजय यादव
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http://intermittent-thoughts.blogspot.com/

anitakumar ने कहा…

समीर जी आप वापस आ गये वेरी गुड, जरा देर से देख रही हूँ पर फ़िर भी आप दोनों को वेलेन्टाइन की शुभकाम्नाएं, फ़ूल ले जाना याद रहा कि नहीं?

amit ने कहा…

एसी अटेंडेन्ट को सामान का तकादा कर कुछ स्टेशनों के लिए जनरल डिब्बे में आकर बैठ गया. कितना बदल गया है सब कुछ. काफी साफ सुथरा माहौल. न तो कोई बीड़ी पी रहा था. न बाथरुम से उठती गंध, न मूंगफली वाले, न कुल्हड़ वाली चाय.

अरे एक वर्ष में इतना बदलाव आ गया क्या? पिछले वर्ष जब मैं दिल्ली से झांसी(खजुराहो यात्रा पर) स्लीपर में गया था तो पास ही मौजूद शौचालय से आती तीव्र दुर्गन्ध नथुनों में जबरन घुसे जा रही थी। :( बाकी कुल्हड़ में चाय मिलना तो अब स्टैन्डर्ड है, हर स्टेशन आदि पर मिलती है, आखिर लालू जी हैं रेल मंत्री। :) अब चूंकि मेरी ट्रेन रात्रि की थी तो इसलिए मूँगफली आदि बेचने वाले कोई न दिखे! :)

Dr.Bhawna ने कहा…

समीर जी देर से आना हुआ किन्तु एक अच्छा लेख पढ़ने को मिला बधाई स्वीकारें...