बुधवार, अगस्त 22, 2007

चूं चूं चीं चीं और हम लोग!!

इस कविता के वास्ते मैने अपने पाठकों, जो कि अधिकतर चिट्ठाकार भी हैं, तीन वर्गों में बाँट दिया है.

पहला वर्ग जो कि 'अ' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ एवं नीचे.
दूसरा वर्ग जो कि 'ब' कहलायेगा कि उम्र सीमा १२ से ६५ वर्ष
तीसरा वर्ग जो कि 'स' कहलायेगा कि उम्र सीमा ६५ वर्ष एवं उपर...?? (उपर का अर्थ सिधार चुकों से न लगाये. इसका मतलब है 65+)


यह कविता 'अ' वर्ग के लिये रची गयी है, वो इसे पूर्णतः रोचक, मनोरंजक ओर ज्ञानवर्धक पायेंगे.

यह कविता 'ब' वर्ग के उन लोगों के लिये भी है जो 'अ' वर्ग की मातायें हैं. 'अ' वर्ग के पिता इसे बेतुका, वाहियात और बकवास मानेंगे अन्य नापसंद करने वाले वर्ग के साथ. इसमें इस कविता का दोष नहीं है. इसमें उनका दर्शन दोष है. उन्हें हर चीज में दोष नजर आता है.राजनेता दोषी-जबकि हैं उनके द्वारा चुने गये. अर्थ व्यवस्थता दोषी, राजनीति दोषी..जब पूछो-क्या आप चुनाव लड़ेंगे इसे सुधारने के लिये? तब उनसे सुनिये कि हम इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहते, हमें यह पसंद नहीं. खुद कुछ करना नहीं बाकि सब दोषी. उन्हें स्वभावतः यह कविता पसंद नही आयेगी. जबकि इसका स्टेन्डर्ड साहित्यिक है-बाल साहित्य.

मगर 'ब' और 'स' वर्ग में भी ऐसे लोग हैं जो प्रोफाईल उम्र के हिसाब से इस वर्ग में आ गये हैं मगर हरकत अभी भी वर्ग 'अ' की है, उनकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतजार है. हाल यह है कि तुमने मुझे क्यूँ छेड़ा भले ही मैने तुम्हें छेड़ा हो..मैं तो विवाद करुँगा. जो कह लो वो रुठ ही जायेंगे. हर बात में बच्चों की तरह झगड़ना. उस दिन तुमने मुझको परेशान किया था न...आज मैं करुँगा. सारे दोस्तों को बताऊँगा कि तुम गंदे हो. फसाद करवाऊँगा. फिर हसूंगा. शायद उनको भी यह रचना हरकतों के हिसाब से आंकी गई उम्र के कारण उपयुक्त लगे. कोई कह तो दे कि कौआ तुम्हारे कान ले गया, बस दौड़ पड़े कौए के पीछे. अरे भाई, एक बार कान तो चैक कर लो कि ले भी गया है कि नहीं?

यह उनके लिये भी राम बाण सिद्ध हो सकती है जो अपने दोस्तों के बच्चों के पोयेट्रिक काम्पिटेन्स (बेटा, अंकल को पोयेट्री सुनाओ के जबाब में) में जैक एण्ड जिल सालों से झेलते चले आ रहे हैं या फिर मछली जल की रानी है सुन सुन कर पक गये हैं. कम से कम एक नई कविता स्टॉक में आयेगी. आप उन बच्चों को यह कविता प्रिंट करके गिफ्ट स्वरुप दे सकते हैं. यह जनहित का कार्य कहलायेगा. बाकि के लोग भी जैक एण्ड जिल से बच जायेंगे.

वर्ग 'स' इसे नाती पोतों के लिये पसंद करेगा और हमारा अहसान भरेगा. साथ ही उम्र रिवर्सल ऑफ्टर ६५ के सिद्धांत पर उन्हें खुद भी यह पसंद आयेगी.

पाठ्य पुस्तक निगम वाले अगर चाहें तो मुझसे संपर्क करें, उन्हें मैं दे दूँगा इस कविता के सारे अधिकार बहुते सस्ते में.

अब कारण मत पूछिये कि हमने यह कविता क्यूँ रची? ठीक है नहीं मानते हैं तो आगे कभी पोस्ट में बताते हैं कि क्या कारण बना कि हम बाल कविता रच गये. चिट्ठा साहित्य का इतिहास इसका गवाह रहेगा.. इंतजार करिये न!!!

इन्तजार तो खैर करते रहियेगा... पहले के भी बहुत सारे वादों को पूरा करने का इन्तजार हमारे भारत के प्रधान मंत्री बनने की पूर्ण योग्यता की गवाही देते हुए सतत पेन्डिंग हैं.

अभी कविता सुनिये जो कतई अनुराग के महा पकाऊ अभियान का हिस्सा नहीं है.




एक है चिड़िया-
चूं चूं करती
चूं चूं करती
चीं चीं करती
नाम है उसका बोलू
इस डंडी से उस डंडी पर
उड़ती फिरती
कभी न गिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र

फिर दूजी चिड़िया भी आई
चूं चूं करती
चीं चीं करती
उड़ती फिरती
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
नाम बताया मोलू
झूले में वो झूल रही है
खुशी खुशी से बोल रही है
मेरी यार बनोगी, बोलू?
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
दोनों ने यह गाना गाया
कूद कूद के खाना खाया

तब तक तीजा दोस्त भी आया
नाम जरा था अलग सा पाया
हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई
चिड़ियों ने यह जात न पाई
जिसने पाला उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती
मुस्लिम के घर रह कर आई
एक नहीं पूरे दो साल
ऐसा ही तो नाम भी उसका
सबने कहा उसे खुशाल
वो भी झूला उस झूले पर
इस झूले पर, उस झूले पर
हन हन हन हन
घंटी वो भी खूब बजाता
ट्न टन टन टन
फिर सबके संग खाना खाता
मिल मिल करके गाना गाता
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं

तीनों सबको खुश रखते हैं
ठुमक ठुमक के वो चलते हैं
खुशी में होते सभी निहाल
बोलू, मोलू और खुशाल!!

हम भी मिलकर
गाना गाते
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
उड़ते जाते
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र


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31 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

यह कविता किस वर्ग के लिये है? पता लगेगा तभी पढ़ेंगे।

Shastri JC Philip ने कहा…

कविता देखी
आप की,
तो लगा कि खिसक लें
किसी उडन तश्तरी में.

फिर सोचा कि 'अ' मे
भर्ती हो जाते है,
क्योकि बच्चें हैं हम भी
किसी के.

पढ के लगा कि मां के
भाव मन में पहले आये,
फिर बाप के.

अब समस्या यह है
गुरुदेव,
कि कविता तो है
गजब,
लेकिन हम को हो गया है
अपनी केटगरी के बारे में
कंफ्यूजन !!

-- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

Shastri JC Philip ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Neeraj Rohilla ने कहा…

पढ लिया है लेकिन अभी तक पूरा मसला समझ नहीं आया है ।

जब आ जायेगा तो दोबारा आ जायेंगे कुछ कहने के लिये :-)

Yatish Jain ने कहा…

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
करके आपके ब्लोग पे आये.
चूं चूं करती
चीं चीं करती
चिडिया का आप
गान सुनाये,
आपके बडे लेख पढ कर
ये एसा लगा;
जैसे खाने के बाद आप
कुछ मीठा ले आये...

Bhor ने कहा…

समीर भाई आपका मेरे चिठ्ठे पर आना मेरे लिए बहुत उत्साह वर्धक है। एक अदना सा सुझाव है, अगर बुरा न माने तो, ......... आपकी कोई अच्छी तस्वीर आपकी Profile मे लगाएँ इतने दिनो से आपके लेख पढ़ रहा हुँ लेकिन आपकी तस्वीर आपके मिज़ाज से मेल नही खाती, एक बार फिर माफी चाहता हुँ अमर कोई गुस्ताख़ी हो गई हो तो ।

मुकेश कुमार ने कहा…

उडनतश्तरी जी आप तो वाकई चाचा की तरह कविता लिख दि.............

संजय बेंगाणी ने कहा…

लय में पढ़ा और फिर ताली बजाई.

तुत्लाते बच्चे को रटवायेंगे, थोड़ी लम्बी जरूर है, मगर पहले दो पेरा में चलने की सारी सम्भावना है.

Pratyaksha ने कहा…

मैंने अपने "अ" वर्ग की बेटी के लिये इस कविता को सेव कर लिया है । बाकी प्रतिक्रिया उसके पढ लेने के बाद टिपियाई जायेगी ।

परमजीत बाली ने कहा…

समीर लाल जी,
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
हम उड़ते-उड़्ते अभी आए हैं,
आप के चिठ्ठे पर टिपियाए हैं।

हम को कौन-से वर्ग मे रखा,
हम तो हैं आप का पंखा।

ची ची चू चू
लेख है बढिया!
ची ची चू चू
आप ने ये कविता लिखी क्यूँ ?

क्या हम सब छोटे बच्चे हैं ?
आप के सामने सब कच्चे हैं!
हा हा ही ही
तू तू मैं मैं
सब चलता है
अपने को कुछ नही खलता है।

बस लिखना है
लिखते ही जाना..
सब मिलजुल अब गाएं गाना
ची ची चू चू
ची ची चू चू

अब जाते हैं ,
कई जगह और टिपियाना है।
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
रूकना नही उड़्ते जाना है।

उमाशंकर सिंह ने कहा…

एका का संदेश देने वाली इस कविता को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाना चाहिए!

रमेश पटेल ने कहा…

सर जी बड़ी मस्त कविता लिक्खी है, बिलुकल अपने वरगी!
मजा आ गया

Kavi Kulwant ने कहा…

समीर जी.. बहुत खूब..अच्छा लगा..काश हम सभी भी चिड़ियों जैसे ही होते.. न धर्म, जाति, देश के नाम पर अलग न धन, मान, अहं से विलग..
कवि कुलवंत

संजय तिवारी ने कहा…

कुद कुद की जगह कूद कूद और ठूमक-ठूमक की जगह ठुमक-ठुमक हो जाए तो कैसा रहेगा?
बच्चे बड़े मजे से गायेंगे इसे, कापी करके कुछ को बांटता हूं, कवि समीरलाल के नाम के साथ.

Gyandutt Pandey ने कहा…

बचपन में बाल-भारती और नन्दन पढ़ने का कोटा कुछ बचा रह गया था. आपने उसकी सुध ली. धन्यवाद!

विकास कुमार ने कहा…

अब बच्चों की कविताओं में भी धर्म का जिक्र होगा क्या?

"हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई
चिड़ियों ने यह जात न पाई
जिसने पाला उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती
मुस्लिम के घर रह कर आई
एक नहीं पूरे दो साल"

भले ही यह पंक्तियाँ सौहार्द सिखा रहीं हैं परंतु बिना द्वेष समझाए क्या प्रेम सिखाया जा सकता है?

मेरे विचार से यह कविता परिपक्वता की पराकाष्ठा है जो केवल आप जैसे अनुभवी कवि के कलम से ही उपज सकती है.

mamta ने कहा…

अच्छी है फुर्र -फुर्र करती चिड़िया की कविता.
वर्ग पहचानना कठिन लग रहा है.

.... :)

रंजू ने कहा…

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र:):)

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र करती आपकी यह कविता हमको बहुत भाई ..
पर हम कौन से वर्ग में यह बात समझ ना आई:)
मुझे तो फुर्र फुर्र वर्ग ही अच्छा लगा ..:) बाक़ी का क़िस्सा जानने की उत्सुकता है ....और मैने अपने स्कूल में नर्सरी के बच्चो को यह "'चूं चूं, चीं चीं"' सिखानी तो क्या करना होगा :)
""इस कविता के सारे अधिकार बहुते सस्ते में."" कितने सस्ते में है यह बताए ज़रूर :)

Dard Hindustani ने कहा…

पढने की बजाय यदि आपसे स्वर मे इसे सुनते तो अधिक आनन्द आता। इंतजार रहेगा।

Lavanyam -Antarman ने कहा…

समीर भाई,
काश की चूँ चूँ चीँ चीँ करती चिडिया जितनी अक्ल इन्सानोँ मेँ आ जाती...
तो जीवन कितना खुशहाल रहता , है ना ?
स्नेह,
-- लावण्या

दीपक भारतदीप ने कहा…

बहुत अच्छा!
दीपक भारतदीप

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

पहले हमें बतायें कितना आरक्षण हर एक वर्ग में
और कहां सुविधायें कितनी हो उपलब्द रहेंगी सबको
तब ही अपना तुक्का फ़िट कर टिपिया पायेंगे चिट्ठे पर
एक टोकरी दाने वाली पहले भिजवा देना हमको

महावीर ने कहा…

कहते हैं कि बूढ़ा और बालक एक समान ही होते हैं, सो हम तो हिर फिर के 'अ' वर्ग
में आगए हैं। अतः फसाद फझीता तो हमारा अधिकार है। सो, चाहो या ना चाहो, मना करो या ना करो, चाहे झगड़ा कर लो, हमें यह कविता इतनी पसंद आई है कि बिना पूछे अपनी फाइल में डाल ली है।
हम एक शशोपंज में हैं: अगर हमारे नाती ने पूछ लिया कि स्वामी समीरानंद के आश्रम में जो यह तीन धर्म-निर्पेक्ष सुंदर चूं चूं करती उड़ते फिरते बजरीगार दिख रहे हैं, उनमें से कौन सा बोलू है,
कौन सा मोलू और कौन सा खुशाल है, तो हम क्या कहेंगे ? बाल-हट आप जानते ही हैं। मानेगा नहीं जब तक नाम नहीं मलेंगे।
उसे बहुत अच्छा लगेगा, हम तो अभी कायल हो गए।

ALOK PURANIK ने कहा…

अब सुनिये असली कविता
चिड़िया चूं चूं
हूं हूं
नहीं हूं नहीं हूं
क्यों हूं क्यों हूं
यों हूं यो हूं
भूल भूल भूल
फूल फूल फूल
कविता छोड़
पत्थर पाठकों के सिर पे फोड़
चोआंचू चोआंचू
करतकरतचक चचक
रकपकतप कचकचट
घोंटापा घोंटापा सैटलका
करतर दगहदा
चूं चूं
चिड़िया बन गया हूं मैं
या मैं ही चिड़िया हूं
इस कविता का भावार्थ जो बतायेगा, उसे ऐसी पांच कविताएँ बतौर इनाम दी जायेंगी।

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

अपने बारे में भी कंफ्यूजन हो गया। आपके बारे में भी। क्या कहूं आपको। धर्म के नाम पर लड़ते लोगों के दादा, चाचा या ऐसा कोई बड़ा जो हंसते-हंसते रहा दिखा सके।

Manish ने कहा…

अपने बालक को पढ़ा कर प्रतिक्रिया लेनी होगी :)

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

कविताओं का बर्गीकरण बहद रोचक है. समझ में नहीं आ रहा की स्वयं को किस वर्ग में रखू. सुंदर और सरगर्भीत,अच्छी रचना और अच्छी सोच यदि अच्छी भावनाओं के साथ परोसी जाए तो होठों से वाह निकलना लाज़मी है.

Dr.Bhawna ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है, बधाई स्वीकारें।

Pankaj Bengani ने कहा…

फुर्र फुर्र उडता उडता आया,

जल्दी से अब कमेंटियाया,

बोलु बोले क्या लिखोगे,

मोलु बोले जो सोचोगे,

खुशाल बोली चीं ची करती,

लिख दो भैया करो जल्दी,

हमे तो अब दाना है खाना,

समीरलालजी को यह बताना,

कि कविता उनकी रट ली है,

और कागज पर छप ली है,

अब बच्चों को रटवाएंगे
खुब ताली पीटवाएंगे.


बच्चे लोग ताली बजाओ ताली बजाओ..

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

फिर तेरी कहानी याद आई - ऐना!!

sunita (shanoo) ने कहा…

माफ़ किजियेगा गुरुदेव बहुत दिनो से बुखार हुआ था कोई रचना पढ़ नही पाई...आपकी कविता बहुत ही सुन्दर है आप तो हर विधा में पारंगत है कोई जवाब नही ...

सुनीता(शानू)