रविवार, जुलाई 01, 2007

हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार!!



गुगल चैट पर लाल बत्ती जला कर बैठे हैं. कुछ जरुरी काम निपटाना है साथ ही किसी से कुछ जरुरी बात करनी है तो इन्तजार भी है उनके गुगल चैट पर आने का. इसी लिये व्यस्त का बोर्ड टांग दिया है.


एकाएक सामने से मैसेज आता है, 'क्या भाई साहब, बिजी हैं?' .


अब क्या कहें? जब लाल बत्ती और उसके नीचे लिखा 'व्यस्त' कुछ नहीं कह पाया तो हमारी क्या औकात. कैसे मना करते?

कहना पड़ा, 'नहीं, कोई खास नहीं, बतायें.'

अभी लिख कर एन्टर मारा ही था, तो वहाँ तो मैसेज पहले से ही तैयार था, 'इसे देखा.' और साथ में अपनी नई ब्लॉग पोस्ट का लिंक. अभी कुछ सोचे समझें, एक स्माईली :).

कह दिये, 'अभी देखते हैं'

३ मिनट भी नहीं बीते, अभी लिंक खुलने की तैयारी में है. एक और मैसेज, 'कैसा लगा?'.

अब क्या बतायें कि कैसा लगा? पहले दिखे तो. खैर, पोस्ट खुल खुला गई. बी एस एन एल की महा कृपा का परिणाम. (खैर खुलना तो था ही जैसा की नाम से उजागर है कि बी एस एन एल-बहुत समय नहीं लगेगा-उसने अपना वादा निभा दिया) अब इतने दिन से आँख फोड़ फोड़ कर और ब्लॉगिंग में टिपियाते इतना तो अनुभव प्राप्त हो ही गया कि सरसरिया के पहचान जायें कि कविता है कि कहानी. व्यंग्य है कि यात्रा संस्मरण. विवाद होगा या नहीं. अरे, यही अनुभव तो है जो फट से टिप्पणी कर लेते हैं. और बता दूँ, यह ज्ञान बांटना संभव भी नहीं. बस, इतना बताये दे रहे हैं कि करत करत अभ्यास ते वाली कहावत याद रखो और यह भी कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं. आपको भी यह ज्ञान अनुभव से प्राप्त हो जायेगा. यह ठीक वैसा ही है जैसे कि अपने नेता घाघपंती सिखा नहीं सकते बस अनुभव की बात है, जिसका जितना लंबा अनुभव वो उतना बड़ा घाघ.

खैर, जल्दी से सरसरिया दिये. देखा कविता है और वो भी प्रेम गीत टाईप, कह दिये कि 'बड़ी अनूठी कविता कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं, खास कर यह लाईन और चार लाईन उसी में से कट पेस्ट कर दी' .

वे बोले, 'यह वहीं टिप्पणी में कहिये.'.

लो, कर लो बात, तुम कह रहे हो चैट में. सामने बैठे टाईप में ही हो. सामने के सामने तारीफ कर रहे हैं. तारीफ और दाद चाहिये कि टिप्पणियों की संख्या? समझ नहीं आ पाया.

अब वो तो टिप्पणी का कह कर गायब हो गये. कहीं और कटिया फंसा रहे होंगे. एक जन से उनका काम थोड़ी चलेगा और हम लगे हैं, उनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने में. टाईप करो. वो रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े अक्षर भरो वेरिफिकेशन वाले. अपना नाम, पासवर्ड और झुंझलाहट में अक्षर गलत भरा गये तो फिर भरो. खैर, एक लोभ सा रहता है कि कल को हम भी कुछ लिखेंगे तो बंदा अहसान चुकायेगा. बस शायद इसी लिये बुजुर्ग कह गये हैं कि लालच अच्छी बात नहीं. मगर समझ आये जब न!! वो तो बुढ़ापे में हम भी अपने नाती पोतों को समझायेंगे, ब्लॉगिंग अच्छी बात नहीं-कौन मानेगा. हम ही कहाँ मान रहे हैं.

सब फुरसत पाकर ईमेल चेक करने बैठे तो उन्हीं का ईमेल चैट के पहले का आया हुआ था. यहाँ देखिये मेरी नई रचना और लिंक एवं अंत में स्माईली. नाश हो इन स्माईली बनाने वालों का. कोई सी भी हरकत कर लो और स्माईली के पैकिंग रैपर में लपेट कर थमा दो. अरे, पैकेजिंग का जमाना है. अब जो बुरा माने वो बेवकूफ, उसे अन्तर्जाल के तरीके नहीं मालूम. तब यह बेवकूफी कैसे जाहिर होने दें तो स्माईली लगी बात का बुरा नहीं मानते.

यहाँ से छूटे तो नारद पर पहुँचे, वहाँ भी सबसे उपर वो ही चमक रहे हैं उसी पोस्ट के साथ. भईये, नारद का काम ही यही है. थोड़ा तो धीरज धरो. हम तो खुद ही बिना नारद की पूजा अर्चना के खाना नहीं खाते, नहाते नहीं, सोते नहीं, जागते नहीं...देख ही लेंगे. बस कुछ मिनटों का फरक पड़ सकता है. हम नारद के थ्रू आयेंगे, तब भी टिपियायेंगे और शायद वाकई पढ़कर बेहतरीन टिप्पणी कर जायें कभी कभी पढ़कर भी तो करते हैं टिप्पणी :)) न विश्वास हो तो मसीजिवी से पूछ लो, उन्होंने अभी रिसेन्टली देखा था एक जगह. :)

नारद पर नहीं भी आते हो तो हिन्दी ब्लॉग भी देखते हैं, चिट्ठा चर्चा भी पढ़ते हैं और अब तो चिट्ठाजगत डॉट इन भी. बहुत अच्छा या बहुत बूरा लिखोगे तो सारथी पर भी दिख सकते हो.कहीं न कहीं तो तुम दिख ही जाओगे और तुम्हारे जैसा मुखर व्यक्तित्व नहीं दिखेगा तो फिर कौन दिखेगा??

तो हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार, तुम्हारी पोस्ट का अस्तित्व कोई लोकशाही में उपस्थित ईमानदारी सा तो है नहीं, जो लाख ढूंढने पर भी न मिले. वो तो बेईमानी की तरह सर्वव्यापी एवं स्व-उजागर है, जिसे चाह कर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और उससे हाथ मिलाये बिना इस जगत में तो गुजारा संभव भी नहीं. हमें भी गुजारा करना है, जरुर हाथ मिलायेंगे.जरुर टिपियायेंगे फिर काहे अधीर हुये जा रहे हो. तनिक ठहरो, हम चाहें भी तो बचकर नहीं जा सकते. बस निवेदन और विनती है कि भईया, जरा सा धैर्य रख लो. कुछ हमारी भी जरुरते हैं-खाना खाते हैं, नहाते हैं, सोते हैं-थोड़ा तो स्पेस दे दो फिर नौकरी भी करनी है. वैसे, फिर भी चाहो, तो दरवाजा तो हमेशा खुला है, खटखटा देना भले ही व्यस्त का बोर्ड लगा हो, लाल बत्ती जल रही हो: हम तो हाजिर हैं ही, लालची जो हैं. लाल बत्ती, बोर्ड आदि तुम्हारे लिये नहीं हैं वो आम जन के लिये हैं और तुम आम तो हो नहीं, तुम तो हो-स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार. नमन करता हूँ तुम्हें!!! स्विकारो.

धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

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32 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

कटिया फंसवाके यह लेख पढ़वा ही दिया। शब्दचित्र अच्छे हैं, भाव बड़े गहरे हैं।:)

maithily ने कहा…

'बड़ी अनूठी कविता कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं, खास कर यह लाईन'
धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

अरुण ने कहा…

भाइ समीर जी ध्यान दे
टिप्पणियो की चाह मे लिखत फ़िरत दिन रैन
जहा तहा मोका मिलै टिपियावै हम बैण (बचन)
लेख लिख,पोस्टदेख सूनी,ये दिल से निकले बारंबार
या खुदा,जो ना टिपियावे यहा उनका हो जाय बंटाधार

बेनामी ने कहा…

समीर भाई

क्या क्या नाटक लाते हो जो कोई सोच भी न सके. गजब आईटम हैं आप.


खालिद

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है. आपको ब्लॉगरी में किसने फंसाया; उन सज्जन का नाम बता दें तो उन्हे गरियाने का पुनीत कार्य हम कर सकते हैं.
अब यह मत कहियेगा कि खुद ही अपने गले में यह फन्दा डाला है और दुनियां में सहानुभूति के लिये घूम रहे हैं. :)

Pankaj Bengani ने कहा…

लगता है स्वयम्भू साहित्यकार महोदय ने यह नहीं पढा:

http://www.tarakash.com/content/view/308/438/

उन्हे आज ही पढना चाहिए और अमल भी शुरू करना चाहिए. :) नाहक फजिहत करवाते हैं और आपको एक पोस्ट लिखने का मसाला दे देते हैं.. ही ही..

:) <-- ऐ ल्लो, स्माइली भी लगा दी.

संजय बेंगाणी ने कहा…

तो अब आप आईटम हो गए हैं :) किस फिल्म में डांस है जी आपका, एडवांस बुकिंग करवा लेते है :)

स्माइली लगा दी है है अतः खबरदार जो बुरा माना.

सभी टिप्पणी लूटेरों से त्रस्त है. समझ जाए तो अच्छा है, वरना इन्हे अनदेखा करना पड़ेगा, तभी समझेंगे.

Gaurav Pratap ने कहा…

दिल मे तो लगता है कि काफ़ी दर्द पाल लिया है आपने. कवि बनने की राह पर ही हैं. बधाई. ;-)

Pratik ने कहा…

हा हा हा... बहुत सही लिखा है आपने। :)

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

आप गुस्से में भी बहुत अच्छा लिखते हैं। कमाल के कलाकार हैं।

masijeevi ने कहा…

हम भी बहुत दुखी थे...अच्‍छा किया जो हड़का दिया इन खड़कानेवालों को पर अगर आपको उम्‍मीद है कि ये इससे थम जाएंगे तो बहुत नादान हैं आप अैर पता है कि इसका कोनो अबर नहींए होगा तो फिर काहे मेहनत की इतनी।
:
:
हम हमेशा पूरा पढ़कर टिप्‍पणी करते हैं...अच्‍छा लिखा है, साधुवाद।

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

वो कटिया वाला मैं नही हूं ना ?, कह देना बंधु नहीं हो आपको छत्तीसगढ का सौं

Sanjeet Tripathi ने कहा…

शानदार!!
एक बात के लिए तो आपकी तारीफ़ सच मे करनी होगी, टॉपिक बढ़िया-बढ़िया उठाते हो आप (अब कभी कभी गुरु की झूठी तारीफ़ तो करनी पड़ती है ना,समझा करो भई,लेकिन इस बार सच में)

हमहूं सीख रहे है कटिया फ़ंसाना अपने गुरु से, देखत है कब तक बचे रहत हो हमारे गुरु के फ़ंडों से!!

sunita (shanoo) ने कहा…

हे गुरुदेव कितना बढ़ा पेट है ये आपका,
सबसे ज्यादा टिप्पणी खाकर भी है आधा,
इतना लालच देखिये ठीक नही,...
नित नये चिट्ठे के लालच मै हम आते है,
रोज टिप्पणी की बौछार लगाते है...
फ़िर भी आप यही फ़रमाते है...
खुद लम्बी-लम्बी पोस्ट पढ़वाते है...
हमे बिना पढे़ ही टिप्पीयाते है...

हा हा हा

शानू

Sanjay Tiwari ने कहा…

अभिव्यक्ति की अकुलाहट में हम दूसरों का कितना नुकसान करते हैं, इसे पढकर यही समझ में आ रहा है. बहुतों को अपने से यह सवाल करना चाहिए, क्या सचमुच उनके पास कुछ ऐसा है जिसकी अभिव्यक्ति से दूसरों का कुछ भला होगा?

साहित्य भाषा और विचार का सुवर्ण है लेकिन ब्लाग पर अधिकांश जो दिखता है वह निजी "मलबद्धकोष्ठता" के तनाव से पैदा हुआ जान पड़ता है. लोग अपने को अभिव्यक्त करने के लिए जितना बेचैन रहते हैं उसका आधा भी दूसरों को समझने में समय लगायें तो उनकी अभिव्यक्ति समष्टिगत लोककल्याणकारी हो सकती है.

ईश्वर आपको झेलने की शक्ति दे.

notepad ने कहा…

तो हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार, तुम्हारी पोस्ट का अस्तित्व कोई लोकशाही में उपस्थित ईमानदारी सा तो है नहीं, जो लाख ढूंढने पर भी न मिले. वो तो बेईमानी की तरह सर्वव्यापी एवं स्व-उजागर है

****
बहुत खूब !
वैसे आपने वास्तविकता बयां की है । ब्लाग पर स्माइली प्रयोग पर हमारा शोध है ,और कापीराइट भी इस नवीन खोज पर कि स्माइली से कडे से कडे पीस भी बुरा नही मानते । इसे हमने "तू मेरी पीठ ...." वाले पोस्ट मे प्रतिपादित किया था ।:)

Vijendra S. Vij ने कहा…

क्या बात है समीर जी..यथार्थ वादी चित्र खीचा है आपने..बढिया लगा...

ALOK PURANIK ने कहा…

चिट्ठा पढ़े बगैर चिट्ठा कैसे पढ़ें, इस विषय पर जल्दी ही एक पोस्ट आने वाली है इस खाकसार की।

विकास कुमार ने कहा…

ab samjhaa ki aapke posts par itni tippani kyun aati hai :D

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

अति उत्तम नुस्ख़ा. आज से मैं भी यही चाल चलने वाला हूँ अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने के लिये - वरना रात रात जग कर ब्लॉग लिखो और मिलती हैं मात्र 5 या 6 टिप्पणियाँ. आज कल ब्लॉग पढ़ने वाले महा आलसी हो गये हैं - अगर यही हाल रहा तो मेरे जैसे अनगिनत महान लेखक ब्लॉहित्य (ब्लॉग साहित्य) के जगत से गायब ही हो जायेंगे.

Neeraj Rohilla ने कहा…

तनिक देर से ही सही हम भी हाजिरी लगा रहे हैं । गैरों पे करम अपनो पे सितम....

आपका चैट आई.डी. क्या है जीमेल पर हमें भी बताईये, कभी आपसे वार्तासुख का लाभ लिया जाये । परेशान न हों आपको जबरदस्ती अपनी पोस्ट न पढायेंगे (वो तो आप ऐसे ही पढ कर टिपिया भी देते हैं :-) ).

ऐसा लगता है आपके मस्तिष्क में एक क्षेत्र एक नयी पोस्ट का मसाला ढूँढने में सदैव सक्रिय रहता है ।

बहुत दिनों से आपकी कुण्डलिनी नहीं सुनी, ये तमन्ना भी पूरी कर दीजिये शीघ्र ही ।

साभार,
नीरज

mamta ने कहा…

हम तो बस यही कहेंगे वाह उस्ताद वाह !

ग्यारह साल का कवि ने कहा…

अंकल मुझे मालूम है आपके मुझको झूठ-मूठ में टिप्पणी नही दी है,आज कल मेरी परीक्षा होने वाली है, मै पढ़ाई कर रहा हूं कोई कविता नही लिखी।

आपका अक्षय

Dr.Bhawna ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Dr.Bhawna ने कहा…

समीर जी जवाब नहीं है आपका। आप तो विषय खोज़ने में माहिर हैं और उस पर इतना शानदार लेख। फोटो भी खूब लिया है। आपने रास्ता दिखाया उसके लिये शुक्रिया हम भी ५ से ६ तक टिप्पणी ही देख पाते हैं अपने ब्लॉग पर अब ये तरीका अपनायेंगे।

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

वह भाई बहुत बढिया. मुसीबत अपकी भले हुई हो, पर पढ़कर हमें तो मजा आया. बधाई स्वीकारें.

Abhishek ने कहा…

वैसे मेरी कविता पर आपने मेरे बिन आग्रह टिप्‍पणी कर दी है सो सोचता हूँ कि शायद वास्‍तविक है! धन्‍यवाद.

(देखिये स्‍माइली भी नहीं लगाया)

Sagar Chand Nahar ने कहा…

हमेशा की तरह मजेदार,
वैसे इस पोस्ट पर टिप्प्णी करने के लिये आपने कितनों को पोस्ट पढ़ने और टिप्प्णी करने ले लिये कहा (चैट के दौरान!!) :)
(स्माईली दे दी गई है)

Sagar Chand Nahar ने कहा…

हमेशा की तरह मजेदार,
वैसे इस पोस्ट पर टिप्प्णी करने के लिये आपने कितनों को पोस्ट पढ़ने और टिप्प्णी करने ले लिये कहा (चैट के दौरान!!) :)
(स्माईली दे दी गई है)

Tarun ने कहा…

दो बूँद आँसू हमारी तरफ से भी ले लो

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढ़िया नुस्खा बताया आपने, मैं भी कटिया लगाता हूँ आज ही से...

Shrish ने कहा…

बड़ी अनूठी प्रॉब्लम कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं।

बहूहू इस समस्या से तो बहुत से भाईलोग ग्रसित हैं, कासे कहें वाली स्थिति है। इस तरह के टिप्पणार्थी हमारे ही कुछ मित्र हैं इसलिए साफ टोक भी नहीं सकते, बस एक ही तरीका बचता है स्पैम के डब्बे में डालने का।