शुक्रवार, मई 18, 2007

चिट्ठाकार मिलन: रमन कौल जी पधारे द्वार हमारे

रविवार को दिन में रमन भाई का फोन आया कि सोमवार शाम को टोरंटो आ रहे हैं. हमें बड़ी प्रसन्नता हुई और हमने आग्रह किया कि भाई, हमारे ही घर रुकें. अब रमन जी संकोची जीव और दूसरा, हमसे पहले कभी मिले भी नहीं थे तो सोचे कि हम कहीं घर पर रुकवा कर सारी शाम कवितायें न झिलवा दें. कहने लगे, आयेंगे जरुर मगर ठहरेंगे अपने रिश्तेदार के यहाँ. हम समझ तो गये कि क्या वजह है मगर फिर भी सोचा कि शाम को आयेंगे और खाना खाने को हम जबरदस्ती रोक ही लेंगे. इस बीच ७-८ की जगह २-३ कविता तो सुना ही डालेंगे मौका निकाल कर. हमें इसीलिये संकोची लोग अच्छे लगते हैं कि खुलकर कविता न सुनाने के लिये बोल नहीं पाते. बस फिर क्या था, हमने बेसब्री से सोमवार शाम का इंतजार करना शुरु कर दिया. ३ बढ़िया वाली कविता कंठस्थ कर लीं और एक गजल का भी तर्रनुम में गाने का रियाज कर लिया. १० और कवितायें प्रिंट करके रख लीं ताकि अगर रुकने के लिये मान गये तो वो इसी यज्ञ में आहूति चढ़ा देंगे.

सोमवार सारा दिन दफ्तर में प्रफुल्लित घूमते रहे. कोई काम नहीं किया रमन भाई को कविता सुनाने की उमंग में. शाम को घर लौट कर बस फटाफट स्नान किया. बढ़िया क्रिम-पाउडर वगैरह लगाकर बाहर बरामदे में ही बैठ गये सड़क पर नजर गड़ाये. आखिर फोटो और कविता सुनाते समय विडियो लेने का भी प्लान बनाये थे, इसीलिये क्रिम-पाउडर.

अति उत्साह में हम भूल ही गये कि अगला भी वरिष्ठ चिट्ठाकार है. सारे इंडीब्लागीज विजेताओं से पहले से मिला जुला है. सब गुर समझता है. हम तो खुद को ही होशियार समझे बैठे थे. शाम ७ बज गये इंतजार करते, रमन भाई नहीं आये और न ही उनका फोन. हमने इस बीच दो तीन बार फोन उठाकर चेक भी कर लिया कि ठीक काम तो कर रहा है कि नहीं. मन को तसल्ली देते रहे कि लम्बा रास्ता है ९०० किमी का, शायद कहीं समय लग रहा होगा बार्डर वगैरह पर भीड़ में कभी कभी २-३ घंटे भी लग जाते हैं क्लिरेंस मिलने में. सवा सात बजे फोन की घंटी बजी और हमारा चेहरा खिल उठा. रमन भाई ही थे. हमने कहा, स्वागत है भाई, कहाँ तक पहुँचे? रमन भाई बोले, पहुँचे हुये तो देर हो गई है. अपने रिश्तेदार के यहाँ हैं. अब बहुत थक गये हैं, कल सुबह ही आ पायेंगे आपके पास. हम तो बुझ से गये. एक दो मनुहार के बाद हमने कल सुबह आने वाली बात मान ली कि कहीं समझ न जायें हमारी स्कीम. मन को मना लिया कि सुबह ही कुछ एक सुना डालेंगे. वैसे हमारा गला शाम को ज्यादा सुर में रहता है. ११ बजे दिन में आने की बात तय पायी गई.

सुबह जल्दी उठकर थोड़ा बहुत ऑफिस का काम निपटाया, फिर तैयार होने लगे. १०.३० बजे दरवाजे पर घंटी बजी. बिना पावडर लगाये भागे दरवाजा खोलने. इसी से बाद में जो फोटू ली गई, उसमें हमारा रंग थोड़ा दबा सा आ गया है. :)

भये प्रकट कृपाला.......

सामने रमन भाई और आशा भाभी खड़े थे. नमस्कार बंदगी हुई और बस फिर ड्राइंग रुम में बातचीत शुरु हुई. टोरंटो आने का मकसद, रास्ता कैसे गुजरा आदि. तब तक साधना (हमारी पत्नी) भी आ गई. उनसे परिचय. फिर महिलाओं की अलग और हमारी और रमन भाई की आपसी बातचीत आगे बढ़ी. हम क्या करते हैं, कब कनाडा आये. रमन भाई क्या करते है आदि सामान्य शिष्टाचार की बातें. हम सोच ही रहे थे कि बात को कैसे घूमा फिरा कर चिट्ठों पर लायें और फिर धीरे से कविता पर. हमने रमन भाई को सूचित किया कि ई-स्वामी जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है. यह उनके लिये समाचार था जो उन्हें नहीं मालूम था. बात शुरु हुई थी कि पत्नी नें बताया कि नाश्ता लगा दिया है. पहले नाश्ता कर लें. हमने पत्नी को आँख भी मारी कि जरा कुछ देर तो रुको. मगर ऐसे मौके पर उनको समझ ही नहीं आता सो आज भी नहीं आया. अब हम सब खाने के मेज की इर्द गिर्द बैठे थे, तो खाने की बात चलना स्वभाविक थी. यह अच्छा बना है, यह कैसे बनाया यानि कि खाने की मेज पर जैसे शिष्टाचारवश बात होती है, बस वो ही.



रमन जी और उड़न तश्तरी (हम)

हम बात का रुख फिर घुमाने के चक्कर में थे तो जुलाई में विश्व हिन्दी सम्मेलन में जायेंगे कि नहीं, से शुरु की कि इस बीच रमन भाई को चाय पीने की इच्छा होने लगी. भाभी जी ने बताया कि रमन भाई चाय के बहुत शौकीन हैं और हर समय चाय पीने को लालायित रहते हैं. रमन भाई ने भी कन्फर्म किया कि खाना कैसा भी हो, चल जाता है. चाय बेहतरीन ही पसंद है और वो भी देशी वाली उबाल कर. अब अच्छी चाय, यानि जिम्मेदारी हमारी पत्नी से लुढ़क कर हम पर आ गिरी.तो हम उसमें व्यस्त हो गये. चाय बना कर फुरसत पायी, तो रमन भाई कैमरा ले आये. फिर फोटो सेशन. साथ चाय भी चलती रही. फोटू का सेशन खत्म हुआ तो रमन भाई ने ऐलान किया कि १० घंटे गाड़ी चला कर वापस पहुंचना है तो अब चलेंगे. हम तो कविता धरे ही रह गये और रमन भाई बच कर निकल गये. हमने भी कहा कि यह आपका आना माना नहीं जायेगा (कैसे मानें जब कविता सुना ही नहीं पाये) अगली बार समय निकाल कर आयें और हमारे पास ही रुकें. उन्होंने भी वादा किया और हमें भी अपने घर आने का निमंत्रण दे गये. अब सोचता हूँ कि किसी समय यात्रा कर ही ली जाये. वहाँ पहुँच कर तो सुना ही लूँगा जी भर कविता और खूब होगी चिट्ठाकारी की बातें!!

हमारी पत्नी हमें भारत की आदत के अनुरुप आज भी लाल साहब ही बुलाती हैं. इस तरह का संबोधन देख आशा भाभी बड़ी खुश हुई और हमें भाग्यवान होने की बधाई दी कि कनाडा/ अमेरीका में भी कोई साहब बुला रहा है. वरना ऐसा नसीब किसी का यहाँ पर कहाँ-यहाँ तो सबको पहले नाम से ही पुकारा जाता है.



बायें से दायें: रमन भाई, साधना, आशा भाभी

बहुत अच्छा लगा रमन भाई और आशा भाभी से मिलकर. सच में लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं.

बस, इस तरह यह चिट्ठाकार मिलन बिना चिट्ठाकारी की चर्चा के ही, यह साबित करते ही बीत गया कि-तू डाल डाल, तो मैं पात पात. यही तो पहचान है वरिष्ठ चिट्ठाकार की कि हम उनको नहीं घेर पाये. नमन करता हूँ रमन भाई को. Indli - Hindi News, Blogs, Links

33 टिप्‍पणियां:

Arun Arora ने कहा…

भाई समीर आज फ़ोटो देख कर हम इस बात के कायल हो गये की आप वाकई बहुत सज्जन शर्मीले और शिष्टाचरी है,वरना अगर आप सुनाने बैठ जाते तो कौल साहब की हिम्मत मना करने की फ़ोटो मे तो दिखती नही,दो दिन की तैयारी और कविता सुनाने की हुडक वाकई बहुत हिम्मत की बात है आप अपने पर कन्ट्रोल कर पाये,इस पर भी आपको पुरुस्कार अवश्य मिलना चाहिये

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

हमें तो इसी में मजा आ रहा है कि आपकी इस्कीम फट्ट हो गयी. बहुत स्मार्ट कवि/ब्लॉगर समझते हैं अपने को! और लोग भी हैं जो लिफाफा देख कंटेण्ट जान जाते हैं.

ALOK PURANIK ने कहा…

आपकी मेहमानवाजी भी आपके साइज की होती है, यह जानकर अच्छा लगा। मोगंबो खुश हुआ-
आलोक पुराणिक

Kaul ने कहा…

समीर जी, मैं आप के ही लिखने का इन्तज़ार कर रहा था, खुद पहले लिखने से हिचकिचा रहा था। मालूम था कि अपना गदहा भी कमज़ोर है, और "पदहा" को तो अपन जानते ही नहीं। धन्यवाद एक बहुत रोचक विवरण के लिए। कविता का प्रोग्राम अब हमारे यहाँ तय रहा। :-)

अनाम ने कहा…

बहुत खूब! आपको पता नहीं है समीर भाई कि रमनजी को आशा भाभी तब से डूबने से बचाती आयी हैं जब उनकी शादी भी नहीं हुयी है। आपके कविता सागर में असहाय हाथ-पैर मारते हुये छटपटाने में जरूर उनका योगदान रहा होगा। रमन भाई चाय के शौकीन हैं यह जानकर अच्छा लगा कि वे भी अपनी'पाल्टी' के हैं। वैसे यह भ्रम बड़ा सुहाना हैं कि आपने कुछ अच्छी कवितायें लिखीं हैं। लिखीं हैं तो हमें भी पढ़वाइये न! सारी अच्छी कवितायें कुछ लोगों को सुनाने के लिये रख रखी हैं और केवल खराब वाली पोस्ट कर देते हैं बहुत नाइन्साफ़ी है ये। :) विवरण मजेदार रहा!

अनाम ने कहा…

ऊपर की टिप्पणी में 'छटपटाने की' जगह 'छटपटाने से बचाने में' पढ़ा जाये!

Pramendra Pratap Singh ने कहा…

आपको बैठा देख कर लग रहा था कि आपने दो रमन भाई इत्‍ती जगह कब्‍जा कर रखी थी :)

पढ़ कर अच्‍छा लगा।

dhurvirodhi ने कहा…

अत्यन्त आल्हादित हुये.
आप हिन्दुस्तान कब आ रहे हैं?

अनाम ने कहा…

जो बाते पसन्द आयी वह लिख देता हूँ
आपका लिखने का अन्दाज.
रमण भाई का चाय पसन्द होना, क्योंकि एक अच्छी चाय हमारी भी कमजोरी है.
आपका अच्छी चाय बनाना.
मस्त मेजबानी करना, कभी कभी हमारे भाग्य भी खुलेंगे.
रमणभाई के साथ भाभीजी और साधना भाभीजी के दर्शन होना.
लिस्ट शायद खत्म नहीं होगी.

रंजू भाटिया ने कहा…

इसको पढ़ के तो हमारे दिल में भी वहाँ आने की इच्छा जागृत हो गयी है .
बहुत ही रोचक ढंग से लिखा है आपने ...

dpkraj ने कहा…

उड़ान तश्तरी जीं आप बहुत दिल से लिखते हैं

ghughutibasuti ने कहा…

बहुत बढ़िया रहा यह विवरण । मेरी पूरी सहानुभूति आपके साथ है । अब कविता सुनाने के लिए घेरने के २५ नुस्खे लिख ही डालिये । आपके तो काम आएँगे ही हम सब भी उपयोग कर आपको दुआ देंगे । हाँ, ये नुस्खे साधना जी को भी कंठस्त करा दीजिएगा फिर इशारों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।
घुघूती बासूती

Jitendra Chaudhary ने कहा…

ह्म्म! अच्छा लगा। एक सफ़ल (एकतरफ़ा ही सही) ब्लॉगर फैमिली मीट के लिए बधाई। जानकर दुख हुआ कि आप अपना कविता पाठ ना कर सके।

समीर भाई, इस बार आप रमण भाई के यहाँ लद लीजिए, साथ मे ट्रक भरकर कविताए ले जाएं, रमण भाई को तब तक कविताएं सुनाए, जब तक वे चित्ता ना हो जाएं। ऊपर से जब वे मेजबान होंगे तो आपको हड़का भी नही सकेंगे, बस ये ध्यान रखना चाय आपको ही बनानी होगी। बेचारे रमण भाई,आखिर कवि से दोस्ती का कुछ तो खामियाजा भुगतना ही पड़ता है। (बाकी लोग तो भुगत ही रहे है!...हेहे)

उन्मुक्त ने कहा…

पढ़ कर अच्छा लगा।

अनाम ने कहा…

बहुत दिनों से केनेडा का टूर टाल रहे थे सोचते है अब बना ही डालें। और हाँ हमें कवितायों से मत डराइएगा, आप दो सुनाएंगे तो एक आध दाद में हम भी आपकी नज़र कर ही देगें।

अनाम ने कहा…

अच्छा विवरण...

पहली तस्वीर पर केप्शन में बांये से दांये लिख दीजिये..बडा कन्फ़्यूजन हो रहा है :) :D

अनाम ने कहा…

ये तो अच्छा हुआ कि आपने बता दिया..हम तो भारत से कनाडा आने की सोच रहे थे (कल मोर्निंग वाक करते करते पहुंच जाते.. )..आपसे मिलने ..अभी तक एक ही तो मित्र बने चिट्ठाजगत में और वो भी बिल्कुल अपने साईज के ..अब आपने कविता वाल राज बता दिया तो अभी तो नहीं ही आयेंगे ..अभी थोड़ी कविता हम भी लिख लें ..फिर पूरे गोला बारूद के साथ आयेंगे...

वैसे चाय वाली पार्टी में हम भी हैं....

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बढ़िया विवरण!
आप रमण जी को कविता(एं) न सुना पाए सो आपसे हमें पूरी सहानुभूति है!
और हां आशा है कि कविता(एं) न सुनाने के गम में आपका पाचन तंत्र बिगड़ा ना होगा लेकिन अंदर कहीं एक खदबदाहट तो हो ही रही होगी ना

चलते चलते ने कहा…

समीर जी मैं भी अब तक कुछ ब्‍लॉगर मित्रों से मिल चुका है और जब से ब्‍लॉग लिखने का कार्य किया है अनेक मित्र मिले हैं और काफी मजा आ रहा है। आपकी इस पोस्‍ट से मैं काफी प्रभावित हुआ हूं। सोचता हूं कि कनाडा आकर आपसे भी मिलूं और ढेर सारी कविताएं सुनू क्‍योंकि आपकी मेहमानवाजी तो बेहतर होगी ही यह तय है।

Yunus Khan ने कहा…

.comउड़नतश्‍तरी जी आप भारत कब आ रहे हैं बताईये । मिलना विलना तो होता रहेगा भैया पर अब हम वैसी ही तैयारी करेंगे जैसी आपने रमन जी के लिए की थी । पर हम आपको बिना सौ दो सौ कविताएं सुनें खिसकने नहीं देंगे । पूरी तैयारी से आईयेगा ।

सुनीता शानू ने कहा…

समीर भाई ये सब देख और पढ कर तो हम भी उतावले हो रहे है या तो आप हमे अपना पता बताएं ताकि हम भी भाभी जी के हाथ की चाय पीने आये या आप आ जाईये भाभी जी को लेकर चाय पीने,..चुनिन्दा बागानो की बेहतरीन चाय वाले है हम। आप ऐक बार आ गये तो बार-बार आयेन्गे..
:)
सुनीता चोटिया(शानू)

Atul Arora ने कहा…

समीर भाई

विश्वस्त सूत्रानुसार रमन भाई बहुत अच्छे मेजबान हैं, और इनकी मित्र मँडली भी अच्छी श्रोतागण हैं।

ePandit ने कहा…

हम्म रमण जी बच ही निकले। हमें आपसे हमदर्दी है। :)

चिट्ठाकार-मिलन का मजेदार वर्णन किया आपने।

अनाम ने कहा…

आपकी योजना पर असफल होने पर मुझे आपसे सहानुभूति है :-)
परंतु मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं जब कनाडा आऊँगा तो आपके आस आकर कविता ज़रूर सुनूँगा और देखियेगा चूँ भी नहीं करूँगा :-)

Mohinder56 ने कहा…

आपका यह लेख पढ कर हमने तो एक ईयर प्लग खरीदने का मन बना लिया ताकि जब भी कभी कविता सुनने का मूड न हो तो कान मेँ उसे लगा कर बस मुँडी हिला कर ही काम बन जाये......

mamta ने कहा…

बहुत ही अच्छा विवरण किया है। फोटो बहुत अच्छी है। इस बार नही तो अगली बार सुना लीजियेगा कविता।

अनाम ने कहा…

Hi Friend.....

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अनाम ने कहा…

अच्छा, अब हमें भी पता चल गया है कि आप मेहमानों के लिए क्या क्या शस्त्रास्त्र तैयार रखते हैं। कभी हमारा आपसे मिलना हुआ (उम्मीद है जल्द ही हो) तो हम इन बातों को याद रखेंगे। हम भी प्रत्यस्त्र तैयार करेंगे।

जनाब, बहोत मज़ेदार लेख! अच्छा लगा।

Gee ने कहा…

समीर जी, बाहूत अछा लगा ये जानकर कि आपने इतने प्रेम भाव से अपने चिठ्टठाकार मित्र का स्वागत किया…

Udan Tashtari ने कहा…

आप सबका बहुत आभार .पढ़ते रहें पढ़ाते रहें. आते रहें, बुलाते रहें. धन्यवाद, मन आनन्दित है आप सबकी टिप्पणियां पाकर.

:)

Manish Kumar ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपका ये रोचक विवरण ! इसी तरह मिलते मिलाते रहें और हमें अपने खास अंदाज में बताते रहें ।

अनाम ने कहा…

मिलन का बेहद आनंदपूर्ण चित्रण करने के लिए अनेकानेक बधाइयां . एक कवि की कविता सुनाने की उत्कंठा कवि ही समझ सकता है . एक खग जाने दूसरे खग की भाषा .

Dr.Bhawna ने कहा…

समीर जी लिखने को शब्द नहीं हैं, पर हँसते-हँसते लोटपोट हो गये।
आप सबको ब्लॉग पर देखकर बहुत अच्छा लगा।