रविवार, मई 13, 2007

आप गदहा लेखक हैं……..


आज एक प्रशंसक की अपने लेख पर टिप्पणी मिली. हिन्दी टंकण औजार की अनुपलब्धता की वजह से उन्होंने रोमन में टिप्पणी कर दी. ऐसे होते हैं प्रशंसक कि चाहे जैसे भी हो, अपने भाव जरुर लिख भेजते हैं. हम बहुत खुश हुये. अरे, टिप्पणी तो संस्कृत से लेकर फ्रेंच तक की किसी भी भाषा में मिल जाये. हमेशा आमंत्रित हैं. अंधा क्या चाहे, दो आँख. तुरंत उनकी टिप्पणी पढ़ना शुरु की. आप भी पढ़ें. आपकी सुविधा के लिये उसे देवनागरी में भी टंकित किये देता हूँ.

रोमन में:

Aap ek achche gadha lekhak hain. Aap apni dullati shali se badi karari chot karte hain.Main Gadha nahi, kavita karta hun. Aapke lekh jitne sidhe sadhe dikhte hain,ander se utne hi nukile hote hain. Yahi to asli gadha ki pahchan hai or yahi aapko anya gadhon se alag isthan deti hai. Is lekh se aapne punah sabit kar diya ki Aap ek bahut behtarin gadha lekhak hain. Aapko shat shat naman. Aapke Gadha lekhan ne hume koyal bana diya hai. Likhate rahe, hum aate rahenge.

देवनागरी में उपरोक्त कथन, जैसा मैं पढ़ पाया:

आप एक अच्छे गदहा लेखक हैं. आप अपनी दुल्लती साली से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गदहा नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गदहा की पहचान है और यही आपको अन्य गदहों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गदहा लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गदहा लेखन ने हमें कोयल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.

(नोट: साहित्यिक हिन्दी में गधा को गदहा कहते हैं)

अब हम सोचने लगे कि भाई यह प्रशंसक हैं कि आलोचक. मित्र हैं कि दुश्मन. शत शत नमन भी कर रहा है और गदहा भी कह रहा है.यह बात तो समझ आई कि कैसी भी आवाज में कविता गाता होगा तो गदहे की ढ़ेचू के सामने उसकी आवाज कोयल सी लगेगी, तो उसने अपने आपको कोयल समझ लिया होगा. मगर हमको गदहा कह रहा है, वो भी ऐसा वैसा नहीं, सब गदहों में अपनी अलग पहचान रखने वाला बेहतरीन गदहा. यह भी कह गया कि लिखते रहो, हम आते रहेंगे. लगता है इतना गरिया कर भी पेट नहीं भरा. आगे जब भी लिखेंगे और गरियायेगा.हे प्रभु, रक्षा करना. बस इतना ही हमारे मुँह से निकल पाया. लोग कहते हैं रोमन में हिन्दी लिखने से पूरे भाव नहीं आ पाते हैं, मजा नहीं आता. अब और कैसे भाव देखने हैं? और कितना मजा चाहिये?

याद आने लगा कि यह वही बंदा है, जिसे हमने प्रोत्साहित करके इसका चिट्ठा बनवाया था. देवनागरी में टंकण सिखाया था. लालच थी तो बस इतनी कि यह हमारे लिखे की भी प्रशंसा करेगा और इसी उद्देश्य से उसकी हर आड़ी तिरछी कविताओं को दाद देते रहे. कितनी बार अपने मन को मारा. अपने मानस को पीछे ढकेल दिया और इनकी कविता पर लिख आये- बहुत खूब, मजा आ गया आदि आदि. आज उसका ये सिला मिला है. मानो हम अमरीका हो गये और ये तालिबान. हमसे चलना सीखे और हम ही पर वार.

स्थितियों की गंभीरता भांपते हुये हम तुरंत देवनागरी के सबसे बड़े समर्थक बन गये. सोच लिया कि हम रोमन में लिखी टिप्पणी नहीं छापेंगे. शाम का सूरज छिपता, उसके पहले ही हमारे उन तथाकथित प्रशंसक महोदय का फोन आ गया कि हमारी टिप्पणी नहीं छापी. हमने सोचा कि कैसा बंदा है? मन में तो आया कि पलट कर गाली बक दें. फिर अपनी जमीं हुई छवि का ख्याल करते हुये हिम्मत जुटा कर कहा: काहे नाराज हो, भाई! क्यूँ ऐसी टिप्पणी करते हो? क्या गलती हो गई?

वो आश्चर्य से बोला: काहे की गलती, भाई. तारीफ ही तो किये हैं. हमारे सामने तो प्रिंट पड़ा है, क्या गलत लिख दिया?

हमने कहा:’ अच्छा, जरा पढ़कर सुनाना. खुद ही समझ जाओगे. ‘

फिर जब वो सुनाने लगा तो हम तो आवाक रह गये. आप भी सुनो, उन्होंने क्या सुनाया:

‘ आप एक अच्छे गद्य लेखक हैं. आप अपनी दौलती शैली (उच्च शैली) से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गद्य नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गद्य की पहचान है और यही आपको अन्य गद्यों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गद्य लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गद्य लेखन ने हमें कायल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.’

(नोट: हमारे प्रशंसक अपनी कवित्तमयी भाषा में उच्च शैली को गज़ल के प्रभाव में दौलती शैली कहते हैं)

फिर उन्होंने कहा कि एक स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है वो a की जगह o लग गया है, कायल में. अब उन्हें क्या बतायें कि कहाँ कहाँ स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है. हम तो शर्मसार हो गये कि क्यूँ शक कर बैठे इतने बड़े प्रशंसक पर. सामने होता तो गले लग कर रो पड़ते. फोन पर तो बस सॉरी ही कह पाये.

तो देखा आपने कि कितना सही कहते हैं लोग कि रोमन में लिखने से भाव खो जाते हैं और जो उभर कर आते हैं वो कितने खतरनाक हो सकते हैं. अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

अपील: देवनागरी में हिन्दी लिखना बहुत आसान है, इस लिंक या इस लिंक पर देखें. देवनागरी में लिख कर हिन्दी को समृद्ध बनायें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

47 टिप्‍पणियां:

काकेश ने कहा…

लेकिन आप तो सिर्फ गदहा लेखक ही नहीं पदहा लेखक भी हैं .. आपके प्रशंशक तो आपको गदहा लेखक बनते देख कोयल बन गये ..हम तो बाकायदा काँव काँव करने लगे. कभी हमारी प्रसंशा में भी एक पोस्ट लिखना दीजिये.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

आप खतरनाक हेडिंग देते हैं. लगा कि सबेरे-सबेरे हमें ही गरिया रहे हैं. लेकिन अंत भला सो भला!

sunita (shanoo) ने कहा…

वाह समीर भाई,सुबह-सुबह आपको चराने के लिये और कोई नही मिला,...आप तो बने ही बने हमे भी आपने गदहो की श्रेणी में लपेट लिया,...बहुत अच्छा लगा सुबह-सुबह हम बहुत हँसे....ऐसे ही आते रहिए...हमे हँसाते रहीए,...
:)
सुनीता(शानू)

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

गद्य लिखना गदहागीरी से कम थोड़े ही है भाई। बड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत सही है! वैसे शायद आपको पता हो कि भारत में लिखा जाता है कि किसी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी पाठ को मान्यता दी जायेगी! इस लिहाज से आप अगर अपनी पहली वाली सोच पर टिके रहते हैं तो कौनो हर्जा नहीं है! :)

priya sudrania ने कहा…

बहुत सही है
अर्थ का अनर्थ हो जाता है.
बहुत अच्छा लगा

अरुण ने कहा…

ढेचू, ढेचू ढेचू ढेचू...
"तो देखा आपने कि कितना सही कहते हैं लोग कि रोमन में लिखने से भाव खा जाते हैं"
सही लिखे हो भैया ,रोमन मे लिखने और पढने वाले भाव ही खाते है
उपर स्पेशल टिपीयाया है अनुवाद कर के पढ लेना
काहे की अब बिरादर अब तो कई भाषा समझ लेते हो ना काव काव, भो भॊ से ढेचू ढेचू तक,

अभय तिवारी ने कहा…

मस्त है..

आलोक पुराणिक ने कहा…

अकेले आप ही नहीं हैं,हम भी तो हैं
गधत्व पर किसी का एकाधिकार थोड़े ही है
घोड़ेपन की सीमा होती है
गधत्व तो अनंत है
हम भी इसी अनंत का हिस्सा हैं
आलोक पुराणिक

Mired Mirage ने कहा…

वाह ! मजा आ गया और हम इतने हँसे और वह भी असली हँसी , सुबह वाली योग के बाद की नकली हँसी नहीं । वैसे आपके गदहे पढ़ पढ़कर हमने भी गदहा लेखन आरम्भ किया है । बस अपने गदहे पर भी एक ठो ऐसी जोरदार टिप्पणी की प्रतीक्षा है ।
घुघूती बासूती

mahashakti ने कहा…

सटीक लिखा है। मजा आ गया,

मस्‍त गदहागीरी किया है :)

Manish ने कहा…

हा, हा , हा, हा ये भी खूब रही ! रोमन में ऍसी दिक्कतें आती हें। ब्लॉगर में जैसा हिंदी टूल पोस्ट लिकने के लिए आया है वेसा टिप्पणी लिखने के लिए भी आ जाए तो बड़ी सहूलियत हो जाएगी ।

Neeraj Rohilla ने कहा…

अंकिल,
हंस हंस कर पेट में बल पड गये हैं, हम तो हमेशा से ही गदहा लेखक रहें हैं और रहेंगे |

ऐसे ही बढिया लिखते रहो, तबियत हरी हो गयी पढकर,

साभार,

संजय बेंगाणी ने कहा…

एकबारगी तो हम घबरा गए की हमारी असलियत आपको कैसे पता चली, चली तो चली उसे सार्वजनीक करने की क्या आवश्यकता थी. पूरा पढ़ा तो जान में जान आयी.
रोमन मे कमल का कमाल हो जाता है, देवनागरी भली.

Pankaj Bengani ने कहा…

लो एक बात सिद्ध हो गई ,

गद्य लेखक और गधा लेखक एक समान,

दोनों भाईयों का करो सम्मान,


दौलती शैली लगे दुल्लती सी,

साबित हुआ अब, ना मांगो और प्रमाण.


कई लोग कहते थे, हिन्दी रोमन लिपी में लिखनी चाहिए. देख लिया नतीजा. :)

Dr.Bhawna ने कहा…

वास्तव में बुरा बीता आप पर मुझे आपसे सहानुभूति है खुद को अकेला न समझे हम सब लेखक उस श्रेणी में हैं जो भी 'गदहा' लिखते हैं। अच्छा लिखा है समीर जी। वास्तव में अर्थ का अनर्थ होते देखा !!

परमजीत बाली ने कहा…

यह बात सच है ।रोमन मे हिन्दी लिखना सब के बस की बात नही है। अर्थ के अनर्थ तो होगे ही। जब कुत्ता अपनी आवाज की जगह शेर का स्वर निकालेगा तो यही कुछ होगा। हमे तो अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए,उस से प्रेम करना चाहिए।आज तो हिन्दी लिखने के बीसियो साधन हमारे पास है।फिर हमारे चिट्ठाकार साथी हमेशा मदद को तैयार रहते हैं।फिर भी रोमन मे हिन्दी लिखना क्या सही है?सभी भारतीयों को सोचना चाहिए।

जगदीश भाटिया ने कहा…

अरे भाई, बहुत गड़बड़ है, रोमन में च और छ का, द और ड का तथा त और ट का कोई अंतर नहीं रहता और अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
मैंने तो कई बार टिप्पणियों को स्वंय देवनागरी में परिवर्तित किया है जिससे दूसरे पाठकों को कोई गलत फहमी न हो।
कभी अलग इमेल में बतायेंगे कैसे कैसे अर्थ के अनर्थ निकले हमारे चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों के :)

अतुल शर्मा ने कहा…

आपके इस गदहा ने भी अपनी दुल्लती साली से बड़ी करारी चोट की है। परंतु इस गदहा के के अंत मे कोई पदहा नहीं लगाया आपने?

Pramod Singh ने कहा…

आप हैं कि नहीं हैं?.. हमारे लिए तो रहस्‍यवाद बना हुआ है..

Sanjeet Tripathi ने कहा…

गुरुवर, क्या क्या बनेंगे आप।
बाकी सब तो ठीक है पर गदहा गुरु हमें स्वीकार्य न होगा हां, कहे देते हैं।

मस्त रचना, शुक्रिया

रंजू ने कहा…

बहुत अच्छा लगा :):)

Rajesh Roshan ने कहा…

समीर जी बहुत सही लिखा है। शीर्षक तो बड़ा डराने वाला है। जैसा आप डर गए थे हम भी डर गए लेकिन पढने के बाद राहत है :) :)

Beji ने कहा…

सीरीयस से मूड में बैठी थी....उडन तश्तरी उड़ी....तो देखा....

कितना हँसायेंगे आप??

आप सचमुच मस्त गदहा लेखक हैं....और मैं कोयल!!

अपनी दुल्लती साली सँभाल कर रखे....कभी जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल कीजिये।

mamta ने कहा…

मजा आ गया । आपके लेख तो हमेशा ही अलग होते है। शीर्षक देख कर तो हम चौंक ही गए थे।

Shrish ने कहा…

हा हा हा, मजा आ गया पढ़कर वाकई फुरसतिया जी और आप सबसे बढ़े गदहा लेखक हो और हम सब आपकी दुल्लती साली के कोयल हैं।

इस विषय पर सर्वज्ञ पर रोमनागरी नामक लेख पढ़ना न भूलें। आपके इस लेख का लिंक भी वहाँ डाल देते हैं।

काश हम भी आपके जैसे गदहा लेखक होते। :(

नीरज दीवान ने कहा…

बाली उम्र में आपको आत्मज्ञान हो गया. गधत्व को उपलब्ध होने पर बधाई स्वीकार करें.

Amit ने कहा…

खूब, शीर्षक द्वारा तो वाकई आपने असमंजस में डाल दिया था! ;)

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

अंग्रेजी में लिख कर कोई दिखा गया है लगा आईना
वरना हम प्रभुत्व के मद में झूम रहे थे बस मुस्काते
वरना आप और हम कैसा लिखते हैं इसकी गुत्थी को
हल कर पाता कौन ? नहीं जो मित्र प्रशंसक ये सुलझाते

गीतकार ने कहा…

अब आदरणीय ओम प्रकाश आदित्य बतला ही गये थे:

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है
जो खेतों में दीखे वो फ़सली गधा है
जो माईक पे चीखे वो असली गधा है

चूँकि जब उन्होंने लिखा था तो देश काल की समस्यायें और साधन भिन्न थे. आज के साधन और. समाज के तहद उनकी इस रचना को ऐसे कहना चाहिये :

जो गलियों में गरियाये, कच्चा गधा है
जो कोयल सा चिल्लाये सच्चा गधा है
जो टिपियाये चिट्ठे पे फ़सली गधा है
जो नुक्ते लगाये वो असली गधा है

उन्मुक्त ने कहा…

:-) :-)

dhurvirodhi ने कहा…

मेरे कहने को तो कुछ बचा ही नहीं है.
जो मेरे पूर्ववर्तियों ने कहा है उन सभी गदहों को यहां कापी-पेस्ट कर लीजिये.

sajeev sarathie ने कहा…

मूड खराब था .... आपने हंसा दिया ...thanks

Mrinal Kant (मृणाल कान्त) ने कहा…

दिन भर् की थकान निकल गयी हंस हंस कर।

वैसे तो मै आपकी और फुर्सतिया के सारे लेख् पढ्ता हूं, लेकिन आज कमेन्ट किये बिना रहा नही गया

लेख के लिये धन्यवाद्

अरुण ने कहा…

वाह वाह मजा आ गया, पूरी महफ़िल सजी है सुबह एक था अब पैतीस
कूहू
कूहू

राजीव ने कहा…

पहला (मूल) पाठ ही सही है। यदि आप स्वामी समीरानन्द कहलाते हैं तो आप वास्तव में गदहा (गधा नहीँ) हैं। मेरी जानकारी में महापुरुष शब्द का एक पर्याय "गदहा" भी होता है। जाँच करें और यदि ठीक हो तो इस पर एक स्पष्टीकरण / स्वीकृति पोस्ट से नवाज़ें ।

गायत्री ने कहा…

शुक्रिया...आपका ब्लॉग देखा, ...बहुत उम्दा है व्यंख पढ़ कर मज़ा आ गया गदाह लेखक पर

Sagar Chand Nahar ने कहा…

आपभी कभी कभी हँसा हँसा कर पेट दुखा देते हो। पर हमें इस तरह पेट दुखाना अच्छा लगता है।

लिखते रहें गदहा लेखन, हम दुलत्ती खाने तैयार हैं।

Tarun ने कहा…

sat sat naman guru kya arth ka anarth kiya hai ya kahoon ki kya anarth ka arth kiya hai. lagta hai tippani bhi aapki aur arth bhi ....ha ha maja aa gaya

Divine India ने कहा…

वाह समीर भाई…,
रंग हमेशा की तरह आपका जमा ही रहता है…अब क्या कहे हमें लगता है की कही अगली बारी मेरी तो नहीं तो दो-चार बार पुन: पधारेगे और अपना स्पेलिंग देख लेंगे…। :) :) :)

Laxmi N. Gupta ने कहा…

समीर जी,

गदहा लेख़्न अवश्य ही हिन्दी साहित्य की एक विधा होगी जो हमारे और आपके विदेश आगमन के बाद ईजाद की गई होगी। किन्तु यह कैसे हुआ कि आपके लेखन को पढ़ के ये जनाब कोयल बन गए। यह जरूर ही कोई जन्तर मन्तर वाला मामला है। सँभल कर रहना।

बेनामी ने कहा…

Agar sahi akshro ko chun kar shabd banaaye jaye tho Roman main bhi sahi Hindi likhi jaa sakti hai. gadha ki jagah gadya hona chaahiye tha.

annapurna

rachana ने कहा…

वाह! मजेदार! टिप्पणी करने मे कुछ देर हुई, लेकिन हम भी आपके --- लेखन के ---- पाठक है‍!! सो टिप्पणी करना हमारा हक बनता है!

Udan Tashtari ने कहा…

आप सबका बहुत आभार .पढ़ते रहें पढ़ाते रहें. आते रहें, बुलाते रहें. धन्यवाद, मन आनन्दित है आप सबकी टिप्पणियां पाकर.

महावीर ने कहा…

समीर भाई, यह आपबीती तो कई साइटों पर देनी चाहिए जिससे रोमनी लोग इस रोमन-हिंदी का पीछा छोड़ें। हिंदी शब्दों के अंगरेजीकरण ने तो तबाही कर रखी है।
उधर 'a' के डंडे की हर शब्द पर ऐसी पूंछ लग गई है कि 'योग' का 'योगा' और ना जाने
क्या क्या कर डाला है। हमने एक बार 'योग' कह दिया तो कहने लगे, 'आपको हिंदी नहीं आती?'
इसी चक्कर में एक मित्र Arun का Aruna बन गया। बेचारे का लिंग-परिवर्तन ही कर डाला!
आपका लेख केवल व्यंग्य ही नहीं, ज्ञान वर्धक भी है।

P.N. Subramanian ने कहा…

अच्छी दुलत्ती मार दी

P.N. Subramanian ने कहा…

आनंद आ गया।