शनिवार, मार्च 18, 2017

चुनाव के बाद..



चुनाव के बाद बस दो तरह के नेता बचते हैं. एक जीते हुए और दूसरे हारे हुए.

आज जब बड़े दुखी मन से अपने तुरंत उप्र चुनाव हारे दोस्त के घर मातम जताने पहुँचा तो वह तो उसी गर्म जोशी से मिले जैसे पहले मिलते थे. नाई चंपी करके जा रहा था. नौकर जलेबी और समोसे की प्लेट के साथ गरमा गरम चाय परोस रहा था. उन्हें देख कर लगा कि जैसे मैं चुनाव हार गया हूँ और वो मुझे ढाढस बँधाने तैयार बैठे हैं. मुस्करा कर कहने लगे कि यार, पहले सरकार चलाने और फिर इधर चुनाव के चक्कर में ही उलझे रह गये. परिवार के लिए वक्त ही नहीं मिला इसलिए कल दुबई जा रहे हैं. परिवार के साथ छुट्टी मनाने १० दिनों के लिए. थोड़ा आराम भी तो जरुरी है.

हम तो गये ही यह पूछने थे कि चुनाव हारने के बाद अब क्या प्लान है? क्या कोई नया धंधा वगैरह तलाशेंगे? घर परिवर चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा? चुनाव में जब चंदा मांग रहे थे तभी हमें लग गया था कि बंदा अपनी पूँजी चुक गया है,,वरना किसी से मांगने की क्या जरुरत? चुनाव में उनके द्वारा उड़ाई रकम देख कर लगा था सारी की सारी पूँजी भी खर्च कर ही दी होगी. मगर आज उनका हाल देखकर तो लगा कि चुनाव हार कर मानो लाटरी लग गई हो. बंदा सपरिवार दुबई जा रहा है छुट्टी मनाने. हम तो विभाग से एलटीसी मिलने के बावजूद भी मात्र आगरा, जयपुर और नैनीताल घूम पाये हैं छुट्टी मनाने.

अब गये थे तो पूछना भी जरुरी था कि भाई साहब, लौट कर क्या सोचा है, क्या करना है?

कहने लगे कि करना क्या है? अगले चुनाव की तैयारी करनी है..वाईफ को सत्तारुढ पार्टी ज्वाईन कराना है. बस और क्या!!

इस बार जरा सा चूक गये एक दो साथियों को पहचानने में. अगली बार तो हम ही जीत रहे हैं..ग्राऊण्ड रिपोर्ट है हमारे पास...चाहो तो शर्त लगा लो. ये जो जीते हैं न...इनकी कोई औकात थोड़े न है..वो तो हमारे अपने साथी सेबोटाज़ न करते तो इनकी जमानत जब्त हो जाती. बाप बेटे की लड़ाई के चलते हमारे शहर में अपने ही विद्रोही हो लिए.

हमने कहा चाहे जैसे भी जीते हों मगर उन्होंने तो आपको और आपकी पार्टी को सिरे से साफ कर दिया. वे हँसने लगे – बोले, तुम्हें राजनीति की समझ नहीं है. यहाँ न तो कोई सिरा होता है न ही कोई छोर, जो कोई किसी को सिरे से खत्म करे और न ही चुनाव के बाद क्या होगा जैसी कोई सोच....जो भी ऐसी सोच रखता है वो नेता हो ही नहीं सकता..

अगर नेता हो तो चुनाव में हारो या जीतो..नजर अगले चुनाव पर ही होना चाहिये. जो बीत गई वो बात गई.

और हमारी या आपकी पार्टी जैसी अवधारणा भी मूर्ख ही पालते हैं. नेता अजर अमर है. नेता मूल रुप से राजनिती की आत्मा है और पार्टी शरीर. पार्टियाँ बदलती रहती हैं.

इनकी बात सुन कर मुझे याद आया कि कभी हमारे गुरु जी ने न जाने किस संदर्भ में उदाहरण दिया था कि जरायम पेशा लोगों से यह पूछना जेल से लौट कर क्या करने का इरादा है? वो भला क्या यह बतायेगा कि लौट कर साधु हो जाऊँगा? उसका तो सीधा सादा एक जबाब होगा कि अगला असामी देखूँगा कि किसको निशाना बनाना है. पकड़ा गया तो एक बार फिर जेल यात्रा. ये तो सतत प्रक्रिया है हमारे पेशे की. विचार किया तो पाया कि दोनों पेशों के बीच है भी तो बहुत झीनी सी लकीर, जिसके इस पार उस पार आना जाना भी सतत प्रक्रिया ही है. मानो भारत और बंग्लादेश की सरहद हो.

एक सांस आती है. फिर एक सांस जाती है. इसके बाद सांस आने का इन्तजार छोड़ दें क्या? नेता जी मुस्कराते हुए समझा रहे हैं..

नेता जी की सिंगापुर की टिकिट देने के लिए बंदा आ चुका है.

क्या दुबई क्या सिंगापुर..विदेश तो विदेश है..नजर भी न गई इस ओर...

-समीर लाल ’समीर’
#जुगलबन्दी #jugalbandi
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बुधवार, मार्च 15, 2017

फेस बुकिया कैसे कैसे


कई लोग फेस बुक पर इस तरह लाईक करते नजर आते हैं मानो कोई नेता रोड़ शो में सबका हाथ हिला हिला कर अभिवादन कर रहा हो. देखा पहचाना किसी को नहीं, हाथ हिलाया सबको. इनका संघर्ष मात्र इतना सा है कि आप देख लो कि यह सक्रिय हैं और आपको पसंद करते हैं.
एक सज्जन है उनके बारे में दावे से कह सकता हूँ कि या तो वो कोई टू डू टास्क टाईप की लिस्ट मेन्टेन करते हैं कि किस दिन किस की वाल पर जाना है या फिर तोते से नाम की पर्चियाँ कढ़वाते हैं, तोता जिनके नाम निकाल दे, उन्हीं के वाल पर निकल लिये और धड़धड़ाते हुए सबसे नई पोस्ट से लेकर पिछली बार की लाईक की आखिरी पोस्ट तक लाईक करते चले गये.७ मिनट में १७ आलेख वो भी ५००-५०० शब्दों वाले लाईक किये और ये चले. इनका नाम लिमका बुक में फास्टेस्ट रीडिंग में दर्ज होना चाहिये.
उनकी बेइन्तहा लाईक देखकर कई बार लगने लगता है कि सही उम्र के मोड़ पर मिले होते तो मोहब्बत हो गई होती. इतना भी भला कोई किसी को चाहता है क्या?
इनसे उपर की पायदान पर वे फेसबुकिया बैठे हैं जिनकी वाल आपके भरोसे चलती है. वे मात्र शेयर में भरोसा रखते हैं. जो पोस्ट दिखी, बस शेयर. आपको भी अच्छा लगता है कि उनको इतना अच्छा लगा कि शेयर किया है अपने चहेतों के बीच और जाकर देखिये तो शेयर पर एक भी लाईक नहीं. इनकी वाल लदी रहती है शेयर्ड पोस्टों से और यह निर्लिप्त भाव से उस बोझ को बढ़ाते चलते हैं. आपने नेताओं के साथ ऐसे समर्थक को जन प्रचार के वक्त डोर टू डोर अपने पहचान वालों के यहाँ ले जाकर मिलवाते देखा होगा जो दरवाजा खोल कर मिल तो लेते हैं, मगर उनके चेहरे के भाव साफ कहते हैं कि चलो, मिल लेते हैं मगर हमसे कोई आशा न रखना.
फिर वो दिग्गज हैं जिनकी लिए किसी ने इमोटिकॉन बनाये होंगे. वे निश्चित ही पोस्ट पढ़ कर ही इमोटिकॉन चिपकाते होंगे, वरना खुशी में नाचने वाला, चिंतन में आँख घुमाने वाला और गुस्से में लाल मूँह वाला इमोटिकॉन चिपकाना भी आसान काम नहीं. यह मात्र अपने को जमीन से जुड़ा नेता दिखाने की कोशिश मात्र है बिना टिप्पणी लिखने की मेहनत किये हुए. जैसे वो सारे राज्य सभा के सदस्य. जनता के प्रतिनिधी, जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा चुने हुए या उनके द्वारा नामित हुए वाले.
फिर आते हैं असल ग्राऊण्ड ट्रोडन..जमीन से जुड़े नेता. पूरा कायदे से पढ़ेंगे, पढ़ कर सारगर्भित टिप्पणी करेंगे और अपने द्वार पधारने का निमंत्रण भी देंगे. सुधार के सुझाव भी छोड़ जायेंगे. नमन है इनको निश्चित ही मगर इनकी आड़ में कई लिख कर दिखने जैसा कट पेस्ट लगाने वाले कि बहुत खूब, उम्दा, सतीक, बेहतरीन...आदि वो लोग हैं जो मात्र इस लिए चुनाव जीत जाते हैं कि फलानी पार्टी के हैं और उस पार्टी की लहर क्या सुनामी चल रही है..इनसे सतर्क रहना चाहिये थोड़ा सा..बहुत नहीं.
कुछ तो अध्यात्म के उस अंतिम मुकाम पर पहुँचे पीर हैं जो हर घटित होने वाली घटना को मात्र साक्षी भाव से निहारते रहते हैं. वे फेसबुक पर होते हुए भी नहीं हैं. देखते सब कुछ हैं मगर बस साक्षी भाव से. न लाईक करते हैं न कमेंट और न ही शेयर. यह महामना इन सब से बहुत उपर उठ चुके हैं. कभी व्यक्तिगत तौर पर मिलो तब जान जाओगे जब ये कहेंगे कि हाँ, देखी थी तुम्हारे पोते की फोटो, बहुत प्यारा है या फिर कि काफी जगह घूम आयेहो इन छुट्टियों में...यात्रा वृतांत अच्छा था. ये फेसबुक की अनजान कुंदराओं में बैठे फेसबुकिया बाबा हैं. अक्सर किसी प्रदेश के गवर्नर या कभी कभी देश के मुखिया बनने की भरपूर गुजांइश लिए लोग.
एक और होते हैं जो टैग करते हैं, मगर हम उनके बारे मॆं कुछ नहीं कहेंगे क्यूँकि यह काम अलग अलग उद्देश्यों से किया जाता है, हर बात में राजनिती नहीं होती. बात तो हमने निर्दलियों की भी नहीं की.
ये फेसबुक है कि राजनीत का अखाड़ा...हम भी कहाँ की लेकर बैठ गये..आप तो बस कमेंट करो जी!!
-समीर लाल ’समीर’
आज मार्च १६,२०१७ के भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में

http://epaper.subahsavere.news/c/17556138
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मंगलवार, मार्च 14, 2017

होली पर भंगेड़ियों के लिए जनहित में जारी वैधानिक चेतावनी


कृप्या भांग के नशे में निम्न कार्य न करें:
  • बुलेट ट्रेन के आने का इन्तजार कतई न करें. जो भी पैसेन्जर ट्रेन मिले, लटक कर निकल लिजिये. कभी न कभी गंतव्य पहुँच ही जायेंगे.
  • अच्छे दिन आ चुके हैं, यह आप खुद अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके बता चुके हैं अत: अब अच्छे दिन का इन्तजार करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ गया है.
  • ई वी एम मशीन कभी सॉरी नहीं बोलती, जो बोल दिया है वो ही सत्य है. अतः भांग के नशे में आकर इस जनमत के बदलने का इन्तजार मत करना.
  • स्मार्ट सिटी स्मार्ट शहरवासियों से बनती है, इसलिये अपने शहर के स्मार्ट होने का इन्तजार न करें. खुद स्मार्ट बनिये और सबको बताने लगिये कि आपका शहर अब स्मार्ट हो गया है. इसी तर्ज पर सभी शहर स्मार्ट हो जायेंगे.
  • भांग के नशे में उपजे किसी भी क्रांतिकारी विचार को फेसबुक या व्हाटसएप्प पर डालने की हिम्मत मत करिये, वरना परिणाम घातक सिद्ध हो सकते हैं.
  • बैंक खाता खोलना जरुरी है, खोलिये मगर उसका इस्तेमाल मत करिये, वरना महिने में ४ बार से ज्यादा इस्तेमाल के बाद हर बार दण्ड भरना पड़ेगा.
  • नोटबंदी पर बात करना भी अब सश्रम दंडनीयअपराध है. इसमें पेरोल पर भी छूटने का कोई प्रावधान नहीं है. पूरा देश (उप्र + उत्तराखण्ड) जब इससे इत्ता खुश है तो इससे दुखी व्यक्ति मात्र अराजकता फैलाने के लिए दुखी दिखा माना जायेगा.
  • सेल्फी खींच कर फेसबुक पर डालने के पहले फोटो में एक बार अपने आसपास देख लें कि कहीं कोई कचरा तो नहीं फेला है. स्वच्छ भारत अभियान का साथ न देना नैतिक अपराध माना जायेगा. आप धरे जा सकते हैं.
  • डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम लागू कर दिया गया है, अतः मात्र इसलिए कि कोई देख नहीं रहा है, कुछ भी ऐसा क्रांतिकारी बयान न दें जिससे आप धर लिए जायें. हमेशा किसी बड़े शायर का यह शेर ध्यान रखें 
ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं
मसरूफ हम बहुत हैं ; मगर बेखबर नहीं ...

 इन सारी सावधानियों के बाद भी जब नशा टूटे तो सब से जाने अनजाने में हुई अपनी भूलों के लिए क्षमा अवश्य मांग लिजियेगा. इसके लिए फेस बुक और व्हाटसएप्प पर स्टेटस लगा सकते हैं.
इतना समझाने के बाद भी अगर न माने, जो कि आप नहीं ही मानेंगे तो आप अपनी सुरक्षा का इन्तजाम स्वंय करें. मित्र जबाबदार नहीं होंगे.

डिस्क्लेमर: इसे मात्र होली का हुड़दंग के सिवाय कुछ भी मान लेने वाले अपनी समझ के लिए खुद जिम्मेदार माने जायेंगे.

-समीर लाल समीर
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शनिवार, मार्च 11, 2017

होली का हुड़दंग

होली हो और भांग न पी जाये तो फिर वो होली कैसी?
भांग पियें और बकैती न करें तो फिर वो भांग कैसी?
मित्र बाद में बकैती का मजाक न उडायें तो वो मित्रता कैसी?

मजाक उड़ाने के दौरान पता चली अपनी कुछ भंगेड़िया बकैतियों की बानगी:
दृश्य १
बस अब बहुत हुआ. इस साल तो पहले से भी इतना अच्छा लिखना है कि साहित्य सम्मान खुद आकर हमारे गले लटक कर धन्य हो जाये. आज के दिन हम बस तुम लोगों को बता रहे हैं, नोट कर लो..कि इस साल का साहित्य सम्मान हमको मिलकर ही रहेगा. कलम को पिचकारी मान कर शब्दों के ऐसे रंग उकेरेंगे कि हमारे रंग बिरंगे साहित्यिक व्यंग्यों के रंग में पूरा साहित्य जगत रंग जाये. लोग कह उठेंगे कि यह हीरा अब तक कहाँ था?
मुन्ना मित्र मंडली में बैठा आँख मलते हुए लल्लु से समझने की कोशिश कर रहा हैं कि क्या इसका मतलब यह हुआ कि आज तक भईया अच्छा लिखते आये थे, जो कह रहे हैं कि पहले से भी इतना अच्छा लिखना है? दूसरा हमारे रंग बिरंगे साहित्यिक व्यंग्यों के रंग सुन कर पहली बार जाना कि भईया जो लिखते हैं उसे व्यंग्य कहते हैं.. बाकिया तो समझ आया कि भगवान का वरदान श्याम वर्ण के रुप में जो भईया जी ने पाया है तो कोयला ही तो आगे चल कर हीरा बनता है..जाहिर है लोग आश्चर्य करेंगे ही कि अब तक कहाँ था? अरे साहेब, भईया जी यहीं थे मगर कोयला थे तो आप ध्यान नहीं दिये इन पर.बस्स!!
लल्लु मुन्ना को हड़का रहा है, चुप कर गुड़बक!! तुम नहीं समझोगे ये साहित्यिक बातें.
मुन्ना मूँह लटकाये बैठे हैं.
दृष्य २
हम अगले टॉपिक को सोचते हुए अगला भांग का गिलास चढ़ा रहे हैं.
सारे मित्र भांग का गिलास बनाने और निपटाने में जुटे हैं.
लल्लु मुन्ना को गले लगाये उसे हड़काने के लिए ग्लानिमग्न हुए रो रहे हैं
मुन्ना रोते हुए लल्लु से कह रहे हैं कि आप मेरे भाई हो आप को अधिकार है कि आप मुझे हड़कायें और पीटें भी.
दृश्य ३
हम घोषणा कर रहे हैं कि अब से फ्री में लिखना बंद. किसी को हमारा लिखा छापना है तो पैसे दो, वरना हम नहीं लिखेंगे. आज से ही और अभी से ही इस बात का संज्ञान लिया जाये.
मुन्ना लल्लु से पूछ रहे हैं कि भईया अब से बिल्कुले नहीं लिखेंगे क्या?
लल्लु मुन्ना को समझा रहे हैं कि हिन्दी में लिख कर ऐसे सपने देख रहे हैं इसका मतलब समझते हो?
लल्लु कहे कि नहीं समझे, इसका क्या मतलब है?
मुन्ना बता रहे हैं कि भईया को भाँग चढ़ गई है...और कोई खास बात नहीं है!!
दृश्य ४
जो मित्र नशे में नहीं है वो प्रसन्न हैं कि अब से ये नहीं लिखेंगे.
जो मित्र नशे में हैं वो रो रहे हैं कि अब से ये नहीं लिखेंगे.
खैर!! देश भी तो ऐसे ही चलता है..यही जीवन की धारा है..मुद्दा एक ही होता है जिसे लिए कोई रो रहा होता है तो कोई प्रसन्न हो रहा होता है!!
होली मुबारक!!
भांग संभल कर पीने के वैधानिक चेतावनी का ध्यान रखें!!
-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, मार्च 09, 2017

टुकड़े टुकड़े में बंटी जिन्दगी...


हम देश से इतनी दूर बैठे देश को सोचते हैं जहाँ हाल में चुनाव हुए हैं.
पता ही न चला कि देश के चुनाव हैं, कि प्रदेश के या फिर शहर विशेष के...
अब चुनाव हो चुके हैं..निर्णय पेटियों में बंद हैं..
ये सारे सर्वे वाले इस बात को जानते हैं कि हम क्या सोचते हैं.
आकाशवाणी सुनने की क्षमता अब भी बरकार है इतने सालों बाद भी जबकि इस देश में ऐसी वाणी मौन है.
सर्वे वाले आकाशवाणी कर रहे हैं...हम सुन रहे हैं..हमारे संस्कार बाकी हैं अभी चुपचाप सुनने के...
इनकी बकर अच्छी लगती है जबकि मालूम है यह हकीकत नहीं..
बचपन से हर तिलस्मी बातें अच्छी लगने के संस्कार लेकर बड़े हुए हैं...
यही सीखा है जिन्दगी से...खुश रहने का भी यही एक मात्र तरीका है..
चंदा मामा आयेंगे...दूध मलाई लायेंगे..
अब चंदा मामा ग्यारह तारीख को आयेंगे तब देखेंगे कौन सी दूध मलाई आई है.
आयेगी तो दूध मलाई ही...मगर किसके लिए...वही तो सर्वे उछाल रहे हैं?
पेट का सवाल तो उनके सामने भी है...क्या करें वो भला...अतः उत्पात आवश्यक है उनके भी..
मगर यह तय है कि किसी न किसी राजनीतिक दल के लिए तो दूध मलाई आयेगी..हंडिया में..
बच रही आम जनता तो वो फिर ठगी सी रह जायेगी..
ग्यारह तारीख तक जो भी सपने देखने हो देख लो आम जनों..
फिर हकीकत का हाथ थामे..अपनी पुरानी जिन्दगी में लौट जाना
अगले पांच साल के लिए अपने सपने कैद में डाल देना...
फिर उन्हें जब पाँच साल बाद खोलना तो इसलिए
कि अगर घुन लग गया हो..तो धूप दिखा दी जाये...
वरना फिर बंद हो जाना तो नियति है ही..अगले पाँच साल के लिए..
मानो सर्दी सर्दी नेप्थानाल की गोली के साथ स्वेटर बंद कर रहे हो पेटी में..
और तुम इस बात से भली भाँति परिचित हो...हर बार तो दोहराते हो..
पाँच पाँच साल में बंटी
हकीकत और सपनों की दुनिया..
-समीर लाल ’समीर’


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सोमवार, मार्च 06, 2017

हे करण जोहर- तुम पहले कहाँ थे!!!!


करण जोहर का सरोगेसी के माध्यम से पिता बन जाने का धमाका आज ऐसा गुँजायमान है कि उसकी धमक में नार्थ कोरिया की छोड़ी मिसाईलें अपनी धमक खो बैठी...सारे मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियाँ बस इसी पर नागिन डांस चल रहा है मानो कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना!!

एकाएक राजेश रेड्डी का शेर याद आया:
मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,
बड़ों की देख के हालत बड़ा होने से डरता है --------

...राजेश रेड्डी से माफी के साथ मेरी कलम यूँ फिसली कि:

उसके दिल के किसी कोने में इक दबंग सा मर्द
पतियों की देख के हालत पति होने से डरता है....

मगर एक पति बनने के डर के मारे पिता बनने के सुख से वंचित रह जाओ, ये तो सरासर नाइंसाफी है. कोई जरुरी है क्या कि गुलाब का फूल तोड़ने के हम अपने हाथ कांटों से जख्मी करवा कर लहू लुहान हो जायें वो भी तब जब कि बाज़ार में गुलाब का फूल काँटे वांटे साफ करके मिल रहे हैं.

जब हम बाज़ार से सबसे मँहगा वाला हॉलैण्ड का गुलाब खरीद कर अपने कोट में फंसा कर घूमने निकलेंगे तो लोग पूछेंगे ही कि भाई जी, गज़ब गुलाब है? कहाँ से लाये?

ऐसे में दुकान का नाम और कीमत ही तो बतायेंगे न!! इस बात का चिट्ठा लेकर तो नहीं घूमेंगे न कि किस माली ने तोड़ा? उसको कांटा चुभा क्या?

विवाहित पुरुषों के एक सर्वे के मुताबिक, नाम न छापने की शर्त पर, ८७.३८ प्रतिशत पतियों नें करन जौहर को ब्रिलियन्ट माना है और कहा है कि अगर पहले से मालूम होता तो वो इसी राह पर चलते मगर अब तो इट ईज टू लेट.
उनसे जब पूछा गया कि क्या आप अपने बेटों को करण जैसा स्टेप लेने के लिए प्रोत्साहित करेंगे तो इस पर उनका जबाब था कि एक जरुरी काम याद आ गया है...बस!! उसे निपटा कर आता हूँ..ये फैसला बच्चों की माँ लेगी.

हल्ला है कि करन जोहर का नाम हो रहा है और उस बेचारी माँ के नाम का जिक्र भी नहीं जिसने इस सरोगेसी को अन्जाम दिया..हद है हल्ला उठाने वालों का भी..सरोगेसी मे से कॉन्फिडेन्सियल्टी गायब हो जायेगी तो बचेगा क्या? ये तो वही बात हुई कि सी आई ए का जासूस कहीं जासूसी करने घुसने के पहले अपना विजिटिंग कार्ड दे कि मैं सी आई ए से हूँ और आपके यहाँ जासूसी करने आया हूं जी...कृप्या मुझे गुप्त बातें बताई जावें!!

सरोगेसी से माँ बनना एक व्यापार है.. अपनी कोख समाज सेवा हेतु नहीं..जीविकोपार्जन हेतु किराये पर दे रही हैं. उनकी कोख है, उनका अधिकार है कि किराये पर दें या न दें? कोई जबरदस्ती नहीं करता उनके साथ.

पैदा करने वाले से बड़ा स्थान पालने और संस्कार देने वाले का होता है जीवन में.. ऐसे में यह प्रश्न चिन्ह कि पैदा नहीं कर सकते थे तो सरोगेसी क्यूँ? जबाब कि पैदा नहीं कर सकते इसीलिए सरोगेसी...

मैने कनाडा में अनेक सेम सेक्स वाले जोड़े देखें हैं जिन्होंने बच्चे गोद लिए हैं. उनका पालन पोषण देखकर किसी भी तरह उन्हें कमतर नहीं कहा जा सकता और वहीं नार्मल शादी किये पति पत्नी अपनी पैदा की हुई औलाद के सामने लड़ लड़ कर ऐसा उदाहरण पेश किये दे रहे हैं कि बच्चा सुबह शाम मनाता है कि इससे बेहतर तो फोस्टर पेरेन्ट ही रहेंगे...फास्टर पेरेन्ट वो होते हैं जिनको सरकार दूसरों का बच्चा अपने बच्चे की तरह पालने के लिए बच्चे के खर्च के साथ पालने की फीस देती हैं.

वक्त और मौके की नजाकत है ऐसे में करन जौहर ने जो किया वो उनका फैसला है. बच्चों को तो एक धन धान्य से परिपूर्ण घर मिला..भविष्य तो उज्जवल होगा ही...

बॉर्न विथ सिल्वर स्पून..


-समीर लाल ’समीर’
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रविवार, मार्च 05, 2017

लब आजाद हैं मेरे...


आज तक गाँधी, भगत सिंग, सन ४७ आदि का जिक्र सुनते ही मानट पटल पर बैकड्राप में आजादी की आवाज गूँज उठती थी लेकिन एकाएक कुछ समय से अभिव्यक्ति का जिक्र आते ही यही गूँज धमाका बन कर सुनाई देने लगी है उसी आजादी वाले बैकड्राप के साथ. वैसे हम शादी शुदा पुरुषों को इस तरह की अभिव्यक्ति की आजादी के स्वपन भी नहीं देखना चाहिये किन्तु फिर भी माहौल को कैसे नजर अंदाज करें?
कभी जिस अभिव्यक्ति के साथ भावनात्मक, रचनात्मक जैसे विशेषण जुड़ा करते थे आज वही आजाद और बोल्ड बनी, आजादी के साथ गलबहिंया किये खड़ी अभिव्यक्ति की आजादी के नारे लगा रही है
सब के सब लामबद्ध होकर इस बात को स्वीकार करते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी है. मगर जब तक अभिव्यक्ति उनके स्तुति गान करे तब तक तो ठीक वरना अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग और इस आजादी का दुरुपयोग देशद्रोह कहला रहा है, भले ही यह आजादी देश की नहीं अभिव्यक्ति की थी.  
जैसे किसी बाबा जी के कहने पर कि सारी इच्छायें त्याग कर प्रभु में ध्यान लगाओ और सारे भक्त आँख मूँद कर प्रभु में ध्यान लगाने हेतु सारी इच्छायें त्यागने में जुट जाते हैं और भूल जाते हैं कि सारी इच्छायें त्यागने की इच्छा भी तो एक इच्छा ही है. उसी तरह निष्पक्षों की एक बड़ी जमात ने अपना एक अलग पक्ष बना लिया है.
वे इस अभिव्यक्ति की आजादी के प्रणेता और देशद्रोहियों के बीच होती कुश्ति पर नित सोशल मीडिया में अफसोस जाहिर करते हुए देखे जा सकते हैं. ये चुनावी सभाओं की उन लोगों की भीड़ के समान हैं जो हर पार्टी की सभाओं में जा कर भीड़ बढ़ा आते हैं मगर वोटिंग के दिन पिकनिक मनाने निकल जाते हैं. इनका सभाओं में होना चुनावी परिणामों पर कोई मायने नहीं रखता मगर इनकी तादाद बहुत बड़ी होती है. वैसे ही यह निष्पक्ष गुटेरे हर तरफ अफसोस जाहिर करते नजर आते हैं मगर अभिव्यक्ति की आजादी के बसह को इनके माध्यम से कोई मुकाम नहीं मिलता.
अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करना, उसके लिए नारे बुलंद करना और इस आजादी का परचम लहराने के लिए एकाएक कोई बोल्ड सा बयान दे देना आजकल सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी कहलाने का माध्यम एवं स्टेटस सिम्बाल सा बन गया है.
अभिव्यक्ति की आजादी के छप्पर के नीचे खड़े होकर कही गई एक बोल्ड पंक्ति भी साहित्य के ऊँचे मंच से खड़े होकर कही गई १५०० पंक्तियों की रचनात्मक अभिव्यक्ति को पछाड़े हुए है. हालात यूँ बने कि पछाड़ खाते खाते जब परेशान होकर वही साहित्यकार उसी आजादी वाले छप्पर के नीचे जाकर गुस्से में एक पंक्ति की हुँकार लगा आता है, तब जाकर लोगों को पता चलता है कि इन्होंने १५०० पंक्तियों वाली कोई रचनात्मक अभिव्यक्ति भी की हुई है.
ग्लोबल वार्मिंग की तरह ही इस अभिव्यक्ति की आजादी के माहौल की गर्माहट का हर क्षेत्र में कुछ न कुछ असर दिख रहा है. अखबार और पत्रिका कहते हैं कि अपनी व्यंग्य रचनायें भेजिये, हम छापेंगे. एकदम निष्पक्ष होकर लिखिये बस थोड़ा सा ध्यान रखियेगा कि एक तो सरकार और उसकी नीतियों पर तंज हो...(बिना बताये समझ लें कि विज्ञापन तो वहीं से आयेगा) और दूसरा स्पेस कन्सट्रेन्ट तो आप जैसे लेखक समझते ही हैं अतः आलेख ५०० शब्दों से ज्यादा का न हो.
अब ऐसा आजाद और निष्पक्ष लेखन निश्चित शब्द सीमा में करना उसी तोते की आजादी जैसा है जिसका पूरा आसमान उसके पिंजड़े की सीमा रेखा है. पंख तो हैं, पिंजड़े में से नीला आसमान भी नजर आता है और उड़ना भी मना नहीं है मगर पिंजड़े में उड़े भी तो भला कैसे? जुबान भी है, बोल भी लेता है. गाली देना भी आती है और गुस्सा भी आता है पिंजड़े में बंद रखने के लिए मगर बोलता है तो सिर्फ राम राम, आखिर सुबह शाम खाना देने वाले को गाली बके भी तो कैसे?
राम राम भी शायद इसीलिए बोलता होगा ताकि कम से कम इतना अहम जिन्दा रहे कि सुन लो, लब आजाद हैं मेरे!!

-समीर लाल ’समीर”
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