शनिवार, अक्टूबर 17, 2020

आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स और मशीन लर्निंग से बदलती दुनिया

 



पान की दुकान पर मुफ्त अखबार के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त करने को अगर विश्व विद्यालय किसी संकाय की मान्यता देता तो तिवारी जी को निश्चित ही डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा जाता। डॉक्टरेट बिना मिले भी वह पान की दुकान पर प्रोफेसर की भूमिका का निर्वहन तो कर ही रहे थे। जो कुछ भी अखबार से ज्ञान प्राप्त करते, पान की दुकान पर उन्हीं की तरह फुरसत बैठे लोगों को अपना छात्र मानते हुए उनके बीच ज्ञान सरिता बहाते रहते। सब कुछ व्यवस्थित है, एक मान्यता को छोड़ कर। मान्यता नहीं है, इसलिए तो प्रोफेसर तिवारी को इस हेतु कोई तनख्वाह मिलती है और ही छात्रों से कोई शुल्क लिया जाता है।

छात्रों की हाजिरी भी तिवारी जी बस मुस्कराते हुए ऐसे लेते किजिंदा हो? कल दिखे नहीं’? छात्र का मन हो तो जबाब दे वरना पान सुरती दबाए चुप खड़ा मुस्कराता रहे। बस इसी मामले में इनकी कार्यशैली और व्यवहार सरकारी विद्यालयों से मिलता है।

आज तिवारी जी हाल ही में हुए विश्व स्तरीय सम्मेलनआर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स के क्षेत्र में भातर के विश्वगुरु बनने की संभावनापर व्याख्यान दे रहे थे। यह विषय तो उपस्थित छात्रों के लिए एकदम अनजाना था। अतः तिवारी जी बिना व्यवधान के खुद की समझ के अनुसार सही गलत जैसा भी हो, बोल रहे थे। अनजाने विषय में यह सुविधा रहती है। जिस तरह हमारे शहरी नेता कभी CAA तो कभी NRC तो कभी कृषि बिल पर जनता को समझाने लगते हैं जबकि पता उन्हें भी कुछ नहीं होता।

तिवारी जी बता रहे हैं कि भविष्य वर्तमान से एकदम अलग होगा। अब तक तो निरबुद्ध चालाक लोग आपको बुद्धू बनाते थे किन्तु इस योजना के तहत असली बुद्धि वाले लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स (कृत्रिम बुद्धि) वाली मशीनें बनाएंगे जो इंसानों की तरह काम करने लगेंगी। उनके अंदर इंसानों की तरह ही अनुभव और माहौल से नित सीखते जाने की क्षमता (मशीन लर्निंग) भी होगी।

इंसान को गलतियों का पुतला माना गया है। इंसान के जोड़ घटाने में गलती हो सकती है इसीलिए केलकुलेटर से जोड़ कर उसे सत्यापित किया जाता है। इस सत्यापन की विधि से तो कुछ लोग आज भी इतना प्रभावित हैं कि कंप्यूटर  से जुड़ कर निकले बिल को पहले जुबानी जोड़ते हैं और फिर केलकुलेटर से जोड़ने के बाद ही उसे सही मानते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स वाली मशीन और इंसानों में यही फरक है। वो भी पहले पहल ऐसा ही करेगी। फिर वो सीख जाएगी कि कंप्यूटर  से निकला जोड़ बार बार सही रहा है अतः उसे आगे से सही मानकर पुनः सत्यापित करने की आवश्यकता नहीं हैं।

सम्मेलन में बताया गया कि कैसे और कब चीन विश्व का मैन्युफैक्चरिंग हब बना। अब भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स का हब बनने की काबिलियत रखता है। अगले २० से २५ साल के अंदर ऐसा हो जाने की संभावना है।  हालांकि जो कुछ पिछले -  बरसों में हो जाने की संभावना थी, उसमें से क्या हुआ और क्या नहीं, उसके ट्रेक रिकार्ड को खंगालने की आवश्यता नहीं है। सदैव आगे देखो और चलते रहो की नीति पर चलना ही विश्व गुरुतत्व प्राप्त करने का मार्ग है।

इतना ज्ञान पटकने के बाद तिवारी जी ने अपनी वाणी को विराम दिया और नया पान मुँह में भर कर गलाने लगे।

लोगों के दिमाग में तरह तरह के प्रश्न रहे थे कि जब हर तरफ मशीनें काम करने लग जाएंगी तो हमारे रोजगार जो बिना इनके हुए भी खत्म होते जा रहे हैं, उनका क्या होगा। कोई सोच रहा था  कि माना मशीन गल्तियों का पुतला हो तो भी गलती तो कर ही सकती है। कहीं गलती हो गई और मिसाईल वगैरह छोड़ दी तब?   

अब बारी तिवारीजी के सबसे मेधावी छात्र घंसू की थी। घंसू जानना चाहता है कि इसमें भिन्न क्या है?

आज असली बुद्धिमान इंसान याने कि मास्साब अपने असली छात्रों की बुद्धि में असली ज्ञान का भंडार भरते हैं और तब असली बुद्धि वाले अपने ही द्वारा निर्मित मशीनों की कृत्रिम बुद्धि में असल ज्ञान भर रहे होंगे।

असली छात्र बुद्धिमानी लेने के साथ साथ अपने आसपास के माहौल और तौर तरीकों से सीखता हुआ समाज में अपनी दक्षता के हिसाब से स्थापित हो जाता हैकोई अधिकारी बनाता है। कोई कामगार तो कोई नेता और कोई ज्ञान गुरु बाबा। कोई व्यापारी बन जाता है तो कोई अभिनेता। कोई चोर तो कोई डकैत। कोई ईमानदार तो कोई भृष्ट।

कृत्रिम बुद्धि वाली मशीनें भी अपने आस पास के माहौल से सीखेते सिखाते समाज में इन्हीं को तो रिप्लेस करेंगी और उन्हीं बातों को अंजाम देंगी। बल्कि बिना गलती के और आज से अधिक तेजी से।

आज जब सरकारी कछुआ चाल ने इतने सालों में सोने की चिड़िया को एक विलुप्त प्रजाति बना दिया है और दूध की नदियों का दूध पानी में बदल दिया है। तब घंसू सोच रहा है कि जब यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स वाली मशीनें इंसानों को रिप्लेस कर देंगी, तब सोने की चिड़िया को स्मृति से भी विलुप्त होने में और नदियों के दूध से बदले पानी को भाप हो कर गुम जाने में कितने दिनों का वक्त लगेगा?

अरे अगर कुछ बनाना ही है तो ऐसा कुछ बनाओ जो आज के असंवेदनशील हो चले समाज की बुद्धि में कुछ ऐसा भर दे कि उसकी संवेदनाएं पुनः जागें। वो एक बार फिर सहिष्णु हो जाये। इंसान जब सुबह उठ कर आईना देखे तो उसमें उसे इंसान ही नजर आए -हैवान नहीं।   

तिवारी जी ने इतनी देर से मुँह में गलता पान, स्वच्छता अभियान में अपने योगदान स्वरूप एक जोरदार पीक के साथ सड़क पर थूका और अपने घर की राह पकड़ी।

कल फिर जो हाजिर होना है अखबार से अर्जित अगले ज्ञान के साथ।

-समीर लालसमीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अकतूबर १८, २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/55742528

 

 

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शनिवार, अक्टूबर 10, 2020

सम्मान समारोहों का स्वर्णिम युग

 

सबके अपने अपने शौक होते हैं। उसे सम्मान समारोह देखने का शौक था। मौका लगा तो व्यक्तिगत तौर पर हाजिर हो कर अन्यथा टीवी पर। यहाँ तक कि अखबार में भी सम्मान समारोहों की रिपोर्ट देख कर वो गदगद हो जाता। फिर वो चाहे उके मोहल्ले का कोई आशु कवि सम्मानित किया जा रहा हो या किसी को भारत रत्न से नवाजा जा रहा हो। जब भी किसी को सम्मानित किया जाता, वह बहुत प्रसन्न होता। तालियाँ बजाता। संभव होता तो सम्मानित को बधाई देता और साथ में तस्वीर भी खिंचवाता।

सम्मानित व्यक्ति भी सम्मानित होने से अधिक सम्मान की बधाई और चर्चा से ही प्रसन्न होता है। ऐसा सम्मान दो कौड़ी का होता है, जिसकी न तो बधाई मिले और न समाचारों में चर्चा हो। अखबार में छपी सम्मान की खबर की कटिंग जब तक फेस बुक, व्हाट्स एप्प, ट्विटर आदि पर लगाकर भरपूर बधाई न ले लो, तब तक कैसा सम्मान?

सम्मानित का सम्मान करना वो अपना परम कर्तव्य मानता था। उसे न कभी स्वयं सम्मान प्राप्ति का कोई लोभ हुआ और न ही किसी सम्मानित से ईर्ष्या और न ही किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा का भाव। सम्मानित से ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा न करने का यह दुर्लभ स्वभाव ही उसे सम्मान समारोह में पधारे अन्य गणमान्यों से अलग बनाता था।

इस दुर्लभ एवं विलक्षण स्वभाव के चलते सभी सम्मानित उसे बड़े सम्मान से देखते। हालत यह हो गई कि अब जब किसी को सम्मान मिलना होता, वो उसे समारोह में आने जाने रहने का खर्चा देकर बुलाने लगे। सारी तालियाँ बज कर जब रुक जाएं तो भी एक ताली की आवाज जो सबसे आखिरी में रुकती, वो उसकी ही होती।

ख्याति और उम्र में एक समानता होती है कि अगर चलती रहे तो सदा आगे ही बढ़ती है। अतः उसकी भी ख्याति सम्मानितों के बीच बढ़ती चली गई और उसका यह अद्भुत शौक व्यवसाय में परिवर्तित हो गया। अब वह आने जाने रहने के खर्च के साथ साथ मानदेय भी लेने लग गया था। अब व्यस्तता के साथ साथ उसे पैसे की भी कोई कमी न रही। कहते हैं पैसे से पैसा आता है। तभी ये नेता चुनाव में इतना पैसा खर्च करते हैं। सम्मानितों के बुलावे पर आते जाते सम्मान समारोहों के आयोजकों के बीच भी उसका याराना हो गया। अब उसका बिजनेस मोडेल त्रिकोणिय हो गया था। पहला सम्मानितों से सम्मान समारोहों में आने का मानदेय लेना। दूसरा सम्मान प्राप्ति के इच्छुक सम्मानलोलुपों से महचाही रकम लेकर आयोजकों की मिलीभगत से उन्हें सम्मानित कराना। तीसरा फिर इन पेड सम्मानितों के सम्मान समारोह में आने का मानदेय। जैसा कि बड़े लोगों के साथ अक्सर होता है वैसे ही उसके ही कुछ खास लोगों ने नाम न जाहिर करने के आश्वासन पर उसके व्यापार का एक चौथा सबसे दुधारू कोण भी बताया कि वह आजकल कई सम्मान समोरोह खुद ही छद्म नामों से आयोजित कर रहा है।       

सम्मान समारोहों के इस स्वर्णिम युग में सम्मान समारोहों और सम्मानितों की बाढ़ आई हुई है। महानगरों से लेकर शहर, कस्बे, गली मोहल्ले सब इस बाढ़ की चपेट में हैं और इस स्वर्ण काल का असली स्वर्ण उसके आँगन में बरस रहा है। इस बाढ़ में बहे सम्मानित सम्मान से भीगे शरीर को सम्मान में मिले दुशाले से घिस घिस के सुखा रहे हैं और वो अपने आँगन में बरसते स्वर्ण कणों को सोने की ईटों में तब्दील कर रहा है। उसे आज समझ में आ रहा है कि हमारे नेता बाढ़ आने पर इतना खुश क्यूँ होते हैं।

वक्त हरदम एक सा कहाँ रहता है। एकाएक वो दौर भी आया जब लोग बात बात पर सम्मान वापस करने लगे। सम्मान वापसी का वो दौर भी अजब था। एक ओर सम्मान समारोहों और सम्मानितों की बाढ़ सुनामी का रूप ले रही थी वहीं दूसरी तरफ सम्मान वापसी की नहर भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी। तकलीफ मात्र इतनी सी थी कि सम्मानित सम्मान वापस कर लौटते हुए उसके दरवाजे पर रकम वापसी के लिए दस्तक देते।

व्यापार में एक बार सफलता लग जाये तो बुद्धि स्वतः कुशाग्र हो जाती है। स्कूल में बामुश्किल पास हो पाने वाला व्यक्ति भी जब बड़ा व्यापारी बन जाता है तो बड़े बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों के दीक्षांत समोरह में मुख्य अथिति बना ज्ञान की वर्षा करता है। वो भी अब कुशाग्र बुद्धि का मालिक हो गया था। अतः रकम वापसी को तुरन्त तैयार हो गया। उसके इस रकम वापसी वाले स्वभाव के चलते वो अब सम्मान वापसी कर सम्मानित से असम्मानित में तब्दील हुए लोगों के भी सम्मान का पात्र हो गया।

उसे मालूम है कि एक बार सम्मानित होने की लत लग जाये तो आसानी से नहीं छूटती। आज सम्मान वापस करके लौटने वाले कल फिर सम्मानित होने की कतार में खड़े होंगे और वो आज लौटाई रकम को मय ब्याज पुनः वसूल कर लेगा।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अकतूबर ११, २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/55575204

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शनिवार, अक्टूबर 03, 2020

घोटालों के राज की तरह ही कई चीजें एकाएक खुलती हैं

 


आज तिवारी जी सुबह सुबह चौक से दाढ़ी मूंछ सेट करवा कर और बाल रंगवा कर जल्दबाजी में  घर लौटते दिखे। साथ ही धोबी से प्रेस करवा कर अपना कुर्ता भी लिए हुए थे। मैंने उन्हें प्रणाम करके जब चाय पीने की पेशकश की तो वो कहने लगे कि ये चाय वाय के ठेले पर बैठ कर गप्प सटाका करना तुम निट्ठलों का काम है। मुझे समझ नहीं आया कि हरदम खाली बैठे रहने वाले तिवारी जी जो हमेंशा इसी फिराक में चौक की पान की दुकान पर बैठे रहते थे कि कोई चाय पिलवा दे, उनको अचानक क्या हुआ? ऐसी कौन सी व्यस्तता आ गई कि चाय की दुकान पर बैठने वाले सभी निट्ठले नजर आने लगे। व्यस्तता न हुई जैसे कोई ज्ञान हो गया, जरा सा आ क्या जाये, सारी दुनिया मूर्ख नजर आने लगती है।

दूसरों के बारे में  बेवजह जानने की उत्सुकता ही शायद इंसानों को जानवरों से भिन्न करती हो, अतः मैं भी इंसान होने का कर्तव्य निभाते हुए तिवारी जी के साथ टहलते हुए उनके घर की तरफ ही चलने लगा। हालांकि उनका घर मेंरे घर से विपरीत दिशा में है मगर अपने घर जाकर तो उनकी व्यस्तता का पता चलेगा नहीं। रास्ते में  मैंने उनसे उनकी व्यस्तता की वजह जाननी चाही। एकाएक गंभीर भाव से उन्होंने बताया कि आज तीन मंच करना है और अब तो यह लगभग रोज ही की व्यस्तता हो चली है।

मैं अज्ञानी समझ न पाया कि मंच करना क्या होता है? मैंने कहा कि चुनाव आने वाले हैं इसलिए मंच बनाने का ठेका लेने लगे हैँ क्या? वह मेंरी अज्ञानता पर झुंझलाहट भरा ठहाका लगाते हुए कहने लगे कि ३-३ कवि सम्मेलनों में  शिरकत करनी है। कविताएं पढ़नी हैं। सब अलग अलग शहरों में  हैं और एक तो अमरीका में  है।

मेंरी तो बुद्धि ही चकरा गई कि कोई व्यक्ति एक ही दिन में  दो अलग अलग शहरों में और फिर उसी दिन अमरीका में भी कवि सम्मेलन में कैसे शिरकत कर सकता है? हालांकि मैं यह तो जानता हूँ कि कई कवि एवं विद्वान साहित्यकार बिना अमेंरिका गए भी अपने बायोडाटा में  अमरीका एवं अन्य अनेकों देशों की यात्रा लिखते लिखते अमरीका हो भी आए।

मैं हँसा और मैंने तिवारी जी से कहा कि माना आपके मन में आगे चल कर चुनाव लड़ने का विचार है। लेकिन अभी तो आपको सत्ता मिली भी नहीं है और फेंकने में तो आप सत्ताधीष को भी पछाड़ दे रहे हैं।

उन्होंने सभी बुद्धिजीवियों द्वारा कहा जाने वाला वाक्य दुहराया कि तुम नहीं समझोगे! अरे, आजकल कवि सम्मेलन के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता, घर से बैठे बैठे कंप्यूटर से हो जाता है। सारी दुनिया जान गई है ज़ूम, टीम, फेसबुक लाईव और भी न जाने क्या क्या!! मगर तुम निट्ठलों को चाय की दुकान पर गप्प मारने से फुरसत मिले तब न।  

घोटालों के राज की तरह ही कई चीजें एकाएक खुलती हैं। उसी तर्ज पर एकाएक मेंरे ज्ञानचक्षु खुले। मैंने जाना कि  कैसे आजकल सुबह से रात तक कवि सम्मेलन चला करते हैं। सुनने वाले तारीफ में कमेंट कर करके अपने होने का पता देते हैं ताकि अगले कवि सम्मेलन में उनको भी बुलाया जावे और जिनको आज बुलाया है वो उस वक्त सुनने आवें। उन्होंने बताया कि आम कवि सम्मेलन की तरह ही ऑनलाइन कवि सम्मेलन के भी कई गुर एवं हथकंडे हैं, जो इसे अलग विधा बनाता है। उस पर फिर कभी विस्तार से तुमसे बात करूंगा।

मैंने कहा जी बस एक शंका का निवारण और कर दें कि आपने कुर्ता प्रेस करा लिया और पायजामा क्यूँ नहीं?   

वो बोले इस हेतु प्रशासनिक समझ की जरूरत होती है। मंत्री जी की जायजा यात्रा के दौरान उतना ही हिस्सा सजाया जाता है जो उन्हें दिखाया जाना है। पायजामा भला स्क्रीन में कहाँ दिखता है। आजकल पायजामें की प्रेस का और जूता पालिश का खर्च तो एकदम रुक गया है, यह बड़ा आराम है। मैंने पूछा मगर कवि सम्मेलन के पैसे भी तो मिलना बंद हो गए होंगे? इस पर वह शरमाते हुए कहने लगे कि पैसे तो पहले भी नहीं मिलते थे, इस बहाने कम से कम कवि सम्मेलन तो मिलने लगे। 

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर ४, २०२०

http://epaper.subahsavere.news/c/55406849

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शनिवार, सितंबर 26, 2020

आजकल मैं समय लिख रहा हूँ

 


वे उन दिनों कम ही निकल रहे थे घर से। जब कभी दिखते भी तो हाथ में एक डायरी और कलम जरूर लिए रहते। मैंने दो तीन बार उनसे जानना चाहा कि आजकल कहाँ रहते हैं और यह डायरी और कलम साथ में लेकर चलने का क्या राज है? हर बार वह अजीब सा मुँह बनाकर कहते कि ‘बस ऐसे ही, तुम नहीं समझोगे।‘

मैं इस विचारधारा का घोर समर्थक रहा हूँ की जब व्यक्ति स्वयं की ही हरकत समझ नहीं पाता तब ही दूसरे के पूछने पर कहता है कि तुम नहीं समझोगे। ऐसा मैं आज अपने चारों ओर देख रहा हूँ। कुछ लोगों ने तो इसी के चलते पूछने पर ही पाबंदी लगा दी है ताकि यह भी न कहना पड़े कि ‘तुम नहीं समझोगे?’

खैर, एक दो दिन बाद फिर वह चौक पर नजर आए। वैसे ही  हाथ में डायरी और कलम थामें। आज खुद उन्होंने आगे बढ़ कर प्रणाम किया। ऐसा वो प्रायः तभी करते हैं जब उनको आपसे कोई काम निकलवाना हो जैसे  हमारे नेता चुनाव के दौरान करते हैं। बाकी समय तो वो मान कर चलते हैं कि ‘तुम नहीं समझोगे।’ इससे पहले कि वो कुछ कहते, हमने फिर वही प्रश्न दोहराया। कहने लगे कि चलो, उस चाय की दुकान पर बैठ कर बताते हैं। चाय नाश्ता भी हो जायेगा और चाय पर चर्चा भी।

चाय नाश्ता आते ही वह चर्चारत हुए। कहने लगे कि ‘आजकल मैं समय लिख रहा हूँ’ समझे? मेरे कानों में महाभारत टीवी सीरियल का ‘मैं समय हूँ’ गूँज उठा पूरे शंखनाद के साथ। मैंने पूछा कि वो महाभारत वाले समय की आत्मकथा लिख रहे हैं क्या? मुस्कराते हुए कहने लगे- मैं जानता था कि तुम नहीं समझोगे। चलो तुमको इसे सरल शब्दों में समझाता हूँ।

एकदम से मुझे पुनः ख्याल आया कि मैं इस विचारधारा का भी घोर समर्थक रहा हूँ कि जब कोई अपनी ही कही किसी बात को सरल शब्दों में समझाने की पेशकश करे, तो यह तय है कि सरल शब्द पहले कही गई बात से भी अधिक कठिन होने वाले हैँ अन्यथा तो वो पहली बार में ही अपनी बात सरल शब्दों में कर लेते और मामला यहाँ तक न पहुंचता।

नेताओ को मंचों से अपने प्रस्तावित विधेयकों को आम जनता को सरल शब्दों में समझाते देखने और सुनने के घोर अनुभव के बाद ही मैं उपरोक्त विचारधारा का समर्थक हुआ हूँ।

वह सरल शब्दों में बोले कि दरअसल मैं भविष्य का इतिहास लिख रहा हूँ।

अब वह मेरे चेहरे पर उभरे प्रश्न चिन्ह को मुस्कराते हुए पढ़ रहे थे। कहने लगे कि एक चाय और मंगाओ, मैं तुम्हें विस्तार से समझाता हूँ। हालांकि मैं उस विचारधारा का भी घोर समर्थक रहा हूँ जिसमें इंसान सामने वाले को विस्तार से समझाने के लिए इतना आमादा हो जाता है कि सामने वाला समझने पर हो जाये।

उन्होंने अबकी बार विस्तार से समझाना शुरू किया। अपनी डायरी खोल कर दिखाई। पहले दो पन्नों में अपना नाम, पावन जन्म स्थल, जन्म तिथि, परिवार, बचपन से कुशाग्र बुद्धि के मालिक एवं कुछ उनके शौर्य के किस्से एवं बहादुर  होने का परिचय, प्रारंभिक शिक्षा आदि का विवरण, घर से भाग जाने का विस्तृत वृतांत, फिर एकाएक ‘उच्च शिक्षा -स्नातक एवं स्नातकोत्तर’ वाले हिस्से में शीर्षक के बाद एक पैराग्राफ की खाली जगह, फिर प्रारंभिक संघर्ष गाथा जिसमें साइकिल चलाना सीखने से लेकर उसी साइकिल से शहर तक चले आने, जिसे उन्होंने देशाटन का नाम दिया, की कथा। फिर कुछ खाली पंक्तियों के बाद नया शीर्षक ‘उपलब्धियां एवं गौरव’ के बाद पूरी कोरी डायरी।

दो लिखित और ९८ अलिखित पन्नों की डायरी को जब उन्होंने विस्तार से समझाया, तब निश्चित ही मेरी  मंदबुद्दि के बावजूद उसमें कुछ प्रश्न कौंधे कि यह ‘उच्च शिक्षा -स्नातक एवं स्नातकोत्तर’ और ‘उपलब्धियां एवं गौरव’ वाले हिस्से खाली क्यूँ हैँ?

वे पुनः मुस्कराये कि तुम नहीं समझे न? मुझे मालूम था कि ‘तुम नहीं समझोगे।’ यह ‘उच्च शिक्षा -स्नातक एवं स्नातकोत्तर’ वाला हिस्सा तो चुनाव जीतते ही भर जायेगा। बस, जरा पावर हाथ आने दो। बाकी सब सेट है।

मैंने कहा कि चलिए वो तो मान भी लें लेकिन ‘उपलब्धियां एवं गौरव’? उसका क्या – आज तक तो आपने ऐसा कोई काम किया नहीं है जिसे उपलब्धियां एवं गौरव गिना जा सके। ले दे कर मोहल्ले के जिस मकान में आप किराये पर रहते थे, उसके अहाते में आपने वृक्षारोपण समारोह कर बरसों पहले एक फल का पेड़ लगाया था। पेड़ जब बड़ा हुआ तब लोगों को पता लगा कि पेड़ तो बबूल का था और उसकी जड़ें भी विकास करते हुए इतनी विकसित हो गई कि अहाते की दीवार ढहा गईं और फल के नाम पर कांटे ही कांटे। यह ‘उपलब्धियां एवं गौरव’ वाला डायरी का हिस्सा तो कोरा का कोरा ही रह जाने वाला है।

चाय नाश्ता कर लेने के बाद दूसरी चाय भी अब खत्म हो चुकी थी अतः वे पुनः मुस्कराये और बोले ‘तुम नहीं समझोगे।’

दरअसल एक बार चुनाव जीत कर मुझे कुर्सी पर काबिज तो हो जाने दो फिर तो मेरे चाहने वाले इस हिस्से को खुद ही लिख लिख कर इतना भर डालेंगे कि इतने पन्ने भी कम पड़ जायेंगे। इसके लिए मुझे कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।

वाकई वो कितना सही कह रहे थे और मैं मूर्ख समझ ही नहीं पाया। ‘उच्च शिक्षा -स्नातक एवं स्नातकोत्तर’ वाला हिस्सा तो चुनाव जीतते ही भर गया और ‘उपलब्धियां एवं गौरव’ वाले पन्नों पर पन्ने भरते चले जा रहे हैं और उनको कुछ करने की जरूरत भी नहीं पड़ रही है।

-समीर लाल ‘समीर’


भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर २७,२०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/55240664


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शनिवार, सितंबर 19, 2020

सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है।

 


कहते हैं आज के इस कोविड काल में सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है। सकारात्मक सोच एवं सुरक्षात्मक उपाय अपनाते रहें तो शायद इस काल का पार कर जाएं।

शुरुवात में तो दिन दिन भर बैठ कर यही देखते थे टीवी पर की कितने और मरे? हर बढ़ते आंकड़े के साथ दिल की धड़कन बढ़ती जाती। जितनी बार वो टीवी पर विज्ञापन आते कि हाथ साबुन से २० सेकेंड तक धोते जाओ, उतनी बार उठाकर हाथ धोने जाते। फिर सीएनएन ने बताया की जितनी देर मे दो बार हैप्पी बर्थ सांग  गाओगे, २० सेकेंड पूरे हो जायेगे। देखते देखते धुलते धुलते हाथ बाकी के शरीर से गोरा हो गया और कंठ हैप्पी बर्थडे गाने में माहिर मगर करोना का भय टिका रहा यथावत।

विशेषज्ञों ने सलाह दी कि टीवी दिन में एकबार १० मिनट के लिए देखो वो भी सिर्फ यह देखने के लिए कि सरकार का कोई नया आदेश तो नहीं आया जो आपको पालन करना है। टीवी देखना बंद कर दिया। हाथ धोना बंद नहीं किया अतः भय मानस पर छाया रहा। अब हैप्पी बर्थ डे याने तुम जिओ हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार गाते हुए लगता कि करोना उससे अपने लिए गाया मान कर दिन प्रति दिन विस्तार प्राप्त कर रहा है। आखिर दुनिया भर में उसे याद करके कितने सारे लोग हाथ धोते हुए यही गा रहे है तो दुआओं का असर तो होना ही था। जब गुडडु ये गाना १ साल की उम्र से सुनते आज ८० के होकर चुस्त दुरुस्त हैं तो भला करोना का क्या बिगड़ना है। यही सोच कर अब गाना बिना गाए हाथ धोने लगे हैं।

टीवी पर समाचार देखने की आदत तो शराब पीने की लत से भी ज्यादा खराब बताई गई है। शराब और गांजे की आदत तो छुड़वाई जा सकती है। मगर टीवी पर समाचार देखने का चस्का ऐसा होता है कि बिना देखे जीवन नीरस लगने लगता है। दरअसल दूरदर्शन वाले समाचारों में वो नशा न था जो आजकल वालों में हैं। धूमधड़ाके के साथ ऐसा लगता है समाचार नहीं, कोई फिल्म देख रहे हैं जिसकी एकदम मस्त पटकथा लिखी गई है, सटीक डॉयलॉग लिखे गए हैं और जैसा निर्देशक ने चाहा है वैसा ही मनभावन अभिनय किया गया है अपने फाइनेंसर का पूरा ध्यान रखते हुए। हर समाचार रूपी फिल्म का उद्देश्य मात्र इतना की फाइनेंसर को किसी न किसी रूप से फायदा मिलता रहे। फाइनेंसर आका होता है। उसे नाराज नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है की जिसने भी उसे नाराज किया है, उसकी दुकान सिमट गई है।

खैर टीवी का नशा छुड़ाने के लिए सोशल मीडिया का हाथ थामा तो पाया की यह तो गाँजा छुड़ाने के लिए चरस पीने लगे। व्हाट्सअप्प, ट्वीटर, फेसबुक, ईमेल जहाँ जाओ, वहाँ करोना पसरा पड़ा है। कोई इलाज बता रहा है तो कोई इसे लाइलाज बता रहा है। कुछ बुद्धत्व को प्राप्त लोग इसे बीमारी मानने को ही तैयार नहीं और इसे अफवाह बता कर निकल जा रहे हैं।  कोई घर पर हैन्ड सेनेटाइज़र बता रहा है तो कोई इम्यूनिटी बढ़ाने का तरीका मगर ले देकर बात करोना की ही हो रही है और हम अभी भी हाथ धो धो कर करोना भगाने में लगे हैं और वो दिमाग पर चढ़ अपनी विकास यात्रा में लगा है।

लगने लगा की कहां चले जाएं जहाँ इसकी कोई बात न हो। कोई जिक्र ही न आए और यह हमारे सिर से उतरे। कहते हैं न कि उदण्ड बच्चे की बदमाशी बंद करवानी हो तो उसे इग्नोर करो। उसकी बात ही न करो। थोडी देर में अपनी उपेक्षा देख कर वो बदमाशी करना बंद कर देगा।

मगर वैसी कौन सी जगह है? क्या देखूँ -क्या सुनूँ? कुछ नहीं समझ आता- जित देखूँ तित लाल की तर्ज पर हर तरफ करोना की बात – कारोना मय वातावरण।

तब एकाएक एक ईश्वर का भेजा कोई दूत मुझे मन की बात सुनने की सलाह दे गया। तब जा कर इस बैचेन दिल को करार आया। न करोना की कोई बात, न आंकडे और न इससे होने वाले नुकसानों की कोई बात। अहा!! कोई तो ऐसी जगह मिली। आराम से बैठो- देशी कुत्तों की प्रजातियाँ जानो। मोर को दाना खिलाओ। सब सुनो बस करोना को छोड़ कर। ऐसे शुद्ध वातावरण और करोना मुक्त स्थल आज बचे कहाँ हैं।

आज फिर हमने अपने आपको विश्व गुरु साबित कर दिया। मैं करोना भय से मुक्त हुआ। आपको भी भय मुक्त होना है तो मन की बात सुनो।

गौतम बुद्ध भी कहा करते थे की जब बाहर बहुत कोलाहल हो तो मन की बात सुनना चाहिए। आज जाकर उनकी बात का गूढ़ अर्थ समझ आया।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर २०,२०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/55078867


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