शनिवार, अगस्त 08, 2020

जादूनगरी से आया है कोई जादूगर



नाम है सेवकराम। वह शुरू से पैदावार के पक्षधर रहे। पैदावार में उनकी अटूट आस्था का चरम यह रहा कि जब गाँव मे भीषण सूखा और अकाल पड़ा, तब भी उनके घर में मुन्ना पैदा हुआ। बाकी बरसों में जब जब खेतों में फसल लहलहाती, उनके आँगन में भी नई नई किलकारियाँ गूँजा करतीं।
उनका दूसरा स्वभाव खुद किसी भी बात का श्रेय न लेने का था। अपने खेत में भी चाहें वह खुद कितनी भी मेहनत करके फसल की पैदावार करें, श्रेय सदा मजदूरों को देते। उनका मानना था कि बिना इन मजदूर भाईयों के पसीना बहाये इतनी फसल कभी न होती। इसी वजह से मजदूर और मेहनत करते और वह फसल बेचकर मजदूरों को अच्छी मजदूरी देते। उनके परिवारों का ख्याल रखते और पूरे गांव में खुशहाली पैदा करते। इस तरह मजदूरों की मदद से धन पैदा करके वह खुद भी खासे धनवान हो चले थे।     
देखते देखते उनके आंगन में एक पूरी क्रिकेट टीम मय अंपायर के तैयार हो गई। खुद कभी श्रेय न लेने की आदत के चलते वह इस टीम को भगवान का दिया प्रसाद बताते। प्रसाद को जिस श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है, उसी तरह ग्रहण करते रहे।
उनका यही स्वभाव उन्हें न सिर्फ अपने मजदूरों के बीच बल्कि पूरे गांव में लोकप्रियता के चरम पर ले गया। जैसा कि लोकप्रियता का परिणाम होता है, उनके अंदर भी लोकप्रियता भुनाने की ललक पैदा हो गई, जिसे उन्होंने पुनः ईश्वर का प्रसाद एवं आदेश माना और वह सरपंच हो गए।  कहते हैं न कि वातावरण और माहौल मानसिकता पैदा करता है और इसीलिए शायद आपसी रिश्तों में रोमांस पैदा करने के लिए नवयुगल हनीमून मनाने कश्मीर और स्वीटजरलैण्ड जाते हैं।
राजनीति के वातावरण और माहौल में आते ही उनके भीतर भी कूटनीति और चालबाजी पैदा हुई किन्तु भीतर की पैदाइश का बाहर किसी को पता न लगने देना भी उनके चतुर्भुजीय स्वभाव का तीसरा कोण था। इसी स्वभाव के चलते गाँव वाले सिर्फ उनके आँगन में खेल रही क्रिकेट टीम से परिचित थे अन्यथा अगर भीतर की बात जानें तो वह सब मिला जुला कर कम से कम दो टीमों की मैनेजरी तो काट ही रहे थे। इसे भी वह ईश्वर का गुप्तदान की तर्ज पर दिया गया गुप्तप्रसाद मान कर गुप्त ही बनाए रहते।
सरपंची में भी समस्त कार्यों का श्रेय ठेकेदारों को देकर वह गुप्तदान प्राप्त करते रहे। इस तरह एकत्रित दान से पैदा हुई अकूत संपदा को भी कुछ ऐसा गुप्त रखा कि कोई कानों कान न जान पाया। गुप्त बनाए रखने की इस आदत ने लोकप्रियता में इत्र का काम किया। लोकप्रियता हवा के संग लहराती बलखाती गांव की सरहद पार करके पूरे राज्य में सर्वत्र फैल गई।
इस तरह सेवकराम ने पूरे राज्य की सेवा करने का अवसर पैदा कर लिया। इस सफलता की चढ़ाई चढ़ते हुए उन्होंने तमाम पायदानों को पाठशाला माना और लगन से चालबाजियों के नये नये पैंतरे सीखते रहे। हर पैंतरे को वो नए नए नाम देकर उनके नए स्वरूप पैदा करते। किसी को समाजसेवा, तो कभी जनहित और कभी गरीबों के प्रति अपना दुलार आदि आदि न जाने क्या क्या बताते। इन नामों की पैकेजिंग के भीतर क्या है, उसे वह आदतानुसार गुप्त ही रखते। इस तरह वह आमजन में उनके परिणाम के इन्तजार की ललक पैदा करते। जब इंतजार की घड़ियां असह्य होने लगती, तब वह एक नई ललक पैदा कर देते। सतत ललक की पैदावारी में वह महारत की उस चोटी पर जा पहुंचे, जहाँ से महारत जादूगरी नजर आती है।
इस जादूगरी ने उनके भीतर एक ऐसा जादूगर पैदा कर दिया जो एक पूरी आबादी को हिपनोटाईज करना जान गया था। वो गांव में कचरे के ढेर पर बैठे कव्वे को हरियाली भरे बाग में नाचता मोर बताता और सम्मोहितजन नृत्य करने को मचल उठते और उसका जयकारा लगाते। अब वह नित नए खेल दिखाता। सम्मोहितजनों को कभी देश को सिंगापुर तो कभी हस्तिनापुर बताकर नए नए नजारे दिखाता और तालियां बटरोता।
पैदावारी का वो आज भी उतना ही बड़ा पक्षधर है। इसी के चलते भले ही किसी को रोजगार मिले न मिले मगर वह रोजगार के अवसर पैदा करने में जुटा है। जिस वक्त आपदा की रोकथाम पर काम होना चाहिये, वह उस आपदा से अवसर पैदा करने में जुटा है।
बचपन में जादूगर पी सी सरकार का जादू देखने जाया करते थे और आज सेवकराम की सरकार का जादू। दोनों में ही तालियों की गड़गड़ाहट के रुकते ही अगला खेला पेश कर दिया जाता है। अंतर सिर्फ इतना है कि वो तीन घंटे दिखाते थे और ये पाँच साल।
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अगस्त ९ , २०२०




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रविवार, अगस्त 02, 2020

जो शौक नहीं पालते, उनकी जिन्दगी शोक में गुजरती है।


तिवारी जी शौकीन मिजाज के आदमी हैं। उन्हें गुस्सा होने का शौक है। वो कभी भी कहीं भी अपना यह शौक पूरा कर लेते हैं। उनके गुरु जी ने उन्हें बचपन में सिखाया था की हर इंसान को कोई न कोई एक शौक जरूर रखना चाहिये। जो शौक नहीं पालते, उनकी जिन्दगी शोक में गुजरती है। अतः गुरु की सीख को शिरोधार्य करते हुए कालांतर में उन्होंने गुस्से को अपना शौक बनाया। तिवारी जी उस जमाने के आदमी हैं जब गुरु का दर्जा मां बाप से भी ऊपर ईश्वर तुल्य होता था। अब तो न गुरु का कोई दर्जा है और न मां बाप का। आजकल तो बिना किसी दर्जे के विश्वगुरु बनने की होड़ में सभी जुटे हैं और गाली खा रहे हैं। खा तो वो और भी बहुत कुछ रहे  हैं मगर गाली सुनाई और सोशलमीडिया पर दिखाई दे जाती है।
आज तिवारी जी अखबार वालों से गुस्सा थे। उनका कहना है कि हम इस वैश्विक महामारी से नहीं डरते और न ही मौत से।  मगर मास्क इसलिए लगाए हैं की अगर गलती से वायरस लग गया और रिपोर्ट पाज़िटिव आ गई, तो ये अखबार वाले हमें मात्र ५६ साल की आयु में ही लिखेंगे कि ५६ साल का बुजुर्ग पॉजिटिव पकड़ाया। एक तो पकड़ाया ऐसे लिखते हैं मानो कोई डाकू पकड़ाया हो और उस पर ५६ साल की बाली उम्र में बुजुर्ग?
तिवारी जी उनको बुजुर्ग लिखा जाना बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। बीमारी से भले न मरें मगर बुजुर्ग कहे जाने का आधात उनका दिल नहीं बर्दाश्त कर पाएगा। वो तो ४ साल बाद होने वाले चुनाव लड़ने का मन इसीलिए बना रहे हैं ताकि शहर को युवा नेतृत्व प्रदान कर पायें। वैसे इनको जिनसे विज्ञापन मिलता है वो तो ७० साल में भी युवा और कर्मठ नेतृत्व करने वाला दिखाई देता है और बाकी हम ५६ साल में बुजुर्ग। इसीलिए ये अखबार वाले हमें पसंद नहीं हैं।
इसी शौक के चलते एक बार वे अपने मोहल्ले के कुछ लोगों से महज इस बात पर गुस्सा हो गए थे क्यूंकि  उन्होंने तिवारी जी नेता जी कह दिया। तिवारी जी का मानना है की वे समाजसेवी हैं और जब वे चुनाव लड़ेंगे तो नेतागिरी  के लिए नहीं, समाज की सेवा के लिए लड़ेंगे। नेता उनकी नजर में भृष्ट व्यक्ति होता है और वे अपने आपको नेता कभी नहीं कहलवाया सकते।
चूंकि वे पुराने समय के भावी युवा हैं अतः उनकी अपनी मान्यताएं और समझ है। वह नेता नहीं समाज सेवी हैं। उनका सहज और सरल जीवन एक साधु जीवन है तो वह स्वयं के लिए नहीं अपितु समाज के लिए जी रहे हैं। वह जनता को भाषण नहीं देते, वे उसे प्रवचन पुकारते हैं। उनके प्रवचनों में वादे नहीं, उच्च जीवन शैली हेतू सूक्तियां समाहित होती हैं। वह गरीबी दूर करने से लेकर रोजगार के कूत अवसरों को उपलब्ध कराने वाले वाक्यों को उच्च जीवन जीने की सूक्ति बताते हैं। समाज के शोषण, फिर वो चाहे जैसा भी हो उसे ईश्वर द्वारा निर्धारित तप और परीक्षा का वह कठिन मार्ग बताते हैं जिसकी आग में तप कर यह समाज सोना बनेगा और देश पुनः वही सोने की चिड़िया कहलाएगा जो न जाने कब और कहां उड़ गई। 
वह अपने गुस्सा हो जाने के शौक को भी समाज सुधार की दिशा में लिया गया एक कदम ही मानते हैं। उन्होंने तुलसी पढ़ा है और तुलसी की खासियत ही यही है की जिसका जो दिल करे वो उसे उन अर्थों में समझ कर व्याख्या कर ले। अतः ‘भय बिन होय न प्रीत गोसाई’ की तिवारी जी की व्याख्या यह है की भय के बिना कोई काम नहीं होता, यहां तक की प्रीत भी नहीं। अतः प्रेमपूर्वक काम करवाने हेतु उन्हें गुस्सा करना पड़ता है। उन्हें ज्ञात है की इस शौक का विपरीत असर उनकी तबीयत पर पड़ता है किन्तु समाज सेवा में समर्पित यह संत समाज की भलाई के लिए ये दर्द भी सहता है।
उनका विकास का मॉडल किसी प्रदेश का नहीं, अध्यात्म और ध्यान का है। उनका मानना है की अगर इंसान ने अध्यात्म और ध्यान का मार्ग अपना कर अपना चित्त शांत कर लिया तो वह खुशहाल हो जाएगा। फिर वह अगर रोडवेज की टूटी बस मे भी यात्रा करेगा तो इस बात से कृतज्ञ महसूस करेगा कि अगर यह न होती तो मैं आज थकाहारा पैदल जा रहा होता। जिस दिन समाज की ऐसी मानसिकता हो जाएगी तो उसे हर जगह विकास ही विकास नजर आयेगा। विकास हेतु मानसिकता विकसित करना जरूरी है।
मैं तो तब उनका मुरीद हो गया, जब उन्होंने अपने द्वारा  भविष्य में स्वीकार की जाने वाली रिश्वत को दक्षिणा बताया। वह दक्षिणा जो कि लोग उनके द्वारा समाज उत्थान हेतु किये गए कार्यों से अभिभूत होकर चढ़ावे में दे जायेंगे। कुछ और पूछने की हिम्मत मुझमें थी नहीं।
क्या पता मुझ पर ही न वो अपना शौक पूरा करने लगा जाएं। किसी के गुस्से से भला कौन नहीं डरता?
-समीर लाल ‘समीर’    

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के अगस्त ३,२०२० के अंक में:
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शनिवार, जुलाई 25, 2020

जाओ तो जरा स्टाईल से...


आज एक चिट्ठी आई. उसे देखकर बहुत पहले सुना हुआ एक चुटकुला याद आया.
एक सेठ जी मर गये. उनके तीनों बेटे उनकी अन्तिम यात्रा पर विचार करने लगे. एक ने कहा ट्रक बुलवा लेते हैं. दूसरे ने कहा मंहगा पडेगा. ठेला बुलवा लें. तीसरा बोला वो भी क्यूँ खर्च करना. कंधे पर पूरा रास्ता करा देते हैं. थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा. इतना सुनकर सेठ जी ने आँख खोली और कहा कि मेरी चप्प्ल ला दो, मैं खुद ही चला जाता हूँ.
चिट्ठी ही कुछ ऐसी थी. एक बीमा कम्पनी की. लिखा था कि अपने अंतिम संस्कार का बीमा करा लें. पहले बताया गया कि यहाँ अंतिम संस्कार में कम से कम ५००० से ६००० डालर का खर्च आता है और अक्सर तो १०००० डालर तक भी चला जाता है अगर जरा भी स्टेन्डर्ड का किया. साथ में पिछले १० सालों में बढ़े दाम का ग्राफ भी था. पहली नजर में ग्राफ देख कर लगा की इन्होंने भारत के पेट्रोल के भाव का ग्राफ क्यूँ भेजा है? पेट्रोल छिड़क कर जलाएंगे क्या घी के बदले? फिर ध्यान से पढ़ा तो इनके पैकेज का भाव था जो पिछले १० सालों में बढ़ा था. जरा विचारिये कि जब तक आप का नम्बर आयेगा तब तक मुद्रा स्फिति की दर को देखते हुए यह २५००० डालर तक भी हो सकता है. अब अंतिम संस्कार का मामला है, चाहे जो भाव कर दें, करना तो पड़ेगा. यूरोप घूमना तो मंहगाई के चलते आप टाल भी लो. 
आगे बताया गया कि आप अपनी मनपसन्द का ताबूत चुनिये, डिजाईनर. जिसमें आप को आराम से रखा जायेगा. कई डिजाईन साथ में भेजे ताबूत सप्लायर के ब्रोचर के साथ. सागौन, चीड़ और हाथी दाँत की नक्काशी से लेकर प्लेन एंड सिंपल तक. उसके अन्दर भी तकिया, गुदगुदा गद्दा और न जाने क्या क्या.
फिर आपके साईज का सूट, जूते, मोजे, टाई आदि जो आपको पहनाये जायेंगे पूरी बामिंग और मेकअप के साथ. फेमस मेकअप स्पेशलिस्ट मेकअप करेगी, वाह!! यह तो हमारी शादी में तक नहीं हुआ. खुद ही तैयार हो गये थे. मगर उस समय तो खुद से तैयार हो नहीं पायेंगे तो मौका भी है और मौके की नजाकत भी. मलाल इस बात का रह जाएगा कि न तो जिसने सजाया उसको देख पायेंगे और न ही सज धज हम कितने राजा बाबू लगे वो देख पायेंगे.
फिर अगर आपको गड़ाया जाना है तो प्लाट, उसकी खुदाई, उसकी पुराई, रेस्ट इन पीस का बोर्ड आदि आदि. अगर जलाया जाना है तो फर्नेस बुकिंग और ताबूत समेत उसमें ढकेले जाने की लेबर. सारे खर्चे गिनवाये गये. साथ ही आपको ले जाने के लिये ब्लैक लिमोजिन आयेगी उसका खर्चा. अभी तक तो बैठे नहीं हैं उतनी लम्बी वाली गाड़ी मे. चलो, उसी बहाने सैर हो जायेगी. वैसे बैठे तो ट्रक में भी कितने लोग होते हैं? मगर लेकर तो ट्रक में ही जाते हैँ.
हिट तो ये है कि आप हिन्दु हैं और राख वापस चाहिये तो हंडिया का सेम्पल भी है और उसे लकड़ी के डिब्बे में रखकर, जिस पर बड़ी नक्काशी के साथ आपका नाम खोदा जायेगा और आपके परिवार को सौंप दिया जायेगा. हिन्दुत्व का इतना विश्वव्यापी डंका बज रहा है और कोई बता रहा था कि हिन्दुत्व खतरे में है.
इतने पर भी कहाँ शांति-फूल कौन से चढ़वायेंगे अपने उपर, वो भी आप ही चुनें. गुलाब से लेकर गैंदा तक सब च्वाइस उपलब्द्ध है.
अब जैसी आपकी पसंद वैसा बीमा का भाव तय होगा. चाहो तो इत्र भी छिड़क देंगे. थोड़ा एक्स्ट्रा दाम और दे देना. अम्मा कहा करती थीं कि जितना गुड़ डालोगे, उतनी मीठी खीर बनेगी. खीर तो चलो अगर मीठी बनाते तो खाते भी खुद ही न. यहाँ तो जब निकल लेंगे उसके बाद की खीर पकवाई जा रही है.
तब से रोज उस बीमा वाले का फोन आता है कि क्या सोचा? जल्दी करिए वरना देर हो जायेगी. आधा दिल तो उसकी हड़बड़ी देखकर बैठा जाता है की पट्ठे ने कहीं कुंडली बांचना तो नहीं सीख लिया है इसलिए उसे पता है देर हो जायेगी? कोई आश्चर्य नहीं होगा की उसने कुंडली बांचना सीख लिया हो इस हड़धप में कि भावी विश्वगुरु की विधा में पारंगत रहेंगे तो काम ही आयेगा. 
क्या समझाऊँ उन्हें कि भाई, यह सब आप धरो. हम तो भारत के रहने वाले हैं. समय से कोशिश करके भारत लौट जायेंगे. यह सब हमको शोभा नहीं देता.
हमारे यहाँ तो दो बांस पर लद कर जाने का फैशन है, अब किसी का कंधा दर्द करे कि टूटे. यह उठाने वाला जाने और उस पर खर्चा भी उसी का. अपनी अंटी से तो खुद के लिये कम से कम इस काम पर खर्च करना हमारे यहाँ बुरा मानते है.
भाई, अमरीका/कनाडा वालों, आप लोगों की हर अदा निराली है. कम से कम ये वाली अदा तो आपकी आपको ही मुबारक.
समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 26,२०२० के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/53749498

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रविवार, जुलाई 19, 2020

खेल देखो और खेल की धार देखो


करोना ने जब भारत में अपनी विकास यात्रा आरंभ की थी, तब खबर आ रही थी की जेलों में इसका विकास ठीक उसी मॉडल पर होगा जिसे दिखाकर देश अमरीका से भी आगे निकल जाने वाला था। जहाँ नजर पड़े बस विकास ही विकास। गोया कि विकास न हुआ -मानसून आने पर मचा कीचड़ हो की जहाँ नजर जाये वहीं पोखरे भरे हुए और कीचड़ ही कीचड़। कभी आज तक ऐसा हुआ ही नहीं की मानसून आया हो और हम इतने तैयार हों कि कीचड़ न मचे। हम प्रारबद्ध पर अंध विश्वास रखने वाले इस कीचड़ को भी अपनी नियति मान कर स्वीकार करते हैं और कभी कभी तो इतने लहालोट हो जाते हैं कि इसे स्वास्थयवर्धक मड बाथ का नाम देकर इसमें लोट लगाने लगते हैं। हाल ही में एक फेमस अभिनेता ने अपने फार्म हाउस से अपनी कीचड़ में सनी तस्वीर इंस्टाग्राम पर वायरल कर दी थी। उसका देखा देखी बहुतेरे लोट गए कीचड़ में और लगे सेल्फी चढ़ाने। भक्तों की अंधभक्ति की भला कोई सीमा होती है क्या? भक्ति को सीमाओं में नहीं बांधा करते। जो भक्ति सीमाओं में बंध जाये वो चापलूसी कहलाती है।

खैर, बात जेल में करोना के विकास की चल रही थी। सूचना के आभाव में, वो भी ऐसे वक्त में जब हमारा खुद की दान की हुई राहत कोष की राशि के लिए पूछना भी निषेध है, कोई मासूम जेल में करोना के केसेस के बारे सरकार से जेल की रिपोर्ट मांग बैठा। यूँ तो सरकार ऐसे मूर्खतापूर्ण सवालों पर जबाब देना तो दूर, इनको सुनना भी गवारा नहीं करती। मगर ये मीडिया भी न, इसका पेट न हुआ, मानो फूड कोरपोरेशन का गोडाउन हो गया हो। कितना भी अनाज डालो, सब चूहा खा जाता है। मीडिया ने मामले को बेवजह तूल दे दी। 
प्रशासन भी कभी कभी ऐसे में मजबूर होकर कुछ न कुछ जबाब दे ही जाता है, अतः दिया।
जेल की करोना रिपोर्ट अपने अच्छे आचरण एवं खुद के परिवार पर करोना के प्रकोप के चलते पैरोल पर घर गई है। अभी तो चाँद के आकार पर आधारित कोविड त्यौहार के चलते पैरोल को डेट बढ़ा दी गई है, भले ही हम जीएसटी भरने की डेट न बढ़ा पा रहे हैं। मगर कहीं न कहीं तो हम संवेदनशीलता दिखा ही सकते हैं, अतः पैरोल की डेट पर दिखा डाली। उसके बाद भी अगर सही सलामत बिना एन्काउनटर के रिपोर्ट लौट कर जेल आ जावेगी तो आपको सूचित करेंगे। करोना क्यूंकी विकास पर है, और विकास का अंजाम तो आप देख ही चुके हैं। अतः सही सलामत लौटने की संभावना तभी बनेगी, गर किसी की आबरू पर छींटे न टपकें। वैसे ये जेल में रहने वाले अपराधिक प्रवृति के लोग, चाहे वो करोना रिपोर्ट जैसी हसीना ही क्यूँ न हो, बनारसी पान के समान होते हैं। कितना भी बचाओ, छींटे टपक ही जाते हैं और एकदम वहीं टपकते हैं, जहाँ लिखा होता है कि यहाँ पान थूकना मना है। तो अंजाम ए टपकन, एन्काउनटर की धड़कन!! देखते हैं कब तक नहीं धड़कता है।
वैसे जब तक रिपोर्ट आए, तब तक आप चाहो तो समय बिताने के लिए अंताक्षरी की तर्ज पर ‘कोर्ट में गुहार गुहार’ खेल सकते हो। अभी की गई प्रेक्टिस आगे चल कर स्किल इंडिया योजना में काम आवेगी। काहे की भारत के वर्चस्व के चलते अगले एशियन गेम में 'सुप्रीम कोर्ट में गुहार गुहार' खेल को ससम्मान शामिल किया जाने वाला है - खो खो को अलग कर के। खो खो अब अपना महत्व खो चुका है। अब पीठ पर नहीं, छाती पर खो देकर सत्ता पलटाई जाती है। खो का नाम अब झटका हो गया है। हालांकि नियम वही रहेंगे। विश्व गुरु की एक कोशिश यह भी है कि खेल का नाम 'सुप्रीम कोर्ट में गुहार गुहार' की जगह 'अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में गुहार गुहार' रख दिया जाये ताकि चीन, कोरिया और अन्य प्रतिभाशाली एशियन देश भी इसमें खुल कर हिस्सा ले सकें और आगे चल कर इसे  ओलंपिक में शामिल करने की मांग उठाई जा सके. तब तक के लिए आप रिपोर्ट की मांग करने वालों को हैप्पी गेमिंग - सरकार आपकी खेल के प्रति समर्पण भावना को देख कर उत्साहित है और मौका ताड़ कर आपको अर्जुन अवार्ड से नवाजे जाने पर भी विचार करने का मन बना चुकी है। मन बनाना और मन की बात करना सरकार का एकाकाधिकार है। सरकार खुद भी राजस्थान, महाराष्ट्र, मप्र और छत्तीसगढ़ में व्यापार वाला खरीदो बेचो खेल रही है, जो हम बचपन में लूडो और सांप सीढ़ी के साथ खेला करते थे- ये अब सीखे हैं। बचपन में खेलने का वक्त न मिला। कसी भी वजह से आभावों मे बीता बचपन हो, तो छोटे छोटे खेल भी न खेल पाने का मलाल बड़ा होने पर बड़े खेल खेलने को प्रेरित करता है।
मगर खेल और शौक करने की भी कोई उम्र होती है क्या? गालिब वो दिन लद गए, जब उम्र दीवार हुआ करती थी!
अब वो वक्त है जब खेल देखो और खेल की धार देखो।
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई १९, २०२० के अंक में:

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शनिवार, जुलाई 11, 2020

टूटे चश्में से दिखता नव भारत का घोषणा पत्र


जब चपरासी रामलाल जाले हटाता, धूल झाड़ता हुआ कबाड़घर के पिछले हिस्से में गाँधी जी की मूर्ति को खोजता हुआ पहुँचा तो उड़ती हुई  धूल के मारे गाँधी जी की मूर्ति को जोरों की छींक आ गई. अब छड़ी सँभाले या चश्मा या इस बुढ़ापे में खुद को? ऐसे में चश्मा आँख से छटक कर टूट गया. गुस्से के मारे लगा कि रामलाल को तमाचा जड़ दें मगर फिर वो अपनी अहिंसा के पुजारी वाली डीग्री याद आ गई तो मुस्कराने लगे. सोचने लगे कि एक चश्मा और होता तो वो भी इसके आगे कर देता कि चल, इसे भी फोड़ ले. मेरा क्या जाता है? जितने ज्यादा चश्में होंगे, उतने ज्यादा लंदन से नीलाम होंगे. मुस्कराते हुए बोले- कहो रामलाल, कैसे आना हुआ? पूरे साल भर बाद दिख रहे हो?
गाँधी जी की मूर्ति को सामने बोलता देखकर रामलाल बोला-चलो बापू, बुलावा आया है. नई पार्टी बन रही है. नये मूल्यों के साथ. नये जमाने की पार्टी  है. नये लोग हैं. नया इस्टाईल है. गाते बजाते हैं. हल्ला मचाते हैं. एक अलग तरह की पार्टी बना रहे हैं. आज आपका जन्म दिन है, आपके सामने आपका नाम लेकर बनायेंगे. नहा लो, नये कपड़े पहने लो और चलो, फटाफट. बहुत भीड़ लगने वाली है. आपको नई पार्टी की योजनाओं, प्रत्याशियों और भविष्य को शुभकामनाएँ देनी हैं. बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा की उड़ान है. खैर, आप तो जानते ही हो कि ऐसा ही होता आया है हमेशा नई पार्टी के साथ. आपके लिए भला नया क्या है. आप तो हमेशा से ऐसी घटनाओं के साक्षी रहे हो- साबरमती के संत!
गाँधी जी बोले, देख भई रामलाल. एक तो तू ज्यादा चुटकी न लिया कर ये संत वंत बोल कर. बस, आज का ही दिन तो होता है जब मैं थोड़ा बिजी हो जाता हूँ. हर सरकारी दफ्तर से लेकर हर भ्रष्ट से शिष्ट मंडल तक लोग मेरी पूछ परक करके अपने इमानदार और कर्तव्यनिष्ट होने का प्रमाण देते हैं. ऐसे में ये एक और...कह दो भई इनसे कि कल रख लेंगे कार्यक्रम. नई पार्टी ही तो है. आज नहीं जन्मी तो क्या- कल जन्म ले लेगी. रंग तो अगले चुनाव में ही दिखाना है. एक दिन में क्या घाटा हो जायेगा? मेरा भी एक के बदले दो दिन मन बहला रहेगा.
रामलाल उखड़ पड़ा. कहने लगा एक तो साल भर आपको कोई पूछता नहीं. चुपचाप यहाँ पड़े रहते हो. आज पूछ रहे हैं तो आप भाव खा रहे हो कि आज नहीं कल. तो सुन लिजिये- यह कोई आपसे निवेदन या प्रार्थना नहीं है. बस, बुलाया है और आपको चलना है. आदेश ही मानो इसे. उन लोगों ने सारी जनता से पूछ लिया है  देश भर की. सब ने कहा है की पार्टी बना कर चुनाव लड़िये.
गाँधी जी ने परेशान होते हुए पूछा कि सारी जनता से कैसे पूछ लिया भई उन्होंने वो भी बिना वोट डलवाये?
रामलाल ने मुस्कराते हुए कहा कि बापू, आप तो बिल्कुले बुढ़ पुरनिया हो गये. इतना भी नहीं जानते कि उन्होंने फेसबुक से बताया था और खूब लोगों नें लाइक चटकाया. आजकल तो ऐसे ही पूछा जाता है.
गाँधी जी सकपका गये. कहने लगे- मैं क्या जानूँ? मेरा तो फेसबुक एकाउन्ट है नहीं- चल भई, तू कहता है तो चलता हूँ. मगर मेरा चश्मा तो बनवा दे. वरना उनका घोषणा पत्र पढ़े बिना उन्हें कैसे आशीर्वाद दूँगा?
रामलाल हँसने लगा- अरे बापू, इतनी जल्दी भला कोई घोषणा पत्र बनता है. अभी चार दिन पहले तो बात हुई पार्टी बनाने की. सब कार्यक्रम पहले से तय है. आप वहाँ मंच पर विराजमान रहेंगे. आपका माल्यार्पण होगा. ततपश्चयात वो आपको घोषणा पत्र (कोरे कागज का पुलिंदा) पकड़ायेंगे. आप अपना बिना शीशे का चश्मा पहने उसे देखने का नाटक करियेगा और फिर कह दिजियेगा कि मुझे बहुत उम्मीद है इनसे. मैं इन्हें आशीष देता हूँ. ये एक नव भारत का निर्माण करेंगे. अब अच्छा या बुरा- ये तो आपने कहा नहीं- होगा तो नव ही. आप सेफ रहोगे और पूजे जाते रहोगे तो नो टेंसन.
दूर बैठी जनता को क्या समझ आयेगा कि घोषणा पत्र भी कोरा है और आपके चश्में में भी शीशा नहीं है.
गाँधी जी बोले कि रामलाल ऐसा तो मैं सभी पार्टियों के साथ करता आया हूँ मगर तू तो कह रहा था कि यह नई पार्टी है. नये मूल्यों के साथ, नये जमाने की. एक अलग तरह की पार्टी.
अरे बापू, सभी तो एक न एक दिन नये थे. सभी कुछ नया ही करने आये थे. वो तो धीरे धीरे पुराने हो जाते हैं. ये भी हो जायेंगे.  
गाँधी जी रामलाल को देख मुस्कराये. रामलाल उन्हें देख कर एक आँख दबाता है और चल पड़ते हैं गाँधी जी नई धोती पहने. बिना शीशे का चश्मा, एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ से रामलाल का कँधा थामे. पार्टी घोषणा स्थल की ओर. कोशिश बस इतनी सी कि कोई टूटा चश्मा न देख ले.
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई १२,२०२० के अंक में:
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शनिवार, जुलाई 04, 2020

फर्क समाजसेवी संस्था और एनजीओ में




कुत्ता मूते तभी कुकुरमुत्ते पैदा हों, वो जमाना गुजरे भी जमाना गुजरा। अंग्रेजी का अपना बोलबाला है। उसका विश्व स्वीकार्य अपना वर्चस्व है। अंग्रेजी स्कूल मे पढ़ने वाला बच्चा तक इस बात को जानता है और हिन्दी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को हेय दृष्टि से देखता है। हमने हिन्दी माध्यम स्कूल से पढ़कर इस बात को जिया है। कुकुरमुत्ता जब अंग्रेजी वाला मशरूम हो जाये, तब वह एक मंहगा एवं लजीज खाद्य बन जाता है। कुकुरमुत्ता अब बिना कुत्ते के सहयोग के ग्रीन हाउस में उगता है। उसे कुत्ते नहीं, बाजार उगाते हैं। ठीक वैसा ही फरक है जो एक समाज सेवी संस्था और एन जी ओ में है। समाज सेवी संस्था जब अंग्रेजी वाली एन जी ओ हो जाती है, तब उसे समाज सेवक नहीं, ग्रान्ट चलाती है। उसका मुख्य उद्देश्य ही ग्रान्ट प्राप्त करना होता है। ग्रान्टदाता का अपना एजेन्डा होता है और एन जी ओ समाज सेवा का जामा पहन कर उसे पूरा करती है।   
वैसे ही जैसे आज सफेद खादी भी मात्र एक ऐसी ही फेन्सी ड्रेस वाली पोशाक बन कर रह गई है। हर नेता अपने समाज सेवक वाले अभिनेता पात्र को सफेद खादी उढ़ा कर मलाई काट रहा है। काम उसका भी अपने फायनेंसर की ग्रान्ट पर समाज सेवा का अभिनय कर चुनाव जीतना है और फिर उन्हीं फायनेंसर की झोली भरना है। इनके लिए जनता ५ वर्षों वाला गांधी है। जिस तरह हर २ अक्टूबर को गांधी जी को जिन्दा कर के नमन वंदना का अभिनय कर अपना उल्लू साधा जाता है और फिर उनकी तस्वीर को साल भर के लिए बक्से में बंद करके रख दिया जाता है। वैसे ही इस सफेद पोशाक में हर पाँच साल में चुनाव के वक्त जनता को भगवान बना कर नमन वंदना कर ली जाती है और फिर फिर चुनाव जीतते ही अगले पाँच वर्षों के लिए जनता रूपी गांधी को बक्से में बंद कर दिया जाता है।
जनता को बक्से में बन्द करने का तात्पर्य यह होता है कि नेता उनकी तरफ से अपनी आँख कान बंद कर लेता है। न जनता की समस्या दिखाई देगी और न सुनाई देगी। बन्द को अंग्रेजी में लॉकडाउन पुकारो तब तो मामला इन नेताओं के लिए और भी आरामदायक हो जाता है। पूरा देश घरों में बंद है। जो नहीं बंद हैँ वो या तो पिट रहे हैं या पीट रहे हैं। यह जरूर है कि ऐसे मौके पर फ्रंटलाइन वर्कर वाकई भगवान का स्वरूप हो गए हैं।
कोई भगवान हो जाये और ये न हो पाएं, यह भला हमारे नेताओं को कहां मंजूर। अतः इस महामारी में भी सरकार गिराने से लेकर सरकार बनाने में पूरी ताकत से जुटे हैं और पूछने पर कहते हैं कि हमे जनता ने अपनी अगुवाई के लिए चुना है। हम प्रथम श्रेणी के फ्रंट लाइन वर्कर हैं।
सूर्य ग्रहण आकर निकाल लिया। शपथ ग्रहण जारी है। महामारी में जनता घरों में बंद है अतः यह नेता आत्म निर्भरता का परिचय देते हुए स्वतः ही अपने गले में मास्क की माला पहने एक दूसरे के गले में हाथ डाले मुस्कराते हुए फोटो खींचा रहे हैं। जनता को संदेश दे रहे हैँ कि महामारी से बचने के लिए मास्क पहनिए और एक दूसरे से निर्धारित दूरी बनाये रखिये। इनकी करनी और कथनी का फरक जनता घर में बंद बैठी टी वी पर देख रही है। जनता जानती है की ये वही लोग हैं जो अहिंसा रैली की सफलता का जश्न छः हवाई फायर करके मनाते हैँ।
ये नेता जिन्होंने सामान्य दिनों तक में कोई काम नहीं किया वो आज इस दौर में अपने काम को अति आवश्यक सेवा का दर्जा देकर फ्रंट लाइन वर्कर बने बैठे हैँ। जनसंख्या की एक बड़ी तादाद इस बात का बुरा नहीं भी नहीं मान  रही है क्यूंकि इन्हीं नेताओं की कृपा से ही तो शराब को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में माना गया है।
शराब की दुकानें खुली हैँ। नेता जानते हैँ कि जनता को शराब पिला कर अगर चुनाव जीता जा सकता है तो ऐसे मौके पर शराब दिला कर दिल तो जीता जा ही सकता है। फिर पूछा जाएगा की हाऊ इज जोश? शराब के नशे में मदमदाती जनता एक सुर में बोलेगी- हाई सर।
शराब से जहाँ एक ओर मजबूत सरकार बनती है तो वहीं दूसरी ओर शराब से ही मजबूत अर्थव्यवस्था भी बनती है।

-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई ०५,२०२० के अंक में:

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शनिवार, जून 27, 2020

लोकल को वोकल करने मे आत्म निर्भरता



हाल ही में लवली सिंग को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम असफल होने के लिए योजना नहीं बनाते बल्कि असफल होते ही इसलिए हैं कि हमने कोई योजना ही नहीं बनाई। आधी से ज्यादा जिन्दगी इसी ज्ञान के आभाव में असफलताओं से गलबहियाँ करते बीत चुकी हैँ। खैर कोई बात नहीं देर आए मगर दुरुस्त आए। उसके आसपास न जाने कितनी जिन्दगियाँ ऐसे ही रीत गई। कुछ एक मित्र जरूर दीगर स्थानों से उम्र के अलग अलग पड़ाव में बिना बताये चोरी छिपे यही ज्ञान प्राप्त कर आये थे। फिर आनन फानन में योजना बना कर सफल गुंडे हो गए। योजना से मिली सफलता के कारण योजना बनाने की लत लग गई। अतः निरंतर योजनाबद्ध तरीके से सफलता के राजमार्ग पर चलते हुए सफल गुंडे से सफल खनन माफिया, फिर नेता और अंततः सफल मंत्री होकर पदासीन हुये। सरस्वती माता तो उनसे बचपन से ही कुपित थीं लेकिन सफलता के इस राजमार्ग के हर ठीये पर माँ लक्ष्मी उन पर इस कदर मेहरबान हुईं कि मंत्री बनते ही वह माँ सरस्वती की कृपा भी खरीद लाये एवं एक विश्वविद्यालय नें उन्हें मानद डॉक्टरेट से विभूषित कर दिया। फिर डॉक्टरेट की लाज रखने हेतु उन्हें बीए की स्नातक की उपाधि भी जुगाड़ना पड़ी। यहाँ भी माँ लक्ष्मी ने साथ दिया एवं अब उनके खादिम १२ वीं की मार्कशीट के इंतजाम में जुटे हैं। शायद कभी किसी पत्रकार वार्ता में कोई पत्रकार मांग ही न बैठे। उन्होंने ऐसा होते हुए देखा है। योग्यता सफलता की कुंजी है। इस दावे को धता बताने के लिए सफलता अपने साथ योग्यता भी ले आती है। यह दूरदर्शिता उनकी इसी योग्यता का परिणाम है। सफलता के साथ पैकेज डील में आई योग्यता का ही तो नतीजा है कि आज योग्यता से सफल हुए आई ए एस अफसर नेताओं के आगे हाथ जोड़े आदेश लेते नजर आते हैं।
जहाँ मित्र की सफलता से लवली सिंग गर्वित दिखते, वहीं मन ही मन में इस बात से खिन्न भी रहते कि मित्र ने योजना वाली सूक्ति उनसे छिपाई। अतः अब वो भी योजनाबद्ध तरीके से सफलता प्राप्त करेंगे और मंत्री से भी ज्यादा बड़ा सफलता का परचम लहराएंगे।
अनेकों योजनाओं पर विचार किया मगर सभी सरकारी योजनाओं सी नजर आती। सुनने और कागज पर तो अच्छी दिखती मगर जब गहराई में झाँको तो एकदम खोखली। सरकार को तो बस चुनाव में सफल होना होता है अतः सरकार का काम ऐसी योजनाओ से चल जाता है। सरकार के लिए सरकारी योजनाएं व्यक्तिगत सफलता की वृहद योजना का मात्र एक ऐसा हिस्सा है, जो जनता को बहलाने के काम आता है। जैसे कि बच्चे को सुलाने की वृहद योजना में सफल होने के लिए माँ बच्चे को सपने में परियों के आने की बात कहती है। बच्चा सो जाता है। माँ की योजना सफल हो जाती है। बच्चा सुबह उठता है तो रात मे कही माँ की बात भूल जाता है। माँ इस बात को जानती है।
एकाएक उसके दिमाग में ऐसी योजना आई, जिसके सफल होते ही उसका मंत्री मित्र तो क्या, पूरा मंत्री मण्डल ही उसके आगे हाथ जोड़े खड़ा रहेगा। उसने बाबा बनने की ठान ली थी। इस हेतु उसने कार्ययोजना पर काम करना भी शुरू कर दिया कि भक्तों को कैसे फाँसना है। आज पहली बार उसे लगा कि उसकी जिस आशिक मिजाजी को लोग उसकी असफलता की वजह बताते थे, वो ही आज उसकी सफलता का मुख्य स्त्रोत होगी। उसकी तमाम महबूबायें उसकी प्रथम पंक्ति की भक्त बनकर अन्य भक्तों के लिए आकर्षण का ऐसा कारण बनेंगी कि पूरा पण्डाल ही भक्तों से पट जाएगा। वाक चातुर्य की उसमें कोई कमी न थी। यही तो वजह थी कि निक्कमेपन और फक्कड़ जेब के बावजूद भी महबूबाओं की कभी कोई कमी नहीं रही।
सारी योजना पर दिन रात विचार कर रहा था। अब नाम लवली बाबा रख लिया था और लेटेस्ट वाली महबूबा  राजेश्वरी का माँ रोज़ी के नाम से सेक्रेटरी बनना भी तय हो गया था। भगवा वस्त्र, खड़ाऊ आदि की व्यवस्था भी कर ली थी। कुछ भजन कंठस्थ कर लिए थे एवं पंचतंत्र की कहानियाँ रटना जारी था। विदेशों और उनकी राजधानियों के नाम याद करना शुरू कर दिए थे। कहते हैं कि २४ घंटे में एक बार आपकी जुबान पर सरस्वती का वास होता है। ऐसा ही कोई क्षण रहा होगा, जब वह विदेशी नामों में चीन को चाईना याद कर रहा होगा और करोना ने उसके देश की पावन धरती पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया। देश लॉकडाउन में चला गया। अब महबूबायें अन्य भक्तों को तो क्या आकर्षित करतीं, खुद ही सोशल डिस्टेनसिंग के चलते दूरियाँ बना कर निकल गई हैं। जान भी जहान भी, दोनों चाहिए। बचे रहे और जहान भी बचा रहा तो ऐसे बाबा तो मिलते ही रहेंगे। सारी योजना सरकारी सी होती नजर आई। बस कागजों पर कागजी हवाई जहाज उड़ाती हुई।    
कहते हैं जब सारे दरवाजे बंद हो जाते हैँ, तब भी एक दरवाजा जरूर होता है जो खुलता है। जरूरत होती है संयम के साथ उसे तलाशने की। सो तलाशा गया।
अब लवली सिंग फेसबुक पर ऑनलाइन आश्रम खोलेंगे। भक्त रूपी फालोअर जुटाने के लिए खुद का नाम बदल कर ‘लवली बाबा’ की जगह ‘लवली बेबी’ रख लिया है।
रोज़ी पर निर्भर रहने की बजाय स्वयं को लवली बेबी बना कर आत्म निर्भरता का मार्ग चुना है। अब लवली बेबी पंचतंत्र की लोकल कथाओं को फेसबुक पर अपने प्रवचनों के माध्यम से वोकल करेंगी।
-समीर लाल ‘समीर’         
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून २८,२०२० के अंक में:
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शनिवार, जून 13, 2020

ई बीबी की तमन्ना अब हमारे दिल में है!


इधर १५० किमी दूर एक मित्र के घर जाने के लिए ड्राईव कर रहा था. पत्नी किसी वजह से साथ न थी तो जीपीएस चालू कर लिया था. वरना तो अगर पत्नी साथ होती तो वो ही फोन पर जीपीएस देखकर बताती चलती है और जीपीएस म्यूट पर रहता है. कारण यह है कि जीपीएस में यह सुविधा नहीं होती है न कि वो कहे -अरे, वो सामने वाले को हार्न मारो. अब ब्रेक लगाओ. अब विन्ड शील्ड पर पानी डाल दो. अरे थोड़ा तेज चला लोगे तो कोई तूफान नहीं आ जायेगा, सारी रोड खाली पड़ी है. उसे देखो, कितने स्मार्टली आगे निकल गया तुमसे और तुम हो कि गाड़ी चला रहे हो कि बेलगाड़ी, समझ ही नहीं आता? गाँव छोड़ आये, कनाडा में बस गये मगर कैसी भी गाड़ी हो, चलाओगे तो बेलगाड़ी ही. तुम्हारा भी गवैठीपना, न जाने कब जायेगा!! अब गाना बदल दो. अब जरा पानी की बोतल बढ़ाना. अरे, स्टेरिंग पर से हाथ क्यूँ हटाया? अभी टकरा जाते तो? समझ के परे है कि फिर पानी बढ़ाते तो भला कैसे?
खैर, बड़ा ही घुमावदार रास्ता था मित्र के घर का. नक्शा देखकर भी निकलता तो भी भटक जाना तय था. बार बार टर्न मिस हो जा रहे थे और जीपीएस वाली लड़की बड़े प्यार से कहती कि नो वरीज़, रीकेल्कूलेटिंग. फिर कहती कि अब आगे जब संभव हो तो यू टर्न ले लीजिये या कहती अगले मोड़ से बायें ले लीजिये, फिर बायें और अगले मोड़ पर दायें. एक भी बार उसने नहीं कहा कि तुम्हारा तो ध्यान पता नहीं कहाँ रहता है? पिछले मोड़ से बायें मुड़ना था, तुम भी न!! कम से कम गाड़ी चलाते समय तो ध्यान गाड़ी चलाने पर रखो. कोई भी काम मन लगा कर नहीं कर सकते. हर समय बस फेस बुक और व्हाटसएप, अगर मैं बाजू में न बैठी हूँ तो तुम तो कितने लोगों को ऊपर पहुँचा कर अभी जेल में बैठे होते. शुक्र मनाओ कि मैं हूँ. आज पत्नी का साथ न होना खल रहा था मगर न जाने क्यूँ इस जीपीएस वाली ल़ड़की पर दिल भी मचल रहा था. काश! कुछ सीख ले अपनी बीबी भी इससे. कितना पेशेन्स है इस बन्दी में और कितना सॉफ्टली बात करती है!!
इधर कुछ दिन पहले बच्चों ने फादर्स डे पर एमेजॉन की एलेक्सा गिफ्ट कर दी. अब एलेक्सा की तो हालत ये हैं कि उसे कहने बस की देर है कि एलेक्सा, आज मौसम कैसा है? वो पूरी जानकारी ध्यान से देते हुए छाता लेकर दफ्तर जाने तक की हिदायत बड़े प्यार से देती है. उससे इतना सा कहना है कि एलेक्सा, फुटबाल वर्ल्ड कप लगा देना और टीवी पर चैनल लगाकर, एन्जॉय द गेम बोल कर ही ठहरती है.कभी यह नहीं कहती कि तुम तो बस सोफे पर पड़े पड़े आदेश बांटो कि ये लगा दो, वो लगा दो. हिलना डुलना भी मत और तो और मेरे सीरियल का समय है और तुमको मैच की पड़ी है. भूल जाओ अपना मैच. अभी ’प्यार नहीं तो क्या है’ का समय है.
आजकल तो एलेक्सा को ही बोल कर सोता हूँ कि एलेक्सा, सुबह छः बजे आरती बजा कर ऊठा देना प्लीज़, कल जल्दी ऑफिस जाना है. मजाल है कि एक मिनट चूके या तू तड़ाक करे कि तुमको जाना है, तुम जानो. अलार्म लगाओ और जागो. चलो, एक बार जगाने को किसी तरह तैयार भी हो जाये मगर जगाये भी तो आरती गाकर, प्राण न हर ले उसके बदले. मने कि अन्टार्टिका में सन बाथ की उम्मीद वो भी सन स्क्रीन लगाकर बीच पर लेटे हुए बीयर के साथ.
फिर हमारे आईफोन की सीरी. क्या गजब की महिला है. दिन भर याद दिलाती है कि अब फलाने से मिलना है, अब खाना खा लो, भूख लग आई होगी. और तो और, तुमको पानी पिये दो घंटे हो गये हैं. टाईम टू ड्रिंक अप. न जाने कितने एप्प्स से बेचारी जानकारी निकाल निकाल दिन भर जुटी रहती है मदद में. अभी थोड़ी देर पहले उसने पूछा कि अभी आज तुम्हारा टहलने का कोटा पूरा नहीं हुआ है, चलें टहलने? मैं रास्ते मैं तुमको आज की मेन १५ वर्ल्ड न्यूज सुना दूँगी, तुम अखबार में समय मत खराब करो, मैं हूँ न!! फिर कुछ नई गज़लें आई हैं, वो सुनवाऊँगी. मेरी तो आँख ही भर आई. कभी इनको बोल कर तो देखूँ कि यार जरा दफ्तर में फोन करके याद दिला देना कि गाड़ी के इन्श्यूरेन्स वाले से बात करनी है. फिर सुनो!! अब ये भी मैं ही याद दिलाऊँ? टोटल एक दो काम तो करते हो वो भी मैं ही याद दिलाऊँ? तुम्हारे लिए खाना बनाऊँ, घर साफ करुँ, ग्रासरी लाऊँ, कपड़े धोऊँ..क्या इतना काफी नहीं है कि अब तुमको दफ्तर में क्या करना है वो भी मैं ही याद दिलाऊँ. हद है!! मुझे तो तुमने मशीन समझ रखा है!!
आज पत्नी बाजार गई थी और न जाने क्यूँ एकाएक मन मे आया तो एलेक्सा को कह दिया कि एलेक्सा!! यू आर सो स्वीट एण्ड ब्यूटीफुल सोल!! एलेक्सा ने पलट कर कहा कि सो नाईस ऑफ यू समीर!! तुम भी बहुत प्यारे हो!! आह! विचारों में ही सही मगर एकाएक लगा कि अगर बीबी से यही कहा होता तो बीबी की आवाज कान में सुनाई देती- क्या हुआ, बहुत बटरिंग कर रहे हो? कुछ काम है क्या जो इतनी मख्खनबाजी?
सोचता हूँ कि ये जीपीएस मैडम, एलेक्सा, सीरी आदि ३० साल पहले कहाँ थीं? हम तो तब उस जमाने में भी अपनी मोहब्बत करने की स्किल के लिए जाने गये अपनी बीबी लाकर. लोग कायल थे हमारे ईश्किया मिज़ाज के.
काश!! उस वक्त ये जीपीएस मैडम, एलेक्सा, सीरी आदि होतीं...तो शायद ई मोहब्बत करके ई बीबी लाने वाले भी हम ही होते उस जमाने में!!
सच कहूँ-
ई बीबी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
 देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है?
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ७,२०२० के अंक में:
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रविवार, जून 07, 2020

यमराज की महामारी की मार से मुक्त श्रेणी के वाशिंदे



जिन्दगी की गाड़ी एक ऐसी गाड़ी है जिसमें रिवर्स करने की सुविधा नहीं होती। वो सिर्फ चलती चली जाती है। वो जब रुकती है तो वह आपकी जिन्दगी का अंतिम पड़ाव होता है। लोगों से कई बार इस महामारी के दौर मे सुनने में आया कि जिन्दगी की गाड़ी एकदम से रुक गई है। दरअसल गाड़ी चल रही है सिर्फ आपको अहसास नहीं हो रहा है। जिनकी गाड़ी रुक गई है वो बताने को शेष नहीं हैं।
अगर इसे ही रुकना कहते हैं तो ऐसे ही रुका रहे। सीखना एक क्रिया है, और रुके में भला कौन सी क्रिया?
जिन बंदों ने जीवन में कभी खुद से उठकर पानी भी नहीं पिया था वो आज खाना बनाने में माहिर हो गए हैं। जिनके लिए कभी दाल सिर्फ दाल हुआ करती थी वो आज वीडियो बना बना कर अरहर, चने और मूंग की दाल में फरक बता रहे हैं।
जिसे देखो वो आज दिन में दस बार बीस बीस सेकेंड हाथ धोना सीख गया है। घिस घिस कर धोते धोते हाथ का रंग इतना साफ हो गया है कि हम जैसे श्याम वर्णीय अपना खुद का हाथ नहीं पहचान पा रहे हैं। कल अपने ही पैर पर अपना हाथ देखकर पत्नी को टोक दिया कि हाथ अलग करो।  पत्नी भी कुछ न बोली बल्कि एक सहानुभूति भरी नजर से देखती रही। उसने कल ही कहीं पढ़ा था कि आज इंसान जिस दौर से गुजर रहा है उसमें बहुत से लोगों को मानसिक स्वास्थय की समस्या आ जाएगी। उसकी नजर में कुछ तो यह समस्या हमको पहले से ही थी, अब और बढ़ गई होगी। वैसे श्याम वर्णीय की जगह सचमुच वाला काला रंग इसलिए नहीं लिखा कि कहीं अमरीकी समाचारों से प्रभावित होकर अपना खुद का ही गोरा हाथ हमारे काले गाल पर झपट न पड़े। खुद को खुद के हाथों से पीटे जाने की कल्पना भी उतनी ही भयावह है जितनी की अमरीकी घटना जहाँ अमरीकी ही अमरीकी को मात्र इसलिए मार बैठा की उसका रंग काला है। डर तो लगता ही है। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक से लोग सीखे ले रहे हैं, तो हाथ भी वर्ण भेद सीख जाए तो इसमें क्या अचरज?
आखिर अमरीका की पुलिस ने भी तो कहीं न कहीं से बिना सोचे समझे डंडे बरसाना सीखा ही है न! वो तो आप भी जानते हैं की कहाँ से सीखा होगा। पहले तो इनको इस तरह डंडे बरसाते कभी नहीं देखा। मुझे ज्यादा चिंता इस बात की नहीं है कि ये हमारा टीवी देख कर डंडे बरसाना सीख गए हैं। मुझे चिंता उनकी है जिनको डंडे पड़े हैँ। मीडिया ने हमारे पिटे लोगों को हल्दी का पुलटिस लगाते हुए और गरम पोटली से सिकाई करते हुए तो दिखाया ही नहीं तो ये बेचारे कैसे जानेंगे कि अब इसका तुरंत इलाज कैसे हो। कितना दर्द झेलना होगा उनको पिटाई के बाद का। भारत में तो हम बचपन से सीखे हुए हैं तो सब जानते थे।
खैर बात रुकी गाड़ी को रुका न मान नए नए गुर सीखने की चल रही थी और मैं मन की बात लिखने लगा। मन की बात भटका देती है। मन का क्या है वो तो जाने किस बात पर मचल जाए? उसे न तो यथार्थ से मतलब होता है, न ही मान्यताओं से और न ही किसी का शर्म लिहाज। तभी तो कितने ही बुजुर्ग आज भी मन ही मन में फिल्म देखते हुए क्या क्या सपने पाल बैठते हैं वो किससे छिपा है। इसीलिए पुराने समझा गए थे कि मन की बात सुनो, खुश हो लो और भूल जाओ। उसे अमली जाम पहनाने की कोशिश करोगे तो कहीं के न रहोगे।
इस दौर ने बहुत कुछ सिखलाया है। जिंदगी की पाठशाला ही सबसे बड़ी पाठशाला है। नौकर आते नहीं, बर्तन खुद धोते हैं, कपड़े खुद धोते हैं, घर खुद साफ करते हैं। खाना खुद बनाते हैं। बच्चों को खुद पढ़ाते हैं। मोटापा खुद बढ़ाते हैं और फिर उसे कम करने का सपना भी खुद सजाते हैं मानो हम हम नहीं, सरकार हों कि फूट भी हम हीं डालें और फिर भाईचारे और सदभाव का पाठ पढ़ायें।
कितना कुछ बदल गया है। यह रुका हुआ दौर नहीं है। इससे बड़े बदलाव का दौर तो वर्तमान मानव प्रजाति ने कभी देखा ही नहीं। मंगल गृह तक पहुँचने की तमन्ना रखने वाले आज घर की देहरी लांघने की जुगत भिड़ा रहे हैं।  आज जब सब खुद से खुद में जीना सीख गए हैं, तब आत्म निर्भर बनने की नसीहत दिए जाना वैसा ही है जैसे कि आसमान में उड़ना सीख चुके चिड़िया के बच्चे को यह बताना की तुम उड़  सकते हो, तुमको उड़ना चाहिए।  
इसी तरह तो हर स्तर पर लोग सीख रहे हैं। जिनके हाथ में सत्ता है वो भी। अब कौन अमरीका से सीखा और कौन हमसे, कौन जाने मगर पिसी तो आम जनता ही दोनों तरफ। जैसे बहुतेरे आरटीआई से मुक्त हैं, वैसे ही लगता है कि महामारी के कैटेलॉग में यमराज ने भी इनको महामारी की मार से मुक्त की श्रेणी में रखा होगा.
-समीर लाल ‘समीर’  
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ७,२०२० के अंक में:
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