रविवार, फ़रवरी 05, 2017

रईस: एक नजरिया

नाम बड़े और दर्शन छोटे तो सुना था..मगर नाम बड़े और दर्शन खोटे. रईस की रईसी देखने गये थे और वहाँ रईस ऐसे कि अगर हमने बचपन में देख लिया होता तो कभी रईस बनने की तमन्ना ही न होती. फिल्म बॉक्स ऑफिस में बड़ा बिजनेस कर रही है, यही सोच कर देखने चले गये. 

अब हाल यह है कि इस फिल्म को देखने के बाद ऐसे परम ज्ञान के साथ लौटे हैं कि जनहित में रईस फिल्म देखने और पूरी खत्म होने तक बैठे रहने के लिए कुछ नुस्खे और वजह सुझा रहे हैं, इसके लिए:
  • ·         आपका शाहरुख खान का वैसा वाला फैन होना जरुरी है, जैसे मोदी के भक्त होते हैं. सही गलत, हंसी, मजाक, रोना, गाना चाहे जो हो, चाहे नोटबन्दी के दौरान एटीएम की लाईन में लगे लगे दम तोड़ दो, मगर ताली बजते रहना चाहिये और नारे लगते रहना चाहिये मोदी मोदी...
  • ·         आप इतना गरिष्ट भोजन खा करके सिनेमा घर में गये हों कि एक बार एसी में नरम आराम दायक कुर्सी में जाकर जो धंसे तो फिर चाह कर आलस्य के दामन से अगले ढाई घंटे तक हिलने का भी मन न करे जैसे नेताओं की चुनावी सभा में लोग लम्बे इन्तजार के बाद स्वागत समारोह से लेकर नेताओं के भाषण पर भाषण बिना सुने ही भीड़ के साथ ताली और नारा लगाते हैं.
  • ·         आप रईस को सही वाला रईस मान कर सिनेमा घर में प्रवेश न करें. ये गरीब वाला रईस अपनी दिलेरी और आत्म प्रवंचा में स्व घोषित तीक्ष्ण बनिया बुद्धि वाला शराब का दो नम्बर का वैसा व्यापारी है जो हर वक्त रुपये की कमी से जूझता हुआ खुद को रोबिन हुड की भूमिका में प्रस्तुत करने का असफल प्रयास करते करते अंत में मारा जाता है. बीच बीच में खुद को इतना सिद्धांतवादी घोषित करते हुए हिन्दु मुसलमान के प्रति एक सा व्यवहार और एक सा लंगर बंटवाते हुए ऐसा लगता है कि मानो कोई राजनेता मंच से खड़ा घोषणा कर रहा हो कि हम हिन्दु मुसलमान को बांटने वाली ध्रुवीकरण की राजनीति के पक्षधर नहीं हैं और फिर सभा के अंत में जोरदार नारा लगाया जाता है कि मंदिर वहीं बनायेंगे.
  • ·         सिनेमा घर का चयन करते समय यह ध्यान रखें कि टिकिट इतना मंहगा होना चाहिये कि बस खर्च की गई रकम साधने की बाध्यता में आप पूरी फिल्म देख कर ही उठें.  अब जब एक सारा दिन लगा कर, रेल गाड़ी मे लदे  चुनावी सभा में आ ही गयें हैं तो भाषण खत्म होने तक बैठ ही जाते हैं वाली मानसिकता का जागना जरुरी है.
  • ·         फिल्म देखने के लिए आपने अपनी पत्नी को बाजार जाने से रुकवा कर राजी किया हो अतः अपनी जिद की लाज बचाये रखने के लिए आपका फिल्म के अंत तक बैठे रहना जरुरी हो और बीच बीच में फिल्म को अच्छा बताना भी मजबूरी हो. इस बीच बीच में अच्छा बताने के लिए जब पूरी फिल्म आप खोज चुके होंगे और कुछ हाथ न लगेगा. तब फिल्म खत्म होने पर आप अपनी झेंप छिपाते हुए पत्नी से पूछेंगे कि कैसी लगी? आपकी झूठी तारीफ करना उसकी आदत का हिस्सा है अतः हमेशा की तरह ही आज भी आपको मायूस नहीं करेगी. पिछली बार आपके कहे पर ही उसने इस सरकार को वोट किया था. फिर सालों से आपसे छिपा छिपा कर बचाया उसका सारा धन एक मिनट में इस सरकार ने बाहर निकलवा दिया मगर फिर भी जब आज आप उससे पूछेंगे कि सरकार कैसी लगी? वो यही कहेगी- बहुत बढ़िया. क्या शानदार विकास किया है.
  • ·         इन सबसे भी ज्यादा मुफीद तरीका यह होगा कि किसी साथी को किसी जरुरी काम से कहीं जाना था वो आपको सिनेमा हाल में बिठाकर ढाई घंटे में लौट कर लिवा लेने का वादा कर चला गया हो और आपके पास घर लौटने के लिए मात्र उसके इन्तजार के कोई अन्य चारा न हो. जैसे हाल फिलहाल इस सरकार के पूरे पाँच साल किये बिना हटने की कोई गुँजाईश ही नहीं..इतना बड़ा बहुमत देकर बैठा दिया है. अब बैठे रहो और तमाशा देखो.
  • ·         एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि घर में बीबी ने अपनी सहेलियों के लिए किटि पार्टी रखी हो और आपको अगले ३ घंटे तक घर वापस आना अलाउड ही न हो..तब सड़क पर लम्फरेट करने से बेहतर है कि सिनेमा घर की आराम कुर्सी में ही बैठकर ऊँघा जाये. जैसे बजट भाषण के दौरान युवराज ऊँघ ही रहे थे. न ऊँघते तो जाते कहाँ? बाहर लोगों को क्या जबाब देते कि बजट समझ नहीं आ रहा था इसलिए चले आये.

बस यही कुछ विचार है जो दिमाग में उस वक्त कौंधे जब कल खुद को ढाई घंटे तक यह दिलासा दिलाते रहे कि तुम अकेले नहीं हो पूरा देश इसी हालत में है वरना काबिल से ज्यादा रईस चलता क्या भला?

-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के सुबह सवेरे में प्रकाशित 
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4 टिप्‍पणियां:

विकास नैनवाल ने कहा…

हा हा!! मैने तो अब इन बड़े बड़े सितारों की फिल्मे देखनी ही बन्द कर दी हैं। नाम बड़े और दर्शन खोटे ही होते हैं अक्सर। आप सही फँसे।

HindIndia ने कहा…

As usual amazing article .... really fantastic .... Thanks for sharing this!! :) :)

Kavita Rawat ने कहा…

चलिए इसी बहाने हमने भी रईस क्या होता है देख,समझ लिया। हम तो वैसे भी ऐसे ही इधर उधर से सुनकर मनोरंजन कर लेते हैं

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने।
फिल्म देखने के बाद बहुत सारे सवाल कौंध गये मन में