रविवार, अगस्त 08, 2010

वो रिश्ते..

आज कोई भूमिका नहीं. बस, कुछ ख्याल दिल से उपजे हुए:

cash

 

कहते हैं

रिश्ते खून के होते हैं..

या बनते है दिल से..

न जाने क्यूँ

कोई उन रिश्तों की बात नहीं करता

जो उपजते हैं मजबूरी में

पेट की भूख से

और विलीन हो जाते

जिस्म में कहीं!!

शायद जमाने की

चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें

अँधेरे में देख नहीं पाती!!

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

-समीर लाल 'समीर'

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98 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

बेचैन आत्मा ने कहा…

कोई उन रिश्तों की बात नहीं करता जो भूख से उपजते हैं और विलीन हो जाते हैं जिस्म में मगर हकीकत तो यही है कि यथार्त की धरातल पर वे रिश्ते ही जीवित दिखते हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

दिल का हो या खून का, रिश्ता झट बन जाय।
भूखे-नंगों से कोई, रिश्ता नही बनाय।।
--
मन को झकझोरती हुई,
बहुत ही उपयोगी रचना!

boletobindas ने कहा…

देखते तो हैं जी....पर देख कर अनजाना कर देते हैं जी.....भई बंद भी कैसे होने दे संसार का सबसे पुराना धंधा माना जाता है जी......अब गंदा है तो क्या है धंधा है ये .....

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

कहते हैं

रिश्ते खून के होते हैं..

या बनते है दिल से..

@ लेकिन आजकल तो ये रिश्ते नोटों के दम पर भी बनते है

कुमार राधारमण ने कहा…

परिस्थितियां बदली हैं। अब सिर्फ मज़बूरी में ऐसे रिश्ते नहीं बनते। सक्षम भी और ताक़तवर बनने के लिए ऐसे रिश्तों को हवा दे रहे हैं।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

कितने प्रकार के रिश्ते बनते हैं ... खून के, दिल के, मजबूरी के ...
बहुत सुन्दर रचना !

शिक्षामित्र ने कहा…

पैसों ने हमें बहुत कुछ दिया है मगर हमसे बहुत कुछ छीना भी है। पाश ने कहा था,सब ठीक है मगर सपनों का मर जाना ठीक नहीं। जिन रिश्तों की बात आपने उठाई है,वह इन सपनों के मर जाने से ही उपजी है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मजबूरी के ये रिश्ते शायद कोई याद भी नहीं रखना चाहता।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

आजकल ऐसे भी रिश्ते होते है जो भूख के खौफ से नहीं , शौक से बनते हैं ।
अब उनकी क्या मजबूरी और कैसी संवेदना ।

वैसे कालों से चलते आए इस नाकाम काम को अंजाम देने वाले भी तो हम ही है । सफेदपोश !

Udan Tashtari ने कहा…

ईमेल से प्राप्त भाई अमरेन्द्र त्रिपाठी का संदेश:



'' मजबूरी में उपजने वाले रिश्ते सच हैं हर काल / व्यक्ति के | इनके प्रति एक नए सोच का 'पैटर्न' भी आवश्यक है | मजबूरी के रिश्ते कितने सकारात्मक देखे जायेंगे , यह सवाल अभी भी है ! आभार ! ''

मो सम कौन ? ने कहा…

सही में सर, हमने अपनी संवेदनाओं को मार दिया है।

Shah Nawaz ने कहा…

मानवीय संवेदनाओं से भरी एक बेहतरीन रचना.

हम आज की आधुनिकता में इतने व्यस्त हो गए हैं, कि अच्छी से अच्छी रचना को भी पढ़ते हैं, विश्लेषण करते हैं और बस. कभी उनसे सीख लेने की कोशिश आखिर क्यों नहीं करते हैं? उनके सन्देश को ग्रहण क्यों नहीं करते हैं? :-(

वाणी गीत ने कहा…

मजबूरी में बने रिश्ते ...
पेट की भूख से ...
इनसे ज्यादा तकलीफ या घुटन क्या किसी और रिश्ते में भी होती होगी
इस पर तो कभी सोचा ही नहीं था ...

Shah Nawaz ने कहा…

दैनिक जागरण के राष्ट्रिय संस्करण के प्रष्ट न. ९ पर, कॉलम "फिर से" में आपका लेख "उन कदमों की आहट.. " प्रकाशित हुआ है.

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2010-08-09&pageno=9

ali ने कहा…

संबंधों ,संवेदनाओं और जीवन यथार्थ पर गहरा तंज !

राजकुमार सोनी ने कहा…

आपने जो ऊपर फोटो छाप रखी है.. आजकर सारे रिश्ते उसी के आसपास सिमटकर रह गए हैं।
एक रिश्ता जो मैंने आपसे कायम किया है वह है भाई का... इसके बीच कभी हरी-हरी पत्तियों की जरूरत नहीं आएगी.
आशा है आप ठीक-ठाक होंगे, मैं भी थोड़ा ठीक हो गया हूं.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

भूख से जाये रिश्ते ! लोग उसे आलोचनाओं के घेरे में कील से घेर देते हैं, बहते खून का कोई रिश्ता नहीं होता

arun c roy ने कहा…

EAK SAMVEDNA BAHRI KAVITA... BADALTE SAMAY KE MAR RAHI HAI MAANVIYATA... ACHHI RACHNA KE LIYE BADHAI

मेरे भाव ने कहा…

DESH SE ITNI DUR BAS KAR BHI BHARAT KEE BHOOKH KE LIYE AAPKE BHITAR BHAV DEKH KAR ACHHA LAGA. SUNDER ABHIVYAKTI

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

सभी रिश्ते पूर्व जन्म के
संस्कारों पर आधारित होते हैं!....
संवेदनायें और भावनायें इस जन्म के
संस्कारो पर आधारित होती हैं!..........

mukti ने कहा…

मजबूरी में भूख से उपजे रिश्तों को लोग रिश्ते मानते ही कहाँ हैं, जो उसकी बात करें.
बहुत अच्छी कविता. विचलित कर देने वाली.

'उदय' ने कहा…

...बेहद प्रसंशनीय रचना, बधाई !!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पेट की भूख से बनाये जाने वाले रिश्तों का कोई नाम नहीं होता ....यह महज़ एक कारोबार होता है ...और शायद जिंदा रहने के लिए यह एक तरह की मजबूरी भी है ....लेकिन जो महज़ क्षण भर के सुख के लिए ऐसे रिश्तों में लिप्त रहते हैं सच में तो उनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं ...
रचना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है ..

खुशदीप सहगल ने कहा…

हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो,
सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो,
हमने देखी है...

जय हिंद...

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सब रिश्‍ते तो पेट से बनते हैं फिर चाहे खून के हों या फिर भूख के।

निर्मला कपिला ने कहा…

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!
बिलकुल यही बात है। बहुत भावपूर्ण रचना है धन्यवाद।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

खून और दिल के भावों से अलग एक चीज़ है जो बहती है और बहाती है सम्बन्धों का प्रवाह। सही दिशा में इंगित करती पोस्ट।

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

एक अलग एहसास-सा दे गई आपकी यह रचना।

बहुत सुन्दर!

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

बहुत खूब समीर जी!
देखा जाये तो ये दौड़ हम सब भूखों की दौड़ ही तो है!
पहले शरीर को लगने वाली भूख
फिर मन के पागलपन की, महत्वाकांशाओं की भूख.
अंत में मुमुक्षा की भूख....

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi ने कहा…

अद्भुत!!!
एक एक पंक्ति वज़नदार
.
अच्ची रचना.
बधाई

Parul ने कहा…

rishton ke ek anchuye pahlu ko jabardast tarike se ukera hai aapne..
शायद जमाने की

चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें

अँधेरे में देख नहीं पाती!!

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती

shikha varshney ने कहा…

सच्ची बात ...मन को झकझोरने वाली रचना.

kshama ने कहा…

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!
Jaise satane lagtee hain,ham apna dhyaan kaheen aur kheench lete hain...nazarandaaz karna behtar samajhte hain..

honesty project democracy ने कहा…

ना जाने आज कल कैसी-कैसी मजबूरियां हैं जो लोगों को इंसान से हैवान बनने की और प्रेरित करती है ,दरअसल सामाजिक ढांचा ही लोभ-लालच का बनता जा रहा है और सरकारी कुव्यवस्था उसको पोषण और संरक्षण दे रही है |

KK Yadava ने कहा…

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

....रिश्तों की जमीं पर बेहद खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...बधाई.

P.N. Subramanian ने कहा…

सुन्दर रचना. फोटू में कोई काला गोरे को रिश्वत दे रहा है?

संजीव गौतम ने कहा…

sahi baat to yahi hai ki ziyadatar rishte give and take par hi tike hain. ye apne samay ka sach hai.

मनोज कुमार ने कहा…

संक्षिप्ति ही इस कविता की विशेषता है, स्‍फीति नहीं।
मार्मिक शब्‍दचित्र इस कविता में है।
शायद जमाने की चकाचौंध की
अभ्यस्त आँखें अँधेरे में देख नहीं पाती!!
या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को
ऐसी बातें अब नहीं सताती!!
आपकी ये बातें हमारे समक्ष यक्षप्रश्‍न के समान खड़ी है। उत्तर देने में सदियां बीत जाएं और शायद तब भी अधूरे ही रह जाएं।

कविता रावत ने कहा…

शायद जमाने की
चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें
अँधेरे में देख नहीं पाती!!
या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को
ऐसी बातें अब नहीं सताती!!
.........आजकल रिश्तों का बनाना बिगड़ना आपसी तालमेल और आदमी की प्रकृति पर निर्भर सा हो गया है ..
भावपूर्ण रचना के लिए बधाई

Akshita (Pakhi) ने कहा…

कित्ता अच्छा व सच्चा लिखा अंकल जी आपने....बधाई.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

bahut sadhe sabdo me aapne pyari se bbat kahi.......:)

dhanywad!

cmpershad ने कहा…

मृत संबेदनाएं नोटों से ही जीवित हो सकती हैं :)

बेनामी ने कहा…

रिश्तों की खूबसूरत व्याख्या .....के साथ ऐसा भी होता है ।

रचना ने कहा…

kafi samay baad ek achhci kavita padhii thanks

Mithilesh dubey ने कहा…

मजबूरी के ये रिश्ते शायद कोई याद भी नहीं रखना चाहता।

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

bahut kuchh kahati hui ..aakpki ye ...chhoti se rachna ...!!!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

शायद जमाने की

चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें

अँधेरे में देख नहीं पाती!!

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

दोनों ही बातें है ! सुन्दर भाव !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

शायद जमाने की

चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें

अँधेरे में देख नहीं पाती!!

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

बहुत सही कहा.

रामराम.

Sadhana Vaid ने कहा…

एक कटु यथार्थ को समेटे हुए सार्थक और सटीक रचना ! यह भी एक सच है कि आज के युग में सभी की संवेदनाएं या तो मर चुकी हैं या मूर्छित हो चुकी हैं ! जिनकी थोड़ी होश में हैं शायद वे ही यह अनाचार देख कर कविता कर्म की ओर उन्मुख हो गए हैं ! अपनी एक रचना की लिंक दे रही हूँ ! समय मिले तो अवश्य पढियेगा !
http://sudhinama.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html
सुन्दर प्रस्तुति के लिये बधाई !

हास्यफुहार ने कहा…

सच भी है, और कटु भी!

ana ने कहा…

bahut sundar kavita ...........aapki kalpanashakti ki koi parisima nahi hai

hem pandey ने कहा…

'कोई उन रिश्तों की बात नहीं करता

जो उपजते हैं मजबूरी में

पेट की भूख से

और विलीन हो जाते

जिस्म में कहीं!!'
- रिश्तों की एक और परिभाषा.

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 10 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

महफूज़ अली ने कहा…

दिल से उपजे हुए ख्याल बहुत अच्छे लगे... बहुत अच्छी और संवेदनशील कविता...

mridula pradhan ने कहा…

bahot achchi lagi .

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

समीर बाबू,
जेतना घिनौना ई सच है सायद ओतना घिनौना टिप्पनी हम लिखने जा रहे हैं..सब्द हमारा नही6 है.. चक्र फिल्म से नसीर भाई का एगो सम्बाद हैः
“दुनिया का सारा धंधा पेट के लिए और उसके नीचे वाले हिस्से के लिए ही तो चल रहा है.”
ई जबाब अश्लील हो सकता है और राही मासूम के सब्दों में ये टिप्पनी अश्लील है ज़िंदगी की तरह. माफ कीजिएगा समीर भाई... एमोसनल फूल हूँ और आपका कबिता एहाँ जाकर लगा है जिसको लोग दिल बोलता है... कम्बख्त इसीलिए पागल कहलाता है!!

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

हम्म

Sonal ने कहा…

bahut hi badiya likha hai...

mere new blog par sawagat hai..
http://asilentsilence.blogspot.com/

Udan Tashtari ने कहा…

Sonal ने आपकी पोस्ट " वो रिश्ते.. " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

bahut hi badiya likha hai...

mere new blog par sawagat hai..
http://asilentsilence.blogspot.com/

राज भाटिय़ा ने कहा…

आज ८०% रिशते ऎसे ही होते है,

ललित शर्मा ने कहा…

कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे बयां और

Asha ने कहा…

बहुत भावपूर्ण रचना |बहुत बहुत बधाई |
आशा

Ashish (Ashu) ने कहा…

उफ सच कहा आपने..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Udan Tashtari ने कहा…

शिवम् मिश्रा ने आपकी पोस्ट " वो रिश्ते.. " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

अभिषेक ओझा ने कहा…

नहीं सताती वाली बात ही यथार्थ लगती है !

अरूण साथी ने कहा…

सच यही है......


हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

अरूण साथी ने कहा…

सच यही है......


हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

डा सुभाष राय ने कहा…

समीर भाई, सच यही है कि कई बार खून के रिश्तों से भी ज्यादा गहरे मजबूरी में बने रिश्ते होते हैं. जब वह मजबूरी खत्म होती है तब ऐसे रिश्ते और गहरे हो जाते हैं और कृतज्ञता का भाव उन्हें एक आधार देता है.ऐसे रिश्तों को जो लोग सहेज कर राखी पाते हैं वे बहुत भाग्यशाली होटल हैं. अच्छी रचना के लिये बधाई.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

kamaal hai..

Babli ने कहा…

बिल्कुल सही कहा है आपने! बहुत ही गहराई के साथ आपने हर एक शब्द लिखा है ! उम्दा रचना!

nilesh mathur ने कहा…

मन को झकझोरती हुई, रचना!

sangeeta ने कहा…

The last two lines are just too good.

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

bahut sundar vichar badhai.

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत प्यारी पोस्ट...बधाई अंकल जी.

रंजना ने कहा…

क्या कहें....

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रचना विवशतावश जन्मे रिश्तोँ को बखूबी व्यक्त करती है ।
प्रशंसनीय ।

kabeera khara bajar mein ने कहा…

lajwab rachna. Hum sambadanhin grahak hi to bantey ja rahai hai

हर्षिता ने कहा…

दिल और दिमाग को झकझोर गई आपकी रचना समीर जी शुक्रिया।

RAJWANT RAJ ने कहा…

bhut sare rishton ke beech ek rishta pathk our lekhk ka bhi hota hai jo in tmam rishton ki babt btata hai .
thanks .

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

शायद जमाने की
चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें
अँधेरे में देख नहीं पाती!!
या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को
ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

मानवी संवेदनाओं और सम्बंधों पर तीव्र प्रहार करती रचना....

राम त्यागी ने कहा…

क्या कहें अब ...लोग कहाँ याद रखते हैं बिना मतलब के किसी को ...चिंतनीय अभिव्यक्ति !!

Dr.Bhawna ने कहा…

tekshn ktaksh ..

Pratul ने कहा…

वाह-वाह.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सारगार्वित प्रस्तुति....आभार

sanu shukla ने कहा…

बहुत सुन्दर....!

प्रतिमा ने कहा…

sahi kaha aapne

Kuldeep Saini ने कहा…

sochne par majboor karti hai aapki yah rachna

बवाल ने कहा…

शायद जमाने की चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें अँधेरे में देख नहीं पाती!! या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को ऐसी बातें अब नहीं सताती!!
क्या ही बड़ी बात कह गए लाला जी। अश अश!!

Pooja ने कहा…

Bahut khoob... Par kash ham jitni aasani se rishte bana lete hain, utni hi aasani se unhe nibhate bhi aur thoda jatan karke unhe sambhalte bhi...

अशोक बजाज ने कहा…

आपकी यह पोस्ट बड़ी अच्छी है .

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को ऐसी बातें अब नहीं सताती!! यही सच है ...रिश्तों के रंग तेजी से बदल रहे हैं ...यह मन की संवेदन हीनता ही है ..याद रह जाने लायक पोस्ट ..

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

वाह क्या खूब कही सर जी...अच्छी रचना

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत संवेदनशील ... चुप करा गयी ये रचना समीर भाई ....

Vandana ! ! ! ने कहा…

बहुत ही सटीक, संक्षिप्त और सोचने को मजबूर करती पंक्तियाँ . आपके ब्लॉग पर आके बहुत अच्छा लगा.

Vandana ! ! ! ने कहा…

बहुत ही सटीक, संक्षिप्त और सोचने को मजबूर करती पंक्तियाँ . आपके ब्लॉग पर आके बहुत अच्छा लगा.